20120528

बोले तो..लौट रहे हैं रोडछाप


टिकट की खिड़की पर राउड़ी बोल. बाकी काम मुझ पर छोड़..फिल्म ‘राउड़ी राठौड़’ के प्रोमोशनल पोस्टर्स पर इन दिनों यह संवाद खूब नजर आ रहे हैं. आम लोगों में यह बेहद लोकप्रिय हो रहा है. दरअसल, जब से फिल्म ‘राउड़ी राठौड़’ की चर्चा शुरू हुई है, उस वक्त से ही इसकी पंचलाइन बेहद पसंद की जा रही है. इसकी खास वजह यह है कि यह दो पंक्तियों की पंचलाइन बेहद सामान्य से शब्दों में लिखी गयी है और लोगों को इससे अपनापन लग रहा हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो राउड़ी के संवादों में फिर से टपोरी अंदाज के नायकों की वापसी हो रही है. यह टपोरी अंदाज नायक का अपना स्टाइल है. वह डिजाइनर कप.डे नहीं पहनता. ब्रांडेड चश्मे नहीं लगाता, लेकिन फिर भी उसके स्टाइल की अपनी दुनिया है. लोग उसे उसी अंदाज में पसंद करते हैं. खुली शर्ट, गले में रूमाल और डुप्लीकेट सनग्लासेज उसकी पहचान हैं. और बोले तो, टेंशन, ठोक डाल उसकी डिक्शनरी के शब्द. इन सब के बावजूद वह लोकप्रिय है. हिट है. हिंदी सिनेमा में टपोरी अंदाज के नायकों को लोकप्रिय बनाने का मुख्य श्रेय अनिल कपूर को जाता है. फिल्म ‘राम-लखन’ में वन टू का फोर करनेवाले अनिल ने इस फिल्म से टपोरी अंदाज के नायकों को मुख्यधारा की फिल्मों का नायक बना डाला था. ये टपोरी, बिंदास अंदाज में बोलते हैं. चलते हैं. लोगों की मदद करते हैं. रफ एंड टफ रहनेवाले इन टपोरियों से पूरी दुनिंया डरती है. लेकिन वह हंसमुख भी होते हैं और भावनात्मक भी. अनिल के बाद फिल्म मुत्राभाई सीरीज में टपोरियों का अलग रूप दर्शकों के सामने आया. एक लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर से रूपहले परदे पर ऐसे किरदारों की लोकप्रियता बढ. रही है. फिल्म ‘इशकजादे’ में अर्जुन का किरदार भी अनपढ. टपोरी का ही है. ‘गैंग ऑफ वसैपुर’ में भी टपोरी अंदाज को अहमियत दी गयी है. हाल में दिखायी जा रही फिल्मों में टपोरियों के किरदारों में अलग-अलग राज्यों की झलक है. गौर करें तो ‘गैंग ऑफ वसैपुर’ में बिहार-झारखंड के टपोरियों का अंदाज नजर आ रहा है, तो राउड़ी में साउथ का. ‘इशकजादे’ में यूपी के टपोरी का तो अन्य फिल्मों में मुंबई के टपोरियों का. दरअसल, रोडछाप, रोमियो, टपोरी, छोकरा जैसे नामों से विख्यात यह किरदार भारत के राज्यों के एक ऐसे युवा वर्ग से परिचय कराता है, जो ऐसी जिंदगी जीते हैं और इनकी जिंदगी बेहद दिलचस्प भी होती है. आम युवा वर्ग उनमें अपनी छवि को तलाशता है. इसलिए फिल्मों में वे हमेशा लोकप्रिय रहे हैं और लोकप्रिय होते रहेंगे.

20120516

बेबस, अकेला, बेजुबां चुपचाप रोया

आमिर खान ने अपने शो ‘सत्यमेव जयते’ में बीते रविवार बाल यौन शोषण का मुद्दा उठाया था. शो के पहले एपिसोड से ज्यादा उन्हें इस बार प्रतिक्रियाएं मिलीं. इस शो के प्रसारण के बाद सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर कई लोगों ने आकर लगातार इस मुद्दे पर चर्चा की. इन लोगों में कई सेलिब्रिटी भी शामिल थे. अभिनेत्री व गायिका सोफिया हयात ने ट्वीट किया और अपने ब्लॉग पर लिखा है कि उनके साथ भी कभी बचपन में ऐसा हादसा हुआ था. सेलिब्रिटीज के अलावा चौंकानेवाली बात यह थी कि कई लड़कियों व लड़कों ने जिनके साथ बचपन में कभी ऐसी घटना घटी, उन्होंने ने भी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर आकर अपना स्टेटस अपडेट दिया. सोमवार व मंगलवार के दिन मैंने नोटिस किया. ऐसे स्टेटस लिखनेवाले कई लोग नजर आये. यह आंक.डें साफतौर पर बताते हैं कि कितने लोगों ने अपना मासूम बचपन इस हैवानियत की वजह से खोया है. आमिर खान के इस खास एपिसोड व खास मुहिम की सराहना की जानी चाहिए. इससे लोगों में न सिर्फ जागरूकता आयी है, बल्कि कई खामोश आवाजों ने अपनी चुप्पी भी तोड़ी है. आमिर के शो का गीत वाकई इस रूप में सार्थक है कि अब पीड़ित लोगों ने धीरे-धीरे ही सही पर इस चुप्पी को तोड़ा है. कई वर्षों पहले मीरा नायर की फिल्म आयी थी ‘मॉनसून वेडिंग’. इस फिल्म का केंद्रीय विषय बाल यौन शोषण का मुद्दा तो नहीं था, लेकिन शेफाली छाया व रजत कपूर के किरदारों में मीरा नायर ने एक अहम बात कहने की व दिखाने की कोशिश की थी. इस फिल्म को जिन दर्शकों ने भी गौर से देखा होगा, वे निश्‍चित तौर पर निर्देशक के उद्देश्य को समझ पाये होंगे. आज से लगभग 11 साल पहले मीरा ने यह फिल्म भारतीय दर्शकों के लिए बनायी थी. शायद मीरा ने महसूस किया होगा कि उस वक्त इस विषय को शायद न स्वीकारा जाये, लेकिन संकेत के रूप में ही सही उन्होंने इस विषय पर बातचीत का एक माहौल तैयार किया था. मधुर भंडारकर ने भी फिल्म ‘पेज 3’ में चौंकानेवाले दृश्य दिखाये थे. जिनमें एक कंपनी का सीइओ बाल यौन शोषण करता है. फिल्म ‘आइएम’ में भी इस मुद्दे पर प्रकाश डालने की कोशिश की गयी है. इन फिल्मों के माध्यम में बाल यौन शोषण के ही विभित्र रूपों को दर्शाया गया है. आमिर खान की इस मुहिम के बाद इस संवेदनशील विषयों पर और फिल्में बने तो शायद और लोगों की आंखें खुलेंगी.

20120515

बंदिनी से बंदूक धारिणी


बिमल रॉय की फिल्म ‘बंदिनी’ में कल्याणी (नूतन), विकास कुमार ( अशोक कुमार) से बेहद प्यार करती है, लेकिन विकास उसे धोखा देता है. इसके बावजूद फिल्म के अंत में वह जाकर विकास के ही चरणों में गिर जाती है. मेरा पति परमेश्‍वर की तर्ज पर वह विकास कुमार के साथ आगे का सफर पूरा करती है. वह उस देवेन को भी भूल जाती है, जो उस वक्त उसके सहारा बनते हैं, जब उसके पास कोई नहीं होता. इसके बावजूद विकास के तमाम बेवफाई के वह विकास का ही साथ चुनती है. बिमल रॉय की यह फिल्म 1963 में रिलीज हुई थी. यानी आज से 49 वर्ष पूर्व. उस दौर में भारतीय समाज का परिवेश उसका ढांचा बिल्कुल अलग था. उस वक्त महिलाएं शायद उसी सोच के साथ आगे बढ.ती थीं, जिनके लिए उनके पति में ही उनकी दुनिया बसती है. उसी के मद्देनजर फिल्मों में महिलाओं की भूमिकाएं गढ.ी जाती थीं. इन 49 सालों में इस सोच में बड़ी तब्दील आ चुकी है. अब प्यार की परिभाषा भी बदल चुकी है और इसे जताने-निभाने का तरीका भी. अब अभिनेत्रियों को बंदिनी बनना नहीं बल्कि बंदूकधारिणी बनना गंवारा है. हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘इशकजादे’ में जोया के रूप में परिणिति के किरदार को कुछ ऐसा ही बेखौफ दिखाया गया है. अपने पति से मिले धोखे से वह भी टूटती है. आह भरती है. लेकिन वह आह भर कर शांत नहीं हो जाती, बल्कि आह के साथ वह बंदूक में गोलियां भरती है और अपने धोखे का बदला लेने के लिए निकल पड़ती है. वह सिसकने की बजाय अपने प्रेमी से पति बने परमा की गर्दन पर बंदूक तान देती है. इससे साफ जाहिर होता है कि वर्तमान दौर की महिलाएं आंसू बहा कर चुपचाप अपनी जिंदगी व्यतीत नहीं कर सकतीं. फिल्म ‘अर्थ’ में शबाना आजिमी अपने पति की बेवफाई को चुपचाप सह लेती है, लेकिन वहीं फिल्म ‘इश्किया’ में अपने पति के सच को जानने के लिए, अपना बदला पूरा करने के लिए साजिश तक रच जाती है और अंतत: अपने पति को मारने में भी वह नहीं हिचकती. हाल ही में रिलीज हुई हेट स्टोरी की महिला किरदार अपने बदले के खिलाफ एक अलग ही रुख इख्तियार कर लेती है. दरअसल, हकीकत यह है कि वर्तमान में महिलाएं अब बेबस, लाचार कहलाने की बजाय पुरुषों को सबक सिखाने में विश्‍वास रखती है. पुरुष प्रधान समाज में वाकई ऐसे निर्देशक जो महिलाओं की इतनी सशक्त भूमिकाएं गढ. रहे हैं वह काबिल-ए-तारीफ हैं.

20120514

छोटी-सी उमर से 1000वां कदम

आज बालिका वधू के 1000 एपिसोड पूरे हो रहे हैं. बालिका वधू की पूरी टीम इसका जश्न मना रही है. यह जश्न केवल बालिका वधू की टीम का नहीं है, बल्कि धारावाहिक के लेखक पुरनेंदुशेखर की सोच के परिपक्व होने का भी जश्न है. उन्होंने ही पहली बार इस मुद्दे को महसूस किया और उसे छोटे परदे पर पहचान दिलायी. कभी पुरनेंदु इस विषय को लेकर फिल्म बनाने की परिकल्पना कर रहे थे, लेकिन इस छोटे परदे की बालिका वधू ने उसे किसी सुपरहिट फिल्म से भी अधिक लोकप्रिय बना दिया. ‘बालिका वधू’ धारावाहिक भले ही छोटे परदे पर प्रसारित होता हो, लेकिन इसकी लोकप्रियता किसी 100 करोड़ का आंकड़ा पार करनेवाली फिल्म से कम नहीं. इस दौर में जहां हर तरफ टीआरपी की होड़ है. मनोरंजन को अहमियत दी जा रही है. ऐसे में एक ऐसा शो जो लगातार गंभीर मुद्दों को उठा रहा है. गंवई कहानियां दिखा रहे हैं. वह लगातार लोकप्रियता बनाये रखने में कामयाब है. यही वह शो है, जिसने उस दौर में अपना स्थान बनाने में काफी मशक्कत की थी, जिस वक्त छोटे परदे पर सास बहू वाले धारावाहिकों का बोलबाला था. उस वक्त कलर्स भी नया चैनल था और बालिका वधू जैसे धारावाहिक का सोच भी. दोनों ही नये प्रतिभागियों ने खुद को साबित कर दिया. किसी दौर में जो दर्शक बालिका वधू के रूप में सचिन की फिल्म ‘बालिका वधू’ को याद करते थे. अचानक धारावाहिक ‘बालिका वधू’ व उसकी आनंदी इस शब्द की पयार्यवाची बन गयी. गौर करें तो बालिका वधू केवल एक लड़की की कहानी नहीं (जिसकी बचपन में शादी हो जाती है), बल्कि यह समाज की हर वर्ग की महिला की कहानी है. इस धारावाहिक का हर किरदार अपने आप में एक कहानी है. अगर संयुक्त रूप से देखें तो इस धारावाहिक को आधार बना कर महिलाओं पर केंद्रित सीरीज फिल्मों का निर्माण किया जा सकता है. फिर चाहे वह सुगना, फुली के रूप में बाल विधवा का संघर्ष हो, गहना व आनंदी के रूप में बालिका वधू का संघर्ष, गौरी के रूप में शादी टूट जाने के बाद की जिंदगी का संघर्ष हो या दादी सा के रूप में अकेली महिला के रूप में परिवार का स्तंभ बनना. बालिका वधू की पूरी यात्रा किसी हिंदी फिल्म से कम दिलचस्प नहीं. दरअसल, यह जश्न उन हजारों किरदारों का है, जो वास्तविक जिंदगी से प्रभावित थी और जिन्होंने वास्तविक जिंदगियां सकारात्मक रूप से बदली.

20120511

हुआ छोकरा जवां रे

फिल्म ‘इशकजादे’ आज रिलीज हो रही है. बोनी कपूर के बेटे अर्जुन कपूर अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत कर रहे हैं. इस कपूर खानदान (सुरविंदर कपूर-बोनी कपूर के पिता) की यह तीसरी पीढ.ी है. तीसरी पीढ.ी में अनिल कपूर की बेटी सोनम कपूर के बाद अर्जुन दूसरे सदस्य होंगे, जो फिल्मी कैरियर की शुरुआत कर रहे हैं. यह सच है कि जो सुपरसितारा हैसियत कपूर खानदान (पृथ्वराज कपूर खानदान) की चौथी पीढ.ी व भाई बहन करीना कपूर व रनबीर कपूर को प्राप्त है, वह इस कपूर खानदान की तीसरी पीढ.ी को प्राप्त नहीं था. इसके बावजूद इस कपूर (अर्जुन) में कुछ खास बात नजर आ रही है. अर्जुन की परवरिश शानौ शौकत और ऐशो आराम से हुई है. चूंकि वह ब.डे निर्माता बोनी कपूर के परिवार से हैं, फिर भी बोनी कपूर के प्रोडक् शन हाउस से वह लांच नहीं हो रहे. उन्होंने आम प्रतिभागियों की तरह कई दफे ऑडिशन दिया. इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि फिलवक्त बोनी इस आर्थिक स्थिति में नहीं कि वह किसी बड़ी फिल्म का निर्माण अकेले अपने कंधे पर करें. उनकी खस्ताहाल आर्थिक स्थिति का अनुमान इंडस्ट्री व उनके करीबियों को बखूबी मालूम है. ऐसे में अर्जुन का यह निर्णय कि वह किसी दूसरे प्रोडक्शन हाउस के साथ अपने कैरियर की शुरुआत करेंगे, बेहद उचित था. उनके कैरियर की शुरुआत के लिए भी. दरअसल, अपने जंगल में तो सभी राजा होते हैं. असली कमाल तो जब दिखता है, जब वह शेर दूसरे जंगल में जंग जीत आये. उस लिहाज से अर्जुन को भी ‘इशकजादे’ के रूप में शुरुआती दौर से ही एक बड़ा इंस्टीटयूशन मिला. वे स्वयं बताते हैं कि किस तरह निर्देशक हबीब फैजल के साथ उन्होंने लगातार ट्रेनिंग ली. शायद अपने होम प्रोडक्शन में वे इतनी मेहनत व शिद्दत से काम नहीं कर पाते. अपनी अभिनय क्षमता पर उतनी बारीकियों से ध्यान नहीं दे पाते. क्योंकि कहीं न कहीं उन पर अपने जंगल के राजा वाले ख्याल मंडराते रहते. केवल अर्जुन ही नहीं, बल्कि वे सभी सुपरसितारों के बेटे बेटियां जिनका अपना प्रोडक्शन हाउस है, उन्हें शुरुआत हमेशा दूसरे मंझे निर्देशकों के साथ ही करना चाहिए

20120510

लौट रही हैं पति, पत्नी और वो की कहानियां


छोटे परदे पर पति, पत्नी और वो की कहानी हम कई वर्षो से देखते आ रहे हैं. खासतौर से एकता कपूर के शोज में इन कहानियों को तूल दिया जाता रहा है. लेकिन पिछले कुछ सालों में इस ट्रेंड में बदलाव आया था. पति, पत्नी और वो की त्रिकोणीय प्रेम कहानियों पर ब्रेक लग गया था. पिछले कुछ सालों में यह स्थान सामाजिक विषयों ने लिया था. लेकिन एक बार फिर टेलीवुड के कई धारावाहिकों में इसी ट्रैक पर कहानियों को मोड़ा जा रहा है.
वर्षो पहले शोभा डे के शो स्वाभिमान में शादी के बाद एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर पर आधारित कहानी दिखाई गयी थी. शो का निर्देशन महेश भट्ट ने किया था. उन्होंने इसी विषय पर अर्थ नामक फिल्म भी बनाई थी, जो सफल रही थी. जिस दौर में स्वाभिमान का निर्माण हुआ था वह दौर 1995 का था. तब इस धारावाहिक के विषय को लेकर काफी चर्चाएं हुई थीं कि इस तरह के विषय को छोटे परदे पर नहीं लाना चाहिए.
लेकिन गौर करें, तो इसी शो से छोटे परदे ने इस बोल्ड विषय को अपनाया और तब से छोटे परदे के निर्माताओं के लिए यह विषय टीआरपी बढ़ाने का एक जरिया बन चुका है. स्वयं महेश भट्ट मानते हैं कि यह वास्तविकता है कि भले ही इंसान खुद को कितना भी ईमानदार और आदर्श बताने की कोशिश करे, ऐसे रिश्ते जुड़ते जाते हैं. और मैं मानता हूं कि दिल से झूठ नहीं बोलना चाहिए. आम जिंदगी में भी ऐसे कई किस्से दर्शकों के सामने हैं.
क्योंकि प्यार, शादी और जिम्मेदारियों का रिश्ता लंबे समय तक लेकर चलना एक कठिन कार्य है. छोटे परदे पर जब भी ऐसी कहांिनयां दिखायी गयी हैं, दर्शकों ने हमेशा पहली पत्नी का ही साथ दिया है. फिर चाहे वह क्योंकि सास भी कभी बहू थी की तुलसी हो या क्या हुआ तेरा वादा की मोना. दर्शक हमेशा यह महसूस करते हैं कि पहली पत्नी के साथ धोखा हुआ है.
और दर्शकों की यही हमदर्दी टीआरपी के अंक बटोरने में कामयाब हो जाती है. दर्शकों को उस वक्त सबसे बड़ा झटका लगा था जब एकता कपूर ने अपने सुपरहिट शो क्योंकि सास भी कभी बहू थी में आदर्श पति-पत्नी मीहिर व तुलसी की जिंदगी में मंदिरा नामक दूसरी औरत की एंट्री करायी थी. उस वक्त भी सभी दर्शकों ने तुलसी का ही साथ दिया था.
क्या हुआ तेरा वादा
सोनी टीवी पर प्रसारित हो रहे धारावाहिक क्या हुआ तेरा वादा में इन दिनों मोना अपने पति प्रदीप द्वारा दिये गये धोखे से खुद को उबारने की कोशिश कर रही हैं. प्रदीप व मोना के बीच प्रदीप की पुरानी गर्लफ्रेंड अनुष्का आ चुकी है. बहुत मिन्नतें करने के बाद जब अनुष्का मोना की जिंदगी से नहीं गयी, तो अब मोना ने अपना अलग रास्ता चुन लिया है. कई सालों पहले बनी फिल्म अर्थ में शबाना आजमी ने चुपचाप सारी परेशानियों व दर्द को ङोल लिया था. लेकिन इस जमाने में मोना अपना सम्मान वापस हासिल करने के लिए जद्दोजहद कर
रही है.
साथ निभाना साथिया
स्टार प्लस के धारावाहिक साथ निभाना साथिया में इन दिनों गोपी और अहम की जिंदगी में अहम की पुरानी गर्लफ्रेंड अनीता की एंट्री हुई है. लेकिन गोपी की सास कोकिला अपनी बहू की गृहस्थ जिंदगी को टूटते व बिखरते देखने की बजाय जल्द से इस समस्या का समाधान निकालने की कोशिश कर रही है.
ससुराल सिमर का
कलर्स के ससुराल सिमर का में भी इन दिनों यही ट्रैक चल रहा है. प्रेम की जिंदगी में एक नयी लड़की की एंट्री हुई है, जिसकी गुत्थी सिमर सुलझाने की कोशिश कर रही है.
तुम देना साथ मेरा
लाइफ ओके के शो तुम देना साथ मेरा में भी हूबहू इसी ट्रैक पर कहानी दोहरायी जा रही है.
बालिका वधू
कलर्स के लोकप्रिय धारावाहिक बालिका वधू में आनंदी, जगिया और गौरी की कहानी भी इसी विषय पर आधारित है. इस शो में लगातार नये ट्विस्ट आ रहे हैं.
इसके अलावा कुछ तो लोग कहेंगे में निधि व आशुतोष के बीच डॉ मल्लिका ने कई बार दरार डालने की कोशिश की. लेकिन वह कामयाब नहीं हुई. प्रतिज्ञा, आइएम विरानी, मैं लक्ष्मी तेरे आंगन की, तेरे लिए जैसे धारावाहिकों में भी इस ट्रैक पर कहानियों का निर्माण होता रहा है.

जवां इशकजादा अर्जुन


उनका बचपन लाइट, कैमरा एक्शन के बीच ही बीता. लगभग पूरा परिवार फिल्म निर्माण से जुड़ा रहा है. इसके बावजूद जब पहले ब्रेक की बारी आयी, तो उन्होंने अपने होम प्रोडक्शन की बजाय यशराज बैनर के साथ शुरुआत की.
इसके पीछे मंशा साफ थी कि वे भी संघर्ष का स्वाद चखें. बात हो रही है निर्माता बोनी कपूर के बेटे अर्जुन कपूर की. यशराज की फिल्म इशकजादे से अपने कॅरियर की शुरु आत कर रहे अर्जुन इस फिल्म को लेकर बेहद उत्साहित हैं. पहली फिल्म से जुड़े उनके अनुभव और तैयारियों पर अनुप्रिया अनंत ने उनसे विशेष बातचीत की.
इशकजादे के प्रोमोज में अर्जुन कपूर दर्शकों को आकर्षित करने में कामयाब रहे हैं. उनकी पूरी कोशिश और उम्मीद यही है कि फिल्म को भी दर्शकों का प्यार मिले.
अर्जुन, यह आपकी पहली फिल्म है. क्या इसको लेकर आप नर्वस हैं?
जी हां, बहुत नर्वस हूं. बावजूद इसके कि मैंने अपने परिवार में हमेशा फिल्में बनते देखी हैं. लेकिन बतौर एक्टर बात और हो जाती है. पूरी दुनिया की नजर आप पर होती है. आपकी छोटी सी भी गलती लोग नोटिस करते हैं.
प्रोमोज देखकर लोग आपकी तारीफ कर रहे हैं. कैसा लग रहा है?
इसलिए और अधिक नर्वस हूं, क्योंकि प्रोमोज में दर्शकों ने मुझे पसंद किया है. अब फिल्म में भी पसंद कर लें, तो बात बने.
फिल्म का नाम इशकजादे क्यों है. इश्कजादे क्यों नहीं?
इस बारे में हबीब सर बेहतर बता पायेंगे. हालांकि, मैं मानता हूं कि फिल्म युवाओं की है और युवा इन दिनों कोई भी काम सीधे तरीके से तो करते नहीं. इसलिए, इशकजादे हैं. और देखिए, यह अलग नाम है तभी तो लोकप्रिय है. तभी तो आपने सवाल पूछा.
आप खुद एक फिल्मी खानदान से संबंध रखते हैं, फिर शुरुआत के लिए बाहरी प्रोडक्शन हाउस का सहारा क्यों लिया?
मैं मानता हूं कि किसी भी अभिनेता के लिए अभिनय सीखने का यही सही तरीका हो सकता है. अपने घर से तो मैं कभी भी लांच हो सकता था. लेकिन शायद वहां मुझे इतना कुछ सीखने का मौका नहीं मिलता. लोगों को ऐसा लगता है कि आप फिल्मी खानदान से हैं, तो आपके लिए राहें आसान होंगी. लेकिन मैं खुद को खुशनसीब मानता हूं कि जब मैंने यशराज में ऑडिशन दिया था, लोगों को पता नहीं था कि मैं बोनी कपूर का बेटा हूं. मेरे साथ ऑडिशन की वही प्रक्रिया हुई थी जो किसी भी दूसरे कलाकार के साथ होती है.
दरअसल, मैंने जब ऑडिशन दिया था, उस वक्त वायरस दीवान नामक फिल्म के लिए मेरा चुनाव किया गया था. लेकिन बाद में इशकजादे की शुरुआत हुई. मुझे हबीब फैजल जैसे बेहतरीन निर्देशक के साथ काम करने का मौका मिला. उनके साथ मैंने कई वर्कशॉप किये हैं. बहुत तैयारी की है. मैं खुद औरों के ऑडिशन में भी चला जाता था.
इशकजादे के लिए सबसे पहले बतौर लीड एक्टर मेरा नाम फाइनल हुआ. फिर बाद में अभिनेत्री का चुनाव हुआ था. उस दौरान भी मैं अपने किरदार में रह कर सारे ऑडिशन में भाग ले लिया करता था. इससे सबसे ज्यादा फायदा मेरा ही हुआ कि मैंने काफी मेहनत की अपने किरदार पर.
अपने किरदार की तैयारियों के बारे में और विस्तार से बताएं.
दरअसल, जब आप हबीब सर जैसे निर्देशक के साथ काम कर रहे होते हैं, तो तैयारियों का लेवल इस लिहाज से थोड़ा कम हो जाता है कि हबीब सर, अपनी स्क्रिप्ट कुछ इस कदर तैयार रखते हैं कि अगर आह, उफ भी करना है तो वह स्क्रिप्ट में मेंशन होता है. अब निर्भर आप पर करता है कि आप किस तरह उसे निभा पाते हैं. हालांकि, जब से अहसास हुआ कि मुझे अभिनय करना है, मैंने बैरी जोन्स के अभिनय वर्कशॉप को अटेंड करना शुरू किया. हबीब सर ने भी मेरी बहुत मदद की.
सुना है आप निर्देशक बनना चाहते थे. फिर अभिनय के क्षेत्र में?
जी हां, आपने बिल्कुल सही सुना है. मैं भविष्य में जरूर निर्देशन करूंगा. दरअसल, मैं खुद भी नहीं जानता था और न ही कभी सोचा था कि अभिनय में आऊंगा. लेकिन सलमान भाई की वजह से मैंने इस तरफ सोचना शुरू किया. सलमान भाई की बहन अर्पिता मेरी गर्लफ्रेंड थी. हम दोनों के परिवार में बहुत नजदीकी थी. मैं उस वक्त सलमान भाई से मिलता रहता था. सलमान भाई पापा की फिल्मों में काम कर रहे थे. हमने बहुत वक्त साथ गुजारा था. उन्होंने ही मुझे एक दिन कहा कि यार अर्जुन तू एक्टर बन सकता है.
तुझमें वह स्पार्क नजर आ रहा है. उस दिन मैं घर लौटा तो मुझे लगा कि सलमान भाई की बातों में कुछ तो दम है. मैंने सोचना शुरू किया. लेकिन परेशानी यह थी कि मैं बहुत मोटा था. फिर मैंने सलमान भाई से बात की तो उन्होंने मेरा साथ दिया और तीन साल में मैंने 50 किलो वजन घटाया. इतना वजन कम करने के बावजूद आज भी मैं डरा रहता हूं कि कहीं मेरा वजन फिर से न बढ़ जाये.
फिल्म युवाओं पर आधारित है, तो निश्चित तौर पर आप सबने बहुत मस्ती की होगी सेट पर.
हां जी बिल्कुल बहुत मस्ती की थी. मैं और परिणिति सेट पर खूब मस्ती करते थे. हम दोनों ही खाने, खिलाने और हंसी मजाक करने के शौकीन हैं. इसलिए, सेट पर माहौल बेहद अलग होता था. फिल्म में जो दृश्य मेरे लिए सबसे कठिन रहा उसी में सबसे मजा भी आया. लखनऊ में जब हम इस सीन की शूटिंग कर रहे थे, उस वक्त बहुत गर्मी थी.
वहां येज्दी बाइक चलानी थी मुझे, जो अब शायद मिलती भी नहीं. मैं ठहरा मुंबई का लड़का. कभी उतनी भारी बाइक चलायी नहीं थी. जब वह चलानी पड़ी, मेरी तो हालत खराब हो गयी. उसमें मेरे न जाने कितने सारे रीटेक हुए थे. मजे की बात यह थी कि वह बाइक हमने वहां के दूधवालों से ली थी. फिर उन्होंने ही मुझे ट्रेनिंग भी दी थी.
परिणिति के साथ आपकी केमेस्ट्री कैसी रही?
मजेदार. आप देखना इस पूरी फिल्म में परमा और जोया ही नजर आयेंगे आपको. यह फिल्म पूरी तरह इन दोनों किरदारों पर ही निर्भर है.
हुआ छोकड़ा जवान रे..गीत में आपने एक्सप्रेशन का काफी इस्तेमाल किया है. खास ट्रेनिंग ली?
नहीं. हां, यह जरूर है कि डांसिंग में मेरी शुरू से ही दिलचस्पी रही है इसलिए इस गाने की शूटिंग में मैंने बहुत एंजॉय किया.यह गीत भी लखनऊ में ही फिल्माया गया था. चिनी प्रकाश सर जो खुद बेहद शानदार डांसर हैं, उन्होंने मेरी बहुत मदद की.
बतौर अभिनेता, आप दर्शकों से क्या उम्मीद कर रहे हैं?
बस यही कि मेरी फिल्में देखने के बाद कोई यह न कहे कि सिर्फ दिखने में अच्छा है. इसे एक्टिंग नहीं आती, क्योंकि मैं जानता हूं कि मैं बहुत मेहनत कर रहा हूं और बारीकी से काम सीख रहा हूं. चाहता हूं कि अच्छा अभिनय कर सकूं.
आपकी मां, आपकी पहली शुरुआत में साथ नहीं?
हां, लेकिन मां का आशीर्वाद हमेशा साथ रहेगा. उन्होंने हमेशा मेरा साथ दिया है. इसलिए, उम्मीद है कि कामयाबी मिलेगी.