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20160326


रियलिस्टिक अप्रोच वाले शोज ही पसंद हैं: निकिता दत्ता


निकिता दत्ता ने ड्रीम गर्ल से अपने छोटे परदे के करियर की शुरुआत की। इन दिनों उन्हें सोनी टीवी के शो में काफी लोकप्रियता हासिल हो रही है। 

ड्रीम गर्ल के बाद यह रोल आपके लिए कितना चैलेंजिंग है?
मुझे लगता है कि वह हर रोल आपके लिए चैलेंजिंग ही होता है, जो आपके कंफर्ट जोन से बाहर होता है।इसमें जो रोल है सुमन का, वह अलग अलग है। जैसे हमलोग भी एक से नहीं होते हरदम। घर में अलग बाहर अलग होते हैं। तो कुछ हद तक तो मैं सुमन के किरदार से काफी रिलेट कर पाती हूं। क्योंकि मैं भी कभी कभी बहुत साड़ी जगहों पर चुप रहती हूं तो कई बार बाहर के कामों में मैं दबंग भी हूं। इसलिए आप कहीं-कहीं सुमन में मेरी झलक देख सकते हैं। सुमन भी मल्टी टास्क करती है और मुझे भी अपने घर की मल्टी टास्किंग क्वीन ही माना जाता है।
ड्रीम गर्ल छोड़ने की कोई खास वजह रही?
मैंने अपने लिए हमेशा काम करते रहने के लिए कुछ गाईडलाईन तैयार कर रखे हैं। मैंने वह शो छोड़ा क्योंकि वहां जो कहा गया था उस हिसाब से ट्रैक नहीं जा रहे थे। सो मुझे लगा कि मैं यह शो अब और नहीं कर सकती। मैं पैसे के लिए काम नहीं करती। शुरूआती दौर में जब मॉडलिंग करती थी। उस वक़्त भी मुझे पैसों की खास लालसा नहीं था। एक्टिंग करना पसंद है इसलिए कर रही। जिस दिन महसूस होगा कि यहां भी मुझे जो किरदार सौंपा गया है। कहानी उस ट्रैक पर नहीं चल रही। तो मैं शो के साथ सिर्फ इसलिए जुड़ी नहीं रहूंगी कि मुझे शो करना ही है। मैं फ़ौरन शो छोड़ दूंगी।हालांकि ये फायिनाइट शो है तो मुझे नहीं लगता कि इस शो की स्टोरी लाइन से छेड़छाड़ की जायेगी।
टेलीविज़न के ट्रेंड को किस तरह देखती हैं आप?
मुझे सास बहू वाले शोज बिलकुल पसंद नहीं हैं और शायद यही वजह है कि ड्रीम गर्ल के बाद मुझे कई शोज़ ऑफर हुए है। लेकिन मैंने सबको ना ही कहा।चूंकि मुझे रियलिस्टिक अप्रोच वाले शोज ही पसन्द आते हैं और कॉन्सेप्ट भी। इस शो में भी आप देख रहे होंगे कि बचपन की प्रेम कहानी दिखाई जा रही कि दोनों के बीच कुछ ऐसा होता है कि दोनों एक दूसरे से नाराज हो जाते हैं।ऐसा रियल जिंदगी में भी तो होता ही है। इसलिए इससे मैं भी कनेक्ट कर पायी हूं।  हालांकि इस फील्ड में आप कभी नेवर से नो वाले फंडे पर ही चलते हैं।शायद कभी ऐसा हो कि मजबूरी भी सास बहु करने पड़े। लेकिन कभी प्राथमिकता नहीं।
आप मिस इंडिया की प्रतियोगिता में प्रतिभागी रह चुकी हैं।तो आपको क्या लगता है मॉडलिंग अभिनय की दुनिया में एंट्री लेने के रास्ते आसान कर देता है?
मुझे लगता है कि आपको माहौल के बारे में तो थोड़ी बहुत जानकारी जरूर हो जाती है। एक सबसे बड़ी  बात जो हम इस तरह के ब्यूटी कॉम्पटीशन से सीखते हैं वह यह है कि आपमें आत्मविश्वास काफी आ जाता है ।बाकी मुझे जो भी काम मिले हैं मैंने लगातार मेहनत की है। तब जाकर काम मिले हैं। मैंने सैफ अली खान निर्मित फ़िल्म लेकर हम दीवाना दिल में काम किया। वह मेरा पहला प्रॉजेक्ट था। बड़े लेवल पर। फिर मैंने कई विज्ञापनों में भी काम किया।तो मॉडलिंग से आपको एक बड़ा एक्सपोजर तो मिलता ही है। हां मगर पिछले कई सालों में प्रतियोगिता कठिन हुई है। यह बात जरूर कहना चाहूंगी। शायद यही वजह है कि कई सालों से भारत को कामयाबी हासिल नहीं हुई है और इस बात का मुझे काफी अफ़सोस होता है। लेकिन हां यह एक बड़ा मंच जरूर देता है। आप काफी एटिकेट्स सीख जाते हैं।साथ ही आप कई नए लोगों से भी मिलते हैं। फिर आपके कई तरह के दोस्त भी बन जाते हैं। आप दुनिया की कई हकीकत से आमना सामना करते हो। ये सारी बातें आपको जिंदगी के कई मायने सिखाती हैं। न कि सिर्फ अभिनय की दुनिया में एंट्री के लिए तैयार करती है।
आपने अभी बस शुरुआत ही की है और पहले ही शो में आपने एक आवाज़ उठायी। तो आपको नहीं लगता कि आपने खुद के लिए एक रिस्क लिया है?
मुझे बस यह लगता है कि रिस्क तो हर जगह है।मैं जानती हूं कि न्यू कमर्स से लोग ऐसी उम्मीद नहीं करते हैं कि वह कोई ठोस कदम उठाएगी।लेकिन मैंने अपनी जिंदगी इसी तरह से जी है। तो मुझे लगता है कि मैं इसी तरह जिऊंगी और मुझे पता है कि मेरा काम ही बोलेगा।
जब अभिनय नहीं कर रही होतीं तो क्या करती हैं?
मुझे इंटीरियर करना पसंद है। साथ ही मैं फिटनेस को लेकर हमेशा सजग रहती हूं। तो काफी वर्कआउट करती हूँ। नयी चीजें एक्सप्लोर करने में मज़ा आता है।

20160325

बंदिशें न इन्हें रोकें ...



सरहदों पर खींची लकीरें मिटेंगी. बस दो कदम तुम चलो, दो कदम हम चलें...कुछ ऐसी ही नेक सोच के साथ आगे बढ़ी हैं शैलजा केजरीवाल. जिंदगी चैनल को माध्यम बना कर उन्होंने ही पाकिस्तान और भारत की दूरियों को सृजन के स्तर पर कम करने की कोशिश की है और इस बार भी वे एक ऐसे कांसेप्ट के साथ आयी हैं, जिससे वाकई तसल्ली मिलती है कि हां, यह मुमकिन है कि कम से कम इसी बहाने यहां के झोखे, सरहद पार के झोखों से टकरायेंगे और अमन शांति का गीत गायेंगे. जील फॉर यूनिटी एक ऐसी ही मकसद के साथ 12 फिल्में लेकर आयी हैं,जिनका निर्देशन और निर्माण भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों के प्रसिद्ध फिल्मकारों ने किया है.

 तोड़ना हमेशा आसान होता है. जोड़ना उतना ही मुश्किल. लेकिन आसान काम करना शैलजा को पसंद ही कहा है. शायद यही तो वजह रही है कि जहां एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री 100 करोड़, 200 करोड़ की फिल्में बनाने में लीन है. शैलजा केजरीवाल अपनी सोच और क्रियेटिवीटी के माध्यम से कुछ ऐसी गिरहों को खोलने की कोशिश कर रही हैं, जहां दो देश जब एक साथ आयें तो प्रेम बढ़े. सौहार्द्ध बढ़े. इसी मकसद के साथ जील फॉर यूनिटी भारत और पाकिस्तान के 12 ऐसे फिल्म मेकर्स और उनकी कहानियों को लेकर आये हैं, जिनकी कोशिश है कि अपनी फिल्मों के माध्यम से दोनों देशों में कला का आदान-प्रदान हो. और इस खूबसूरत और नेक सोच को आकार में तब्दील करने के लिए वागा बॉर्डर से बेहतरीन जगह और क्या हो सकती थी. इस आगाज का साक्षी बना वागा बॉर्डर का जीरो लाइन. भारत के छह फिल्म मेकर और पाकिस्तान के छह फिल्म मेकर 12 फिल्में लेकर आये हैं. ये 12 फिल्में जल्द ही दर्शकों के बीच होंगी. यह छह फिल्म मेकर हैं भारत से तिग्मांशु धूलिया, अर्पणा सेन, तनुजा चंद्रा, निखिल आडवाणी, बिजॉय नांबियार, केतन मेहता. पाकिस्तान के फिल्म मेकर्स में सबीहा समर, मेहरीन जब्बार,खालिद अहमद, शाहबाज समर जैसे निर्देशकों का नाम शुमार है.इन फिल्मों की खासियच यह है कि पाकिस्तान के फिल्म मेकर ने भारतीय कलाकारों के साथ भी फिल्में बनायी है.
 ये है पहला कदम : शैलजा केजरीवाल, चीफ क्रियेटिव
जील फॉर यूनिटी एक सोच है, एक पहल है, जिसके तहत भारत व पाकिस्तान की सर्वश्रेष्ठ और सृजनशील प्रतिभाएं एक साथ आकर दोनों देशों के बीच एकता की भावना को प्रदर्शित करेंगी व अपनी कृतियों को एक साथ प्रदर्शित करेंगी.हमने दोनों पक्षों के 12 फिल्मकारों को एक साथ लाकर  इस दिशा में अपना पहला कदम उठाया है. और मैं मानती हूं कि छोटी ही सही शुरुआत होनी चाहिए. ताकि  दोनों देशों के लोग यह जान पायें कि दोनों देशों के आम लोग आपस में मिलना चाहते हैं. सब एक सी चाहत रखते हैं. शांति की चाहत. 12 फिल्में, जिन्हें इस ऐतिहासिक पहल को सेलिब्रेट करने के लिए बनाया गया है. मेरा मानना है कि जब लोग इन्हें साथ-साथ देखेंगे  तो उनके मन में कहीं न कहीं दोनों देशों के लोगों के लिए आपस में सम्मान ही बढ़ेगा. और ये फिल्में एक साथ दोनों देशों में प्रदर्शित होगी. हमारा उद्देश्य यही है कि कला के विविध स्वरूपों के जरिये दोनों पक्षों के लोगों के बीच सांस्कृितक संवाद जारी रखा जाये. कला को किसी भी तरह की बंदिशों या जंजीरों में न जकड़ें.

आम लोगों से पूछें वे तो शांति चाहते हैं :खालिद अहमद
खालिद अहमद पाकिस्तान के मशहूर लेखक, निर्देशक और कलाकारों में से एक हंैं. उन्होंने इस प्रोजेक्ट के तहत फिल्म लालूलाल डॉट कॉम का निर्माण किया है, वे मानते हैं कि यह एक बेहतरीन पहल है. बकौल खालिद अहमद पाकिस्तान के आम लोगों से आप बात करके देखें. वे सभी इस बात से थक चुके हैं. कोई अब लड़ाई झगड़ा, दंगे फसाद नहीं चाहता. मेरा तो भारत से पुराना नाता रहा है. मेरे परिवार के कई लोग आज भी यहां हैं. मैं भी विभाजन के बाद गया.तो मेरी तो कई यादें हैं. मेरी कई मौसियां हैं, उनके परिवार हैं. मेरी फिल्म की कहानी एक इलाका है हमारे यहां पाकिस्तान में, जो कि राजस्थान से काफी मिलता-जुलता है.  राजस्थान की संस्कृति, उसके लोक-संगीत, भाषा भी काफी मिलती-जुलती है. और मुझे लगा कि भारत के लोग इस इलाके के बारे में बहुत नहीं जानते. उमर कोर्ट एक जगह है. वहां के बारे में शायद लोग कम जानते हैं कि वहां हिंदू -मुसलिम दोनों एक तरह की संस्कृति का आदान प्रदान करते हैं. वही पर एक आदमी है लालूलाल यह उसकी कहानी है. इस फिल्म के माध्यम से एक छोटी सी कोशिश है दो देशों को साथ लाने की. यही वजह थी कि जब मुझे इसके बारे में कहा गया तो मैं तुरंत तैयार हो गया. सिनेमा एक मजबूत माध्यम है मेरा मानना है.
अर्पणा सेन, निर्देशिका सारी रात
जब मुझे इस प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी मिली. तो मैंने हां इसलिए हां क्योंकि मेरी फिल्म का विषय भी इस दर्शन से निकटता से जुड़ा हुआ है. मेरी फिल्म 80 मिनट की है. यह कहानी युवा विवाहित जोड़े के बारे में है, जो एक अजनबी के संपर्क में आते हैं, और किस तरह उनके अंदर की पारस्परिक समझ व प्रेम व विवाह के भाव  को पूरी तरह से बदल कर देता है. मुझे पूरी उम्मीद है कि यह पहल कला व सिनेमा के माध्यम से दो देशों को एक साथ लाने में सफल होगी. मुझे खुशी है कि मैंने फिर से इस फिल्म में अपनी बेटी कोंकणा सेन को फिल्माया है. अच्छा लगता है कि वह बिल्कुल रेडी कलाकार है.वह खुद को तैयार रखती है. और फिल्म को लेकर उसका अप्रोच अलग होता है. वह काफी सवाल पूछती है.पूरी तैयारी करती है. मैं इस प्रोजेक्ट के साथ जुड़ कर और पाकिस्तान के फिल्म मेकर से मिल कर भी खुश हूं. इस तरह के माहौल में आप कई नयी चीजें देखते सुनते हैं.


फिल्म- निर्देशक
सारी रात-निर्देशिका अर्पणा सेन, भारत 
लालूलाल डॉट कॉम -निर्देशक खालिद अहमद, पाकिस्तान
दोबारा- निर्देशक बिजॉय नांबियार, भारत
जीवन हाथी- निर्देशक मीनू व फरजाद
लाल बेगम- निर्देशिका मेहरीन जब्बार
गुड्डू इंजीनियर- निर्देशक निखिल आडवाणी
छोटे शाह- निर्देशिका सबीहा समर
टोबा टेक सिंह- निर्देशक केतन मेहता
खेमे में मत झांकें- निर्देशक शाहबाज समर
सिलवट- निर्देशिका तनुजा चंद्रा
बारिश और चाउमिन - निर्देशक तिग्मांशु धूलिया 
मोहब्बत की आखिरी रात  - निर्देशक सिराज उल हक

हां, मेरे लिए वाकई स्त्रीलिंग-पुलिंग सेमथिंग है : आर बाल्की


उनके लिए की एंड का में कोई भेद नहीं. मतलब उनके लिए स्त्रीलिंग और पुलिंग एक ही बात है. कुछ ऐसी सोच को लेकर वे फिल्म की एंड का लेकर आये हैं. बात हो रही है निर्देशक आर बाल्की की, जिन्होंने हमेशा अपने अलग कांसेप्ट से दर्शकों का दिल जीता है.
 की एंड का का ख्याल कैसे आया?
शमिताभ के बाद मैंने सोचा था, मैं थोड़ा ब्रेक लूंगा. लेकिन अमिताभ जी और जयाजी का लगातार फोन आ रहा था. वे कह रहे थे कि लंबा ब्रेक मत लो. बैठो मत. कुछ करो. तो मुझे लगा कि इस विषय पर कुछ करते हैं. जब मैंंंने यह फिल्म सोची तो मेरे जेहन में सबसे पहले अर्जुन का ही नाम आया.अर्जुन आये. और वह तैयार हो गये. मुझे अर्जुन का हंक, मशकूलर अंदाज बेहद पसंद आया. और मुझे लगा कि वह इस फिल्म में फिट बैठेंगे. मैंने फिर अर्जुन और करीना की किसी पार्टी की तसवीरें साथ में देखी थी. वहां मुझे लगा कि दोनों की जोड़ी लग सकती है. करीना के बारे में मुझे लगता है कि वह फिनोमिनल एक्ट्रेस हैं. इस फिल्म के लिए मुझे अल्ट्रा मशकूलर लड़के की तलाश थी और मुझे अल्ट्रा फेमिनिन लड़की ही चाहिए थी. यह एक लव स्टोरी है. यह फिल्म हाउस हस्बैंड पर नहीं है. आमतौर पर आप कहानियों में देखेंगे कि एक लड़का काम कर रहा होता है. और एक लड़की उसके प्यार में पड़ती है. लेकिन यहां उल्टा होगा.
आपकी फिल्मों के शीर्षक हमेशा अलग रहते हैं? 
जब आप फिल्म बनाते हैं तो काफी वक्त लगता है. काफी मुश्किलें आती हैं. काफी वक्त लगता है. इतने लोगों की मेहनत होती है.एक साल काम करने के लिए कुछ तो मोटिवेशन चाहिए. मेरा मोटिवेशन है कि शुरुआत अलग हो. कम से कम हमारी यह कोशिश होती है कि कुछ तो अलग करूं. ताकि हम एक साल बीता सकें. शुरुआत दिलचस्प होगी तभी ऐसा हो सकता. इसलिए मैं फिल्मों के शीर्षक अलग रखता हूं. हर एक आर्टिस्ट के लिए थॉट प्रोसेस अलग हो तो उससे काम करने की ऊर्जा मिलती है. ऐसा मैं मानता हूं.
अमिताभ आपकी फिल्मों के लकी चार्म रहे हैं?
मैं लकी हूं कि उनका साथ मुझे फिल्मों में मिलता रहा है. वे इस फिल्म में भी हैं. मेरी कोशिश होती है कि मैं उनके पास जब भी कोई प्रोजेक्ट लेकर जाऊं. वह वाकई में लीक से हट कर हो. वरना, इसका कोई अस्तित्व नहीं रह जायेगा. इस फिल्म में वह सेंटर आॅफ द फिल्म हैं.
करीना को फिल्म के लिए हां कहलवाना मुश्किल था या आसान?
मैं जब पहली बार करीना से मिला था. उसी वक्त से वे मुझे अच्छी लगी थीं. वह स्पॉनटेनियस एक्ट्रेस हैं. मैं हमेशा से उनके साथ फिल्म करना चाहता था. मेरी जिंदगी में आज तक मैं जितने लोगों से मिला हूं, मुझे उनमें करीना सबसे खुशमिजाज रहने वालों लोगों में से दिखीं. उन्हें किसी तरह का तनाव नहीं हैं. वह शिकायत नहीं करतीं. हमेशा आराम से रहती हैं. उनके साथ काम करके मुझे आस-पास हमेशा पोजिटिव एनर्जी ही नजर आती रही है. आज के दौर की मैजिकल हीरोइन में से एक हैं करीना. वह काफी नेचुरल हैं. बहुत कम लोगों में सिनेमा की समझ, लुक की समझ, वह ज्यादा शो आॅफ नहीं करतीं. बिंदास रहती हैं और शांत रहती हैं. फटाक फटाक काम करती हैं. बहुत सिंपल पर्सन हैं.बहुत इलेक्ट्रीफाइ हीरोइन हैं. मुझे उनके साथ काम करके बेहद मजा आया.
करीना और अर्जुन को कास्ट करते हुए कहीं उनकी उम्र का ख्याल जेहन में आया?
किसी निर्देशक के जेहन में मुझे नहीं लगता यह बातें आती हैं और लोग जो यह कह रहे हैं कि अर्जुन तो करीना से छोटे हैं. मैं जानना चाहता हूं कि जब कोई हीरो के साथ उससे 15 साल से कम उम्र की लड़की काम करती है तो यह सवाल क्यों नहीं आता कि अरे लड़की कितनी छोटी है. हीरोइन को लेकर हमारे यहां यह अवधारणा बनी हुई है और यह बेहद अफसोसजनक बात है. मुझे तो लगता है कि सबसे ज्यादा महिलाएं ही आंखें तरेरती हैं कि उम्र को लेकर. उम्र की बातें लेकर. यह गलत है. आप इस पर सवाल नहीं उठा सकते. महिलाओं में यह सोच होती है अगर वह दो साल भी बड़ी होंगी तो ढिंढोरा पिटेंगी कि अरे मैं तो बड़ी हूं. बड़ी हूं. बोलेंगी मैं तो बूढ़ी हो गयी हैं. लोगों ने मान लिया होता है कि 30 साल की उम्र लड़कियों के लिए बहुत बड़ी उम्र है. लेकिन मर्दों के लिए बहुत कम होती है. उदाहरण के तौर पर दीपिका पादुकोण अगर 29 वां जन्मदिन मनायेंगी तो खबरें आती हैं कि दीपिका पादुकोण 30 की पड़ाव पर और अर्जुन कपूर के बारे में खबरें आयेंगी कि अर्जुन इस साल जस्ट 30 के हुए. इसमें क्या तूलना है. करीना तो यंग गर्ल है. करीना तो अभी बस 34 की हैं और रनबीर भी 34 के हैं तो रनबीर यंग एक्टर हैं और करीना बुजुर्ग हो गयी हैं. यह गलत माइंडसेट हैं. मेरे लिए आलिया छोटी हैं. लेकिन दीपिका यंग हैं. करीना यंग हैं. मैं वाकई विश्वास करता हूं स्त्रीलिंग पुलिंग सेमथिंग़. दोनों बराबर हैं. मैंने कभी भी पुरुष को पुरुष की तरह या औरत हैं तो औरत की तरह नहीं दिखाया है. मैं हमेशा दोनों को लोग मानता हूं.
इस विषय को लेकर आपकी इतनी स्पष्ट राय बनी. इसकी क्या वजह रही. आपकी परवरिश, माहौल ...?
मैंने हमेशा यूनिसेक्स को अहमियत दी है. मेरी पत् नी हमेशा वह सबकुछ करती है जो मैं कर सकता हूं. मैंने हमेशा वैसे लोगों को ही जिंदगी में भी तवज्जो दी है. जो सम्मान की सोच रखें. दोनों को बराबर देखें. मुझे आरक्षण जैसे शब्दों में विश्वास नहीं है.
विज्ञापन की दुनिया की कुशलता फिल्म मेकिंग में कितनी सहायता करती है?
मैंने हमेशा एक बात सीखी है कि कहानी होनी चाहिए. बिना कहानी वाली मेरी फिल्म नहीं होती. इसलिए इसका श्रेय मैं विज्ञापन जगत को दूंगा. वहां लिखते लिखते आप पॉलिश हो जाते हैं और फिर आप क्रिस्प लिख पाते हैं. सोच पाते हंै. मेरा बजट भी हमेशा कहानी पर ही निर्भर होता है. शमिताभ का बजट काफी था.पा काफी बजट वाली फिल्म थी. लेकिन हां मैंने कंट्रोल तरीके से खर्च करता हूं. शमिताभ की शूटिंग में मैंने महसूस किया कि मुंबई में शूटिंग करना ज्यादा महंगा है. बजाय इसके कि आप कहीं बाहर जाकर शूट करें. यहां सड़क पर छोटी सी शूटिंग के भी काफी फीस देनी पड़ जाती है. वहां ऐसा नहीं है.यह सब एड की दुनिया से आप सीख पाते हैं.
हर फिल्म से कितना सीखते हैं आप?
मंैने कुछ नहीं सीखा. न ही कुछ सीखने की कोशिश करता हूं. मैं किसी फिल्म से कुछ नहीं सीखता. मुझे लगता है कि दुनिया में ऐसी काफी चीजें हैं जिसे आप सीख सकते हैं. मेरा ट्रीक है कि मैं कैसे खुद को अनलर्न्ड रखूं. यहां काफी कुछ है जानने के लिए. मैं ज्यादा जानना की कोशिश करता हूं तो मैं कंफ्यूज्ड हो जाता हूं. सो, मेरी कोशिश होती है कि मैं कई चीजें नहीं सीखता. मैं तो कोशिश करता हूं कि मैं सबकुछ रिमूव करता चलता हूं

20160321


नल्ला कहलाने में हर्ज़ ही क्या है : आसिफ शेख


उन्हें खुद को नल्ला कहलाने में कोई हर्ज नहीं, क्योंकि जब वह किरदार निभा रहे होते हैं तो उसमें वह अपना 100 प्रतिशत देते हैं. वे मानते हैं कि वे कोई माइथोलॉजिकल किरदार नहीं निभा रहे. इसलिए कभी किसी छवि में बंध कर रह जाने का उन्हें डर नहीं है. वे भाभीजी घर पर  हैं के लेखक व निर्देशक की तारीफ इस लिहाज से करते हैं कि इस शो में महिलाओं को बहुत सम्मानित किरदार मिला है. बड़े परदे पर की एंड का की रिलीज में वक्त है. लेकिन छोटे परदे पर विभूति हाउस हस्बैंड के किरदार से दर्शकों को अपना कद्रदान बना चुके हैं.
लंबे अरसे के बाद किसी शो को पारिवारिक मत से कामयाबी मिली है. आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
हां, भाभीजी घर पर हैं की लोकप्रियता की सबसे खास बात यही है कि इसे हर वर्ग के दर्शक पसंद करते हैं. और इसकी वजह यह है कि इस शो में महिला किरदारों को बहुत ही सम्मानजनक किरदार में दिखाया जा रहा है. उनसे दोनों पुरुष किरदार भले ही मजाक करते हैं. लेकिन पूरे लहजे के साथ करते हैं. इस वजह से दर्शकों तक पहुंच पाया है. हम इसमें कनर्वसेशनल कॉमेडी कर रहे हैं. बातचीत में कॉमेडी आ जाती है. आम बोलचाल की भाषा है. और विशेष कर जिस शहर से संबंधित है यह शो वहां के लहजे को हमने अच्छे से पकड़ा है. और इसके लिए शो के लेखक मनोष संतोषी और शंशाक बाली बधाई के पात्र हैं. कई लोग पूछते हैं कि शो में नल्ला कह कर बुलाया जाता है. बुरा लगता है. मैं कहता हूं किरदार है. और किरदार के लिए कुछ भी करूंगा. चूंकि मैं काम को लेकर हमेशा से बहुत अनुशासित रहा हूं. मेरी पत् नी तो मजाक में कहती है कि मुझसे अधिक अनीता और अंगूरी भाभी के साथ वक्त बिताते हो.
बड़े परदे पर हाउस हस्बैंड के कांसेप्ट पर की एंड  का आ रही है. लेकिन छोटे परदे पर आप इसकी अगुवाई कर चुके हैं?
जी हां, और मुझे लगता है कि यह शो सिर्फ कॉमेडी शो नहीं है, इसके माध्यम से अगर संदेश जा रहा है कि महिलाओं को कभी कमतर न आंकें. गौर करें तो प्राय: हम मजाक महिलाओं का बनाते हैं. लेकिन इस बार पुरुष किरदार टारगेट हैं. हाउस हस्बैंड होने में कोई बुराई नहीं है. मैं निजी जिंदगी में भी खाना पकाना बहुत पसंद करता हूं और जब भी छुट्टी हो मैं कोशिश करता हूं कि अपनी पत् नी और बच्चों के साथ नये नये व्यंजन पकाऊं. यकनी पुलाव मेरा सिग्नेचर डिश है. और मुझे इसमें कोई शर्म नहीं आती. 
शो जब हिट हो. किरदार हो तो किसी छवि में बंधने की भी गुंजाईश होती है. आपकी क्या राय है?
मुझे नहीं लगता कि मैं कोई माइथोलॉजिकल किरदार निभा रहा हूं. इससे पहले भी मैंने कई कॉमेडी किरदार निभाये हैं. तब नहीं बंधा. अब भी नहीं बंधूगा. विभूति कोई एक्स्ट्रा आॅर्डिनरी किरदार नहीं है. आम लोगों के बीच का किरदार है. इसलिए अधिक सहज भी लगता है. और इस किरदार को निभाना कठिन इसलिए है कि एफर्टलेस कॉमेडी कठिन होती है. और मैं स्पॉनटेनियस एक्टर हूं . थियेटर से जुड़ा रहा हूं हमेशा से. लेकिन फिर भी स्पॉनटीनिटी देने की कोशिश करता हूं. वही शो की खूबी है. किरदार की भी. इस किरदार के साथ सबसे बड़ी चुनौती है कि किस तरह हर दिन दर्शकों को मनोरंजन दें. वे बोर न हो. वरना, आज तो विकल्प बहुत हैं. हमें अपने किरदार में पोटेनशियल बरकरार रखना होगा. हर दिन बेस्ट देना होगा.तभी टिके रहेंगे.
आपने टेलीविजन और फिल्मी दुनिया में एक लंबा सफर तय किया है. पीछे मुड़ कर देखते हैं तो कैसा लगता है?
मैं संतुष्ट हूं. मुझे याद है, जब मेरे पास काम नहीं था और मैं जिम जाता था. खुद को फिट रखने की कोशिश करता था. तो उस वक्त लोग बोलते थे कि काम नहीं है, इसलिए यह सब कर रहा. लेकिन मेरा मानना था कि एक्टर को सदैव तैयार रहना चाहिए. कभी भी किसी रोल के लिए बुलावा आ सकता है. सो, मैंने हमेशा खुद पर ध्यान दिया है. खुदा ने आपको बेहतरीन जिंदगी और शरीर दिया है. उसकी खिदमत क्यों न की जाये. सो, मैं अपने खाने-पीने पर भी पूरी निगरानी रखता हूं. मां की बातों पर चलता हूं कि पेट से ही बीमारियों की शुरुआत होती है. यह सब बातें इसलिए कि पिछले लंबे समय से मैंने कोशिश की है कि मैं खुद को फिट रखूं, क्योंकि एक एक्टर की यह डिमांड है. मैं थियेटर लगातार करता रहा. तो मेरे अंदर की भूख शांत होती रही. हर तरह के किरदार निभाये हैं मैंने. और मैं अपने काम से कभी बोर नहीं होता. सो, बहुत एंजॉय करता रहा हूं अपने करियर को. इसलिए खुश भी हूं. सच कहूं तो मैं अपनी तारीफ को बहुत गंभीरता से नहीं लेता. लेकिन काम को लेता हूं. 
टेलीविजन के बदलते दौर को किस तरह देखते हैं?
मुझे लगता है कि काफी अच्छे बदलाव हुए हैं. हां, मगर यह कहूंगा कि नये नये कांसेप्ट पर काम होना चाहिए,. यह नहीं कि कोई एक शो हिट हो जाये तो उसी ढर्रे पर अगले शोज भी बने. फिर परेशानी होगी.

परदे के पीछे की होली


 होली के गीत सुनने की बजाय देखना अधिक सुखद होता है. वजह यह है कि रंगों की खूबसूरती, उसकी रौनक हमें अपनी तरफ आकर्षित करती है. शायद यही वजह है कि हिंदी फिल्मों में जब जब होली के गीत व दृश्य फिल्माये गये हैं. कलाकारों के चेहरे चमकते और अंदाज हमेशा मतवाला नजर आया है. लेकिन शायद ही दर्शक इस बात से वाकिफ होंगे कि होली के दृश्यों को फिल्माने में कलाकारों के मेकअप से लेकर उनके कैमरे के एंगल जैसी कई बारीकियों को ध्यान में रखते हुए दृश्य पूरे किये जाते थे. हिंदी सिनेमा के कुछ ऐसे ही परदे के पीछे के कलाकारों ने अनुप्रिया अनंंत को बताया कि कैसी होती थी होली के गानों की खास तैयारी. 

 शोले और बागवान फिल्म की होली का मेकअप : दीपक सावंत
अमिताभ बच्चन का और हिंदी फिल्मों में होली के गीत-संगीत का एक खास् संगम रहा है. अब तक हिंदी फिल्मों के होली के लोकप्रिय गीत अमिताभ बच्चन के खाते में ही गये हैं. जाहिर सी बात है कि उनके साथ लंबे अरसे से जुड़े रहे उनके पर्सनल मेकअप आर्टिस्ट दीपक सावंत उस सारे गाने और दृश्यों के ंिनर्माण के साक्षी रहे हैं. सो, वे खुद उस दौर की यादों को साझा करते हुए बताते हैं कि जब भी होली के  गीत या किसी दृश्य की शूटिंग होती है तो यह जरूरी नहीं है कि एक दिन में शूटिंग हो जाये. ऐसे में एक मेकअप मैन की भी बड़ी जिम्मेदारी रहती है कि वह कलाकार के त्वचा पर इस तरह पूरा मेकअप करें कि उनकी त्वचा को नुकसान भी न और अगले दिन भी वे उसी कंटीन्यूटी में नजर आ सकें. फिल्म शोले के होली के गीत दुश्मन भी गले मिल जाते हैं कि शूटिंग एक दिन में नहीं हुई थी. उस दृश्य के लिए अमिताभ बच्चन का उन्होंने खास तरह से मेकअप किया था. फिल्म बागवान के गीत होली खेले रघूवीरा में भी खास अंदाज में फिल्माया गया था और अमिताभ बच्चन का उन्होंने खास मेकअप किया था. दीपक बताते हैं कि कम लोगों को यह जानकारी होगी कि हमलोग भी स्टार्स के मेकअप से पहले उन्हें तेल लगाते हैं. होली के मेकअप से पहले यह बेहद जरूरी है. क्योंकि कितने भी नेचुरल कलर हों. अगर ड्राइ कलर त्वचा पर रहेगी तो बिना तेल के रंग उतारना कठिन होता ही है तो हम तेल जरूर लगाते हैं. साथ ही दूसरे दिन की कंटीन्यूटी में वही रंग उसी जगह पर उसी अंदाज में होना यह सब का ध्यान रखना भी हमारा ही काम होता है. दीपक बताते हंैं कि होली के गानों की शूटिंग का सबसे खास मजा यह रहा है कि माहौल में बहुत मस्ती रहती है और अमिताभ का पसंदीदा त्योहार है होली. वे इसका जम कर आनंद उठाते हैं. यही वजह है कि उनके चेहरे पर वह रौनक और चमक दिखाई देती है.

ँपंडारी दादा ( फिल्म डर के प्रमुख मेकअप आर्टिस्ट)
पंडारी दादा फिल्म डर के प्रमुख मेकअप आर्टिस्ट थे. वे बताते हैं कि इस फिल्म को यश चोपड़ा खास तरीके से फिल्माना चाहते थे. वे खुद बहुत  मस्ती पसंद थे और यही वजह थी कि वे फिल्म में होली के गीत को बहुत फिल्माने अंदाज में प्रस्तुत करना चाहते थे. उन्होंने इससे पहले फिल्म सिलसिला में भी होली के गाने को फिल्माया था. लेकिन वह यह भी चाहते थे कि यह गाना उसकी नकल न लगे. उसका अपना रूप लगे. पंडारी बताते हैं कि खास तौर से अभिनेत्रियां अपने बालों और चेहरे को लेकर काफी सजग रहती थीं. जब जब उन्हें होली के गानों की शूटिंग करनी होती थी. हमारी कोशिश होती थी कि हम उनके बालों में चोटी कर दें. उस दौर में सागर चोटी काफी लोकप्रिय थी. हम लोग बालों को समेट कर इसलिए चोटियां बनाते थे, ताकि बालों में अबीर या रंग न जाये और वॉश के बाद वह हट जाये. यही वजह रही कि आप देखें जूही ने गाने में बालों को बांधे रखा है और दूसरी तरफ रेखा ने भी फिल्म सिलसिला में बालों में चोटियां बनायी हैं. शूट खत्म होते ही हम लोग फौरन चेहरे से रंग हटा दिया करते थे. इस दौरान हम मोइश्जराइजर का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते थे. कंटीन्यूटी एक महत्वपूर्ण मुद्दा होता था. उसका ख्याल हम जरूर रखा करते थे.
बलम पिचकारी में जमकर रंगे गये रणबीर कपूर : अयान मुखर्जी, निर्देशक
फिल्म ये जवानी है दीवानी के गीत बलम पिचकारी युवाओं का पसंदीदा होली गीत है. रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण ने इस गाने में जम कर मस्ती की है. लेकिन इस गाने की मेकिंग के पीछे की एक रोचक बात खुद निर्देशक अयान मुखर्जी ने शेयर की.कि रणबीर कपूर को रंगों से एलर्जी है और यही वजह है कि जितनी बार टेक्स होते थे. वे फौरन अपना चेहरा पानी से साफ कर लेते थे. हमने वहां एक रंगों से भरा टब बना रखा था और जिसे भी मौका मिल रहा था. सब एकदूसरे को उसमें डाल दे रहे थे. सबसे ज्यादा मस्ती मैंने की थी. कोई भी अपना चेहरा जैसे ही साफ करके आता. मैं दोबारा उन्हें रंग लगा दे रहा था. सब मुझ पर चिल्ला रहे थे. लेकिन मुझे काफी मजा आया था. और रेमो डिसूजा ने भी जैसे स्टेप्स दिये थे. वह क्लासिक थे. शायद यही वजह है कि न सिर्फ गाना मेरे लिए वह पूरा एक्सपीरियंस हमेशा खास रहेगा. चूंकि मैं होली में जम कर मस्ती करता हूं. हर साल. खास बात यह भी थी कि मैंने किसी को कहा नहीं था. कि गाने की शूटिंग हो चुकी है. लेकिन एक दिन का और शूट रखा था और उस दिन हमने कीचड़, रंग सबकी बाल्टी तैयार करके रखी थी और जम कर सारे स्टार्स को नहलाया था. वे सोच रहे थे कि शूटिंग है. लेकिन माजरा तो कुछ और ही था.
्रगणेश आचार्य, कोरियोग्राफर, एक् शन रिप्ले का होली गीत
मुझे हमेशा ही होली के गीतों की कोरियोग्राफी करने में मजा आता है. फिल्म एक् शन रिप्ले का गीत तेरी तो कसम से कोयला... गीत की कोरियोग्राफी मैंने की थी और काफी एंजॉय किया था. इस गीत में जो सबसे बड़ी चुनौती थी कि हम गु्रप डांस तो कर ही रहे थे. तो उसमें सबके स्टेप्स एक साथ मैच करने जरूरी थी. फिर जमीन पर बहुत सारी रंगोली बनी हुई थी. जो हर बार अबीर और गुलाल के उड़ने से गंदी हो जा रही थी. तो उसे हर बार साफ करना पड़ रहा था. हर टेक में. इस गाने के साथ एक खास बात यह हुई थी कि ऐश्वर्य और निर्देशक ने तय किया था कि उस वक्त पानी की समस्या बढ़ी हुई थी मुंबई में तो पूरे गाने में सुखे अबीर के साथ ही यह गीत शूट हुआ था. 

हम तो ऋषि दा ऋषि दा कह कर धड़ल्ले से चले जाते थे : दीप्ति नवल


दीप्ती नवल  खुद को बेहद खुशनसीब मानती हैं कि उन्होंने जितनी फिल्मों में भी काम किया, उन फिल्मों का गीत-संगीत जहीन रहा. चूंकि वे खुद संगीत से बहुत राबता रखती हैं और यही वजह है कि उन्होंने एंड टीवी के शो मेरी आवाज ही पहचान है के लिए हामी भरी.

आप खुद को लकी मानती हैं कि आपको जितनी भी फिल्में मिलीं, उनका गीत संगीत सदाबहार बना.
 शुक्र करती हूं कि मैंने ऐसी फिल्मों में काम किया है, जिनमें गाने हैं. मैं उन आर्टिस्ट में से एक हूं, जिनकी फिल्मों में जितने भी गाने रहे. हिट रहे हैं. हिट इस लिहाज से नहीं कि वे सिर्फ सुने गये हैं, बल्कि इस लिहाज से कि वे सारे गाने याद रखे गये हैं. और यह मेरे लिए बड़ी कामयाबी है. जो भी मैंने काम किया है. मैं तो काफी चयन करके काम करती आयी हूं. लेकिन फिर भी मेरे हिस्से अच्छे गाने आये. बात करें तो चश्मएबद्दूर का गीत कहां से आये बदरा. उस गाने का पिक्चराइजेशन मुझे बेहद पसंद है. कथा फिल्म का संगीत भी मुझे बेहद प्रिय है. नसीर और मेरा गाना है मैंने तुमसे कुछ नहीं मांगा...फिल्म कथा का ही. ये सारे गाने कितने मेलोडियस थे. कमला फिल्म का एक गाना... जो कि बैकग्राउंड में है. मैं उससे भी जुड़ी रही हूं. फिल्म अंगूर का गीत है आशाजी ने मेरे लिए गाया है. साथ-साथ के गाने भी बेहद प्रिय है. फिल्म मैंने फिल्म की थी अनकही, संगीत जयदेव साहब जी का है. वह सब मेरे लिए यादगार है. आशाजी ने मेरे लिए बहुत सारे गाये हैं. लताजी ने मेरे लिए जो गीत गाया था. उठइले घूंघटा हम पांच के लिए. लताजी ने गाया है मेरे लिए एक बार चले आओ. वह टाइटिल सांग है. फिर दिल ने पुकारा यह सब मुझे प्रिय हैं.
यानी आपको हमेशा से संगीत में दिलचस्पी रही है.
जी हां, बिल्कुल संगीत तो हमारे रगों में हैं. वो तो हमसे निकल नहीं सकते. हम भारतीय हैं. हमारे यहां तो हर मौके पर संगीत है. फोक चाहिए ही. हर रस्म के लिए. संगीत है ही. और यही संगीत की खूबी है. भारतीय संगीत की खूबी है.
फिर आपने कभी इस विधा को गंभीरता से नहीं लिया?
नहीं, ऐसा नहीं है कि इसे लेकर गंभीर नहीं हूं. शुरू में काफी कोशिशें की. कई बार शुरू किया. लेकिन अनुशासित होकर पूरा नहीं किया. यह कमी मुझे खलती है और बहुत खलती है. लेकिन अब सोच रही हूं कि इसे गंभीरता से करूंगी. इस सीरियल में भी मुझे वह रोल मिल गया है, तो मेरे लिए बड़ी बात है कि मैं अब इसे गंभीरता से सीख सकूंगी. मैं काफी अरसे से अच्छे गुरु की तलाश में थी. मैंने बचपन में संगीत सीखा है. जब बहुत छोटी थी. आज भी कहीं कोई राग बजता है तो मैं कहती हूं कि ये राग मुझे याद है. ये तो वह राग है. वह इस राग का गीत है. तो मुझे लगता है कि मैैं  गा सकती हूं. मुझे उन राग के आरोह अवरोह याद है. पकड़ याद है. लेकिन नाम नहीं याद है. मुझे राग की ऐसी पहचान है कि हां यह गीत किसी राग का तो है. तो मैं वह सबकुछ रिवाइव करना चाहती हूं और मुझे लगता है कि यह शो मेरी जिंदगी में बिल्कुल सही वक्त पर आया है कि मुझे संगीत की तरफ लेकर जायेगा और अभी मेरे पास वक्त भी है.
आशाजी और लताजी दोनों ने आपके लिए प्लेबैक सिंगिंग किया है. उनसे जुड़ी कुछ यादें शेयर करें?
हां,बिल्कुल मेरी कोशिश होती थी उस दौर में कि मैं गानों की रिकॉर्र्डिंग में वहां मौजूद रहूं. हालांकि कई बार नहीं भी रह पाती थी. एक्टर्स का रहना अनिवार्य नहीं होता था. लेकिन चूंकि लगाव था तो मैं जाती थी. मैं अंगूर फिल्म की रिकॉर्र्डिंग के लिए गयी थी. वहां पर आरडी साहब थे, गुलजार साहब थे, आशाजी थीं, सभी लोग जिस मजाकिया अंदाज में और मजे लेकर काम करते थे. मजा आता था उनकी संगत में और खास बात यह है कि मैंने उन तसवीरों को आज भी संजो कर रखा है और आज भी उसे बार बार देखती हूं. तो वे सारी यादें ताजा हो जाती हैं.गुलजार साहब के साथ तो खूब बनती थी. जैसे जयदेव साहब की सारी रिकॉर्र्डिंग में मुझे होना चाहिए था. चूंकि उस फिल्म के सारे गाने मुझे पसंद हैं. लेकिन मैं किसी भी रिकॉर्र्डिंग में नहीं थी. तो इस बात की बहुत तकलीफ हुई थी मुझे. मैं उस वक्त अमेरिका में थी. तो मैं मिस करती हूं कि वह मेरी मेमोरी का हिस्सा क्यों नहीं बन पाया. काश बन पाती उस फिल्म की यादें. लताजी के साथ भी काफी स्रेह मिला हमेशा. उनकी खासियत यही है कि वे काम को लेकर डेडिकेटेड रहीं और छोटे बड़े सभी को सम्मान देती हैं और हमेशा आपको सकारात्मक बातें ही कहेंगी. संगीत स्टूडियो में मुझे याद नहीं कि रिकॉर्र्डिंग के दौरान शायद ही उन्होंने कभी चप्पल पहनी होगी, वे पूजा की तरह संगीत को पूजती रहीं.
आपने एक लंबा सफर तय किया है. कामयाबी भी हासिल की. मुकाम बनाया. अब भी क्या कोई चाहत है, जिसे पूरी करना चाहती हैं?
जी हां, बिल्कुल मैं लिखना चाहती हूं,  संगीत सीखना चाहती हूं. पेंटिंग इन दिनों थोड़ी पीछे रह गयी है. लेकिन धीरे धीरे उसे फिर से ट्रैक पर लाना चाहती हूं. मुझे तो लगा है कि अब तक सीखा ही क्या है. आज भी बहुत सी चीजें हैं जो और सीखना चाहती हूं.
आज भी खुद को ऊर्जा से भरपूर रखने के लिए क्या करती हैं?
मुझे लगता है कि ये जो ललक है न कि अभी आपने सीखा ही क्या है, यही आपको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है. एक आर्टिस्ट में भूख तो रहनी ही चाहिए. आप इत्तमिनान हो गये कि हां मैं तो बहुत ग्रेट हूं और आपकी सारी ख्वाहिशें पूरी हो गयीं तो इसके बाद तो आपका खत्म है. वह लगते रहना चाहिए कि अभी तो कुछ करना है. मौका तो मिला ही नहीं है तो वे चीजें आपको इंस्पायर करना है. मुझे तो लगता है कि अभी तो बहुत सारे रोल करने है. अब तक वे रोल मिले ही कहां हैं. वही एक चीज है जो आपको प्रोत्साहित किये रहती है.
 आपने किरदार की बात कही है. तो वे कौन से किरदार हैं, जिसे आप निभाना चाहेंगी?
अगर कभी मौका मिला तो मैं लता मंगेशकर जी का किरदार निभाना चाहूंगी. अगर उन पर कभी फिल्म बनी तो मैं जरूर करना चाहूंगी. उनकी जिंदगी के दिलचस्प शेड्स रहे हैं. वे काफी रोचक हैं. एक कलाकार के लिए मौके होंगे. उसमें खेलने के लिए. मुझे आशा भोंसले, रेशमा का किरदार, गीता दत्त जी का किरदार निभाने का मौका मिले तो भी निभाऊंगी.
आपको किस तरह के किरदार अधिक आकर्षित करते हैं. कभी नेगेटिव किरदार निभाने के बारे में नहीं सोचा. क्या वजह रही है कि आप नेगेटिव किरदारों में कम नजर  आयी हैं?
जी बिल्कुल चाहत है. लेकिन शायद लोग पहले ही मान बैठते हैं कि मैं नेगेटिव करूंगी ही नहीं. मेरा पर्सोना वैसा नहीं होगा शायद, शुरू से सॉफ्ट स्पोकन रही हूं. एक ये वजह हो सकती है. लेकिन एक टीवी शो था मुक्ति बंधन. उसमें मैंने साध्वी का किरदार निभाया. छोटा सा था. लेकिन मजा आया. क्योंकि उसके ग्रे शेड्स थे. और मैंने उसे एंजॉय किया. अलग था वह अब तक जो भी मुझे आॅफर होते आये थे. आप देखें कि फिल्म एनएच 10 में मैंने थोड़ा सा अलग किया तो मुझे सारे अवार्डस उसी फिल्म के लिए मिल गये.
आप मानती हैं कि जहां कला है, वहां कांप्टीशन है?
हर आर्टिस्ट को तलब रहती है कि हमें अपना बेस्ट करना है. हर किसी से अच्छा करना है. ख्वाहिश होती ही है. मुझे जब लोगों ने चशमए बद्दूर के वक्त कहा था कि वाह क्या नेचुरल एक्ट्रेस है तो मैं उसी वक्त मान बैठती कि वही अचीवमेंट है तो रुक जाती. वह तो शुरुआत थी न. किसी कलाकार को तसल्ली नहीं होनी चाहिए. और इसे ही लोग कांप्टीशन का नाम देते हैं तो हां है कांप्टीशन. ये है तभी तो आप खुद को निखारने की कोशिश करेंगे.  जैसे मुझे याद है, जगजीत साहब ने मुकेश साहब का गाना सुन कर कहा था, काश मैं भी ऐसा गा पाते. इसका यह मतलब नहीं कि जगजीत साहब का अपना मुकाम नहीं. मुझे लगता है कि इसे इंस्पायरड कह सकते. आर्ट में नेगेटिविटी की जगह नहीं है.
पुराने दौर से अब के दौर में फिल्मों में काफी माहौल में, रिश्तों में बदलाव आ चुके हैं? आप इसे कैसे देखती हैं?
हां, बदलाव तो बहुत आ चुके हैं. उस दौर में तो हम बच्चे थे. कोई तैयारी नहीं थी. हम उस दौर में बच्चों की तरह ऋषि दा, कह कर धड़ल्ले से घुस जाते थे. सवाल पूछते थे. फिल्मों में काम न भी करते हों तो हम हर निर्देशक से मिलते थे. उनसे सीखते थे. माहौल दोस्ताना था. तभी तो फारुख जैसे दोस्त मिले. गुलजार साहब के साथ अच्छा वक्त गुजरा. काफी कुछ सीखा. नसीर साहब कई कलाकारों की संगत मिली. लेकिन आज आप किसी भी डायरेक्टर को ऐसे अप्रोच नहीं कर सकते. मैंने सुना है कि आज तो काफी प्रोफेशनल हो गये हैं सब. यंगस्टर्स किसी निर्देशक से यूं ही नहीं मिल सकते. हम तो आये. रोल मिला. सराहना हुई. काम चलता रहा.
अब तक के सफर को किस तरह देखती हैं?
चैलेंजिंग तो रहा है. अपने सिद्धांतों के साथ सुदृढ़ रह कर काम करना कठिन रहा है.  हो सकता है कि सिद्धांतवादी न होती तो और भी चीजें अचीव हो जातीं, कुछ और भी चीजें मिल जाती. कुछ लोग मिल जाते.लेकिन अपने ढंग से रहते हुए 

चेहरे को रुमाल से ढंक कर बच्चों के साथ क्रिकेट खेलते थे परेश : स्वरूप संपत


स्वरूप संपत लंबे अरसे के बाद बड़े परदे पर वापसी कर रही हैं. और इस बार वे अपने किरदार से बेहद खुश हैं. स्वरूप मानती हैं कि उन्होंने जीवन में जो भी हासिल किया है. वे उसमें बहुत संतुष्ट हैं. उनके चेहरे के तेज से भी यह बात साफ जाहिर होती है. 

 की एंड का में ऐसी क्या खास लगी कि आपने हां कह दिया?
ऐसा नहीं है कि इसके पहले मुझे फिल्में आॅफर नहीं हो रही थीं, लेकिन प्राथमिकताएन्ं अलग थीं. शादी के बाद मेरे बच्चे मेरी प्राथमिकता थे. एक बात मैं हमेशा परेश को मजाकिया अंदाज में कहती हूं कि वह लाउजी टीचर हैं, वह बेहतरीन एक्टर हैं मगर. तो मैंने उनसे कहा कि आप एक्टिंग करो. मैं बच्चों को संभालती हूं. ( हंसते हुए)परेश तो चाय भी नहीं बना पाते. फिर मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की. पीएचडी किया. और मुझे लगता है कि जिस वक्त मुझे मां का किरदार निभाने वाले आॅफर आ रहे थे. मैं उस वक्त काफी युवा थी. तो मुझे वह भी पसंद नहीं था. हिंदी फिल्म की यह परेशानी है कि अगर हीरो या हीरोइन नहीं तो मां का ही रोल मिलेगा. तो वह मैं उस वक्त तैयार नहीं थी करने के लिए. मुझे कोई हिस्ट्री नहीं बनानी. हां, मगर मुझे कैमरे से बहुत प्यार है. मुझे काम करना पसंद है. जब भी मैं कैमरे के सामने जाती हंूं तो लगता है कि जन्नत में आ गयी हूं. मैं कैमरा देख कर बहुत खुश होती हूं. मैं काफी मिस करती थी काम करना. लेकिन मुझे स्ट्रगल नहीं करना. इसलिए सही वक्त का इंतजार कर रही थीं.
पीछे मुड़ कर देखती हैं तो कैसा लगता है?
मुझे तो लगता है कि मैंने अच्छा काम किया है. लेकिन थैंक गॉड स्ट्रगल नहीं करना पड़ा. मैं हमेशा टॉप मॉडल रही. मिस इंडिया यूनिवर्स बनी. मुझे उस दौर में ऋषि दा और यशराज से आॅफर आते थे, जो कि बड़े निर्देशकों में से एक रहे. और दोनों ने मुझे लीड के लिए बात की थी. तो उस दौर में भी काम चल कर आता था. तो उस वक्त संघर्ष नहीं किया तो अब तो सवाल ही नहीं उठता.
आपके परिवार की क्या प्रतिक्रिया रही?
मुझे जब रोल आॅफर हुआ तो मैं डर भी रही थी कि ये रोल करूं कि न करूं. 30 साल हो चुके थे. लेकिन मेरे छोटे बेटे आदित्य, जो कि स्क्रीन राइटिंग की पढ़ाई कर रहे हैं. तो उनको मैंने स्क्रीप्ट दी तो उसने ही कहा कि तुम्हें फिल्म करनी चाहिए. ट्रेलर देख कर परेश और दोनों  बेटों की प्रतिक्रिया बहुत अच्छी थी. तो मुझमें भी आत्मविश्वास आया.
घर पर कैसा माहौल रहता है. सभी फिल्मी और थियेटर क्षेत्र से जुड़े हैं?
हमलोग काफी फिल्मों की बातचीत करते हैं. फिल्में देखते हैं. मैं तो बेटों केसाथ बैठ कर काफी वर्ल्ड सिनेमा की फिल्में देखती हूं और फिर हम उस पर चर्चा भी करते हैं. मुझे याद है, शुरुआती दौर में हमने तो मेड भी नहीं रखा था. जब हम दोनों काफी काम करते थे. तो 15-15 दिन बाहर रहते थे. और अगर घर पर रहे भी तो शूट से देर रात लौट कर आते थे. तो सुबह कौन जगे तो उस वक्त मैं और परेश ही मिल कर घर के सारे काम निबटाते थे. परेश साफ सफाई को लेकर बहुत कांसस हैं. आपने अतिथि कब जाओगे देखी होगी. आपको उससे अनुमान लग जायेगा. और परेश की यह खासियत है कि वह यह नहीं सोचते कि मर्द और औरतों वाले काम हैं. हां, वह खाना नहीं बना पाते. लेकिन साफ सफाई का पूरा ध्यान वही रखते हैं.
बतौर पिता बच्चों की परवरिश में परेश की किस तरह की भागीदारी रही?
परेश ने काम और बच्चों के साथ अपने वक्त को काफी अच्छे मैनेज किया हमेशा. वे बच्चों को न सिर्फ संस्कार देते रहे हैं. बल्कि उनके साथ वे क्रिकेट भी खेलते थे. क्योंकि वे जानते थे कि बच्चों को इससे लगाव है. मुझे याद है. रुमाल बांध कर वह चेहरा छिपा कर क्रिकेट खेलते थे. आज भी खेलते हैं. ताकि लोग उन्हें पहचाने न और वे बच्चों के साथ क्वालिटी वक्त बिता सकें. उनकी वजह से ही बच्चे पोयेटरी, साहित्य ऐेसी चीजों से जुड़ पाये हैं और मुझे लगता है कि माता-पिता अगर साहित्य सभ्यता से जुड़े हैं तो बच्चों पर असर होता ही है. प्रभावित होते ही हैं. और यह अच्छी ही बात है न. मेरे बच्चों के लिए थियेटर कुछ अजीब चीज नहीं है. वह जानता है कि वहां की दुनिया कैसी होती है. मेरा बड़ा बेटा अनिरुद्ध नसीर भाई के साथ काम करता है. मुझे लगता है कि वह बेहतरीन प्रोडक् शन अस्टिेंट हैं. फिल्म देखते हैं तो उन पर उनका नजरिया होता है. यह सब माता पिता की वजह से ही मिला है.
और किन किन  चीजों में दिलचस्पी है?
मुझे लोगों से मिलना पसंद है. अनप्रिभलेज्ड चाइल्ड, एजुकेशन को लेकर काम करती हूं तो अच्छा लगता है. 

बस इतनी सी ख्वाहिश है


नाम दौलत शोहरत हासिल करने के बावजूद कुछ ख्वाहिशें ऐसी भी होती हैं , जिनका मोल कोई मोल नहीं।  हिंदी सिनेमा के कुछ ऐसे ही सितारें हैं, जिनकी वह एक चाहत अबतक पूरी नहीं हुई है। कुछ ऐसे ही स्टार्स और उनकी ख्वाहिश पर अनुप्रिया अनंत की रिपोर्ट।



माँ का बचपन लौटाने की चाहत :आमिर खान
हर माता पिता की चाहत होती है कि वे अपने बच्चे की सारी चाहतों को पूरी करें। लेकिन ऐसे मौके कम होते हैं जब आपको अपने माता पिता की चाहत पूरी करने का मौका मिले। आमिर का बनारस से गहरा नाता है। आमिर खान ने हाल में अपना 51वां जन्मदिन मनाया। उन्होंने अपनी बातचीत में इस बात का जिक्र किया कि उनकी सबसे बड़ी ख्वाहिश है कि वह चाहते हैं कि उनकी अम्मी का जो एक पुश्तैनी मकान बनारस में है। वह  चाहते हैं वे उसे खरीद कर मां को तोहफे के रूप में दें। फिलवक्त वहां कोई अन्य लोग रह रहे हैं। उनकी चाहत है कि वे जाएं और वहां के लोगों से गुजारिश करें कि वह घर उन्हें दे दें। आमिर खान बताते हैं कि उनकी अम्मी का बचपन वहाँ बीता है। और वे इस तोहफे से अपनी अम्मी को उनका बचपन लौटाना चाहते हैं। आमिर ने हिंदी सिनेमा जगत में बड़ा मुकाम हासिल किया है। लेकिन इसके बावजूद अब भी उनकी चाहत है कि वह इस हसरत को पूरी करें। 
खंडवा में बाकी की जिंदगी बिताना चाहते थे किशोर कुमार
किशोर कुमार की हमेशा से चाहत रही थी कि वे काम के बाद अपना पूरा वक़्त अपने पैतृक स्थान खंडवा में जाकर बिताएं। लेकिन वे अपनी जिंदगी में इतने मशगूल हो गए कि वे वहां जाकर कभी अपनी जिंदगी के हसीन पल नहीं बीता पाये। इस बात का अफ़सोस उन्हें हमेशा सालता रहा। किशोर कुमार ने हमेशा अपनी बातचीत में हमेशा इस बात का जिक्र किया है। हालांकि वे हमेशा खंडवा जाते रहते थे। एक बार तो वह खुद वहां बैलगाड़ी से  पहुंच गए। वे हमेशा जमीन से जुड़े रहे।
स्मिता का मेकअप
स्मिता पाटिल अपने जमाने की मशहूर अभिनेत्री रहीं। वे हमेशा कम मेकअप करती थीं।लेकिन उनकी एक चाहत हमेशा रही कि जिस तरह राज कुमार अपना मेकअप लेट कर करवाते थे। स्मिता की भी चाहत थी कि वह भी लेट कर अपना मेकअप कराएं। उन्होंने हमेशा मेकअप मैन से कहती थी कि उनका मेकअप भी उसी तरह से किया जाये। लेकिन उनके मेकअप मैन ने मना कर दिया था। उनकी यह चाहत तो जीते जी पूरी नहीं हो पायी। तो उनकी मौत के बाद उनका उसी अंदाज़ में मेकअप किया गया था। उनकी यह हसरत कुछ इस तरह आधी भी रही और पूरी भी हुई।
कैफ़ी का घर
शबाना आज़मी

शबाना आज़मी भी हमेशा अपने पिता कैफ़ी आज़मी की पुश्तैनी घर को लेकर भावुक रही हैं। और हाल में काफी मशक्ततों के बाद उन्हें वह घर वापस मिल रहा है। और अब वे उसे एक खूबसूरत रूप देकर तैयार करना चाहती हैं। शबाना उस घर को अपना तीर्थ स्थल मानती हैं। शबाना आज़मी ने इस घर को हासिल करने में काफी मुश्किलों और अड़चनों का सामना किया है। वे हमेशा कहती हैं कि उनकी हमेशा से चाहत रही है कि वे अपने पिता के इस घर को अपनी जिंदगी में अहम हिस्सा दें। वे उस घर की इत्मिनान से मरम्मत करा कर उसे एक यादगार घर का रूप देना चाहती हैं।
प्रीतम का पहला घर
प्रीतम ने हमेशा अपने पहले घर को अहमियत दी है। उनकी चाहत है कि वे उसे अपनी जिंदगी में कभी भी उसे बेंचने की कोशिश नहीं करेंगे। से हमेशा कहते हैं कि यह उनका लकी घर रहा है। वे आज भी उसे लेकर बहुत भावुक हैं। उन्होंने हमेशा इस बात का जिक्र किया है कि जब उनके पास बहुत पैसे नहीं थे तब उन्होंने वह घर ख़रीदा था। इसलिए वे उसे लेकर काफी उत्साहित थे। उस घर में वे अभी भी जाते रहते हैं।वहाँ उन्हें बहुत सुकून मिलता है

हद से ज्यादा इमोशनल हूं : फवाद खान


उन्होंने दस्तक तो जिंदगी चैनल के माध्यम से दी थी. लेकिन उनकी खूबसूरती, उनके अंदाज और खासतौर से उनके लहजे को कद्रदान इस कदर बने, कि उन्हें दर्शकों ने अपने दिल का हमसफर बना लिया है. वे स्क्रीन पर दिखते हैं तो लड़कियों के मुख से एक ही पंक्ति निकलती है कि आपको देखा, अब जिंदगी गुलजार है. बात हो रही है युवा लड़कियों के दिलों की धड़कन फवाद खान की. 
 बॉलीवुड में आपको जिस तरह से प्यार मिल रहा है. इसकी अनुभूति कैसी है?
मैं बहुत खुश हूं. और बहुत अच्छा लग रहा है. इतना प्यार पाकर. और धर्मा प्रोडक् शन के साथ काम कर रहा हूं तो अपने आप पर भी फक्र होता है. धर्मा हिंदी सिनेमा का बड़ा प्रतिष्ठित प्रोडक् शन हाउस है. और काम करने का माहौल भी काफी अच्छा रहा. मेरी अनरियलिस्टिक चाहत कभी भी नहीं रही. न पाकिस्तान में रही न यहां रही.हां, यह हकीकत है कि आप जब काम कर रहे हों और कामयाबी न मिले तो मायूसी होती है. मुझे भी होती थी. तो जिंदगी में कितना कुछ देख लिया कि अब हर चीज के लिए तैयार हूं. मुझे यहां काफी अच्छा काम मिल रहा है और मैं चाहूंगा कि जिंदगी में मुझे और भी मौके मिले. मैं ग्लोबल एक्टर बनूं. मैं हर तरह की इंडस्ट्री में काम करना चाहूंगा. भारत में काम करने में मजा इसलिए आ रहा है क्योंकि यहां हमारी भाषा एक सी है तो कंफर्ट जोन है.
आपकी भाषा को लेकर पूरे भारत में चर्चा है?
नहीं नहीं ऐसा नहीं है कि मुझे उर्दू भाषा या शेरो शायरी में महारथ हासिल है. वह तो हर बार मुझे यहां लोग कहते हैं कि कोई शेर सुनाओ तो मैं पढ़ कर आता हूं. ताकि लोगों को कुछ सुना सकूं. हां, मगर सच कहूं तो शेरो शायरी पर काम करना जरूरी है, क्योंकि वह क्राफ्ट का हिस्सा है. चूंकि शेरो शायरी सीख लेने से आपकी भाषा और आपके परफॉरमेंस पर काफी फर्क पड़ता है. तो आप फिर और एफर्टलेस परफॉर्म कर पाओगे. खूबसूरत के वक्त मुझे हिंदी सिनेमा का उतना ज्ञान नहीं था. उस वक्त समझ नहीं आती थी. तो उस वक्त एग्जीक्यूट करना मुश्किल था. मैं अटक जाता था. मेरे जेहन में उर्दू शब्द आते थे. तो मुझे टोका जाता था. मुझे याद है एक सीन में मैंने 10 टेक दिये थे. लेकिन फिर भी परफॉर्म नहीं कर पाया था. लेकिन अब इससे ओवरकम हो गया हूं. और मुझे लगता है कि अगर खुद अपनी मुंह से तारीफ करूं तो स्पॉनटेनिटी मेरी क्वालिटी है. मेरे क्राफ्ट की. तो मुझे लगता है कि जहां की भाषा के लिए काम कर रहे हैं. उस पर आपका कमांड हो. तो काम करने में मजा आता है.
कभी जब नकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती है तो कैसे उससे निकलने की कोशिश करते हैं?
मेरा मानना है कि हर जगह आपको सकारात्मक और नकारात्मक पक्ष सुनने और देखने को मिलते रहते हैं. पाकिस्तान में मेरे खिलाफ लोग बोलते हैं. लेकिन पोजिटिव लोग भी होते हैं. यहां भी है. तो मैं सकारात्मक लोगों को देखता हूं और खुश रहता हूं. बस मैं चाहता हूं कि दो देश न लड़ें. ये बचकाना हरकत है. दुनिया ग्लोबल विलेज हो चुकी है. और हम अब भी छोटी छोटी बातों पर लड़ लेते हैं. मेरा मानना है कि ग्लोबल विलेज को हमने स्वीकारा नहीं है अभी.
लड़कियों में आपकी फैन फॉलोइंग ज्यादा है. 
मुझे लगता है कि मैंने अब तक जिस तरह के किरदार निभाये हैं. जिस तरह के टीवी सीरियल में काम किया है. मैं एक आइडियल हस्बैंड माना जाता हूं. शायद यह वजह है.
जिल जिंदगी ने पाकिस्तान और भारत के साथ मिल कर जो एक नयी शुरुआत की है. छह फिल्में बनाने की. आप इसे किस तरह देखते हैं?
आपने एक नयी जानकारी दी. अगर वाकई ऐसा हो रहा है तो इससे बेहतरीन बात और क्या होगी. दो देशों में शांति फैले. अमल चैन आये और क्या चाहिए. मुझे खुशी है कि रतना पाठक शाह और नसीरुद्दीन शाह जैसे एक्टर्स  हैं, जो इन बातों को नहीं मानते और वे हर साल वहां आते हैं और थियेटर के कई सारे नाटक करते हैं. हम सबको पता है कि हालात नाजुक है. हम भी नहीं चाहते कि कुछ भी गलत हो. एक दौर था जब हमारा यहां आना नागंवारा था. लेकिन मुंबई पुलिस ने जिस तरह से हमारे साथ कॉपोरेट किया. यह जो कॉलेब्रेशन हो रहा है तो इससे दोनों देशों के एक्टर्स एक दूसरे के साथ जुड़ेंगे.
आपको पीके फिल्म आॅफर हुई. न करने की कोई खास वजह रही?
जी मुझे भी इस बात का थोड़ा अफसोस है कि उतने बड़े फिल्ममेकर के साथ काम नहीं कर पाया. लेकिन उस वक्त मैंने कपूर एंड सन्स को हां कह दिया था. सो, मुमकिन ही नहीं था कि मैं कर पाऊं. लेकिन वह बेहतरीन किरदार था. और मुझे लगता है कि मैं उसे बेहद खूबसूरती से निभा पाता. मैं किसी को न नहीं कह पाता. तो मुझे लगता कि कोई भी मेरा एडवांटेज ले सकता है. मैं इमोशनल बहुत हूं. तो ब्लैकमेल हो सकता.

20160308

कमरे की सफाई को लेकर लड़ते हैं हम दोनों : अमृता


अमृता राव छोटे परदे पर अपनी पहली शुरुआत की है  और वे बेहद खुश हैं कि उन्हें मेरी आवाज ही पहचान है...जैसे अलग विषय पर आधारित धारावाहिक से पहला मौका मिला है. 

छोटे परदे पर आपकी पहली शुरुआत है, क्या वजह रही हां कहने की?
मुझे लगता है कि यह कहानी छोटे परदे के लिए भी बिल्कुल अनोखी है. अलग है. यही वजह थी कि मैंने इस किरदार को हां कहा. हां, कहने की वजह यह भी है कि यह एक फाइनाइट शो है. फिल्म कमिटमेंट की तरह ही इस शो से मेरा कमिटमेंट है. स्टार्ट टू फिनिश होगी शूटिंग़. दूसरी बात यह है कि मैं जो किरदार निभा रही हूं, वैसा किरदार मैंने आज तक नहीं किया है. फिल्मों में भी नहीं किया है. ऐसे किरदार में किसी ने मुझे लेकर प्रयोग करने का भी नहीं सोचा. तो मुझे लगता है कि मेरे लिए काफी चैलेंजिंग है.
यह शो दो बहनों की जिंदगी और उनकी ईर्ष्या को लेकर है. आपकी बहन भी पहले से टेलीविजन का हिस्सा हैं. तो इस संदर्भ में क्या कहना चाहेंगी?
नहीं, मुझे नहीं लगता कि हम दोनों के बीच कोई प्रतियोगिता है. मैं बड़ी थी और एक्टिंग करियर में मैंने पहले शुरुआत की. हम दोनों एक दूसरे की ढाल ही बनेंगे हमेशा. यही कोशिश है हमारी. हम दोनों एक दूसरे से काफी करीबी हैं. एक दूसरे से सीखते ही हैं. हां, बस बचपन से हमारी लड़ाई एक ही बात को लेकर होती थी कि सफाई कौन करेगा कमरे की. प्रीतिका भी बहुत जल्द ही टेलीविजन पर एक नये अवतार में होगी. तो आॅडियंस के लिए यह बड़ा मौका होगा कि वे हम दोनों को एक साथ एक मंच पर देखें.
आप खुद संगीत से कितनी जुड़ी रही हैं?
मैं सच कहूं तो सिंगिंग में मेरा जो कंफर्ट जोन रहा है. वह मेलोडी है. यही वजह है कि अगर मैं गीत गुनगुनाती भी हूं. और गाती भी हूं तो मेरी जुबान पर रेट्रो गीत आते हैं. न कि आज के गाने आते हैं. मुझे आज के गानों में वह बात नहीं लगती. मुझे लूटेरा के गाने बहुत पसंद हैं. लेकिन मेलोडियस गाने बनने बंद हो गये हैं. मुझे लगता है कि अनु मल्लिक जैसे लोगों ने अपना काम करना बंद कर दिया है, क्योंकि वैसी मेलोडियस गीत अभी नहीं ंबन रहे. 
इस किरदार के लिए आपने कोई ट्रेनिंग भी ली है?
हां, मैंने ट्रेनिंग ली है, क्योंकि यह जो किरदार है. वह सिंगर है. म्यूजिकल एंटरटेनर है मेरा किरदार. लेकिन सिंबॉलिक था किरदार के लिए. चूंकि इस शो में जो किरदार मैं निभा रही हूं, उनके पिताजी काफी वर्सेटाइल थियेटर पर्सन थे. उन्होंने दोनों लड़कियों को हर तरह का इंस्ट्रूमेंट प्ले करना सिखाया. तो हर्ष व्यास से मैंने क्लासिकल ट्रेनिंग ली है सिंगिंग में. मंसूर खान से मैंने सितार में ट्रेनिंग ली है.
छोटे परदे पर आपको सभी बड़ी चुनौती क्या महसूस हो रही है?
मुझे लगता है कि यहां फिल्मों जैसी लग्जरी आपको नहीं मिलती. लग्जरी इस लिहाज से कि आपको हर दिन शूट करना पड़ता है.साथ ही यहां आपको हर दिन खुद का बेस्ट देना होगा. चूंकि लोग आपको हर दिन देखेंगे और हर दिन जज करेंगे.इसलिए टफ होगा. वर्किंग लाइफस्टाइल बहुत टफ है. फिल्मों की शूटिंग में डेडलाइन को लेकर बहुत शोर नहीं है. लेकिन यहां आपको डेडलाइन के अनुसार बहुत अधिक चलना होता है. तो, यहां सिर्फ अपना बेस्ट देना ही चैलेंज नहीं, बल्कि हर दिन शूटिंग वक्त पर खत्म करना भी एक बड़ा चैलेंज है.
शो में आप आइकॉनिक किरदार निभा  रही हैं. यह भी एक बड़ी चुनौती है. ऐसा मानती हैं?
मैंने कभी लीजेंडरी किरदार नहीं निभाया है. तो हां, यह मेरे लिए बड़ी कामयाबी है. मैं खुद आर्टिस्ट हूं तो हर आर्टिस्ट के साथ ऐसा होता है कि सफलता के साथ आप कई तरह से भटकने लगते हैं. लोग आपसे पैसे निकालना चाहते हैं. फोकस से आप अनफोकस हो जाते हैं. तो इस शो से एक आर्टिस्ट का समर्पण और उसकी समझ के बारे में भी आप देख पायेंगे. इस लिहाज से भी यह शो खास होगा. 

20160304

ख्वाबों के कैमरे से


बॉलीवुड में ऐसे कई निर्देशक हैं, जिन्होंने बड़ी-बड़ी फिल्में बनाने का सपना देखा है और उनका वह सपना फौरन पूरा नहीं हुआ. लेकिन उन्होंने अपनी आस नहीं छोड़ी. कुछ ऐसे ही बॉलीवुड के निर्देशकों  की रिपोर्ट
 फैन
मनीष शर्मा की फिल्म फैन जल्द ही रिलीज होनेवाली है.फिल्म में शाहरुख खान लीड किरदार निभा रहे हैं और उन्होंने हाल ही में ट्रेलर लांच के दौरान यह बात स्वीकारी कि इस फिल्म के बारे में मनीष शर्मा ने शाहरुख खान से कई सालों पहले की थी. मनीष शर्मा का यह ड्रीम प्रोजेक्ट है और उन्होंने शाहरुख से कहा था कि उन्हें मुंबई जाकर यही फिल्म बनानी है. अगर वे यह फिल्म बनाने में कामयाब रहे तो वे बेहद खुशनसीब होंगे. और 9 सालों में उन्होंने अपना यह सपना पूरा किया है.
बाजीराव मस्तानी
बाजीराव मस्तानी को लेकर संजय लीला भंसाली ने भी लंबा इंतजार किया है. उन्होंने लगभग 12 साल इस फिल्म के लिए इंतजार किया है. लेकिन उनके जेहन में भी कभी यह बात नहीं आयी कि उन्हें यह फिल्म नहीं करनी चाहिए. इस फिल्म के लीड किरदारों को लेकर भी काफी विवाद चले. फिल्म के सेट को लेकर भी काफी चर्चा होती रही. लेकिन उन्होंने तय कर लिया था कि इसे बनायेंगे तो बनायेंगे. तब जाकर उनकी यह इच्छा पूरी हुई. वर्ष 2015 में यह फिल्म साल की सबसे बड़ी हिट फिल्म बनी.
मुगलएआजम
मुगलएआजम को उस दौर में बनने में काफी वक्त लगे. उस दौर में जहां तकनीकी आधार पर काफी कम साधन उपलब्ध थे. ऐसे में मुगलएआजम ने काफी सारे माइलस्टोन तय किये. फिल्म में ऐसे कई दृश्य हैं, जो आज भी भारतीय सिनेमा के इतिहास के आइकॉनिक दृश्य माने जाते हैं. इस फिल्म की खास बात यह थी कि लंबे अरसे तक बनने के बावजूद फिल्म अप्रसांगिक नहीं लगी. लोगों ने फिल्म को देखा भी और सराहा भी. के आसिफ के जहन में कभी इस फिल्म को न बनाने की बात नहीं आयी.
रईस
फिल्म रईस जल्द ही रिलीज होनेवाली है. इस फिल्म को भी राहुल ढोलकिया काफी सालों से बनाना चाहते थे. लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिल पा रही थी. उन्होंने फिल्म को पूरे चार साल दिये हैं. तब जाकर अब यह रिलीज को तैयार है. यह फिल्म भी उनकी ड्रीम प्रोजेक्ट फिल्म है.
ब्लैक फ्राइडे 
अनुराग कश्यप की फ़िल्म ब्लैक फ्राइडे भी लम्बे समय तक रिलीज नहीं हो पायी थी। क्योंकि अनुराग कश्यप ने फ़िल्म में रियल स्थान और नामों का इस्तेमाल किया था। उन्हें काफी परेशानियां आयीं। लेकिन वे पीछे नहीं हटे। आखिर कार फ़िल्म रिलीज हुई और सपना पूरा हुआ।
लगान 
आशुतोष ने भी लगान बनाने का सपना देखा और इसे पूरा भी किया। उन्हें भी काफी लोगों को मनाने में वक़्त लगा। लेकिन फ़िल्म जब बनी तो काफी कामयाब हुई।