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20141203

फिल्मों के साथ भेदभाव


 डीप फोकस : अ वेडनेसडे एक बेहतरीन फिल्म होने के बावजूद बॉक्स ऑफिस पे कामयाब नहीं हो पाई
इस शुक्रवार जेड प्लस रिलीज हुई है।  फिल्म आम आदमी की कहानी है।  एक आम आदमी को किस तरह वीआईपी  बना दिया जाता है।  और उसकी जिंदगी में क्या तब्दीलियां आ जाती हैं।  फिल्म वेडनेसडे में भी एक आम आदमी को अलग अंदाज़ में पेश किया गया है। इसी हफ्ते रिलीज हुई फिल्म ऊँगली में भी आम आदमी की कहानी बयां की गई है।  हिंदी सिनेमा के लिए आम आदमी हमेशा अहम मुद्दा रहा है।  लेकिन उन्हें दर्शाने के अंदाज़ अलग अलग रहे हैं।  दरअसल एक आम आदमी की कहानी को ख़ास तरीके से दर्शाना भी एक कला है।  बॉलीवुड में भी फिल्मों में दिखाए  गए आम आदमी के साथ भेदभाव किये जाते हैं।  यह गौर किया जाता है कि उसे गढ़ने वाला कौन है।  बॉलीवुड में अगर एक आम आदमी खुद को चुलबुल पाण्डेय के रूप में दर्शकों के सामने प्रस्तुत  किया जाए।  एक सुपरस्टार अगर बार बार यह कहे कि वह आम आदमी है तो दर्शक उससे देखना और सुनना दोनों पसंद करते हैं।  लेकिन अगर कोई आम चेहरा वही  किरदार निभाए तो वे खास नहीं बन पाते।  फ़िल्मी पत्रकार और समीक्षक भी आम स्टार की आम आदमी वाली कहानी देखना पसंद नहीं करते।  वे दोहरा व्यवहार करते हैं. नतीजन एक सुपरस्टार की  बुरी फिल्में भी हिट होती हैं।  एक   अच्छे कलाकार की अच्छी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफलता हासिल नहीं कर पाती। दोष हमारी आँखों का भी है। हिंदी फिल्मों में कहानी प्रधान फिल्में लाने की आवेश्यता है।  लेकिन हम इसपर गंभीरता से बातें नहीं करते।  ऐसी फिल्मों को बुद्धिजीवी फिल्मों की श्रेणी में लाकर सीमित कर दिया जाता है।  और जो इन्हे सपोर्ट करें उन्हें भी बुद्धिजीवी का तमगा दे दिया जाता है। हमें जरूररत है कि हम जेड प्लस , फिल्मिस्तान , जॉली एल एल बी व इस श्रेणी की फिल्मों को बेझिझक सपोर्ट करें। ऐसी फिल्मों का बॉक्स ऑफिस पर कामयाब होना भी जरुरी है वरना , हम मसाला फिल्मों की चपेट से बाहर नहीं आ पायेंगे 

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