My Blog List

20161201

=

http://www.jagran.com/entertainment/bollywood-ranveer-singh-remembers-shooting-his-debut-film-band-baja-baraat-15125786.html


अनुप्रिया वर्मा, मुंबई। रणवीर सिंह इन दिनों यशराज की फ़िल्म बेफ़िक्रे के प्रमोशन में व्यस्त हैं। रणवीर ने अपने करियर की शुरुआत यशराज बैनर से ही की थी।
यही वजह है कि 'बेफ़िक्रे' के प्रमोशन में वो यशराज में अपने पहले दिन को याद कर रहे हैं। रणवीर बताते हैं कि मैं वह पहला लड़का था, जिसे आदि सर ने लांच किया था। आदि सर ने मुझे जब बताया कि वह मुझे डायरेक्ट करने वाले हैं। तब मैं चौंक गया था, क्योंकि आदी सर बहुत कम फिल्में बनाते हैं। रणवीर बताते हैं कि जब वह पहली बार सेट पर गए थे तो चौंक गए थे। उन्हें पता ही नहीं था कि करना क्या होता है। वो बार-बार फ्रेम से आउट हो जाते थे। बकौल रणवीर उस वक़्त जब 'बैंड बाजा बारात' का एक गाना शूट हो रहा था, तो उन्हें पता ही नहीं होता था कि फ्रेम कौन सा है। वो हमेशा फ्रेम से आउट हो जाते थे। फिर वैभवी (कॉरियोग्राफर) मुझे समझाती थींं कि मुझे फ्रेम में रहना है उससे बाहर नहीं जाना है।
यही नहीं रणवीर बताते हैं कि उन्हें हर सीन के बाद बोला जाता था कि जाकर वैनिटी में बैठिये। तो वह बार-बार सवाल पूछते थे, कहां बैठूं, क्योंकि उन्हें इस बात का यकीं ही नहीं होता था कि वह किसी फ़िल्म के हीरो हैं और उन्हें स्टारी ट्रीटमेंट मिल रहा है।
रणबीर कहते हैं कि उनकी यही कोशिश रहेगी कि वो कभी भी अपने मेंटर आदित्य चोपड़ा को लेट डाउन ना करें। रणवीर की फ़िल्म 'बेफ़िक्रे' 9 दिसम्बर को रिलीज़ होने जा रही है।
- See more at: http://www.jagran.com/entertainment/bollywood-ranveer-singh-remembers-shooting-his-debut-film-band-baja-baraat-15125786.html#sthash.bz7JpTHN.dpuf

स्टंट करते हुए लगी चोट, लेकिन टाइगर ने नहीं की फ़िक्र

  टाइगर श्रॉफ इन दिनों फिल्म मुन्ना माइकल की शूटिंग कर रहे हैं।  इन दिनों फिल्म की शूटिंग मुंबई के विरार  इलाके में हो रही है। 
लगता है, टाइगर श्रॉफ अपनी पिछली फिल्म फलाइंग जट की असफलता से इस तरह से दुखी हैं कि अभी वे अपनी अगली फिल्म मुन्ना माइकल की तैयारियों में जोर-शोर से लगे हुए हैं।  और शायद यही वजह है कि  वह अपने हर स्टंट को भी बिल्कुल परफेक्शन के साथ दर्शकों के सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं। 
सेट पर मौजूद सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार एक सीन की शूटिंग में टाइगर काफी वक़्त ले रहे हैं।  वे स्टंट में माहिर माने जाते हैं।  लेकिन इस बार वह स्टंट की सीन परफेक्ट तरीके से देने में काफी वक़्त लगा रहे हैं।  
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार वह जिस स्टन्ट वाले सीन की शूटिंग चल रही है।  वह स्टंट काफी कठिन भी है।  इसलिए टाइगर उसे करने में पूरी तरह कम्फेरटेबल भी नहीं हैं।  लेकिन यह भी सभी जानते हैं कि टाइगर अपने लिए किसी बॉडी डबल का इस्तेमाल नहीं करते हैं।  इसलिए उन्होंने यह स्टंट हर हाल में खुद करने की ही ठान रखी थी। बाद में काफी रस्सियों के सहारे उन्होंने शूटिंग पूरी की। खास बात यह रही कि  स्टंट के दौरान टाइगर को गर्दन के हिस्से पर चोट भी आयी. लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इस सीन को पूरा किया। 
मुन्ना मिल्कल की कहानी माइकल जैक्सन को समर्पित की गयी है। फिल्म का निर्देशन शाबिर खान कर रहे हैं। फिल्म 2017  में सात जुलाई को रिलीज होगी। 

http://www.jagran.com/entertainment/bollywood-tiger-shroff-hurts-himself-during-the-shooting-of-munna-michael-15130439.html

20160711

इसी बहाने संस्कृत भाषा का ज्ञान तो हुआ : शक्ति अरोड़ा


शक्ति अरोड़ा ने कलर्स के शो मेरी आशिकी तुमसे ही से काफी लोकप्रियता हासिल की. शक्ति की यह खासियत रही है कि वे सकारात्मक व नकारात्मक किरदार हमेशा ही निभाते आये हैं. इन दिनों वह होस्ट की भूमिका में हैं. सोनी के शो मन में है विश्वास में. पेश है अनुप्रिया अनंत से हुई बातचीत के मुख्य अंश
ेमन में है विश्वास को हां कहने की क्या वजह थी. आपकी यूथ फैन फॉलोइंग है. ऐसे में क्या आपके फैन्स इस तरह के शोज को गंभीरता से लेंगे?
मैं स्प्रीच्युअल हूं और मुझे नहीं लगता कि स्प्रीच्युअल होने का मतलब अंधविश्वास है. मुझे यह शो काफी इंस्पायरिंग लगता है. मुझे इस बात पर विश्वास है कि अगर आप अच्छा काम करते हैं तो भगवान आपके साथ होते हैं और आपका भाग्य भी साथ देता. मैं इस शो से बस इन्हीं कारणों से जुड़ा. मुझे लगता है. अच्छा करोगे तो अच्छा मिलता ही है. हम लोग इस शो में किसी धर्म का प्रचार नहीं कर रहे. बस लोगों के विश्वास को  दर्शा रहे. मेरा मानना है कि अगर आप अच्छा करते हैं तो आपके साथ अच्छा ही होता. जहां तक बात है कि मेरे युवा फैन फॉलोइंग की तो मैं उन्हें फोर्स नहीं कर सकता. मेरा मानना है कि इस शो से अगर पांच प्रतिशत लोग भी इंस्पायर हों तो यह सफल शो है.
आपने इससे पहले भी शो होस्ट की है. यह अनुभव अलग कैसे है?
मुझे लगता है कि शो की होस्टिंग भी एक अलग तरह की कला है. इससे भी आप काफी कुछ सीखते हैं. एक अलग ही विधा है. लोगों से अलग तरीके से जुड़ने का मौका मिलता है. यहां इमोशन अलग तरह का होता है और आॅडियंस से अलग तरीके से जुड़ना होता है. डेली सोप में आप डायलॉग्स को  इंप्रोवाइज भी कर लेते हैं.यहां यह सब मुमकिन नहीं है. 
हमने सुना, आपने इस शो के लिए संस्कृत भाषा की ट्रेनिंग लेनी शुरू की है.
हां, यह सच है. इस शो में श्लोक और दोहों का काफी इस्तेमाल करना होता है. संस्कृत के शब्दों को बोलना मेरे लिए चुनौती थी, क्योंकि  मुझे नहीं पता था कि उन्हें ठीक तरह से कैसे बोला जाता है. इसलिऐ मैंने संस्कृत की क्लासेज ले ली. खास बात यह रही कि मुझे इसमें काफी मजा आया. मेरे हर शोज या प्रोजेक्ट्स से मैंने कुछ न कुछ नया सीखा है. इस शो की वजह से मैंने संस्कृत सीख ली. इन दिनों मैं संस्कृत की किताबें खूब पढ़ रहा हूं. और संस्कृत भाषा पर आधारित वीडियोज भी देखे हैं. यह भाषा मुझे काफी रोचक लग रही.
आपका शो मेरी आशिकी काफी लोकप्रिय शो रहा. लेकिन इसके तुरंत बाद आप फिर से काम पर लौट आये? कोई खास वजह?
मुझे लंबे ब्रेक्स पसंद नहीं. मैं फिलहाल काम करना चाहता हूं. आराम नहीं करना चाहता. हालांकि मैं चाहता था कि छोटा ब्रेक लूं. लेकिन फिर इस शो का आॅफर आया. अच्छी बात यह है कि यह डेली सोप नहीं है तो हफ्ते में तीन दिन की शूटिंग करता हूं .बाकी दिन निजी जिंदगी गुजारता हूं. 
अपने हर प्रोजेक्ट्स से कितना निखारते हैं खुद को?
मुझे नया सीखना पसंद है और मेरी कोशिश होती है कि हर प्रोजेक्ट्स से कुछ न कुछ लूं. एक तरह के किरदार में या छवि में न बंधू. हर तरह के किरदार निभाऊं. हर विधा सीखूं. 
शाहरुख खान इंटरव्यू -01
गौरव नहीं बनता तो नहीं स्वीकारता यह फिल्म : शाहरुख खान
शाहरुख खान की आगामी फिल्म फैन में शाहरुख सुपरस्टार और फैन दोनों ही भूमिकाओं में हैं. इस फिल्म ने उनसे बतौर कलाकार सिर्फ अभिनय नहीं कराया, बल्कि तकनीकी रूप से भी यह फिल्म काफी अलग है. हॉलीवुड की फिल्मों में जो तकनीक कुछ सेकेंड्स के लिए इस्तेमाल किये गये हैं. उस तकनीक का इस फिल्म में दो घंटे इस्तेमाल किया गया है. शाहरुख मानते हैं कि अगर वे गौरव नहीं बनते तो वे यह फिल्म नहीं स्वीकारते. अपनी 25 साल के सफर से वे बेहद संतुष्ट हैं. बेटे का नाम आर्यन ही फिल्म में उनके किरदार का भी ंनाम है, मगर मानते हैं कि गौरव का किरदार नहीं निभा पाता उनका बेटा...शाहरुख खान की यह खासियत है कि वे अच्छे वक्ता है, क्योंकि वे अच्छे श्रोता हैं. वे आपके सवालों को ध्यान से सुनने के बाद ही स्पष्ट रूप से जवाब देते हैं. बॉलीवुड के युवा कलाकारों को शाहरुख से इस कला की ट्रेनिंग तो लेनी ही चाहिए कि जब सवाल पूछे जायें, तो किस तरह उनका टालने वाला व्यवहार न हो. अपनी फिल्म फैन और जिंदगी के कई दिलचस्प पहलुओं से शाहरुख ने अनुप्रिया अनंत और उर्मिला कोरी को अवगत कराया. उन्होंने प्रभात खबर डॉट कॉम से खास बातचीत की. इस लंबी बातचीत के प्रमुख अंश हम प्रभातखबर डॉट कॉम के पाठकों के लिए  किस्तों में लेकर आयेंगे. प्रस्तुत है पहली किस्त 

इस फिल्म में वास्तविक जीवन की छवि को रील लाइफ में दर्शाया है आपने कैसा अनुभव रहा आपका?
मुझे अगर गौरव का किरदार निभाने का मौका इस फिल्म में नहीं दिया जा रहा होता. मतलब अगर फिल्म में मुझे सिर्फ कहा जाता कि मैं स्टार की भूमिका निभाऊं. और गौरव का किरदार कोई और निभायेगा, तो शायद मैं यह फिल्म हरगिज नहीं करता. क्योंकि फिर वह बेमजा हो सकता था.  फिल्म की कहानी फिर प्री रिक्विसिट हो जाती.स्टार का किरदार मुझे लगता है कि कोई भी कर सकता था. फिर दूसरी बात है कि मैंंने चूंकि 25 साल इंडस्ट्री को दिये हैं तो लोग भी फिल्म देखेंगे तो महसूस करेंगे कि हां आर्यन खन्ना स्टार है. वह स्टैबलिश करने में दिक्कत नहीं होगी. आप देखें तो फिल्म में मेरे ही जन्मदिन के सीन लिये गये हैं. जैसे काजोल और मेरी फिल्म में लोगों को यह नहीं बताना होता है कि प्यार होगा इसमें. तो मैं मानता हूं कि आर्यन खन्ना को देख कर लोगों को लगेगा चूंकि मेरा चेहरा उन्हें नजर आयेगा तो वे महसूस करेंगे कि हां किसी सुपरस्टार की कहानी कही जा रही है. मुझे लगता है कि जैसे मेरा किरदार है, वह हिंदी सिनेमा का वह कोई भी स्टार जिसने कम से कम 10 साल 15 साल या फिर लंबी सदी दी है इस इंडस्ट्री को. वह यह किरदार निभा सकते. जैसे अमितजी, सलमान, आमिर, अक्षय, अजय कोई भी. ताकि लोग उनको समझ सकें.  तो हमने इस फिल्म में मेरी ही फिल्में बाजीगर, दिलवाले वगैरह के फुटेज लिये हैं. इस फिल्म की जरूरत थी कि शक्ल मिलती-जुलती होनी चाहिए थी. फिल्म में मेरा एंट्री सीक्वेंस ही है कि मैं लोगों को वेब कर रहा हूं. यह सब मेरी जिंदगी के वास्तविक फुटेज हैं. 
कोटेशन : जिन्होंने लंबी पारी खेली है इस इंडस्ट्री में वही बन सकते थे फिल्म में आर्यन खन्ना. मेरी जिंदगी के कई वास्तविक फुटेज हैं फिल्मों में.

आपके बेटे आर्यन का नाम आपने इस फिल्म में लिया कोई खास वजह, क्या आपको लगता है कि वह आपके साथ इस फिल्म में किरदार निभा सकते थे?
मुझे नहीं लगता कि अभी उसे इतनी एक्टिंग आती है. ये जो गौरव का रोल है. इसमें थोड़ा एक्सपीरियंस ज्यादा चाहिए. मुझे लगता है कि ऐसा कोई भी व्यक्ति गौरव का किरदार नहीं निभा सकता, जिसके पास अनुभव न हो फैनडम का. स्टारडम का. मैं यह नहीं कह रहा कि मैं ही कर सकता था या मैंने बहुत अच्छा किया है. लेकिन जो भी एक्टर करे, उसके पास अनुभव जरूरी है, क्योंकि इसमें बहुत सारे क्राफ्ट और तकनीक भी है. कैमरा के साथ.  ऐसे भी डबल रोल करना काफी कठिन होता है. मैंने जब डुप्लीकेट में किया था. काफी कठिनाई आयी थी. इसमें होता है कि हाथ नहीं आना चाहिए, कोई होता नहीं है. आपको सोच कर अभिनय करना पड़ता है, तो इसके लिए फिल्मों का अभिनय जरूरी है. और मुझे लगता है कि  मेरा बेटा यह किरदार निभाने के लिए टू हैंडसम हो जायेगा. 
कोटेशन : गौरव का किरदार निभाने के लिए फिल्मों का अनुभव जरूरी 
अब भी अभिनय करते वक्त नर्वस होते हैं. चुनौती लगती है हर फिल्म?
मैं मानता हूं कि हर फिल्म एक चैलेंज की तरह ही होती है. हर फिल्म में चुनौती होती है.हां, मगर जब आप पांच-छह सालों तक एक ही काम करते रहते हैं तो थोड़ा आत्मविश्वास तो आता ही है. मुझे लगता है कि अभिनय करना आसान है, लेकिन अभिनय के बारे में बातें करना मेरे लिए बोरिंग जॉब हो जाता है. मैं अभिनय को सीरियस लेता हूं. लेकिन उसके बारे में बातें करना सीरियस नहीं लेता. लेकिन आप जब कमर्शियल जोन के एक्टर होते हैं, जैसा कि मैं हूं तो खुद को लॉजिक देकर समझाना कि ये ठीक है या नहीं. खुद को कनविंस करना कठिन होता है. जैसे फिल्म दिलवाले का संवाद कि हम शरीफ क्या हुआ सारी दुनिया ही बदमाश हो गयी. यह हीरो टाइप साउंड करता है. और ऐसी फिल्में जब करता हूं, सो कॉल्ड हीरो टाइप तो खुद ही कनविंस करना पड़ता है कि जो दिखाया जा रहा है. सच है. अब जैसे हैप्पी न्यू ईयर उसमें मेरी एंट्री बॉक्सर की तरह हुई है. और मैं अपनी ही लाइन्स का मजाक उड़ा रहा हूं. अगले  सीन के अंदर मैं बैंक रॉबरी की प्लानिंग कर रहा. जीनियस की तरह. तीसरे सीन के अंदर मैं लड़की के साथ रोमांस भी कर रहा हूं. और दूसरे लोगों का टीचर बन गया हूं. तो यह कमर्शियल फिल्म की स्टोरीलाइन होती है. लेकिन कभी कभी खुद को कनविंस करना पड़ता है. अब आप देखें तो फिल्म में मुझे बॉक्सर क्यों दिखाया. पूरी फिल्म में तो मैंने कहीं बॉक्सिंग की ही नहीं है. हीरो टाइप कमर्शियल फिल्म अधिक कठिन होता है मेरे लिए. लेकिन जब मैं रीयल जोन में जाता हंू जैसे चक दे, फैन, स्वेदस मुझे लगता है कि सारी दुनिया मदद करती है. लाइन्स हेल्प करती है. वातावरण मदद करती है. अब जैसे इस फिल्म में गाना नहीं है. तो इसलिए नहीं है, क्योंकि हम चाहते हैं कि जब आप यह फिल्म देख कर जायें तो आपको लगे कि गौरव रियल था. रीयल लोग ऐसे गाना नहीं गाते हैं. तो लोगों को यह लगे कि वह शाहरुख नहीं था, कोई असली आदमी था. और आप घर गौरव को लेकर जायें. यही वजह है कि ऐसी फिल्में करते हुए मुझे मेरे कॉस्टयूम, मेरा लुक, सबकुछ मदद करते हैं. को स्टार्स मदद करते हैं. मेरे डायलॉग मदद करते हैं. मुझे लगता है कि यह कम चैलेंजिंग होता है. रीयल लाइफ किरदार निभाना. जैसे वीर-जारा कमर्शियल फिल्म थी तो अधिक कठिन थी. रानी से मैं इस बात का जिक्र कर रहा था. कि हमने 10 टेक लिया था.हमलोग हंस रहे थे. और यशजी गुस्सा भी हो गये थे कि जाओ पैकअप नहीं करेंगे शूट. यह कनविंस करना खुद को कि मैंं 60 साल का हूं. काफी कठिन था. यह अगर कमर्शियल फिल्म नहीं होती तो हो सकता है कि वहां रानी नहीं आती. सुहानी की तरह कोई छोटी लड़की आतीं. तो उसको बेटी कहना आसान होता. इस लिहाज से रईस भी रियलिस्टिक फिल्म है. अगर हम गाना भी कर रहे हैं रईस में,  तो कोरियोग्राफी भी इस तरह कर रहे हैं कि मैं अचानक से उसमें बेस्ट न दिखने लगूं. गैंगस्टर किस तरह अपने मोहल्ले में डांस करेगा.तो गैंगस्टर कैसे नाचेगा. मैंने उसी तरह डांस किया है. 
कोटेशन: कमर्शियल किरदार हैं अधिक कठिन. रियलिस्टिक किरदार रियल होते तो सारी दुनिया, माहौल, वातावरण से मदद मिल जाती है.
आपकी अब तक के 25 साल के सफर को किस तरह देखते हैं आप और क्या आपको लगता है कि आपकी क्षमता का अब भी पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं किया गया है?
मेरे निर्देशक करन जौहर, संजय लीला भंसाली, आदित्य चोपड़ा, मनीष, अजीज मिर्जा जो कि मुझे जानते हैं. वे मुझे कहते हैं कि मेरे पोंटेंशियल का सही इस्तेमाल नहीं किया गया है. लेकिन वे मेरे लिए सिर्फ फिल्में तो लिखेंगे नहीं( हंसते हुए) हां मगर कुछ फिल्मों को देख कर मुझे लगा कि मेरी क्षमता का सही से इस्तेमाल नहीं हुआ है. रब ने बना दी जोड़ी में आदी ने कोशिश की कि वह थोड़ा अलग टच दे, नकली उसका बेस है. मगर सूरी को रीयल टच देने की कोशिश की है. और मुझे लगता है कि आदी की वजह से ही मुझे रोमांटिक इमेज मिली. आदी ने ही कहा कि मुझे फैन करनी चाहिए.  मुझे नहीं पता कि मुझे किस तरह की फिल्में करनी चाहिए. लेकिन खुशी मिलती है, जब संजय लीला भंसाली ने मुझे कहा था कि अगर मैं देवदास नहीं करता, तो वह यह फिल्म नहीं बनाते. उन्होंने कहा था कि मुझे तुम्हारी आंखें देख कर देवदास की आंखें याद आती हैं. ऐसा कहा था उन्होंने. उस वक्त मैं बहुत बड़ा सुपरस्टार था भी नहीं.तो जब कोई निर्देशक इतना विश्वास दिखाता है तो मैं भी अपनी तरफ से पूरी कोशिश करता हूं कि विश्वास जीत सकूं. फिर मैं अपने क्राफ्ट पर काम करता हूं. और जब कभी मेरे मन मुताबिक मुझे फिल्म नहीं मिलती, तो भी मैं उसमें अवसर तलाशने की कोशिश करता हूं कि चलो कहानी के आधार पर नहीं तो तकनीकी रूप से फिल्म अलग होगी. जैसे मुझे वह फिल्म की कहानी बहुत अच्छी लगी थी. जॉली एलएलबी. अरशद वाली. लेकिन उस वक्त मेरे पास वक्त नहीं था तो मुझे यह गलत लगा था कि मैं उन्हें इंतजार कराऊं. तो उस तरह की फिल्म शायद मेरे लिए कुछ अलग होती. लेकिन मंै कर नहीं सका था. चकदे के लिए आदी ने किसी और को कास्ट किया था. उसने किसी के साथ ट्रायल भी किया.लेकिन उस वक्त आदी ने कहा कि चलो हम इंतजार करेंगे एक साल. लेकिन तेरे साथ ही करेंगे. और मेरी वजह से सारी लड़कियों की कास्टिंग दोबारा से हुई थी. तो मुझे जब कोई ऐसी फिल्म मिलती है, जिसका किरदार मुझे खुशी देता है. जैसे आनंद अभी द्वारफ का किरदार लिख रहे हैं तो यह इंटरेस्टिंग है कि वह एक बिग स्टार को ले रहे हैं और फिर उसे उस किरदार में ढालेंगे तो  काफी दिलचस्प लगी मुझे. तो ऐसे में जब मुझे मौके मिलते हैं तो मैं अपना पोटेंशियल दिखाता हूं. और अगर न मिले  तो जो रहता है खुश रहता हूं. 
कोटेशन : 1.संजय लीला ने कहा था, देवदास की आंखें और तुम्हारी आंखें एक सी हैं. 
2.जॉली एलएलबी की कहानी बेहद पसंद आयी थी. मगर अफसोस नहीं कर सका था
3. आदी ने चकदे के लिए किसी और को कास्ट किया था. लेकिन बाद में उन्होंने फिर एक साल इंतजार किया. सारी लड़कियों की भी री कास्टिंग हुई थी.
आपको युवा दिखाने के लिए जो तकनीक का इस्तेमाल किया गया है. वह क्या है?
 पहले तो प्रोस्थेटिक लगता है. जो कि आंख के नीचे से लगता है.इसमें चार-पांच घंटे लगते हैं. आंख बड़ी की गयी है. मेरी आइब्रोज का शेप ऐसा है, तो हमने इसको सीधा किया है. नाक छोटी की है. होंठ और दांत को इनहांस नहीं किया है. एक्टिंग करते वक्त बस ध्यान दिया है. थोड़ा वजन कम किया है. इसकी शूटिंग के बाद इसी मेकअप के साथ सारे के सारे सीन एक ही लाइट में शूट करना पड़ता है और यह लाइट लॉस एंजिल्स में ही उपलब्ध है. वहां बड़ा सा बॉल होता है. तो वहां जाकर जो चीजें यहां की होती हैं. वहां जैसे 200 एक्सप्रेशन हैं. उसे कवर करते हैं. और वहां जब कैमरा रोल होता है तो एक सेकेंड के अंदर कई तसवीरें खींचती हैं.एचडी होती है. फिल्म को जब टच अप करते हैं तो उन्हीं तसवीरों को देख कर कि वह सेम एक्सप्रेशन लगे. प्लास्ट होता है. पहली बार यह पूरा प्रोसेस देखने के लिए सात या आठ सेकेंड लगते हैं. 300 लोगों को 24 घंटे काम करना पड़ता था. तो हमने सीन कैसा किया यह हमें तीन साढ़े तीन महीने बाद देखने को मिलता था. पिछले 10 दिन में हमने ज्यादातर सीन देखे.यही वजह है कि हॉलीवुड में भी दो तीन मिनट के लिए इस्तेमाल किया है इस तकनीक का. जैसे कैप्टन अमेरिका है. एंटमैन में. लेकिन वह बेसिक है. लेकिन इस फिल्म में पूरे दो घंटे के लिए किया है और वह काफी कठिन रहा. 12-12काम करते थे और 7-8 सेकेंड का सीन होता था.
आप किसके फैन हैं?
ैम्मैं अपने बच्चों का फैन हूं. क्योंकि वह जब मेरे पास नहीं होते.तब भी मैं उन्हें याद करता हूं और उनके बारे में सोच कर खुश होता हूं. मैंने अपनी वैनिटी में भी उनकी तसवीरें लगा रखी हैं तो मैं यही कहूंगा कि मैं उनका ही फैन हूं.




फैन्स का प्यार होता है अनकंडीशनल : शाहरुख खान 
शाहरुख खान फिल्म फैन में अलग ही अवतार में नजर आ रहे हैं. वे इसे अपने करियर की खास फिल्मों में से एक मानते हैं. एक सुपरस्टार की जिंदगी में फैन क्या अहमियत रखते हैं...इसी विषय को लेकर मनीष शर्मा ने इस फिल्म का निर्माण किया है. शाहरुख की व्यक्तिगत राय है कि फैन नहीं तो सुपरस्टार्स नहीं. लेकिन फिल्म की कहानी कुछ और ही बयां करती है. फिल्म व कई अन्य पहलुओं पर शाहरुख खान ने उर्मिला कोरी व अनुप्रिया अनंत से खास बातचीत की.

 फैन के ट्रेलर में लगातार फैन के ओबसेशन और कनेक् शन की बात की गयी है. तो क्या आप मानते हैं कि एक फैन का ओबसेशन और कनेक् शन के बीच कुछ रिश्ता है.
फैन की परिभाषा दरअसल, जो हमने सोच रखी है, वह यही है कि जो बेइतहां प्यार करें. एक फैन जो दूर है. वह साउंड ओबसेसिव करता है. लेकिन उसका प्यार अनकंडिशनल वाला ही प्यार है. दूर करने वाले लोग दरअसल, मुझे लगता है कि ज्यादा प्यार करते हैं. नजदीक वाले लोग अधिक कंडिशन लगाने लगते हैं. गर्लफ्रेंड के साथ. या परिवार के साथ कि ये मत करो. वो करो. फैन का प्यार वैसा होता है कि आप जो भी करेंगे मैं आपको प्यार करता रहूंगा. बिना किसी जजमेंट के.बुरा करोगे तो मैं डिफेंड करूंगा. अच्छा करोगे तो अच्छा. मुझे लगता है कि ओबसेशन नहीं है.अनकंडिशनल लव है. कभी-कभी नॉर्मल प्यार भी ऐसा लगने लगता हंै. तो मैं नहीं मानता कि कनेक् शन और आॅबसेशन सेमथिंग है.
इस फिल्म में आपका फैन आपका लुकअलाइक है. तो इसकी कहानी के अनुसार कितनी जरूरत थी और आप जब निजी जिंदगी में अपने लुकअलाइक को देखते हैं तो क्या महसूस करते हैं?
पहले जब हमने यह फिल्म सोची तो एक बात तय कर ली थी कि डबल रोल नहीं लगनी चाहिए कहीं से. मकसद यह जरूर था कि जरूर लगना चाहिए कि दो किरदार है. अगर मेरे साथ मनीष फिल्म बनाना चाहते थे. और शायद ऐसा इसलिए था, क्योंकि रियल में ऐसा कोई एक्टर चाहिए था जिसने 10-15 साल काम किया हो, उसका बॉडी आॅफ वर्क हो. जैसे जो हमने अर्काइव फोटोज इस्तेमाल किये हैं, वह वास्तविक हैं. अगर ऐसा नहीं होता, तो आपको फिर उसको शूट करना पड़ता. स्टार को समझाना पड़ता कि वह स्टार की तरह बिहेव करे. तो अभी क्या है कि मेरी अपनी एक जर्नी रही है 20-25 साल की. तो मनीष कोशिश थी कि हम शाहरुख की तरह लुकलाइक लायें, लेकिन वह शाहरुख न हो. बस कि उस फैन में  झलक हो आर्यन खन्ना की.फिल्म में कभी कभी ऐसा लगे कि फैन स्टार जैसा है और कभी-कभी न भी लगे कि वह स्टार जैसा है. और मैं जब निजी जिंदगी में किसी लुकअलाइक देखता हूं तो मुझे लगता है कि मैं ही ज्यादा हैंडसम हूं(हंसते हुए).
गौरव के किरदार में आप अपनी उम्र से कम उम्र के नजर आ रहे हैं. बतौर एक्टर अपने उम्र से कम उम्र का किरदार निभाना कठिना होता है या अधिक उम्र का किरदार?
गौरव का जो इस फिल्म में मेकअप है, शायद बॉलीवुड में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी को जवान दिखाने के लिए पॉसथेटिक मेकअप का इस्तेमाल किया गया है. जैसे कपूर एंड सन्स में ऋषि कपूर साहब को बड़ी उम्र का दिखाने के लिए इस मेकअप का इस्तेमाल किया गया था.यह जब लगता है तो लाइन्स बहुत खींच जाती है. थोड़ी सी भी गड़बड़ी हो तो नजर आने लगती है. मुझे लगता है कि यह एक्सपेरिमेंट पहली बार हुआ है. जहां तक बात है परफॉरमेंस की तो मुझे खुद से अधिक  उम्र का किरदार निभाना कठिन लगता है.चूंकि मेरी जो फिजिकैलिटी है. वह एक लड़के की तरह है. मैं मर्द सा नहीं लगता हूं. एल्फा मैं लगता ही नहीं हूं. कितने भी मशल्स बना लूं. मैं ब्वॉय जैसा ही दिखूंगा. तो मेरे लिए कम उम्र का किरदार आसान होता है. वही दूसरी तरफ जब मैं वीर जारा में बुजुर्ग का किरदार निभाया था तो वह काफी कठिन था. एक तो उस वक्त मुझे रानी मुखर्जी को बेटी कहने में भी काफी दिक्कतें आ रही थीं. यश अंकल नाराज भी हो रहे थे. मेरा माइंडसेट भी वैसा ही युवाओं वाला है. खासतौर से मैं जब काम न करूं तो अपने बच्चों से ही घिरा रहता हूं तो मेरा माइंडसेट यंग है. चुलबुला है. भले ही मैं 50 की उम्र पार कर चुका हूं फिर भी. मेरे बच्चे को भी ब्वॉय जैसा लुक ही पसंद है.
आपके किसी फैन ने कभी ऐसा कुछ किया हो, जिसने आपको चौका दिया हो?
नहीं, मैं दरअसल ज्यादा लोगों से मिलता ही नहीं हूं.मुझे मालूम नहीं. लेकिन हां, मैं कुछ सुना है कि अमेरिका में किसी महिला ने मेरे लिए चांद पर जमीन खरीद कर रखी है.एक हैं जो स्केच बनाते हैं.मुझे लगता है कि यह जमाने की और उम्र की भी बात होती है. आप देखें तो फैन्स अधिकतर युवा उम्र में अधिक बनते हैं. चूंकि वह जवां उम्र होती है और किसी काम के लिए उनमें जोश होता है. और वे वह कर जाते हैं जो शायद एक मैच्योर न करे. हां, बस यह जरूर कहूंगा कि कोई मुझे खुश करने के लिए खुद को नुकसान पहुंचाये तो वह मुझे पसंद नहीं है. मेरी एक फैन ने मुझे फोन किया था. वे बार-बार कर रही थीं. उनका कहना था कि उन्होंने सपना देखा है कि मेरी डेथ हो गयी है. मैं उस वक्त सर्जरी के लिए जा रहा था. मैं जब लंदन पहुंचा और मैंने पेपर साइन किये तो मैं उस वक्त काफी डर गया था.
आपको क्या लगता है कि एक फैन की क्या सीमाएं होनी चाहिए. किस हद तक उन्हें किसी सुपरस्टार्स की जिंदगी में झांकना चाहिए?
मैं पर्सनली इन बातों पर विश्वास नहीं करता कि मैं फैन को कहूं कि तुम ये करो. ये मत करो, क्योंकि जो फैनडम बनता है. वह सोच कर नहीं होता. सोच कर किया तो वह फैन नहीं होता.मैं जरूर कहूंगा कि खुद को चोटिल मत करो. लखनऊ में मुझे याद है डर के वक्त लोगों ने चाकू से अपने सीने को काट लिया था. जबकि मैंने फिल्म में असल में ऐसा नहीं किया था.तो ऐसे में दुख होता है. मैं बस उन्हें नजदीक नहीं आने देना चाहूंगा. बाकी लोग आते हैं. कई लोग गालियां भी देते हैं तो हम स्टार हैं. हमें उन्हें सुनना ही होगा.प्यार भी करते हैं. खासतौर से मुझे लड़कियों के लिए अच्छा नहीं लगता कि वह भीड़भाड़ में आती हैं और उन्हें धक्के लगे तो.और जब आप तय कर लेते हैं कि आप स्टार हैं तो आप पब्लिक फिगर बन चुके हैं. जब से मैं इस इंडस्ट्री का हिस्सा बना. उसे 8-10 सालों के बाद से ही मेरे परिवार वालों ने यह बात समझ ली थी कि मेरा वक्त अब सिर्फ मेरा या परिवार का नहीं है.ऐसे में जब मैं काम से 3 बजे लौट कर जाता हूं और कहता हूं कि तुमलोगों के साथ इस वक्त बैठना चाहता हूं तो उनका कभी यह कहना नहीं होता कि अभी नहीं. वे मेरे वक्त को समझ चुक ेहैं. वह कभी शिकायत नहीं करते. यही वजह है कि वे मुझे कई जगहों पर साथ जाने के लिए जिद्द नहीं करते. एयरपोर्ट पर भी व ेकहते हैं कि हम पहले निकलते हैं. आपको वक्त लगेगा. हां, मगर उन्हें सिर्फ ये बातें बुरी लगती हैं कि जब मैं नहीं रहता, िफर भी कैमरा उनका पीछे करे तो. किसी पार्टी में उनसे कोई पूछे कि शाहरुख के बेटे हो या बेटी हो तो वे न कह देते. ताकि एंजॉय कर सकें वे.

एक एक्टर के लिए ड्रीम रोल है रजनी : रिद्धिमा पंडित


रिद्धिमा पंडित को देख कर इन दिनों सास की चाहत यही है कि काश, हमारी बहू भी रजनीकांत बन जाये. अपने पहले ही शो से उन्होंने धमाल मचा दिया है. खासतौर से बच्चों को उन्होंने अपना प्रशंसक बना लिया है. लाइफ ओके के शो बहू हमारी रजनीकांत के लीक से हट कर विषय होने की वजह से इन दिनों दर्शकों को यह शो बेहद पसंद आ रहा है.रिद्धिमा रोबोट का किरदार निभा रही हैं. लेकिन वह अपने किरदार में रोबोटिक एकरसता नहीं ला रहीं. यही उनके किरदार की खूबी है. पेश है अनुप्रिया अनंत से रिद्धिमा की बातचीत के मुख्य अंश

आपके शो को काफी लोकप्रियता मिली है. आप इस सफर को किस तरह देखती हैं?
मैं बहुत खुश हूं कि एक अलग तरह का किरदार निभाने का मौका मिला है. सफर बहुत अच्छा रहा है. मैं पहले टीवी करने से डरती थी, कि पता नहीं कैसे करूंगी. इतना हार्ड वर्क है. मैं क्योंकि एड बैकग्राउंड से आती हूं. उसमें कभी काम मिल गया तो मिल गया. कुछ घंटों का काम होता. यहां पर जॉब जैसा है. लेकिन पहले डरती थी. अब तो इतनी सराहना मिल रही है कि मुझे काफी मजा आ रहा है. मेरे फैन्स बन गये हैं. यहां हर दिन कुछ नया करने को मिल रहा है. एक बड़ा प्लैटफॉर्म मिला है.

आपके किरदार रजनीकांत को देखें तो हर दिन उसमें भिन्नता दिखाई देती है.तो हर दिन अलग तरह से तैयारी करना कितना कठिन होता?
जो एक्टर चैलेंज लेने को तैयार हो. उसके लिए तो यह ड्रीम रोल है. जो एक्टर कतराता है. उसके लिए यह मुश्किल होगा. मेरे लिए भी कठिन है. इसमें व्वॉयस मॉडयूलेशन करना बहुत जरूरी है. और जब आप अंदर से महसूस करो कि अपने किरदार को बेस्ट देना है तो आप अच्छा ही काम करेंगी.  मुझे इस किरदार को निभाने में मेरे निर्देशक मदद करते हैं.मेरे को-एक्टर में पल्लवी और करन बहुत मदद करते हैं. को एक्टर्स भी मदद करते हैं. हम सभी एक दूसरे को इंप्रोवाइज करते हैं. 
एक्टिंग का सपना हमेशा से देखा था?
हां, मैं बचपन से ही एक्ट्रेस बनना चाहती थीं. और पता नहीं मैं खुद में यह मान बैठी थी कि मेरे परिवार को शायद इस बात से हर्ज होगा. मैंने कभी उनसे चर्चा ही नहीं की.मैंने इसलिए जॉब किया था पहले. मैं आर्टिस्ट मैनेजर रह चुकी हूं. इवेंट्स मैनेज किये हैं मैंने. फिर एक दिन मैं अपने पिताजी के पास गयी और उनको बोला कि नादिरा बब्बर जी का एक थियेटर वर्कशॉप आ रहा है. और वह मैं करना चाहती हूं.तो पापा ने सपोर्ट किया. मां ने भी.मैंने वह वर्कशॉप ज्वाइन किया. फिर मैं उनके थियेटर गु्रप में काम करने लगी. फिर मैंने कुछ दिनों के लिए एक्टिंग छोड़ी भी थी. लेकिन एक्टिंग में ही मुझे जाना था. तो कुछ दिनों के बाद एड फिल्मों में काम शुरू किया और फिर बस मिलते गये अवसर.
आपका पहला प्रोजेक्ट कौन सा था?
एक डियोडरेंट का विज्ञापन किया था. और उसके बाद से लगातार मुझे आॅफर्स मिलने लगे थे और मैं फिर लगातार काम करती रही. टीवी के लिए हमेशा से मुझे  आॅफर आते थे. लेकिन मैंने तय कर रखा था कि कुछ भी नहीं कर लेना है. अच्छे अवसर मिलेंगे और अच्छा किरदार कुछ हट के तभी करूंगी. मुझे कुछ अलग करके ही यहां आना है. और मुझे यह शो मिल गया. 
जब शो की शुरुआत हुई थी तो कभी  मन में संदेह था कि यह प्रयोगात्मक शो अगर कामयाब न हुआ तो क्या होगा?
नहीं मैं कभी शो को लेकर संदेह में नहीं रही. चूंकि शो का कांसेप्ट अलग है. बतौर आॅडियंस मैं इस तरह के शो जरूर देखना पसंद करूंगी. और अगर शो नहीं भी हिट होता तो मैं खुश होती कि जब लोग कुछ नये की बात करेंगे तो लोग मुझे रजनी के नाम से याद तो जरूर करेंगे. लेकिन खुशनसीब हूं कि लोगों को शो पसंद आ रहा है. खासतौर से बच्चे मेरे फैन्स बने हैं. इस बात की खुशी है. वे जब मुझसे मिलने आते हैं तो गौर से देखते हैं कि मैं किस तरह से बर्ताव कर रही हूं. मैं भी इनसानों की तरह ही हूं. लेकिन टीवी में तो अलग हूं तो उनकी दिलचस्पी देख कर अच्छा लगता.
रिद्धिमा में रजनी के कौन से फीचर्स हैं ही नहीं?
रिद्धिमा को दुख होता है. वह सेंसटिव है. रिद्धिमा को तो बहुत रोना आता है. रजनी की तरह उसके पास हर बात का सॉल्यूशन नहीं और रजनी डिप्लोमेटिक नहीं हो सकती. चूंकि मशीन है. इनसान नहीं हो सकता.
जब एक्टिंग नहीं कर रही होतीं तो क्या करना पसंद है?
परिवार के साथ वक्त बिताना और छुट्टियां अगर लंबी मिले तो ट्रैवलिंग करना पसंद है. 

आराध्या को पता है मेरे किरदार का नाम : ऐश्वर्य राय बच्चन



ऐेश्वर्य राय बच्चन फिल्म सरबजीत में दलबीर कौर की भूमिका में हैं. वे बताती हैं कि वे इस किरदार से काफी प्रभावित हुईं और वे दलबीर कौर को सलाम करती हैं. हाल ही में वे कान महोत्सव से भी लौट आयी हैं. पेश है अनुप्रिया अनंत से हुई बातचीत के मुख्य अंश

 दलबीर का किरदार
मैंने इस फिल्म को हां इस वजह से ही की, क्योंकि मैंने सुनी थी पूरी कहानी. फिर मैं इस बारे में अच्छी तरह से वाकिफ थी कि उस वक्त क्या हुआ था. यह कहानी दिल दहलाने वाली है. आपको चौकाती है यह फिल्म. सरबजीत  तो जेल काट रहे थे. लेकिन लंबे अरसे तक किस तरह उनके परिवार ने उनका साथ दिया और संघर्ष किया. उन्हें सलाम है. किस तरह उनकी बहन ने खुद की पूरी जिंदगी भाई की रिहाई के संघर्ष में लगा दी. यह काफी प्रेरणा देती हैं. ऐसी महिलाएं भी हमारी आदर्श बननी चाहिए. इस वजह से इस कहानी ने मुझे प्रभावित किया.
आराध्या को पता है मेरे किरदार का नाम
आराध्या को अब धीरे धीरे मेरे काम की समझ होने लगी है. खास बात यह है कि उसे इस फिल्म में मेरे किरदार का नाम पता था. जब फिल्म के प्रीमियर पर जाने से पहले हम बातें कर रहे थे तो उसने तुरंत बोला सरबजीत नाम है न फिल्म का और आप दलबीर कौर का किरदार कर रहे हो.यह सुन कर मैं भी चौक गयी थी. आराध्या ेजानती है कि मैं अपने काम की वजह से उसे नजरअंदाज बिल्कुल नहीं करती.इसलिए मुझे कभी कोई परेशानी नहीं होती. वह जिद्दी बच्ची नहीं है. काफी एंजॉय करने वालों में से है.
कान में लिपस्टिक को लेकर चर्चा
मेरा मानना है कि मैं अभिनेत्री हूं और हमेशा कुछ नया करना मुझे अच्छा लगता है.मुझे यह करने में बहुत मजा आया और मुझे इसके लिए मिक्सड रिस्पांस मिले. मेरा मानना है कि सिर्फ इस बार ही नहीं, जब भी मैं रेड कार्पेट पर होती हूं, कान में. मेरी कोशिश होती है कि मैं कुछ नया करूं. फिर वह वाउ हो या नो हो. मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. दरअसल, मुझे लोगों की बातों का बुरा ही नहीं लगता.
नहीं हूं प्रेगनेट
इस बात को लेकर बेवजह अफवाह उड़ाये जा रहे हैं. मेरे मजाक को भी लोग गंभीरता से लेते हैं. मैं प्रेगनेट नहीं हूं. और यही हकीकत है.
अभिषेक के साथ फिल्म
हमें कोई वैसी फिल्म मिले तो हम जरूर करना चाहेंगे. हमारी पिछली फिल्में आज जब हम देखते हैं तो महसूस करते हैं कि इससे बेहतर काम हम कर सकते थे. उन्हें देख कर महसूस भी करते हैं कि अभी और भी बहुत कुछ हमें सीखना है. 
ऐ दिल है मुश्किल
ऐ दिल है मुश्किल में मैं एक ऐसा किरदार निभा रही हूं, जिसे लेकर मैं खुद बहुत उत्साहित हूं. करन के साथ हमेशा से काम करना चाहती थी. हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त हैं. लेकिन हमारी बात ही नहीं बन पा रही थी. इस बार जो किरदार निभा रही. वह काफी मजेदार है. लोगों को मजा आयेगा. 

आया ही इसलिए था कि अपनी तरह की फिल्में करूं : इरफान खान


इरफान खान जब किसी फिल्म के साथ जुड़ते हैं तो वह फिल्म ब्रांड बन जाती है. इस बार वह मदारी बन कर आ रहे हैं. वे मानते हैं कि युवाओं को अपना आदर्श किसी फिल्म स्टार को नहीं, बल्कि वैसे लोगों को बनाना चाहिए, जो छोटे शहरों व गांवों में कुछ नया कर रहे हैं. उन्होंने स्वीकारा है कि लोगों का विश्वास उनकी सरीकी फिल्मों पर बढ़ा है. अपनी आगामी फिल्म के अलावा उन्होंने कई पहलुओं पर  बातचीत की.

मदारी सिस्टम के खिलाफ खड़ी है?
नहीं, सिर्फ सिस्टम के खिलाफ खड़ी है. ऐसा ही नहीं है. यह फिल्म इमोशनल थ्रीलर भी है.सिस्टम उसमें एक एलिमेंट है. लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या मुझे सिस्टम से शिकायत है तो मैं कहना चाहूंगा कि ऐसा नहीं होता कि सिस्टम से शिकायत हो जाये.सोसाइटी बदलेगा तो सिस्टम भी बदलेगा.मेरा मानना है कि वह कौन बदलेगा. आम आदमी ही बदलेगा न. वह आवाज उठायेगा तभी बदलेगा.फिल्म में और बहुत सारी चीजें हैं. 
इरफान का नाम जब किसी प्रोडक्ट से अब जुड़ता है तो वह ब्रांड बन जाता है. इस मुकाम पर पहुंच कर आप क्या महसूस करते हैं?
यह सब हमारा ही कियाधरा है. हमारे ही कर्मों का फल है. चूंकि आप चाह रहे थे कि इंडस्ट्री एक तरह से चल रही है, तो ऐसे में कैसे जगह बनायें. तो वहां आपको लग रहा था कि आपको अपने तरीके का काम करना है और जगह बनानी है. ऐसे में धीरे-धीरे आपको काम मिले और लोगों ने देखा.चूंकि  लोगों को वह एंटरटेनमेंट मिला है जो अलग है. जो आपके साथ रहता है.वह कहानी आपसे अगले दिन भी बात करती है. इसलिए लोगों ने आपकी फिल्मों को हिट कराया है. शुक्रवार का जो बिजनेस है.वह आपको सोमवार को तय हो रहा है. लोगों ने जब ऐसी फिल्मों को देखना शुरू किया तो सोमवार को फिल्म के बिजनेस ने नया आकार लिया. वह बात लोगों को समझ आती है. कोई फिल्म अगर सोमवार को हिट मतलब वह अच्छी ही है. मैं आया ही यहां इसलिए था कि यहां पर अपनी तरह की फिल्में कर सकूं और जगह बना सकूं.अपनी कहानियों को रिडिफाइन कर सकें. फिर चाहे वह विषय कोई भी हो. मेरी कोशिश है कि मैं नयापन ला सकूं. मेरी यह जरूरत थी और अब मेरी यह पहचान बन गयी है.
इस फिल्म से निर्माता बनने का ख्याल कैसे आया?
यह कहानी ही ऐसी थी कि हम सबको लग  रहा था कि हम अगर जाकर कॉरपोरेट में यह कहानी सुनायेंगे तो जो इंपैक्ट है. वह समझ नहीं पायेंगे. उन्हें लगेगा कि इतना पैसे कैसे डालें.तो बेहतर यही है कि हम खुद पैसे लगायें और बनायें. चूंकि यह रेगुलर स्ट्रक्चर वाली फिल्म नहीं है. फिल्म कहीं और से शुरू होती है और कहीं और जाती है. कई फिल्में होती है, जो पेपर पर एक्साइट नहीं करती. लेकिन होती कमाल की है. पीकू को ही देख लें. उसमें तो कोई कहानी ही नहीं थी.शूजीत सरकार बड़ा नाम था. लेकिन एक्टर हैं तो हम समझ पाते हैं कि हम कहानी में क्या भाव क्रियेट कर सकते हैं. इस फिल्म के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. इस फिल्म में ज्यादा एक्सरसाइज नहीं करेंगे.
इस फिल्म के माध्यम से क्या आपकी कोशिश है कि आप आम आदमी को यह बता पायें कि उनके अधिकार क्या क्या हैं?
फिल्म में वह एक एलिमेंट है कि आम आदमी की भी जिम्मेदारी है. सिर्फ वोट देना आम आदमी की जिम्मेवारी है. आम लोगों को भी सचेत रहना जरूरी है. राइट्स मांगना अधिकार है तो डयूटी निभाना भी जरूरी है.सिस्टम आपके लिए काम नहीं करेगा. अगर आप वोट देकर निश्ंिचत हो जायेंगे तो सिस्टम आपके लिए काम नहीं करेगा.सिस्टम जैसे चाहेगा. आपको नचायेगा. जब तक कि आपमें कुबत नहीं है.दरअसल, हम हमेशा वैसे ही समाज में जिये हैं. जहां फ्यूडल राजा  राज करता आया. अभी भी ऐसा ही लगता है कि हमने राजा चुन लिया और हम ढोल पटाखे बजा कर तमाशे का जश्न करते हैं. और फिर हमें लगता है कि हमारा राजा ही सबकुछ बदल देगा. इतने भुलावे में रहना तो ठीक नहीं है.
आप मानते हैं कि सिनेमा सोच बदलती है किसी भी लिहाज से?
सिनेमा का योगदान होता है अपना. आपको एंटरटेन करने का भी होता है. आपके मन में सवाल जागृत करने का भी होता है. सिनेमा आपके लिए कुछ ऐसा एक्सपीरियंस छोड़ जाता है. जो बाकी चीजें आपको नहीं देती हैं. कई नयी चीजों के बारे में बता देता है. लेकिन अकेली फिल्म कुछ नहीं कर सकती. 
कोई ऐसी फिल्म जिसने आपको बदला हो किसी भी लिहाज से?
बहुत सारी फिल्में हैं. लिटरेचर है. कई चीजें हैं, जैसे अगर आपने कहीं का सिनेमा देखा है, वह मुल्क नहीं देखा. लेकिन पढ़ा है. फिल्मों में देखा है तो यह सब आपके जीवन पर असर डालती है. सोसाइटी के बारे में अंदाजा मिलता है. जैसे ईरान नहीं गया हूं. लेकिन वहां के सिनेमा से वहां के समाज का अनुमान लगा पाता हूं. सोसाइटी का आभास होता है.लेकिन  हमारे यहां का सिनेमा उतना रियलिटी को डील नहीं कर पाता. लेकिन अब जो सिनेमा आ रहा है. वह रियल भी है. एंटरटेन भी कर रहा. यह जो सिनेमा है वह ज्यादा यूनिवर्सल होगा. नयी आॅडियंस तैयार हो रही है.