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20130330

छोटे परदे का बड़ा कैनवास


 इन दिनों टेलीविजन पर प्रसारित हो रहे धारावाहिक सरस्वतिचंद्र की काफी चर्चा है. चर्चा का खास विषय यही है कि इस शो के लोकेशन व सेट को भव्य तरीके से बनाया गया है. और इसके निर्माता हिंदी फिल्मों के जाने माने शख्सियत संजय लीला भंसाली हैं. संजय लीला भंसाली का नाम जुड़ जाने भर से ही इस शो के कलेवर की परिकल्पना कर ली जा सकती  है. चूंकि संजय पेशे से भले ही निर्देशक हैं. लेकिन वे चित्रकार भी हैं और जब भी उन्हें मौका मिलता है. वे अपनी कला को अपने सृजनशीलता में जरूर मिलाते हैं. सरस्वतिचंद्र के कलाकारों को हटा दें तो साफतौर पर यह शो किसी फिल्म की तरह ही है. शो में खास तरीके का बैकग्राउंड स्कोर है. कलाकारों के बोलने के अंदाज भी, कॉस्टयूम सभी चीजों में भव्यता दी गयी है. इससे पहले शोभा सोमनाथ नामक धारावाहिक में भी इसी तरह फिल्मों के स्तर का प्रोडक् शन किया गया था. धारावाहिक मुक्ति बंधन में उनमें से एक है. स्पष्ट है कि अब वाकई छोटा परदा भी छोटा परदा नहीं रहा है. अब छोटे परदे पर भी निर्माता निर्देशक फिल्मों की तरह निवेश कर रहे हैं, चूंकि उन्हें वह निष्कर्ष नजर आ रहा है कि किस तरह इस तरह के धारावाहिक पसंद किये जा रहे हैं. टेलीविजन पर यूं तो कई तरह के उपन्यासों पर आधारित धारावाहिक की प्रस्तुति होती रहती है. लेकिन पिछले कुछ सालों में धारावाहिकों को सेट के आधार पर भव्यता देकर टेलीविजन ने जोखिम भरा काम तो किया है. लेकिन साथ ही साथ उन्होंने साबित किया है कि अच्छी टीम हो तो टेलीविजन में भी क्रियेटिविटी दिखाने के कई मौके मिल सकते हैं. संजय लीला भंसाली फिल्में बनायें या धारावाहिक वे अपनी सृजनशीलता की अदभुत मिसाल कायम करते ही हैं और छोटे परदे पर बड़ा कैनवास प्रस्तुत करते ही हैं और यह सकारात्मक संकेत हैं विकास के.

एक समर्पित फैन व जीवनसाथी



नर्मता दत्त ने कुछ दिनों पहले एक बातचीत के दौरान अपने पिता सुनील दत्त व भाई संजय दत्त से जुड़े कई यादों को सांझा किया है, जिसमें उन्होंने बताया है कि किस तरह जब नरगिस दत्त के कैंसर का इलाज चल रहा है. उस वक्त सुनील दत्त उनका एक मां की तरह ख्याल रखा करते थे. वे खुद नरगिस को ब्रश कराते, उनका शौचालय भी साफ करते, उनकी उल्टियां भी साफ करते. और साथ ही नरगिस को जीने के लिए प्रेरित भी करते थे. सुनील दत्त ने नरगिस की इलाज में अपनी जीवन की पूरी कमाई लगा दी थी. लेकिन वह उन्हें बचा नहीं पाये. नरगिस की मौत के बाद सुनील अकेले कमरे में काफी देर तक रोया करते थे. वे बेडरूम में नहीं जाया करते थे. बेटियों ने पिता से कहा भी कि अगर वह चाहें तो दूसरी शादी कर सकते हैं. लेकिन सुनील ने एक ही बात कही कि कोई दूसरी औरत नरगिस की तरह नहीं हो सकती. दरअसल, हकीकत यही है कि सुनील दत्त ने नरगिस को एक समर्पित फैन की तरह प्यार किया. वे नरगिस से उस वक्त भी प्यार करते थे. जब वह जानते थे कि वह राज कपूर से प्यार करती हैं. लेकिन उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा. उन्होंने नरगिस का हाथ उस दौरान थामा था, जब राज कपूर के प्रेम में धोखे के दौर से गुजर रही थीं. मदर इंडिया में नरगिस को जोखिम से बचाते वक्त जो सुनील ने उनका हाथ थामा. ताउम्र साथ निभाया. वरना, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लिए यह आम बात थी कि वे अपनी पत् नी की मृत्यु के बाद दूसरी शादी कर लेते. लेकिन सुनील साहब ने ऐसा नहीं किया. खुद उनके बेटे संजय ने पहली पत् नी की मौत के बाद दोबारा शादी कर ली थी. दरअसल, किसी के सहारे जिंदगी गुजार देना एक तपस्या की तरह है और यह हर कोई नहीं कर सकता. सुनील एक समर्पित जीवनसाथी थे, सो, उन्होंने वाकई जीवन में सिर्फ एक बार प्यार किया और उसे निभाया भी.

sanjay dutt

सं जंय उस वक्त सिर्फ 3 साल के थे. जब उनके माता-पिता ने उन्हें बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया था. संजू बाबा नहीं चाहते थे कि उन्हें बोर्डिंग भेजा जाये. लेकिन उन्हें जाना पड़ा. वे वहां से मां नरगिस को पत्र लिखते रहते. कि आइ लव यू मॉम. मैं आपसे बहुत प्यार करता हूं. और मैं घर वापस आना चाहता हूं. मैं यहां नहीं रहना चाहता. नरगिस भी बेटे को तसल्ली देती. लेकिन उनका यह निर्णय नहीं बदला. संजय सनवार के ही बोर्डिंग स्कूल में रहे. मां और पापा संजय से मिलने जाया करते थे. लेकिन इसके बावजूद संजय खुश नहीं थे. शुरुआती दौर से ही घर से दूर रहने की वजह से संजय ने अपनी जिंदगी में कम उम्र ही आजादी को खास जगह दे दी. चूंकि वह बाहर थे. सो, उनके माता पिता भी 24 घंटे उन पर नजर नहीं रख सकते थे. सो, वे अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने लगे. मौज मस्ती, दोस्तों के चयन का निर्णय उनका खुद का होता है. वे खुद अपनी जिंदगी के रहन सहन को तय करने लगे थे.  दो बेटियों के बीच इकलौते बेटे की अच्छी परवरिश की लालच में नरगिस और पिता सुनील दत्त ने संजू बाबा को खुद से दूर तो रख दिया. लेकिन शायद वे भूल गये थे कि उनके बेटे को बोर्डिंग स्कूल की नहीं, बल्कि माता पिता के प्यार की जरूरत है. उनकी यही भूल संजू बाबा की जिंदगी में तूफान लेकर आयी. चूंकि कई सालों तक घर से दूर रहने के बाद दोस्तों के बीच कटी जिंदगी की वही दिनचर्या तब भी जारी रही जब वे वापस मीडिल स्कूल की पढ़ाई करने मुंबई आये. मुंबई के एलिफिस्टन कॉलेज में उनका दाखिला हुआ. लेकिन संजू बाबा की पढ़ाई में दिलचस्पी घट गयी. संजू स्कूल के नाम से बाहर जाते. लेकिन स्कूल नहीं जाया करते थे. वे देर देर से घर आते. घर में किसी से बात नहीं करते. अपने कमरे में हमेशा बंद रहते. मां नरगिस को इस बात का एहसास उस वक्त हुआ कि संजू की जिंदगी में कुछ गलत हो रहा है, जब उन्हें कॉलेज से पता चला कि संजू कॉलेज काफी बंक रहे हैं. धीरे धीरे नरगिस ने बेटे पर निगाह रखनी शुरू की. एक दिन कमरे में नशीली पद्धार्थ देखी. कम उम्र में ही गलत संगति में संजू बाबा ने मारीजुना नामक नशीली पद्धार्थ का सेवन कर दिया था. नरगिस जी जान से संजू को इन चीजों से दूर रखने की कोशिश करती. लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था. चूंकि नरगिस की सेहत दिन ब दिन बुरी होती जा रही थी और पिता सुनील का भी पूरा ध्यान नरगिस पर था. यही वह दौर था. जब संजय परवरिश और परिवार से दूर होते गये और उन्होंने गलत रास्ता इख्तियार कर लिया. मां से करीबी होने के बावजूद वे मां से सारी बातें शेयर नहीं करते. गलत संगति में उन्होंने अपना परिवार ढूंढना शुरू कर दिया था. स्थिति और बिगड़ी जब मां नरगिस की मौत हुई. और यही से संजू बाबा की जिंदगी पर ग्रहण लगना भी शुरू हुआ. दरअसल, हकीकत यही है कि कई बार माता पिता अपने बच्चों से अत्यधिक की उम्मीद कर व उनके बेहतर भविष्य की फिक्र में कुछ ऐसे निर्णय ले लेते हैं, जो उन्हें उनकी नजर में तो सही लगते हैं. लेकिन उस एक निर्णय से बच्चे की पूरी जिंदगी तबाह हो जाती है. संजू बाबा उन बच्चों में से नहीं थे, जो घर से दूर रह कर अपनी शिक्षा को बेहतर कर पाते. चूंकि परिवार की निगाह से दूर रहने पर हर बच्चे को अच्छे व बुरी संगति मिलती है. और कई बार बुरी संगति उन्हें अच्छी लगने लगती है. संजय दत्त को पिता सुनील दत्त ने वर्ष 1981 में पहली बार फिल्म रॉकी से बॉलीवुड में भव्य तरीके से लांच किया. एक मां के लिए इससे खुशी की बात और क्या होती कि उनके बेटे की पहली फिल्म रिलीज हो रही है. चूंकि नरगिस खुद अभिनेत्री थी. तो वे चाहती थीं कि उनका बेटा भी फिल्मों में आये और तरक्की करे. संजू बाबा के साथ शुरुआती दौर से किस्मत नेअजीब तरह के खेल खेले. 7 मई 1981 को रॉकी रिलीज होनेवाली थी और 3 मई फिल्म की रिलीज से ठीक 4 दिन पहले मां नरगिस का देहांत हो गया. अपनी जिंदगी में मां की कमी होने के बाद संजू बाबा धीरे धीरे और नशे की गिरफ्त में आने लगे. फिल्म को शानदार कामयाबी मिली. लेकिन संजू बाबा तब भी पूरी तरह अपने करियर पर ध्यान देने की बजाय ड्रग लेने लगे. पिता सुनील पहले ही पत् नी की मौत से टूट चुके थे. वे डिप्रेशन में जा चुके थे. इसी दौरान सुनील को एहसास हुआ कि उनके बेटे को ड्रग की लत लग गयी है. उन्होंने निर्णय लिया कि संजू जर्मनी गये. लगभग आठ महीने के इलाज के बाद संजू वापस आये. इस बार संजय में सकारात्मक बदलाव थे. पिता भी खुश थे. लेकिन किस्मत ने फिर पासा पलटा. संजू की जिंदगी में उनकी पहली पत् नी ऋचा शर्मा आयी. लेकिन ब्रेन ट्यूमर से उनकी मौत हुई. फिर उन्होंने रिया पिल्लई से शादी की. और इसी बीच संजय ने अपनी फिल्मी करियर को भी सुधार लिया. उन्हें रॉकी से जो पहली कामयाबी मिले. इसके बाद उन्हें लगातार फिल्में मिलती रहीं. उनकी फेहरिस्त में उस दौरन लगभग 56 हिट फिल्में दी. लेकिन उन्हें एक बहुत बड़ी कामयाबी मिली फिल्म खलनायक से, जिसमें उन्होंने पहली बार खलनायक की भूमिका निभाई थी. फिल्म ने शानदार सफलता हासिल की. लेकिन इसी वर्ष उनकी सफलता पर फिर से ग्रहण लगा. इसी वर्ष उन्हें सजा सुनाई गयी और वे डेढ़ साल के लिए जेल में रहे. पिता सुनील दत्त ने हर संभव प्रयास कर अपने बेटे की जिंदगी बचाने की कोशिश की.पिता की कोशिशों का ही नतीजा रहा कि उन्हें बेल मिली. इस घटना ने वाकई संजू की जिंदगी पूरी तरह बदल कर रख दी. ठीक उनकी फिल्म लगे रहो मुन्नाभाई की कहानी की तरह. जिस तरह फिल्म मेंं वे इंटरवल से पहले एक माफिया के आदमी रहते हैं और अवैध, गैर सामाजिक कार्य करते हैं. लेकिन जानवी से प्रेम होने के बाद उन्हें एहसास होता है कि वह किस तरह गलत रास्ते पर थे और उन्होंने अपनी जिंदगी में गांधीगिरी को अपना लिया. ठीक इसी तरह संजू बाबा की जिंदगी भी बदली. उन्होंने जेल से लौटने के बाद पूरी तरह से अपने करियर पर ध्यान दिया. उस दौर में जब उनकी फिल्म कुछ कमाल नहीं कर पा रही थी. उन्हें राजकुमार हिरानी की फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस मिली. पहले यह फिल्म शाहरुख खान करनेवाले थे. लेकिन शाहरुख के ना कहने पर यह फिल्म संजय दत्त को मिली. इस फिल्म की कहानी भी संजय की जिंदगी से काफी मिलती जुलती रही. इस फिल्म में भी वह ठग बने थे और अपने माता पिता को धोखा देकर वे झूठी डॉक्टरी की शिक्षा हासिल करते हैं. लेकिन पिता के सामने जब सच सामने आता है तो वह वाकई खुद को उस काबिल बनाते हैं. उनकी जिंदगी में मुन्नाभाई सीरिज ने अहम भूमिका निभायी. फिल्म को अपार सफलता मिली. यह फिल्म संजू के जीवन में अहम इसलिए भी रही क्योंकि इसी फिल्म वे अपने पिता सुनील दत्त के साथ थे. सुनील दत्त के साथ यह उनकी आखिरी फिल्म थी. लेकिन फिल्मों के संवाद जिस तरह लिखे गये थे और सुनील जिस तरह आॅन स्क्रीन बेटे संजय दत्त को ईमानदारी की राह पर चलने को कहते थे. हकीकत में भी वे अपने बेटे से ही यही उम्मीद रखते थे और शायद यही वजह थी कि इस फिल्म के शॉट खत्म होने के बाद हर बार सुनील की आंखों में आंसू होते थे और वे अपने वैनिटी वैन में जाकर घंटों रोया करते थे. खुद विधु विनोद चोपड़ा ने यह बात स्वीकारी थी कि सुनील दत्त इस फिल्म से भावनात्मक रूप से काफी जुड़ गये थे. दरअसल, इस फिल्म में भले ही सुनील दत्त एक पिता के किरदार में थे और मंच पर सिर्फ एक भूमिका निभा रहे थे. लेकिन फिल्म में बोले गये उनके संवाद वास्तविक जिंदगी में उनके बेटे संजय के लिए ही थी. वे संवाद दरअसल, एक पिता की दिल की टीस थी. चूंकि वह चाहते थे कि उनका बेटा जो कि गलत रास्ते पर चला गया था. लौट आये और ईमानदारी से फिर से अपनी जिंदगी की शुरुआत करे. संजय दत्त ने भी अपने पिता सुनील दत्त के दर्द को समझा. तभी उन्होंने अपनी दोबारा नयी जिंदगी शुरू की और फिल्मों पर ध्यान दिया. मुन्नाबाई एमबीबीएस से पहले तक उन पर से निर्माताओं का विश्वास उठ चुका था. लेकिन इस फिल्म की कामयाबी ने फिर से संजू को बॉलीवुड के शीर्ष सितारों में लाकर शामिल कर दिया. फिर आयी इसी फिल्म की अगली सीरिज लगे रहो मुन्नाभाई की कामयाबी ने संजय दत्त को फिर से उनका सम्मान इंडस्ट्री में वापस दिला दिया. इंडस्ट्री ने उनके प्रति अपना रवैया बदला और उन्हें बेहतरीन फिल्में मिलती रहीं. लेकिन इसी दौरान पिता सुनील दत्त की मौत से वे दोबारा टूटे. लेकिन एक पिता को उन्होंने इतनी तसल्ली जरूर दे दी थी कि उनका बेटा भले ही कानून की दृष्टि में गुनहगार हो. लेकिन निजी जिंदगी में उन्होंने खुद को बदला. तब से लेकर अब तक संजय दत्त ने कभी कोई अवैध रास्ता इख्तियार नहीं किया. उन्होंने अपनी छवि को सुधारने की कोशिश की. अपने खानदान पर लगे कलंक को मिटाने की कोशिश की. अपनी मां की याद में पिता द्वारा बनाये गये नरगिस कैंसर संस्थान की देख रेख की. लेकिन परिवार में एक बार फिर से हलचल तब आयी. जब अचानक संजय दत्त ने अपनी दूसरी पत् नी रिया पिल्लई से तलाक लेने के बाद फिल्मों में आयटम सांग करनेवाली मान्यता दत्त से शादी करने का फैसला किया. बहनें नर्मता दत्त और प्रिया दत्त इस निर्णय केबिल्कुल खिलाफ थी.  परेशांिनयों से तो शायद संजय दत्त की ऐसी दोस्ती हो गयी थी कि उन्हें कोई भी खुशी आसानी से नहीं मिलती. आखिरकार कुछ सालों के बाद बहनों ने भाई की पसंद को स्वीकारा. संजय पिछले 10 सालों में काफी बदले. उन्होंने अपनी जिम्मेदारियां समझीं. मान्यता दत्त व अपने दो बच्चों के साथ उन्होंने पहली पत् नी ऋचा र्मा की बेटी त्रिदाशा के पालन पोषण का भी जिम्मा उठाया. एक पिता होने के नाते उन्होंने बेटी की परवरिश में कोई कमी नहीं की. हां, मगर वे बेटी को साथ नहीं रख पाते. साथ ही वे इस बात के हमेशा सख्त खिलाफ रहे कि दत्त परिवार की बेटियां या उनकी बहनें बॉलीवुड में आयें. वर्तमान में इंडस्ट्री में उन्होंने अपनी एक मजबूत जगह बना ली है. पूरा बॉलीवुड चाहता है कि उन्हें दया मिले. और उन्हें राहत मिल जाये. सलमान खान व अजय देवगन से उनकी जिगड़ी दोस्ती जगजाहिर है. पिछले कुछ सालों में संजय दत्त ने न सिर्फ फिल्मों में बल्कि अपने पिता द्वारा बनाई गयी चैरिटी को भी काफी आगे बढ़ाया है. प्रत्येक वर्ष वे घर पर नवरात्रि के मौके पर माता की चौकी रखते हैं, जैसे किसी दौर में उनकी मां रखा करती थी. उनके घर पर आज भी एंट्री लेने के साथ सबसे पहले सामने की दीवार पर मां नरगिस की भव्य तसवीर है. संजय के हर कमरे में मां और बाबूजी की तसवीर है और वे आज भी अपने पिता की बातें सुन कर काफी भावुक हो जाते हैं. चूंकि संजय जानते हैं कि उन्होंने अपने पिता को वे खुशियां नहीं दी, जो उन्हें वे दे सकते थे. उनके पिता को कई बार उनकी वजह से जिल्लत सहनी पड़ी.जबकि वे खुद एक बेहतरीन और पाक साफ व्यक्तित्व थे. कई लोगों के तानें सुने हैं पिता सुनील दत्त ने. खुद संजू बाबा ने एक बातचीत में स्वीकारा है कि उस वक्त उन्हें सबसे ज्यादा तकलीफ होती थी. जब लोग यह बातें कहते थे कि लायक बाप का नालायक बेटा. बाप के पास बहुत पैसे थे सो, बेटा नालायक हो गया. संजय ने अपनी वह छवि सुधारने की बहुत कोशिश की. लेकिन एक बार फिर किस्मत ने उन्हें उनके उसी इतिहास के कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है. जिस वक्त संजू बाबा को यह खबर मिली कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने 5 साल की सजा सुनाई है. वे उस वक्त चैन की नींद सो रहे थे. लेकिन शायद ही उन्होंने सोचा होगा कि उस रात की सुबह ऐसी होगी. कोर्ट का फैसला सुन कर वे रो पड़े. इस बार तो उनका साथ देने के लिए उनके पिता भी नहीं, लेकिन पूरा दत्त परिवार उनके साथ हैं.

आयटम सांग की अभिनेत्रियां



कंगना रनौत ने अपनी आगामी फिल्म शूटआउट एट वडाला के प्रोमोशन से इनकार करते हुए कहा है कि वह फिल्म को प्रोमोट नहीं करेंगी. उनकी नाराजगी का कारण यह है कि उन्हें इस फिल्म में बबली बदमाश के आयटम नंबर से परेशानी है. चूंकि इस गाने में प्रियंका चोपड़ा हैं और फिल्म के निर्माता निर्देशक आयटम गानों को ही अहमियत दे रहे हैं. दरअसल, हिंदी फिल्मों का यह नया ट्रेंड बन गया है. इन दिनों निर्देशकों को फिल्मों की अभिनेत्रियों से अधिक आयटम सांग में किस अभिनेत्री को शामिल किया जाये. इस पर अधिक ध्यान रहता है. इससे पहले चिकनी चमेली, फेविकॉल गीत में भी कुछ ऐसे ही हंगामे हुए थे. इन फिल्मों में भी अभिनेत्रियों से अधिक आयटम गानों की अभिनेत्रियों पर ध्यान दिया गया था. ऐसे में वाकई फिल्म की अभिनेत्री का नाराज होना जायज है. एक तरफ जहां आयटम गीतों पर कमान कसने के लिए सरकार की तरफ से कई नियम बनाये जा रहे हैं. वही एक फिल्म में कई आयटम गीत डालने की कोशिश की जा रही है. और मेकर्स इससे खुश भी हैं. जिस तरह कंगना ने खुले तौर पर इस बात का विरोध किया है तो ऐसा हर अभिनेत्री को करना चाहिए. ऐसे भी हिंदी फिल्मों में अभिनेत्रियों के लिए कुछ नहीं होता. और फिर ऐसे में उन्हें नहीं आयटम गीतों को तवज्जो मिलती है तो यह गलत है. सरासर. और अभिनेत्रियों को भी यह समझना होगा कि किस तरह वे खुद किसी आयटम में केवल आयटम बन कर न रह जायें. अभिनेत्रियां तो इस बात से खुश होती हैं कि उनके आयटम गीतों को तवज्जो मिल रही है. लेकिन हकीकत में वे किस तरह फिल्मों में इस्तेमाल होती हैं. इसका जीता जागता उदाहरण है. आयटम गानों को तवज्जो देनेवाली फिल्में. इसलिए बेहतर हो कि  जिस तरह कंगना ने अपने हक के लिए आवाज उठाई है और भी अभिनेत्रियां उठाएं न कि जश्न मनाएं

20130322

एक फैन-एक बहु की तरफ से खास तोहफा



यासमीन बचपन से ही रफी साहब के गीतों की फैन थीं. उनकी खुदा से सिर्फ यही गुजारिश थी कि कभी उन्हें रफी साहब से बस एक बार मिलने का मौका मिल जाये. और खुदा की इनायत देखिए, उसने इस फैन को रफी साहब की बहू बना दिया. बहू बनने के बाद वे रफी साहब से एक रिश्ते में जरूर बंधीं, लेकिन उनका दिल हमेशा एक फैन वाला ही रहा. यही वजह रही कि परिवार की सदस्य होने के नाते उन्होंने रफी साहब के प्रशंसकों को उनकी व्यक्तिगत जिंदगी से भी किताब के माध्यम से रूबरू कराने की जिम्मेवारी उठायी.
मोहम्मद रफी की जिंदगी पर लिखी यासमीन की किताब ‘मोहम्मद रफी : हमारे अब्बा-कुछ यादें’ का विमोचन हाल ही में हुआ. रफी साहब की जिंदगी के कुछ खास पहलुओं से उन्होंने अनुप्रिया अनंत को अवगत कराया. यासमीन मानती हैं कि यह किताब उनकी तरफ से उनके पिता समान ससुर को एक खास भेंट है.
मोहम्मद रफी साहब हमेशा मेरे दिल के करीब रहेंगे. मुझे याद है जब मैं उनसे पहली बार मिला था, उन्होंने कितनी गरमजोशी से मुझसे हाथ मिलाते हुए कहा था कि आदाब मैं मोहम्मद रफी हूं. मुझे इतनी खुशी मिली थी कि वे खुद कितनी बड़ी शख्सीयत हैं. उन्हें कौन नहीं जानता, लेकिन फिर भी उन्होंने अपना कुछ इस तरह से परिचय दिया था. यह जताता है कि कामयाबी हासिल करने के बावजूद उनके पैर जमीन पर थे.
रफी साहब जब मुझे पहली बार देखने आये थे, उन्होंने मुझसे एक गाना गवाया था. मैंने जब उनका ही एक गीत गाया, तो वे चौंक गये थे. बाद में उन्हें यह जानकारी मिली कि मैं उनके गानों की फैन हूं.
मोहम्मद रफी साहब हमेशा मेरे दिल के करीब रहेंगे. मुझे याद है जब मैं उनसे पहली बार मिला था, उन्होंने कितनी गरमजोशी से मुझसे हाथ मिलाते हुए कहा था कि आदाब मैं मोहम्मद रफी हूं. मुझे इतनी खुशी मिली थी कि वे खुद कितनी बड़ी शख्सीयत हैं. उन्हें कौन नहीं जानता, लेकिन फिर भी उन्होंने अपना कुछ इस तरह से परिचय दिया था. यह जताता है कि कामयाबी हासिल करने के बावजूद उनके पैर जमीन पर थे.
यासमीन खालिद रफी

bihar diwas


वासुदेव नारायण सिंह,एमडी व को फाउंडर अलकैम लेबरोटरीज आॅफ इंडिया

मैं मानता हूं कि बिहार का भविष्य बहुत उज्जवल है, क्योंकि बिहार में जो एक सबसे अच्छी बात हुई है वह यही हुई है कि बिहार को नीतिश कुमार जैसे लीडर मिले हैं. नीतिश कुमार की टीम बहुत अच्छा काम इसलिए कर पा रही है क्योंकि उन्होंने एक टीम बना ली है और टीम के तहत वह काम कर रहे हैं. उनकी टीम सकारात्मक सोच वाली टीम है. इसमें कोई संदेह नहीं कि बिहार को पूरे भारत में जो रुतबा दोबारा दिलाया है वह वर्तमान की सरकार ने ही दिलाया है. चूंकि उन्होंने सिर्फ बातें की नहीं, बल्कि काम करके भी दिखाया है. बिहार में अब इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर किसी  भी तरह की कोताही नहीं बरती जा रही है. पैसे खर्च किये जा रहे हैं तो काम भी हो रहा है. दूसरी तरफ मेरा मानना है कि शिक्षा के क्षेत्र में भी काफी विकास हुआ है. नये कॉलेज, वोकेशनल कोर्सेज भी अब शुरू हो रहा है. लेकिन सबसे अधिक अगर बिहार ने किसी चीज में तरक्की की है तो वह है एग्रीकल्चर में. मैं मान सकता हूं कि कृषि के लिहाज से बिहार का जो स्थान उसे पहले मिला था. अब फिर से उसे हासिल हो गया है. अब बिहार में हर तरह के कृषि को बढ़ावा मिल रहा है. फिर चाहे वह मखाना की खेती हो या फिर शूगरकेन की खेती. लिची की खेती में, आलू की खेती में सबसे में तेजी से वृद्धि हुई है. कृषि में तेजी से विकास हुआ है और वहां के किसानों को भी कई तरह के काम दिये जा रहे हैं सुविधाएं दी जा रही हैं. चूंकि मैं खुद एक किसान के परिवार से संबंध रखता हूं तो इस बात को अच्छी तरह समझ सकता हूं कि कृषि के विकास पर क्या क्या चीजें टिकी हैं. सो, मैं मानता हूं कि कृषि के विकास की वजह से बिहार की स्थिति बदली है. यही नहीं, बिहार के वर्तमान सड़कें भी कई बातें कह जाती हैं. अब मैं सड़क मार्ग से केवल 1 से डेढ़ घंटे में अपने घर पहुंच जाता हूं. क्योंकि सड़कों की अब मरम्मत हो गयी है. जहां पहले कच्ची और खराब सड़कें थीं. अब वहां बेहतरीन सड़के बन गयी हैं. चूंकि मैं खुद फार्मा व स्वास्थ्य संबंधी क्षेत्र से जुड़ा हूं तो मैं यह जानता हूं और देख रहा हूं कि इस क्षेत्र में भी पहले की अपेक्षा काम हुए हैं. अस्पताल खुले हैं. गांवों में भी पहले से चीजें अब बदली हैं. स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी बिहार को बेहतरीन राज्य माना जा रहा है. बिहार की एक और खासियत भी रही है कि यहां के लोग पूरे भारत ही नहीं पूरे विश्व में अपने दम पर एक पहचान हासिल करते हैं. वे अपनी कुशलता का परिचय हमेशा देते रहते हैं. यह हमारे संस्कार में ही है. हां,बस एक बात जो और मैं कहना चाहंूगा कि अगर बिहार के विकास को हम स्थाई रूप से बरकरार रखना चाहते हैं तो यह बहूत जरूरी है कि हमारे यहां के जो पॉलिटिकल लीडर हैं वे भी थोड़ा प्रोफेशनल तरीके से काम करें. वहां इस मामले में थोड़ी लचरता है. जबकि लोग योग्य हैं. लेकिन प्रोफेशनल नहीं हो पाते.  एक जो और महत्वपूर्ण बात मैं कहना चाहूंगा कि प्राय: हमसे भी यह शिकायत होती है कि हम अपने राज्य में जाकर क्यों नहीं इंडस्ट्री की शुरुआत करते. तो, मैं कहना चाहूंगा कि ऐसा कौन नहीं चाहता. लेकिन बिहार में हमें वह सारी चीजें मिलनी चाहिए, जिससे हम अपना काम आराम से कर सकें. मैं स्पेशल पैकेज सिस्टम की बात कर रहा हूं. हालांकि बिहार सरकार इसके लिए काफी दिनों से तत्पर है. जिस तरह उत्तर पूर्वी राज्यों, हिमाचल के राज्यों को यह स्पेशल पैकेज मिला है तो वहां इंडस्ट्री की पहुंच हो रही है.  अगर कुछ ऐसा ही स्पेशल पैकेज बिहार को मिले तो हमें खुशी होगी कि हम वहां के लिए कुछ कर पायेंगे. लेकिन यह सब तभी संभव है, जब वहां से भी हमें सपोर्ट मिले. बिहार के युवा एंटरप्रेनर बनें, छोटे छोटे ही सही लेकिन उद्योग लगाने की पहल करें. तो निश्चित तौर पर बिहार की तरक्की होगी. एक बात तो तय है कि बिहार के लोग काफी मेहनती होते हैं और इसलिए वे हर जगह अपनी पहचान स्थापित कर लेते हैं तो जरूरत है कि हम ऐसे युवा, ऐसी ऊर्जा को बिहार की तरक्की के लिए सकारात्मक रूप से इस्तेमाल करें. जिस तरह हम अपनी कंपनी अलकैम में बिहार के कई लोगों को रोजगार देते हैं. वैसे ही जरूरी है कि भारत के कई इलाकों में जहां भी जो लोग समर्थ हैं. उन्हें अपने राज्य के लोगों को रोजगार के अवसर देने ही चाहिए.
परिचय :
बिहार से संबंध रखनेवाले वासुदेव नारायण सिंह अपने बड़े भाई संपदा सिंह के साथ 1973 में बिहार से मुंबई आये. उस वक्त वासुदेव नारायण यह नहीं जानते थे कि उन्हें वाकई इतनी बड़ी कामयाबी मिलेगी. लेकिन भाई संपदा सिंह व कुछ लोगों के टीम की तरह काम करने की वजह से संपदा सिंह व वासुदेव नारायण की कंपनी अलकैम( दवाई की कंपनी) भारत की नहीं, बल्कि  विश्व स्तर पर ब्रांड बनी. दोनों भाईयों ने हमेशा अच्छे विजन के साथ दवाईयों का निर्माण शुरू किया. उन्होंने अपनी कंपनी में अच्छे तरह की मशीनें लगायीं. और फिर काम शुरू किया. कभी भी क्वालिटी से कोई कांप्रमाइज नहीं किया. तभी उन्हें यह कामयाबी मिली.  वर्तमान में बासुदेव नारायण सिंह इंडियन ड्रग मैन्युफैक्चर एसोशियेशन के अध्यक्ष भी हैं. वे अलकैम की तरक्की की खास वजह संपदा सिंह की सोच के साथ खुद की सकरात्मक सोच व अलकैम के लोगों को आम लोग न मान कर टीम की तरह मानना ही अपनी कंपनी की यूएसपी मानते हैं. वे अपने यहां काम कर रहे लोगों को अलकैम परिवार का हिस्सा मानते हैं. अलकैम भारत की टॉप 7 फार्माशेटिकल कंपनियों में से एक है.
डॉ पीएन सिंह, समाज सेवी, एंटरप्रेनर,  ग्रेड इंडिया, लीडर्स आॅफ टूमॉरो
मैं यह मानता हूं बिहार ने कई लीडर्स दिये हैं और बिहार ने जैसे लीडर्स दिये हैं वैसे दुनिया में रहीं नहीं होंगे. फिलवक्त भी बिहार को जो लीड कर रहे हैं. वह सर्वश्रेष्ठ लीडर में से एक हैं. चूंकि उन्होंने बिहार में जो सबसे अहम चीज की है. वह यह है कि बिहार का स्वरूप बदला है और अब हम बिहार में बेफिक्र होकर अपनी बेटियों को आजादी से जाने दे सकते हैं. चूंकि वर्तमान सरकार ने लॉ एंड आॅर्डर को पूरी तरह दुरुस्त कर दिया है. बिहार आज से कुछ सालों पहले क्या था और अब क्या है. इसका सीधा प्रमाण आप खुद बिहार जाकर देख सकते हैं. हाल ही में मेरी बेटी हमारे ही संस्था के एक कार्यक्रम में वहां शिरकत करने अकेली गयी. मेरी तबियत ठीक नहीं थी, इसलिए. तो मैंने अपनी बेटी को सिर्फ इसलिए भेजा, क्योंकि अब वहां स्थिति बदल चुकी है. अब वहां लॉ एंड आॅर्डर के दुरुस्त होने से अब वहां लड़कियां भी सुरक्षित हैं. यह खुशी की बात है और आशा की किरण है. लेकिन एक बात जो मुझे अखड़ती है वह यही है कि पहले बिहार में जो पढ़ाई का आधार था. जो स्टैंडर्ड था. अब वह नहीं रहा. पहले बिहार में सबसे पहले लोग पढ़ाई को ही अहमियत देते थे. मुझे याद है अमेरिका ने एनपी सिंह जो कि पटना के बेहतरीन लीडर हुआ करते थे. उनके बारे में कहा था कि वह बेस्ट लीडर हैं. यह सब पढ़ाई के बल पर ही था. लेकिन अब वह खत्म हो गया है और जाहिर सी बात है कि जहां पढ़ाई दुरुस्त नहीं होगी. वहां करप् शन और राजनीति में तो कमियां आयेंगी. दूसरी बात जो मैं कहना चाहंूगा वह यह है कि बिहार के विकास को बिहार के गांव के विकास से देखिए. अभी कुछ दिनों पहले गुजरात गया था. संस्था के काम से. वहां के गांव कई गुना विकास कर चुके हैं. वहां के लोग घूस नामात्र लेते हैं और वहां विकास हो रहा है. जबकि बिहार में मैं जहां रहता हूं छपरा से कुछ दूरी पर स्थित है गंजपर. वहां आज भी बिजली, सड़क नहीं है और तो और रहने के लिए घर नहीं है. मैंने अपनी संस्था से लगभग 51 पक्के घर बनवाये हैं. वहां. मेरा मानना है कि बिहार को आगे ले जाने की अगर सोच रखते हैं तो सबकुछ सरकार पर मत सौंपिये. सरकार पर तो और भी कई जिम्मेदारियां हैं. आपको खुद रुचि दिखानी होगी. एक बात मैंने गौर की है कि बिहार के लोग बिहार में रह कर बातें ज्यादा करते हैं और बिहार से बाहर आकर वही लोग खूब काम करते हैं. ऐसा क्यों? वहां भी रह कर बातें बनाने की बजाय काम करते रहना चाहिए न. मेरा मानना है कि आज के दौर में बिहार को कई अच्छे एंटरप्रेनर की जरूरत है. बिहार में अब भी लोग या तो आइपीएस या मेडिकल या ब्यूरोकेसी जैसे अवसर ही तलाशते हैं. जबकि जरूरत है कि वहां पढ़े लिखे लोग मिल कर छोटे ही सही नये उद्योगों की शुरुआत करें. जरूरी नहीं कि सभी आइएस ही बन जाये.  वहां के गांव के लिए कुछ किया जाये. और यह कोई बाहर वाला नहीं करेगा. बिहार के लोगों को ही करना होगा. जो भी बिहार से बाहर आते हैं. बिहार को भूल जाते हैं, जबकि जरूरत है कि बिहार के लिए छोटे छोटे ही सही लेकिन प्रयास हो. हर कोई व्यक्तिगत रूप से मदद करे. संभव हो तो अपने घर के आसपास के गरीबों की मदद करें. जरूरत पड़ने पर उन्हें किताबें दे दें. पढ़ाएं. उद्योगों में उन्हें काम करने के मौके दें. तभी हम पूर्णरूप से बिहार के विकास की बात कर सकते हैं. वरना, बिहार का जो भविष्य है. वह ग्रोथ मुझे सस्टेन करता हुआ नहीं दिखता. मैं मानता हूं कि वर्तमान की स्थिति बहुत अच्छी है. लेकिन स्थिति को बनाये रखने के लिए जरूरी है कि काफी काम किया जाये.
जरूरी यह भी है कि केवल सतही स्तर पर बिहार के विकास या कमियों का आंकलन न करें. तभी हम डेवलपमेंट की बात कह सकते हैं. बिहार से करप्शन भी पूरी तरह तभी हटेगा. जब वहां शिक्षा को महत्व दिया जायेगा. सो, जरूरी है कि वहां के स्कूलों पर, कॉलेज पर खास ध्यान दिया जाये और लोगों के विकास की बातें हों. लोग खुद जुझारू हों और खुद काम करें. बिहार के लोग उद्यमी होते हैं. मेहनती हैं. वे जहां भी जाते हैं आसानी से रह लेते हैं और यही वजह है कि वह काफी मेहनत करके अपना नाम बनाते हैं तो यह जागरूकता व जुझारूपन हमेशा बरकरार रहे. तभी हम बेहतर बिहार की कामना कर सकते हैं. बिहार से बाहर काम करें लेकिन बिहार को भी भूलें नहीं. अपनी मिट्टी को न भूलेें. जिस क्षेत्र में भी उसे बढ़ावा दे सकते हैं. वह दिया जाना चाहिए. उच्चस्तरीय शिक्षा की भी जरूरत है. लेकिन इसके हमें खुद को जागरूक रखना होगा.
परिचय : डॉ पी एन सिंह बिहार के एक छोटे से इलाके गंज के रहनेवाले हैं. उन्होंने प्राथमिक शिक्षा गांव में रह कर ही पूरी की. शायद यही वजह है कि वे हमेशा गांव से जुड़े रहे और वहां की मिट्टी उन्हें  हमेशा अपनी ओर खींचती रही.  उन्होंने पढ़ाई तो पेट्रोलियम इंजीनियरिंग कॉलेज से पूरी की. फिर नौकरी करने लगे. लेकिन 11 साल  इंडियन आॅयल कॉरपोरेशन में काम करने के बाद एमबीए  की पढ़ाई के लिए मनीला चले गये. बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ कर एंटरप्रेनर की तरह एक संस्था की शुरुआत की. जिसका नाम जननी जन्मभूमि व कर्मभूमि रखा. इस ट्रस्ट के तहत वे गरीबों को शिक्षा, लाइब्रेरी रिसोर्स, ह्वाटर कंजरवेशन, वोकेशनल ट्रेनिंग, व गरीबों के आवास के लिए काम करता है. फिलवक्त डॉ पीएन सिंह मुंबई के ग्रीड कंसलटेंट के चेयरमैन हैं. साथ ही उन्होंने अब तक लगभग 22 किताबें लिखी हैं. उन्होंने आदित्य बिड़ला, मैनेजमेंट स्कूल आॅफ श्रीलंका जैसे स्थानों के साथ भी काम किया है.
एनबी पांडे, को फाउंडर व निर्देशक, पेंटागन मरीन
पहले जब मैं अपने घर जाता था. उस वक्त मुझे काफी सुरक्षा के साथ जाना होता था, क्योंकि पटना उतना सुरक्षित नहीं था. मुझे आइजी को बोल कर जाना होता था. लेकिन अब वहां के लॉ और आॅर्डर के सुधर जाने से काफी कुछ बदला है. लोग बेखौफ होकर कहीं भी आने जाने को तैयार होते हैं. वहां की सड़कें ऐसी हो गयी हैं कि सड़क मार्ग से कहीं भी आया जाया जा सकता है. बिहार में भी अब कई तरह के कॉलेज की शुरुआत हो रही है. कई गर्वमेंट कॉलेज की दशा बदली है. अब वहां की इंटरनल इकोनॉमी पर भी ध्यान दिया जा रहा है. हाल ही में बिहार ने राइस( चावल के उत्पादन में वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़ा है, अब वहां भी नाइट सर्विसेज शुरू हुए हैं. पहले जहां लगभग लोग बिहार से बाहर जदाते थे. अब वह भी वापस आकर बिहार में कुछ करना चाहते हैं.  प्रत्येक साल लगभग 12 हजार करोड़ रुपये जो लोग बाहर निवेश करके पढ़ाई करते थे. अब यहां कर करना चाहते हैं. हमें बिहार के भूतकाल को भूल जाना चाहिए. अब यहां के वर्तमान की राइजिंग के बारे में सोचा जाना चाहिए और यह हो रहा है. अच्छी बात यह है कि बिहार ने क्राइम से खुद को बहुत हद तक अलग किया है. अब लोग इज्जत से बिहार का नाम लेते हैं. धीरे धीरे यहां इंडस्ट्री की शुरुआत हो रही है. बिहार ने खुद को लगभग पोलियो मुक्त कर लिया है. इससे स्पष्ट है कि यहां की स्थिति बदली है. और स्वास्थ्य संबंधी कामों पर ध्यान दिया जा रहा है. अब लोग केवळ नौकरी नहीं कर रहे, वहां के लाइफस्टाइल में भी बदलाव आया है और लोग अब मेट्रो की तरह खुद को अपडेट रखते हैं. किसी भी राज्य का आइटीआइ उस राज्य का बैकबोन होता है तो वह भी सुधर रहा है. दरअसल बिहार को फिलहाल एंटरप्रेनर की जरूरत है. जो कि खुद सोचें और बिहार के विकास के लिए वहां आकर कुछ करे. तभी माइग्रेशन कम होगा. क्योंकि माइग्रेशन भी बिहार की बड़ी समस्या है. वहां रोजगार उपलब्ध नहीं तो लोग वहां से बाहर चले जाते हैं. इसलिए बहुत जरूरी है कि यहां पलायन रोकने की रोजगार के माध्यम जेनरेट किये जायें.बिहार को लेकर जो लोगों में गलत अवधारणा है. वह इसी तरह बदलेगी. जब धीरे धीरे पूरा भारत खुद अपनी आंखों से इसकी तरक्की होते हुए देखेगा. इसके लिए जरूरत है कि सरकार के साथ साथ हम खुद भी इसके बारे में सोचे. एंटरप्रेनरशीप को बढ़ावा दें. वैसी सुविधाएं दें. नयी युवा पीढ़ियों को. लोगों को काम दें. ज्यादा से ज्यादा. साथ ही लॉ एंड आॅर्डर का रिस्पेक्ट करें. तभी हम आगे बढ़ पायेंगे और बिहार तरक्की कर पायेगा.

परिचय : बिहार के रहनेवाले एनबी पांडे वर्तमान में पेंटागान मरीन सर्विसेज के फोर्ट डायरेक्टर हैं व फाउंडर हैं.  पैंटागन मरीन सर्विसेज की शुरुआत 2004 में हुई थी और फिलवक्त शिपिंग व अलायड एक्टिविज में यह एक जानी मानी संस्था है. उन्होंने सिसको, मॉटे कार्लो जैसी कंपनियों में भी काम किया है.

ँपदमश्री ब्रह्मदेव राम पंडित
मेरा मानना है कि बिहार की प्रगति को केवल शहर की प्रगति या सिर्फ पटना की प्रगति के आधार पर न आंका जाये. जरूरत है कि बिहार के गांव तक लोग जायें और वहां जाकर भी वहां के लोगों की सुने. आज भी बिहार में जहां सड़क बिजली पानी नहीं है. वहां लोगों को यह मुहैया कराया जाना चाहिए. मेरा मानना है किग्राम उद्योग कला से गांवों का काफी विकास हो सकता है और बिहार जैसे गांवों का तो खास तौर पर, क्योंकि यह बहुत जरूरी है कि अपनी कला को भी हम संजोयें और इसके लिए वहां के कलाकारों को भी बढ़ावा दे. बिहार का इतिहास काफी समृद्ध रहा है. सो, हमें उन्हें संजोना होगा. कला को भी महत्वपूर्ण दर्जा देना होगा. जैसे मैं खुद पोटरी के काम में हूं. और मैं बिहरा से बाहर यह काम कर रहा हूं और मुझे यह सम्मान मिल रहा है. जरूरत है कि वहां रह कर वहां के जो लोग इस काम में पारंगत हैं. उन्हें महत्व दिया जाये और उनको प्रोत्साहन मिले. वहां कई ट्रेनिंग प्रोगाम  भी हों, ताकि ऐसी चीजों को बढ़ावा मिले. वहां ग्रामोउद्योग शुरू हो. गृह उद्योग शुरू हो. क्योंकि वहां के लोगों में लगन की कमी नहीं है. वहां के लोगों को बस मार्गदर्शन चाहिए,बिहार के गांवों पर भी सरकार ध्यान दे तो बिहार विकासशील कहलायेगा

परिचय : बिहार के आम कुम्हार परिवार से संबंध रखनेवाले पंडित ब्रह्मदेव ने अपनी मेहनत व लगन से अपनी कला से पूरे भारत में अपनी पहचान बनायी. ेपंडित ब्रह्मदेव मिट्टी के बर्तन बनाने की कला में अंतरराष्टÑीय स्तर की पहचान बना चुके हैं.  इन्होंने, आम तौर पर मिट्टी से बर्तन बनाने की कला को धीरे धीरे अपने हुनर से स्टूडियो में इस्तेमाल किये जाने वाले डिजाइनर बर्तनों की मेकिंग तक का सफर तय किया है आगामी 6 अप्रेल को उन्हें राष्टÑपति के हाथों पदमश्री का सम्मान हासिल होगा.

विकास वर्मा, सीइओ, जी-7 सेक्योरिटीज
 मैं अपने पुराने बिहार को भी बेहतरीन मानता हूं और आज के बिहार को भी बेहतरीन मानता हूं. चूंकि उस वक्त का जो बिहार था. वह भी काफी खूबसूरत था. उस वक्त के लोग काफी मासूम थे. अब बिहार में टीवी, कंप्यूटर, तकनीक सभी चीजों को बढ़ावा मिला है.  बिहार भारत की सोने की चिड़िया है. वहां जो प्रतिभाएं हैं, वहां के लोगों के पास जो सोच है. जो लगन है. वह हर क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने की दम रखते हैं. वे सक्षम हैं. इसलिए अब धीरे धीरे जिस बिहार से कई जीनियस बाहर चले जाते थे. अमेरिका चले जाते थे. लंदन चले जाते थे. अब एक बार फिर से वह बिहार लौटना चाहते हैं.  अब बिहार के बढ़ने के वे सारे आसार नजर आने लगे हैं. चूंकि बिहार के यंग जेनरेशन के हाथों में बिहार की डोर आ गयी है और अगर पूरी तरह नहीं आयी है तो भी जरूरत है कि हम बिहार के होनहार लोगों को मौके दें. वहां ज्यादा से ज्यादा रोजगार के माध्यम  तैयार किये जायें. बिजली की समस्या आज भी बिहार की बड़ी समस्या है. गांव गांव तक बिजली पहुंचायी जाये. मेरा मानना है कि अगर नयी युवा पीढ़ी को सही निर्देशन  मिले तो वह वहां काफी तरक्की करेगी. साथ ही यह भी जरूरी है कि हम अपने यहां के कल्चर को और बढ़ावा दें, उसकी इज्जत करें. अगर बिहार में नहीं हैं. कहीं बाहर भी हैं तो वहां की सारी पूजा, त्योहार मनाएं. तभी हम उज्जवल बिहार की सोच रख पायेंगे. जातिवाद के नाम पर हो रहे विवाद को खत्म करना जरूरी है. अपर कास्ट लोअर कास्ट सबको मिल कर काम करना होगा. बिहार में जो अच्छी चीजें हो रही हैं. उनमें यह भी एक बात है कि वहां की सड़कें सुधरी हैं. लोगों ने अब शिक्षा को अधिक महत्व देना शुरू किया है. वहां कंप्यूटर की लिटरेसी बढ़ी है.  सरकारी संस्था अब काफी मेंटन हो गये हैं. इससे बहुत फर्क पड़ा है. लोग अब सरकारी संस्थाओं पर भी विश्वास करने लगे हैं.  एग्रीकलचर के क्षेत्र में भी काम हो रहे हैं. जरूरत है कि सरकार  पशुपालन को महत्व दें. गृह उद्योग जो कि पूरी तरह से हमारे बिहार की सोच है. अब चीन ने इसे आजमा कर तरक्की कर ली है. जरूरत है कि बिहार में भी गृह उद्योगों की शुरुआत तो इससे लोगों को रोजगार मिलेगा. हालांकि इसके लिए साधन की जरूरत है. और बिजली जैसी चीजें जरूरत हैं. तो जरूरत है कि बिजली की स्थिति को दुरुस्त किया जाये. अब बिहार को किसी पंचवर्षीय और लंबी खींची जानी वाली योजनाओं की नहीं, आधुनिक योजनाओं की जरूरत है. बिहार के टूरिज्म को बढ़ावा मिलना चाहिए क्योंकि इससे बिहार में इकोनॉमी आयेगी. जो लोग बिहार छोड़ कर बाहर जाकर पढ़ाई कर रहे हैं. वे बिहार वापस आकर काम करें तो बिहार को अपना निवेश मिलेगा.  एअरपोर्ट भी बनने चाहिए. रेल रोज चाहिए. मोनो रेल है जैसे प्रोजेक्ट शुरू हो. और बिहार ये चीजें जरूर कर लेगा. चूंकि वहां आज भी लोग एक दूसरे की मदद करते हैं. महामारी हो या बाढ़ हो. लोग मदद करते हैं. बिहार की मासूमियत और लगन जिंदा रहे तो विकास होता रहेगा बिहार का.
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ारिचय : बिहार के पटना शहर के रहनेवाले विकास वर्मा ने कई वर्षों पहले मुंबई आकर सेक्योरिटी सर्विस की छोटी सी शुरुआत की थी. लेकिन अपनी मेहनत के दम पर उन्होंने जी-7 सेक्योरिटिज कंपनी को अंतरराष्टÑीय स्तर पर पहचान दिला दी. जी 7 वर्तमान में सेक्योरिटी गाडर््स, बॉडीगार्ड व तमाम सेक्योरिटी से जुड़े सर्विसेज में अपनी सेवाएं देता है. जी 7 के इतिहास में अंतरराष्टÑीय शख्सियतों के भी नाम हैं, जिन्हें इस कंपनी ने अपनी सेवाएं दी हैं, रिकी मार्टिन,स्टीवन सेगल, बिल क्लिंटन जैसे नाम प्रमुख हैं. अपनी ईमानदारी व बेखौफ काम के लिए ही जी सेवन विख्यात है.

सरवेश कुमार शाही, सीएमडी, एसकेएस लॉजिस्टिक लिमिटेड, शिपिंग व्यवसाय में जुड़े



मैं मानता हूं कि बिहार को अब पूरे हिंदुस्तान में इज्जत मिलने लगी है. वह बिहार के बदली छवि और तसवीर की वजह से ही है. अब बिहार को भी एक स्टेटस मिल चुका है. लेकिन मेरा मानना है कि अब भी बिहार में जो इंडस्ट्रीयल ग्रोथ होना चाहिए था, अब तक पूरी तरह नहीं हो पाया है. इसके लिए कुछ समाधान होने ही चाहिए. कई बार हमसे शिकायत होती है कि हम वहां काम नहीं करते. वहां के लिए कुछ नहीं करते. तो यह जरूरी है कि वहां इंडस्ट्री लग सके. इसके लिए जो वर्क प्रोविजन है वह बदलना होगा. ताकि अपने लोग बिहार में जाकर इंडस्ट्री लगा सकें. और वही रोजगार जेनेरेट कर सकें. 40 साल पहले जब मैं बिहार में थे. वहां पर कई इलाकों को इंडस्ट्रीयल बेल्ट घोषित किया गया था. लेकिन आज वह स्थिति नहीं है. अगर वैसा होगा, तो कई लोग वहां निवेश करेंगे. देश विदेश की कंपनियां आयेंगी  और वहां निवेश होने से वही की तरक्की होगी. वहां रोजगार के अवसर बढ़ेंगे. हालांकि मुझे इस बात की खुशी है कि अब हमें वहां सड़कों के लिए बहुत रोना नहीं पड़ता. वहां कई इलाकों में अच्छी सड़कें बन गयी हैं.  और शिक्षा के क्षेत्र में ऊी काफी काम हो रहा है. वहां के टेक्नीकल इंस्टीटयूट की शुुरुआत की जा रही है. सरकार की यह उपलब्धि है कि अब पहले के मुकाबले क्राइम में बिहार का नाम नहीं लिया जाता है. हां, लेकिन कुछ क्षेत्र में जहां अब भी बिहार से पलायन हो रहा है, उसकी खास वजह यही है कि वहां रोजगार के माध्यम जेनरेट नहीं हो पा रहे. लोग वहां रह कर अपनी तरक्की के बारे में नहीं सोच पाते, इसलिए वहां से बाहर आते हैं. तो यह जरूरी है कि वहां की शिक्षा को और दुरुस्त बनाया जाये. एजुकेशन के क्षेत्र में तरक्की हो. खासतौर से प्राइमरी एजुकेशन के क्षेत्र में.  लेकिन प्रशासनीय स्तर पर बिहार ने खूब तरक्की की है. लेकिन यह बात भी हमें माननी होगी कि बिहार के विकास के भी कुछ सीमाएं हैं. जैसे जापान के हैं. हमें खुद को चीन की तरह विकास करने की सोच रखनी होगी. हालांकि  एनटीपीसी बाढ़ पीड़ित इलाकों में जो काम कर रहा है. वह काफी अच्छा है. साथ ही इससे सरप्लस पॉवर तो बढ़ेगा ही. लेकिन लांग टर्म ग्रोथ के लिए अभी और भी कई कार्य करने बाकी हैं. लेकिन मैं अपनी तरफ से बधाई देना चाहूंगा बिहार सरकार कि उसने धीरे धीरे ही सही जो विकास के जो कदम उठाये हैं. वह उल्लेखनीय हैं. बस जरूरत है कि उसे बरकरार रखा जाये. तो बेहतर बिहार की परिकल्पना की जा सकती है.
परिचय : एस के शाही बिहार के मुजफ्फरपुर के शाहीमुनापुर गंव से हैं. शुरुआत दिनों में उन्होंने बांबे सेल के साथ काम किया. लेकिन बाद में उन्हें लगा कि उन्हें खुद का कोई व्यवसाय शुरू करना चाहिए. सो, उन्होंने शीपिंग बिजनेस की शुरुआत की. वर्तमान में उनकी कंपनी में बिहार के ही लगभग 5000 हजार लोग काम करते हैं. एस के शाही की यह कंपनी लगभग 20 सालों से सक्रिय है व इंटरनेशनल व कोस्टल शिपिंग में जाना माना बन चुकी हैं. एसके शाही को अपने योगदान के लिए कई पुरस्कारों से भी नवाजा जा चुका है.

फिल्म रिव्यू : जॉली एलएलबी




कलाकार : अरशद वारसी, बोमेन ईरानी, अमृता राव, सौरभ शुक्ला
निर्देशक : सुभाष कपूर
रेटिंग : 4 स्टार
सुभाष कपूर ने जॉलीएलएल बी से पहले फिल्म फंस गये रे ओबामा का निर्देशन किया था. फंस गये रे ओबामा ही बेहतरीन व्यंगात्मक फिल्म है. प्राय: निर्देशक पहली कामयाबी के बाद भटक जाता है. लेकिन पहली कामयाबी के बाद आयी दूसरी फिल्म में अगर वह खुद को साबित कर देता है और कहीं भी भटकाव नजर न आये तो आप मान लें कि निर्देशक में वह बात है. शायद यही वजह है कि सुभाष कपूर को ही विधु विनोद चोपड़ा की पसंदीदा मुन्नाभाई सीरिज निर्देशित करने का मौका मिल रहा है. सुभाष ने जॉली एल एलबी से साबित कर दिया है कि उनकी कहानी ही हीरो है और उन्हें अपनी कहानियों को कहने के लिए किसी भी बड़े स्टार्स की जरूरत नहीं, बल्कि हो सकता है कि भविष्य में उनकी फिल्मों के कलाकार स्टार्स बन जायें. सुभाष कपूर ने इंडियन ज्यूडीशरी को लेकर एक बेहतरीन कहानी कही है जॉली एलएलबी के माध्यम से. हो सकता है कि आपको जॉली एल एल बी के प्रोमोज लुभावने न लगे और यह भी हो सकता है कि आपको ऐसा लगा कि शायद फिल्म में अरशद व बोमन हैं तो यह आम हास्यपद फिल्मों से एक होगी. अगर आप ऐसा सोचेंगे तो यह आपकी भूल होगी. क्योंकि जॉली हर मायने से खरी उतरती है. सुभाष कपूर ने फिल्म में जिस बारीकी से पूरे सिस्टम को दर्शाया है. खासतौर से भारतीय न्यायालय की खूबियों और कमियों को सामने दर्शाया है. वह उल्लेखनीय है. फिल्म की कहानी की चर्चा होने के बजाय बेहतर हो कि आप खुद यह फिल्म देखें. सुभाष कपूर ने आम आदमी के जीवन की भावनाओं को जोड़ते हुए एक अच्छी कहानी कहने की कोशिश की है. अरशद वारसी के रूप में एक स्टार लॉयर बनने का ख्वाब और फिर धीरे धीरे सच्चाई का सामना करनेवाले इस लॉयर के राह में आनेवाले रोड़े को मेरठ की भाषा के माध्यम से दर्शकों तक सार्थक रूप से पहुंचाया गया है. एक स्टार लॉयर पैसे और शोहरत के लिए किस हद तक जा सकता है. इसका स्पष्ट उदाहरण एडवोकेट राजपाल के रूप में दर्शाया गया है. किस तरह भारतीय न्यायलय में केस पर तारीख पर तारीख देकर कई मुद्दे पेंडिंग कर दिये जाते हैं, कैसे पैसे के दम पर और वकील की वजह से मुजरिम बाहर और गुनहगार अंदर चला जाता है. यह सारी गुत्थियां बखूबी दर्शकों के सामने आयेंगी. कानून अंधा होता है. जज नहीं जज की भूमिका निभा रहे सौरभ शुक्ला इस एक संवाद में न्यायलय के हालात को पूरी तरह दर्शा जाते हैं. इश्किया, मुन्नाभाई के बाद अरशद की यह अब तक का सबसे बेहतरीन किरदार है. बोमन ईरानी ने भी उम्दा अभिनय किया है. अमृता राव के पास विशेष कुछ खास करने के मौके नहीं ेथे. सौरभ शुक्ला जज के रूप में जंचे हैं. आनेवाले सालों में सुभाष कपूर हिंदी सिनेमा के शीर्ष व समझपरक, वैचारिक निर्देशकों में से एक होंगे. और एक बात अमूमन फिल्मों के द एंड पर दर्शकों की तालियां नहीं बजती. लेकिन यह फिल्म तालियों की हकदार होगी. कहानी के साथ पूरी तरह से न्याय करती है यह फिल्म. जरूर देखें.


तिग्मांशु धूलिया




मुझे खुशी है कि पान सिंह तोमर जैसी फिल्म को राष्टÑीय पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है. यह मैं इसलिए नहीं कह रहा क्योंकि यह मेरी फिल्म है. लेकिन खुशी इसलिए है, क्योंकि ऐसी बायोपिक फिल्मों को अब राष्टÑीय सम्मान का दर्जा दिया जा रहा है. हिंदी फिल्मों में इन दिनों बायोपिक का जो दौर शुरू हुआ है, वह एक बेहतरीन और सार्थक कदम है. दरअसल, हिंदी सिनेमा को बायोपिक फिल्मों की जरूरत है. पान सिंह तोमर के बाद राकेश ओम प्रकाश मेहरा की फिल्म भाग मिल्खा भाग भी एक सार्थक फिल्म होगी. चूंकि बायोपिक फिल्मों की वजह से कई चीजें सामने आती हंै. हम ऐसे कई शख्सियत के बारे में जान पाते हैं, जिन्हें हम जानते भी नहीं. जिस वक्त मैंने तय किया था कि पान सिंह तोमर पर फिल्म बनाऊंगा. उस वक्त मुझे पान सिंह के बारे में बस छोटी सी खबर मिली थी कि कैसे कोई धावक एक डाकू बन जाता है. परिस्थिति से हार कर. ऐसे में मुझे जरूरत थी कि मैं इसका रिसर्च करूं. लेकिन पान सिंह के बारे में कोई भी खबर नहीं थी. न अखबार, न इंटरनेट . ऐसे में मेरी टीम ने और मैंने खुद ने रिसर्च किया. वहां गांव जाकर लोगों से मिला. मैं मानता हूं कि किसी भी बायोपिक फिल्म के लिए उसका रिसर्च बहुत खास होना चाहिए. रिसर्च दुरुस्त हो , तभी अच्छी फिल्में बन पाती हैं. हॉलीवुड में बायोपिक फिल्में बनती रहती हैं. लेकिन हमारे यहां गिने चुने लोगों पर ही बायोपिक फिल्में बनती हैं. ज्यादातर जो विषय हैं या शख्सियत हैं वे स्वतंत्रता सेनानी ही होते हैं. जबकि मैं मानता हूं कि हमारे आस पास, गांव मोहल्ले में ऐसी कहानियां हैं. जिन पर फिल्में बननी चाहिए. ऐसे लोग हैं, जो कभी सामने नहीं आये हैं. लेकिन बड़े कारनामें किये हैं. उनके नाम सामने आने चाहिए. उन पर फिल्में बननी चाहिए. द डर्टी पिक्चर्स्र को मैं एक बेहतरीन कोशिश मानता हूं कि हम सिल्क स्मिथा के कई पहलुओं से रूबरू हो पाये. मैं बेगम समरु पर फिल्म बनाने जा रहा हूं. यह मेरठ की एक नौटंकी करनेवाली महिला थीं और कैसे वह बेगम बनी. इस पर पूरी कहानी है. लेकिन मैं इस पर यूं ही फिल्म नहीं बनाऊंगा. मैं इसके रिसर्च पर पूरा वक्त दूंगा. हिंदी सिनेमा की यह भी त्रासदी है कि हमारे पास वैसे कलाकार नहीं मिल पाते. जो कि बायोपिक फिल्मों में फिट बैठें. गिने चुने कलाकार हैं. खुद मैं बेगम समरु को लेकर सोच रहा हूं कि किसे लिया जाये. संजय लीला भंसाली ने मैरी कॉम पर फिल्म बनाने का निर्णय लिया है. यह भी एक बेहतरीन सोच है. चूंकि ऐसी हस्तियों को हमें फिल्मों के जरिये सामने लाना ही होगा. आखिर एक फिल्म एक महत्वपूर्ण दस्तावेज होती है. इससे उस व्यक्ति के जीवन की पूरी कहानी सबकुछ का डॉक्यूमेंटेशन होता है और हिंदी फिल्मों में इसकी बहुत कमी है. एक दौर फिलवक्त अगर बायोपिक का चल रहा है तो यह अच्छा है. कम से कम इस बहाने हम कुछ शख्सियतों को तो संग्रह कर पायेंगे. उनकी चीजें, उनकी यादें, उनके योगदान को देख पायेंगे. अनुराग बसु भी किशोर दा की जिंदगी पर फिल्म बनाने जा रहे हैं. यह अच्छी शुरुआत है. मुझे नहीं लगता कि केवल पॉलिटिकल या स्पोर्ट्स या स्वतंत्रता सेनानी पर ही बायोपिक फिल्में बन सकती हैं. वे सारे शख्सियत जो हमारे आसपास हैं. उन पर फिल्में बननी चाहिए. हम जब हॉलीवुड में देखते हैं कि किसी पॉलिटिकल लीडर पर फिल्में बन रही हैं तो हम काफी खुश होते हैं. और उसकी प्रशंसा भी करते हैं. और सोचते हैं कि ऐसी फिल्में भारत में बने. लेकिन सच्चाई यह है कि हम जिस तरह के राजनीतिक ढांचे में जकड़े हैं. हम कई चीजें छुपाने की कोशिश करते हैं. हमारी कोशिश किसी बात को दर्शकों तक पूरी तरह से सच्चाई बयां करने की नहीं होती. बल्कि हम पॉलिटिकली करेक्ट होने की सोचते हैं. हाल ही में स्पीलबर्ग आये थे. उन्होंने ईमानदारी से अपनी जिंदगी व फिल्मों की कमियां भी बतायीं. लेकिन हमारे भारत में तो यह हिम्मत हम में नहीं. हम बिल्कुल सच सच दर्शक के सामने नहीं ला पाते. ऐसे में एक ईमानदार फिल्म नहीं बन सकती. बायोपिक कभी भी बायस्ड नहीं होना चाहिए. बायोपिक ऐसा होगा कि उस व्यक्ति की वास्तविक शख्सियत को सामने ला पाये. लेकिन भारत में ऐसा कर पाना बहुत कठिन होता है. यहां अगर फिल्में बनने लगती है तो लोग बुरा मानते हैं, क्योंकि कई छुपी गुत्थियां सामने आ जाती हैं. जो लोग पसंद नहीं करते. दूसरी बात बायोपिक फिल्मों में सटीक किरदारों व कलाकारों की भी. चूंकि बायोपिक में पूरी तरह एक व्यक्ति के कंधों पर कहानी टिकी होती है. और ऐसे में किसी किरदार का उस व्यक्तित्व से मेल खाना बहुत जरूरी है. प्राय: हिंदी फिल्मों में बायोपिक फिल्मों में केवल लुक पर ध्यान दिया जाता है. लेकिन हकीकत यह है कि बायोपिक फिल्मों में शख्सियत की रुह तक पहुंचना जरूरी है. अगर प्रियंका मैरी कॉम बन रही हैं तो लोगों को लगना चाहिए कि और कोई मैरी कॉम हो ही नहीं सकता. मैरी कॉम की जिंदगी को वे लोग भी प्रियंका की नजर से देखें जिन्होंने कभी मैरी कॉम को नहीं देखा. जिस तरह इरफान ने पान सिंह तोमर की भूमिका निभायी.लोगों ने पान सिंह को नहीं देखा. लेकिन इरफान के जरिये लोगों ने अनुमान लगा लिया कि पान सिंह ऐसे ही होंगे. हमारे स्वतंत्रता सेनानियों पर बनी फिल्मों के माध्यम से ही हमने गांधी, नेहरू को जाना और आगे भी जानते रहेंगे. क्योंकि दर्शक इन फिल्मों से ही उन व्यक्तित्व के साथ जीते हैं. हिंदी सिनेमा ने अगर बायोपिक फिल्मों की जरूरत को समझना शुरू किया है तो यह एक अच्छी शुरुआत है और इस बात का स्वागत किया जाना चाहिए, ताकि साल में कम से कम चार से पांच उल्लेखनीय फिल्में बनें और शख्सियतों का डॉक्यूमेंटेशन किया जा सके


इंडस्ट्री को और भी कई विद्या बालन की जरूरत है : शबाना आजिमी


हाल ही में सेंसर बोर्ड ने यह निर्देश जारी किया है कि अब किसी भी फिल्म में आयटम नंबर को दिखाने की अनुमति तभी दी जायेगी, जब फिल्मों की तरह उन्हें भी सर्टिफाइ किया जायेगा. हाल ही में इसकी शुरुआत फिल्म शूटआउट एट वडाला के बबली बदमाश गीत को ए सर्टिफिकेट दिया गया है और तय किया गया है कि इस गाने का प्रसारण फिल्म के सेटेलाइट टेलीविजन के दौरान नहीं किया जायेगा. मुंबई में आयोजित फिक्की फ्रेम्स कार्यक्रम में इसी मुद्दे को लेकर हिंदी सिने जगत की महत्वपूर्ण हस्तियों में बहस हुई.

 हिंदी फिल्मों व टेलीविजन में महिलाओं के इमेज को गलत तरीके से प्रस्तुत करने के मुद्दे को लेकर लगातार हिंदी सिने के कुछ सेलिब्रिटिज एक्सपर्ट के बीच बहस होती रही है. कई लोगों ने इस पर आवाज भी उठायी है. विशेष कर आयटम सांग के मुद्दे को लेकर व आयटम सांग में इस्तेमाल किये जा रहे शब्दों व महिलाओं को गलत तरीके से प्रस्तुत करने के मुद्दे पर भी बात होती रही है. इस मुद्दे पर हाल ही में मुंबई में आयोजित फिक्की फ्रेम्स कार्यक्रम में विशेष रूप से बातचीत हुई. बातचीत का अहम मुद्दा था: हिंदी सिनेमा में महिलाओं की उपस्थिति, महिलाओं का चित्रण व आयटम नंबर में महिलाओं का चित्रण. इस खास विषय पर चर्चा के लिए मुख्य रूप से शामिल हुईंंं जानी मानी अभिनेत्री शबाना आजिमी, निर्देशिका गुरविंदर चड्डा, टीवी पर्सनैलिटी वंदना मल्लिक, पत्रकार सोनाली सिंह व निर्देशक सुधीर मिश्रा

 चर्चा में कुछ विशेष प्रश्न जिन पर खुलकर बातचीत की गयी.
सवाल : क्या हिंदी सिनेमा व टीवी में महिलाओं की स्थिति पहले से बदली है या सुधरी है?
शबाना आजिमी :  मैं मानती हूं कि चीजें बदली हैं. लेकिन अब भी स्थिति पूरी तरह महिलाओं के पक्ष में नहीं हैं. अब भी जेंडर बायसनेस है और यह तब तक नहीं बदल सकती, जब तक खुद हिंदी सिनेमा इंडस्ट्री की महिलाएं खुद को कम तर आंकने से पीछे नहीं हटतीं. वर्तमान में जरूरत नहीं अभिनेत्रियों को कि वे सुपरस्टार के साथ किसी भी फिल्म में सेकेंडरी अभिनेत्री बन कर खुद को खुशनसीब मानें. और न ही इस बात की जरूरत है कि वे किसी भी तरह अपने मेहनताना में समझौता करे. खुद अभिनेत्रियों को अपनी आवाज बनना होगा. मेरा तो मानना है कि हिंदी सिने जगत के महत्वपूर्ण स्टार आमिर खान, शाहरुख खान और सलमान खान को यह पहल करनी चाहिए कि वे महिला प्रधान फिल्मों में काम करें. कभी अभिनेत्रियों की फिल्मों में वे सेकेंडरी किरदार निभायें, क्योंकि वे सुपरस्टार हैं. अगर वे ऐसा करेंगे तो बाकी के स्टार्स भी करेंगे और अभिनेत्रियों को पहचान मिलेगी. मैं विद्या बालन की फैन इसलिए हूं कि उन्होंने खुद को साबित किया. खुद को दर्शाया कि उन्हें पुरुष कलाकार या स्टार्स की जरूरत नहीं है. ऐसी विद्या बालन की इंडस्ट्री को और ज्यादा जरूरत है
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वंदना मलिक : मैं मानती हूं कि टेलीविजन की दुनिया में महिलाओं का स्वरूप बदला है. वे अब ज्यादा ताकतवर हुई हैं. वे बिना किसी हिचक के महत्वपूर्ण निर्णय लेती हैं और टेलीविजन आज भी महिला प्रधान ही है. हां, मगर जहां तक बात मेहनताना की है तो यह सच है कि सिर्फ फिल्मों में नहीं, टेलीविजन में भी अभिनेत्रियों को अभिनेताओं से कमतर आंक उन्हें कम मेहनताना दिया जाता है और साफतौर पर यही जेंडर बायसनेस नजर आता है.

गुरविंदर चड्डा : मैं जिस माहौल में पली बढ़ी हूं. वहां मैंने कभी जेंडर बायसनेस नहीं देखा है. लेकिन इसके बावजूद मैं मानती हूं कि ज्यादातर जगह जेंडर बायसनेस है. हमारी फिल्म इंडस्ट्री में अधिक है. आज भी यहां लोग मानते हैं कि महिलाएं बहुत उल्लेखनीय या बौद्धिक काम नहीं कर सकती. उन्हें खुद को बार बार प्रूफ करना पड़ता है. साथ ही मुझे इस बात से भी आपत्ति है कि क्यों माना जाता है कि महिला निर्देशिका सिर्फ महिला विषयों पर ही फिल्में बना सकती है. मैं जोया अख्तर जैसी निर्देशिकाओं की दाद दूंगी, जिन्होंने अपनी फिल्मों में महिलाओं की बेबसी नहीं दिखायी.

सुधीर मिश्रा : मैं तो इस बात के सख्त खिलाफ हूं कि महिला या पुरुष दो अलग अलग जाति के लोग हैं. मैंने शुरुआती दौर से ही दोनों को एक माना है. खुद मेरे परिवार में महत्वपूर्ण निर्णय मेरी मां लिया करती थी और मैं तो पुरुष निर्देशक होकर भी महिला केंद्रित फिल्मों को न सिर्फ अहमियत देता हूं, बल्कि मेरी अधिकतर दोस्त भी महिलाएं भी हैं तो मैं इस बात को नहीं मानता कि स्थिति बदली नहीं है. हां, लेकिन अब भी महिलाओं को खुद को साबित करने के लिए कई चीजों से गुजरना पड़ता है. वह अग्नि परीक्षा आज भी जारी है. जो कि सरासर गलत है.

सोनाली सिंह : मैं खुद एक पत्रकार हूं और प्राय: लोगों की ऐसी सोच होती है कि महिला है तो महिलाओं से जुड़े मुद्दे ही दिये जायें. जबकि मैं साफतौर पर मानती हूं कि क्या मैं महिला हूं तो मुझमें राजनीति की समझ नहीं होगी. या फिर मुझमें राजनीति से जुड़े मुद्दों की समझ नहीं. जबकि मैं भी हर तरह के मुद्दों पर अच्छी समझ रखती हूं.

सवाल : क्या आयटम नंबर पर जारी किये गये सेंसर बोर्ड के निर्देश उचित हैं?
शबाना आजिमी : मैं मानती हूं कि किसी चीज पर बैन करना किसी बात का सॉल्यूशन नहीं. मेरा मानना है कि वाकई आयटम नंबर में दिखाई जा रही चीजें आपत्तिजनक है. आप किसी गाने में ऐसी चीज दिखा रहे हैं, जिससे सीधे तौर पर एक महिला का मजाक उड़ाया जा रहा है. मैं बस यह कहना चाहती हूं कि किसी भी आयटम नंबर में इस्तेमाल किये जा रहे शब्दों पर सोचना जरूरी है. जिस तरह के मूव्स इन दिनों फिल्मों के गीतों में दिखाये जा रहे हैं. आप खुद सोचें कि उन गानों पर आपकी घर की ही बेटियां डांस करती हैं. और वह कहती हैं कि चिपकाले भईया सीने से और मैं हूं तंदूरी कबाब तो फिर इसका क्या असर होता होगा. मुझे आयटम नंबर से नहीं, उसके प्रस्तुतीकरण से प्रॉब्लम है. कट्रीना कैफ, करीना कपूर सभी ऐसी अभिनेत्रियां हैं जो आम लड़कियों की मॉडल हैं. वे जब उनसे यह सब सीखती हैं तो उन्हें लगता है कि इसमें कुछ भी गलत नहीं. बस मुझे इस बात पर आपत्ति है कि जिस तरह के कपड़े पहनाये जा रहे हैं और महिला को जिस तरह सेक्स सिंबल के रूप में दर्शाया जा रहा है. वह सरासर गलत है और मैं अपील करना चाहंूगी हिंदी सिनेमा के सुपरस्टार्स से कि वे अपनी फिल्मों में ऐसे गानों का इस्तेमाल न करें.

गुरविंदर चड्डा : हम भले ही यह मान कर बैठे हों कि हमारी फिल्में आयटम नंबर से चलती हैं. जबकि भारत के बाहर यह सोच है कि वे सारी फिल्में जिनमें आयटम नंबर है. वह अच्छी नहीं होती. हाल ही में मैंने अपने इंग्लैंड के कुछ दोस्तों को एक हिंदी फिल्म दिखायी. सबने उसकी जम कर तारीफ की और यह फिल्म थी विकी डोनर जो बिना किसी आयटम नंबर के थी. तो मैं मानती हूं कि आयटम नंबर को पार्टी नंबर कह कर उसे प्रस्तुत न करें. पहले भी तो आते थे वैसे गाने. लेकिन जिस तरह के गाने अब आ रहे हैं. उसमें महिलाओं को अश्लीलता ही दर्शाई जाती है और महिलाएं सिर्फ उत्तेजना दर्शाने वाली कोई वस्तु तो नहीं है.

सुधीर मिश्रा : मैं तो मानता हूं कि आयटम सांग का कंसेप्ट रहना ठीक है. बिड़ी जलईकै भी तो आयटम नंबर था. लेकिन जिस तरह उसे फिल्माया गया है. वह अश्लील या असभ्य नहीं लगता. जबकि आज कल जो गाने बन रहे हैं उनमें प्राय: किसी लड़की के नाम पर शीला, मुन्नी, बबली जैसे नाम रख कर महिलाओं को ही बदनाम किया जा रहा है. वह गलत है. लेकिन मैं गानों के बैन के खिलाफ हूं. मुझे लगता है कि अगर जरूरत है तो आयटम नंबर दो. वरना न दो फिल्म में.
सवाल : विज्ञापनों में महिलाओं का चित्रण
शबाना आजिमी : मैं इस बात के भी सख्त खिलाफ हूं कि किसी मोबाइल फोन के विज्ञापन में आप जबरन किसी महिला का बाथिंग सीन दिखायें. यह एक महिला के लिए भी शर्मनाक बात है कि वह इस तरह के विज्ञापनों के लिए हां कहती है. ऐसे कंटेंट को सेंसर से पास नहीं किया जाना चाहिए. चूंकि विज्ञापन तो पूरा परिवार एक साथ देखता है. इस तरह से महिलाओं का चित्रण महिलाओं की छवि खराब करता है और उसे सिर्फ उत्तेजक उपभोक्ताओं तक सीमित करता है. जो कि सरासर गलत है.

सुधीर मिश्रा : मैं शबाना की बातों से पूरी तरह से सहमत हूं. वैसे विज्ञापनों में जहां जबरन आप महिलाओं की उत्तेजक दृश्य दिखा रहे हैं. उन्हें बैन करना चाहिए और वैसे विज्ञापनों के मेकर्स को भी नोटिस भेजना चाहिए व निर्देश दिये जाने चाहिए.

सवाल : फिल्मों में महिलाओं की उपस्थिति
शबाना आजिमी : मैं यह नहीं मानती कि सिर्फ महिला निर्देशिका को महिला प्रधान फिल्में बनानी चाहिए. उन्हें हर तरह की फिल्में बनानी चाहिए. और महिलाओं को भी हर तरह के किरदार निभाना चाहिए. एक बात को हमेशा स्वीकारें कि बोल्ड होना अश्लीलता नहीं. आप वैसे किरदार निभायें. लेकिन उत्तेजना फैलाने के इरादे से नहीं.
गुरविंदर चड्डा : मुझे याद है आज से कई सालों पहले किसी फिल्म के सेट पर केवल कुछ महिलाएं होती थीं. एक अभिनेत्री, एक अभिनेत्री की मम्मी. लेकिन अब स्थिति बदली है. अब तो हर फिल्म के सेट पर आधे से ज्यादा लड़कियां होती हैं तो यह सोच बदली है. जमाना बदला है. तकनीकी रूप से लड़कियां आयी हैं और फिल्मों को लेकर उनकी सोच बदली है. अब हर लड़की सिर्फ हीरोइन नहीं, सिनेमेटोग्राफर भी बनना चाहती हैं.
सुधीर मिश्रा : पुरुष निर्देशकों को ज्यादा से ज्यादा महिला प्रधान फिल्में बनानी चाहिए.
सवाल : बॉलीवुड व आयटम नंबर की वजह से वैश्यावृति व रेप केस बढ़ रहे हैं?
शबाना आजिमी : ये सारी बातें सरासर बकवास है. बॉलीवुड से जो अच्छी चीजें होती हैं. उसका सेहरा तो आप हम पर कभी नहीं बांधते. बॉलीवुड या सिनेमा कभी भी रेप जैसी चीजों को बढ़ावा नहीं देता और न कभी देगा. अब भी फिल्मों में स्तरीय फिल्में बन रही हैं. समाज को आईना  दिखाता है. तो बेहतर हो कि बॉलीवुड की स्थिति और उसके इमेज को सुधारा जाये. कुछ गिने चुने गानों और लोगों की वजह से पूरे सिने जगत को बदनाम न किया जाये.

मीडिया बनाम टूटती जोड़ियां



दो दिनों पहले फिल्म ये जवानी है दीवानी का पहला ट्रेलर जारी किया गया. रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण के ब्रेकअप के बाद यह उनकी पहली फिल्म है. जाहिर है मीडिया के लिए यह खास मौका था. जब वे दोनों के रिश्तों को लेकर ढेर सारी बातें बनाएं. प्रेस कांफ्रेंस के दौरान कुछ ऐसा ही हुआ भी. एक मीडिया प्रतिनिधि से रणबीर कपूर और दीपिका से सीधे तौर पर यह प्रश्न पूछा कि क्या दीपिका दोबारा फिल्म के प्रोमोशन के लिए रणबीर के नाम का टैटू बनवायेंगी. इस पर रणबीर पूरी तरह भड़क गये. उन्होंने सीधे तौर पर कहा कि वह टैटू प्रोमोशनल नहीं था. और हम अपने पर्सनल लाइफ में क्या करते हैं. इस पर हमें किसी को कोई सफाई नहीं देनी. उन्होंने यह भी कहा कि वे इस तरह के वाहियात सवालों का बहिष्कार करते हैं. दरअसल, हकीकत भी यही है कि कई बार मीडिया भी स्टार्स से केवल वैसे ही सवाल पूछती हैं, जिनसे उन्हें मसाला मिले. वे विषयपरक प्रश्नों की बजाय लव, ब्रेकअप जैसी चीजों पर ही सवाल खड़ी करती है. जबकि दीपिका व रणबीर ने वाकई अपने ब्रेकअप के बाद अगर किसी फिल्म को करने का फैसला किया. तो इस बात की सराहना होनी चाहिए. वरना, इतिहास गवाह है कि हिंदी सिनेमा जगत में जब भी आॅफ स्क्रीन जोड़ियां टूटी, वे कभी आॅन स्क्रीन भी जोड़ी नहीं बन पायीं. और दर्शक हमेशा अच्छी जोड़ियों वाली फिल्में देखने से वंचित रहे. रेखा-अमिताभ, सलमान-ऐश्वर्य और अब जॉन और बिपाशा भी कभी एक साथ नहीं देखे जायेंगे. जबकि ये सभी जोड़ियां पसंद की जाती रही हैं. रणबीर दीपिका ने बजाय एक दूसरे पर कटाक्ष करने या बैर रखने की बजाय आपसी समझ से दोस्ती जारी रखी है और इस बात का सम्मान किया जाना चाहिए कि कम से कम उनकी दोस्ती तो कायम है. मीडिया को भी ऐसे रिश्तों का आदर करना चाहिए न कि माखौल उड़ाना चाहिए.

राष्टÑीय सम्मान की नयी फौज



नेशनल अवार्ड 2013 की घोषणा हो चुकी है. इस बार  हिंदी सिनेमा जगत के उन नामों की फेहरिस्त लंबी है. जो इस फिल्म इंडस्ट्री के खानदानी परिवार से नहीं हैं. मसलन फिल्मी खानदान से नहीं हैं. इरफान खान, नवाजुद्दीन सिद्दकी, तिग्मांशु धूलिया,सुजोय घोष जैसे नाम शामिल हैं. पान सिंह तोमर, कहानी,विकी डोनर, चिट्टगांव व गैंग्स आॅफ वासेपुर जैसी फिल्मों के नाम कई राष्टÑीय पुरस्कार हैं. इससे स्पष्ट है कि हिंदी सिनेमा जगत में अब पूरी तरह से दबदबा मुंबई के फिल्मी खानदान की बजाय बाहरी प्रतिभाओं का हो चुका है. हाल ही में फिक्की  फ्रेम्स में करन जौहर की अगुवाई में इसी विषय पर चर्चा हुई थी कि किस तरह फिल्मी खानदान को दरकिनार कर हिंदी सिने जगत में बाहरी प्रतिभाएं अपना नाम शामिल कर रही हैं और राष्टÑीय पुरस्कार की विभिन्न श्रेणियों में मिले पुरस्कार इस बात का साक्षात प्रमाण है. किसी दौर में करन जौहर अनुराग कश्यप की फिल्मों को खास महत्व नहीं देते थे और अब वही करन भलिभांति स्वीकारते हैं कि अनुराग बेहतरीन निर्देशक हैं. साथ ही करन ने यह भी स्वीकारा कि यह सच है कि अगर उनके पिता फिल्म इंडस्ट्री से नहीं होते तो शायद ही वह निर्माता बन पाते. स्पष्ट है कि आज भी इंडस्ट्री में नेपोटिज्म जिसे हम भाई भतीजावाद कह सकते हैं वह हावी है. मजाकिया अंदाज में करन ने यह स्वीकार भी लिया था कि वह नेपोटिज्म के ब्रांड अंबैस्डर हैं. फिक्की फ्रेम्स में सुजोय घोष ने अपनी बातों में दर्शाया कि किस तरह किसी बाहरी के लिऐ किसी प्रोडक् शन हाउस तक पहुंच पाना कठिन होता है. लेकिन सच तो यह है कि एक  नयी फौज तैयार हो चुकी है और वह लगातार सबको चौकाने के लिए तैयार है और चौका रही है. निश्चित तौर पर सुपरस्टार्स व स्टारडम की हैसियत रखनेवाले शख्सियत थोड़े तो थररायेंगे होंगे इस कामयाबी से. आखिर यह एक बड़ी सफलता है.

शादी व करियर में द्वंद्व



मुंबई में हाल ही में फिक्की फ्रेम्स का आयोजन संपन्न हुआ. अमूमन इस समारोह में मीडिया व सिनेमा जगत के व्यवसाय पर बातचीत की जाती है. लेकिन सिनेमा जगत से जुड़े क्रियेटिव पहलुओं पर भी प्रकाश डाला जाता है व कई शख्सियत इसमें शिरकत करते हैं. इसी क्रम में अभिनेत्री काजोल भी फिक्की फ्रेम्स का हिस्सा बनीं. उनके करीबी मित्र करन जौहर ने काजोल से खास बातचीत की. इस बातचीत में काजोल ने खुले दिल से कई बातें स्वीकारीं और कई मुद्दों पर खुल कर जवाब दिये. एक सवाल पर कि क्या अभिनेत्रियां शादी करने के बाद फिल्मों में सक्रिय नहीं रह जाती या इंडस्ट्री का नजरिया बदल जाता है? इसके जवाब में काजोल ने कहा कि मैंने जब से शादी की है. तब से लेकर अब तक उन्हें ज्यादा फिल्मों के आॅफर मिल रहे हैं. हाल ही में करीना कपूर से भी समान सवाल पूछे गये कि क्या शादी के बाद उनके करियर पर बंदिशें लगने लगी हैं,चूंकि खबरें आ रही थीं कि करीना की सास शर्मिला करीना के आयटम सांग करने से नाराज हैं. जबकि करीना ने शादी के बाद ही दबंग 2 का आयटम सांग फिल्माया था. विद्या बालन की शादी के बाद घनचक्कर उनकी पहली फिल्म होगी. करीना ने इस सवाल के जवाब में सटीक बात कही कि उन्होंने शादी की है.कोई पाप नहीं. दरअसल, हकीकत यही है कि हिंदी सिने जगत में ही नहीं, आमतौर पर हिंदी सिनेमा के दर्शकों को महिलाओं का न तो आॅन स्क्रीन सती सावित्रि या सिंदूर लगी अभिनेत्री के किरदार पसंद आते हैं और न ही वास्तविक जिंदगी में. ऐश्वर्य राय ने शादी के बाद जोधा अकबर में जोधा का किरदार निभाया था. और लोगों ने इस शादीशुदा किरदार को पसंद किया, चूंकि जोधा का किरदार वैसा था. वरना, हिंदी फिल्मों के दर्शकों को अभिनेत्रियां डांस करती या ग्लैमरस ही पसंद है और शायद इसलिए अभिनेत्रियां हमेशा द्वंद्व में फंसी रहती हैं.

निर्देशक व उनकी सरप्राइज फिल्में



 हाल ही में फिल्म लूटेरा का फर्स्ट लुक जारी किया गया. लूटेरा के पहले ट्रेलर को दर्शकों व समीक्षकों सभी से काफी सराहना मिल रही है. यह फिल्म उड़ान बनानेवाले निर्देशक विक्रमादित्य मोटवाने की पहली फिल्म है. साथ ही विकास बहल, अनुराग कश्यप और विक्रमादित्य मोटवाने की संयुक्त प्रोडक् शन कंपनी फांटम की भी पहली फिल्म है. विक्रम को फिल्म उड़ान के लिए काफी सराहा गया था. एकता कपूर भी इस फिल्म की निर्माता बनी हैं. हाल ही में जब उनसे पूछा गया कि वह इस फिल्म का प्रोमोशन कैसे करेंगी तो उन्होंने कहा कि कुछ फिल्मों का आॅरा प्रोमोशन से बनता है और कुछ फिल्में खुद ब खुद खास बन जाती है. लूटेरा उनमें से एक हैं. एकता ने कहा कि लूटेरा उनकी पहली फिल्म है, जिसे हां कहने में उन्हें चंद मिनट भी नहीं लगे थे और उन्हें इसके मेकर्स पर पूरा भरोसा है. अनुराग कश्यप मानते हैं कि विक्रमादित्य हिंदी सिनेमा के ग्रामर को समझने वाले चंद लोगों में से एक है. खबरों में यह बात भी थी कि विक्रम ने ही गैंग्स आॅफ वासेपुर के दोनों पार्ट की एडिटिंग में  अनुराग की मदद की थी. इससे यह स्पष्ट है कि विक्रमादित्य निर्माताओं की पसंद बन चुके हैं. उनकी फिल्में दर्शकों के साथ साथ निर्माताओं को भी लुभा रही हैं. दरअसल, हकीकत यही है कि हिंदी सिनेमा में 2013 भी बेहतरीन साल साबित होगा. चूंकि इस बार कई निर्देशक अपनी फिल्मों से लोगों को चौंका रहे हैं. लोग अनुमान भी नहीं लगा पाते और जिन निर्देशकों की चर्चा बहुत नहीं होती. वे ही आश्चर्यजनक फिल्में बना रहे हैं. निर्देशक दर्शकों को सरप्राइज दे रहे हैं.सुभाष कपूर की फिल्म जॉलीएलएलबी की खास चर्चा नहीं थी. लेकिन फिल्म बेहतरीन है. रेमो की फिल्म एबीसीडी का खास प्रोमोशन नहीं हुआ. लेकिन फिल्म हिट रही. स्पष्ट है कि हिंदी सिनेमा का यही स्वर्णिम दौर है.

फिल्में व प्रेस शो का ट्रेंड



इन दिनों बॉलीवुड के कुछ निर्देशकों और निर्माताओं ने एक नयी पहल की है. वे फिल्मों को अपनी रिलीज से लगभग दो तीन दिनों पहले मीडिया से संबंध रखनेवाले लोगों के लिए स्क्रीन कर रहे हैं. हाल ही में सुभाष कपूर ने अपनी फिल्म जॉली एलएलबी की स्क्रीनिंग बुधवार को ही रखी. प्राय: फिल्मों के प्रेस शो गुरुवार यानी रिलीज से एक दिन पहले रखी जाती है. लेकिन इन दिनों यह ट्रेंड बदला है. लेकिन इस ट्रेंड को लागू करनेवाले भी वे ही निर्देशक हैं, जिन्हें अपनी फिल्मों पर भरोसा होता है, और जिनकी फिल्में वाकई स्तरीय बनती हैं. सुभाष कपूर की फिल्म जॉली एलएलबी कमाल की फिल्म है. इंडियन ज्यूडीसरी की तह तक पहुंचनेवाली यह फिल्म हाल के दिनों में बनी अलग और अनोखे विषय पर बनी फिल्म है. निश्चित तौर पर सुभाष जानते थे कि उनकी फिल्म अच्छी बनी है इसलिए उन्होंने अपनी फिल्म बेझिझक प्रेस तक पहुंचायी. वही दूसरी तरफ वासु भगनानी जैसे निर्माता प्राय: अपनी फिल्मों के प्रेस शो फिल्म की रिलीज के दिन रखते हैं. इससे स्पष्ट है कि वे अपने प्रोडक्ट को लेकर संदेहास्पद रहते हैं. खासतौर से जब उनके बेटे जैकी भगनानी की फिल्म हो तो वह यही चाहते हैं कि कम से कम फिल्म को ओपनिंग मिले. वरना, अगर वह प्रेस शो दिखा देंगे तो इन दिनों ट्विटर व फेसबुक से नेगेटिव पब्लिसिटी हो जायेगी और  बॉक्स आॅफिस पर जो भी कलेक् शन होना होगा. वह भी नहीं होगा. हाल के दिनों में महेश भट्ट कैंप ने भी रिलीज के दिन फिल्मों के प्रेस शो का प्रचलन शुरू कर दिया है. वहीं तिग्मांशु धूलिया, सुधीर मिश्र व अनुराग कश्यप जैसे निर्देशक फिल्म की रिलीज से बहुत पहले से फिल्मों की स्क्रीनिंग शुरू कर देते हैं, क्योंकि उन्हें अपने प्रोडक्ट्स पर विश्वास होता है. साथ ही वे लोगों की प्रतिक्रियाओं को भी तवज्जो देते हैं.

राउड़ी है बीरा : सिद्धार्थ अरोड़ा



बनारस की गलियों से निकल कर मुंबई की महानगरी में आये सिद्धार्थ अरोरा ने अभी इस महानगरी को बहुत साल नहीं दिये. लेकिन कम समय में ही उन्होंने अपनी अच्छी पहचान बना ली है. कलर्स के शो मुक्ति बंधन के बाद इन दिनों वे ना बोले तुम न मैंने कुछ कहा में अहम भूमिका में नजर आ रहे हैं
सि  द्धार्थ ने अपनी पढ़ाई बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से एमबीए की पढ़ाई पूरी की है. उनका भी सपना है कि वह फिल्मों में काम करें. लेकिन वे किसी हड़बड़ी में नहीं हैं. वे धीरे धीरे अपना रास्ता खुद बना रहे हैं. बनारस की परवरिश का ही शायद यह नतीजा  है कि सिद्धार्थ टीवी के उन चुनिंदा टीवी कलाकारों में से एक हैं, जिनकी हिंदी भाषा पर बेहतरीन पकड़ है और यह बात उन्हें औरों से अलग बनाती है. फिलवक्त उन्हें कम ही वक्त हुए हैं इंडस्ट्री में. लेकिन उनके अभिनय की क्षमता को देख कर उम्मीद की जा सकती है कि  आनेवाले समय में सिद्धार्थ टीवी के सर्वाधिक लोकप्रिय चेहरों में से एक होंगे.बातचीत सिद्धार्थ से...

धीरे धीरे लेकिन समझदारी से रखना है कदम
मैं हमेशा से अभिनय के क्षेत्र में जाना चाहता था. लेकिन मैं अपनी पढ़ाई को दरकिनार करके ऐसा नहीं कर सकता था. सो, मैंने पहले अपनी न सिर्फ पढ़ाई पूरी की. बल्कि मुंबई आकर मैंने पहले एमबीए के आधार पर कुछ सालों के लिए काम किया. फिर धीरे धीरे लोगों से पहचान बनी और काम मिलने शुरू हुए, मुक्ति बंधन के लिए मैंने आॅडिशन दिया था. फिर चुनाव हुआ. हां, मगर यह जरूर है कि एक बार जब आप किसी शो में काम कर लेते हैं तो आपका रास्ता थोड़ा आसान हो जाता है. ना बोले तुम न मैंने का जब आॅफर आया था. उस वक्त मैं बनारस में था. मैंने वही से अपने काम का शोरील भेजा. फिर मेरा चुनाव हुआ. अभिनय का करियर कठिन जरूर है. लेकिन मैं मानता हूं कि एक बार अगर खुद को प्रूव कर दिया तो फिर रास्ते थोड़े आसान हो जाते हैं.
कैसा है बीरा का किरदार
इस शो में मेरा किरदार मुक्ति बंधन से बिल्कुल अलग है. मुक्ति बंधन में मैं बहुत बड़े बिजनेस मैन का बेटा बना हूं. जबकि ना बोले में मैं बीरा के किरदार में हूं. ना बोले का वीरा बिल्कुल अलग तरह का किरदार है. कह सकते हैं कि राउड़ी या रोड छाप रोमियो की तरह का लड़का है. बीरा नन्ही से प्यार करता है. जो बुलेट चलाता है और जिसे अपने अंदाज में रहना ही पसंद है. बीरा ना बोले में पॉलिटिशयन का पोता बना है. मुक्ति बंधन में मैंने मसर्डिज चलाता था और अब इस शो में मैं बुलेट चला रहा हूं. बीरा को लगता है कि उसके सामने कोई खड़ा नहीं हो सकता. वह सबका बाप है.  तो आप देख सकते हैं कि लुक से लेकर मेरे किरदार तक सबकुछ अलग है. लेकिन मजा आ रहा है. चूंकि जब किसी कलाकार को हर बार नये किरदार मिलते हैं तो इससे आपके लिए और रास्ते खुल जाते हैं.
फिल्मों के लिए कोई हड़बड़ी नहीं
सिनेमा मेरा पहला प्यार रहा है. और मैंने एक फिल्म में काम भी किया है. ये जो मोहब्बत है नामक फिल्म में. लेकिन यह अलग बात है कि मैं जिस तरह के किरदार फिल्मों में निभाना चाहता हूं. अभी मुझे वैसे किरदार नहीं मिले हैं. लेकिन फिल्मों में काम कौन नहीं करना चाहेगा. मैं बनारस का हूं और बनारस पर कई फिल्में बनती रहती हंै. लेकिन अभी मैंने कहीं कोशिश नहीं की. चूंकि फिलहाल टेलीविजन में अच्छी पकड़ बनाना चाहता हूं. अभी मुझे आये बहुत साल हुए भी नहीं हैं. सो, अभी जम कर काम करना चाहता हूं. मुझे खुशी है कि मैं अपने परिवार को यह खुशी दे पा रहा हूं. चूंकि मेरे परिवार से इस क्षेत्र में कोई नहीं. लेकिन मैंने इतना तय जरूर कर रखा है कि मैं टीवी को नहीं छोड़ूंगा. चूंकि बॉलीवुड में आपकी फिल्म अगर शुक्रवार को नहीं चली तो आप याद नहीं रखे जाते. वही टीवी में आप छोटे किरदार निभा कर भी ख्याति प्राप्त कर लेते हो.
पेट्स से है बेहद प्यार
मुझे अभिनय के साथ साथ पेट्स से भी बेहद प्यार है. मैं मुंबई में अकेले रहता हूं. लेकिन ये पेट्स ही मेरे फ्रेंड्स बन जाते हैं. मैंने अभी हाल में ही एक कोकर स्पेनियल ब्रीड खरीदा है और मैंने इसका नाम पॉपिंस रखना है. मैंने अपने होमटाउन में भी काफी पेट्स रखे हैं. लेकिन मुंबई में मेरे पास सिर्फ यही है अभी. सो, मैं बेहद खुश हूं कि मेरे साथ मेरा कोई नया दोस्त तो बना.
स्थापित किरदारों के बीच पहचान
हां, यह बिल्कुल सच है कि किसी भी नये किरदार को खुद को स्थापित करने में वक्त तो लगता है और ना बोले के किरदार दर्शकों को पहले से ही काफी पसंद हैं. लेकिन बीरा के कैरेक्टर के इतने शेड्स हैं कि निश्चित तौर पर दर्शकों को बीरा भी पसंद आयेगा और मुझे अच्छे रिस्पांस मिल रहे हैं शो के लिए.

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से नदारद हिंदी



पिछले दो दिनों से आॅस्कर विजयी निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग भारत में हैं. वे यहां अपनी फिल्म लिंकन का जश्न मनाने आये थे. यहां उन्होंने अमिताभ बच्चन समेत 61 निर्देशकों से मुलाकात की. इस दौरान कुछ मीडिया प्रतिनिधियों को भी उनसे मिलने व बातचीत करने पहुंचे थे. लेकिन आश्चर्यजनक बात यह थी कि इस पूरे कार्यक्रम में किसी भी हिंदी अखबार या चैनल के प्रतिनिधियों को स्पीलबर्ग से बातचीत करने की अनुमति नहीं दी गयी थी. बॉलीवुड में हिंदी को लेकर आंखें तरेरनेवालों की कमी नहीं है. यह पहला मौका नहीं था. जब हिंदी सिनेमा इंडस्ट्री में हिंदी ही नदारद थी. इससे पहले भी कई मौके ऐसे रहे हैं, जहां हिंदी के साथ दुर्वव्यवहार किया जाता रहा है. स्पीलबर्ग से इस मुलाकात करनेवालों लोगों की सूची तैयार करते वक्त निश्चित तौर पर इसके आयोजकों ने यह मान लिया होगा कि हिंदी अखबार या ैचैनल अंगरेजी में काम नहीं करते तो न तो वह अंगरेजी समझ पायेंगे और न ही स्पीलबर्ग से अंगरेजी में प्रश्न पूछने में सहज हो पायेंगे. सो, उन्हें दरकिनार कर दिया गया. ऐसा सिर्फ भारत में ही हो सकता है कि हम जिस हिंदी सिने जगत की बात करते हैं. वहां हिंदी को ही तवज्जो नहीं मिलती. कुछ दिनों पहले तिग्मांशु धूलिया ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि मुंबई वालों के लिए मुंबई से बाहर पूरी दुनिया गांव है, क्योंकि उन्हें अंगरेजी नहीं आती. तिग्मांशु की बात भी यह स्पष्ट करती है कि हिंदी के साथ कैसा रुखा व्यवहार किया जाता है. हिंदी सिने जगत में इससे किसी को आपत्ति नहीं है. वे तमाम निर्देशक जो हिंदी में फिल्में बनाते हैं. उन्होंने भी इस बात की पहल नहीं की, कि हिंदी अखबारों से कुछ प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चाहिए. पूर्वधारणा बना लेना कि जो हिंदी में काम करते हैं वे अंगरेजी नहीं बोल सकते. सरासर गलत है. इसका विरोध होना चाहिए था

अच्छी फिल्म अच्छे कलाकारों से बनती है: नीरज पांडे



आम आदमी को लेकर एक खास फिल्म बनानेवाले निर्देशक नीरज पांडे फिल्म मेकिंग को लेकर अलग सोच रखते हैं.   अ वेडनेस डे से ही नीरज पांडे ने खुद को साबित कर दिया था. और अब वे अपनी दूसरी फिल्म स्पेशल 26 में भी कुछ अलग कमाल दिखा रहे हैं. फिल्म सच्ची घटनाओं पर आधारित है. नीरज इस फिल्म को लेकर काफी उत्साहित हैं

अ ावेडनेस डे से ही नीरज ने खुद को स्थापित कर लिया था. फिल्म कर्मिशयल रूप से भले ही हिट नहीं रही. लेकिन फिल्म को समीक्षकों से काफी सराहना मिली थी. इस बार नीरज स्पेशल 26 लेकर आ रहे हैं और अरसे बाद एक साथ कई बेहतरीन कलाकार साथ साथ नजर आ रहे हैं. फिल्म इसी हफ्ते रिलीज हो रही है. बातचीत नीरज से

आपकी पहली फिल्म अ वेडनेस डे के बाद आप अचानक से गायब हो गये थे. इतने सालों के बाद फिर दूसरी फिल्म लेकर आये. लंबे अंतराल की कोई खास वजह?
अच्छे काम में वक्त तो लगता है. आपको जानकर हैरानी होगी कि स्पेशल 26 की स्क्रिप्ट अ वेडनेस डे से पहले लिखी गयी थी. लेकिन उस वक्त लगा कि पहले वह बनानी चाहिए तो वह बनाया. वैसे वेडनेस डे को आये भी सिर्फ 2 साल ही हुए हैं और एक फिल्म को बनने में कम से कम इतना वक्त तो लग ही जाता है. जहां तक बात है फिल्मों की संख्या की तो एक बात तो तय है कि मैं धराधर फिल्में नहीं बना सकता.

स्पेशल 26 की कहानी कैसे जेहन में आयी? 
मैंने अखबारों में इस बारे में पढ़ा था कि खासतौर से मुंबई में झावेरी बाजार में ऐसे कुछ आॅफिसर थे जो नकली सीबीआइ बन कर छापे मारते थे और पॉलिटिशयन और खासतौर से भ्रष्ट नेताओं को लूट कर ले जाते थे. हाल ही में फिर से एक अखबार ने कुछ वैसे ही ठग लोगों पर स्टोरी की थी तो वही से इंस्पेरेशन मिली लगा कि इस पर कहानी कही जानी चाहिए. हां, इस बार मैंने अपनी शैली सीरियस नहीं. हास्य रखी.

लेकिन बॉलीवुड में इससे पहले बंटी बबली जैसी फिल्मों में भी तो ठगी के किस्से सुनाये गये हैं?
यह हमारे बॉलीवुड की परेशानी है कि हम फिल्म देखे बिना मान लेते हैं कि यह फिल्म उससे मेल खाती है. अगर लव स्टोरी की बात की जाये तो बहुत सारी बनी है न. फिर ठग वाली स्टोरी एक ही कैसी होगी. बंटी बबली काल्पनिक थी. यह सच्ची घटनाओं पर है.

अ वेडनेस डे में आपने किसी बड़े स्टार को नहीं लिया था. तो इस बार अक्षय कुमार के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा और अक्षय का ही चुनाव क्यों किया?
मैं अक्षय की सारी फिल्में देखता हूं. एक तो मैं मानता हूं कि वे ऐसे किरदार बखूबी निभा सकते हैं. उनके चेहरे पर वह कांफिडेंस है. जो मुझे इस किरदार के लिए चाहिए था. हां, लेकिन जिस निर्देशक की एक फिल्म आयी है. उसके लिए यह कठिन जरूर होता है कि वह किसी स्टार को मनाये. मैंने जब अक्षय को स्क्रिप्ट भेजी थी तो उन तक पहुंच ही नहीं पायी थी. फिर मैंने बात की तो उन्होंने बताया कि उन्हें तो स्क्रिप्ट मिली ही नहीं है. फिर मैंने उनको जब स्क्रिप्ट दिया तो वे कहानी को पहली बार समझ ही नहीं पाये थे. उन्होंने मुझसे लगभग 4-5 महीने का वक्त मांगा. फिर इस कहानी को समझा. जब वे संतुष्ट हो गये तो उन्होंने हां कही. जहां तक बात है उनके साथ काम करने के अनुभव को लेकर तो अक्षय खुद ही कई इंटरव्यूज में यह बता चुके हैं कि उन्होंने कोई होमवर्क नहीं किया था. उनको मैंने जैसा जैसा कहा. उन्होंने वही किया. कोई ना नुकुर नहीं की. कोई स्टारडम नहीं था. अक्षय की खास बात जो मुझे लुभा गयी वह यही कि वे नये निर्देशक के साथ भी सामान्य व्यवहार रखते हैं. वे निर्देशक का सम्मान करते हैं और स्क्रिप्ट को अहमियत देते हैं.

फिल्म का शीर्षक थोड़ा अलग है?
आप जब फिल्म देखेंगी तो आप खुद समझ जायेंगी कि फिल्म का शीर्षक ऐसा क्यों है. दरअसल, फिल्म का एक संवाद है. जिसमें अक्षय कहते हैं कि हम हैं स्पेशल 26 और 26 से जुड़े और भी कई कारनामें हैं फिल्म में जो कि आप जब देखेंगे तो आपको खुद समझ में आ जायेगा.

अरसे बाद मनोज बाजपेयी, जिम्मी शेरगिल और अनुुपम साथ काम कर रहे हैं.
मैंने जिम्मी और अनुपम जी के साथ तो पहले भी काम किया है और ये मेरे दोस्त जैसे हैं. वे मुझे काफी गाइड करते हैं. अनुपम जी तो खासतौर से मुझे बहुत प्रोत्साहित करते हैं. मनोज जी के साथ पहली बार काम कर रहा हूं. और वे काफी टैलेंटेड है. अच्छा लगता है कि बतौर निर्देशक आप अच्छे कलाकारों को अपनी फिल्म के लिए कंविंस कर पाते हैं. मतलब निर्देशक के कुछ गुण तो हैं मुझमें. काफी मजेदार टीम रही है. फिल्म में काफी मजा आयेगा लोगों को.

मुझे भी बच्चपन से था एक्टिंग का कीड़ा : सोनाली बेंद्रे



इंडिया गॉट टैलेंट जैसे शो की जज बनने के बाद इस बार सोनाली बेंद्रे जीटीवी के शो इंडियाज बेस्ट ड्रामेबाज में जज की भूमिका निभा रही हैं. वे बेहद खुश हैं, चूंकि उन्हें बच्चों में नये नये टैलेंट नजर आ रहे हैं. कैसा है जीटीवी का उनका यह सफर. बता रही हैं खुद सोनाली बेंद्रे. फिल्मों से विराम लेकर टीवी पर लगातार सक्रिय हैं सोनाली
सो नाली बेंद्रे पिछले कई सालों से टीवी पर सक्रिय रही हैं. वे लगातार कई शोज की जज बन कर दर्शकों का भरपूर प्यार हासिल करती रही हैं. भले ही सोनाली फिल्मों से दूर हैं. लेकिन दर्शक उन्हें अभी भी बेहद पसंद करते हैं और खासतौर से उनकी मुस्कान को. पेश है सोनाली से बातचीत के मुख्य अंश

सोनाली, इससे पहले भी आप टीवी में सक्रिय रही हैं. इंडिया गॉट टैलेंट में काफी लंबे समय तक आपने जज की भूमिका निभायी. लेकिन इस साल आप इस शो में नजर नहीं आयीं. कोई खास वजह.
नहीं ऐसी कोई खास वजह नहीं. हां, लेकिन जज बन  कर केवल जज की कुर्सी संभालना ही रियलिटी शोज के जज की भूमिका नहीं होती. इसमें भी तो क्रियेटिविटी होती है. मैं पिछले कई सालों से इंडिया गॉट के साथ थी. लेकिन अब कुछ नया करना चाहती थीं तो ड्रामेबाज से नयी शुरुआत की.

ड्रामेबाज बिल्कुल अनोखे तरह का शो लग रहा है. बच्चे तरह के करतब दिखा रहे हैं. क्या आशाएं हैं आपको क्या ऐसे शोज से निकले बच्चे वाकई इंडस्ट्री में पहचान बना पायेंगे.
हम सबकी यही परेशानी है. हम बचपन से ही बच्चों को बड़े बड़े सपने. हारना जीतना सीखा देते हैं. बच्चे कामयाब होंगे या नहीं. इंडस्ट्री में काम मिलेगा या नहीं. यह सब सोचने लगते हैं. लेकिन हकीकत यह है कि ऐसे शोज का यह उद्देश्य नहीं होना चाहिए. मैं इस शो के साथ हूं. क्योंकि मुझे लगता है कि इस शो से कुछ ऐसे बच्चे सामने आयेंगे जो अपनी प्रतिभा से सबको दिखायेंगे कि वे भी अभिनय कर सकते हैं अगर उन्हें सही प्लेटफॉर्म मिले तो. तो हमारी बस यही कोशिश है. शेष मुझे लगता है कि बच्चों को ज्यादा पॉलिश न करें. वे जैसे हैं उन्हें रहने दें. मासूमियत उनकी सबसे बड़ी पूंजी है. उन्हें खोने न दें. फिर बाकी पूरी जिंदगी है कांप्टीशन के लिए. मैं देखती हूं. ऐसी कई मां आती हैं. पेरेंट्स आते हैं जो बच्चों से अत्यधिक की उम्मीद लगा लेते हैं. ऐसे में उन पर प्रेशर बनता है और हमारे बस में भी तो नहीं कि हम सभी को ले लें. ऐसे में  मैं गुजारिश करती हूं पेरेंट्स से कि अपने बच्चों को समझे.
तो सोनाली क्या आपको भी बचपन से ही किसी अभिनय के कीड़े ने काट लिया था?
जी बिल्कुल. मुझे भी बचपन से ही गलतफहमी हो गयी थी कि मैं बहुत अच्छी एक्टिंग कर सकती हूं और हीरोइन का मतलब होता है. सजना संवरना. चौबीस घंटे खुद को निहारती रहती थी. जब इस इंडस्ट्री में आयी लोगों  ने खूबसूरती की तारीफ कर दी तो और सातवें आसमान पर रहने लगी थी, लगा एकदम टॉप की हीरोइन बन जाऊंगी. बाद में एहसास हुआ कि खूबसूरत दिखना ही अभिनय नहीं. धीरे धीरे बारीकियों को समझा और लगता है अब कि अभी भी सीख रही हूं.
इन दिनों आप फिल्मों से काफी दूर रहती हैं. कोई खास वजह?
नहीं ऐसा नहीं हैं. इन दिनों जिम्मेदारियां ज्यादा है. घर परिवार. टीवी. सब देखना है. और मुझे टीवी के माध्यम में मजा आ रहा है. फिलवक्त कर रही हूं मिलन लूथरिया की फिल्म वन्स अपन. लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि और भी फिल्में करूंगी. अच्छे किरदार मिलेंगे तो करूंगी. वैसे गोल्डी क े साथ उनके प्रोडक् शन के काम पर पूरा ध्यान देती हूं.
आपके को जज विवेक ओबरॉय और अनुराग बसु के साथ कैसी जम रही है?
विवेक को लंबे अरसे से जानती हूं. अनुराग दादा को हाल ही में जाना. लेकिन उनकी फिल्म बर्फी देखी थी. बहुत पसंद आयी थी. मुझे पता नहीं था कि वह इतने फनी हैं. मुझे लगा था सीरियस होंगे. लेकिन दोनों के साथ ही खूब मजा आता है. दोनों कभी कभी मेरी खूब खिंचाई करते हैं. लेकिन अनुराग दा के पास अच्छी समझ है. मुझे उनका काम पसंद है. विवेक अच्छे अभिनेता हैं और हम तीनों की ही अच्छी जमती है.
बच्चपन परिवार से आप काफी नजदीकी रही हैं. तो आराध्या से मिल कर कैसा लगता है?
ओह शी इज सो क्यूट और बेहद प्यारी लगती है वह मुझे. मुझे खुशी है कि उसकी मम्मी ऐश उसका बहुत अच्छे से ख्याल रखती है और आराध्या भी बड़ी होकर ऐश की तरह ही बेहद सुंदर होगी. मेरे विशेज हमेशा उनके साथ हैं और हमेशा रहेंगे.

समर्पित निर्देशक की समर्पित फिल्म



रेमो डिसूजा की फिल्म एनीबडी कैन डांस की लोकप्रियता के बाद उन्हें यूटीवी मोशन पिक्चर्स ने दो अन्य फिल्मों का आॅफर दिया है. रेमो डिसूजा की फिल्म एबीसीडी का खास प्रोमोशन नहीं किया गया था. यूटीवी ने इस पर खास ध्यान नहीं दिया. कुछ ऐसा ही विकी डोनर के दौरान भी हुआ था. फिल्म के प्रोमोशन को लेकर काफी उत्सुकता नहीं थी. लेकिन आश्चर्यजनक बातें यह है कि वे फिल्में जो वाकई अच्छी हैं. अपनी सोच में. वे सभी कामयाब हो रही है. फोक्सड फिल्मों को इन दिनों दर्शक मिल रहे हैं. रेमो ने डांस पर आधारित फिल्म एबीसीडी का निर्माण महज शब्दों में कहने के लिए नहीं किया है. उन्होंने वाकई फिल्म को सार्थकता दी है. डांस की दुनिया में इंप्रेस व एक्प्रेस के बीच की खाई से समाज की सच्चाईयों के साथ साथ यह भी दर्शाया है कि कैसे वाकई कुछ प्रतिभाएं गली से निकल कर ऊंचाईयां छू सकती हैं. रेमो ने इस फिल्म में सभी कोरियोग्राफर को ही लिया है. और खास बात यह है कि वे अपनी सोच से भटके नहीं हैं. हाल ही में जब यह फिल्म मीडिया प्रतिनिधियों को दिखाई जा रही थी. तो शुुरुआत में फिल्म के कलाकारों ने थियेटर में एक शानदार परफॉरमेंस के साथ इसकी शुरुआत की थी. इतने सालों में पहली बार था जब किसी फिल्म की शुरुआत में ऐसा परफॉरमेंस देखा. फिल्म में डांस को अनुशासन से जोड़ा गया है. साथ ही गुरु की अहमियत को भी दर्शाया गया है. अगर कोई व्यक्ति वाकई डांस की बारीकियों को समझना चाहता है तो रेमो की फिल्म उनके लिए गाइड है. लेकिन दुख की बात यह है कि ऐसी फिल्मों के प्रोमोशन में कभी भी प्रोडक् शन कंपनी खास दिलचस्पी क्यों नहीं लेती. वे इनके साथ पक्षपात क्यों करती हैं. जबकि यही फिल्में वाकई में मौलिक फिल्में हैं और दर्शकों कोलुभाती भी हैं. कुछ ऐसा ही पान सिंह तोमर के साथ भी किया गया था. लेकिन फिल्म ने सबके दिलों को जीता. और सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक रही. रेमो की लोकप्रियता और उनकी शैली को देखते हुए यूटीवी ने उन्हें दो और फिल्में दी हैं. लेकिन रेमो से यही गुजारिश कि उन्होंने खुद फिल्म में एक बात कही है कि जिस काम में दिल लगे वही करना चाहिए. सो, वह भी धाराप्रवाह में बह कर हर तरह की फिल्में न बनायें और न ही एबीसीडी के सीक्वल के बारे में सोचें. चूंकि जो बात उन्होंने एबीसीडी के माध्यम से पहुंचाने की कोशिश की है. वह लोगों तक पहुंच चुकी है. अब रेमो के लिए चुनौती बढ़ चुकी है. उन्हें आगे भी अपनी फिल्मों से खुद को साबित करना होगा.

जीनत का जन्नत



अपने जमाने की मशहूर अभिनेत्री जीनत तमान ने तय किया है कि वह दोबारा शादी करेंगी. उन्होंने अपने से 30 साल छोटे लड़के से शादी करने का फैसला किया है. उनके इस निर्णय से उनके बेटे खुश हैं. लेकिन दुनिया नहीं. दुनिया लगातार जीनत पर फांकाकशी कर रही है. दुनिया का मानना है कि इस उम्र में जीनत को जवानी चढ़ी है. इस उम्र में शादी की क्या जरूरत. दरअसल, हकीकत यही है कि हम शादी का सीधा तात्पर्य सेक्स समझते हैं. जबकि अगर जीनत ने इस उम्र में यह निर्णय लिया है तो निश्चित तौर पर वे सेक्स की नहीं एक साथी की तलाश में हैं. जीनत ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत हरे रामा हरे कृष्णा से की थी. वे देव आनंद की खोज थी. उसके बाद उन्होंने लगातार अपनी मन मर्जी की भूमिकाएं निभायीं और बोल्ड भूमिकाएं निभायीं. सो, लोगों में यह छवि बन गयी कि जीनत आम जिंदगी में भी वैसी ही होंगी. अक्सर कलाकारों के साथ ऐसा होता है कि वे अपने निभाये किरदारों के मुताबिक ही असल जिंदगी में आंक लिये जाते हैं. जीनत देव से प्रेम प्रसंग में रहीं. लेकिन प्रेम कहानी आगे नहीं बढ़ी. बाद में उन्हें अभिनेता संजय खान से प्रेम हुआ. लेकिन संजय खान व उनकी पत् नी की बेरुखी से उन्होंने अपनी आंखें खो दी. संजय ने गुस्से में आकर जीनत पर यूं वार किया था कि उनकी आंखों में गहरी चोट लगी. बाद में उन्होंंने मजहर खान से शादी की, जिन्होंने उन्हें काफी प्रताड़ित किया. घरेलू हिंसा की साक्षात गवाह खुद जीनत हैं. जीनत ने लगातार अपनी जिंदगी में   बतौर अभिनेत्री को मान सम्मान हासिल किया. लेकिन वास्तविक जिंदगी में वे प्रेम की तलाश में रहीं. और अब जब उन्हें एक सच्चा जीवन साथी मिल रहा है तो लोग उन पर फब्तियां कस रहे हैं. शादी या प्रेम में कोई सीमा नहीं होती. फिर जीनत पर यह प्रश्न चिन्ह क्यों? उन्हें हक है कि वे अपनी जिंदगी का फैसला करें. खुद जीनत भी अपनी सीमाएं जानती हैं. ऐसे में जिस व्यक्ति ने उनसे शादी करने के लिए हां कही है. जरा सोचें, वे किस सोच के धनी होंगे,जिन्होंने जीनत में जन्नत को देखा होगा. हिंदी फिल्मों में  उम्र के फासलों पर कई फिल्में बनी हैं. दिल चाहता है में भी अक्षय को अपनी मां की उम्र की लड़की से प्यार होता है. लेकिन डिंपल अक्षय को नहीं स्वीकार पाती. चूंकि वह दुनिया की बंदिशों से घिरी है. ऐसे में अगर जीनत ऐसे कदम उठा रही हैं तो यह एक सकारात्मक पहल है. चूंकि अकेलेपन से बड़ी कोई दर्द नहीं होता और अगर जजीनत को किसी का साथ मिल रहा है तो यह उनके लिए सबसे बड़ा जन्नत है.

ये डायन स्त्रीलिंग क्यों



एकता कपूर और विशाल भारद्वाज के सौंजर्य से एक फिल्म जल्द ही रिलीज होनेवाली है. एक थी डायन. फिल्म का शीर्षक और साथ ही फिल्म के प्रोमो ने लोगों में जिज्ञासा बढ़ा दी है. इस फिल्म का नाम पहले डायन रखा गया था. लेकिन बाद में इसे बदलकर एक थी डायन किया गया. पिछले कुछ दिनों से लगातार इस बात को लेकर चर्चा है कि फिल्म की कहानी क्या होगी. जिस दिन फिल्म का प्रोमो रिलीज किया गया. उस दिन ट्रेलर से लोगों ने अनुमान लगा लिया कि फिल्म हॉरर फिल्म है. चूंकि फिल्म का ट्रेलर लांच रात के 12 बजे रखा गया था. और फिल्म के सारे कास्ट अजीबोगरीब परिधान में थे. जैसी परिकल्पना हम एक हॉरर फिल्म की करते हैं. इस फिल्म में वे सारे तत्व नजर आ रहे हैं. लेकिन क्या हकीकत में डायन किसी भूत का नाम है. या यह डायन रूपी भूत हमने और समाज ने मिल कर उत्पन्न किया है. वर्षों से गांवों में, कस्बों में, महिलाओं को डायन प्रथा के नाम पर जलाया जा रहा है. उनके साथ बदसलूकी की जा रही है. कई सालों पहले जब मैं अपने गांव सिवान गयी थी. वहां रास्ते में हमारी बस रुक गयी थी. उस वक्त तकरीबन 20 साल की थी मैं. लोगों ने कहा कि पास के गांव में डायन घुस आयी थी. लोग उसे ही पिट पिट कर बाहर भगा रहे हैं. प्उस वक्त इस शब्द से मुझे भी डर लगा था. मैं भी सहमी थी. लेकिन धीरे धीरे जब समझ हुई तो इस बात को समझा कि डायन एक कुप्रथा है और जिसमें आम औरतों पर जुल्म कर उन्हें बेहरमी से मार दिया जाता है. प्राय: डायन का दोष उन महिलाओं पर लगता है, जो आम से थोड़ी अलग होती है और वह गांव देहातों में घूमती रहती है. गांव देहातों में पागल हुई महिला को भी लोग डायन का ही रूप दे देते हैं और उन पर इल्जाम लगाते हैं कि डायन न तो गांव के लिए ठीक है और न ही उनके बच्चे के लिए. एक बात समझ से परे है कि हमेशा डायन स्त्रीलिंग ही क्यों होती है. क्यों सारे कुकर्मों का सेहरा  हमेशा महिलाओं पर ही मढ़ दिया जाता है. अजीब विडंबना है हमारे देश की, यहां नारी देवी भी है और डायन भी? बालिका वधू जैसे धारावाहिक में भी इस कुप्रथा पर प्रकाश डाला गया. कई फिल्मों में छोटे अंतराल के लिए ही सही इस प्रथा पर प्रकाश डाला जाता रहा है. ऐसे में विशाल की यह फिल्म उम्मीदन दर्शकों को यह समझाने की कोशिश करेगी कि कोई डायन जैसी चीज नहीं होती. यह हमारे मन का वहम है. ऐसा आभास हो रहा है और विशाल जैसे निर्देशक को करना भी यही चाहिए, ताकि इस प्रथा को और बढ़ावा न मिले.

शिक्षा-ग्लैमर के बीच की खाई


काजोल, ऐश्वर्य राय बच्चन व सचिन तेंदुलकर जैसी कई सुप्रसिद्ध हस्तियां एक साथ एक मुहिम कर रहे हैं. वे सभी एक टीवी चैनल के शिक्षा पर आधारित कैंपेन के चेहरे बने हैं. इस कैंपेन के माध्यम से महिलाओं की शिक्षा के साथ साथ हर किसी को शिक्षा मुहैया कराने की बात कही है. इसी दौरान सचिन तेंदुलकर ने बातचीत में कहा कि उन्होंने जब यह सुना कि कई बच्चियां केवल स्कूल इसलिए नहीं जा पातीं, क्योंकि स्कूल में अच्छे शौचालय नहीं तो वे दंग रह गये. सचिन ने एक निश्चित धन राशि से भी मदद की है. वही दूसरी तरफ काजोल ने स्वीकारा कि किस तरह उन्होंने अपने फिल्मी करियर को बनाने के लिए पढ़ाई को दांव पर लगा दिया. और स्कूल के बाद अपनी पढ़ाई पूरी नहीं की और उन्हें इस बात का आज अफसोस होता है. काजोल वह पहली अभिनेत्री नहीं, जिन्होंने अभिनय के लिए अपनी पढ़ाई छोड़ी हो. दरअसल, ग्लैमर की दुनिया में आने के लिए आपको किसी एजुकेशनल सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं होती. यहां आपकी उम्र, आपका हुस्र और आपकी अभिनय क्षमता आपको स्टार बनाती है. यही वजह है कि कई एक्टर व एक्ट्रेस अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ कर ग्लैमर के मोह में लीन हो जाते हैं. खासतौर से अभिनेत्रियां कम उम्र में ही यह क्षेत्र चुन लेती हैं और फिर पढ़ाई उनके लिए प्राथमिकता नहीं रहतीं. दीपिका पादुकोण ने भी एक बार मुझसे बातचीत करते हुए अफसोस जताया था कि वे इस बात से हमेशा दुखी रहती हैं कि पढ़ाई अधूरी छोड़ दी. करीना कपूर समेत कई नामचीन अभिनेत्रियां इसी फेहरिस्त में शामिल हैं. करन जौहर की नयी खोज आलिया के इन दिनों काफी चर्चे हैं. आलिया अभी काफी छोटी हैं. लेकिन उनके पास लगातार फिल्मों के आॅफर हैं. निश्चित तौर पर वे भी पढ़ाई अधूरी ही छोड़ देंगी. इस मामले में कई हद तक एक्टर्स सही रास्ता चुनते हैं. वे पहले पढ़ाई पूरी करते हैं और फिर इस क्षेत्र में आते हैं. इसकी वजह यह भी है कि अभिनेत्रियो के लिए उम्र भी एक बड़ी बाधा होती है. ढलती उम्र के साथ उन्हें फिल्में नहीं मिलतीं. सो, वे जल्द से जल्द इस करियर में आ जाती हैं. हालांकि विद्या बालन ने अपनी एमए की पढ़ाई पूरी करने के बाद अभिनय में कदम रखा. लेकिन वह अपवाद हैं. तो क्या वाकई इस स्थिति पर यह बात फिट बैठती है कि जहां लक्ष्मी है वहां सरस्वती नहीं...चूंकि निस्संदेह ग्लैमर की दुनिया पैसा शोहरत सबकुछ देती है( लक्ष्मी) देती है. सो, उस लोभ में विद्या ( सरस्वती) की अहमियत समझ नहीं आती.