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20110415

लड़ते-झगड़ते तीन थे भाई (फिल्म रिव्यू)



पारिवारिक एकता का पाठ पढ़ाते तीन थे भाई

फिल्म ः तीन थे भाई

कलाकार ः ओम पुरी, दीपक डोबरियाल, श्रेयस तलपड़े, रागिनी खन्ना

निदर्ेशक ः मृगदीप सिंह लांबा

निर्माता ः राकेश ओमप्रकाश मेहरा

रेटिंग ः दो स्टार

बचपन में जब प्रायः हम यात्रा पर जाया करते थे. तो प्रायः रेलवे स्टॉल पर हमारी निगाह वहां पड़े चंपक, सौरभ सुमन, चाचा चौधरी व कॉमिक्स पर पड़ती थी. और हम वहां से वे सारी किताबें खरीद लाते थे. पूरी यात्रा के दौरान बस हम उन्हें ही पढ़ा करते थे. उन किताबों की कहानियों में प्रायः एक था राजा, एक थी रानी, तीन थे दोस्त, तीन थे भाई ऐसी कई कहानियां हुआ करती थीं. जिनमें नैतिक मूल्यों व पारिवारिक मूल्यों के बारे में किसी प्रेरक प्रसंग या कहानी के माध्यम से अपनी बात समझाने की कोशिश की जाती थी. तीन थे भाई कुछ ऐसी कहानियों का दार्शनिक किताब है. फिल्म में जिस तरह किरदारों को आपस में मिलते-बिछुड़ते-झगड़ते फिर वापस एक होते दिखाया गया है और जिस तरह के काल्पनिक दृश्यों और किरदारों का सहयोग लिया गया है. आपको फिल्म देखते वक्त कुछ ऐसा ही महसूस होगा कि आप किसी कॉमिक्स के किरदारों को अपने आस-पास घूमते देख रहे हैं. निदर्ेशक मृगदीप सिंह के जेहन में जब यह बात आयी होगी कि वे किसी ऐसी फिल्म से अपने निदर्ेशन क्षेत्र की दुनिया में कदम रखें तो निश्चित तौर में उन्होंने बचपन में ऐसी कई कहानियां पढ़ी होंगी और ऐसे किरदारों से रूबरू हुए होंगे. निस्संदेह फिल्म के माध्यम से उन्होंने यह तो साबित कर दिया है कि वे काल्पनिक हैं और एक बेहतरीन ड्रामा फिल्में लिख सकते हैं और उसे परदे पर उकेर भी सकते हैं. लेकिन कहीं कहीं उनके इस प्रयोग में उनसे चूक होती है. और उनकी कल्पनाशीलता दर्शकों को बोर करती है. हालांकि फिल्म की कहानी जिस तरह परत दर परत खुलती जाती है, वह कुछ ऐसा ही प्रतीत होती है कि हमारे सामने किसी कॉमिक्स के अगले पन्ने पलटे जा रहे हों. बहरहाल तीन थे भाई तीन भाईयों की कहानी है. हैप्पी, फैेंसी और जिक्सी. तीनों भाईयों अपनी अपनी जिंदगी से नाखुश हैं. चूंकि उनके सिर से बचपन में ही पापा का साया उठ जाता है. दादाजी उनके सहारे बनते हैं. फिल्म में दादाजी की एक सशक्त भूमिका दर्शाई गयी है. तीनों भाईयों को वे दादाजी नापसंद हैं. बचपन में ही अपने दादाजी से विद्रोह करके जिक्सी बड़ा भाई शहर चला जाता है. वहां छोटा सा व्यापार शुरू करता है, उनकी तीन बेटियां हैं.तीनों हद से अधिक मोटी. जिस वजह से उनकी शादी नहीं हो पाती. दूसरी तरफ हैप्पी ने डेंटल की पढ़ाई की है और डेंटिस्ट है. लेकिन वह इसमें पारंगत नहीं. तीसरा हॉलीवुड का स्टार बनना चाहता है. लेकिन अभिनय का उसे ककहरा भी नहीं आता. मतलब तीनों की जिंदगी में सपने हैं, लेकिन उन सपनों को पूरा कर पाने का खास जज्बा नहीं. तीनों एक दूसरे से नफरत करते हैं और एक दूसरे की शक्ल नहीं देखना चाहते. लेकिन हालात उन्हें एक दूसरे से मिलवाने पर मजबूर करती है. बचपन में सही परवरिश न मिल पाने की वजह से वे दिशाहीन हैं. ऐसे में उन्हें अचानक पता चलता है कि दादाजी ने उनके लिए वसीहत छोड़ रखी है. उस वसीहत के अनुसार तीनों अलग हुए भाईयों को एक पहाड़ी के घर पर लगातार तीन साल दो दिनों तक साथ बिताना है. तभी वसीहत के पैसे उन्हें दिये जायेंगे. वसीहत और पैसे की चाहत में तीनों भाई इस शर्त को पूरी करने में जुट जाते हैं. इसी दौरान उन्हें अपने आपसी प्रेम का एहसास होता है. रोचक तरीके से तीनों भाई एक होकर अपने सामने आयी परेशानियों को दरकिनार करते जाते हैं. गौर करें तो निदर्ेशक ओम प्रकाश मेहरा ने अपनी फिल्म दिल्ली 6 में भी काले बंदर के रूप में समाज के नकारात्मक तबके की तसवीर प्रस्तुत की थी. कहीं न कहीं उनकी छवि इस फिल्म में भी नजर आयी है. फिल्म में रावण को बाहुबलि के रूप में प्रदर्शित किया गया है और उत्पाति बंदर को दुश्मन के रूप में. राकेश की संगत में निस्ंसंदेह मृगदीप को भी रामलीला से अति प्रेम सा हो गया है. बहरहाल फिल्म की कहानी अंतराल से पहले दर्शकों को बांध पाने समर्थ नहीं होती. कई जगहों पर फिल्म के दृश्य अति बनावटी नजर आये हैं. हालांकि लोगों को फिल्म के शीर्षक और गीत-संगीत सुन कर यह उम्मीद की जा रही थी फिल्म में हास्य और कहानी का भरपूर मिश्रण देखने को मिलेगा. लेकिन वह ्मिश्रण फिल्म में लोप है. कहानी कहीं कहीं बहुत उबाऊ सी लगती है. लेकिन एक बात माकर्े की है कि किरदारों के चयन में निदर्ेशक ने पूरी तन्मयता बरती है. ओम पुरी जिक्सी के रूप में बिल्कुल उम्दा अभिनेता के रूप में निखर कर सामने आये हैं. दीपक डोबरियाल ने फिल्म तनु वेड्स मनु के पप्पी के बाद इस फिल्म में हैप्पी के रूप में लोगों को हैप्पी होने का मौका दिया है. श्रेयस को हास्य अभिनय की तरफ रुख करना चाहिए, चूंकि वे हास्य करते हुए सहज नजर आते हैं. रागिनी खन्ना को फिल्म में अभिनय के लिए खास अवसर नहीं दिये गये हैं. अंततः गौर करें तो अपने बच्चों और परिवार के साथ एक बार फिर से अगर आपकी इच्छा है कि उन किस्से कहानियों के दौर को लौटना चाहिए तो फिल्म एक बार देखी जा सकती है.


एक जगह जब जमा हो तीनों

भले ही आम जिंदगी में हम इस जुमले पर विश्वास करते हों कि तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा. लेकिन हिंदी सिनेमा के इतिहास से लेकर हाल के कुछ वर्षों की फिल्मों पर गौर करें तो प्रायः निदर्ेशकों की तिगड़ियों ने कमाल कर दिखाया है. इस शुक्रवार रिलीज हुई फिल्म तीन थे भाई से भी कुछ ऐसी ही उम्मीदें हैं. अनुप्रिया अनंत की रिपोर्ट

हिंदी सिनेमा जगत में शुरुआती दौर से ही मल्टी स्टारर फिल्मों पर जोर दिया जाता रहा है. एक साथ लगभग दो या तीन नायकों की फिल्में देखने में दर्शकों ने हमेशा रुचि दिखाई है. शायद यही वजह रही है कि निदर्ेशकों ने भी एक साथ दो या तीन नायकों या नायिकाओं को फिल्मों में दोहराया है. खासतौर से गौर करें तो भले ही हम आम जीवन में मानते हों कि तीन नंबर भाग्यशाली नहीं होता. लेकिन हिंदी सिनेमा में हमेशा तीन नंबरी ने अपना कमाल दिखाया है.

अमर, अकबर, एंथनी

वर्ष 1977 में रिलीज हुई फिल्म अमर , अकबर, एंथनी की कहानी तीन नायकों पर थी. अमिताभ बच्चन, ऋषि कपूर और विनोद खन्ना ने इसमें अहम भूमिका निभाई थी. इसमें तीन नायिकाएं भी थीं.कहानी इतनी रोचक. कि आज भी दर्शक इसे देखना पसंद करते हैं.

हेरा-फेरी , फिर हेरा-फेरी

प्रियदर्शन द्वारा बनायी गयी फिल्म, हेरा-फेरी में भी तीन दोस्तों की कहानी होती है. इसमें मुख्य भूमिकाओं में परेश रावल, अक्षय कुमार और सुनील शेट्ठी नजर आये थे. फिल्म इतनी लोकप्रिय रही कि फिर हेरा फेरी के रूप में यह सीक्वेल बन कर दर्शकों के सामने आयी.

तीन थे भाई

इस शुक्रवार रिलीज हुई फिल्म तीन थे भाई में भी ओमपुरी, श्रेयस तलपड़े और दीपक डोबरियाल नजर आ रहे हैं. फिल्म की कहानी वसीयत पर है.

थ्री इडियट्स

सुपरहिट रही फिल्म 3 इडियट्स में भी तीन दोस्तों की कहानी होती है. यह फिल्म अब तक की पसंदीदा फिल्मों में सर्वोपरि मानी गयी है. इसमें मुख्य भूमिकाओं में आमिर खान, आर माधवन और शरमन जोशी नजर आये हैं.

हम

फिल्म हम भी तीन भाईयों की कहानी है. इस फिल्म में अमिताभ बच्चन, रजनीकांत और गोविंदा ने मुख्य भूमिका निभाई है.

ओम जय जगदीश

फिल्म ओम जय जगदीश में अनिल कपूर, फरदीन खान और अभिषेक ने तीन भाईयों की भूमिका निभाई है.लेकिन फिल्म हिट न हो सकी.

चलती का नाम गाड़ी

किशोर कुमार, अशोक कुमार और अनूप कुमार वास्तविक जिंदगी के भी तीनों भाईयों ने इस फिल्म में भी भाई की भूमिका निभाई है. फिल्म सुपरहिट रही थी.

यमला पगला दीवाना

हाल ही में रिलीज हुई फिल्म यमला पगला दीवाना में भी दर्शकों ने तीनों देओल धमर्ेंद्र, बॉबी और सनी की तिगड़ी को कमाल करते देखा और बेहद पसंद भी किया.

यादों की बारात

फिल्म यादों की बारात में भी दर्शकों ने तीन किरदारों को एक साथ अभिनय करते देखा. तीनों भाई बिछड़ जाते हैं. फिर हालात उन्हें एक कर देती है.

उम्मीद की रोशनी से जगमगाती मोमबत्ती


गर हम सिनेमा के इतिहास को खंगालें तो हम महसूस करेंगे कि किस तरह कभी छोटी फिल्मों से सिनेमा की शुरुआत हुई थी. धीरे धीरे इसकी समय सीमा बढ़ाई गयी और फिर इसने 3 घंटे के सिनेमा का रूप लिया. लेकिन आज भी अगर आप गौर करें तो ऐसे कई निदर्ेशक हैं, जिन्होंने लघु फिल्मों के माध्यम से एक पहचान कायम की है. आज के दौर में मुंबई, गुजरात, राजस्थान, कोलकाता में कई युवा निदर्ेशक हैं जो लघु फिल्मों के माध्यम से अलग तरह की कहानी कह रहे हैं. पुणे फिल्म संस्थान और सत्यजीत फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान के छात्र इससे ही अपनी फिल्मी करियर की शुरुआत करते हैं. इसी क्रम में पुनीत प्रकाश की फिल्म लघु फिल्म मोमबत्ती एक उल्लेखनीय फिल्म के रूप में लोगों के सामने आती है. फिल्म की कहानी नक्सली हमले में मारे गये उत्तर भारत के सुदूर गांव के एक गुमनाम शहीद पुलिसकर्मी के 10 साल के बेटे पिंटू के इर्द-गिर्द घूमती है. वह अपने पिता को एक हीरो की नजर से देखता है. पिता की शहादत की वजह से टूट चुका पिंटू मुंबई के आतंकी हमलों के शहीदों की स्मृति में आयोजित कार्यक्रमों को देख कर यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि आखिर उसके पिता भी तो नक्सली हमले में शहीद हुए हैं. फिर उनकी इतनी अनदेखी क्यों की जा रही है. उदास पिंटू अपने स्कूल जाता है और मास्टर साहब से पूछता है कि शहीद क्या होता है. उनके जवाब को सुन कर पिंटू के बाल मन में पूरी तरह झकझोर कर रख देता है. अपने पिता की स्मृति में वह जो कुछ करता है. वही इस फिल्म की आत्मा है. इस फिल्म में वाकई शहीदों के परिवार की वास्तविकता को दर्शाया है. बाल कलाकार अविनाश नायर ने पिंटू की भूमिका बखूबी निभाई है. अपने अभिनय से अविनाश ने यह साबित किया है कि इतनी कम उम्र में कहानी और पिंटू के चरित्र को लेकर उसी समझ काफी परिपक्व है. अविनाश का दमदार अभिनय सभी दर्शकों के अंदर एक नयी ऊर्जा का संचार करता है. पिंटू की मां की भूमिका पीपली लाइव की धनिया उर्फ शालिनी वत्स ने निभाया है. मास्टर साहब के रूप में चेतन पंडित नजर आ रहे हैं. चेतन पंडित एनएसडी के छात्र रह चुके हैं और राजनीति, अपहरण, वेडनेस डे जैसी कई फिल्मों में इन्होंने अभिनय किया है. गौरतलब है कि फिल्म के युवा निर्माता-निदर्ेशक पुनीत प्रकाश दिल्ली विश्वविद्यालय के ग्रेजुएट रहे हैं और उन्होंने न्यूयॉर्क फिल्म अकादमी लॉस एंजिल्स से फिल्म निर्माण का अध्ययन किया है. उन्होंने अब तक कुल सात लघु फिल्मों और एक वृतचित्र का निर्माण किया है. पुनीत ने फिल्म कैश में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. छोटे परदे पर भी उन्होंने कई शो कन्यादान, यू-टर्न में कार्यकारी निर्माता के रूप में काम किया है. पुनीत बताते हैं कि उनके मन में मोमबत्ती का विचार तब आया जब उन्होंने मुंबई के आतंकी हमलों के शहीदों की स्मृति में महानगरों में मोमबत्तियां जला कर लोगों को शोक सभाएं करते देखा. गौरतलब है कि फिल्म को कई फिल्मोत्सव में भी भेजने की योजनाएं बनाई जा रही हैं. अब तक जिन लोगों ने भी फिल्म देखी है. वे इसे विषयपरक फिल्म की उपाधि दे रहे हैं.

हिंदी सिनेमा का सबसे स्वर्णिम दौर है ः रमेश सिप्पी



हिंदी सिनेमा ने अपने जीवन के 98 वर्ष को पूरी जिंदादिली से जिया है. बदलते दौर के साथ, सिनेमा के लोग बदले, सिनेमा की सोच बदली, सिनेमा की पीढ़ी भी. लेकिन इसके बावजूद इतिहास हमेशा इतिहास ही रचता है. चर्चिल के कथनों के अनुसार हमें अगर अपने भविष्य की चिंता है तो हमें बार-बार अपने अतीत को खंगालने की जरूरत है. हिंदी सिनेमा का भविष्य भी उसके इतिहास में है. और उसी इतिहास में ऐतिहासिक कीर्तमान है फिल्म शोले और इसके निदर्ेशक रमेश सिप्पी. इतने वर्षों के बावजूद अब तक हास्य-व्यंग्यों में रियलिटी शोज में जितने रीमेक फिल्म शोले के रूप में लोगों के सामने आये हैं.किसी और फिल्म के नहीं. आज भी उसकी लोकप्रियता कम नहीं हुई है. लेकिन रमेश उस दौर के उन निदर्ेशकों में से हैं जो नयी पीढ़ी के युवा दर्शकों का स्वागत करते हैं. कुछ पुरानी यादें और उस दौर से वर्तमान दौर के सिनेमा के जुड़ते तार पर रमेश सिप्पी से अनुप्रिया ने विशेष बातचीत की...

अगर आपमें उमंग है. ललक है न तो आप जरूर कर सकते हैं. आप तो नयी पीढ़ी हैं. आप ही लोग तो भविष्य हैं. शोले जैसी ऐतिहासिक फिल्म के निदर्ेशक रमेश सिप्पी से रूबरू होने के साथ उनके यह शब्द कानों में पड़ते ही हर नयी युवा पीढ़ी को उमंग और ऊर्जा से भर देंगे. दरअसल, रमेश सिप्पी उन निदर्ेशकों में से हैं जो पुराने दौर के सिनेमा को साथ लेकर चलने की बात तो करते हैं लेकिन साथ ही वे नयी युवा पीढ़ी का भी तहे दिल से स्वागत करते हैं.

युवा पीढ़ी पर है पूरा भरोसा

बकौल रमेश...आज के दौर में सिनेमा में जिस तरह की फिल्में बन रही हैं और निदर्ेशक नये नये कंसेप्ट के साथ आ रहे हैं. मैं उनका स्वागत करता हूं. पिछले साल तो पूरी फौज ही नजर आयी और ऐसा लगा कि उन्होंने एक साथ हिंदी सिनेमा पर धावा बोला है. कि देखें हम सभी एक से बढ़ कर एक फिल्में लगातार आपके सामने लायेंगे. मुझे सच कहूं तो नयी पीढ़ी से बेहद उम्मीद है.

शोले की प्रासंगिकता

मैं मानता हूं कि दर्शक के मिजाज को समझना आज भी उतना ही कठिन है. जितना पहले कभी हुआ करता था. यह कह पाना बहुत मुश्किल है कि आज के दौर में अगर शोले बनती तो पसंद की जाती या नहीं. वैसे मैं मानता हूं कि शोले एक अपवाद थी. चूंकि आप गौर करें तो उसके बाद और भी फिल्में बनीं उस तरह की. लेकिन जिसने इतिहास बना दिया सो बना दिया. मैं मानता हूं कि अब दर्शकों के मिजाज में बदलाव आया है. वे अब अधिक बुध्दिजीवी हो गये हैं. माहौल बदला है. सोच बदली है तो जाहिर है नजरिया भी बदलेगा. तो हम यह नहीं कह सकते कि फिल्में अच्छी नहीं बन रहीं. या क्लाइमेक्स पहले की फिल्मों की तरह नहीं होता. दरअसल, अब हम सिनेमा को सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि एक उद्देश्य के रूप में भी देखने लगे हैं.लेकिन अगर मेरी राय पूछें तो हिंदी सिनेमा का स्वर्णिम दौर है. चूंकि यहां अब किसी परिवार का नहीं बल्कि परफॉरमेंस को तवज्जो दी जा रही है. उड़ान, तनु वेड़्स मनु, नो वन, बैंड बाजा जैसी फिल्में पसंद की जा रही हैं.

बेटे रोहन से उम्मीदें

मैं फिल्मों में इसलिए आया. चूंकि पिताजी थे. शुरू से उनके साथ सेट पर जाना. काम देखना, तो कैमरे से प्यार सा हो गया. लेकिन मेरे बच्चों के साथ वह बात नहीं थी. मेरे चार बच्चों में किसी ने इस क्षेत्र में कदम नहीं रखा. लेकिन रोहन विदेश गये, वहां पढ़ाई कि लेकिन उनका मन यही रह गया सिनेमा में. वापस आये और बस काम से जुड़ गये. मुझे रोहन से उम्मीदें हैं.वे अच्छा काम कर रहे हैं. बारीकियां हैं उनके काम में. खास बात यह है कि वह अपने निदर्ेशन में नये नये आइडिया को लाने की कोशिश करते हैं. दृश्यों को खूबसूरती से पिरोते हैं. स्क्रिप्ट पर अच्छा काम करते हैं और वन लाइनर बेहद अच्छा क्रियेट करते हैं. किरदार दर्शकों के सामने किस रूप में आयेगा. यह कल्पना अच्छी करते हैं. वह मुझसे जहां सीख लेना चाहते हैं. मैं देता हूं. दम मारो दम के रूप में अच्छी फिल्म बनाई है. उम्मीद है दर्शकों को पसंद आयेगी.

शोले का पसंदीदा सीन

फिल्म शोले में ऐसे कई दृश्य हैं, जो मेरे पसंदीदा दृश्य हैं, लेकिन वह सीन मुझे बेहद मार्मिक लगता है जब संजीव कुमार यानी ठाकुर वापस गांव आता है. गांव की तबाही देखता है और अपने घर पर अपनी विधवा बहू को देखता है. इसके अलावा फिल्म के संवाद मुझे अतिप्रिय हैं और शोले की वजह से ही मुझे धमर्ेंद्र और अमिताभ जैसे अच्छे कलाकार मिले. दर्शकों को गब्बर मिला और मेरे निदर्ेशक बनने का ख्वाब पूरा हुआ.

पसंदीदा फिल्म शक्ति

फिल्म शक्ति मेरी पसंदीदा फिल्म है. चूंकि इस फिल्म में मुझे मेरी प्रिय कलाकार स्मिता पाटिल के साथ काम करने का मौका मिला. इस फिल्म में अमिताभ और स्मिता थे. वह एक पीढ़ी थी और अब दूसरी पीढ़ी रोहन, अभिषेक और प्रतीक बब्बर दम मारो दम के माध्यम से आप सबके सामने होंगे. तो दो पीढ़ियों को जोड़ती यह फिल्में मेरे लिए हमेशा महत्वपूर्ण रहेंगी.

हल्ला बोल


हल्ला बोल

भ्रष्टाचार के विरुध्द अन्ना हजारे ने पूरे देश में क्रांति की एक नयी अलख जगा दी है, जिसने पूरे भारत को एकजुट कर दिया. जब जब आंदोलन हुए, आम लोगों के साथ-साथ सिनेमा के निदर्ेशकों को भी इन विषयों ने प्रभावित किया. फिर चाहे वह मौजूदा दौर हो या दशक पहले की बात. श्याम बेनेगल की वेलडन अब्बा से दशकों पुरानी फिल्म इंकलाब तक बनी कई फिल्मों में भ्रष्टाचार का विरोध अपने -अपने अंदाज में किया गया है. अगर गौर करे तो रूपहले परदे पर क्रांति हमेशा दो रूपों में प्रस्तुत की गयी है. एक हिंसा का रास्ता तो दूसरा अहिंसा का मार्ग. हिंदी सिनेमा में आंदोलन के उन सभी स्वरूपों को प्रस्तुत करती उर्मिला कोरी की रिपोर्ट

मार्क हरमन द्वारा बनाई गयी फिल्म द मैन इन स्टि्रपल्ड पायजामा में खानबदोशों के साथ दूसरे देश में हो रही बदसलूकियों को बेहतरीन तरीके से फिल्माया गया है. फिल्म में अंत में किरदारों ने फिर उस भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन का बिगुल बजाया. पूरे विश्व में जब जब आंदोलन हुए हैं, उन्हें सिनेमा के स्वरूप से दर्शकों तक पहुंचाने की पूरी कोशिश की जाती रही हैं. अगर आप गौर करें तो भले ही इतिहास की किताबों ने आम लोगों को कई आंदोलन की जानकारी दी हो. लेकिन उसका जीता जागता स्वरूप सिनेमा के माध्यम से ही लोगों तक पहुंचाया जाता रहा है. जापान, रूस, जर्मनी व ईरान में ऐसी कई फिल्में बनाई जाती रही हैं, जिनसे दर्शकों को उस दौर में हो रहे आंदोलन की जानकारी मिल सके. इसी क्रम में भारतीय सिनेमा ने भी अहम भूमिका निभाई है. न सिर्फ स्वतंत्रता आंदोलन के स्वरूप को बल्कि और भी कई अन्य मायनों से आंदोलन की तसवीर प्रस्तुत की जाती रही है. कभी नायक के रूप में एक दिन का सीएम हमें नजर आता है तो कभी वेलडन अब्बा के अरमान अली के रूप में. रूप चाहे जो भी, नायक के माध्यम से ही सही एक सार्थक छवि प्रस्तुत की जाती रही है.

मैं आजाद हूंः अमिताभ बच्चन अभिनीत यह फिल्म आम आदमी के हीरो की कहानी बयां करता है. इस फिल्म में आजाद की मौत के बाद आम लोगों में क्रांति की ज्योत को कैंडल मार्च के जरिये दिखाया गया था.

क्रांतिवीरः प्रताप नारायण तिलक ( नाना पाटेकर) के क्रांति की कहानी क्रंातिवीर है. अपने आसपास हो रहे अन्याय के विरोध में वह हथियार उठा लेता है, बाद में उसकी इस क्रांति से आम आदमी भी जुड़ जाते हैं.

गुलामः सन 1998 में रिलीज हुई आमिर खान की फिल्म गुलाम टप्पोरी सिद्दू की कहानी है. बाक्सिंग चैंपियन रोनी का पूरे इलाके पर एकछत्र राज्य है. वह वसूली करता हैं लोगों को मारता है लेकिन उसके खिलाफ किसी को कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं होती है लेकिन सिध्दू उसे चैलेंज करता है. सिध्दू का चैलेंज आम लोग में भी एक जोश भरता है.

दिल हैं हिंदुस्तानीः चैनल की टीआरपी भूल जब दो पत्रकार इंसाफ की लडाई में उतरते हैं तो पूरा देश एकजुट होकर उनका साथ देता है. इसी की कहानी फिर भी दिल हैं हिंदुस्तानी है. अजीज मिर्जा निदर्ेशित इस फिल्म में जुही और शाहरुख की अहम भूमिका थी.

घातकः राजकुमार संतोषी की यह फिल्म कात्या भाई की अराजकता के खिलाफ लोहा लेते एक अकेले इंसान की कहानी हैं जो अंत में एक जन आंदोलन तक पहुंच जाती है. फिल्म काफी मारधाड से भरी है. फिल्म का डायलाग जिसके पास गुर्दा है उसे ही जीने का अधिकार है. कहीं न कहीं से इस फिल्म के स्वरूप को बयां कर देता है.

चिंगारीः गांव के मंदिर का पुजारी भुवन पंडा,जो अपने ताकत का इस्तेमाल सिर्फ गांव वालों को शोषित करने के लिए करता है. एक के बाद एक कुकृत्यों से गांव में नफरत की ऐसी चिंगारी उठती हैं जो भुवन पंडा को जला देती है. कल्पना लाजमी निदर्ेशित यह फिल्म भूपेन हजारिका द्वारा लिखे गयी सच्ची कहानी पर आधारित थी.

रंग दे बसंतीः राकेश ओम प्रकाश मेहरा की यह फिल्म अहिंसा और हिंसा दोनों तरह की आंदोलन की बात करती हैं. फिल्म में कैप्टन की मौत के बाद कैंडल मार्च कर जहां आमिर की टीम इंसाफ की गुहार लगाती नजर आती हैं वही अनदेखी पर वह गुनहगारों को सजा दिलाने के लिए हाथ में बंदूक तक थाम लेता है.

नायकः भष्ट नेताओं के बीच एक सच्चे नेता को राजनीति में लाने के लिए एक अनोखा जन आंदोलन इस फिल्म में नजर आया था. इस फिल्म के निदर्ेशक शंकर थे.

गंगाजलः प्रकाश झा की फिल्म गंगाजल अपराधी प्रवृति के राजनेताओं की कहानी कहता है. जब पुलिस कानून के जरिये उन्हें सजा नहीं दे पाती हैं तो वे एसिड के जरिये उन्हें सजा देते हैं. अपराधी प्रवृति के लोगों से खुद को बचाने के लिए इस गंगाजल को आम आदमी भी अपना लेता हैं. आम आदमी के इसी आक्रोश की कहानी गंगाजल है.

हल्ला बोलः साल 2008 में रिलीज हुई राजकुमार संतोषी की यह फिल्म एक साथ कई मुद्दों को छूती नजर आयी. जेसिका लाल हत्याकंाड , नर्मदा बचाओं से अभिनेता आमिर खान का जुड़ाव, जन नाटय मंच के लीडर सफदर हाशमी की हत्या से लेकर भ्रष्टाचार के खिलाफ आम जनता के एकजुट होकर आंदोलन करने की बात भी यह फिल्म सामने लाता है. इस फिल्म में जन आंदोलन को अहिंसात्मक तरीके से दिखाया गया है.

नो वन किल्ड जेसिकाः हालिया रिलीज हुई राजकुमार गुप्ता की फिल्म नो वन किल्ड जेसिका कहीं न कहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ अहिंसक आंदोलन की कहानी कहता है. एक पैक शराब के लिए रसूख वाला इंसान किसी का खून भरी पार्टी में कर देता है लेकिन उस घटना का कोई चश्मदीद नहीं होता है. जिस वजह से वह छूट जाता है. किस तरह एक पत्रकार की पहल पर यह मुद्दा जन आंदोलन का रूप ले लेता है. लोग सडको पर कैंडल मार्च करते हैं और अंत में गुनाहगार सलाखों के पीछे पहुंचा है. एक जन अंादोलन की सच्ची तस्वीर इस फिल्म में देखने को मिली है.

कोटेशन ः बोमेन ईरानी

वेलडन अब्बा हमेशा मेरी प्रिय फिल्म रहेगी. चूंकि इस फिल्म के माध्यम से लोगों के सामने एक सार्थक छवि प्रस्तुत की गयी है. और मुझे खुशी है कि आज अन्ना हजारे के रूप में दर्शक किसी वेलडन अब्बा के अरमान अली को ही देखेंगे जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने की कोशिश करता है.

बॉक्स में ः सिनेमा के वास्तविक अन्ना हजारे

फिल्म वेलडन अब्बा अगर आपने देखी तो आप इस बात की पुष्टि कर सकते हैं कि कैसे इस फिल्म में अरमान अली और उनकी बेटी मुस्कान ने अपने गांव में हो रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठायी और अपने चोरी किये गये बावरी को वापस लिया. फिल्म में अरमान अली भी अहिंसक रूप से अपने गांव की पंचायत को झकझोर देने में सफल हो जाते हैं. एक एक कर भ्रष्टाचार कर रहे सभी पुलिस, प्रशासन व व्यक्ति उस अरमान अली के कदम के सामने घुटने टेक देते हैं. आज के दौर में वह बी किसी आंदोलन से कम नहीं.

20110412

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ताकि वह उधार के सपने देखने या पूरा करने के लिए मजबूर न हो ः किरण राव



मैंने जब पहली बार आमिर से कहा कि मैं फिल्म बनाना चाहती हूं. तो उन्होंने मेरी बात अनसुनी कर दी थी. इसलिए नहीं कि उन्हें लगा कि अरे किरण फिल्म कैसे बना सकती है. इसलिए चूंकि उन्हें लगा कि अभी मैं बच्ची हूं. मुझे और सीखने की जरूरत है. लेकिन जब मैं टिकी रही. लगातार उनसे स्क्रिप्ट पर चर्चा करती रही, तो अंततः वह मान गये. दरअसल, इस बात की यहां चर्चा करने की वजह यही है कि आमिर की तरह ही कई लड़कियों को लोग उनकी शारीरिक बनावट पर आंक लेते हैं. मतलब मैं मिस्टर खान की बातों पर ऐतराज नहीं जता रही. खान का तो यह प्यार था कि उन्हें लगा कि अभी मैं बच्ची हूं और सीखना चाहिए. लेकिन अधिकतर लोगों की अवधारणा यही होती है कि अरे यह बच्ची सी दिखती है, क्या कर पायेगी. यह बात पुरुषों के संदर्भ में लागू नहीं होती. सिर्फ महिलाओं को ही फिर क्यूं टेकेन फॉर ग्रांटेड लिया जाता है. मैं बस अपनी बात रखना चाहती हूं कि महिलाओं को भी सबसे पहले एक मौके की तलाश होती है. उन्हें मौके दें और फिर देखें कि वह क्या कर सकती है. मेरा क्षेत्र सिनेमा है इसलिए मैं सिनेमा की बात करूंगी. बतौर महिला सिनेमा निदर्ेशक मैंने कभी कोई परेशानी नहीं झेली. लेकिन मुझसे हमेशा यह सवाल पूछा जाता है कि लोगों का महिला सिनेमा निदर्ेशकों के प्रति बर्ताव सही नहीं रहता. यह भी हो सकता है कि कहीं न कहीं आमिर खान का स्टारओरा मुझ पर हावी हो. और लोग इस वजह से बात न बिगाड़ते हों. लेकिन यह भी सच है कि आखिरकार जीत आपके टैलेंट की होती है. मैं जिस परिवार से संबध्द रखती हूं, वह स्वतंत्र सोच व विचारोंवाला है. मुझे अच्छी शिक्षा मिली. कभी परिवार में लड़के या लड़की में अंतर नहीं किया गया. लेकिन मैं अपने आधार पर पूरे भारत की महिला की स्थिति नहीं आंक सकती. अखबारों में पढ़ती रहती हूं.यह सच है कि अभी भी महिलाओं को कई गांवों, कई शहरों और खासतौर से आम मध्यम वर्गीय परिवार में भी कई तरह की परेशानियां झेलनी पड़ती हैं. मैंने अपनी फिल्म में यास्मीन के किरदार के माध्यम से उसे दर्शाने की कोशिश की है. इसलिए वह मेरा पसंदीदा किरदार भी है. जिस तरह फिल्म में वह बड़े महानगर आ जाती है लेकिन उसे अपने पति का सुख नहीं मिलता, वह दुखी रहती है फिर आत्महत्या कर लेती है. यह कहानी कई महिलाओं की हो सकती है. हमें यह भी जरूरी है कि सकारात्मक उपलब्धियों के साथ-साथ हम नकारात्मक पहलुओं पर भी गौर करें. मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूं कि अब अवसर का दायरा बढ़ा है. लड़कियां खुल कर अपनी आजादी का इस्तेमाल कर रही हैं. लेकिन उन्हें मेहनती बनना पड़ता है. लोगों की अवधारणा है कि अरे उसे तो काम मिल ही जायेगा. लड़की है. लेकिन मैं अगर अपनी बात करूं तो मैंने भी अपनी पहचान काम व मेहनत के बलबूते बनायी है. मैं 1998 में आयी थी दोबारा मुंबई. उस वक्त सिनेमा का ककहरा भी नहीं जानती थी. मैंने सिखना शुरू किया. कई विज्ञापन में काम किये. फिर सहायक निदर्ेशक बनी. मैंने अपने बलबूते 7 साल मेहनत की. आज लोगों को जरूर यह लगता है कि आमिर हैं तो किरण की फिल्म बनेगी हंी. लेकिन किसी ने कभी उन सात सालों के बारे में तो झांक कर नहीं देखा. सच यही है कि उन सात सालों ने मैंने बहुत कुछ सीखा है. और वही मेरे लिए जिंदगी की ट्रेनिंग भी है. एक लड़की और आत्मनिर्भर लड़की के रूप में मैंने कुछ इसी तरह जिंदगी जीना सीखा. मैं मानती हूं चाहे किसी भी उम्र की महिला हो. किसी भी इलाके की महिला हो. उसे बस थोड़े से सहयोग और प्रोत्साहन चाहिए. फिर वह कमाल कर सकती हैं. आज के दौर में मानती हूं कि एक लड़की के लिए सबसे जरूरी है कि वह आत्मनिर्भर बने और अपने दम पर पैसे भी कमाये. हर लड़की का यह सपना होता है कि वह अपने सपने खुद देखे और उसे पूरा करे. आप उसे मजबूर न करें कि उसको अपनी राह किस तरह तय करनी चाहिए. बात जहां तक सिनेमा में आने की है तब भी महिलाओं के आड़े न आयें कि उसे मॉडलिंग में नहीं जाना चाहिए.चूंकि यह क्षेत्र महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं. उसे सोचने व सच का सामना करने की ताकत तो दें. हम कैसे भूल जाते हैं कि फातिमा बेगम ही वह पहली महिला थी जिन्होंने 1926 के दौर में फिल्म बनायी. वह दौर तो महिलाओं को लेकर और संकीर्ण था. उन्हें उतनी स्वतंत्रता भी नहीं मिलती थी. लेकिन फिर भी फातिमा बेगम ने उस दौर में यह पहल की. उन्होंने महिलाओं को राह दिखायी कि आप भी कैमरे के पीछे कमाल दिखा सकते हैं. फरहा खान, रीमा कागती जैसी महिलाओं ने साबित किया कि कैसे शादी के बाद भी आप अपनी घर की जिम्मेदारियां निभाते हुए कैमरे के पीछे भी काम कर सकती हैं. फरहा घर पर तीन बच्चों को संभालती है. फिर ऑफिस का भी काम संभालती है. घर पर बच्चे उनके बच्चे हैं. ऑफिस में बच्चे उनका काम है. जिसके प्रति भी वह पूरी तरह समर्पित होकर काम करती है. यह संकेत है हमारी महिलाओं के स्वाभिमान व सारी जिम्मेदारियों को साथ निभाते हुए मुकाम हासिल करने की. गौर करें तो महिला निदर्ेशकों में वह खासियत है कि वह तीस मार खां जैसी मसाला फिल्में भी बना सकती हैं और टर्निंग 30 जैसी बोल्ड फिल्में भी. मैं मानती हूं कि हमें सिर्फ प्रोत्साहन चाहिए तो हम भी अपनी पहचान स्थापित कर सकते हैं.


ेएंड इट्स द क्वीज टाइम.



बजर पर हाथ. और वक्त समाप्ति की घोषणा. आइ एम सौरी. इट्स नॉट द राइट आनसर. यह सारे अल्फाज सुन कर निश्चित तौर पर आपको क्वीज टाइम के उस पुराने दौर या यूं कह लें दूरदर्शन के दौर की याद आ गयी होगी. रविवार का दिन. पूरे परिवार और अपने बच्चों के साथ माता-पिता क्वीज टाइम शो को पूरी तरह एंजॉय करते थे. सिध्दार्थ बसु, डेरक ओबरॉय और रोशन अब्बास जैसे क्वीज मास्टर कई तरह के क्वीज शो लेकर आते थे. बच्चों में खलबली मची रहती थी कि वह शो देखना ही है. चूंकि ऐसे शोज से बच्चों के साथ माता-पिता का भी ज्ञान बढ़ता था और लोग खुद को और ज्ञानी बनाने की कोशिश करते थे. लेकिन पिछले कई सालों से रविवार की सुबह इतनंी अच्छी नहीं होती कि आप टीवी के सामने बैठें और इस तरह के ज्ञानवर्ध्दक शोज या क्वीज शो देखा करें. लेकिन इस हफ्ते स्टार प्लस ने फिर से उस प्रथा को तोड़ते हुए फिर से एक बेहतरीन पहल की है. अनुपम खेर ने कदम बड़ाया है और डिस्कवर नामक शो की शुरुआत की है. यह एक क्वीज शो है. इस शो की खासियत यह है कि इस सो में स्लम के बच्चों को अत्यधिक रूप से शामिल किया जा रहा है. साथ ही इस बात का भी ख्याल रखा जा रहा है कि किस तरह बच्चों के लिए सवाल रोचक बनाये जायें ताकि वे उसे भरपूर जी सकें. न सिर्फ यह सोच कर कि वे बेहद कठिन हों. शो का फॉरमेंट रोचक रखा गया है और बेहद शालीन है. अनुपम सामान्य से ड्रेस में नजर आते हैं और बच्चे भी. कोई ताम-झाम नहीं है. न ही कोईन लाग-लपेट है. सबकुछ सीधा सपाट होते भी दर्शकों को पसंद आ रहा है. अनुपम खेर ने अपने इस सो क लांचिंग के दौरान बातचीत में कहा था कि वे कोई ताम झाम नहीं चाहते. बस चाहते हैं कि नयी पीढ़ी इसे समझने की कोशिश करे कि हमारा भारत क्या है. हम सामान्य से सवाल पूछेंगे जो भारत के बारे में होगा. यह बहुत जरूरी है कि बच्चे अपने लोगों के बारे में जानें. न कि सिर्फ हम यह मान कर बैठें कि हमें सिर्फ नयी चीजें जानने की जरूरत है. हमारे लिए यह बेहद जरूरी है कि हम नयी पीढ़ी को पुरानी चीजों की भी पहचान कराएं. इसी उम्मीद से हमने इस शो की शुरुआत की. दरअसल, आज के दौर में जब दादागिरी, बिग स्वीच, मॉम एक्सचेंज व कई रियलिटी शोज जो सिर्फ बच्चों को जिंदगी में रफ एंड टफ बनाने की कोशिश कर रहे होते हैं. ऐस में अगर कोई डिस्कवर इंडिया की तरह शो की शुरुआत होती है तो ऐसे शो की प्रशंसा की जानी चाहिए. पिछले कई सालों से टेलीविजन पर इस तरह के शोज का अभाव है. कई वर्षों तक डेरेक इस तरह के शोज लेकर सोनी टीवी पर आये थे. जो काफी लोकप्रिय रहा. लंबे समय तक चला ता. लेकिन अचानक ऐसे सारे शोज बिल्कपुल खो चुके थे. जिनकी शुरुआत फिर से हुई है और यह एक बेहतर संकेत है.

20110411

हिंदी सिनेमा जगत की खूबसूरत-सी किताब ः माधुरी


वे जब बोलती हैं तो सिर्फ उनकी जुबां नहीं उनकी आंखें भी बोलती हैं. वह जब नृत्य करती हैं तो उनकी ताल से ताल मिलाने में उनकी निगाहें व चेहरे की भाव-भंगिमाएं भी गुरेज नहीं करती. वे भी उनके साथ थिरकने लगती हैं. वे जब अभिनय करती हैं तो दीदी के देवर के साथ-साथ दर्शकों को भी दीवाना बना दिया. वे अब फिल्मों में बतौर अभिनेत्री नजर नहीं आती. लेकिन इसके बावजूद आज भी उनकी अदाकारी, शोख-अदाओं व उनकी खूबसूरती का कायल सारा जमाना है.

वे अपने हर काम को संजीदगी से लेती हैं. इतने सालों के बावजूद इन दिनों जब वह सोनी टीवी के शो में जज की भूमिका निभा रही हैं. आज भी वह वक्त की उतनी ही पाबंद हैं. वे स्वीकारती हैं कि एक अभिनेत्री के लिए अभिनय से बढ़ कर कुछ नहीं होता.

माधुरी, कभी अभिनय को मिस नहीं करती?

आप एक अभिनेत्री से ऐसा प्रश्न पूछ रही हैं. निस्संदेह करती हूं. मैंने बेहद कम उम्र से कैमरे से दोस्ती कर ली थी. हर वक्त कैमरे के सामने तरह-तरह के चेहरे बनाना, अभिनय करना, संवाद कहना. सबकुछ बेहद मिस करती हूं. खासतौर से अभिनय को तो बेहद. हां, सच है कि अब अपनी वास्तविक जिंदगी में बहुत व्यस्त हो चुकी हूं. लेकिन फिर भी अभिनय मेरे जीवन का अनमोल तोहफा है और इसे खुद से कभी अलग नहीं कर पाऊंगी.

अपनी व्यस्तताओं में कितना ध्यान दे पाती हैं इस कला की ओर. नृत्य-अभ्यास का भी वक्त मुश्किल से निकाल पाती होंगी अब तो?

नहीं ऐसा नहीं है. मुझे जब भी वक्त मिलता है मैं नृत्य का अभ्यास करती हूं. इसे कैसे छोड़ सकती हूं. घर पर जब कोई नहीं होता तो मैं अपनी फिल्मों के गाने पर डांस कर लेती हूं.हां, यह जरूर है कि वहां कैमरा नहीं होता. तो बस अपनी ही धुन में घर के बल्बों को ही अपना कैमरा समझ लेती हूं.

आपने बॉलीवुड से जिस वक्त विराम लिया. उस वक्त आपको ऐसा नहीं लगा कि मैं एक जिंदगी पाने के लिए एक जिंदगी छोड़ने जा रही हूं?

आप जिंदगी में सबकुछ हासिल नहीं कर सकते. और जो हासिल कर ले. वे बेहद लकी होते हैं. मैंने लकी रही कि मुझे दर्शकों का प्यार भी मिला और परिवार का सहयोग भी. मैंने हिंदी सिनेमा में लंबे अरसे तक काम किया. हर तरह के किरदार निभाये. अब बारी थी कि असल जिंदगी में किरदार निभाये जायें. सो मुझे इसका कोई अफसोस नहीं हुआ. मैं हमेशा कहती हूं कि आपको जिंदगी में संतुष्ट होना बेहद जरूरी है. एक सीमा बांधें. मुझे यही चाहिए. इतना ही चाहिए. फिर परिवार से बड़ा सुख और क्या होता है.

आपका अब तक पसंदीदा किरदार कौन सा रहा.

मुझे अपना किरदार राम लखन में भी बेहद पसंद आया था और साजन फिल्म भी मेरे बेहद करीब है. लेकिन हम आपके हैं कौन को मैं चाहे कितनी भी बार देखूं मैं भूल नहीं पाती. सबसे फेवरिट है वह मेरे लिए. हां, यह अलग बात है कि अपनी शादी में मैंने वैसी मस्ती नहीं की.

शुरुआती दौर में जब आप फिल्मों में आयीं और कुछ सालों बाद कई बदलाव आये थे. मसलन मेकअप, संवादों में तो उन अनुभवों को सांझा करें.

हां, बिल्कुल बदलाव आये थे. खासतौर से मेकअप व फैशन में बेहद बदलाव आये थे. आप गौर करें तो साजन फिल्म में जिस तरह से हमारा मेकअप किया गया था. वह बाद में आउट ऑफ फैशन हो गया. अगर मैं वैसे मेकअप करना शुरू कर दूं तो सभी कहेंगे कि माधुरी के पास सेंस नहीं है. लेकिन तभी लड़कियों को वही अंदाज पसंद आया था. तो निस्संदेह हर दौर में इसमें बदलाव तो होते रहे हैं. बाद की फिल्मों में बहुत लंबे और इमोशनल संवादों की कमी नजर आती थी.

इतने सालों के बावजूद पूरी दुनिया आपके नृत्य व अदाकारी की कायल है.

मैं मानती हूं कि मैं एक अच्छी डांसर बन पायी. यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है. बचपन से ही मैं डांस करती रहती थी. आइने के सामने. दरअसल, उस दौर में वैसे गीत भी बनते थे. जिन पर बेहतरीन डांस परफॉरमेंस दिये जा सकते थे. अच्छा लगता है कि अब जबकि मैं बहुत सक्रिय नहीं हिंदी सिनेमा जगत में . िफर भी दर्शकों का प्यार मिलता रहता है.

आपके अनुसार एक अच्छे डांसर की सबसे खास बात क्या होती है?

उसके चेहरे की भाव-भंगिमाएं. जब आप डांस करें तो आपका पूरा शरीर भी साथ में नृत्य करे. उसमें वह लचक नजर आये. खूबसूरती नजर आये. ऐसा महसूस हो कि आप दिल से नृत्य कर रहे हैं.

इन दिनों आपको बॉलीवुड में सबसे अधिक कौन-कौन से कलाकारों में नृत्य की संभावना दिखती है

मुझे रणबीर कपूर पसंद हैं और अभिनेत्रियों में ऐश्वर्या और करिश्मा मेरी हमेशा से पसंदीदा डांसर रही हैं. पुराने दौर की बात करें तो शम्मी कपूरजी हमेशा दिल के करीब हैं. उनसे बेहतरीन डांसर तो मैंने आज तक नहीं देखा. वह खुद अपने अंदाज में डांस करते थे.

विद्या बालन को आप बेहद पसंद करती हैं?

हां, विद्या बालन की सबसे अच्छी बात मुझे यह लगती है कि वे अपने अभिनय में बहुत भारतीयता व मौलिकता प्रदान करती हैं, उनकी मुस्कान अच्छी है और वे भारतीय परिधानों को अच्छे तरीके से होल्ड करती हैं. मैंने उनकी फिल्म इश्किया देखी है और उनमें बहुत सारी संभावनाएं नजर आती हैं.

झलक दिखला जा का अनुभव कैसा रहा.

बहुत अच्छा. बहुत दिनों बाद अपने घर लौटने का मौका मिला. बहुत कुछ बदल गया है. लेकिन अच्छा लगता है कि मेरे लिए लोगों का प्यार अब तक वही है. लोग अब भी माधुरी से मिलने के लिए बेताब हैं. उनकी बेताबी मेरे लिए जड़ीबुटी है. वरना, इस दुनिया में लोग हमेशा नये चहरे की ही तलाश करते हैं. ऐसे में मैं सबके दिल के करीब हूं. झलक से कई बेहतरीन टैलेंट से मिलने का मौका मिला. उन्हें देख कर लगा कि छोटे परदे पर भी टैलेंट की कमी नहीं. खासतौर से सूशांत सिंह का नृत्य मुझे बेहद पसंद है.

बच्चे कहें कि उन्हें अभिनय के क्षेत्र में आना है तो...

हंसते हुए तो कहूंगी कि बेटा धक धक पर डांस करो...हा हा हा. अभी तो वे बेहद छोटे हैं. चाहूंगी कि वे इससे जुड़े रहें और अपने मन मुताबिक कला को अपनाएं.

फूड चैनल की एंबैसेडर बनने की खास वजह.

मेरे पति और मैं खाने के बेहद शौकीन हैं.सो, हम दोनों को इसी बहाने कई तरह के नये डिश बनाने के तौर-तरीके आ जायेंगे. फूड चैनल का प्रस्ताव आते हीं मैंने खुद में बेहद फ्रेश फ्रेश महसूस किया. तो सोचा कि इसमें हर्ज ही क्या है.

आपके कुछ पसंदीदा गीत व उपाधि जो अब तक आपके दर्शकों ने आपको दिये

धक धक गर्ल व एक दो तीन गर्ल की उपाधि हमेशा करीब रहेंगे दिल के. गीतों में तू शायर है, हम आपके हैं कौन के गीत, दिल तो पागल है. हमेशा करीब रहेंगे. बिरजू महाराज से जुड़ने का मौका देवदास के गीत मार डाला से मिला. सो, उसकी तूलना अन्य किसी गीत से नहीं कर सकती.

सूरज बड़जात्या ः निदर्ेशक

संजीदगी बरकरार रहेगी माधुरी की

हम आपके हैं कौन माधुरी की पसंदीदा फिल्म रही है. और हमारी भी. हमारे परिवार ने हमेशा दर्शकों के लिए ऐसी फिल्में बनाने का मौका दिया है. जिसमें परिवार पूरी तरह घुलमिल सके. सच कहूं तो हम आपके हैं कौन हर परिवार की कहानी थी. ऐसे में हमारा सौभाग्य था कि माधुरी ने फिल्म के लिए हां कही थी. फिल्म में उन्होंने चुलबुला किरदार भी निभाया था और एक गंभीर किरदार भी. लेकिन दोनों ही रूपों में उनका गजब का सामंजस्य था. वह तालमेल वह अपने नृत्य के साथ भी जारी रखती थी. वे संजीदा अभिनेत्री हैं. और हमेशा उनकी संजीदगी यूं ही बरकरार रहेगी.

उनके लिए तो बस परफेक्ट ः सरोज खान

माधुरी और श्रीदेवी की मैं बहुत बड़ी फैन हूं. सभी जानते हैं. वह मेरे लिए मेरी शिष्य कम. बेटियां अधिक हैं. माधुरी को किसी भी स्टेप्स को सिखने में वक्त नहीं लगता था. दरअसल, वह डांस को पूरी तरह एंजॉय करती हैं. यही वजह है कि उनके हर टेक पर मैं परफेक्ट कहे बिना नहीं रह पाती थी.

सेट पर भी वह दीदी ही बोला करती थी ः रेणुका सहाणे

कई सालों के बाद हमारी मुलाकात झलक के सेट पर हुई थी. हमने हम आपके हैं कौन के कई दृश्यों के बारे में चर्चा की थी. मुझे याद है जब हम दीदी तेरा देवर दीवाना की शूटिंग कर रहे थे. उस वक्त का माहौल बिल्कुल घरेलू सा हो गया था. माधुरी ने मुझसे कहा था कि दीदी काश मेरी शादी में भी यह सब हो जाये तो कितना मजा आयेगा न.

देवदास का वह गीत नहीं भूल सकता ः शाहरुख खान

उस वक्त जब फिल्म देवदास की शूटिंग हो रही थी. हम सभी बहुत मस्ती किया करते थे. इससे पहले भी मैंने माधुरी के साथ कई फिल्मों में काम किया था. लेकिन वह मौका खास था. चंद्रमुखी के रूप में माधुरी. आहा. क्या लग रही थी माधुरी. मैं उन्हें बार-बार चिढ़ाता. माधुरी वह अंदाज दिखाओ न जो तुम दोनों आइब्रोज को ऊपर-नीचे करती हो. और माधुरी बेहद सलीके से उसे दिखाती भी. वाकई माधुरी हिंदी सिनेमा जगत की लेजेंड रही हैं और हमेशा रहेंगी. हमारी बेहद प्रिय हैं वह.

एक्स्ट्रा शॉट्स ः

माधुरी दीक्षित ने अब तक अपनी बेहतरीन अदाकारी के लिए कई पुरस्कार हासिल किये हैं. फिल्म हम आपके हैं कौन, देवदास, दिल तो पागल है जैसी फिल्मों के लिए उन्हें कई सम्मान से नवाजा जा चुका है.

बड़ा दुख दीना मेरे लखन ने...गीत के लिए माधुरी ने कई दिनों तक उपवास रखा था ताकि उनके चेहरे पर वह उदासी नजर आ सके, जो किसी लड़की के चेहरे पर तब आती है जब उसका प्रियवर उससे दूर हो जाता है.

माधुरी के बच्चों ने आजा नच ले फिल्म की शूटिंग के दौरान यह जाना कि उनकी मम्मी अभिनेत्री हैं.

सलमान खान के साथ पहला-पहला प्यार है गाने की शूटिंग के दौरान उन्हें कई बार शॉट देने पड़े थे, क्योंकि सलमान ने उससे पहले कोई ऐसी बात कह दी थी कि माधुरी अपनी हंसी नहीं रोक पा रही थीं.

बॉक्स में ः

झारखंड के जमशेदपुर में साक्षी स्थित पप्पू सरदार चाट भंडार के संचालक पप्पू सरदार माधुरी के बहुत बड़े फैन हैं. वे माधुरी को अपनी छोटी बहन मानते हैं. उन्होंने अपनी दुकान में हर तरफ माधुरी की तसवीर लगा रखी है. और उनकी पूजा भी करते हैं. आजा नच ले के प्रोमोशन के दौरान माधुरी ने बतौर पप्पू सरदार को बुला कर उनसे मुलाकात भी की थी.

टेलीविजन की छोटी बहुएं


कितनी नाटी हो. छोटी हो कद में. कुछ करती क्यों नहीं कि थोड़ा कद बढ़े. कभी एक दौर था. जब लड़कियों को हमेशा अपने परिवार व जमाने से अपने छोटे कद के लिए ताने सुनने पड़ते थे. लेकिन टेलीवुड में पिछले कई सालों से लगातार मुख्य किरदारों में ऐसी अभिनेत्रियों को अवसर दिये जा रहे हैं, जिनका कद नहीं बल्कि उनका अभिनय महत्व रखता है. गौर करनेवाली बात यह भी है न सिर्फ कद बल्कि इतनी गंभीर भूमिकाएं निभानेवाली ये अदाकाराएं बहद कम उम्र की भी हैं.

उतरन की इच्छा और तपू आज हर घर की प्यारी है. लोग उनके अभिनय को इस कदर पसंद करते हैं कि वे उनके छोटे कद पर ध्यान भी नहीं देते. टीवी सेट पर गॉरजियस दिखनेवाली यह नायिकाओं को जब वास्तविक जिंदगी में करीब से देखो तो मन में यही प्रश्न आता है कि अरे इनका कद तो बेहद छोटा है. लेकिन कैमरे पर यह चीजें नजर ही नहीं आती. दरअसल, इन दिनों अगर आप गौर करें तो लगभग लीड किरदार निभानेवाली सभी नायिकाएं शॉट हाइटेड हैं. लेकिन मेकअप के कमाल व कैमरे के कमाल से हमें उनका वास्तविक कद नजर नहीं आता. एक बात गौर करनेवाली और भी है कि ये नायिकाएं न सिर्फ कद में बल्कि उम्र में भी बेहद छोटी हैं. लगभग अधिकतर नायिकाएं 19 वर्ष की हैं. यह पूछने पर कि वे क्यों कम उम्र में इस क्षेत्र में आना चाहती हैं. वे साफ कहती हैं कि अभिनय के लिए उम्र की कोई सीमा नहीं होती. मौका मिलते ही बस एंट्री ले लेनी चाहिए.

पूजा गौर , मन की आवाज में लीड किरदार

पूजा गौर मन की आवाज प्रतिज्ञा में लीड किरदार निभा रही हैं. उम्र में वे बेहद छोटी हैं. वे फिलवक्त केवल 19साल की हैं. गुजरात के अहमदाबाद की रहनेवाली पूजा का कद मात्र 5फिट 1 इंच हैं. यह पूछने पर कि वे क्यों इस क्षेत्र में आयीं.और क्या कभी कम कद की वजह से उन्हें ताने नहीं सुनने पड़े. वे बताती हैं कि यह सच है कि लड़कियों में प्रायः कम कद होने की वजह से उन्हें बाते सुननी पड़ती हैं. मुझे भी मेरे दोस्त चिढ़ाया करते थे. कभी कभी पड़ोस के लोग भी. लेकिन जब मैं एक्ट्रेस बन गयी हूं. यह चीजें अब मामूली सी बात लगती है.

सांभवी, गिनी, छज्जे छज्जे का प्यार

सांभवी की उम्र 19 साल है. और वे सोनी टीवी के शो छज्जे छज्जे का प्यार में लीड किरदार निभा रही हैं. यह पूछने पर कि क्या कभी उन्हें छोटी उम्र होने के बावजूद कुछ ऐसे गंभीर किरदार निभाने में परेशानी नहीं होती. वे कहती हैं कि जब यह सोच लिया है कि इसी क्षेत्र में आना है तो अपनी सोच को भी तो मैच्योर करना होगा. रही जहां तक बात कद की तो मेरा परिवार काफी सहयोगी था. उसने मुझे कभी ताने नहीं दिये. कभी भी नहीं. सो, मुझे नहीं लगता कि अभिनय में कद कहीं से भी मैटर करता है. ऐसा होता तो फिर रानी मुखर्जी को भी काम नहीं मिलता न.

सारा खान

21 वर्षीय सारा खान खुद को बहुत मैच्योर मानती हैं और कहती हैं कि उन्हें तो कभी कद की वजह से कोई परेशानी नहीं हुई. मैं तो मिस मध्य प्रदेश का खिताब भी जीत चुकी हूं. हालांकि उनका परिवार भी मध्य वर्गीय था तो सभी पापा को कहते थे कि बेटी का न स्वास्थ्य ठीक है और न ही कद. कैसे ढूंढेंगे लड़का. लेकिन मैंने कभी उन बातों पर ध्यान ही नहीं दिया. सारा की लंबाई 5 फीट 1 इंच है.

पूजा जोशी

ये रिश्ता क्या कहलाता में अक्षरा की बेस्ट फ्रेंड और भाभी का किरदार निभानेवाली पूजा जोशी की लंबाई केवल 4 फिट है. लेकिन इसके बावजूद उनके सशक्त अभिनय के वजह से उन्हें हमेशा मौके मिलते रहे हैं.

श्रीति झा, रक्त संबंध

इमेजिन के शो रक्त संबंध व ज्योति में महत्वपूर्ण किरदार निभा चुकीं श्रीति 21 वर्ष की हैं और इनकी लंबाई भी 5 फिट 1 इंच है. लेकिन इसके बावजूद इन्होंने अब तक महत्वपूर्ण व गंभीर भूमिका कर अपनी पहचान बनायी है.

बहने

स्टार प्लस के शो बहने की सभी अभिनेत्रियां छोटे कद की हैं. लेकिन कैमरे के कमाल से उन्हें खूबसूरत और लंबी दिखाया जाता है.

इसके अलावा असल जिंदगी में पापड़ पोल की कोकिला अमि त्रिवेद्वी, सजन रे झूठ मत बोलो की नायिकाएं, सना, छोटी बहू की रुबीना मल्लिक, सुप्रिया, रतन राजपूत भी छोटे कद व कम उम्र की नायिकाएं हैं.

मां भी तू सखी भी तू


हिंदी सिनेमा जगत में एक दौर ऐसा भी था जब अभिनेत्रियों के लिए न उम्र की सीमा मायने रखती थी और न ही अपनी उम्र से अधिक किरदार करने से उन्हें कोई गुरेज था. चूंकि वह वक्त था. जब अभिनेत्रियों के लिए किरदार मायने रखते थे. उस दौर में ऐसी ही कुछ अभिनेत्रियों पर एक नजर जिन्होंने लोकप्रिय होते हुए भी अपने सहयोगी कलाकारों की मां की भूमिका निभाने से भी गुरेज नहीं किया.

फिल्म नमक हलाल में वहीदा रहमान बेहद दुखी हैं क्योंकि उनके बेटे शशि कपूर उन्हें अच्छी मां नहीं समझते. उनके घर के नौकर के किरदार में अमिताभ बच्चन उन्हें समझाते हैं कि वे चिंता न करें उनके बेटे जल्द ही असलियत जान जायेंगे. अमिताभ बच्चन उन्हें मां कह कर संबोधित करते हैं. कुछ इसी तरह राखी ने भी कई फिल्मों में अमिताभ बच्चन व अपने सहयोगी कलाकारों के साथ मां की भूमिका निभाई है. दरअसल, उस दौर में अभिनेत्री या अभिनेता पर अभिनय की धुन कुछ इस कदर सवार रहती थी कि उन्हें सिर्फ किरदार नजर आता था. उनमें वह ललक होती थी कि वे हर हाल में उस किरदार को निभायें . फिर भले ही वह किरदार उम्र से बड़ा क्यों न हो. ब्लैक एंड ह्वाइट से लेकर अब तक ऐसी कई फिल्में हमने देखी हैं जिसमें अभिनेत्रियां अपने सहयोगी कलाकार की मम्मी भी बनी हैं और अगली ही फिल्म में उनकी अभिनेत्री भी. मधुबाला, नरगिस, वहीदा रहमान, शर्मिला टैगोर और राखी उनमें से एक हैं. और उनकी अभिनय के जादू का ही जलवा था जो दर्शकों ने उन्हें हर रूप में स्वीकार किया. फर्ज कीजिए अगर यही दौर अब का रहा होता तो निश्चित तौर पर यह संभव नहीं था. दरअसल, उस दौर में निदर्ेशक सर्वोपरि थे. वे जैसा सोचते थे जैसे किरदार की इच्छा रखते थे वे अपने अभिनेताओं से वैसी भूमिकाएं निभाने को कहते थे और वे निभाते भी थे. लेकिन अब ऐसा नहीं होता. हालांकि विद्या बालन इसमें अपवाद हैं. उन्होंने फिल्म पा में अमिताभ बच्चन की मां का किरदार निभाने का जोखिम उठाया. जो कम से कम आज के दौर में तो कोई अभिनेत्री नहीं ही उठाती हैं. चूंकि उन्हेंं यह लगता है कि उन पर मां बनने का ठप्पा लग जायेगा, जिससे उनके भविष्य पर ग्रहण लग सकता है.

नरगिस

फिल्म मदर इंडिया में नरगिस ने सुनील दत्त की मां की भूमिका निभाई है. जबकि वास्तविक जिंदगी में दोनों पति-पत्नी हैं. मदर इंडिया के किरदार के लिए जब नरगिस से पूछा गया था उस वक्त दोनों के प्यार के बीज बोये जा चुके थे. लेकिन दोनों ने इस सशक्त किरदार को निभाने के लिए रजामंदी दी. फिल्म में नरगिस ने बेहतरीन अदाकारी की, जिसके लिए उन्हें कई पुरस्कार भी मिले.

क्लाइमेस से दर्शकों के ये फासले....


एक दौर था, जब दर्शक थियेटर में सीट पर बैठ कर बस यह सोचा करते थे यार अब क्या होगा. फिल्म का इंटरवल लोगों के मन में और उत्सुकता पैदा करता था. लेकिन हाल की फिल्मों पर गौर करें तो लगभग सभी फिल्में शुरुआत से बेहद अच्छे अंदाज में शुरू होती हैं लेकिन धीरे-धीरे क्लाइमेक्स आते आते कहानी दम तोड़ देती है. थियेटर से बाहर निकलने के बाद दर्शक मायूस हो जाते हैं कि उन्होंने देखा क्या. शुरुआत से अंत तक दर्शकों की उत्सुकता को बांधे न रख पाने वाली कहानियों पर अनुप्रिया अनंत की रिपोर्ट

अकिरा कुरसावा जब निदर्ेशक के रूप में बहत लोकप्रिय हो गये थे. इसके बाद वे कई कॉलेज में फिल्म मेकिंग की ट्रेनिंग देने जाया करते थे. उन्होंने अपने भाषण के दौरान बच्चों को सिखाया था कि किसी भी फिल्म की कहानी तभी बहुत प्र्रभाव छोड़ पाती है. जब वह बेहतरीन हो. उसकी शुरुआत उसका मध्यांतर और क्लाइमेक्स यानी अंत तक कहानी दर्शकों को बांध कर रख सकती है. उनका प्रभाव अब तक भारतीय निदर्ेशकों पर रहा है. बर्गमैन जैसे निदर्ेशकों ने भी इस ग्रामर को हमेशा फॉलो किया है. लेकिन हाल की फिल्मों में देखें तो जिस कदर नये निदर्ेशक व नये प्रयोगों के साथ कहानियां आ रही हैं. वे अपनी फिल्मों के क्लाइमेक्स के साथ बहुत न्याय नहीं कर पाते. गौर करें तो राजकपूर की फिल्मों ज्यादातर आम लोगों पर या लव स्टोरी हुआ करती थी. लेकिन फिल्म का क्लाइमेक्स बेहद दिलचस्प होता था. दर्शक यह अनुमान नहीं लगा पाते थे कि आगे क्या होगा. हमेशा उनकी सोच के विपरीत होता था क्लाइमेक्स. कुछ ऐसा ही उस दौर की थ्रीलर फिल्मों के साथ भी होता था. अंत तक लोगों को पता नहीं चल पाता था कि आखिरकार खुनी कौन है या किस तरह यह होगा. अच्छे किरदार बाद में जाकर खलनायक के रूप में जब लोगों के सामने आते थे. तो सभी यही सोचते थे अरे यह खूनी है. यस खलनायक है. यही वजह थी लोगों की उत्सुकता बरकरार रहती थी. लेकिन हाल की थ्रीलर फिल्मों की बात करें तो सभी फिल्मों में थ्रील जैसा कुछ भी नहीं होता. न ही रोमांच होता है और न ही कोई थ्रील. न ही कोई सस्पेंस जैसी चीजें.

तनु वेड्स मनु

तनु वेड्स मनु जिम्मी शेरगील ही कंगना रनाउत का ब्वॉयफ्रेंड होगा. यह अनुमान उस वक्त ही लोगों ने लगा लिया था जिस वक्त जिम्मी शेरगिल की दोबारा ट्रेन में एंट्री होती है. फिल्म वही से कमडोर पड़ जाती है और लोगों की रुचि घट जाती है. सभी ने इस फिल्म को अंतराल से पहले बेहद पसंद किया. लेकिन बाद में फिल्म कमजोर तो हुई ही. अंत भी बहुत जोरदार या प्रभाव छोड़नेवाला नहीं हुआ. नतीजन दर्शकों ने माना कि यह फिल्म अच्छी तो है लेकिन अंत कुछ खास नहीं रहा.

सात खून माफ

सात खून माफ में लगातार यह दिखाया गया है सुजैना यानी प्रियंका चोपड़ा बहुत क्रांतिकारी स्वभाव की है. वह अपने रास्ते के रोड़े को हटाना जानती थी. रास्ता बदलना उसे नहीं आता था. लकिन अंत में उसने अपनेआप को भगवान को समर्पित कर दिया. तो यह बेहद अटपटी सी समाप्ति हुई.

अज्ञात

फिल्म अज्ञात में लगातार अंत में नायिका को जंगल में रास्ता नहीं मिलता है. अचानक नायिका का पैरा रुक जाता है. और नीचे पानी है. और फिल्म अंत हो जाता है. यहां भी दर्शक रोमांचित होने की बजाय बोर हो जाते हैं.

ये फासले

हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ये फासले में महाजार रेडी के आने के साथ ही दर्शक इस बात का अनुमान लगा लेते हैं कि फिल्म में वही खलनायक हैं. फिल्म लगातार खींची जाती है. लेकिन अंततः खलनायक बिल्कुल बेतरतीब तरीके से लोगों के सामने आता है. कहानी का कमजोर पहलू यही है.

कौन

फिल्म कौन नायिका खुद लोगों से डरती रहती हैं. और अंत में वह खुद मर्डरर निकलती हैं. दर्शक फिल्म की कहानी के बीच में ही इस बात का अनुमान लगा चुके थे कि फिल्म में उर्मिला ही खूनी हैं.

रावण

फिल्म रावण की कहानी जितनी कमजोर थी उतना ही उसका क्लाइमेक्स भी. वीरा मर जाता है. और फिल्म वही खत्म हो जाती है. फिल्म में दर्शकों को यही महसूस होता है कि उनके साथ कोई मजाक किया गया है.

अच्छी क्लाइमेक्सवाली फिल्में

गौर करें तो ऐसी भी कई फिल्में रही हैं जिनके क्लाइमेक्स शानदार रहे हैं

ज्वेल थीफ

फिल्म ज्वेल थीफ में लोगों को बहुत बाद में यह जानकारी मिलती है कि दरअसल अशोक कुमार खलनायक हैं.

जानी दुश्मन

गांव में हर दुल्हन का खून हो रहा है. लेकिन फिल्म के अंत में लोगों को यह जानकारी मिलती है कि दरअसल संजीव कुमार ही वह खून करते थे.

गुमनाम

फिल्म गुमनाम के अंत में लोगों को पता चलता है कि नायिका नहीं बल्कि नायक का दोस्त खलनायक है.

दबंग

फिल्म दबंग में अंत में लोगों को पता चलता है कि सोनू सुद ने सलमान खान की मां का खून किया था.

रेस

फिल्म रेस में बार-बार कट्रीना, सैफ, बिपाशा और अक्षय खन्ना एक दूसरे से प्यार का नाटक करते हैं. बाद में लोगों को पता चलता है कि सैफ व बिपाशा एक साथ हैं.

फ्लॉप हैं पर हिट हैं



बॉलीवुड की बात ही निराली है. यहां जो फ्लॉप हैं. वह भी हिट हैं और जो हिट हैं वह भी फ्लॉप हैं. अगर ्ाप गौर करें, तो बॉलीवुड के वे तमाम नामचीन हस्तियां अपनी लगातार फ्लॉप फिल्में देने के बावजूद हिट ह

अक्षय कुमार की फिल्म तीस मार खां में जब दर्शकों ने उनकी एक्टिंग देखी तो उन्हें साफ तौर पर अक्षय को एक अभिनेता के रूप में नकार दिया. खबर आने लगी कि अब उनका करियर ढलाव पर है. तभी खबर आती है कि उनके पास अब भी सबसे ज्यादा फिल्में हैं. दरअसल, बॉलीवुड में उन अभिनेताओं की भी तूती बोलती है. जो फ्लॉप हैं. एक के बाद एक फिल्में लगातार बॉक्स ऑफिस पर पिटती जायें लेकिन उनके पास फिल्मों के ऑफर कम नहीं होते,वे सालोंभर काम में व्यस्त रहते हैं और उनके पास अन्य कामों के लिए वक्त नहीं होता. गौर करें तो हाल की फिल्मों में वे सारे बड़े नामों पर फिल्मों को फ्लॉप कराने का कलंक लग चुका है. इसके बावजूद उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ा, चूंकि उनके पास उनकी फेहरिस्त में अगले चार साल के लिए फिल्में आ चुकी हैं. तो ऐसे में वाकई यह बात मायने रखती है कि किसी अभिनेता या अभिनेत्री के लिए क्या वाकई फिल्मों की सफलता होना अहमियत नहीं रखा. अहमियत सिर्फ उनकी फिल्मों में उपस्थिति मात्र है. अक्सर खबरें मिलती रहती हैं कि बॉलीवुड निर्माताओं के आधार पर फिल्में तय करता है. तो फिर क्या वजह है कि नायक-नायिकाओं की असफलताओं के बावजूद घूम फिर कर सारी फिल्मों में वही चेहरे नजर आते हैं. गौर करें तो कुछेक ही निदर्ेशक हैं जो नये चेहरों के साथ प्रयोग करना चाहते हैं. इनमें दिबाकर बनर्जी, अनुराग कश्यप ही प्रमुख हैं. इन्हें चोड़ दें तो अनीस बज्मी जैसे निदर्ेशक उन निदर्ेशकों में से हैं जो लगातार पुराने चेहरों को ही दोहराते रहते हैं.

सोनम कपूर

अनिल कपूर की बेटी सोनम कपूर ने अपनी फिल्मी करियर की शुरुआत सांवरिया से शुरू किया था. वह फिल्म खास कमाल नहीं दिखाया. इसके बाद उन्होंने दिल्ली 6 में अभिनय किया. यह फिल्म भी फ्लॉप के खाते में गयी. इसके बाद आयशा भी फ्लॉप रही. इसके बाद वे आइ हेट लव स्टोरी में नजर आयीं. यह एक मात्र फिल्म रही जिसे सफलता मिली. लेकिन किसी ने भी सोनम के अभिनय की सराहना नहीं की. सबने यही कहा कि अभी उनके अभिनय में बहुत बचपना है. उसमें सुधार की काफी गुंजाइश है. इसके बाद फिल्म थैंक्यू में वे नजर आयी हैं. जिसमें उनके अभिनय के लिए खास स्पेस ही नहीं छोड़ा गया है. लेकिन इसके बावजूद उनके पास आनेवाले समय में कई फिल्में हैं. मौसम और प्लेयर्स उनकी आनेवाली फिल्मों में प्रमुख हैं.

अभिषेक बच्चन

अमिताभ बच्चन के सुपुत्र अभिषेक बच्चन ने रिफ्यूजी से अपने करियर की शुरुआत की थी. लेकिन फिल्म को खास सफलता नहीं मिली. उसके बाद उन्होंने लगभग जितनी भी फिल्मों में काम किया है. कम ही फिल्मों को सफलता मिली है. गौर करें तो अभिषेक बच्चन के फिल्मी करियर के 11 साल पूरे हो चुके हैं और उन्होंने अब तक सिर्फ तीन से चार ही फिल्में हिट दी हैं. इनमें गुरु, पा, धूम सीरिज, दोस्ताना प्रमुख हैं. गौरतलब हैं कि इन फिल्मों की सफलता के पीछे का श्रेय पूरी तरह से अभिषेक को नहीं दिया जा सकता. सिर्फ गुरु को छोड़ दें तो शेष फिल्मों में वे कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाये हैं. हाल ही में रिलीज हुई फिल्म गेम भी फ्लॉप हो चुकी है. रावण बुरी तरह पिटी. और शुरुआती दौर की फिल्में भी फ्लॉप होती रही हैं. इन सबके बावजूद उनके पास फिल्मों की कोई कमी नहीं है और उन्हें इसका अच्छा मेहनताना भी मिल रहा है. आनेवाली फिल्मों में दम मारो दम, प्लेयर्स, बोल बच्चन, दोस्ताना प्रमुख हैं.

अक्षय कुमार

अक्षय कुमार भी फ्लॉप फिल्मों की फेहरिस्त में सबसे आगे हैं. लेकिन आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि अक्षय कुमार के पास शाहरुख, सलमान और आमिर से भी ज्यादा फिल्में हैं. उन्होंने अब तक कई फिल्में फ्लॉप दी हैं. हाल ही में तीस मार खां से उन्हें सबसे बड़ा झटका लगा था. फिर पटियाला हाउस भी खास कमाल नहीं कर पायी. थैंक्यू रिलीज हो चुकी है और आनेवाले समय में रे जोकर और देसी ब्वॉयज में नजर आयेंगे.

दीपिका पादुकोण

दीपिका पादुकोण भले ही बी टाउन की की पसंदीदा नायिका हों और दम मारो दम के गाने से लोगों के सामने उनकी लोकप्रियता बढ़ गयी हों. लेकिन उनकी फिल्में भी बाक्स ऑफिस पर खास कमाल नहीं दिखा पायी हैं. गौर करें तो ओम शांति ओम के बाद, लव आजकल, बचना ऐ हसीनो और हाउसफुल के अलावा उनकी सारी फिल्में पिट चुकी हैं. इसके बावजूद अगले चार साल तक उनके पास किसी भी निदर्ेशक को डेट्स देने के लिए नहीं हैं. उन्होंने फिल्म केले हम जी जान से, ब्रेक के बाद में भी अभिनय किया. लेकिन सफल नहीं हो पायीं.

रितेश देशमुख

रितेश देशमुख अब तक अपने दम पर किसी भी फिल्म को हिट नहीं करा पाये हैं. लेकिन इसके बावजूद उन्हें फिल्में मिल रही हैं. तुझे मेरी कसम से शुरुआत करनेवाले रितेश ने अब तक अपने दम पर कभी अभिनय नहीं किया.वे हास्य फिल्मों में ही नजर आये हैं. लेकिन फिर भी वे सालोंभर फिल्मों की शूटिंग में व्यस्त रहते हैं.

बड़े नामों की बात करें तो हाल में प्रियंका चोपड़ा, रनबीर कपूर की फिल्में भी खास कमाल नहीं कर पायी हैं. लेकिन फिर भी उनके पास फिल्मों की कमी नहीं. इमरान खान ने अब तक केवल दो जाने तू या जाने और आइ हेट लव स्टोरी के रूप में ही दो हिट फिल्में दी हैं. लेकिन इसके बावजूद वे कई फिल्मों में नजर आ रहे हैं. रितिक रोशन ने भी हाल में दो फ्लॉप फिल्में दी हैं. लेकिन उनमें अभिनय की पूरी क्षमता नजर आती है. ऐश्वर्य ने भी पिछले साल दो फ्लॉप फिल्में दी हैं.

फिल्मों के लव गुरुओं को थैंक्यू


बॉलीवुड में इन दिनों कॉमेडी फिल्मों के विषय में उन किरदारों को अधिक तवज्जो दी जा रही है, जिन्होंने फिल्मों के माध्यम से लव गुरु के रूप में या फिर पति-पत्नी के बीच आयी गलतफहमियों को दूर करने का जिम्मा उठा रखा है.

फिल्म थैंक्यू में अक्षय कुमार ने एक ऐसा किरदार निभाया है, जो लोगों के एक्स्ट्रा मैरेटियल अफेयर से संबंधित समस्याओं को सुलझाता है. इस फिल्म में वे तीन जोड़ियों की निजी जिंदगी को सुलझाते नजर आयेंगे. दरअसल, पिछले कई वर्षों से कॉमेडी फिल्में बना रहे निदर्ेशकों के लिए यह विषय पसंदीदा विषय बन चुका है. चूंकि लगभग ऐसे किरदारोंवाली हर फिल्म को सफलता मिलती है. इसलिए वे बार-बार इस किरदार को दोहरा रहे हैं. इसकी एक वजह यह भी रही है कि अक्सर ऐसा होता है जब दो पति-पत्नी के रिश्तों में दरार या दूरियां आती हैं. तब कोई तीसरा ही उन रिश्तों को फिर से एक दूसरे के करीब लाता है. खासतौर से महानगरों में यह बेहद लोकप्रिय फंडा है. यही वजह है कि इन दिनों कई एजेंसियों ने इस तरह के लव गुरु या एक्स्ट्रा मेरेटियल अफेयर को सुधारनेवाले लोगों को नियुक्त करना शुरू कर दिया है. गौर करें तो पुराने दौर में भी निदर्ेशकों ने ऐसे किरदारों को तवज्जो दी थी. सुपरहिट फिल्म पड़ोसन इसका बेहतरीन उदाहरण है. फिल्म में किशोर कुमार ने सुनील दत्त और शायरा बानो के बीच प्यार का बीज बोने का काम किया था.

इश्क विश्क( यश टांक)

फिल्म इश्क विश्क में पहली बार इस तरह के किरदार निखर कर सामने आये थे. अमृता राव व शाहिद कपूर अभिनीत इस फिल्म में जब नायक व नायिका के बीच गलतफहमियां आ जाती हैं तो यश टांक लव गुरु बन कर उन दूरियों को मिटाने का काम करते हैं.

बीवी नंबर 1 ( अनिल कपूर)

सलमान खान व करिश्मा कपूर अभिनीत इस फिल्म में सलमान जब करिश्मा यानी अपनी बीवी से प्यार करने की बजाय किसी और से इश्क फरमाना शुरू करते हैं और करिश्मा को इस बात की जानकारी मिलती है तो वे अनिल कपूर का सहारा लेते हैं. अनिल कपूर इसमें लव गुरु का किरदार निभाते हैं. उनकी मदद से सलमान वापस अपनी बीवी के पास आ जाते हैं.

मस्ती( अजय देवगन-लारा दत्ता)

तीन दोस्तों की कहानी पर आधारित फिल्म मस्ती में रितेश देशमुख, आफताब शिवदसानी और विवेक ऑबरॉय अपनी अपनी पत्नियों से पीछा छुड़ाने के लिए किसी दूसरे माध्यम का सहारा लेते हैं. ऐसे में वे अपनी अपनी पत्नियों से झूठ बोल कर उन्हें धोखा देने की कोशिश करते हैं. लेकिन ऐन वक्त पर उनकी पत्नियां लव गुरु अजय देवगन और लारा दत्ता का सहारा लेते हैं. दोनों की मदद से तीनों पतियों को अपनी कमियों का एहसास होता है. और वे फिर एक हो जाते हैं.

पार्टनर( सलमान खान)

फिल्म पार्टनर में तो सलमान खान ने पूरी तरह से लव गुरु का ही किरदार निभाया है. लव गुरु ही सलमान खान का व्यवसाय भी है. इस फिल्म में वे अपने दोस्त गोविंदा को उसकी प्रेमिका से मिलवाने में उसे बेहतरीन टिप्स देता है और फिर वे एक हो जाते हैं.

थैंक्यू( अक्षय कुमार)

फिल्म थैंक्यू की कहानी बहुत हद तक फिल्म मस्ती से मिलती जुलती है. इसमें भी तीन धोखेबाज पतियों की कहानी है और फिल्म थैंक्यू में भी तीन किरदारों को दर्शाया गया है. फिल्म में सुनील शेट्ठी, सोनम कपूर, बॉबी देओल, अक्षय कुमार, इरफान खान व रिम्मी सेन ने मुख्य भूमिका निभाई है. फिल्म में अक्षय कुमार तीनों के बीच की गलतफहमियों को दूर करने की कोशिश करते हैं.

आमदनी अठ्ठनी खर्चा रुपया( गोविंदा-जूही)

फिल्म आमदनी अठ्ठनी खर्चा रुपया में भी तीन पति-पत्नी की जोड़ियों पर कहानी आधारित है. सभी पति अपनी पत्नियों पर जुल्म ढ़ाते हैं. ऐसेमें जूही और गोविंदा उनके मोहल्ले में आते हैं और उनकी जीवन में आये मनमुटाव को दूर करने की कोशिश करते हैं.

हद कर दी आपने( रानी-गोविंदा)

फिल्म हद कर दी आपने में रानी और गोविंदा अपने अपने बेस्ट फ्रेंड में आयी दूरियों को मिटाने की कोशिश करते हैं और फिर उन दोनों में खुद ही प्यार हो जाता है.

नायकों के पिता ने भी निभाई है लव गुरु की भूमिका

हिंदी सिनेमा में ऐसी भी कई फिल्में रही हैं, जिनमें नायक व नायिकाओं के पिताजी या उनके किसी सगे-संबंधी ने दो प्रेमी युगल को मिलाने की कोशिश की है. इनमें कादर खान का नाम सबसे पहले आता है. उन्होंने फिल्म हीरो नंबर 1 व कई फिल्मों में गोविंदा के लिए लव गुरु का काम किया है. फिल्म दिलवाले दुल्हनिया में अनुपम खेर शाहरुख के लव गुरु बने हैं . अनुपम खेर ही फिल्म प्यार इं्पोसिबल में उदय चोपड़ा के लव गुरु बने हैं.