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20140220

दशरथ के गांव में आमिर

 आमिर खान ने तय किया है कि वे अपने शो सत्यमेव जयते की शुरुआत माउंटेन मैन दशरथ मांझी के घर जाकर करेंगे. पिछले सीजन में दशरथ मांझी के बारे में थोड़ी चर्चा हुई थी. उस वक्त आमिर को दशरथ मांझी के योगदान के बारे में जानकारी मिली थी और वे उनसे इस कदर प्रभावित हुए कि उन्होंने तय किया कि वे उनके परिवार से मिलेंगे. ताकि उनके बारे में वह जानकारी हासिल कर सकें. बी टाउन में तो इस बात को लेकर चर्चा भी शुरू हो गयी है कि हो सकता है कि भविष्य में आमिर दशरथ मांझी पर किसी फिल्म का निर्माण करें. हालांकि अभी बातें हवा में ही हैं. लेकिन आमिर का वहां जाना और दशरथ मांझी के बारे में जानकारी हासिल करना. उनमें दिलचस्पी लेना इस बात की तो तसल्ली दिलाता है कि ऐसी शख्सियत सुपरस्टार्स को प्रभावित करती है. पिछले कई सालों से दशरथ मांझी को लेकर कई फिल्में बन रही हैं. लेकिन अब तक किसी भी फिल्म का प्रदर्शन मुमकिन नहीं हो पाया है. दशरथ मांझी पर फिल्म को लेकर जंग छिड़ने की वजह यही है कि यह एक महानतम शख्सियत की जिंदगी पर बनी कहानी है, जिसके बारे में बिहार से बाहर लोगों को कम जानकारी है. इन दिनों यह ट्रेंड है कि ऐसी कहानियां जब सेलोलॉयड परदे पर आती हैं कि उन्हें दर्शक बेहद पसंद कर रहे हैं. खासतौर से मेट्रो के दर्शक और जाहिर सी बात है यही मुनाफा का जरिया भी है. शायद यही वजह है कि इन दिनों ऐसे विषयों को लेकर होड़ मची हुई है. वास्तविकता तो यह है कि वाकई दशरथ मांझी जैसे शख्स पर एक अदद और ईमानदार फिल्म की जरूरत है. आमिर खान जैसे अभिनेता ऐसी फिल्मों के साथ हर रूप में न्याय कर सकते हैं. अगर वाकई कभी उनके मन में यह ख्याल आये तो .चूंकि आमिर कर्मशियल मुनाफे के साथ साथ फिल्म को विषयपरक अहमियत भी दे पायेंगे.

20140218

कहानी की खोज सबसे बड़ी चुनौती होगी : कमलेश पांडे


मैं सीधे तौर पर मानता हूं कि आनेवाले सालों में बल्कि यूं कहें आने वाले कई सालों में हिंदी सिनेमा व टेलीविजन दोनों ही जगत में कहानी की खोज ही एक बड़ी चुनौती होगी. मेरा मानना है और मेरी समझ है कि हां, हमने अपने तकनीक में सिनेमा को हॉलीवुड के समकक्ष लाकर खड़ा कर दिया है. हमारी फिल्मों की एडिटिंग अच्छी हो गयी है. सिनेमेटोग्राफी अच्छी हो गयी है. हम तकनीक रूप से काफी आगे बढ़ चुके हैं. लेकिन हमने कहानी को फिल्म की आखिरी जरूरत बना दी है. आज फिल्मों में खूबसूरत चेहरा है. खूबसूरत आवाज है. चमक है. धमक है. कुछ नहीं है तो बस कहानी नहीं है. जो हमारी पहली जरूरत होती थी. अब आखिरी हो चुकी है. फिल्मों का शरीर खूबसूरत हो गया है लेकिन आत्मा खो चुकी है. आपने बाजारों में देखा होगा जिस तरह दुकानों में औरतों और मर्दों के पुतले खड़े होते हैं. खूबसूरत से कपड़े पहन कर और उन डम्मी क ो देख कर आप किसी दुकान में प्रवेश करते हैं. लेकिन उनमें जान नहीं होती. फिल्मों की भी यही स्थिति हो गयी है. अभी हाल ही में मैं बंगलुरु में था. फिक्की के कार्यक्रम के लिए. स्क्रिीप्टिंग का वर्कशॉप कर रहा था. वहां जितने बच्चे थे मैंने उनसे कहा कि 2003 से लेकर अब तक 2013 में 10 सालों में कम से कम आठ हजार फिल्में बनी हंै. तो कोई दो फिल्मों का नाम बताओं जो आपको आज भी याद है. किसी ने कोई उत्तर नहीं दिया. लेकिन हमारा सिनेमा यह तो नहीं था. हम आज भी शोले, मुगलएआजम, श्री 420, आवारा और कई फिल्में देखना पसंद करते हैं. आज भी इन फिल्मों का हैंगओवर हम पर  से उतरा नहीं है. आज भी ये फिल्में प्रासंगिक लगती हैं और हम पर उतना ही असर छोड़ती हैं. जबकि कितनी पुरानी हो चुकी हैं. लेकिन पिछले कई सालों में जो फिल्में बनी हैं और जिन फिल्मों ने 100 करोड़, 200 करोड़ क्लब में शामिल होने का दावा ठोखा है,. क्या वे फिल्में 10 साल बाद भी याद की जायेगी. शायद नहीं. तो मेरी समझ से फिल्मों ने अपनी आत्मा को खोया है और कहानी ही उसकी आत्मा है. मुझे तो लगता है कि अब फिल्म और टेलीविजन में उन लोगों की भी कमी हो गयी है जो अच्छी कहानियों की पहचान कर सकें. हां, मैं यह जरूर कहना चाहूंगा कि पिछले कुछ सालों में हिंदी सिनेमा और टेलीविजन ने जो मार्केटिंग स्ट्रेजी तैयार की है वह अब विशेषता बन चुकी है. जिस तरह से यहां फिल्मों की मार्केटिंग की जाती है कि बुरी से बुुरी फिल्में भी रिलीज होती हैं और दर्शक जाते ही देखने. चूंकि दर्शकों को तो फिल्म चाहिए हर वीकएंड. फिर वह बुरी हो या अच्छी तो उस लिहाज से आनेवाले सालों में भी मार्केटिंग की वजह से फिल्में चलेंगी. लेकिन मैं मानता हूं कि आप इसे कामयाबी न समझें. हिम्मत हैं तो वैसी फिल्में बनायें जो 10 साल के बाद भी प्रासंगिक हो. टीवी की बात करें तो वाकई बड़े परदे से वह किसी भी तरह कम नहीं हैं. लेकिन चूंकि वहां भी  कहानियों की कमी है तो लोगों ने वहां रियलिटी शोज से काम चलाना शुरू कर दिया है तो आनेवाले साल में यह चुनौती फिर से रहेगी कि हम कहानियों की खोज करें. मैं पूछता हूं कि क्या है सैटेलाइट चैनल्स के पास तो इतने पैसे हैं तो क्यों नहीं वह नये तरह के शोज और कहानियों को लेकर आता है. 80 के दशक में जो टीवी ने गोल्डन एरा देखा है वह फिर से क्रियेट क्यों नहीं कर पाता. इसकी सीधी वजह यह है कि सैटेलाइट चैनल के पास पैसे हैं. लेकिन सोच नहीं है. हिम्मत नहीं है. साहस नहीं है. साहस है तो जायें ऐसे जगहों पर जहां कहानियां हैं और ढूंढ कर निकालें. हर चैनल पर आपको रियलिटी शोज ही नजर आते हैं और एक से होते हंै.तो मेरा मानना है कि फिल्मों और धारावाहिक छोटे परदे का इम्तिहान यही है कि वह कब तक लोगों के जेहन में जिंदा हैं. मुख्य मकसद यही है कि वह कब तक लोगों के साथ चल पाती है. लोगों को लग रहा है कि अरे 100 करोड़ 200 करोड़. तो मैं कहना चाहूंगा कि जनाब यह सब कामयाबी का सबूत नहीं है. बल्कि यह चमत्कार मार्केटिंग है. मार्केटिंग को आपने विशेषता बना ली है और फिल्म मेकिंग और टेलीविजन मेकिंग को कहीं पीछे छोड़ दिया है. और जो लोग ये सारी बातें करते हैं. उन्हें आप कहने लगते हो कि जमाने के साथ आप नहीं चल रहे. जबकि हकीकत यही है कि जो लंबे समय तक आपके साथ रहे वही असली कहानी है. वही अच्छी सिनेमा है. वही अच्छी टीवी है. टिकट के दाम बढ़ा कर, हजारों स्क्रीन पर फिल्में रिलीज करके तीन दिनों में पैसा कमा कर आप सोच रहे हैं कि आप कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं तो यह आपकी गलत सोच है. हालांकि भाग मिल्खा भाग और रांझणा जैसी फिल्में अपवाद रही हैं. बात वही है कि बबूल के पेड़ को भी लोग पड़ समझने लगते हैं तो कुछ फिल्में हैं जो अंधों में काना राजा बन जाती हैं. लेकिन इसका मतलब आप यह समझ लें कि बहुत अच्छे काम हो रहे तो मैं नहीं मानता. चुनौतियां यही हैं कि फिल्मों में नये लोगों को जो मौके मिल रहे हैं, वे मिलते रहें. प्रतिभाओं की खोज हो, अच्छी कहानियों की खोज हो, छोटे परदे पर रियलिटी शोज कम हो. अच्छी कहानियों वाले शोज आये और जितना आगे बढ़ें अपने इतिहास की धरोहर को सहेंजे. वह गोल्डन ऐरा वापस लाने की कोशिश करें
लेखक फिल्म व टेलीविजन लेखक हैं. रंग दे बसंती जैसी फिल्मों का लेखन 

पापा की वजह से बदला शीषर्क : सलमान खान


फिल्म दबंग 2 के बाद एक बार फिर सलमान खान की दर्शकों के साथ जय हो की गूंज करने जा रहे हैं.

सलमान, पहले आपकी फिल्म का नाम मेंटल था. फिर अचानक फिल्म का नाम जय हो रख दिया. कोई खास वजह?
वजह साफ थी कि हमारे डैड ने कहा कि मेंटल नाम अच्छा नहीं है. लोग इस फिल्म के बाद हो सकता है कि मुझे मेंटल खान कहने लगते और डैड ये नहीं चाहते थे. सो, उन्होंने हमसे पूछा कि फिल्म में तुम्हारे किरदार का नाम क्या है. मैंने बताया कि जय है तो उन्होंने कहा कि जय हो रख दो. चूंकि फिल्म में जय का किरदार आम आदमी का किरदार है और वह हमेशा भ्रष्टाचार मिटाने की कोशिशों में जुटा रहता है और इसी तरह फिल्म में लोग जय की जय जय कार कहते हैं.
तो सलीम खान ही आपकी फिल्मों का स्क्रिप्ट सुपरविजन करते हैं?
जी हां, बिल्कुल जब घर में इतने महान लेखक हैं तो हम बाहर क्यों जायें. हम तीनों ही भाई अगर कई दिनों तक किसी सीन पर अटके हुए हैं और सोच रहे हैं कि आखिर क्या किया जाये. तो सीधे डैड को ही फोन लगाते हैं. फिल्म में हमने संवाद लिखा है कि आम आदमी कोई पॉलिटिकल पार्टी नहीं होता. आम आदमी आम आदमी होता है. ऐसे संवाद डैड ही बता सकते हैं. उन्होंने दुनिया देखी है. वे जानते हैं कि कहां क्या सटीक चीजें लिखी जा सकती हैं. तो बाप तो बाप ही होता है. उनके ऊपर तो हम नहीं. भाड़ में जाये दुनिया हम तीनों के लिए डैड  महत्वपूर्ण हैं. उन्होंने कह दिया कि नहीं रखना तो भले ही हमने शीषर्क पर कितने भी पैसे खर्च कर दिये हों. हम नहीं रखेंगे.
कभी सलीम खान साहब को आप तीनों भाई यह कर मनाने की कोशिश नहीं करते कि उन्हें दोबारा लिखना चाहिए?
वह हमारे बाप हैं हम उनके नहीं और ऐसा नहीं कि वे लेखन से दूर हुए हैं. जब मौके मिलते हैं तो वह लिखते हैं. हमारे ही होम प्रोडक् शन की फिल्में उनके सुपरविजन से ही बनती हैं. इंशाह अल्लाह वह लिखे तो हमें खुशी होगी.
सोहेल खान को काफी लंबा इंतजार करा दिया आपने. इस बीच अरबाज के लिए दो फिल्में बना ली तो सोहेल नाराज नहीं हुए?
अरे भाई है मेरा. मुझे पता है कि किस वक्त क्या सही होगा. अपने घर की बात है. जब जय हो जैसी फिल्म का समय आया तो कर रहा हूं. उस वक्त दबंग नहीं करता तो दबंग का क्रेज खत्म हो जाता है. सबका अपना टाइम होता है. पैसे तो घर से ही जा रहे हैं या आ रहे हैं.
तो कभी भाईयों में मतभेद नहीं होता इन बातों को लेकर?
इन बातों को लेकर तो नहीं होता कि भाई आपने अरबाज की फिल्में कर दीं. मेरी नहीं. हां, संवाद को लेकर होता है. तो हम डिस्कस करते हैं. वह लड़ाई तो अच्छी लड़ाई है.
अगर सोहेल और अरबाज दोनों को बतौर निर्देशक के रूप में परिभाषित करना हो तो किस तरह करेंगे?
सोहेल और अरबाज दोनों की फिल्में बनाने का अंदाज अलग है. दोनों दो लोग हैं. दोनों को अलग तरह की कहानियां पसंद आती हैं. सीन को लेकर लोगों का अप्रोच अलग है.
लेकिन अचानक एक् शन फिल्में बनाते हुए आम आदमी व भ्रष्टाचार की फिल्में क्यों?
मुझे काफी दिनों से इच्छा थी कि कोई ऐसी फिल्म करूं. मैं आमतौर पर भी सामाजिक चीजों में दिलचस्पी लेता हूं और मुझे लगता है कि ऐसे विषयों पर हमें फिल्में बनानी चाहिए क्योंकि लोग आपको अगर सुनते हैं तो फिल्म में दिखाई गयी चीजों पर भी विश्वास करेंगे.
आप जब भी किसी फिल्म को लेकर आते हैं. लोगों की उम्मीदें पहले से ही काफी बढ़ जाती है कि फिल्म सुपरहिट होगी. आप बॉक्स आॅफिस की सफलता को किस तरह से देखते हैं?
मैं चाहता हूं कि मेरी फिल्में फ्लॉप न हो. मेरी कोशिश होती है कि मैं उसी तरह की कहानियों पर फिल्में बनाऊं, जिसे मैं देखना पसंद करूंगा. मुझे फिल्मों में हर हाल में इमोशनल कोशेंट चाहिए. अब आप देखें तो बॉडीगार्ड फिल्म सिर्फ लास्ट के 20 मिनट के कारण चली.जहां इमोशल कोशेंट था. भैयाजी आ रही है उसमें तो सबसे ज्यादा है इमोशन. दबंग में मां और बेटे का इमोशन फिर पिता के साथ जो कि उसका अपना पिता भी नहीं होता. फिर पत् नी के दिखाया गया रोमांस तो मेरे लिए इमोशनल कोशेंट होना फिल्म के लिए जरूरी है. वह है तभी मैं फिल्में करता हूं, फिर चाहे कॉमेडी हो या कोई आम फिल्म.
डैजी फिल्म में मुख्य किरदार निभा सकती हैं. जेहन में यह ख्याल कैसे आया?
मुझे याद है कहीं किसी फिल्म की शूटिंग चल रही थी. डैजी वहां कोरियोग्राफर के रूप में थी. मैंने उसे दूर से देखा तो अपने लोगों से पूछा कि ये लड़की कौन है. पता चला कि कोरियोग्राफर है. मैंने बोला कि अरे इसे तो एक्टिंग करनी चाहिए. हालांकि वह तैयार नहीं हुई. बोली नहीं नहीं जो मैं कर रही वही ठीक है. लेकिन उसे कंनविंस किया. मुझे नये लोगों को मौके देना अच्छा लगता है. जल्द ही आदित्य पंचोली के बेटे को लांच करूंगा. अरे जब टैलेंट को निखार सकते हो तो निखारना चाहिए.
बिइंग हुमन का कई बार लोग गलत फायदा भी उठाते हैं. इस बारे में क्या कहना चाहेंगे आप?
हां, मुझे ऐसे लोगों पर बहुत गुस्सा आता है जो आकर कहते हैं कि मुझे 4 लाख देदो घर खरीदना है. शादी करनी है. मुझे लगता है मैं थप्पड़ मारूं कि जाओ काम करो. मैं चाहता हूं कि जो जरूरतमंद है. उसकी मदद हो न कि आप कुछ भी करो.
इस बार शाहरुख ने आपका रिकॉर्ड तोड़ा तो क्या उम्मीद है कि आप जय हो से उनका रिकॉर्ड तोड़ पायेंगे.
यह सब आंकड़ें आप लोगों की ही देन है और आप लोग ही इसके बारे में अधिक बता पायेंगे.मैं बस इतना जानता हूं कि हां, एक दूसरे से हेल्दी कांप्टीशन हो तो ही अच्छा. दर्शक मेरी फिल्में देखें. सिंगल स्क्रीन में तालियां बजें. तो मैं उसमें ही संतुष्ट हूं. मैं कोई इमेज से बंधा नहीं हूं और किसी भ्रम में भी नहीं कि अरे देखो मेरी फिल्म कम बिजनेस कर रही तो मैं लॉस में हूं. हां बस इतना चाहता हूं कि जिन्होंने पैसे लगाये हैं. उन्हें मिल जाये.
आपकी आनेवाली फिल्में
किक और सूरज की फिल्म. सूरज की फिल्म से आपको वापस रोमांटिक प्रेम को देखने का मौका मिलेगा.

फिल्में मेरा शौक हैं : फरहान अख्तर


निर्माता, निर्देशक,अभिनेता, लेखक, गायक फरहान अख्तर इन दिनों अभिनेता के तौर पर इंडस्ट्री में अपनी जगह पुख्ता कर चुके हैं. भाग मिल्खा भाग के लिए इन दिनों हर एवार्ड समारोह में जमकर पुरस्कार बटोर रहे फरहान जल्द ही कॉमेडी फिल्म शादी के साइड़ इफेक्टस में नजर आएंगे. वे अभिनेता के तौर पर अलग अलग किरदारों और जॉनर की फिल्मों के जरिए खुद को चुनौती देना चाहते हैं.  
 
मेरा किरदार भगौडे किस्म का:  
 यह फिल्म तृषा(विद्या बालन) और सिद्धार्थ(मैं) की कहानी है. शादी और फिर बच्चे के बाद इनकी जिंदगी में किस तरह से प्यार गायब हो जाता है इसी की कहानी यह फिल्म है. जहां तक मेरे किरदार की बात है सिद्धार्थ भगौडे किस्म का है जो हर परिस्थितियों से भागता रहता है. उसकी अपनी काल्पनिक दुनिया है और वह उसी में रहना चाहता है. उसे लगता है कि शादी के बाद उसका बैचलरहुड खत्म हो गया है. जिम्मेदारियों के नाम पर वह म्यूजिशियन बनने का अपना सपना कहीं खो बैठा है. उसे लगता है कि शादी और फिर बच्चे ने उससे उसकी सभी खुशी और सपने छीन लिए हैं.

शादी नहीं जिम्मेदारियां जिंदगी बदलती है: मेरा मानना है कि शादी नहीं उससे जुड़ी जिम्मेदारियां जिंदगी बदलती हैं. जिम्मेदारियां हर कोई नहीं निभा सकता है. यही वजह है कि लोग शादी को दोष देने लगते हैं खुद को दोष नहीं देते हैं.

सफल शादी के मंत्र: सफल शादी के मंत्र आप हमेशा सॉरी बोलने को तैयार रहें फिर चाहे गलती आपकी पत्नी की ही क्यों न हो. मजाक कर रहा था. हकीकत में अगर आपको अपनी शादी को सफल बनाए रखना है तो अपने पार्टनर की जिन खूबियों की वजह से आपने उससे शादी की थी. उसे हमेशा याद रखिए और छोटी मोटी गलतियों को नजरअंदाज करना सीखें.

ग्लैमर वर्ल्ड में शादियां नहीं टिकती गलत धारणा: 
इन दिनों ग्लैमर वर्ल्ड की एक दो शादियां टूट गयी है तो उससे एक बहस ही शुरु हो गयी है. उस बहस के बारे में मैं एक शब्द में कहूं तो हमें दूसरी की निजता का सम्मान करना चाहिए इसलिए मैं किसी की भी पर्सनल लाइफ पर कमेंट करना पसंद नहीं करता हूं. जहां तक बात ग्लैमर वर्ल्ड की है तो ग्लैमर इंडस्ट्री से जुड़े होने की वजह से शादियां चलती है या नहीं चलती ऐसा नहीं है.  मुझे लगता है कि इंसान इंसान होते हैं. उनके प्रोफेशन से उनका कुछ लेना देना नहीं होता है. यह पूरी तरह से गलत धारणा है.

 मेरी शादी पर भी हुई है टीका टिप्पणी: 
शादियों के बनने या टूटने से पहले मीडिया की रिपोर्ट पहले ही शुरु हो जाती है. इनकी शादी होने वाली हैं. इनकी शादी टूटने वाली है. मैं भी ऐसे खबरों से दो चार हुआ हूं कि मेरा और मेरी पत्नी अधूना के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है और भी न जाने क्या क्या लेकिन मैंने इन सब पर रिएक्ट नहीं किया आखिरकार थककर गॉसिप करने वाले रुक ही गए थे. अधूना और मैं पति पत्नी होने के अलावा एक दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त भी हैं. दोस्ती का रिश्ता विश्वास का होता है.  यही वजह है कि मैं अधूना पर आंख बंद करके विश्वास कर सकता हूं. वह भी मुझ पर उतना ही भरोसा करती है.

विद्या प्रोफेशनल एक्टर: विद्या की जितनी तारीफ की जाए कम है. यह उनके साथ मेरी पहली फिल्म है. विद्या एक बहुत अच्छी को स्टार होने के अलावा काफी प्रोफेशनल स्टार हैं. यह बात मेरे लिए बहुत मायने रखती है क्योंकि मुझे प्रोफेशनल लोग बहुत पसंद है.इसके अलावा वह काफी खुशमिजाजमहिला हैं सो काफी चीजेंऔर आसान हो जाती हैं. काम करने में मजा आता है.


 एक्टिंग डायरेक्शन सब करना चाहता हूं:  मैंने जब से अभिनय शुरु किया है. यह चर्चा शुरु हो गयी है कि अब मैं निर्देशन नहीं करने वाला हं. सच कहूं तो मैं एक्टिंग डायरेक्शन सब करना चाहता हूं. फिल्में मेरा शौक है.  मैं हमेशा फिल्मों से जुड़ा रहना चाहता हूं. फिल्म का निर्देशन और लेखन हीं मेरी ताकत है. मैने दिल चाहता है,लक्ष्य और  डॉन  जैसी फिल्में बनायी तब मुझे लगा कि मुझे अभिनय के क्षेत्र में भी काम करना चाहिए. मै फिल्मों में काम करके बेहद खुश हूं. हां फिलहाल  अभिनेता के रूप में मेरा अनुभव काफी अच्छा रहा है. मै आगे भी काम करते रहना चाहता हूं. जहां तक निर्देशन की बात है तो उसके लिए मुझे समय चाहिए. मुझे पढ़ना पढेगा. जो चीजें मुझे प्रभावित करेंगी. उस पर कहानी लिखूंगा दैन मैं निर्देशन के बारें में सोचूंगा.

मसाला फिल्मों से परहेज नहीं: मुझे किसी भी काम से कोई परहेज नहीं है. मैं नेवर शे नेवर एटिट्यूड़ में विश्वास करता हूं. हो सकता है कि भविष्य में मुझे ऐसी कोई फिल्म मिले जिसमें मैं स्पूफ के तौर पर साइलेंट हो नहीं तो मैं वाइलेंट हो जाऊंगा जैसे डायलॉग बोलता नजर आऊं. आप कब क्या करेंगे आपको भी पता नहीं होता है.


एक्टिंग करते हुए डायरेक्टर दूर रखता हूं: 
मैं डायरेक्टर हूं इसका मतलब यह नहीं कि एक्टिंग करते हुए मैं अपने डायरेक्टर को यह सीखाता रहता हूं कि यह सीन ऐसे शूट करो. वह वैसे. दरअसल एक्टर का डाइरेक्टर पर हावी होना संभव ही नहीं है क्योंकि स्क्रि प्ट महीने पहले लॉक हो जाती है और साथ ही डाइरेक्टर कोक्या चाहिए वह पहले ही एक्टर को बता देता है. यकीन कीजिए शूटिंग शुरू होने से पहले दोनों के बीच इतनी बातें हो चुकी होती है कि शूटिंग के दौरान किसी तरह कीतनातनी नहीं होती. हां अगर कभी लगता है कि ये सीन ऐसा होता तो ज्यादा अच्छा होता ऐसे में अपनी राय दे देता हूं. मानना न मानना निर्देशक पर ही है. निजी तौर पर मैं एक्टिंग करते हुए अपने अंदर के डायरेक्टर को दूर ही रखता हूं. यह दोनों जिम्मेदारियां मैं एक साथ नहीं निभा सकता हूं.

 मर्द कैंपेन: 
मैंने मर्द के रूप में जो कैंपेन की शुरु आत की थी. उसका उद्देश्य यही था कि हमारे देश के पुरु ष वर्गों को सचेत किया जाये और उन्हें यह बताया जाये कि जो हम कर रहे हैं, वह कितना गलत कर रहे हैं. अगर आप असली मर्द हैं तो महिला की इज्जत करना सीखिए. मर्द होने का मतलब अपनी ताकत दिखा कर किसी का बलात्कार करना नहीं है. किसी का अपमान करना नहीं है. मर्द का मतलब औरतों की इज्जत करना हैयह हमारा मुख्य उद्देश्य था.  मैं इसे सफलता ही मानता हूं कि आपने इस बारें में पूछा. हां, यह सच है कि इतनी सी चीज से हम सबकुछ बदल नहीं लेंगे. लेकिन मैं अवेयरनेस में यकीन रखता हूं. जैसे अवेयर करो तो फिल्में लोगों तक पहुंचती हैं तो मुझे लगता है कि लोगों तक बात भी पहुंचेगी.


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टीवी में जाने का कोई ईरादा नहीं : सनाया


कलर्स के नये शो रंगरसिया में सनाया ईरानी अलग अंदाज में हैं. वे इस शो को लेकर काफी उत्साहित हैं. दर्शकों से उन्हें अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है.

 सनाया आप टेलीविजन की बड़ी हस्ती हैं.  तो ऐसे में रंगरसिया जैसे शो से क्या उम्मीदें हैं?
 मैं ऐसे सिर पर कोई जिम्मेदारी का पहाड़ लेकर नहीं घूमती. कांसेप्ट अच्छा है. आप शो देख रहे होंगे कि आमतौर पर चलने वाले शो से किस तरह से अलग है. धीरे धीरे जैसे लोग देखेंगे. उन्हें शो काफी पसंद आयेगा ही.
 लेकिन आपका पिछला शो छनछन खास लोकप्रिय नहीं हो पाया तो ऐसे में नये शो करते वक्त क्या सावधानियां रखती हैं आप?
मैं नहीं मानती कि किसी शो के फ्लॉप होने का पूरा कारण शो के किरदार होते हैं. छोटे परदे पर चेहरे से ज्यादा कहानियां वर्क करती हैं. हो सकता है कि मैंने जो सोच कर वह शो किया था. शायद लोग वैसा नहीं सोचते होंगे. लेकिन मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता. मैं वैसे किरदारों को निभाना चाहती हूं. जो मैंने अब तक नहीं निभाया है. छनछन करने के बाद एक बात तो समझ ली है कि क्या करना है और क्या नहीं.
पारो के किरदार के बारे में बताएं?
मैंने इससे पहले ऐसा किरदार नहीं निभाया है. यह इस प्यार का नाम दूं से अलग किरदार है. और मुझे लगता है कि मैं रुरल किरदार पहली बार निभा रही हूं. सो, मैंने काफी मेहनत भी की है.
रंगरसिया के किरदार से खुद को किस तरह जोड़ पाती हैं?
मैं रंगरसिया के किरदार से बिल्कुल अलग हूं और यही वजह है कि मैंने यह शो आॅप्ट किया है. मैं वाकई काफी काम करके आती हूं सेट पर. खासतौर से राजस्थान में जिस तरह की हिंदी और भाषा का प्रयोग किया जाता है. मैं वैसी भाषा नहीं बोल पाती तो मैंने काफी मेहनत की है. उसे सीखने में. वैसे मेरे निर्देशक सिद्धार्थ सेन गुप्ता ने मुझे काफी कुछ सिखाया है.
रंगरसिया के विषय को क्यों चुना?
एक तो बड़ी वजह यह है कि मुझे मधुबाला शो काफी पसंद है और वह इसी प्रोडक् शन हाउस का शो है. मुझे लगता है कि इस प्रोडक् शन में हर कोई अपने काम को लेकर काफी जूझारू है खासतौर से सौरभ तिवारी. टेलीविजन पर कम शोज हैं, जिसने मधुबाला जैसे कांसेप्ट को ऊंचाईयां दी है तो मुझे इससे पूरी उम्मीद है.
आशीष के साथ आपकी केमेस्ट्री किस तरह की है?
आशीष काफी टैलेंटेड हैं और उन्होंने तो फिल्मों में भी काम किया है. जब मैं पहले दिन उनके साथ लुक टेस्ट दे रही थी तो मुझे लगा कि वह ही मेरे इस शो का हिस्सा बनें. इंडस्ट्री में ऐसी अनयुजल सी जोड़ी लंबे सम के बाद देखी जायेगी. आशीष अपने किरदार को लेकर काफी सीरियर रहते हैं और मैं भी. इसलिए मुझे उनके साथ काम करके मजा आ रहा है.
आप और मोहित नच बलिये जैसे शो का हिस्सा क्यों नहीं बनते? 
मोहित और मुझे दोनों को ही इस तरह के शोज पसंद नहीं है. मैं एक्टर हूं और मुझे लगता है कि मैं एक्टिंग ही सही तरीके से कर पाऊंगी.सो, मैं उसे ही करते रहना चाहती हूं.
फिल्मों में जाने की चाहत है?
बिल्कुल नहीं. मैं टीवी में बेहद खुश हूं.
जब कुछ नहीं करतीं. उस वक्त क्या करती हैं आप?
मुझे खाना और घूमना पसंद है और अपने दोस्तों के साथ वक्त बिताना पसंद है.
लोगों का कहना है कि अबआपमें और द्रष्टि धामी जो कि आपकी बेस्ट फ्रेंड हैं. दोनों में प्रतियोगिता शुरू हो जायेगी.
मुझे पता नहीं लोग ऐसा क्यों कह रहे. मधुबाला अलग वक्त पर दिखाई जाती है. मेरे शो की टाइमिंग अलग है. हम दोनों दोस्त मिल कर धमाल मचायेंगे. 

मुझे हर तरह का लाइफस्टाइल पसंद है :तोरल रासपुत्रा

बालिका वधू में आनंदी की भूमिका निभा रहीं तोरल रासपुत्रा को शुरुआती दौर में इस बात पर संदेह था कि उन्हें लोग आनंदी के रूप में स्वीकारेंगे या नहीं. लेकिन उन्हें सफलता मिल चुकी है और वे बेहद खुश हैं.
तोरल, शुरुआती दौर में आपको काफी नकारात् म क प्रतिक्रियाएं मिली थीं. उस वक्त में और अब वक्त में कितना फर्क महसूस करती हैं आप?
यह सच है कि मुझे शुरुआती दौर में लोगों का प्यार नहीं मिला था. मेर ेमन में भी डर था कि पता नहीं लोगों को मुझ पर विश्वास होगा या नहीं. चूंकि जब भी आप किसी एक्ट्रेस के रिप्लेसमेंट बनते हैं. आपको क्रिटिसिज्म झेलनी पड़ती है और वह मैंने भी झेली. लेकिन धीरे धीरे लोगों ने मुझे स्वीकार लिया.
आप आनंदी के किरदार से कितनी करीब हैं. वास्तविक जिंदगी में?
काफी करीब हूं. आनंदी को भी अपने कल्चर से काफी प्यार है और मुझे भी. मैं भी काफी डाउन टू अर्थ हूं. आनंदी भी. मुझसे आप मिल कर खुद जान जायेंगे कि मुझमें कोई सेलिब्रिटी टैंटरम नहीं हैं. आप सेट पर भी पूछ सकते हैं. हां, बस एक अंतर है हम दोनों के किरदार में आनंंदी बहुत जल्दी लोगों को माफ कर देती है. मैं नहीं करती. मैं अपने गुस्से को शांत नहीं कर पाती.  मैं आनंदी से बस यही एक चीज लेना चाहती हूं.
क्या आप आनंदी की तरह ट्रेडिशनल कपड़े पहनना पसंद करती हैं या मॉर्डन?
मुझे हर तरह का लाइफस्टाइल पसंद है. मुझे अच्छा लगता है यह सब. मुझे लगता है कि मैं एक अलग ही जिंदगी जी रही हूं. इस बहाने. खासतौर से ज्वेलरी. लेकिन हर वक्त ये पहनना कठिन  है.
 आपकी लगातार तुलना प्रत्युषा से होती रही तो आखिर आपने उस वक्त की परिस्थिति का सामना कैसे किया?
मुश्किल था. लेकिन मेरे परिवार ने मेरा साथ हमेश दिया. एक एक्टर के लिए वह वक्त काफी कठोर था. लेकिन मेरे परिवार ने हमेशा समझाया कि मैं धैर्य रखूं और खुद से जो हो सकता है करूं. यह सच है कि प्रत्यूषा ने जिस तरह शो में जगह बना रखी थी किसी और को उसे रिप्लेस करना मुश्किल था और मुझे इससे दिक्कत नहीं होती कि लोग मुझे नयी आनंदी कहते हैं. लोग खरी खोटी भी सुनाते थे. मॉल में भी कई बार जाती तो लोग कुछ कहते थे. लेकिन अब वह वक्त बीत चुका है. और अब मैंने अपनी जगह बना ली है.
बालिका वधू आज भी लोकप्रिय धारावाहिक है. आपकी नजर में वह क्या वजह है जो लोग इससे आज भी जुड़े हुए हैं?
मुझे लगता है कि बालिका वधू इमोशन भी दिखाता है लेकिन सोशल इश्यूज को भूलता नहीं है. वह अपनी सोच से भटका नहीं है. शो में हमेशा कुछ न कुछ सोशल चीजें दिखाई जाती हैं. फिर परिवार की बांडिंग. मां, बेटी, दादी, पिता बहन, पत् नी हर तरह के रिश्तों को अच्छे से डील करता है यह शो. इसलिए मुझे लगता है कि लोग इसे बेहद पसंद करते हैं और अपने परिवार का हिस्सा मानते हैं.
अभी जो वर्तमान ट्रैक चल रहा. आप उससे कितनी संतुष्ट हैं?
बालिका वधू की लेखक की टीम सबसे स्ट्रांग टीम मानी जाती है. छोटे परदे की और वे कुछ अचानक से ट्रैक नहीं डालते. वे इसकी तैयारी और योजना पहले से बना कर रखते हैं. याद हो तो गौरी वही लड़की थी जिससे जगिया की बचपन में शादी हुई थी. फिर बड़े होने पर जगिया और गौरी टकराते हैं और कहानी आगे बढ़ती है. तो मैं मानती हूं कि कहानी में कोई भटकाव नहीं है. जो भी ट्रैक दिखाये जा रहे हैं. वह सोच समझ कर दिखाये जा रहे हैं.
गंगा का किरदार निभा रहीं सरगुन ने हाल ही में व्याह रचाया. उनके बारे में क्या कहना चाहेंगी?
बेहतरीन अभिनेत्री हैं सरगुन और उन्हें बहुत बहुत बधाई देना चाहूंगी.
बालिका वधू के अलावा कोई और शो?
बिल्कुल नहीं. फिलहाल पूरी तरह इस पर ही ध्यान दे रही हूं

अब तक नहीं मिला है शादी का प्रपोजल : कट्रीना कैफ


कट्रीना कैफ पिछले कई दिनों से चर्चा में रहीं. वजह रणबीर और उनकी कुछ व्यक्तिगत तसवीरों का सार्वजनिक हो जाना रहा. उम्मीद थी कि वे कुछ विवादित सवालों पर उखड़ी नजर आयेंगी. लेकिन इस बार कट्रीना का एक अलग ही चेहरा सामने आया. उन्होंने न सिर्फ बेबाकी और बिंदास अंदाज में बिकनी विवाद पर बातचीत की, बल्कि अपने 9 साल के करियर और उनकी आनेवाली फिल्म धूम 3 के हर सवाल पर खुल कर बातचीत की.

 कट्रीना धूम 3 में जितनी चर्चा फिल्म के खलनायक की होती है. उतनी ही चर्चा फिल्म की अभिनेत्री की भी होती रही है. निश्चित तौर पर आपकी तुलना ऐश्वर्य राय बच्चन से भी की जायेगी. तो आप इसके लिए तैयार हैं?
जी हां, बिल्कुल तैयार हूं. यशराज के साथ मैंने अब तक जितनी भी फिल्में की हैं. वह सब अच्छी रही हैं. लोगों को पसंद आयी हैं और यशराज ने मुझे मेरे करियर की वे फिल्में दी हैं, जिसमें मैं खुल कर अपने टैलेंट को दिखा पायी हूं. धूम 3 में भी जिस तरह मैंने सारी चीजें सीखी हैं. फिर वह एक्रोबेट्स हों. डांस हो. और जिस तरह की स्ट्रीक्ट डायट पर मैं रही हूं. सिर्फ फिजिकली नहीं, मेंटल रूप से भी यह फिल्म काफी कठिन रही हैं. कई ऐसी चीजें रहीं जो मेरे लिए बिल्कुल नयी थी. मैं एक बात शेयर करना चाहूंगी कि आप मेरा धूम 3 का गाना देख रहे होंगे कमली. उसमें मेरी बांह के मूवमेंट्स पर आप ध्यान दें तो आप गौर करेंगे कि मुझे उसमें काफी दिक्कतें हुई हैं. उस डांस में. इसकी वजह यह है कि आज से नहीं शुरुआती दौर से मैं अपने हाथों का इस्तेमाल अपने डांस में नहीं कर पाती. वह मेरी कमजोरी है. लेकिन इस फिल्म में गाने से लेकर सारे दृश्य में मुझे वह सबकुछ करना था तो काफी कठिन रहा सबकुछ. लेकिन यशराज ने मुझे अच्छे ट्रेनर दिये और सकारात्मक सोच के साथ मैंने सबकुछ पूरा किया.
आमिंर खान के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
काफी अच्छा. मुझे लगता है कि हर एक्टर का काम करने का तरीका अपना होता है. उनका भी अपना है. उनका अप्रोच भी अलग होता है. हां, लेकिन मैं कहना चाहूंगी कि आमिर ने अपने कंफर्ट जोन से हट कर इस फिल्म में खुद को कुछ और ही प्रूव करने की अच्छी कोशिश की है.
किस तरह की तैयारी की है आपने ? साथ ही अपने किरदार के बारे में भी बताएं 
मैं एक स्पेशल डायट पर थीं. मेरी रेगुलर ट्रेनर यास्मीन कराचीवाला ने इसका ध्यान रखा है. साथ ही लंदन की रेजा कतानी ने मुझे काफी कुछ ट्रेनिंग दी. उन्होंने मुझे ट्रेनिंग दी जिमनास्टिक की और स्पोर्ट्सपर्सन की. चूंकि आम फिल्मों से धूम 3 में जो कुछ मैंने किया है. वह बिल्कुल अलग है. मैंने फिल्म में कुछ कांपलेक्स मूव्स किये हैं. जो काफी कठिन थे. अपनी फ्लेक्सबिलिटी, और एक्रोबेट्स ट्रेनिंंग पर समय दिया. मैंने लगभग एक दिन में 10-10 घंटे का वर्कआउट किया है इस फिल्म के लिए. जो कि आसान नहीं था. जहां तक मेरे किरदार का सवाल है तो मैं फिल्म में जिमनास्ट की भूमिका में हूं. जिसे प्यार हो जाता है और प्यार के लिए वह किसी भी हद तक गुजरने के लिए तैयार रहती है.
अपने 9 साल के करियर को किस तरह देखती हैं आप?
मैं अगर पीछे मुड़ कर देखती हूं तो मुझे मेरे कई मोमेंट्स याद आते हैं. कुछ अच्छे भी कुछ बुरे भी.कुछ को याद करती हूं तो हंसी आती है और कुछ को याद करती हूं तो दुख भी होता है. मुझे याद है. शुरुआती दौर में मैं जब अक्षय कुमार के साथ फिल्म हमको दीवाना कर गये की शूटिंग कर रही थी. उस वक्त अक्षय सेट पर जिस तरह गुस्से में रहते थे. मुझे तो लगता था कि बाप रे ये ऐसे ही होते हैं क्या. मैं जाकर बहुत रोती थी कि सेट पर कोई खास बात ही नहीं करता था. धीरे धीरे जब इंडस्ट्री को समझी तो समझ आया. पहले अक्षय जिस तरह डांस करते थे. मैं डर जाती थी. लेकिन अब तो उनको खड़ा कर देती हूं और कहती हूं देखो मैं डांस करके दिखाती हूं. बाद में मैं और अक्षय अच्छे दोस्त बने. लेकिन शुुरुआत में काफी दिक्कतें होती थीं. मैंने भी अपना करियर उन तमाम लड़कियों की तरह ही शुरू किया था. जो बाहर से आती हैं. पोर्टफोलियो बना कर मैं कई लोगों से मिलती थी. शुुरुआत में मॉडलिंग की. इन नौ सालों में मैंने कुछ ऐसे किरदार निभाये, जो मेरे दिल के करीब रहे. जिसमें मैंने खुद को महसूस किया. मुझे लगा कि मैंने कुछ कनेक्ट किया है उन किरदारों से. इनमें कबीर खान की फिल्म न्यूयॉर्क. उसमें जिस तरह का मैंने किरदार निभाया है. दरअसल, वास्तविक कट्रीना पूरी तरह तो नहीं लेकिन बहुत हद तक उसके करीब है. उस फिल्म में जो सेट का माहौल था. वह आज भी याद आते हैं. वहां मेरे कई फ्रेंड्स बने जो आज भी मेरे अच्छे दोस्त हैं. अली जफर जिन्होंने बाद में मेरे साथ मेरे ब्रदर की दुल्हन बनायी. वह आज भी मेरे बेस्ट फ्रेंड् हैं. उसको पता होता है कि अगर मैं जवाब नहीं दे रही तो पक्का मैं बीमार हूं. वह केयर करता है मेरी. फिर कबीर और उनकी पत् नी मिनी. सभी मुझे जितना प्यार आज भी करते हैं. वह मेरे लिए काफी है. इन सभी से हर दिन बात नहीं होती मेरी. लेकिन इसके बावजूद हम एक दूसरे से कनेक्ट रहते हैं. हां, कुछ बातों का दुख है कि लोग काम से ज्यादा यहां आपकी पर्सनल जिंदगी में झांकते हैं और फिर उसकी बातें बनाते हैं. आप कुछ भी कर लो. यही कहते हैं कि कट्रीना में ग्लैमर है इसलिए काम मिलता है. टैलेंट नहीं है. जबकि मैंने हर उस लड़की की तरह मेहनत किया है. जो मुझे फिल्मी एक्ट्रेस बनने के बाद करना चाहिए था. मैंने हिंदी सीखी. डांस सीखा. अभिनय सीखा. साथ ही जिंदगी न मिलेगी दोबारा में जैसी जोया है. वास्तविक जिंदगी में मैं उसी तरह की हूं. यही वजह है कि मैंने जोया से जब जोया के किरदार के बारे में सुना तो तुरंत हां कह दिया था.
आपने बचपन से सोच रखा था कि आप फिल्मों में आयेंगी?
बिल्कुल नहीं. आप सभी विश्वास नहीं करेंगे. मैं उन लड़कियों में से एक थी जो काफी शर्मिली थी. दुबकी सी रहती थी. मैं लोगों से ज्यादा बात भी नहीं कर पाती थी. मैं उन लड़कियों को देखती थी क्लास में जो लड़कों को डराती धमकाती हैं तो उनसे भी डर जाती थी. मां के साथ मेरी पहली की जितनी तसवीरें हैं. अब उन्हें देखती हूं तो हंसती हूं. सबमें मैं कितनी शर्मिली सी हूं. लेकिन बाद में मुझे मॉडलिंग की दुनिया में आने के बाद महसूस हुआ और धीरे धीरे मेरा आत्मविश्वास बढ़ा. और फिर मैंने फिल्मों में काम शुरू किया.
हाल ही में आप बिकनी विवाद को लेकर काफी चर्चा में रहीं. आपने मीडिया को पत्र लिख कर भी अपना गुस्सा जाहिर किया था. आखिर आप इतनी नाराज क्यों हो गयीं?
जब मैं इस इंडस्ट्री में आयी थी. सलमान खान ने मुझे बताया था बल्कि यूं कहूं कि सिखाया था कि अभिनेत्री से पहले एक लड़की हूं. मैं आपसे पूछती हूं कि अगर आप किसी पर्सनल जगह पर हैं और आपकी कोई ऐसी तसवीरें सार्वजनिक हो तो आप किस तरह रियेक्ट करेंगी. मैं नहीं मानती कि कोई भी फैन इस तरह की चीजें जानना चाहता था. मीडिया उन्हें दिखाती है इसलिए वे देखते हैं. अगर ऐसा होता तो कोई फैन तो होता. जब हम आम लोगों से प्रोमोशन के दौरान मिलते हैं तो वह बोलता कि कैट आप ऐसा क्यों कर रही हो. लेकिन कोई फैन ऐसे सवाल नहीं पूछता. दूसरी बात है. मैं खुद मानती हूं कि मैं पब्लिक फिगर हूं तो लोगों को हर कुछ जानना चाहिए. लेकिन एक अपना स्पेस होना चाहिए. मीडिया मेरे दोस्त हैं. जैसे दोस्त से नाराजगी हो जाती है. मेरी भी हो गयी थी. अब लेकिन ऐसा कुछ नहीं है.
रणबीर और आपकी लिंक अप्स की खबरें आती रहती हैं. करीना ने भी चैट शो में आपको भाभी कहा? 
हां, लेकिन उस पूरे शो में कही गयी बात को मैंने जोक की तरह लिया. लेकिन लोगों ने इसे इश्यू बना दिया है. वैसे मैं स्पष्ट कर दूं. मुझे शादी के लिए कोई प्रपोजल आया ही नहीं है. किसी ने अब तक प्रपोज नहीं किया है तो मैं हां, कैसे कहूं. सब कह रहे हैं कि मेरी सगाई हो गयी है. शादी होनेवाली है. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है.
आपकी आनेवाली फिल्में
बैंग बैंग और जग्गा जासूस. 

हां, प्यार को लेकर कंफ्यूज्ड हूं मैं : इम्तियाज अली

 अपनी फिल्म, फिल्म की कहानी, फिल्म का अप्रोच, फिल्म के कलाकार को लेकर जितनी स्पष्ट सोच और नजरिया इम्तियाज अली रखते हैं. हिंदी सिनेमा के कुछेक निर्देशक ही इतनी स्पष्ट तरीके से अपनी बात को लोगों तक पहुंचा पाते हैं. उनके फिल्मों के किरदार कंफ्यूज्ड होकर भी लोगों से कनेक्ट कर पाते हैं. रॉकस्टार, जब वी मेट, लव आजकल जैसी फिल्मों के बाद इस बार इम्तियाज हाइवे लेकर आ रहे हैं. हाइवे में भी उनकी कोशिश एक रिश्ते की कहानी कहने की है. पेश है फिल्म व कुछ अन्य पहलुओं पर अनुप्रिया और उर्मिला से हुई बातचीत के मुख्य अंश 
हाइवे का विषय जेहन में कैसे आया?
मैंने हाइवे काफी सालों पहले लिखी थी. मैं मीडिल क्लास से हूं और मुझे सफर करना हमेशा से काफी पसंद रहा है. मेरा परिवार हर छुट्टियों में घूमने जाता था. मुझसे हमेशा लोग पूछते हैं कि आपकी फिल्म में लड़का लड़की भागते क्यों रहते हैं तो मैं उन्हें यही कहता हूं कि मुझे भागने का बड़ा शौक है. मैं भागते रहता चाहता हूं और इसलिए मैं सफर का आनंद उठा पाता हूं. मैं ट्रेवल से बहुत ज्यादा फैशिनेटेड रहता हूं. अक्सर क्या होता है न जो चीजें जिंदगी में आपने अधूरी करके छोड़ देते हैं, या फिर ये लगता है कि अरे ये मैं नहीं कर पाया, इसमें तो मुझे मजा आता था. तो वे अरमां मैं फिल्मों में पूरे करता हूं.  मैं काफी घूमता रहा हूं और मुझे लगता है कि अपने भारत को समझने के लिए घूमना जरूरी है. मुंबई में रहनेवाले लोग केवल मुंबई को ही दुनिया मान लेते हैं और मैं वही नहीं मानना चाहता. मुझे लगता है कि पूरी दुनिया घूमो. अपने भारत के ही कोने कोने में जाओ. क्या नयी नयी चीजें देखने को मिलती है और नजरिया मिलता है और मुझे लगता है कि उनसे ही आपके अनुभव मिलते हंै. मुझे यात्रा करना पसंद है और इसलिए मैं अपनी फिल्मों में किरदारों को भी भगाता रहता हूं. दौड़ाता रहात हूं. मैंने जब हाइवे बनाने के बारे में पहले सोचा था तो मैंने सोचा था कि इसे एक् शन फिल्म के रूप में प्रस्तुत करूंगा. लेकिन बाद में कुछ जमी नहीं तो मैंने इसे यह रूप दिया.
आपकी फिल्मों में रोमांस को हमेशा अलग अंदाज में प्रस्तुत किया जाता रहा है. तो हाइवे में भी रोमांटिक कहानी होगी?
मैं यह बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि मैं रोमांटिक फिल्में नहीं बनाता. मैं दो लोगों के बीच के संबंधों के बीच की कहानी बनाता. लेकिन संयोग से लोग उसे रोमांटिक ही मान लेते हैं और मुझे इस बात से परेशानी होती है. मैंने इस फिल्म में भी दो लोगों के बीच के संबंध को ही दर्शाने की कोशिश की है. सच कहूं तो मैं हाइवे को कई तरीकों से बनाना चाहता था. कभी मेरे जेहन में ये भी बात आयी थी कि चलो इसे कयामत से कयामत तक की तरह बनाते हैं, क्योंकि मैं बस स्क्रिप्ट लिखता जा रहा था. लेकिन अब जब स्क्रिप्ट ने फाइनल रूप लिया तो उसे मैंने यही रूप दिया है. इस फिल्म की डिमांड थी कि जो लड़की है उसे कई स्थानों से सफर करते हुए और वैसे स्थान जो आमतौर पर जाने नहीं जाते. उन स्थानों से गुजरना है. फिल्म में लड़की ब्राह्मण परिवार की है और लड़का गुजर है. लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि दोनों के बीच कोई जातिवाद को लेकर मतभेद नहीं है.
हाइवे फिल्म के अनुभव को हाइवे डायरीज का रूप देने का ख्याल कैसे आया?
दरअसल, हमारे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में हम चीजों का डॉक्यूमेंटेशन सही तरीके से नहीं करते. हम दिलचस्प तरीके नहीं ढूंढते. मेरे लिए हाइवे डायरीज कोई प्रोमोशनल वीडियो नहीं है. बल्कि हाइवे जो मेरे लिए फीचर फिल्म है वही हाइवे डायरीज डॉक्यूमेंट्री है. मैंने और मेरे साथ पूरी टीम ने जो खट्ठे मीठे और अनोखे अनुभव किये हैं. वह हमने इसके माध्यम से संजोने की कोशिश की है. और मुझे लगता है कि यह एक दिलचस्प तरीका है. हाइवे डायरीज से भी आप कई चीजें देख कर समझ लेंगे. भारत को इस नजरिये से देखने का अनुभव भी अनोखा होगा. ऐसा मेरा मानना है.
लेकिन इन छह राज्यों को ही चुनने की कोई खास वजह. ये सारे राज्य उत्तर भारत के राज्य हैं. 
मेरी फिल्में हिंदी में होती हैं, क्योंकि मेरे दर्शक हिंदी में हैं, मैं हिंदी बोलता हूं.तो जाहिर है वैसे ही स्थान चुनूंगा जिसमें मैं सहज हूं. अब कोई भी भाषा मैं जानता नहीं और फिर उसे बोलने या उसको दिखाने की कोशिश करूं तो वह बनावटी लगेगा न. दक्षिण में कोई हिंदी बोले तो कैसा लगेगा. मैं ओरिंजनल अंदाज नहीं दे पाता, इसलिए मैंने राजस्थान, कश्मीर, दिल्ली को चुना. सिर्फ नॉर्थ ही एक हिस्सा है, जहां हिंदी बोली जाती है तो निश्चित तौर पर वही मुझे लैंग्वेज आॅफ कम्युनिकेशन की दिक्कत नहीं होती है. दूसरी वजह  है कि मैं इन जगहों को जानता हूं और आप जब फिल्म बना रहे होते हैं या आपका जो फैशिनेशन होता है. वह उन स्थानों के लिए नहीं हो सकता जिसके बारे में आप कुछ जानते ही न हों. और मुझे लगता है कि इन स्थानों पर कुछ तो एक खास बात है, जो मुझे बार बार अपनी ओर खींचती है. वह मैं शब्दों में तो नहीं बता सकता. लेकिन ऐसा कुछ तो है. फिर आप देखो न नॉर्थ में कभी भी वेदर भी एक सा नहीं रहता. कभी ठंडा कभी गर्मी. तो ये सब मुझे ड्रामेटिक सा लगता है. मतलब इसमें ड्रामा है. एकरसता नहीं. शायद
हाइवे की क्या चीजें आपको आकर्षित करती हैं?
मुझे हाइवे का खाना यानी ढाबा का जो अंदाज है. ढाबा कल्चर का खाना मुझे बेहद पसंद है. मैं तो सड़क मार्ग से यात्रा करना बेहद पसंद करता हूं. फिर वहां जिस तरह के लोग आते हैं. कुछ दूरियों पर ही भाषा बदल जाती है. लोगों के बात करने का तरीका. खाने में मसाले का इंतजाम करने का तरीका. सबकुछ बदल जाता है. वहां का संगीत. अलग अलग  तरह की औरतें मिली. गांव में काम करनेवाली. मैं जब राजस्थान में था. मैंने आलिया से पूछा  कि तुमने कुछ महसूस किया इन औरतों के बारे में तो आलिया ने भी कहा कि हां, मैं देख रही हूं कि हर जगह औरत ही ज्यादा काम कर रही हैं. मर्द नहीं तो ये चीजें इनकरेज करती हैं.  मेरा मानना है कि शहर में लोग ज्यादा दकियानुसी होते हैं. वहां औरत का रोल या कैरेक्टर समझ नहीं आता. आप अलग तरह के इलाकों में जाओ तो आपको पता चलेगा.  क्या होता है न जब आप हाइवे पर चल रहे होते हैं और फिर ढाबे पे रुकते हैं तो दूर कहीं से कई तरह के लोग वहां आते हैं. ठहरते हैं और फिर बातें करते हैं. ट्रैक्टर से आते हैं, फिर वो जो खाना अपने घर से बना कर लाये हैं, उनका लिबास, ये सब यूनिक और टिपिकल सी चीजें हैं जो मुझे देखना अच्छा लगता है. हाइवे डायरीज में वही चीजें दिखाने की कोशिश की है. कुछ लोग हैं अभी भी जिन्हें नहीं पता क्या होता है कैमरा, क्या होती है फिल्में. वे जब हमारा कैमरा देख कर चिल्ला रहे थे. गुस्सा कर रहे थे. वह सब रियल इंडिया है और ये सब मुझे पसंद है.
आपके फिल्मों के किरदार कंफ्यूज्ड होते हैं प्यार को लेकर. तो क्या कहीं न कहीं वास्तविक जिंदगी में आप भी प्यार को लेकर कंफ्यूज्ड हैं?
हां, स्पष्ट तौर पर और ईमानदारी से कहूं तो हां मैं कंफ्यूज्ड हूं. मुझे नहीं लगता कि प्यार में कमिटमेंट करना या बोलना आसान है. निभाना मुश्किल. आप किसी के साथ हैं आपको अच्छा लग रहा. फिर आप उसके हो जाते हो लेकिन बाद में लगता कि शायद यह सही निर्णय नहीं था. फिर आपको किसी और का साथ अच्छा लगने लगता. तो प्यार मेरे लिए पूरी तरह से कंफ्यूजन की चीज है और हां, कहीं न कहीं मेरी यह सोच मेरे किरदारों में दिखती है.मैं इस तरह से सोचता हूं कि क्या होता है जब एक औरत और मर्द साथ में होते हैं. क्यों अचानक से दोनों को एक दूसरे अच्छे लगते हैं. तो इस बात को दिखाने समझाने की कोशिश करता हूं. और मुझे लगता है कि जब तक कंफ्यूज्ड हूं तभी तक ऐसी कहानियां कह पा रहा हूं.
आलिया और रणदीप को चुनने की खास वजह?
ये दोनों ही किरदार के लिए बिल्कुल फिट थे. आप देखें आलिया किस तरह जूहू गर्ल होकर जूहू से बाहर आकर एक नयी दुनिया के रंग में रंग गयी है और कैसे वह वहां की होकर रह गयी है. फिल्म देखेंगे तो आप महसूस करेंगे.

चुगली चाची चुगलखोर चाचा

जी हां, बॉलीवुड के सितारे भी आमलोगों की तरह गॉसिप करने में बेहद दिलचस्पी लेते हैं. बॉलीवुड के कुछ ऐसे सितारे हैं, जिन्हें इंडस्ट्री की सारी खबरें मालूम होती हैं.
करीना कपूर को सब पता है
खुद करीना कपूर की ननद सोहा अली खान ने स्वीकारा है कि वह करीना कपूर से कभी भी फिल्मी बातें नहीं करतीं. बल्कि जब वह दोनों मिलती हैं तो केवल गॉसिप करती हैं, क्योंकि करीना को इंडस्ट्री की सारी खबरें मालूम होती हैं कि कौन किसके साथ डेटिंग कर रहा है. सोहा की यह बातें बिल्कुल सही भी हैं, चूंकि कुछ महीनों पहले करीना से जब हीरोइन फिल्म के सिलसिले में बातचीत हो रही थी. तो उस वक्त सेट पर मधुर किसी दूसरी फिल्म की शूटिंग की बात कर रहे थे. तो करीना ने पूरी दिलचस्पी दिखाते हुए मधुर से जानने की कोशिश की थी कि कौन सी फिल्म है और कौन इसकी शूटिंग कर रहा है. खुद अजय देवगन कॉफी विद करन में स्वीकार चुके हैं कि करीना को सब पता होता है.
अजय देवगन हैं छुपे रुस्तम
अजय देवगन भले ही मीडिया से ज्यादा बातें न करते हों. लेकिन उन्हें सारी खबरें मालूम होती हैं. जी हां, अजय देवगन को भी इंडस्ट्री की सारी अंदर की खबरें मालूम होती हैं. खुद उनकी पत् नी काजोल ने एक कार्यक्रम के दौरान स्वीकारा कि अजय देवगन गॉसिप करने में बेहद दिलचस्पी लेते हैं. लेकिन वह सिर्फ काजोल ने ही सारी बातें शेयर करते हैं.
करन जौहर
करन जौहर इंडस्ट्री के उन शख्सियत में से एक हैं, जिनकी पूरी इंडस्ट्री दोस्त हैं. सो, उन्हें भी इंडस्ट्री की सारी गॉसिप की जानकारी होती है.
सलमान की बहन अलविरा
सलमान की बहन अलविरा भले ही फिल्मों में काम नहीं करतीं. लेकिन उन्हें सलमान खान से ज्यादा इंडस्ट्री की सारी खबरें मालूम होती हैं और यही वजह है कि वे सलमान को कई बार उनके दुश्मनों से आगाह भी करती रहती हैं.
वैभवी मर्चेंट
वैभवी मर्चेंट कईबड़े सितारों की करीबी दोस्त हैं. सो, उन्हें भी इंडस्ट्री की व कई लोगों की निजी जिंदगी से जुड़ी सारी बातें मालूम होती हैं. लेकिन वह सिर्फ अपने दोस्तों में ही गॉसिप करना पसंद करती हैं. वह रानी मुखर्जी की सबसे करीबी दोस्त हैं तो निश्चित तौर पर भले ही दुनिया को मालूम न हो लेकिन वैभवी को यह पता है कि आदित्य और रानी कब शादी करनेवाले हैं.
इनके अलावा संजय दत्त भी पूरी इंडस्ट्री की सारी खबरें रखा करते थे. 

लेटलतीफ पुराने स्टार, ऊर्जावान नये कलाकार


टेलीविजन पर इन दिनों कलाकारों की लेटलतीफी से निर्माता परेशान हैं और किसी न किसी वजह से लोकप्रिय चेहरे होने क े बावजूद कलाकारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जा रहा है. तो दूसरी तरफ नये चेहरे को फिर से कई मौके मिल रहे हैं.

टेलीवुड के निर्माता इन दिनों एक बड़ी परेशानी से गुजर रहे हैं. वे अपने शोज के लीड कलाकारों से परेशान हैं. कुछ स्टार या तो लेटलतीफ हैं या फिर कुछ के नखरे इस तरह के हैं, जिसे सहन करना उनके वश की बात नहीं रह गयी है. मजबूरन हर दिन इन दिनों टेलीविजन शो से लोकप्रिय कलाकार बाहर निकाले जा रहे हैं. और यही वजह है कि दर्शक इन दिनों पूरी तरह से कंफ्यूजन में रहते हैं कि आखिर किसी शो में हर दिन नये चेहरे क्यों नजर आने लगते हैं. लेकिन दूसरी तरफ टेलीवुड में स्थापित कलाकारों की जगह इन दिनों नये चेहरे ले रहे हैं. वीरा, गुस्ताख दिल और और प्यार हो गया जैसे ऐसे कई शोज हैं, जिनमें नये चेहरों को मौके मिल रहे हैं. निर्माताओं का मानना है कि नये कलाकार ऊर्जा के साथ काम करते हैं और वे शिकायत नहीं करते. साथ ही वक्त पर भी होते हैं. सो, उनके साथ काम करना आर्थिक रूप से भी काफी फायदेमंद होता है.
बालिका वधू के शिव
खबर है कि बालिका वधू के शिव यानी सिद्धार्थ शुक्ला ने इन दिनों अपने निर्माता की नाक में दम कर दिया है. वे इन दिनों काफी देरी से सेट पर पहुंचते हैं और उनकी इस कारण की वजह से उन्हें निर्माता ने चेतावनी भी दी है. लेकिन चूंकि शिव काफी लोकप्रिय स्टार हैं, सो, उन्हें शो से बाहर का रास्ता दिखाने में निर्माता कई बार सोच रहे हैं. हालांकि इसी शो की बालिका वधू रह चुकीं प्रत्युषा बनर्जी को उनके नखरे दिखाने की वजह से शो से अलग कर दिया.
बालिका की गंगा
बालिका वधू की गंगा यानी सरगुन मेहता भी हो सकता है कि जल्द ही इस शो से अलविदा कह दे. चूंकि उनकी शादी हो रही है और यही वजह है कि शो में गंगा के किरदार को किसी बीमारी से ग्रस्त होते हुए दिखाया जा रहा है. हो सकता है कि उनके किरदार की शो में मौत दिखा दी जाये और शो में फिर से जगिया की जिंदगी में कोई और प्रेम प्रसंग को जोड़ दिया जाये.
बड़े अच्छे की पीहू
बड़े अच्छे लगते हैं में जिस तरह पीहू को बार बार बदला गया है और जितने जल्दी अंतराल पर. शायद ही अब तक किसी शो में इतनी जल्दी किसी एक किरदार में बदलाव नहीं किया गया होगा. पीहू इस शो में स्थाई अब तक नहीं है.
नये कलाकारों को मौके
इन दिनों  वीरा में जो वीरा का किरदार निभा रही हैं और रणविजय का. वह दोनों ही कलाकार टेलीविजन के लिए बिल्कुल नये चेहरे हैं. साथ ही और प्यार हो गया में कांची पहली बार बड़े परदे पर नजर आयेंगी. 

डर के आगे जीत है


फिल्म जिंदगी न मिलेगी दोबारा में ऋतिक रोशन, अभय देओल और फरहान अख्तर तीनों किसी न किसी चीज से जिंदगी में डरते हैं. लेकिन तीनों ही डर को अपने सामने हरा देते हैं. दरअसल, वास्तविक जिंदगी में भी बॉलीवुड की कई शख्सियत भी  कई चीजें करने से डरती हैं. लेकिन फिल्मों में  किरदार निभाते निभाते कई बार कई फिल्मी हस्तियां अपनी वास्तविक जिंदगी में भी कई चीजें सीख जाती हैं. बॉलीवुड शख्सियतों के कुछ ऐसे ही हुनर पर अनुप्रिया अनंत की रिपोर्ट, जो उन्होंने फिल्मों के माध्यम से सीखी.

 फिल्म धूम 3 को देखने के बाद यह स्पष्ट रूप से नजर आ रहा है कि आमिर खान ने किस तरह अपने डर को दूर भगाते हुए और अपने कंफर्ट जोन से बाहर आकर किस तरह फिल्म के  बहाने ही कई ऐसी विधाएं सीखीं, जिनसे वह कभी रूबरू नहीं थे. आमिर खान समेत कई फिल्मी हस्तियों ने स्वीकारा है कि उन्होंने अपने डर को फिल्म की वजह से खत्म किया.
आमिर ने किया डर को दूर
आमिर इमोशनल फिल्में करने में माहिर रहे हैं, लेकिन पहली बार उन्होंने धूम 3 में अपने कंफर्ट जोन से बाहर आकर वह सारे स्टंट किये हैं, जिन्हें वह करने से पहले घबराते थे. याद हो कि वह पहले एक विज्ञापन में यह दोहराते नजर आते थे कि मैं स्टंट नहीं करता. लेकिन आज उन्होंने धूम 3 के माध्यम से वास्तविक जिंदगी की कई ऐसी नयी विधाओं को सीखा, जिनसे वे पहले या तो डरते थे या घबराते थे. उन्होंने फिल्म धूम 3 के बहाने एक सर्कस जिम्नास्ट की सारी ट्रेनिंग ली. वे पहले ऐसे कोई किरदार नहीं निभाते थे. जिसमें उन्हें काफी घूमना हो. उन्होंने खुद अपनी बातों में स्वीकारा है कि उन्हें काफी चक्कर आते थे. लेकिन इस फिल्म में उन्होंने विधा सीखी. इसके अलावा उन्होंने टैपिंग डांस सीखी. जो उनकी काफी दिनों से इच्छा थी कि वह इसे सीखे. और उन्हें लगता था कि यह काफी आसान होगा. लेकिन जब उन्होंने इसे सीखना शुरू किया तो उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ी. सिर्फ धूम 3 ही नहीं. उन्होंने फिल्म तलाश के दौरान तैराकी सीखी. इससे पहले उन्हें पानी से काफी डर लगता था. चूंकि फिल्म में स्कूबा ड्राइविंग का अहम दृश्य था तो उन्होंने इस वजह से तैराकी सीखी.
कट्रीना की कमजोरी
कट्रीना कैफ मानती हैं कि वे अच्छी डांसर तो हैं लेकिन उनकी बांहें उनकी कमजोरी हैं और वह उसका ज्यादा इस्तेमाल नहीं कर पातीं. लेकिन फिल्म धूम 3 में उन्होंने अपनी इस कमजोरी को हराया है और उन्होंने जिस तरह अपने पूरे शरीर का इस्तेमाल किया है. और ज्यादातर दृश्यों में उनके हाथ के ही करतब अधिक दिखाये गये हैं. वह खुद मानती हैं कि इस फिल्म से उन्होंने अपनी यह कमजोरी दूर की है. साथ ही उन्होंने फिल्म जिंदगी न मिलेगी दोबारा के वक्त बाइक चलाना सीखा, जिसे वह पहले डराने में काफी डर रही थीं. लेकिन उन्होेंने डर को हराते हुए बाइक चलाना सीखा.
शाहिद कपूर ने सीखी  फ्लाइंग
शाहिद कपूर को ऊंचाईयों से काफी डर लगता था. लेकिन उन्होंने फिल्म मौसम के लिए बकायदा ट्रेनिंग ली. इस फिल्म में उन्होंने वाकई जी 6 लेवल पर फ्लाइंग किया था और उन्होंने एक महीने तक इसकी ट्रेनिंग ली थी. शाहिद कपूर पहले बॉलीवुड एक्टर हैं जिन्हें वास्तविक एफ 16 में बैठने का मौका मिला था.
पानी से डर हुआ खत्म
लारा दत्ता को भी आमिर खान की तरह ही पानी से काफी डर लगता था. लेकिन फिल्म ब्लू के लिए उन्होंने नेशनल लेवल कोच से स्वीमिंग सीखी. ब्लू की वजह से लारा दत्त ने हाइड्रो फोबिया को खत्म किया.
ऋतिक रोशन को मिले शब्द
ऋतिक रोशन ने फिल्मों की वजह से ही अपनी सबसे बड़ी कमजोरी अपने हकलाने की बीमारी को खुद से दूर किया. चूंकि आमतौर पर बातें करते वक्त वह भले स्पष्ट न बोल पायें. लेकिन फिल्मों ने उनमें आत्मविश्वास दिलाया कि वह स्पष्ट बोल सकते हैं. वे मानते हैं कि फिल्मों की वजह से उन्होंने अपनी इस कमजोरी को खुद से दूर किया.
माधुरी दीक्षित ने किया स्टंट 
माधुरी दीक्षित ने गुलाब गैंग के लिए कई वास्तविक वैसे स्टंट किये हैं, जिन्हें फिल्माने में उन्हें पहले काफी डर लग रहा था. चूंकि उन्हें भी ज्यादा ऊंचाईयों से डर लगता है. लेकिन माधुरी ने भी अपने इस डर को गुलाब गैंग की वजह से दूर कर लिया.
: मैं खुशनसीब हूं कि मैं कई सालों से टैपिंग सीखना चाहता था. लेकिन सीख नहीं पा रहा था. लेकिन आदित्य ने मुझे इसकी तैयारी के लिए तीन महीने के लिए बिल्कुल अलग दुनिया में जाने का मौका दिया. धूम 3 से मिली यह सबसे बड़ी अचीवमेंट है मेरे लिए . - आमिर खान

अमृता राव नहीं बनना : प्रीतिका राव


प्रीतिका राव के लिए टेलीविजन की दुनिया नयी है. लेकिन उन्होंने साउथ की फिल्म में कई फिल्में की हैं. प्रीतिका चाहती हैं कि लोग उन्हें अभिनेत्री के रूप में स्वीकारें. प्रीतिका अमृता राव की बहन हैं. लेकिन वह अपनी पहचान अलग हट कर बनाना चाहती हैं. जल्द ही कलर्स के शो बेइतहां से वह छोटे परदे पर नयी शुरुआत कर रही हैं.
 प्रीतिका, अचानक फिल्मों से टीवी पर आने के बारे में क्यों सोचा?
मैंने साउथ की फिल्मों में काम किया है और हर अभिनेत्री का सपना होता है कि उसे बड़े परदे पर ज्यादा मौके मिले. लेकिन मेरा मानना है कि छोटे परदे पर आपकी पहचान जल्दी बन जाती है अगर आप सही तरीके से मेहनत कर रहे हैं तो.फिल्मों में कई साल लग जाते हैं. लेकिन टेलीविजन अपने हुनर को दिखाने का सही माध्यम है और यही वजह है कि मैंने टेलीविजन के लिए हामी भरी. मुझे मॉडलिंग करना पसंद था. लेकिन मुझे लगा कि कुछ सालों के बाद सिर्फ उसमें मोनोटोनस लाइफ हो गयी है तो फिर मैंने कुछ अलग करने के बारे में सोचा.
आप अमृता राव की बहन हैं तो निश्चित तौर पर आपकी तूलना आपकी बहन से की जायेगी? क्या आप तैयार हैं?
जी हां, बिल्कुल. खुद मैं कई सालों से यही करती आ रही हूं. मैं भी आमिर खान से इमरान खान की तूलना और परिवार में जो पहले से स्थापित है, उसके परिवार से कोई और आये तो उसकी तूलना करती आयी हूं तो मेरे साथ भी ऐसा होगा ही और मुझे इस बात से कोई परेशानी नहीं है. अमृता ने पहले ही यह सब बताया था और मैं खुद फिल्म जर्नलिस्ट रह चुकी हंू . जानती हूं कि क्या क्या चीजें हो सकती हैं. किस तरह की बातें बनेंगी. लेकिन मैं हर तरह से इन सभी बातों के लिए तैयार हूं.
आप खुद फिल्म जर्नलिस्ट रही हैं और फिर अब आपके बारे में ही तरह तरह की खबरें प्रकाशित होंगी. इसके लिए किस तरह तैयार हैं आप?
जैसा कि मैंने कहा कि मैं फिल्म जर्नलिस्ट हूं तो जानती हूं कि खबरें कैसे बनती हैं और उनका कितना असर होता है. सो, सारे कदम सोच समझ कर ही लूंगी और कोशिश होगी कि जो हूं और जो सच है. वही बातें प्रकाशित हों.
आपकी और अमृता की बांडिंग कैसी है?
बहुत अच्छी. वह अच्छी दोस्त हैं और गाइड भी. मुझे काफी चीजें बताती रहती हैं. बचपन में अमृता काफी शैतान थी. स्कूल में भी. लेकिन हम दोनों ही बहनें काफी मस्ती भी किया करते थे.उसका सपोर्ट मुझे हमेशा मिलता है. कोई भी प्रोजेक्ट करने से पहले मैं उनसे सलाह लेती हूं. आखिर वह मुझे फील्ड में भी सीनियर हैं तो इन बातों का ख्याल रखती ही हूं.
साउथ इंडस्ट्री में काम करने के दौरान अभिनय के क्षेत्र में क्या क्या सीखा?
मेरे लिए साइथ इंडस्ट्री एक तरह से ट्रेनिंग इंस्टीटयूट की तरह रहा. वहां काफी कुछ सीखा. बारीकी सीखी. वह इंडस्ट्री भी काफी पॉपुलर है तो लोग धीरे धीरे जानने लगे थे मुझे. मैंने वहां मनमुताबिक कई तरह के काम किये सो मुझे काफी मजा आया.
अमृता की कौन कौन सी फिल्में आपको पसंद है? अगर आपको अपनी बहन की फिल्मों के किरदार निभाने के मौके मिले तो क्या आप निभायेंगी.
मुझे उनकी विवाह, वेलकम टू सज्जनपुर और मैं हूं न पसंद है. लेकिन जहां तक बात है अमृता के किरदार निभाने की तो मैं नेक्सट अमृता नहीं बनना चाहूंगी. मैं अपनी पहचान खुद बनाना चाहती हूं. अगर कभी कोई मुझे उनकी फीलर के रूप में इस्तेमाल करना चाहेगा तो मैं नहीं करूंगी.
जब वक्त मिलता है तो क्या करना पसंद करती हैं?
मुझे पढ़ना लिखना पसंद है और सबसे ज्यादा टीवी देखना पसंद है. तभी तो फिल्म जर्नलिस्ट थी मैं.
बेइतहां में आपका किरदार किस तरह का है?
एक मुसलिम लड़की का किरदार है, जो हालातों से मजबूर है. लेकिन फिर उसकी जिंदगी किस तरह मोड़ लेती है. यह शो इसी थीम पर आधारित है.

कॉमेडी रहेगी हमेशा पहली पसंद


अरशद वारसी की दो फिल्में मि. जो भी करवालो और डेढ़ इश्किया छोटे अंतराल में ही रिलीज हो रीह है. दोनों ही फिल्मों में अरशद महत्वपूर्ण भूमिकाओं में हैं. 
अरशद, एक साथ आपकी दो दो फिल्में रिलीज हो रही हैं. तो बतौर अभिनेता आप इसे किस नजरिये से देखते हैं?
एक अभिनेता के लिए यह अच्छी बात है कि दर्शकों को एक के बाद एक उनके कई अवतार देखने को मिलेंगे. वे मुझे विभिन्न फिल्मों में देखेंगे तो तय कर पायेंगे कि मेरे किरदार किस तरह कई रूपों में नजर आ सकते हैं.
पहले मिस्टर जो भी करवा लो का नाम रॉकी मेरा नाम था?
हां, मगर मुझे लगा कि मेरा जो चरित्र है, वह कुछ अलग है. चरित्र की कार्यशैली के अनुसार नाम रखा जाये. तो दर्शक जल्दी इत्तेफाक कर लेता है. मिस्टर जो भी करवा लो मेरे पास रजिस्टर नाम था. तो मैंने यह नाम रख दिया. और यह फिल्म पूरी तरह से कॉमेडी फिल्म है. सो, यह मेल भी खा रहा है. इसके संवाद बेहद रोचक हैं. और मेरे शीषर्क से बिल्कुल मेल खाते हैं.
जो भी करवालो और डेढ़ इश्किया में आपका किस तरह का किरदार है और दोनों किरदार किस तरह से एक दूसरे से अलग हैं?
हां, मेरा किरदार गंभीर किस्म का जासूस है. वह दिल से काम करता है. पर उसके साथ सबकुछ उल्टा हो जाता है. कुछ भी सही नहीं होता. वह अपने पिता की तरह बहुत बड़ा और सफल जासूस बनना चाहता है. नेक दिल इनसान है. बदकिस्मती से उसका नाम भी मिस्टर जॉय भी करवा लो है. पर वह स्मार्ट नहीं है. जबकि वह अपने आपको स्मार्ट समझता जरूर है. ऊपरवाले ने उसकी शराफत पर तरस खा कर उसे उसके मकसद  में कामयाबी दिला देता है. वही फिल्म डेढ़ इश्किया में मेरा किरदार बब्बन का है और वह निहायत ही बदमाश किस्म का आदमी है, जो चालाक है और वह दुनिया को हमेशा शक की निगाह से ही देखता है.
पिछले कुछ सालों में आपने जिस तरह की फिल्में की हैं, अब लोग आपको हास्य अभिनेता से भी इतर मानने लगे हैं.
हां, खासतौर से जॉलीएलएलबी की वजह से लोगों का नजरिया मेरे प्रति बदला है. कॉमेडी हमेशा मेरा कंफर्ट जोन रहा है. लेकिन मैं अब उससे अलग भी काम कर रहा हूं और लोगों को मेरा काम पसंद आ रहा है. यह खास बात है. लेकिन मैं क्या करूं मैं जो फिल्में करता हूं उसमें कॉमेडी  न हो ऐसा होता ही नहीं है. मैं लंबे समय से जिस तरह की कॉमेडी वाली फिल्म करना चाह रहा था. पूरी तरह से लंबे समय से वह फिल्म मुझे मिली ही नहीं थी. मैं कॉमेडी के साथ साथ संजीदगी वाली फिल्में पसंद करता हूं और इसलिए डेढ़ इश्किया जैसी फिल्में चुनता हूं. मैं इश्किया या जॉलीएलएलबी, सहर जैसी फिल्में भी करता हूं. मैं कहना चाहूंगा कि आज के जमाने में अगर अंगूर जैसी फिल्म बनती तो वह मिस्टर जो भी करवा लो जैसी होती.
लेकिन अंगूर से अपनी फिल्म की तूलना करना अतिश्योक्ति नहीं हो गयी?
नहीं, मैं मानता हूं कि आज के दौर में साफ सुथरी हास्य फिल्म लिखना बहुत कठिन है. चश्मेबद्दूर, जाने भी दो यारो या ऋषिकेश मुखर्जी की जो फिल्में हुआ करती थी. उन्हें लिखना मुश्किल होता है. इस तरह की फिल्में नहीं लिखी जा रही हैं. पर इसमें लेखकों का कोई दोष नहीं है.  सारा दोष बिजनेस का है. कोई रिस्क लेना नहीं चाहता.  हम अंगूर से चले थे और ग्रैंड मस्ती तक आ पहुंचे.
नसीरुद्दीन शाह जैसे अभिनेता के साथ आपको दूसरी बार काम करने का मौका मिला है. कैसा अनुभव रहा?
बेहद अच्छा. उनके साथ काम करके काफी कुछ सीखने का मौका मिलता है. आज भी वे अपने किरदारों को कितनी संजीदगी और नयेपन के साथ निभाने की कोशिश करते हैं. साफ झलकता है कि वह अभिनय से कभी बोर नहीं हो सकते. लेकिन हमारे उम्र के कलाकार कुछ समय के बाद सिर्फ पैसे कमाने के लिए ही काम करते हैं. जबकि ये कलाकार काफी संजीदगी से और गंभीरता से काम करते हैं. मैं उन्हें परफेक् शनिष्ट कलाकार मानता हूं.
सोहा अली के साथ पहली बार मिस्टर जो भी करवा लो में आप पहली बार साथ काम कर रहे हैं और माधुरी, हुमा के साथ भी तो कैसा रहा तीनों अभिनेत्रियों के साथ काम करने का अनुभव?
बहुत अच्छे अनुभव रहे. तीनों ही अभिनेत्रियों की अपनी अपनी खासियत है. कुछ लोगों की परवरिश के इतने मायने होते हैं कि आप सोच भी नहीं सकते. यह बात तब समझ में आती है. जब सोहा अली जैसे लोगों से मिलते हैं. वह तमीजदार हैं. इज्जतदार हैं. छोटे बड़े का अदब करती हैं. अच्छी अदाकारा हैं. वही माधुरी काफी फोक्सड हैं. अपने डांस को लेकर खासतौर से. खुद को हर दिन उभारने की कोशिश करती हैं. सीखने की ललक खत्म नहीं हुई है. हुमा कुरैशी काफी बिंदास हैं और वह काफी फ्रेंडली मिजाज की हैं तो मजा आया उनके साथ काम करके.
चर्चा है कि आपने फिर से कोरियोग्राफी शुरू की है?
नहीं. मैंने जो भी करवा लो में निर्देशक की बस थोड़ी सी मदद की थी. दो गाने जस्मीन और दो गाने राजू ने किये हैं. हमारे पास कम समय था.दो दिन में गाना खत्म करना था. यदि मैं कोरियोग्राफी भी करता तो चार दिन लग जाते. क्योंकि मेरी कोरियोग्राफी का तरीका बिल्कुल अलग है.
अपने को स्टार जावेद जाफरी की आप हमेशा तारीफ करते नजर आते हैं?
जी हां, जावेद अच्छे कलाकार के साथ अच्छे दोस्त भी हैं. मिस्टर जो भी करवा लो में उन्होंने 12 अलग अलग लुक अपनाया है और जो जावेद ने किया है. वह सिर्फ जावेद ही कर सकते हैं. दूसरा कोई कलाकार नहीं निभा सकता. यह बात मैं दूसरे कलाकारों का सम्मान करते हुए कह रहा हूं. उनकी कॉमेडी, मिमिक्री की टाइमिंग बहुत जबरदस्त है. उनका सेंस आॅफ ह्मुमर जैसा है. इंडस्ट्री में काफी कम लोगों का है. 

कॉमेडी किंग के बीच जंग

 स्टार प्लस ने कलर्स पर प्रसारित हो रहे कॉमेडी शो कॉमेडी नाइट्स विद कपिल को टक्कर देने के लिए मैड इन इंडिया की शुरुआत की  है. इसका पहला एपिसोड रविवार को प्रसारित हुआ. दरअसल, कॉमेडी का यह जंग इस बार सिर्फ दो चैनलों के बीच नहीं, बल्कि दो कॉमेडी के महारथियों के बीच भी हैं. टेलीविजन के इतिहास में ऐसी जंग में पहली बार देखने को मिल रही है. कपिल और सुनील दोनों ही एक दूसरे से काम द्वारा प्रतियोगिता कर रहे हैं और एक सही प्रतियोगिता इसी तरीके से की भी जानी चाहिए. निस्संदेह सुनील अपने मिजाज की कॉमेडी करने में माहिर हैं और उनका अद्वितीय अंदाज दर्शकों को भी पसंद आया था. कहीं न कहीं कपिल भी इसे डरे नजर आये और उन्होंने पिछले कई हफ्तों से अपने शो में आ रही एकरूपता को बदलने की पूरी कोशिश की, ताकि वे कहीं कम न पड़ जायें. यह कपिल भी जानते हैं कि स्टार प्लस एंटरटेनमेंट जगत का सबसे बड़ा शेर है. निश्चिततौर पर उन्होंने कई मापदंड तैयार किये होंगे. सुनील से उम्मीद भी बहुत ज्यादा थी. लेकिन फिलवक्त पहले एपिसोड को देखने के बाद वह धराशायी हो गयी. मैड इन इंडिया एक बनावटी शो के रूप में नजर आया.  यह कई कॉमेडी शो का मिश्रण नजर आया. सुनील गुत्थी से बने चुटकी में भी वह तड़का नहीं लगा पाये जो कॉमेडी नाइट्स में लगाया करते थे. दरअसल, जिस तरह  शोले के  जय का अस्तित्व वीरू के बिना अधूरा है. जिस तरह हीरा की कहानी पन्ना के बिना पूरी नहीं होती. पलक और गुत्थी एक दूसरे के पूरक थे. भागों में हंसाना और एकल हंसाने की जिम्मेदारी लेना दो अलग अलग चीजें हैं. कपिल अपनी टाइमिंग से लोगों को हंसा पाने में कामयाब रहे हैं और आगे भी रहेंगे. चूंकि यह उनकी खूबी है. सुनील इस क्रम में कमजोर नजर आ रहे हैं. उन्हें जंग में अपनी ताकत और मजबूत करनी होगी

छोटे परदे की टूटतीं बेड़ियां


स्टार प्लस के धारावाहिक ये हैं मोहब्बतें में शो की लीड किरदार इशिता मां नहीं बन सकतीं. लेकिन अपने पड़ोस में रहनेवाली बच्ची रुही के लिए उसके दिल में इतनी ममता है कि वह केवल रुही के लिए एक ऐसे लड़के से शादी कर लेती है, जिससे वह नफरत करती है. इसी धारावाहिक में शगुन नामक किरदार अपने ब्वॉय फ्रेंड से बिना शादी किये उनके साथ रह रही हैं.  स्टार प्लस के ही एक और धारावाहिक ये रिश्ता क्या कहलाता है में नैतिक के पिता की दूसरी शादी की तैयारियां चल रही हैं. इन धारावाहिकों की सोच पर गौर करें तो धीरे धीरे छोटे परदे पर कई बोल्ड विषय दिखाये जा रहे हैं. खासतौर से इससे इस नजरिये में तो जरूर बदलाव नजर आयेंगे कि एक लड़की जो मां नहीं बन सकती, उसे शादी करने का हक नहीं. या फिर एक अकेला व्यक्ति वृद्धा अवस्था में दूसरी शादी नहीं कर सकता. दरअसल, अब छोटे परदे पर भी अच्छे और जरूरी विषयों का चुनाव हो रहा है, जिससे समाज की कई बेड़ियों को टूटते हुए दिखाया जा रहा है. किसी दौर में टेलीविजन को इस तरह के मुद्दे डील करते हुए नहीं दिखाया जाता था. लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा. अब विषयों के चुनाव में बदलते दौर की तसवीर भी दिखाई जा रही हैं. वैसे विषय जो केवल पहले फिल्मों में दिखाये जाते थे. अब छोटे परदे पर आ रहे हैं. छोटा परदा अपनी बेड़ियां खुद तोड़ रहा है और शायद यही वजह है कि लोग अब फिल्मों से अधिक छोटे परदे पर भरोसा करने लगे हैं. छोटे परदे के धारावाहिकों के निर्माता अब खुद को किचन के झगड़ों तक सीमित नहीं रख रहे और न ही केवल सामाजिक सुधारक की भूमिका निभा रहे, बल्कि ऐसे मुद्दे जो प्राय: उभर कर सामने नहीं आते. वैसे मुद्दों पर भी अब प्रकाश डाला जा रहा है. और इसके लिए निर्माता निर्देशक वाकई तारीफ के हकदार हैं. इस बदलाव का स्वागत किया जाना चाहिए

आलिया का बदला अंदाज

 हाल ही में आलिया भट्ट से फिल्म हाइवे के सिलसिले में बातचीत हुई. आलिया से मुलाकात होने से पहले फिल्म के कोस्टार रणदीप हुड्डा से मुलाकात और बातचीत हुई. उन्होंने फिल्म से जुड़े अपने अनुभव शेयर किये. साथ ही बताया कि आलिया और फिल्म हाइवे में जो आलिया किरदार निभा रही हैं वीरा का किरदार. दोनों में कई समानताएं हैं. जिस तरह आलिया फिल्म में नजर आयी हंै, वह वास्तविकता में भी वैसी ही हैं. आलिया से बातचीत के दौरान जब मैंने यह सवाल पूछा कि आलिया क्या वाकई आप वीरा की तरह ही हैं. तो आलिया ने जवाब दिया. हां, मुझे वीरा की तरह मस्ती करना पसंद है. लेकिन थोड़ी देर में ही जब उनके परिवार से जुड़े लोग़. खासतौर से उनके पिता महेश भट्ट से जुड़े सवाल आये तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्हें दुनिया में इससे बुरी चीज कुछ नहीं लगती कि लोग उनके परिवार के बारे में कुछ बुरा भला कहें तो. आलिया के शब्दों में तब उनकी सटक जाती है. आलिया के चुलबुले, नटखट और मासूम के पीछे इतनी संवेदनशील और कड़क मिजाजी आलिया छुपी बैठी हैं. यह सिर्फ तभी महसूस किया जा सकता है. जब आप उनके करीबी हों या आलिया से दो तीन मुलाकातें हुई हों. आलिया की उम्र अभी बेहद कम है. उनके चेहरे से यह अनुमान लगा पाना बेहद कठिन है कि वह जुहू में पली बढ़ी लड़की दिल से कितनी दृढ़ हैं. शायद इम्तियाज ने आलिया के इस छुपे हुए भाव को भांप लिया था. तभी तो उन्हें फिल्म स्टूडेंट आॅफ द ईयर के आने से पहले ही अपनी फिल्म हाइवे में कास्ट किया. चूंकि वे जानते थे कि वे जिस तरह की फिल्म बनाने जा रहे हैं. उसमें अभिनेत्री का शारीरिक रूप से सुदृढ़ होना जरूरी है. चूंकि पूरी फिल्म सफर पर आधारित है. आलिया धीरे धीरे ही सही अपने कई रूप दिखा रही हैं. निश्चित तौर पर वे लंबे समय तक बॉलीवुड में राज करेंगी.

फिल्मों से परिणीति का परिणय


परिणीति चोपड़ा ने हाल ही में बातचीत के दौरान पहले इनकार, लेकिन फिर स्वीकारा कि यह सच है कि वह सुपरस्टार्स के साथ फिल्में नहीं करना चाहतीं. इसकी वजह यह नहीं कि उन्हें फिल्में आॅफर नहीं हो रहीं. उन्होंने अक्षय कुमार के साथ एक फिल्म सिर्फ इसलिए न कहा, चूंकि उनके लिए उस फिल्म में सिर्फ सात दिनों का काम था. सो, वह इस बात से वाकिफ थीं कि फिल्म में उनके लिए पर्याप्त जगह नहीं. सो, उन्होंने निर्णय लिया, फिल्म छोड़ दी. हाल में जब उनसे पूछा गया कि आखिर वे क्यों सुपरस्टार्स की फिल्में नहीं कर रहीं, तो उन्होंने साफ किया कि वे फिलहाल शो पीस नहीं बनना चाहतीं. वे उन फिल्मों का चुनाव कर रही हैं. जिनमें फिल्म की केंद्र की कहानी उन पर हो. उन्होंने शुरुआत लेडीज वर्सेज रिकी बहल से की और हाल ही में उनकी फिल्म हंसी तो फंसी रिलीज हुई है. निस्संदेह वह काबिलियत रखती हैं और वे लंबी पारी खेल सकती हैं. बशर्ते कि वे अपने अभिनय में एकरसता दूर करें. पिछली कई फिल्मों से वे लगातार एक से किरदार निभा रही हैं, जिसमें वह टॉम ब्वॉय की तरह बर्ताव करती हैं. हालांकि उनकी फैन फॉलोइंग बढ़ती जा रही है. और लोग उन्हें काफी पसंद भी कर रहे हैं. वे लगातार खुद को साबित भी कर रही हैं. साथ ही परिणीति चोपड़ा वाकई समझदारी से फिल्मों का चुनाव कर रही हैं. ये कहा जा सकता है कि वे अपने नाम की तरह सोच समझ कर फिल्मों से परिणय कर रही हैं. उन्होंने अब तक जितनी फिल्में की हैं, अभिनेताओं से अधिक उनकी चर्चा हुई है. वे बिंदास लोगों के सामने अपने बयान दे रही हैं कि उनकी बहन प्रियंका उनकी आइडियल नहीं. उनकी बातों, उनके पूरे स्वभाव से साफ झलकता है कि वे किसी की उधार की पहचान के साथ आगे बढ़ने वाली नहीं. वे अपनी जगह तलाश रही हैं और धीरे धीरे वह इसमें पारंगत भी हो रहीं. आनेवाले दौर में परिणीति और आलिया दो अभिनेत्रियों पर दर्शकों की नजर रहेगी.

फुर्तीले रणवीर


रणवीर सिंह की आगामी फिल्म है गुंडे. फिल्म में वे अपने दोस्त और को स्टार अर्जुन कपूर के साथ नजर आ रहे हैं. लेकिन फिल्म के प्रोमो के साथ साथ फिल्म के गाने में भी नजर टिकती रणवीर सिंह पर ही है. रणवीर सिंह की पहली फिल्म बैंड बाजा बारात थी. उस फिल्म से पहले किसी ने नहीं सोचा था कि रणवीर सिंह इस मुकाम तक पहुंचेंगे. चूंकि उनके पास हिंदी की मसाला फिल्मों के अभिनेता वाली कद काठी नहीं थी. लेकिन रणवरी ने अब खुद को इस कदर साबित कर दिया है कि लोग उनके दीवाने हो गये हैं. उनमें जो ऊर्जा नजर आती है. हाल के दौर के किसी अभिनेता में नजर नहीं आती. उन्होंने बीच में लंबा ब्रेक लिया था. लेकिन अब उनकी लगातार फिल्में रिलीज हो रही हैं और उनकी सारी फिल्मों में वे बिल्कुल अलग नजर आ रहे हैं. फिल्म लुटेरा में उनके किरदार में ठहराव है तो फिल्म रामलीला में उनके किरदार में टशन. फिल्म गुंडे में उनके किरदार में जो फुर्ती और मस्ती नजर आ रही है. खबर है कि आदित्य चोपड़ा ने तय किया है कि वे रणवीर सिंह को लेकर फिल्म निर्देशित करेंगे. आदित्य जैसे शातिर और माहिर निर्देशक का यह निर्णय ही संकेत है कि रणवीर सिंह लंबी पारी खेलने वाले अभिनेताओं की श्रेणी में आ चुके हैं. वे जिस तरह आॅन स्क्रीन मजाकिया नजर आते हैं. लोग उन्हें भले ही हल्के में ले रहे हों. लेकिन निर्देशकों की पैनी नजर उन्हें पहचान चुकी है. खबर है कि ऋतिक की आगामी फिल्म में ऋतिक की जगह रणवीर आ गये हैं. रणवीर उन सारी फिल्मों को लपक रहे हैं, जिनमें उन्हें नजर आ रहा कि वे खुद को अलग रूप में दर्शा सकते हैं. तसवीर स्पष्ट है कि रणवीर आनेवाले दौर में सबसे तेज तर्रार, मनोरंजक, गठीले, एक् शन, ड्रामा, डांस एक अभिनेता के सारे गुण वाले कलाकार के रूप में सामने आयेंगे और वे लंबी पारी खेल जायेंगे. पुराने अभिनेता होशियार. नये अभिनेता हो तैयार

बच्चे से मिली सबक


 एआर रहमान के बेटे ने अपने पिता से आकर स्टूडियो में कहा कि पापा आप बहुत काम करते हैं. कम से कम आपको दिन में सात घंटे की नींद लेनी ही चाहिए. एआर रहमान दिन रात एक कर काम करने वालों में से हैं. सभी जानते हैं कि जब वह काम की लगन में होते हैं. तो उनमें अलग धुन होती है. वे किसी बात की सूध नहीं रखते. उन्हें इससे पहले कई बार उनकी पत् नी ने भी ये कहने की कोशिश की कि वे काम के साथ आराम भी करें. लेकिन उन्होंने कभी उनकी बात नहीं मानी. लेकिन अब उन्हें पहली बार इस बात का एहसास हो रहा है कि उन्हें आराम भी करना चाहिए. शाहरुख खान की बेटी सुहाना उन्हें कई बार इस बात के लिए टोक चुकी हैं कि उन्हें धू्रमपान छोड़ देना चाहिए. और शाहरुख ने कई बार यह कोशिश भी की. हालांकि वे पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाये. लेकिन उन्होंने कोशिशें जारी रखीं. कुछ इसी तरह अक्षय कुमार को भी स्मोकिंग छोड़ने में उनके बेटे आरव ने ही मदद की. दरअसल, जो काम आपके माता पिता नहीं कर पाते. वे बच्चे कर जाते हैं. उनकी मासूमियत एक शब्द में भी सबक सीखा जाती है. टिष्ट्वंकल खन्ना और रिंकी खन्ना की वजह से ही राजेश खन्ना ने एक दौर में शराब को हाथ लगाना छोड़ दिया था. आमिर खान अपने बेटे आजाद के सामने कभी कोई नशा नहीं करते. स्पष्ट है कि बच्चे भी कई बार अपने बड़ों की आदतों को सुधारने में बड़ी भूमिका निभाते हैं. फिर चाहे वह नशा काम का हो या फिर किसी अन्य चीज का. चूंकि कई बार काम का धून भी इंसान को अंदर से खोखला बना देता है. वह दिन दुनिया को भूल कर बस अपनी जिंदगी में भी मग्न रहता है और ऐसे में अगर उन्हें राहत की सांस मिले तो उससे बड़ी संजीवनी उस व्यक्ति के लिए क्या होगी. कहीं राहत काम से तो कहीं सेहत को राहत. बच्चे कहीं न कहीं बड़े काम कर जाते हैं.

सफलता का स्वाद


 शाहिद कपूर विशाल भारद्वाज की फिल्म हैदर में बिल्कुल अलग लुक में नजर आ रहे हैं. वे इस फिल्म को लेकर बेहद उत्साहित हैं. इसकी खास वजह यह है कि पिछले लंबे दौर से उनकी फिल्में बॉक्स आॅफिस पर कुछ खास कमाल नहीं दिखा पा रहीं. हालांकि आर राजकुमार ने उन्हें थोड़ी राहत दी है. लेकिन इसके बावजूद शाहिद को एक अदद फिल्म की जरूरत है, जिसमें वे खुद को पूरी तरह साबित कर पायें. इससे पहले शाहिद ने विशाल के साथ फिल्म कमीने में काम किया था. फिल्म में उनकी दोहरी भूमिका ही थी और निस्संदेह उस फिल्म में शाहिद कपूर  ने खुद को साबित किया था. उन्होंने जितनी बेहतरीन अदाकारी उस फिल्म में की थी. उस फिल्म के बाद वे उस तेवर और अंदाज में नजर नहीं आये. शाहिद बेहतरीन अभिनेता हैं. लेकिन उन्हें मांझने वाले निर्देशक कम मिल रहे. शाहिद जानते हैं कि विशाल उन्हें बखूबी मांझ सकते हैं और तराश सकते हैं. तभी वे उनकी शरण में गये हैं. शाहिद के लुक को देख कर इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि वे फिल्म को लेकर कितने गंभीर हैं और वे कितनी मेहनत कर रहे हैं. इस बात से शाहिद ही वाकिफ हैं कि उन्हें न चाह कर भी अगर इंडस्ट्री में टिके रहना है तो उन्हें आर राजकुमार जैसी फिल्मों के साथ साथ हैदर जैसी फिल्मों की जरूरत होगी ही. निश्चित तौर पर उनके जेहन में यह बात है कि कहीं इंडस्ट्री उन्हें दरकिनार न कर दें और यही वजह है कि वे हैदर जैसी फिल्में भी कर रहे हैं. दरअसल, किसी अभिनेता को लगातार असफलता का स्वाद चखना पड़ता है. वह सजग हो जाता है और फिर असफलता के बाद वह ज्यादा मेहनत करने लगता है. हो सकता है कि इस कोशिश में शाहिद वाकई इस बार पूरी तरह से कामयाब हो जायें. कम से कम उनके लुक से उनकी मेहनत साफ झलक रही है.

अंतरराष्टÑीय स्तर की सोच


 पिछले दिनों रेल से सफर करते हुए एक बेहतरीन शख्स से दोस्ती हुई. वह पेशे से तो मार्केटिंग के क्षेत्र में हैं. लेकिन उन्हें शौक शहरों को घूमने और एंटिक्स एकत्रित करने का है. उनका यही शौक उन्हें हर बार ऐसे स्थानों पर लिये जाता है, जहां वे एंटिक्स संग्रहित कर सकें. वे पेशे को खुद पर हावी नहीं होने देते. बातचीत के दौरान उनसे कई फिल्मों पर भी बातचीत हुई. फिल्मों को लेकर उनकी एक बात जो मुझे बेहद सटीक लगी वह यह कि उन्होंने जिस तरह अनुराग कश्यप की फिल्में और अनुराग कश्यप को परिभाषित किया. शायद ही इससे बेहतरीन जवाब मैंने आज तक किसी से सुना था. उन्होंने कहा कि अनुराग कश्यप हिंदी सिनेमा के वास्तविकता में लीक से अलग हट कर काम करनेवालों में से हैं. औैर अनुराग कश्यप का दिमाग उतना ही टिष्ट्वस्टेड है, जितना हॉलीवुड के निर्देशकों का होता है. और अनुराग की यह कोशिश होती है कि भारत के दर्शक भी उनके उस टिष्ट्वस्ट को समझें और उनकी फिल्मों को स्वीकारें. लेकिन चूंकि आज भी भारत में खासतौर से हिंदी सिनेमा में वैसे दर्शक बन नहीं पाये हैं. इसलिए अनुराग अब भी आम लोगों के निर्देशक नहीं बन पाये हैं. वाकई, उन्होंने एक अच्छा नजरिया प्रस्तुत किया. अनुराग आज अंतरराष्टÑीय स्तर पर इसलिए कामयाब हैं, चूंकि वे  घूमावदार (टिष्ट्वस्टेड) फिल्में बनाते हैं . उनकी फिल्में सीधे तौर पर कोई बात नहीं कहती. लेकिन अगर आप गौर करें और गहराई में जायें तो वे बारिकियों से कई बातों को कह जाते हैं. हां, यह सच है कि उनकी फिल्में हिंदी सिनेमा के दर्शक समझ नहीं पा रहे. हालांकि गैंग्स आॅफ वासेपुर बहुत हद तक आम दर्शकों को भी अच्छी लगी. लेकिन हिंदी सिनेमा वह चुनिंदा निर्देशकों में हैं, जिन्हें फिल्मों की समझ है और जो वाकई आम फिल्मों से जुदा कुछ फिल्में बनाने में यकीन रखते हैं.

डिब्बे में बंद फिल्म

प्रीतिश नंदी अमिताभ बच्चन को लेकर एक बेहतरीन फिल्म बनाने की योजना कर रहे थे. फिल्म की कहानी एक अभिनेता व अपनी पत् नी से प्यार में धोखा खाने के बाद किस तरह अपनी जिंदगी व्यतीत करता है. प्रीतिश नंदी की यह फिल्म फिलहाल डिब्बे में बंद है. चूंकि अमिताभ इस फिल्म को हरी झंडी नहीं दिखा रहे हैं. लेकिन इस फिल्म में जिस अंदाज में अमिताभ को प्रस्तुत करने की कोशिश की गयी है. अमिताभ इस फिल्म में बतौर अभिनेता ही अभिनेता का किरदार निभाते. लेकिन कुछ कारणवश यह फिल्म डिब्बे में बंद है. जबकि इस विषय पर फिल्म अगर दर्शकों तक पहुंचती हैं तो निश्चित तौर पर अमिताभ को दर्शक एक और नये रूप में देखेंगे. यह फिल्म उस वक्त से बननी शुरू हुई थी, जिस वक्त अमिताभ बुरे दौर से गुजर रहे थे. हो सकता है कि शायद अब अमिताभ को इस फिल्म की जरूरत नहीं और इसलिए उन्होंने इस फिल्म से कन्नी काट ली हो. दरअसल, हर स्टार के साथ यह विडंबना होती है कि जिस वक्त वह बुरे दौर से गुजर रहा होता है. उसे संजीवनी जैसी कोई फिल्म चाहिए होती है जो उन्हें फिर से आबाद करे और उन्हें फिर से कामयाबी दिलाये. कई कलाकार इसमें सफल भी होते हैं. कई नाकाम भी. लेकिन जब उन्हें वह कामयाबी मिल जाती है तो उन्हें ऐसी फिल्मों की फिर कोई जरूरत नहीं होती. निस्संदेह यह प्रोफेशनलिज्म का ही दौर है, जहां भावनाओं के आधार पर निर्णय नहीं लिये जा सकते. लेकिन इसके बावजूद कम से कम वैसी फिल्मों को सहयोग करने की कोशिश की जानी चाहिए, जिसमें उनके किरदार दमदार हों. अमिताभ की तरह अन्य कलाकार भी खुद की वापसी के लिए अपने बैनर व कई बैनर का सहारा लेकर फिल्में बनाते रहे हैं. ऐसे में प्रीतिश की फिल्में किसी मुकाम तक पहुंच पाती हैं या नहीं. यह तो आनेवाला वक्त ही बतायेगा.

गुत्थी से चुटकी तक

 सुनील ग्रोवर जल्द ही स्टार प्लस अपना नया शो लेकर आ रहे हैं।  इस शो  की शुरूआत के लिए इंतजार  किया है। चूँकि  उन्हें कपिल का शो नाइट्स छोड़ने के बाद काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। उन पर  चैनल ने आरोप  लगाया कि वे गुत्थी  किरदार का नाम किसी अन्य शो में इस्तेमाल नहीं कर सकते।  सुनील ने इसके खिलाफ लंबी लड़ाई भी लड़ी।  लेकिन आखिरकार उन्हें  हारना ही पड़ा।  यह सही है कि उन्हें अपना शो करने का मौका तो मिल रहा है।  लेकिन वे  गुत्थी नाम का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं. वे चुटकी नाम से ही शो में नजर आयेंगे।  हालाँकि नाम के इस्तेमाल को लेकर सुनील का यही कहना है कि अब वे किसी अनय विवाद को बेवजह तूल नहीं चाहते।  इसलिए उन्होंने नाम  दिया।  लेकिन यह हकीकत है कि गुत्थी किरदार को गढ़ने वाले सुनील ही थे। चूँकि कपिल के शो से पहले भी मंच  पर कई बार उन्होंने इस किरदार का इस्तेमाल किया है।  लेकिन न चाहते हुए भी कॉरपोरेट की मार में वे भी फंसे और उन्हें मजबूरन नाम बदलना ही पड़ा। दरअसल , यह इस इंडस्ट्री का अपना स्वभाव है।  यहाँ दूसरों के काम पर अपने नाम का मुहर लगाने में हर कोई उस्ताद है।  ऐसी खबरें आमतौर पर बाहर नहीं आ पाती और आमलोग इससे रूबरू नहीं हो पाते।  लेकिन हकीकत यही है कि बॉलीवुड और टेलीवुड में काम की सबसे ज्यादा चोरी होती है। हिंदी सिनेमा और टेलीवुड में एक शब्द काफी प्रचलित है घोस्ट राइटिंग मसलन लिखने वाले का नाम परदे पर ना आकर कोई नामी लेखक का नाम लोगों के सामने आएगा। इस घोस्ट राइटिंग के  अंतर्गत टेलीवुड में  सबसे अधिक काम हो रहा. निस्संदेह इससे लोगों को रोजगार मिल रहा है। लेकिन  दूसरी तरफ कई लोग दूसरों के काम पर अपना मुनाफा कमा रहे। सुनील ग्रोवर ने लंबी लड़ाई लड़ी और वह  हक की लड़ाई थी. लेकिन ऐसी  हिम्म्त कम कलाकार ही दिखा पाते हैं।  सो, जरूरत है कि उनका सम्मान हो। वरना कॉरपोरेट की मार से सिर्फ और सिर्फ हार ही हाथ लगेगी

खोटी लोकप्रियता


प्रियंका चोपड़ा फिर से गुंडे  कैबरे डांस करती नजर आएँगी।  वे इस बात से बेहद खुश हैं कि लगभग उन्हें हर फिल्म में अपने डांसिंग की प्रतिभा दिखाने का मौका मिल रहा है।  उन्होंने हाल ही में फिल्म राम लीला में भी आयटम नम्बर किया था।  फिल्म जंजीर में भी उन्होंने आयटम नम्बर किया।  वे लगतार आयटम नंबर कर रही हैं और निशित्तौर पर उनके जेहेन में ये बात है कि इससे उनके करियर को नयी पहचान मिल रही है।  लेकिन हकीकत यह है कि जिस तरह उनकी बहन परिणिति चोपड़ा इंडस्ट्री में सोच समझ कर जगह बना रही हैं और केवल वे फिल्में ही कर रही हैं जो उन्हें करनी चाहिए। जिनमें वे केंद्र भूमिका में हैं. जबकि इससे उलट प्रियंका ऐसी फिल्में कर रही हैं, जिनमें उनके अभिनय प्रतिभा को इन दिनों सही तरीके से निखरने का मौका नहीं मिल रहा है।  और वे खुद फिल्में चयन करने में चूक भी रही हैं।  वे जिस तरह लगातार आयटम नंबर कर रही हैं , वे फिल्मों में अभिनय करती कम और आयटम गर्ल के रूप  में अधिक नजर आ रही हैं।  जबकि प्रियंका प्रतिभाशाली अभिनेत्री हैं और जिस तरह उनकी समकक्ष और उनके बाद आयी अभिनेत्रियां अपनी हर फिल्म से खुद को साबित कर रही हैं। न सिर्फ प्रियंका बल्कि कटरीना और अन्य अभिनेत्रियां जो लगतार फिल्मों में सिर्फ खानापूर्ति कर रही हैं उन्हें सजग रहने की जरुरत है।  प्रियंका को बर्फी की झिलमिल माफिक किरदारों की तलाश करनी चाहिए।  वरना वह पिछड़ती रहेंगी। दरअसल , यह बॉलीवुड का चलन रहा है , जब कसी भी सितारे को यह भनक मिलती है कि वह पिछड़ रहे हैं।  ऐसे में वह सही निर्णय लेने के बजाय भटक जाते हैं।  निस्संदेह प्रियंका ने विश्व स्तर पर खास पहचान बना ली है और उन्होंने अपने अंदर छुपे गायक को मरने नहीं दिया।  फेसबुक पर वह सबसे अधिक सक्रिय हैं।  वे अपनी दिनचर्या से अपने फैन को हमेशा वाकिफ  रहती हैं।  सो, यह बेहद जरूरी है की वे सजग  और गम्भीरता से इस बारे में सोचें कि उन्हें फिल्मों के चयन में क्या क्या सावधानियां बरतनी हैं।  वे फिल्म गुंडे में भी जगह पूर्ती मात्र ही करती  नजर आ रही हैं।  उन्हें जरूरत है की वे पुरुष प्रधान फिल्मों में भी ऐसी फिल्मों का चुनाव करें, जिसमे वे फिर से खुद को साबित करती नजर आयें।

मां-बेटे का द्वंद्व

सलमान खान से हाल ही में मुलाकात हुई. वे हेलेन के बारे में बातें कर रहे थे. लेकिन उन्होंने उन्हें मेरी मां कह कर संबोधित किया. वे हेलेन के बारे में बता रहे थे कि किस तरह फिल्मों में उनकी अहम भूमिका होती थी. सिर्फ उन्हें ध्यान में रख कर पूरी स्क्रिप्ट लिखी जाती थी. लेकिन आज वह माहौल नहीं है. अब आयटम को गंदी नजर से देखा जाता है. सलमान खान किसी दौर में अपने पिता से इस बात के लिए नाराज थे कि उन्होंने दूसरी शादी क्यों की.उनकी मां सलमा खान, जिन्होंने सलीम खान के लिए धर्म तक बदला. उनके पिता ने उन्हें क्यों छोड़ा. उस वक्त मां सलमा ने ही सलमान का मार्गदर्शन किया और उन्हें समझाया कि बेटे तुम्हें इन बातों से नाराज नहीं होना चाहिए और हेलेन को भी मां का ही सम्मान दो. एक वह दौर था और आज यह दौर है कि सलमान खान हेलेन को अपनी मां कह कर बुलाते भी हैं और उन्हें वह दर्जा भी देते हैं. गौर करें तो फिल्म दबंग में सलमान खान की मां डिंपल ने विनोद खन्ना से दूसरी शादी कर ली होती है और इस बात से सलमान फिल्म में विनोद खन्ना से नाराज होते हैं. लेकिन फिल्म के अगले चरण यानी दबंग 2 में विनोद खन्ना को पिता स्वीकार लेते हैं. निश्चित तौर पर अरबाज खान और सलमान खान से शायद वह दर्द महसूस किया होगा जो उन्होंने इस फिल्म के जरिये दिखाने की कोशिश की है. इन दिनों मधुबाला धारावाहिक में भी  शो के लीड किरदार आरके की अपनी मां से सिर्फ इसलिए नाराजगी है चूंकि उन्होंने भी दूसरा व्याह रचाया था. दरअसल, फिल्मों और धारावाहिकों के माध्यम से भी यह बात दर्शाने की कोशिश की जाती रही है कि माता पिता और उनके जीवन में किसी अन्य व्यक्ति का आना वास्तविकता में किसी भी बच्चे को कितना प्रभावित करता है. फिर चाहे वह सेलिब्रिटी हो या कोई आम आदमी. दर्द तो किसी की कद देख कर नहीं होता.

भिखारी के वेश में एक दिन

फिल्म बॉबी जासूस में विद्या बालन एक जासूस की भूमिका में हैं।  इस फिल्म के फर्स्ट लुक में विद्या बालन के भिखारी के किरदार  में नजर आ रही हैं।  विद्या ने बातचीत में बताया कि किस तरह मेकअप करने के बाद जब वह  नामपल्ली स्टेशन के पास जाकर मैं बैठी तो किसी को पता ही नहीं चला। नामपल्ली स्टेशन के पास जाकर मैं बैठी तो किसी को पता ही नहीं चला। दूसरे भिखमंगों के साथ बैठ कर मैं भी हाथ फैला रही थी।और जब वह ज्यादा हाथ फैला रही थी तो किस तरह वही के एक भीखमंगे  ने उन्हें डांट दिया।  विद्या इस अनुभव को बेहद सकारात्मक तरीके से ले रही हैं।  उनका मानना है कि अभिनय ही दुनिया का एक मात्र माध्यम है जिसके माध्यम से आप दुनिया का हर अनुभव हासिल कर सकते हैं। वे इसका पूरा आनंद ले रही हैं।  दरअसल उन्होंने बिलकुल मार्के की ही बात कही है।  एक सेलब्रिटी केवल अभिनय के माधयम से ही एक भिखारी की जिंदगी को नजदीक से देख सकता है या समझ सकता है।  मुझे ये जानकारी तो नहीं कि विद्या इस फिल्म में कितने देर के लिए इस लुक में हैं।  हाँ मगर इतना जरूर तय है कि विद्या ने उन चाँद लम्हों में ही उनकी जिंदगी समझने की कोशिश जरूर की होगी और इसे उन्होंने शिद्द्त से महसूस भी किया होगा कि आखिर उनकी जिंदगी क्या होती है।   किस दौर में अशोक कुमार ने दिलीप कुमार को सलाह दी थी कि वे अगर अंधे भिखारी का किरदार निभाना चाहते हैं तो उन्हें जाकर वास्तविकता में उनकी जिंदगी को देखना समझना चाहिए।  और उनकी सलाह पर दिलीप मुम्बई के महालक्ष्मी इलाके में जाकर भिखारियों के साथ वक्त बिताने के लिए तैयार हुए थे।  और नजदीक से उनकी जिंदगी को समझने के बाद ही उन्होंने वह किरदार बखूबी निभाया।  फिल्मों में यूं तो ऐसे किरदार कई कलाकार ने निभाए हैं।  लेकिन जिस तरह दिलीप कुमार ने उनसे महसूस कर निभाया है।  विद्या बालन भी इसे बखूबी निभाएंगी।  एक सुपर सितारा होने के बावजूद वास्तविकता में भीड़ के बीच भिखारी का किरदार निभाने की हिम्म्त विद्या ही दिखा सकती हैं। 

ेश की बेटियां

 इन दिनों सोनी टीवी टीवी पर प्रसारित  हो रहे धारावाहिक देश की बेटी नंदिनी में नंदिनी अब घर से बाहर निकल कर राजनीति में अपने कदम बढ़ा रही है।  इस शो के शुरूआत  में ही शो के निमार्ता का कहना था कि ये एक आम लड़की की खास कहानी होगी, जिसे लोग देख कर यह कामना करेंगे कि उनकी बेटी भी ऐसी ही हो।  नंदिनी एक बहू के साथ साथ बाहर के कामकाज भी निभा रही है।  वाकई देश में नंदिनी की तरह कई लड़कियां हैं जो अपने घर के साथ साथ देश को भी सँभालने की कोशिश में जुटी हुई हैं।  इस शो में वाकई कई वास्तविकताएं दिखाने की कोशिश की जा रही है. यह सच है कि न चाहते हुए भी टीआरपी की मार झेलने की वजह से हर शो अपनी दिशा से भटक जाते हैं।  देश की बेटी नंदिनी भी उससे अपवाद नहीं है।  लेकिन इसके बावजूद इस शो में जिस तरह के कदम नंदिनी उठा रही हैं।  वह एक आम लड़की का ही प्रतिनिधित्व् कर रही है। चूँकि भारत के हर कोने में ऐसी कहानियां हैं , जहाँ हर लड़की एक बड़े रईस घर में जाने के बावजूद अपने करियर से मुंह नहीं मोड़ती या किसी भी तरह के समझौते नहीं कर रही।  हाल ही में टेलीविजन पर एक नए विज्ञापन का प्रसारण हो रहा है , जिसमें एक कामकाजी महिला का पति अपनी पत्नी की तरफदारी करते हुए कहता है कि वह कमा इसीलिए नहीं रही क्यूंकि उसे कोई जिम्मेदारी पूरी करनी है , बल्कि इसलिए वह काम करना चाहती है क्यूंकि उसे काम करना अच्छा लगता है। इस विज्ञापन में आज के पुरुषों की मानसिकता को दशार्ने की कोशिश की गई है।  ऐसे विज्ञापन एक नयी सोच और नजरिये में बदलाव के सूचक हैं। जिस शख्स ने भी इस विज्ञापन की परिकल्पना की होगी।  निशित्तौर पर वह महिलाओं के विकास की बातें सोचता होगा।  चूँकि ऐसी सोच एक विकासशील सोच रखने वाले व्यक्ति के जेहेन से ही निकल सकती है।  मीडिया और फिल्मों के माधयम से जरुरत बस यही है कि इस तरह के विज्ञापन और धारावाहिकों से महिलाओं के विकास की बातें दिखाई जाएं और उनका प्रोत्साहन बढ़ाया जाये

शहद से हनी सिंह

कुछ दिनों पहले ही टेलीविजन पर वर्ष २०१३ के  स्क्रीन अवार्ड समारोह का प्रसारण किया गया।  कार्यक्रम के आखिरी  में फिल्म यारियां की टीम और लोकप्रिय पॉप सिंगर हनी सिंह ने गीत के कुछ बोल गुनगुनाये और फिर एक पंक्ति में ही इस बात का जिक्र कर दिया कि  उन्हें  मौका मिला तो वे जरुर अभिनेता बनना चाहेंगे।  दरअसल यह हकीकत भी है कि अपनी लोकप्रियता को देखते हुए अगर फिलवक्त वह चाहें तो जरुर स्टार बन सकते हैं।  कही न कही हर सिंगर और इंडस्ट्री से जुड़े हर लोकप्रिय शक्सियत की दिली खवाइश यह होती है कि वह एक बार एक्टर जरूर बन जाये। किसी दौर में सोनू निगम ने भी अपनी लोकप्रियता का इस्तेमाल किया था। लेकिन उन्हें वह कामयाबी नहीं मिली।  हाल ही में एक पारिवारिक समारोह में शरीक होने का मौका मिला।  इस समारोह में हर  उम्र के सदस्य शामिल हुए।  १० वर्ष से अधिक उम्र वाली प्रत्येक लड़के लड़कियों का यही प्रश्न  था कि हनी सिंह से मिली हैं आप.। फिल्मी पत्रकारिता से जुड़े रहने के कारण इस तरह के सवालों से हमेशा सामना होता रहता है। मैंने प्रश्न पूछने पर कहा कि तुम्हे हनी सिंह पसंद है या हनी सिंह की आवाज। उनका जवाब था दोनों। इससे स्पष्ट है कि हनी सिंह आज के दौर के लोकप्रिय शख्सियत में से एक हो चुके हैं।  शायद यही वजह है कि वे अपने अच्छे दौर का पूरा इस्तेमाल करना चाहते है और चाहते हैं कि उन्हें जल्द से जल्द सफलता मिले। आम लोगों किसी स्टार को किस नजरिये से देखते हैं इसका सीधा अनुमान आप ट्रैन में बैठे लोगों की बातचीत, भीड़ में एकत्रित लोगों की बातचीत से लगा सकते हैं. और इसी के आधार पर यह कहा जा सकता है कि हनी सिंह की  न सिर्फ आवाज,  बल्कि उनका व्यक्तित्व भी लोगों को काफी प्रभावित कर रहा है।  और आने वाले समय में  हो सकता है कि वे भी एक्टिंग के क्षेत्र में भी जल्द ही नजर आयें। दरअसल , हनी सिंह वर्त्तमान के बाबा सेहगल हैं।  जिस तरह बाबा सेहगल ने एक दौर देखा।  हनी सिंह का भी जलवा है।  जरूरत बस इतनी सी है कि वे अपने संगीत के शहद को बचा कर रखें तभी वे लंबी पारी खेल पायेंगे

सलमान की जय हो



सलमान खान की फिल्म जय हो ने साबित कर दिया है कि वे आम आदमी के अभिनेता हैं।  फिल्म ने पहले दिन ही २० करोड़ रुपए की कमाई की( आलेख लिखने तक) फिल्म आजम आदमी पर आधारित है, जिसमें उन्होंने आम आदमी से जुड़े सारे तत्व देने की कोशिश की है। एक दौर में  सलमान खान ने लगातार फ्लॉप फिल्में दी. लेकिन उन्होंने धीरे धीरे नब्ज पकड़ी।  और  वे जल्द ही ये बात समझ गए कि दर्शकों को उनसे क्या चाहिए।  वांटेड फिल्म से शायद सलमान ने भी इतनी उम्मीद नहीं की थी उन्हें उस फिल्म से इस कदर सफलता मिलेगी।  और वह उनके करियर की टर्निंग पॉइंट साबित होगी।  लगातार सफल फिल्म देने के बाद उन्हें इस बात का अनुमान हो चुका है कि अब दर्शक उन्हें एकरसता में पसंद नहीं करेंगे।  सो, उन्होंने अब बापना ट्रैक बदलने की कोशिश की है।  वे जल्द ही भैया जी  जैसी रोमेंटिक फिल्म लेकर आ रहे हैं।  हाल ही में जब उनसे मुलाकात हुई उनके चेहरे पे एक प्यारी सी मुस्कान थी।  उन्होंने कहा कि जल्द ही आपका प्रेम लौट रहा है।  पूछने पर उन्होंने कहा  प्रेम   यानि  बनकर अभिनय करना बेहद भाता है।  दरअसल इसकी  वजह यह है कि जब जिंदगी में प्रेम होता है तो इंसान खुद ब खुद अच्छा लगता लगने लगता है।  यही वजह है  कि दर्शक जब एक सी फिल्में देख कर उब जाएं तो अभिनेता को चाहिए कि वे खुद को बदलें और दर्शकों के सामने किसी  में आयें।  सलमान को सभी एंग्री यंग मन मानते हैं और उन्होंने कई स्टंट वाली फिल्में कर ली है और अब उनकी इक्षा है कि वह अपना लुक्क बदलें ताकि लोगों के दिलो दिमाग से अलग न हो।  उन्होंने एक सही निर्णय लिया है।  जाहिर सी बात है कि सलमान जिन ऊंचाइयों को छू चुके हैं वे निशित्तौर पे उसे खोना नहीं चाहेंगे।  भले ही वह इस बात से इंकार करें लेकिन कोई भी अपने शासित प्रदेश में किसी अन्य शासक कका आना बर्दास्त नहीं करेंगे।  सो उनकी नये अवतार का इंतजार रहेगा

खिल चुकी है कली


इम्तियाज अली ने फिल्म हाइवे में आलिया भट्ट को मुख्य किरदार के रूप में कास्ट किया है. आलिया भट्ट महेश भट्ट की बेटी हैं और वह मुंबई में ही पली बढ़ी हैं. निश्चित तौर पर वे मुंबई की लड़की रही हैं और उन्होंने ऐशो आराम से अपनी जिंदगी जी है. लेकिन इम्तियाज की इस फिल्म के माध्यम से आलिया को देश के ऐसे हिस्सों में जाने और देखने समझने का मौका मिला है, जहां वे शायद ही घूमने गयी हों, और शायद ही उन्होंने उन स्थानों को कभी देखा हो. चूंकि मुंबई की लड़कियां खासतौर से फिल्मी दुनिया की लड़की को स्टारबक्स की कॉफी व उनके फ्लेवर और स्वीटजरलैंड के ब्रांड के नाम भले ही याद हों. लेकिन उन्हें किसी भारत के कोने में स्थित किसी शहर का नाम शायद ही याद  होगा. इस फिल्म के प्रोमोज को ध्यान से देखें तो वाकई ऐसा लगता है कि आलिया को जैसे एक नयी जिंदगी मिल गयी है और वह उसे खुल कर जी लेना चाहती हैं. वे फिल्म में अभिनय करती नजर नहीं आ रहीं, बल्कि उसे जी रही हैं. ऐसा महसूस होरहा है. दरअसल, आलिया की यह पहली फिल्म होनी चाहिए थी. चंूकि इस फिल्म में उन्हें खुद को निखारने और अपने अभिनय के कई रूप दिखाने के ज्यादा मौके मिल रहे हैं. ऐसा नजर आ रहा है कि यह कली खिल रही है. इम्तियाज अली की पारखी नजर की दाद देनी चाहिए जो उन्होंने एक जूहू गर्ल को ऐसा किरदार सौंपा है और आलिया उसे परिपक्वता से निभाती नजर भी आ रही हैं.स्पष्ट है कि आलिया जो कि फिल्म स्टूडेंट आॅफ द ईयर में बेहद चार्मी और अरबन दुनिया की लड़की  का ही किरदार निभा रही थी. इस फिल्म से उनका नया रूप लोगों के सामने आयेगा और लोग इसे देख कर दंग हो जायेंगे. स्पष्ट है कि यह कली अब खिल कर मुस्कुराने और अपने पंख फैलाने के लिए तैयार है. उम्मीद है यह कली खुशबू भी फैलायेगी.

कब के बिछड़े आज मिले


 हाल  ही में जावेद अख्तर और सलीम खान सीएनएन आइबीएन में साथ साथ आये. दोनों के बीच आयी दरार के बाद यह पहला मौका था जब सलीम खान और जावेद अख्तर ने साथ साथ कोई साक्षात्कार दिया. दोनों इस इंटरव्यू के दौरान कई बार रोये.दोनों ने अपने मन की बात कही. यह पहली बार था, जब किसी दो बिछड़े दोस्तों ने साथ साथ मिल कर कॉफी विद करन जैसे इतर शो की अपेक्षा किसी अन्य शो में शिरकत की और खुल कर अपनी बातें सामने रखीं . दोनों ने आपसी मतभेद की चर्चा की. सलीम जावेद से किस बात पर नाराज हुए थे. यह स्पष्ट रूप से किसी को भी जानकारी नहीं. लेकिन लोगों में चर्चा यही रहती है कि जावेद अख्तर ने सलीम खान को धोखा दिया था और सलीम खान के बारे में अमिताभ बच्चन से जाकर कुछ कह दिया था. तब से दोनों दूर हंै. लेकिन फिर भी दोनों परिवारों के बीच वह दूरी नहीं. सलीम खान जब भी जावेद की पहली पत् नी हनी ईरानी से मिलते दोनों में खूब बातें होतीं. जंजीर फिल्म को लेकर भी दोनों साथ साथ आये. लेकिन खुद सलीम खान मानते हैं कि रिश्ते में एक बार जब दरार पड़ जाती है तो वह दोबारा वह गांठ खुल नहीं पाती. वे आज भी मानते हैं कि शाहरुख और सलमान के रिश्ते सामान्य नहीं हो सकते. मुमकिन हो कि सलमान खान ने अपने पिता से ही दोस्ती और दोस्ती में पड़ी दरार के रिश्ते को निभाने का तरीका सीखा हो. लेकिन बहाना कोई भी हो. दोनों का साथ साथ फिर से एक मंच पर आना. एक सफलता है और राजीव मशंद की भी यह सफलता है कि उन्होंने दोनों को साथ किया. फिल्मी पत्रकार अगर इस तरह की भूमिका निभाते हैं तो इस बात का भी उल्लेख होना ही चाहिए. चूंकि आमतौर पर फिल्मी पत्रकारों को केवल गॉसिप कर वाहवाही लूटने वाला ही माना जाता रहा है. इस लिहाज से यह एक सफल कदम है. 

नाम नामात्र नहीं

दीया मिर्जा फिल्म निर्माता बन कर बेहद खुश हंै और उनके चेहरे से उनकी यह खुशी साफ झलकती है. उनका मानना है कि हिंदी फिल्मों में अभिनेत्रियां जब जब फिल्म निर्माण से जुड़ती हैं लोग उनके बारे में यह बातें बनाने लगते हैं कि वे प्रोडयूसर बनी हैं क्योंकि उन्हें फिल्मों में काम नहीं मिल रहा या फिल्मों में सफल नहीं हो पायीं. दीया को इन बातों से तकलीफ होती है और दुख भी होता है कि अब भी बॉलीवुड में महिला निर्मात्री को लेकर इस तरह की बातें क्यों की जाती हैं. जबकि लोग अगर देखें तो महिला निर्मात्री में एकता कपूर जैसी सफल निर्मात्री ने यह साबित कर दिया है कि महिलाएं भी सफल अभिनेत्री हो सकती हैं और उन्हें सिर्फ फिल्मों में नाम नहीं चाहिए. किसी दौर तक गौरी खान का नाम फिल्मों में यूं ही जाता रहा. लेकिन हकीकत यह है कि अब गौरी खान भी फिल्मों की मेकिंग और उनके प्रोडक् शन में दखल देने लगी हैं. इससे स्पष्ट है कि फिल्मों में अब अभिनेत्रियां केवल अपना नाम नामात्र नहीं रखना चाहतीं. वे चाहती हैं कि उन्हें के्रडिट तभी मिले. जब उन्होंने वाकई उस नाम के लिए काम किया हो. दीया मिर्जा ने साफ किया है कि लोग यह न सोचें कि निर्माता का मतलब केवल चेक काटने का होता है. ऐसा नहीं है दीया फिल्म के हर क्रियेटिव विभाग में दिलचस्पी ले रही हैं.और उन्हें लगता है कि यह महिलाओं के लिए एक बेहतरीन क्षेत्र है. जल्द ही अमीषा पटेल अपने प्रोडक् शन की पहली फिल्म लेकर आ रही हैं और अभी से इस बात की चर्चा शुरू हो चुकी है कि वह बुरी फिल्म का ही निर्माण करेंगी. चूंकि वह अभिनेत्री के रूप में सफल नहीं रही हैं. इसका यह कतई मतलब नहीं कि एक असफल अभिनेत्री सफल निर्माता नहीं हो सकती. बॉलीवुड भविष्यवाणियों से ग्रसित है. जबकि जो नयी अभिनेत्रियां फिल्मों के साथ निर्माण का क्षेत्र चुन रही हैं. उनका प्रोत्साहन बढ़ाया जाना चाहिए

शादी की मुहर


 अभय देओल पहली बार अपनी वास्तविक गर्लफ्रेंड  प्रीति के साथ आॅन स्क्रीन पर नजर आयेंगे. यह प्रीति की पहली फिल्म है. प्रीति को इन बातों से कोई फर्क  नहीं पड़ता कि लोग उनके और अभय के बारे में किस तरह की बातें करते हैं. वे अभय के साथ लीव इन रिलेशनशीप में रह कर भी बेहद खुश हैं. उनका मानना है कि उन्हें किसी के साथ रहने के लिए किसी से मुहर लगवाने की जरूरत नहीं है. वे अकेली खुश हैं और बिंदास हैं. दरअसल, इन दिनों बॉलीवुड में कई जोड़ियां शादी की बजाय लीव इन में रहना पसंद कर रहे हंै. शुद्ध देसी रोमांस जैसी फिल्में इसी सोच का ही नतीज ा है और इसमें कोई हर्ज भी नहीं. खुद परिणीति चोपड़ा ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि अगर उन्हें कभी मौका मिले तो वे ताउम्र बिना शादी के किसी लड़के के साथ जो उसका दोस्त हो, उसके साथ जिंदगी बिताना पसंद करेंगी बजाय इसके कि वह किसी अन्य ऐसे आदमी से शादी के बंधन में बंधे जो उसके लिए परेशानी का सबब बने या फिर किसी भी रूप में उसके करियर के लिए बांधा बने. करीना बिंदास अंदाज में बताती हैं कि वे शादी से पहले सैफ के साथ लीव इन में रहती थीं. सोहा अली खान और कुणाल खेमू भी लीव इन रिलेशनशीप में ही रहते हैं. हाल ही में इरफान खान ने भी बातों बातों में कहा कि शादी की मुहर किसी रिश्ते को न तो बांध सकती है और न ही रोक सकती है. सो, फिर शादी क्यों. दरअसल, वर्तमान में बॉलीवुड शादी और तलाक जैसे रिश्तों को लेकर अभिनेता उतने गंभीर नहीं, जितने आम लोग हैं. वे रिश्तों में एक दूसरे का साथ चाहते हैं न कि बंधन और यह हकीकत है कि उन्हें अगर कहीं से भी इस बात की भनक लगती है कि रिश्ते उनके लिए परेशानी का सबब बनेंगे वे फौरन उन रिश्तों से किनारा कर लेते हैं, सुजैन और रितिक का अलग होना इस बात का प्रमाण है. 

फिल्में और व्यवसायी

कुछ दिनों पहले अनुराग कश्यप ने इस बात का विरोध किया है कि फिल्मों में एंटी स्मोकिंग डिस्क्लेमर की जरूरत नहीं. अनुराग कश्यप ने बांबे हाइ कोर्ट में इसे लेकर केस भी दर्ज किया, जिसमें उन्होंने साफतौर पर कहा कि वे इस बात के लिए कतई तैयार नहीं कि फिल्म में हर सीन में वह सिगरेट इज इनजुरियस टू हेल्थ का टैगलाइन लगायें. इसे लेकर बहसबाजी चल ही रही थी कि एक और नयी खबर यह आ रही कि अब फिल्मों में जो भी अभिनेता मोटरबाइक पर स्टंट करते नजर आयेंगे. उन्हें अब हेलमेट पहन कर फिल्मों में नजर आना होगा. सीबीएफसी के नये मुख्य अधिकारी ने इस बात की घोषणा की है. चूंकि उनका मानना है कि युवा पीढ़ी के प्रति फिल्मकारों को भी अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए. दरअसल, फिल्मों की अपनी शैली होती है. यह सच है कि सिनेमा समाज का आईना है. लेकिन फिल्मों की अपनी शैली में अगर हर बार इस तरह की बाधाएं प्रस्तुत की जाती रही तो निश्चित तौर पर फिल्मकारों को परेशानियों से जूझना होगा. हां, अब लगभग हर फिल्म में स्टंट के सीन के पहले कई तरह के डिस्कलेमर दिखाये जाते हैं और वह उचित भी है. लेकिन जरूरत से ज्यादा दिखाई गयी सावधानियां और चेतावनी भी दरअसल, लोगों को और अधिक  लोगों को उकासने के लिए काफी होते हैं. चूंकि यह बिल्कुल सामान्य सी बात है कि अगर किसी को गड्ढे में गिरने से बचाना है तो उन्हें एक बार गिरने दें. फिर वे खुद सचेत हो जायेंगे. अगर वाकई सीबीएफसी को भी यही महसूस होता है कि उन्हें 

एक फैन ऐसी भी


 सुधा कृष्णमूर्ति 365 दिनों में 365 फिल्में देखती हैं. मसलन हर दिन वह लगभग एक फिल्म जरूर देखती हैं. कम ही लोगों को यह जानकारी है कि सुधा और नारायण मूर्ति भी सुधा के फिल्मी शौक की वजह से ही मिले थे. उन्हें फिल्मों में इस कदर दिलचस्पी थी कि उन्होंने नारायण मूर्ति की भी फिल्मों के प्रति रुझान पैदा कर दिया था. वरना, नारायण मूर्ति फिल्मों के बिल्कुल शौकीन नहीं थे. दरअसल, व्यवसाय अपने आप में एक ऐसा नशा है, जिसके सामने किसी और नशे की जरूरत ही नहीं. शायद यही वजह है कि  कई सफल और महान व्यवसायियों ने फिल्मों को हमेशा हीन रूप में देखा. खुद गांधीजी भी फिल्मों को बुरी चीज मानते थे. एक बार रतन टाटा और दिलीप कुमार एक ही विमान में सफर कर रहे थे. दिलीप कुमार ने रतन टाटा को देख कर हाथ मिलाया और कहा कि मैं दिलीप कुमार. रतन टाटा ने उनसे पूछा कि कौन दिलीप कुमार. इस बार से दिलीप कुमार बेहद आहत हुए. उन्हें इस बात से काफी तकलीफ हुई कि जिस दिलीप कुमार के पीछे पूरी दुनिया पागल है, रतन टाटा उन्हें नहीं जानते. इस बात से उन्हें काफी तकलीफ हुई थी और उन्हें कई बार इस बात का जिक्र फिल्मों में किया . दरअसल, दोष रतन टाटा का नहीं था. वे फिल्में चूंकि देखा ही नहीं करते हैं सो, उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी. उस वक्त मीडिया इस कदर सक्रिय भी नहीं थी कि लोगों को इतनी जानकारी मिल जाये. अब तो दौर बदल चुका है. अब व्यापार ब्रांड का रूप ले चुका है और हर ब्रांड का चेहरा कोई न कोई सेलिब्रिटी है. मुकेश अंबानी और उनकी पत् नी नीता अंबानी की पार्टी में अब फिल्मी सितारों के बिना फीके हैं. हर व्यवसायी अब सेलिब्रिटिज के नजदीक रहने के बहाने ढूंढते हैं. लेकिन पहले फिल्मो को लेकर लोगों की सोच बिल्कुल अलग थी.

अभिनेता के नेता

 सलमान खान हाल ही में नरेंद्र मोदी के साथ गुजरात में नजर आये. सलमान वहां अपनी फिल्म के प्रोमोशन के लिए गये थे. हर अखबार ने इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया है. यह पहली बार नहीं, जब किसी अभिनेता के साथ मोदी की तसवीरें आती रही हैं. इससे पहले भी अक्षय कुमार और परेश रावल ने हाल ही में जब मोदी से रात के 2 बजे मुलाकात  की थी उस वक्त भी इस खबर को काफी महत्ता दी गयी थी. दरअसल, हकीकत यही है कि मोदी इन दिनों इस कदर किसी भी अखबार के मुख्य तत्व हो चुके हैं कि उनके बिना किसी भी अखबार का पन्ना ही अधूरा रह जा रहा है. एक तरफ तो हम लगातार यह चर्चा कर रहे हैं कि मोदी अपना अत्यधिक प्रचार कर रहे हैं और दूसरी तरफ लगातार खबरें लोगों तक पहुंच रही हैं. बात जहां तक सेलिब्रिटिज की है तो यह तथ्य बिल्कुल सही है कि सेलिब्रिटिज में वाकई मोदी सबसे लोकप्रिय  अभिनेता हैं. खुले तौर पर तो नहीं लेकिन बात जब विकास की आती है तो सभी कलाकार मोदी का नाम लेते हैं. साथ ही वह यह कहना नहीं भूलते कि गुजरात में शूटिंग करना सबसे आसान काम है. जब भी मुंबई से लोग शूटिंग के लिए गुजरात जाते हैं. उन्हें वहां काफी सहुलियत भी होती है. फिल्म गोरी तेरे प्यार में और विशाल भारद्वाज की फिल्म मटरू की बिजली का मंडोला जैसी फिल्मों में भी मोदी ने काफी सहयोग किया था. यही नहीं मोदी के फैशन की सोच लेकर भी अभिनेत्रियां उनकी काफी तारीफ करती हैं. मल्लिका सहरावत ने तो मोदी को अपने एक टीवी शो के दौरान शादी तक के लिए प्रस्ताव भेज दिया था.मलायैका भी हमेशा उनके अंदाज  की मुरीद रहती हैं. स्पष्ट है कि यह सिर्फ मोदी की राजनीतिक सोच नहीं, बल्कि उनकी अन्य गुणवता है जो आम लोगों के साथ सेलिब्रिटिज को भी प्रभावित करती है. 

दो प्रतिद्वंदी अभिनेत्रियां


 फिल्म गुलाब गैंग का प्रोमो हाल ही में रिलीज किया गया है. डेढ़ इश्किया माधुरी दीक्षित की दूसरी फिल्म है. गुलाब गैंग में माधुरी की प्रतियोगिता उनकी अपने दौर की ही प्रतियोगी जूही चावला से है. भले ही जूही चावला ने बाद के दौर में माधुरी से कम लोकप्रियता हासिल की हो. लेकिन इस फिल्म में जिस तरह उनके अंदाज भी नजर आ रहे हैं. यह स्पष्ट है कि उन्होंने अपनी प्रतिभा में कोई कमी नहीं होने दी है. अनुभव सिन्हा ने दो अच्छी प्रतिभाशाली प्रतिभाओं को एक साथ फिल्म में एकत्रित कर बेहतरीन व सराहनीय काम किया है. चूंकि शायद जूही चावला ने अब तक जितनी भी फिल्मों में काम किया. उससे कहीं अधिक उन्होंने इस फिल्म में मेहनत की होगी. चूंकि भले ही कोई भी प्रतिद्वंद्वी यह कह ले कि अब हमारे बीच कोई युद्ध नहीं. लेकिन जीत की ललक और प्रशंसा की ललक हर किसी में होती है. खासतौर से आज के दौर में जहां, फिल्मों के छोटे किरदार भी कभी कभी बड़े बड़े सितारों पर हावी हो जाते हैं और फिल्म की सफलता का पूरा श्रेय उन्हें मिल जाता है. हो सकता है कि जूही चावला के साथ भी कुछ ऐसा ही हो. पिछले लंबे अरसे से उन्होंने अपनी प्रतिभा को गलत तरीके से इस्तेमाल होने दिया है. वे बहुसितारा फिल्मों में भाभी दीदी बनती नजर आ रही हैं,. लेकिन गुलाब गैंग में वह नकारात्मक किरदार में हैं और प्रोमो से स्पष्ट है कि जूही माधुरी को कड़ी टक्कर देंगी. यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि ये दोनों अभिनेत्रियां जो लंबे अरसे से इस बात की भूखी हैं कि उन्हें दर्शकों से प्रशंसा मिले तो जाहिर सी बात है. दोनों ने मेहनत बहुत की है. माधुरी ने खुद से स्टंट करने के जो फैसले इस फिल्म के लिए लिया है. स्पष्ट है कि माधुरी खुद को कहीं से कम नहीं आंकना चाहतीं. सो, गुलाब गैंग इस लिहाज से महत्वपूर्ण फिल्म होगी कि दोनों किस तरह अपना सर्वश्रेष्ठ देती हैं.

प्यार से भी जरूरी कई काम है


हाल ही में दीपिका पादुकोण करन जौहर के शो पर आयी थी. उनके साथ प्रियंका चोपड़ा भी थीं. करन ने प्रियंका और दीपिका दोनों से यह सवाल किया कि जब वे अपने पुराने प्रेमी से मिलती हैं या रूबरू होती हैं तो उन्हें कैसा लगता है. इस पर दीपिका ने कहा कि वे इसे लेकर बेहद सहज हैं और प्रियंका का भी यही जवाब था. दीपिका और प्रियंका दोनों ही कामयाब अभिनेत्रियां हैं और दोनों ने अपनी पहचान अपने स्तर से बनायी है. दोनों बाहर से आयी हैं. उनका फिल्मी दुनिया से कोई ताल्लुकात नहीं रहे हैं. दोनों ने अपनी पहचान स्थापित की. दोनों को वक्त लगा लेकिन दोनों ने मुकाम हासिल कर लिये. जहां एक तरफ दीपिका ने इस साल सफलता के झंडे गाड़े. वही प्रियंका ने भी अपने स्तर पर अंतरराष्टÑीय पहचान भी बनायी. इससे स्पष्ट है कि ये दोनों ही अभिनेत्रियां कितनी स्वतंत्र मिजाज की हैं. दीपिका भी रणबीर को देख कर आंखें नहीं फेरतीं और प्रियंका भी शाहिद कपूर के साथ पार्टी में शिरकत करती हैं. दरअसल, अब दौर बिल्कुल बदल चुका है. अब मुंबई से बाहरी शहरों से आयी लड़कियों में आत्मविश्वास अधिक नजर आता है. अब वे देवदास की पारो की तरह रोना नहीं चाहतीं. वे अब बिंदास हो चुकी हैं. उन्हें पता है कि उन्हें आग ेकरियर में क्या करना है. वे अपने करियर के साथ कोई समझौता नहीं कर रहीं. दीपिका और प्रियंका दोनों ने ही प्रेम संबंधों में सफलता हासिल नहीं की है. लेकिन इस बात की सिकन उनके चेहरे पर नजर नहीं आती. और यह बहुत अच्छी बात है कि अब लड़कियों को प्रेम संबंध की वजह से आत्महत्याएं करने की नौबत नहीं आ रही हैं. ये दो सफल नायिकाएं इस बात का सबूत है कि प्यार ही सबकुछ नहीं दुनिया में. प्यार से भी जरूरी कई काम है. ..प्यार सबकुछ नहीं आदमी के लिए. खुद को इस भीड़ में बनाये रखने के लिए यह मजबूती जरूरी भी है.

छोटे शहरों में गोविंदा छाप

 कॉमेडी नाइट्स विद कपिल में कुछ हफ्तों पहले गोविंदा आये थे. गोविंदा एक दौर में हिंदी सिनेमा के लोकप्रिय हास्य अभिनेताओं में से एक रहे. जिन्होंने अपने अंदाज से खासतौर से सिंगल स्क्रीन थियेटर के दर्शकों के लिए ट्रेंड तय किया था. उनकी अदाकारी का अंदाज व डांस के स्टेप आज भी छोटे शहरों में सबसे अधिक लोकप्रिय हैं. मुझे याद है मेरे अपने शहर बोकारो स्टील सिटी में किस तरह गोविंदा की फिल्में आने पर मोहल्ले के सभी लोग स्टॉल में बैठ कर भी फिल्में देखना पसंद करते थे. मैंने फिल्म आंखें बिहार के कटिहार के एक सिनेमा हॉल में देखी थी. तब मंै बेहद छोटी थी. और उस वक्त फिल्मों की सफला का सीधा मापदंड फिल्म का हाउसफुल होना ही होता था. इसके अलावा मुझे कोई शब्दावली आती भी नहीं थी. उस वक्त की वह भीड़ आज भी मेरे जेहन में जिंदा है. लोग सीढ़ियों पर बैठ कर गोविंदा की फिल्में देख रहे थे. और उनके हर गाने पर सिटियां और तालियां बज रही थीं. लेकिन आज वही गोविंदा फिल्मों में सहयोगी कलाकार के रूप में नजर आते हैं. हाल में जब वह कॉमेडी नाइट्स में आये तो लगा फिर से पुराने दौर का गोविंदा लौट आया है. वही गोविंदा जिनके गानों पर सबसे अधिक सेंसर की कैंची चलाई जाती थी.  शादी और पार्टी गोविंदा छाप गानों के बगैर संभव ही नहीं था. खुद अयान मुखर्जी व बड़ी हस्तियां मानते हैं कि आज भी गोविंदा छाप गानों पर डांस करते हैं. दरअसल, हकीकत यही है कि हम खुद को बौद्धिक जताने की कोशिश करें लेकिन हकीकत यही है कि मस्ती के वक्त हम गोविंदा की मस्ती ही याद करते हैं. गोविंदा वास्तविक जिंदगी में पहले की अपेक्षा अधिक गंभीर हो चुके हैं. लेकिन कॉमेडी नाइट्स में जिस तरह वे कॉमेडी किंग कपिल को भी अपने बातों को जाल में लपेट रहे थे. इससे यह तो स्पष्ट है कि गोविंदा का दौर न खत्म हुआ है न होगा.

सहेजने के सरोकार

सोनम कपूर फोटोग्राफी की काफी शौकीन हैं. इसका अनुमान उनके इंस्टैग्राम व अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर उनके द्वारा पोस्ट की गयी तस्वीरों से लगाया जा सकता है. सोनम आमतौर पर भी जब पत्रकारों से मिलती हैं तो वे उनकी तसवीरें लेकर उसे एकत्रित करती हैं. उनके सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी ऐसी कई तसवीरें हैं जो उनकी दिलचस्पी को दर्शाते हैं. सोनम कपूर किसी बाहरी देश में जाती हैं तो वहां से कपड़ों के एंटिक्स का भी कलेक् शन एकत्रित करती हैं. हाल के दौर में ऐसा शौक कम अभिनेत्रियों में नजर आता है, जिन्हें किसी भी चीज को एकत्रित करने का शौक हो. पुराने दौर में मीना कुमारी को गजल लिखने का शौक था और अपनी नज्में लिख कर उन्हें एकत्रित करती थीं. उनके कई नज्मों पर गाने भी बने. अमिताभ बच्चन को कलम एकत्रित करने का शौक है. राजेश खन्ना ने अपने घर आशीर्वाद में दुनिया की तमाम प्रसिद्ध शराब के ब्रांड्स एकत्रित कर रखे थे. लेकिन वर्तमान दौर में स्टार्स उन चीजों को ही अहमियत अधिक देते हैं. जो भौतिक है. राजकपूर ने अपने कमरे में दुनिया के तमाम कॉमिक्स का संग्रह रखा था.देव आनंद सिगार एकत्रित करने के शौकीन थे. दरअसल, हकीकत यही है कि सफलता को सहेजा जाना भी एक अहम विधा है , जिसे हर कोई नजर अंदाज कर देता है. इस लिहाज से अमिताभ बच्चन एकमात्र कलाकार हैं, िजन्होंने अपनी पारिवारिक धरोहर को भी सहेजा और अपनी जिंदगी की तमाम घटनाओं को वह तसवीरों के माध्यम से सहेजते रहते हैं. आज सबकुछ डिजिटल है और स्टार्स भी सोशल नेटवर्किंग साइट्स के माध्यम से चीजें शेयर करते रहते हैं. लेकिन उन्हें दस्तावेज के रूप में सहेजना बेहद कम कलाकारों ने किया है. जबकि यह उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा है. जिन्हें उन्हें सहेजना ही चाहिए.

शहर शहर घूमते स्टार्स

फिल्म डेढ़ इश्किया का प्रोमोशन देशभर में नहीं किया जायेगा. इसकी बड़ी वजह यह है कि फिल्म के निर्देशक अभिषेक चौबे का मानना है कि आज भी माधुरी दीक्षित के प्रशंसक कम नहीं हुए हैं. वे जहां भी जाती हैं. वहां काफी प्रशंसकों की भीड़ उमड़ पड़ती है. ऐसे में माधुरी की सुरक्षा के लिए कड़े इंतजाम करने पड़ते हैं. सो, उन्होंने तय कर लिया है कि माधुरी को पूरे देशभर में नहीं भेजा जायेगा. इस बात से निस्संदेह माधुरी बेहद खुश होंगी. चूंकि फिल्मों के प्रोमोशन का जो प्रचलन इन दिनों है. वर्तमान में स्टार्स इससे सबसे ज्यादा परहेज करते हैं. सभी का मानना है कि यह उनके लिए थका देनेवाला वक्त होता है. उन्हें जितना वक्त फिल्मों की शूटिंग को नहीं देना पड़ता. उससे अधिक प्रोमोशन में देना पड़ता है. उन्हें छोटे छोटे अंतराल पर दुनियाभर की सैर करनी पड़ती है. फिल्म जिंदगी न मिलेगी दोबारा जैसे विषयों पर फिल्म बनी हो तो छोटे अंतराल में कई शहरों की सैर भी करनी पड़ जाती है. इससे कई बार स्टार्स बीमार भी पड़ जाते हैं. लेकिन प्रोमोशन चूंकि फिल्मों की सफलता का अहम हिस्सा बन चुका है. वे उससे इनकार भी नहीं कर सकते. यही वजह है कि करिश्मा, करीना, बिपाशा बसु, कट्रीना जैसे कई कलाकार प्रोमोशन के दौरान बीमार भी पड़ जाते हैं. लेकिन फिल्म के निर्माता एक फिल्म की देखा देखी कर कोई कसर नहीं छोड़ते. वे लगातार प्रोमोशन करवाते ही हैं. शाहरुख खान ने फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस के लिए जिस कदर प्रोमोशन किया. शायद ही इससे पहले कभी उन्होंने इस तरह से प्रोमोशन किया था. दरअसल, फिल्मों की सफलता के लिए प्रोमोशन एक अहम जरिया बन चुका है. इसके माध्यम से ही दर्शकों के जेहन में फिल्म के बारे में छवि बार बार गढ़ने की कोशिश की जाती है और उसके आधार पर ही उन्हें फिल्म की रिलीज पर दर्शक मिलते हैं.

पहला कदम


हाल ही में फिल्म क्वीन के निर्देशक विकास बहल से बातचीत हुई. उन्होंने बताया कि उन्होंने शुरुआत टीवी से ही की थी. बाद में उन्होंने फिल्मों में कदम बढ़ाये. अनुराग बसु ने भी शुरुआत टीवी से ही की थी. और वे हमेशा कहा करते हैं कि हर नये टैलेंट को पहले टीवी में अपना हाथ आजमाना चाहिए. इससे उन्हें इस इंडस्ट्री के कल्चर के बारे में जानकारी मिल जाती है और फिर वे सही तरीके से फिल्मों से जुड़ पाते हैं. खासतौर से मुंबई से बाहर फिल्मों की दुनिया में कदम रखने का सपना देखने वालों के लिए यह बेहद जरूरी है कि उन्हें इस बात की पूरी जानकारी हो कि आखिर फिल्मी दुनिया की असलियत क्या है. किस तरह सपनों को उड़ान भरने के लिए भी उन्हें सही तरीका चुनना होगा. फिल्म गिप्पी की निर्देशिका सोनम नायर ने एक बेहतरीन लेख लिखा है कि अगर आप अपनी पहली शुरुआत करना चाहते हैं तो आपको किस तरह की तैयारी करनी चाहिए. उन्होंने बताया है कि कभी बड़े प्रोडक् शन हाउस को टारगेट न करें. लेकिन मुंबई से बाहर रहनेवाले युवाओं की हमेशा यही कोशिश होती है कि वे आकर तुरंत बड़े प्रोडक् शन से जुड़ जायें और जब उन्हें वहां से निराशा मिलती है तो उनका मनोबल टूट जाता है. जबकि हकीकत यही है कि कोई भी प्रोडक् शन हाउस अपनी फिल्मों पर करोड़ों खर्च करता है तो वह किसी भी नौसिखिया को काम नहीं सौंपेगा. इस हकीकत को नये लोग जितनी जल्दी स्वीकारें उतना बेहतर. किई निर्माता निर्देशक जो अपनी पहचान बना चुके हैं. उन्हें भी हर फिल्म के बाद अपने करियर को आगे बढ़ाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है.फिल्में बनाने का मतलब आपकी फिल्म में स्टार्स हो यह जरूरी नहीं. आप शॉर्ट फिल्मों से भी अच्छी शुुरुआत कर सकते हैं.कई वर्कशॉप होते हैं. उनके माध्यम से भी रास्ते बन सकते हैं. जरूरी यही है कि पहला कदम सोच समझ कर लिया जाये.