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20141203

स्क्रिप्ट कंठस्थ होती है मुझे : आमिर


फिल्म पीके इस साल की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक है. इसकी वजह यह है कि फिल्म में आमिर मुख्य किरदार निभा रहे हैं और राजकुमार हिरानी इसे निर्देशित कर रहे हैं. मतलब दो परफेक् शनिस्ट का एक साथ होना इस फिल्म को खास बनाता है.

आमिर आपने ऐसा क्यों कहा कि यह आपके करियर की कठिन फिल्मों में से एक है?
चूंकि इस फिल्म को निर्देशित कर रहे हैं राजू हिरानी. राजू हिरानी जैसे निर्देशक जब किसी फिल्म से जुड़ते हैं तो आप समझ सकते हैं कि उससे कितनी उम्मीदें बढ़ जाती हैं. मैंने 3 इडियट्स के वक्त राजू से कहा था कि मंै कैसे 3 इडियट्स में 19 साल के लड़के का किरदार निभा सकता हूं. लेकिन राजू ने मुझे वह बनाया. सो, मेरे लिए ऐसे निर्देशक के साथ काम करना बहुत कठिन है. उनकी सोच पर खरा उतरना कठिन है. मैं बाकी फिल्मों में अपना अप्रोच भी लगाता हूं अभिनय में. लेकिन राजू की फिल्मों में मैं खुद को राजू के हवाले कर देता हूं. इस फिल्म में न सिर्फ मेरे फेशियल एक्सप्रेशन बल्कि कई चीजें आप देखेंगे कि कठिन है. फिल्म का जो लुक है, जो कहानी है. जो किरदार है. आम से अलग है. जैसा कि आप देख रहे हैं कि पीके आम आदमी नहीं है. सो, एक कलाकार पर यह प्रेशर होता है कि आप अपने निर्देशक की सोच को सही तरीके से एग्जीक्यूट कर पाये. बस इसी बात से विचलित हूं कि मैं अच्छा कर पाया हंू कि नहीं.
अक्सर कलाकार अपने आसपास के लोगों व दुनिया से सीखने की कोशिश करते हैं. क्या आप भी ऐसा कुछ रियाज करते हैं?
जी हां, बिल्कुल करता हूं. मैं अपने आस पास के लोगों को बहुत ध्यान से देखता हूं. और अगर मेरे किरदार में उसमें से कुछ ले सकूं तो लेने की कोशिश भी करता हूं. जैसे उदाहरण के तौर पर बताऊं. फिल्म 3 इडियट्स का रैंचो आपने गौर किया होगा कि वह कभी भी एक जगह खड़ा नहीं होता. हमेशा हिलता रहता है. या कुर्सी को पकड़ कर इधर उधर करता रहता है. यह दर्शाता है कि टीनएज में जो बच्चे हैं वे हमेशा उत्साही हैं. स्थिर नहीं होते. मैंने यह अपने चाचा के बेटे को करते देखा है. वह टीनएजर है अभी. तो मुझे लगा कि फिल्म में शायद मैं अपने किरदार को ऐसा दिखा सकता हूं. जो आॅथेंटिक नजर आयेगा. तो मैं सिखता रहता हूं. मुझमें यह खूबी है कि मैं लोगों को गौर करता हूं और फिर उनकी जो चीजें याद रखने लायक है. मैं याद रखता हूं.
किसी किरदार मेंं ढलने की आपकी प्रक्रिया क्या होती है?
ैमैं किसी किरदार में ढलने के लिए किसी जल्दबाजी में नहीं होता. बिल्कुल आराम आराम से, आप कह सकते कि मैं पूरी स्क्रिप्ट कंठस्थ कर जाता हूं. लेकिन रट्टा मारने जैसा नहीं. मान लीजिए कि मुझे फिल्म का पहला सीन करना है. मुझे स्क्रिप्ट दे दी गयी है तो मैं उसे पहले अपने हाथ से अपनी डायरी में लिख लेता हूं. डायरी मेरे पास आपको हमेशा मिलेगी. खुद से लिखने से होता यह है कि मुझे वह याद हो जाती हैं. मेरे साथ प्रशांत हैं. कई सालों से. वह हर दिन आते हैं. हम साथ में दिन की शुरुआत में पहला सीन डिस्कस करते हंै. फिर उसे इनएक्ट करते हैं. और एक दिन में बस एक सीन रिहर्सल करता हूं. फिर दूसरे दिन तक मुझे वह सीन याद हो जाते हैं. फिर हम दूसरे सीन की दूसरे दिन तैयारी करता हूं. मतलब जिस दिन मैं शॉट देने जाता हूं. उस दिन तक एक एक करके मैं पूरी स्क्रिप्ट की तैयारी कर लेता हूं. फिर अगर स्क्रिप्ट में बदलाव हो तो मैं फौरन पकड़ भी लेता हूं. अब जैसे फिल्म पीके के लिए मुझे भोजपुरी में संवाद बोलने हैं तो मैं उसे अपने तरीके से कंफ्यूजिया गये हो का...इसको अपनी डायरी में लिखूंगा रोमन में तो कनफूजिआ गये हो का...ही लिखूंगा. भले यह व्याकरण के हिसाब से अशुद्ध है. लेकिन अभिनय के हिसाब से शुद्ध है. जब जैसे टेलीफोन को मुझे टेलीफून बुलाना है तो मैं टेलीफून ही लिखूंगा. यही मेरी प्रैक्टिस है. एक तरह से मैं मानता हूं कि यह अभिनय के रियाज का ही प्रोसेस है.
फिल्म पीके के पहले जारी किये गये पोस्टर पर काफी शोर मचा? इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है.
ऐसा नहीं है कि हमें यह अनुमान नहीं था कि लोगों की किस तरह की प्रतिक्रिया आयेगी और हमने रातों रात यह निर्णय नहीं लिया था कि चलो कुछ ऐसा पोस्टर जारी करते हैं. यह सोच समझ कर जरूरत के अनुसार ही जारी की गयी है. आप फिल्म देखेंगे तो खुद आपको समझ आयेगी बात कि आखिर इस पोस्टर की उपयोगिता क्या थी. वह पोस्टर फिल्म का सार क्यों है. मुझे खुशी इस बात की भी है कि कई लोगों ने यह माना कि आमिर अगर कुछ ऐसा पोस्टर लेकर आ रहे हैं. और राजकुमार हिरानी की फिल्म है तो यह महज सिर्फ पब्लिसिटी का हिस्सा नहीं होगी. फिल्म में जरूर कोई ऐसी बात  होगी. सो, मैं चाहूंगा कि दर्शक खुद फिल्म देखें और इसके बाद अपना विरोध जारी करेंगे अगर उन्हें वाकई लगता है कि हमने महज सस्ती पब्लिसिटी के लिए ऐसा किया है. यह फिल्म का थीम है.
पीके किस तरह की फिल्म है?
मेरा मानना है कि यह एक यूनिवर्सल फिल्म है. यह बड़ों के लिए है. यह बच्चों के लिए है. यह एक परिवार के लिए फिल्म है. मर्दों के लिए है. औरतों के लिए है. छोटे शहरों के लिए भी है. बड़े शहरों के लिए भी है. फिल्म की कहानी यूनिवर्सल कहानी है. जिसे मतलब आप कहीं से भी देखें आप इससे खुद को कनेक्ट कर पायेंगे. राजू की फिल्मों में ड्रामा होता है और वह अपनी फिल्मों से हर फिल्म से एक अहम चीज बोलने की कोशिश करते हैं. जो अहम चीज वह कह रहे हैं, वह बहुत संजीदा बात होती है. लेकिन वह जो वेकिल(माध्यम) यूज कर रहे हैं कहने के लिए वह बहुत ह्मुमर होता है. यह बात आपको पीके में भी देखने को मिलेगी कि जो वह बात कह रहे हैं वह अहम है. लेकिन तरीका ह्ुमर है.
आमिर अगर यह बात की जाये कि आप किस तरह के आॅडियंस हैं. मसलन आप जब आॅडियंस की कुर्सी पर बैठे हैं तो आप फिल्मों को किस नजरिये से देखते हैं?
मुझे लगता है कि मैं बहुत इमोशनल आॅडियंस हूं. बहुत ज्यादा सेंसिटिव हूं. मैं तो फिल्मों में सीन देख कर रोने लगता हूं. लेकिन कुछ लोग तो रोते ही नहीं हैं. मुझ पर छोटी छोटी चीजों का असर होता है मुझ पर. और मुझे लगता है कि बतौर एक्टर यह एक अच्छी बात है. क्योंकि मुझे लगता है कि अगर आप कुछ फील नहीं कर सकते, तो आप उसे रिक्रियेट नहीं कर सकते. मैं किताबें बहुत पढ़ता हूं. किताबों में जो किरदार लिखे जाते हैं. उनका बहुत असर होता है मुझपर. जो लेखक डिस्क्राइब करता है. तो उन चीजों को मैं एबॉर्ज्ब करता हूं और अपने अभिनय में निखारने की कोश्सि करता हूं

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