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20110528

राष्ट्रीय फलक पर झारखंड के फिल्ममेकर व कहानियां ...



58वें राष्ट्रीय पुरस्कार झारखंड के लिए ऐतिहासिक है. इस बार राष्ट्रीय पुरस्कार कई रूपों से झारखंड के लिए महत्वपूर्ण है. जहां राज्य के दो फिल्मकार मेघनाथ व बिजू टोप्पो का नाम विजेताओं में शामिल है, वही झारखंड के विषय पर बनी फिल्म को भी पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है. इन तीन विजयी फिल्मों की मेकिंग पर अनुप्रिया की रिपोर्ट

बिमल रॉय की फिल्म देवदास देख कर कभी वी शांताराम ने यह बात कही थी कि कोई शराब पीकर किसी लड़की के प्यार में दीवाना हो जाये तो उस पर फिल्में बना लेना ही सिर्फ सिनेमा का उद्देश्य नहीं. सिनेमा का सामाजिक उद्देश्य भी है. आम लोगों की जिंदगी के बारे में उनकी परिस्थिति को लोगों तक पहुंचाने का सार्थक प्रयास सिनेमा ही कर सकता है. इसी उद्देश्य के साथ वी शांताराम ने फिल्म आदमी का निर्माण किया था. वी शांताराम की जिंदगी व उनके फिल्मों की शैली से प्रभावित होकर फिल्मकार मेघनाथ भट्टाचार्य ने फिल्मों का ंनिर्माण प्रारंभ किया था. उन्होंने भी सिनेमा के गंभीर पक्ष को देखा और एक उद्देश्य के साथ फिल्मों का निर्माण करने लगे. कुछ ऐसी ही सोच रखते हैं मेघनाथ भट्ट्चार्य, जिनकी फिल्म को इस बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है. झारखंड में पिछले कई सालों से अपनी फिल्मों के माध्यम से वहां की आम जनता व विशेषकर आदिवासी समुदाय की समस्याओं को दर्शाने की कोशिश कर रहे हैं. इसी क्रम में आयरन इज हॉट एक प्रयास के रूप में लोगों के सामने आया. जिसमें स्पांच आयरन की फैक्ट्री की वजह से आम जीवन अस्त-व्यस्त होने की व्यथा है. मेघनाथ की इस फिल्म में निदर्ेशक व कैमरामैन के रूप में बिजू टोप्पो ने उनका साथ दिया. साथ ही फिल्म के संपादन में कोलकाता के देवकांत व रांची के अमित अर्ज बहादुर ने सहयोग किया. इन चारों लोगों की टीम व कुछ विशेषज्ञों की मदद से फिल्म बेहतरीन बनी और राष्ट्रीय पुरस्कार कमिटी द्वारा विजयी घोषित की गयी. इसी टीम द्वारा बनाई गयी फिल्म एक रोपा धान किसानों की व्यथा को दर्शाती है. फिल्म के निर्माण में हुई परेशानियों के बारे में मेघनाथ कहते हैं कि हमने जब यह क्षेत्र चुना तभी सोच लिया था कि परेशानी का सामना करना ही होगा. यह हमारी जिंदगी का हिस्सा है. इसलिए हम भी इससे भागते नहीं. फिल्म कार व मेघनाथ के सहयोगी बिजू बताते हैं कि इस तरह के विषयों पर फिल्में बनाने में बहुत परेशानी होती है.कई बार शूटिंग के दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा. साथ ही माइनिंग माफियों ने भी उन्हें परेशान करने की कोशिश की.इन फिल्मों की शूटिंग छतीसगढ़, ओड़िसा, झारखंड में की गयी, जहां कई स्थानीय प्रशासन से भी परेशानी का सामना करना पड़ा. लेकिन इसके बावजूद बिजू मानते हैं कि अगर नीयत सही हो तो हल निकल ही आता है. यूं ही जूझते जूझते फिल्म का निर्माण हुआ. फिल्म में बतौर वीडियो संपादक अमित अर्ज बताते हैं कि इस फिल्म के संपादन में वक्त इस स्तर पर परेशानी आती थी कि हम एक ही फिल्म के माध्यम से कई बातें कहना चाहते थे. चूंकि मुद्दा इतना गंभीर था. अमित इस बात से बेहद खुश हैं कि उन्हें इस टीम का हिस्सा बनने का मौका मिला. वे इसका पूरा श्रेय मेघनाथ सर को देते हैं. राष्ट्रीय पुरस्कार की श्रेणी में एक और फिल्म झारखंड के लिए महत्व रखती है .जोहार. चूंकि इस फिल्म का विषय झारखंड की संस्कृति पर आधारित है. जिसे कोलाकाता के फिल्मकार नीलांजन ने बनाया है. इसे भी इस बार पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है. झारखंड, बिहार व पश्चिम बंगाल के लिए यह गौरव की बात है कि यहां की कहानियां व फिल्मकारों को सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है.

बॉक्स 1 ः

गैर फीचर फिल्म की श्रेणी में

58वें राष्ट्रीय महोत्सव में मिल रहा है सम्मान

सर्वश्रेष्ठ पर्यावरण फिल्म

आयरन इज हॉट

भाषा ः अंगरेजी

निर्माता ः मेघनाथ भट्टाचार्य, निदर्ेशक ः बिजू टोप्पो व मेघनाथ भट्टाचार्य

रजत कमल व 50, हजार के रूप में पुरस्कार राशि.

सर्वश्रेष्ठ प्रोमोशनल फिल्म ः एक रोपा धान( हिंदी)

निर्माता ः मेघनाथ

निदर्ेशक ः मेघनाथ व बिजू टोप्पो

बेस्ट नैरेशन ( नैरेशन लेखन के लिए पुरस्कार)

नाम ः निलांजन भट्टाचार्य,

फिल्म जोहार - वेलकम टू आवर वर्ल्ड ( हिंदी और अंगरेजी) के लिए रजत कमल व 50,हजार के रूप में पुरस्कार राशि.

बॉक्स 2 ः

फिल्मोग्राफीः संक्षिप्त परिचय

2. नीलांजन भट्टाचार्य ः

वर्ष 2005 में अंडर दिस सन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त. इट्स ओपेन, व इफ इट इज रेन जैसी डॉक्यूमेंट्री का निर्माण. कोलकाता में रह कर फिल्मों का निर्माण. मशहूर फिल्मकार तपन्न सिन्हा के साथ बतौर सहायक निदर्ेशक के रूप में फिल्मों का निदर्ेशन.

मेघनाथ व बिजू टोप्पो

मेघनाथ पिछले 25 सालों से लगातार फिल्मों के माध्यम से झारखंड के विषयों को विश्व फलक पर लाने की कोशिश कर रहे हैं. बिजू टोप्पो पिछले कई सालों से अपनी फिल्मों के माध्यम से आदिवासी समुदाय की समस्या व उनकी स्थिति को दर्शाने की कोशिश कर रहे हैं.

अननोन मारटियर्स ः फादर एंथनी मुर्मू की हत्या पर आधारित.

यट अनदर एक्सिडेंट ः वर्ष 1997 में पलामू जिले में पड़े सूखे पर आधारित.

वेयर आंट्स आर फाइटिंग एलिफेंट्स ः बॉक्साइट माइनिंग से जूझ रहे आम लोगों पर आधाकित

ट्राइबल सेल्फ रुल ः पंचायती राज पर आधारित.

डेवलपमेंट फ्लोज फ्रॉम बैरल ऑफ गन्स ः विकास के मुद्दे पर आधारित. इन सभी फिल्मों का हिंदी, अंगरेजी व जापानी भाषा में भी निर्माण.

अवार्ड्स ः

वर्ष 2005 में स्टार बेस्ट डॉक्यूमेंट्री का अवार्ड.

फ्रॉम कलिंगा टू काशीपुर ः काशीपुर के अल्युमिनम फैक्ट्री पर आधारित.

कोरा राजी ः कुड़ुक भाषा में बननेवाली पहली फिल्म. फिल्म का विषय असम में रह रहे आदिवासियों पर आधारित.

मिफ 2006 में गाड़ी लोहरदगा, आयरन इज हॉट को अवार्ड, फिल्म स्टोरी ऑफ वाटर, पॉवर ऑफ चेंज, 100 डेज ऑफ वर्क फॉर यू व एक रोपा धान को आइडीपीए अवार्ड, वर्ष 2009 में मुक्ता ज्ञान कुटीर को आइडीपीए ज्ञाना कुटीर अवार्ड एनएसडीएफएफ नवतारगम अवार्ड

बॉक्स 3 ः क्या हैं फिल्म के विषय

एक रोपा धान ः जिंदगी में भोजन का सबसे अधिक महत्व है.लेकिन इसके बावजूद इन दिनों किसान कई तरह की परेशानियों से जूझ रहे हैं. जबकि किसान ही हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण काय करते हैं. उनकी सुविधाओं की अनदेखी की जा रही है. इसी विषय को गहराई से दर्शाने की कोशिश की गयी है और खासतौर से किसानों को कई तरीके सुझाये गये हैं.

जोहार ः वेलकम टू आवर वर्ल्ड

कई लोगों के लिए भोजन सिर्फ उनके जीवन निर्वाह का एक महत्वपूर्ण तत्व है. लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो आज भी इसे संस्कृति की मान समझते हैं. भारत में झारखंड उन्हीं राज्यों में से एक है, जहां आदिवासियों ने अपनी संस्कृति को सहेज कर रखा है. वे जंगलों में रहते हैं. वही का खाना खाते हैं. इस फिल्म में झारखंड के आदिवासियों व उनके जंगल प्रेम को दर्शाने की कोशिश की गयी है.

आयरन इज हॉट

कई राज्यों में स्पांज आयरन की फैक्ट्री की वजह से वहां बसे आस-पास के लोग किसी तरह परेशानियों व बीमारियों का सामना कर रहे हैं. इसी मुद्दे पर शोधपरक फिल्म है आयरन इज हॉट . इसी फिल्म का हिंदी संस्करण है लोहा गरम है.

राष्ट्रीय फलक पर झारखंड के फिल्ममेकर व कहानियां ...


लीड स्टोरी

58वें राष्ट्रीय पुरस्कार झारखंड के लिए ऐतिहासिक है. इस बार राष्ट्रीय पुरस्कार कई रूपों से झारखंड के लिए महत्वपूर्ण है. जहां राज्य के दो फिल्मकार मेघनाथ व बिजू टोप्पो का नाम विजेताओं में शामिल है, वही झारखंड के विषय पर बनी फिल्म को भी पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है. इन तीन विजयी फिल्मों की मेकिंग पर अनुप्रिया की रिपोर्ट

बिमल रॉय की फिल्म देवदास देख कर कभी वी शांताराम ने यह बात कही थी कि कोई शराब पीकर किसी लड़की के प्यार में दीवाना हो जाये तो उस पर फिल्में बना लेना ही सिर्फ सिनेमा का उद्देश्य नहीं. सिनेमा का सामाजिक उद्देश्य भी है. आम लोगों की जिंदगी के बारे में उनकी परिस्थिति को लोगों तक पहुंचाने का सार्थक प्रयास सिनेमा ही कर सकता है. इसी उद्देश्य के साथ वी शांताराम ने फिल्म आदमी का निर्माण किया था. वी शांताराम की जिंदगी व उनके फिल्मों की शैली से प्रभावित होकर फिल्मकार मेघनाथ भट्टाचार्य ने फिल्मों का ंनिर्माण प्रारंभ किया था. उन्होंने भी सिनेमा के गंभीर पक्ष को देखा और एक उद्देश्य के साथ फिल्मों का निर्माण करने लगे. कुछ ऐसी ही सोच रखते हैं मेघनाथ भट्ट्चार्य, जिनकी फिल्म को इस बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है. झारखंड में पिछले कई सालों से अपनी फिल्मों के माध्यम से वहां की आम जनता व विशेषकर आदिवासी समुदाय की समस्याओं को दर्शाने की कोशिश कर रहे हैं. इसी क्रम में आयरन इज हॉट एक प्रयास के रूप में लोगों के सामने आया. जिसमें स्पांच आयरन की फैक्ट्री की वजह से आम जीवन अस्त-व्यस्त होने की व्यथा है. मेघनाथ की इस फिल्म में निदर्ेशक व कैमरामैन के रूप में बिजू टोप्पो ने उनका साथ दिया. साथ ही फिल्म के संपादन में कोलकाता के देवकांत व रांची के अमित अर्ज बहादुर ने सहयोग किया. इन चारों लोगों की टीम व कुछ विशेषज्ञों की मदद से फिल्म बेहतरीन बनी और राष्ट्रीय पुरस्कार कमिटी द्वारा विजयी घोषित की गयी. इसी टीम द्वारा बनाई गयी फिल्म एक रोपा धान किसानों की व्यथा को दर्शाती है. फिल्म के निर्माण में हुई परेशानियों के बारे में मेघनाथ कहते हैं कि हमने जब यह क्षेत्र चुना तभी सोच लिया था कि परेशानी का सामना करना ही होगा. यह हमारी जिंदगी का हिस्सा है. इसलिए हम भी इससे भागते नहीं. फिल्म कार व मेघनाथ के सहयोगी बिजू बताते हैं कि इस तरह के विषयों पर फिल्में बनाने में बहुत परेशानी होती है.कई बार शूटिंग के दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा. साथ ही माइनिंग माफियों ने भी उन्हें परेशान करने की कोशिश की.इन फिल्मों की शूटिंग छतीसगढ़, ओड़िसा, झारखंड में की गयी, जहां कई स्थानीय प्रशासन से भी परेशानी का सामना करना पड़ा. लेकिन इसके बावजूद बिजू मानते हैं कि अगर नीयत सही हो तो हल निकल ही आता है. यूं ही जूझते जूझते फिल्म का निर्माण हुआ. फिल्म में बतौर वीडियो संपादक अमित अर्ज बताते हैं कि इस फिल्म के संपादन में वक्त इस स्तर पर परेशानी आती थी कि हम एक ही फिल्म के माध्यम से कई बातें कहना चाहते थे. चूंकि मुद्दा इतना गंभीर था. अमित इस बात से बेहद खुश हैं कि उन्हें इस टीम का हिस्सा बनने का मौका मिला. वे इसका पूरा श्रेय मेघनाथ सर को देते हैं. राष्ट्रीय पुरस्कार की श्रेणी में एक और फिल्म झारखंड के लिए महत्व रखती है .जोहार. चूंकि इस फिल्म का विषय झारखंड की संस्कृति पर आधारित है. जिसे कोलाकाता के फिल्मकार नीलांजन ने बनाया है. इसे भी इस बार पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है. झारखंड, बिहार व पश्चिम बंगाल के लिए यह गौरव की बात है कि यहां की कहानियां व फिल्मकारों को सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है.

बॉक्स 1 ः

गैर फीचर फिल्म की श्रेणी में

58वें राष्ट्रीय महोत्सव में मिल रहा है सम्मान

सर्वश्रेष्ठ पर्यावरण फिल्म

आयरन इज हॉट

भाषा ः अंगरेजी

निर्माता ः मेघनाथ भट्टाचार्य, निदर्ेशक ः बिजू टोप्पो व मेघनाथ भट्टाचार्य

रजत कमल व 50, हजार के रूप में पुरस्कार राशि.

सर्वश्रेष्ठ प्रोमोशनल फिल्म ः एक रोपा धान( हिंदी)

निर्माता ः मेघनाथ

निदर्ेशक ः मेघनाथ व बिजू टोप्पो

बेस्ट नैरेशन ( नैरेशन लेखन के लिए पुरस्कार)

नाम ः निलांजन भट्टाचार्य,

फिल्म जोहार - वेलकम टू आवर वर्ल्ड ( हिंदी और अंगरेजी) के लिए रजत कमल व 50,हजार के रूप में पुरस्कार राशि.

बॉक्स 2 ः

फिल्मोग्राफीः संक्षिप्त परिचय

2. नीलांजन भट्टाचार्य ः

वर्ष 2005 में अंडर दिस सन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त. इट्स ओपेन, व इफ इट इज रेन जैसी डॉक्यूमेंट्री का निर्माण. कोलकाता में रह कर फिल्मों का निर्माण. मशहूर फिल्मकार तपन्न सिन्हा के साथ बतौर सहायक निदर्ेशक के रूप में फिल्मों का निदर्ेशन.

मेघनाथ व बिजू टोप्पो

मेघनाथ पिछले 25 सालों से लगातार फिल्मों के माध्यम से झारखंड के विषयों को विश्व फलक पर लाने की कोशिश कर रहे हैं. बिजू टोप्पो पिछले कई सालों से अपनी फिल्मों के माध्यम से आदिवासी समुदाय की समस्या व उनकी स्थिति को दर्शाने की कोशिश कर रहे हैं.

अननोन मारटियर्स ः फादर एंथनी मुर्मू की हत्या पर आधारित.

यट अनदर एक्सिडेंट ः वर्ष 1997 में पलामू जिले में पड़े सूखे पर आधारित.

वेयर आंट्स आर फाइटिंग एलिफेंट्स ः बॉक्साइट माइनिंग से जूझ रहे आम लोगों पर आधाकित

ट्राइबल सेल्फ रुल ः पंचायती राज पर आधारित.

डेवलपमेंट फ्लोज फ्रॉम बैरल ऑफ गन्स ः विकास के मुद्दे पर आधारित. इन सभी फिल्मों का हिंदी, अंगरेजी व जापानी भाषा में भी निर्माण.

अवार्ड्स ः

वर्ष 2005 में स्टार बेस्ट डॉक्यूमेंट्री का अवार्ड.

फ्रॉम कलिंगा टू काशीपुर ः काशीपुर के अल्युमिनम फैक्ट्री पर आधारित.

कोरा राजी ः कुड़ुक भाषा में बननेवाली पहली फिल्म. फिल्म का विषय असम में रह रहे आदिवासियों पर आधारित.

मिफ 2006 में गाड़ी लोहरदगा, आयरन इज हॉट को अवार्ड, फिल्म स्टोरी ऑफ वाटर, पॉवर ऑफ चेंज, 100 डेज ऑफ वर्क फॉर यू व एक रोपा धान को आइडीपीए अवार्ड, वर्ष 2009 में मुक्ता ज्ञान कुटीर को आइडीपीए ज्ञाना कुटीर अवार्ड एनएसडीएफएफ नवतारगम अवार्ड

बॉक्स 3 ः क्या हैं फिल्म के विषय

एक रोपा धान ः जिंदगी में भोजन का सबसे अधिक महत्व है.लेकिन इसके बावजूद इन दिनों किसान कई तरह की परेशानियों से जूझ रहे हैं. जबकि किसान ही हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण काय करते हैं. उनकी सुविधाओं की अनदेखी की जा रही है. इसी विषय को गहराई से दर्शाने की कोशिश की गयी है और खासतौर से किसानों को कई तरीके सुझाये गये हैं.

जोहार ः वेलकम टू आवर वर्ल्ड

कई लोगों के लिए भोजन सिर्फ उनके जीवन निर्वाह का एक महत्वपूर्ण तत्व है. लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो आज भी इसे संस्कृति की मान समझते हैं. भारत में झारखंड उन्हीं राज्यों में से एक है, जहां आदिवासियों ने अपनी संस्कृति को सहेज कर रखा है. वे जंगलों में रहते हैं. वही का खाना खाते हैं. इस फिल्म में झारखंड के आदिवासियों व उनके जंगल प्रेम को दर्शाने की कोशिश की गयी है.

आयरन इज हॉट

कई राज्यों में स्पांज आयरन की फैक्ट्री की वजह से वहां बसे आस-पास के लोग किसी तरह परेशानियों व बीमारियों का सामना कर रहे हैं. इसी मुद्दे पर शोधपरक फिल्म है आयरन इज हॉट . इसी फिल्म का हिंदी संस्करण है लोहा गरम है.

ये हैं असली माहिर कलाकार






वे फिल्मों की कहानियां भी लिखते हैं. और गीत भी. वे फिल्में बनाते भी है और अभिनय भी करते हैं. वे एंकर भी हैं. कलाकार भी. लेकिन इसके बावजूद वे खुद को तीस मार खां नहीं समझते. हिंदी सिनेमा जगत में इन दिनों ऐसे कई शख्सीयत हैं, जो एक साथ कई विधाओं में माहिर हैं. एक साथ कई काम करने के बावजूद इनकी रचनाओं को लोगों की सराहना मिल रही है. कुछ ऐसे ही परफेक्शनिस्ट से अनुप्रिया अनंत ने बातचीत की और जाना कि कैसे वे सभी कलाओं में हैं माहिर.

इन दिनों हिंदी सिनेमा में ऐसे कई नाम उभर कर सामने आ रहे हैं, जो एक साथ कई विधाओं में माहिर हैं. एक ही व्यक्ति बेहतरीन गीतों के बोल सजाने में माहिर है तो वह उतना ही अच्छा वक्ता भी है. गौर करें तो फिल्मों की क्रेडिट लिस्ट में इन दिनों एक ही व्यक्ति का नाम कई श्रेणियों में आता है. वजह है इन कलाकारों का काम के प्रति पागलपन. उनका जुनून. हिंदी सिनेमा भी ऐसे महारथियों को हर क्षेत्र में एक साथ अपना हुनर दिखाने का पूरा मौका दे रही है.

1. बांवरे मन हमेशा हजारों सपने देखता है

स्वानंद किरकिरे

गीतकार, नाटकार, अभिनेता, गायक, निदर्ेशक, लेखक, संगीतकार ( टेलीविजन व सिनेमा)

इंदौर जैसे छोटे शहर से मुंबई ेमें आकर इन्होंने अपनी पहचान बनायी. शुरुआती दौर में कई परेशानियों का सामना किया. शुरुआत में सुधीर मिश्रा का साथ मिला. फिल्म हजारों ख्वाहिश ऐसी के लिए गीत लिखा. फिर कई टेलीविजन शोज के लिए लेखन किया. अभिनेता के रूप में हजारों ख्वाहिशों ऐसी में ग्रामीण के किरदार में नजर आये, एकलव्य में हवलदार बाबू के रूप में, चमेली में सर्च पार्टी मेंबर का किरदार निभाया है. लगातार कई नाटकों का मंचन. बतौर संगीतकार इन्होंने स्ट्राइकर में काम किया. गायक के रूप में अजब तेरी करनी मौला, ऑल इज वेल, शेहर, उतरन का टाइटिल गीत, बावंरा मन देखने चला एक सपना, ऐ सजनी रे सजनी, पल्कें झुखाओं ना, जानू ना, खोया खोया चांद जैसी गीत में अपनी आवाज दी. बतौर गीतकार स्ट्राइकर, 3 इडियट्स, जय संतोषी मां, लगे रहे मुन्नाभाई, शेहर, कल, लागा चुनरी में दाग, एकलव्य, पा, लफंगे परिंदे, परिणिता जैसी फिल्मों के गीत लिखे. संवाद लेखक के रूप में उन्होंने चमेली, एकलव्य व शिवाजी जैसी फिल्मों का लेखन किया. असोसियेट निदर्ेशक पे के रूप में हजारों ख्वाहिशें ऐसी, चमेली व कलकाता मेल जैसी फिल्मों का निदर्ेशन.

बकौल स्वानंद ः शायद यह मेरे मन के बांवरे होने का ही नतीजा है. मन में हमेशा कोई न कोई नयी बात आती रहती है. अपने चारों ओर कुछ न कुछ खोजने की कोशिश करता हूं. शायद यही वजह है कि वे इन रूपों में नजर आती हैं. शुरुआती दौर से ही नाटक से लगाव रहा. नाटक से जुड़ाव होने की वजह से कई नाटकों के संवाद लिखने का मौका मिला. कीड़ा लगा रहा. मुंबई आया. लिखने लगा. लोगों को पसंद आया और काम मिलता गया. जो सोचता हूं. महसूस करता हूं. लिख देता हूं. शब्द मेरे प्रिय दोस्त बन गये हैं. बस चाहता हूं कि इसी तरह रचनाएं करूं और लोगों को वे सारी रचनाएं पसंद आये. मन बांवरा है. इसलिए शायद बांवरा गीत पसंदीदा रचनाओं में से एक है

2. आसमान में जब तक तारे रहें, कुछ रचता रहूं

अमोल गुप्ते

स्क्रीनराइटर, अभिनेता, निदर्ेशक.

फंस गये रे ओबामा का नेता धनंजय सिंह जब दर्शकों के बीच बिना किसी खास संवाद के भी लोकप्रिय है. वजह है अभिनेता के हाव भाव. अमोल गुप्ते ने बेहतरीन अभिनय शैली के माध्यम से इस किरदार को जीवंत बना दिया है. हाल ही में रिलीज हुई स्टैनली के डब्बा में भी वे लालची अध्यापक के रूप में बेहतरीन कलाकारी करते नजर आये हैं. दरअसल, अमोल गुप्ते भी उन कलाकारों में से हैं, जो अच्छे अभिनेता होने के साथ साथ अच्छे लेखक व निदर्ेशक भी हैं. तारे जमीन से की सोच में अमोल की खूबियां झलक जाती है. उसके संवाद, भाव सबकुछ यह दर्शाते हैं कि इस कहानी की सोच रखनेवाला कितना भावुक व्यक्ति है. अपनी इसी भावुक निदर्ेशन की क्षमता का प्रमाण वे स्टैनली जैसी भावुक फिल्म के निदर्ेशन से देते हैं. बकौल अमोल बस यही चाहत है कि नेक दिल के साथ कुछ न कुछ रचता रहूं. लोगों को काम पसंद आये और अच्छी कहानियों के साथ लोगों के सामने आऊं. बतौर लेखक अमोल ने अब तक स्टैनली का डब्बा और तारें जमीं की कहानी लिखी है. अभिनेता के रूप में वह उर्मि, प्लेयर्स, फंस गये रे ओबामा, कमीने, तारें जमीं पर, द हैंगमन, जो जीता वही सिंकदर और होली में नजर आये हैं.

3. शायद यह पागलपन का नतीजा है

नीलेश मिश्र

गीतकार, गायक, पत्रकार, फिल्म लेखन, पुस्तक लेखन, रेडियो एंकर

नीलेश मिश्र उन कलाकारों में से एक हैं, जो एक साथ एक ही वक्त में कई प्रोजेक्ट्स पर काम करते हैं. लेकिन सभी कामों में वे बारीकियों का ध्यान रखते हैं. उनके द्वारा लिखी गये गीतों की खास बात यह है कि वे बेहद भावुक और आस-पास की जिंदगी से लिये गये शब्द होते हैं. नीलेश के गीतों में बेहद कठिन शब्द नहीं होते.यही वजह है कि वह लोगों को बेहद पसंद आते हैं. बकौल नीलेश मैं चाहता हूं कि माध्यम कोई भी हो अच्छी कहानी कह सकूं. हमेशा मैं अपनी जिंदगी के इर्द-गिर्द ही सपनों को बुनता हूं. नीलेश ने हाल ही में बैंड कॉल नाइन नामक एल्बम का निर्माण किया, जिसमें वे बेहतरीन गीतों के माध्यम से किस्सागोई करते हैं. किस्सागोई के माध्यम से लोगों तक गीतों को पहुंचाने का यह अपने तरीके का अलग प्रयोग है. हाल ही में उन्होंने बिग एफएम रेडियो के लिए बेहतरीन कार्यक्रम याद शहर नामक एक शो का भी संचालन किया. जिसे पूरे भारत में बेहतरीन सफलता मिली. नीलेश ने कई फिल्मों के गीत भी लिखे हैं, जिनमें फिल्म जिस्म, वो लम्हे, रोग, गैंगस्टर, कृष्णा कॉटेज, फाइटक्लब, 13 बी, होलीडे, सिकंदर, वन्स अपन अ टाइम इन मुंबई, अंजाना-अंजानी, दिल तो बच्चा है जी व रेडी के गीत प्रमुख हैं. वे यशराज की बहुचर्चित फिल्म एक था टाइगर के लेखन से भी जुड़े हैं. आनेवाले समय उनके गीत बॉडीगार्ड में नजर आयेंगे. बतौर लेखक वे यशराज के लिए एक और फिल्म का लेखन कर रहे हैं. नीलेश का मानना है कि इन सभी रचनाओं की वजह है उनका पागलपन. नीलेश ने शुरुआती दौर में पत्रकारिता भी की है व कई किताबों का भी लेखन किया है.

4. शेर हूं इसलिए सबकुछ बिंदास रच डालता हूं ः

मनु ऋषि

नाट्य अभिनेता, फिल्म अभिनेता, गीतकार, स्क्रिप्ट व डायलॉग राइटर.( ओये लकी लकी ओये के लिए फिल्मफेयर व आइफा में बेस्ट डायलॉग अवार्ड प्राप्त.

मनु ऋषि चड्डा ने दिल्ली के अस्मिता गुप्र के थियेटर से शुरुआती की. कई नाटकों में अभिनय किया. फिर मुंबई आये. बकौल मनु ऋषि वर्ष 2001 में मुंबई आया. फिर मशक्कत के बाद रजत कपूर के एक नाटक में बैक स्टेज खड़ा होने का मौका मिला. उस दिन ऐन वक्त पर उस शो के साउंड रिकॉडिस्ट गायब हो गये. मैं बैक स्टेज से कूदा और साउंड का सारा काम संभाला. उस वक्त रजत को लगा कि बंदे में कुछ तो बात है. फिर रजत के साथ साथ काम करते करते कई चीजें सीखीं. लिखने का कीड़ा तो पुरानी दिल्ली से ही लग चुका था. चूंकि दिल्ली के हर मोड़ से वाकिफ हूं. सो, कभी किताबी लिखने की कोशिश नहीं की. जो देखता हूं,सुनता हूं लिख डालता हूं. इसी तरह सात साल की तपस्या के बाद एक दिन दिबाकर का फोन आया. दिबाकर ने बताया कि आठ लोगों ने मेरा नाम सुझाया है. उनमें पीयुष मिश्रा व रजत कपूर, विनय पाठक जैसे स्थापित नाम थे. दिबाकर से मिला. कहा दिल्ली की कहानी है. लेकिन कुतुबमिनार नहीं दिखाना. दिल्ली की गलियां और वहां की बोली दिखानी है. दिल्ली तो दिल में है. फिर क्या था. लिखा. दिबाकर को पसंद आयी स्क्रिप्ट और काम शुरू हुआ. इस फिल्म में बंगाली का किरदार पहले पवन मल्होत्रा निभानेवाले थे. लेकिन तारीख की कुछ परेशानी थी. दिबाकर ने कहा तू कर सकता है यह रोल. मैंने दिबाकर को दिल्ली के कुछ संवाद सुनाये. बस रच गया बंगाली का किरदार. और इस तरह फिर काम मिलता गया. अनिल कपूर को इस फिल्म में मेरा काम इतना पसंद आया कि उन्होंने आयशा फिल्म के लेखन का प्रस्ताव दिया. कुछ इस तरह बस लोगों को काम दिखता रहा. और काम मिलता रहा. मैं मानता हूं कि मैं शेर हूं. बिंदास कुछ भी कहता हूं रचता हूं. इसलिए लोग पसंद करते हैं. किताबी बातें नहीं कर सकता. मनु ऋषि ने बतौर अभिनेता ओये लकी लकी ओये, साथिया, बैंड बाजा बारात, फंस गये रे ओबामा, मिथ्या, एक चालिस की लास्ट लोकल, मिक्सड डबल्स में नजर आये हैं. गीतकार के रूप में ओये लकी के लिए गीत भी लिखे हैं. संवाद लेखक के रूप में ओये लकी, चांस पे डांस व आयशा जैसी फिल्में प्रमुख हैं. मनु आनेवाले समय में और भी कई फिल्मों का लेखन कर रहे हैं. भविष्य में निदर्ेशन के क्षेत्र में भी अपनी कला दिखाने की इच्छा रखते हैं.

20110515

स्वादिष्ट है स्टैनली का डब्बा



फिल्मः स्टैनली का डब्बा

कलाकारः अमोल गुप्ते, दिव्या दत्ता, पार्थो

निदर्ेशक ः अमोल गुप्ते

रेटिंगः 3.5/5

किसी भी सामाजिक मुद्दे को प्रस्तुत करने के लिए यह जरूरी नहीं कि उसे लोगों के सामने शोर मचा कर ही प्रस्तुत किया जाये. एक सामान्य सी दिल छू देनेवाली कहानी भी आपके सामने कई बातें कह जाती हैं. अमोल गुप्ते की फिल्म स्टैनली का डब्बा इस राह वाकई एक बेहतरीन फिल्म है. निदर्ेशक अमोल गुप्ते ने अपनी काल्पनिक दुनिया में बैठ कर बाल मजदूरी के विषय पर एक ऐसी भावविभोर हो जानेवाली कहानी लिखी है. जिसे देख कर आपकी आंखें नम निश्चित तौर पर होंगी. तारें जमीं में निदर्ेशन न कर पाने का मलाल उन्हें हमेशा रहा. लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इस फिल्म में एक भी बारीकी नहीं छोड़ी. हर संवाद हर शब्द व दृश्यों को खूबसूरती से उकेरा गया है.फिल्म में न लंबे दृश्य हैं या अत्यधिक किरदार. बहुत देर तक लोगों के सामने किसी भी मुद्दे को विश्लेषित करते हुए भी नहीं दिखाया गया है. इसके बावजूद फिल्म दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देती है. यह कहानी है स्टैनली की. स्टैनली अपने स्कूल में सबसे होनहार छात्र है. उसे स्कूल के सभी टीचर प्यार करते हैं. वह कहानी कहने व कविताएं बनाने में भी उस्ताद है. उसकी एक टीम भी है. जिसके दोस्त उसे बेहद प्यार करते हैं.फिल्म की कहानी में एक अहम मुद्दे को डब्बे के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश की है. स्टैनली अच्छा गाता है. अच्छा डांस करता है. अच्छी कविताएं भी बनाता है. अपनी हरकतों से ही वह औरों से अलग है. होली स्कूल के कई टीचर उससे प्यार करते हैं लेकिन रोजी मिस उसे सबसे अधिक चाहती है. इन्हीं शिक्षकों में से एक है वर्माजी. वर्माजी को दूसरों का डब्बा खाने की बुरी लत है. वे खुद दूसरों का डब्बा खाते हैं लेकिन स्टैनली के डब्बे न लाने की वजह से वे उसे बातें सुनाते हैं और स्कूल से बाहर निकाल देते हैं. कहानी यहां से मोड़ लेती है और धीरे धीरे स्टैनली के बारे में दर्शकों को एक ऐसी सच्चाई पता चलती है जिसके बाद दर्शक दंग रह जायेंगे. यह यकीनन मानना होगा कि शिक्षक व छात्र के बीच के रिश्ते को सोचने व सहजेने में व फिर उसे कहानी के रूप में गढ़ने में अमोल गुप्ते का जवाब नहीं. उन्होंने तारें जमीं पर के माध्यम से भी बेहतरीन तरीके से एक शिक्षक व छात्र की कहानी गढ़ी. इस फिल्म के माध्यम से भी अमोल गुप्ते ने शिक्षकों के मन की मनःस्थिति को समझने की कोशिश की है. गौर करें, तो इस फिल्म में यह भी बात गौर करनेवाली है. शिक्षक व लालची वर्मा की स्थिति भी कभी बचपन में शायद स्टैनली की तरह ही रही होगी. चूंकि दोनों ही किसी न किसी वजह से डब्बा नहीं लाते. स्टैनली जैसे बच्चों की कहानी उन तमाम बच्चों की कहानी है जो पढ़ाई के साथ साथ गुजारे के लिए होटलों में भी काम करते हैं. अमोल गुप्ते ने एक लालची टीचर की भूमिका के साथ पूरी तरह न्याय किया है. उनके हाव-भाव, मेकअप और उनके संवाद वर्माजी के किरदार में बिल्कुल फिट बैठे हैं. पार्थो के रूप में बॉलीवुड को एक और बेहतरीन बाल कलाकार मिला है. दिव्या दत्ता ने अपना किरदार बखूबी निभाया है. फिल्म की एक और खास बात है फिल्म की शुरुआत में फिल्म की कहानी को एनिमेशन के माध्यम से प्रस्तुत करना. इस तरह की फिल्मों से यह उम्मीद जगती है कि जरूरी नहीं कि फिल्म बहुत लंबी हो. अमोल ने इस फिल्म के माध्यम से वर्तमान दौर में बन रही फिल्मों को यह सीख दी है कि वर्तमान दौर में इस तरह की ईमानदार कोशिशोंवाली कहानियों को हिंदी सिनेमा में प्राथमिकता दिया जाना जरूरी है. फिल्म के गीत फिल्म की कहानी के आधार पर बिल्कुल उपयुक्त हैं.

किसी माध्यम को कला पर हावी न होने देंः रवींद्र


1.शर्मिला टैगोर, अभिनेत्री

वैचारिक से अधिक व्यवहारिक सोच रखते थे रवींद्र ः

कुछ इंसान होते हैं, जो सिर्फ अपने लिये जीते हैं. लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जिन्हें नाम से पहचान से कोई मोह नहीं होता. यही वजह होती है कि जब वह कल्पनाशील व्यक्ति कुछ गढ़ता है तो एक रचना निकल कर सामने आती है. जो किसी तरह के दबाव से परे होती है. कुछ ऐसे ही व्यक्तित्व थे रवींद्रनाथ टैगोर व उनकी रचना. मेरे जीवन में उनका प्रभाव बहुत रहा है. इसकी खास वजह यह रही कि वह मुख्य रूप से केवल सैध्दांतिक बातें नहीं करते थे. वे वैचारिक होने के साथ साथ व्यवहारिक भी थे. वे जिंदगी में दार्शनिक तो रहे, लेकिन उन्होंने व्यवहारिक बातों को महत्व दिया. उनकी लेखनी पर गौर करें तो सामाजिक मुद्दों से जुड़ी वे तमाम बातें मौजूद भी हैं और वर्तमान में वे सारी चीजें नजर भी आती हैं. उन्होंने महिलाओं को हमेशा अपने जीवन में सम्मान की नजर से देखा. गौर करें तो वर्तमान में वे सारी चीजें हो रही हैं जिसके बारे में कभी रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था. मैं रवींद्रनाथ की गीतांजलि से बेहद प्रभावित हूं और हमेशा उसकी चर्चा करती हूं. मैं खुद कई बार शांति निकेतन गयी हूं. वहां मैं देखती हूं कि किस तरह लोग आज भी रवींद्र को मानते हैं. इसकी वजह है कि वह बेहद व्यवहारिक थे. मुझसे उनकी यह बात भी प्रभावित करती थी कि वे अपने विचारों को लेकर ईमानदार थे. उन्होंने कभी कुछ छुपाया नहीं. सबकुछ लोगों के सामने रख दिया.

2. रवींद्र जैन, संगीतकार

बचपन से रवींद्र संगीत से प्रभावित

मैं रवींद्र संगीत से उस वक्त से प्रभावित हूं. जब मैं बहुत छोटा सा था. उनके संगीत की खास बात यह थी कि उसमें मिठास होने के साथ साथ पूरी एक कहानी होती थी. यही वजह थी कि मैंने अपनी फिल्मों में रवींद्रनाथ के संगीत को जरूर शामिल किया है. मुझसे कई बार लोगों ने पूछा है कि क्या मैं रवींद्रनाथ से प्रभावित होकर अपना नाम रवींद्र रखा. तो, सच यही है कि मेरे परिवार में बचपन से रवींद्र संगीत हद से अधिक सुना जाता रहा है. और खासतौर से पिताजी उन्हें सुननेवालों में खास थे. मैंने बांग्ला भाषा इसलिए सीखी, ताकि मैं रवींद्र के संगीत को समझ सकूं. और जब मैं इसे समझने लगा तो मुझे लगा कि रवींद्र संगीत में जो भाव है. वह कहीं और नहीं. रवींद्र संगीत पर गौर करें तो इसमें जीवन के सारे रस नजर आयेंगे. मन को शांति मिलती है. उससे सुन कर यह एहसास होता है कि हमेशा जिंदगी में भागना दौड़ना जरूरी नहीं. कुछ पल ठहर कर भी सोचा जाना चाहिए.

3.सोबरोना विस्वास

उंगली कूची, स्याही था रंग उनके लिए

मुझे उनके जीवन का यह प्रसंग सबसे अधिक प्रभावित करता है.. कि उन्होंने नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने के बाद लिखा था ऐ मुनिहार हमार. मतलब यह सम्मान मेरे लिए खूबसूरत हार भी है. लेकिन मुझे इसे स्वीकारने में एक हिचक हो रही है, कि कहीं इस सम्मान को स्वीकार कर मैं अपने देश के साथ गलत तो नहीं करूंगा. मैं अपने देश की गरिमा रखने में नाकामयाब तो नहीं हो जाऊंगा. साथ ही वह अपने मन में छुपे बच्चे की बात भी कहते हैं कि मुझे मणी की लालसा भी है. तो अब हे धरती मां तुम ही बताओ मैं क्या करूं. रवींद्रनाथ टैगोर की एक खास बात यह भी थी कि उन्होंने अब तक जितनी भी रचनाएं की है. उसमें भावनाओं को बहुत महत्व दिया है. रवींद्रनाथ टैगोर की रचनाओं की चर्चा आज तक जितनी हुई है. उतनी चित्रकारी की नहीं. लेकिन सच तो यह है कि वह बेहतरीन चित्रकार भी थे. वे चित्रकारी के लिए स्याही का इस्तेमाल करते थे और उससे जो भी रंग उकेर सकते थे. उकेरते और ब्रश की बजाय उंगली का इस्तेमाल किया करते थे. एक बेहतरीन तसवीर उभर कर सामने आ जाती थी. उन्होंने समाज के उत्थान के लिए अपनी रचनाओं के माध्यम से बहुत योगदान दिया.

4. कोमोलिका गुहा ठकुराता, अभिनेत्री व मुंबई में रवींद्र संगीत पर आधारित स्कूल का संचालन )

हम बचपन से ही यही चाहते हैं कि हमारे बच्चे रवींद्रनाथ टैगोर की किताबें, उनकी रचनाओं, कविताओं व खासतौर से उनके संगीत का अनुसरण करे. इसकी खास वजह यह है कि रवींद्र संगीत में हर वर्ग के लोगों के लिए खास विचारवर्धक बातें व रस छुपी है.हमने बचपन से ही उनकी कई किताबें पढ़ी हैं और चाहते हैं कि युगों युगों तक उनको लोग जाने, यही वजह है कि मैंने मुंबई में रवींद्र संगीत पर आधारित स्कूल की शुरुआत करे. मैं अचंभित हो जाती हूं जब यहां के बच्चों में उनके बारे में जानने की लालसा देखती हूं. वे बेहद उत्साहित होकर उनके बारे में पूछते हैं. मैं खुद रवींद्र संगीत के माध्यम से बहुत शांति महसूस करती हूं. मैं मानती हूं कि रवींद्र संगीत के माध्यम से उन्होंने कई गंभीर बातों को लोगों तक सरल भाव में पहुंचाया है. मैं मानती हूं कि रवींद्र संगीत जिंदगी में आनेवाली तमाम बातों को सिखाता है. और फिर उससे निकलने का रास्ता भी सुझाता है. रवींद्र संगीत जिंदगी जीने की कला सिखानेवाला एक ठोस माध्यम है. न सिर्फ संगीत उनकी रचनाओं में देखें कि उन्होंने किस तरह लिंग भेद को हटाने के लिए आवाज उठाई थी. वे महिलाओं को बिल्कुल बराबरी का दर्जा दिया करते थे. किसी पुरुष का उस दौर में जब हर तरफ सिर्फ महिलाओं को चहारदीवारी में कैद रखने की बात होती थी. रवींद्र मानते थे कि उन्हें आगे बढ़ना चाहिए और बाहर निकल कर पुरुषों के साथ आगे बढ़ना चाहिए.

5. तुहिन ए सिन्हा,उपन्यासकार

चित्रागंदा-सी हैं महिलाएं

नेहरुजी के जीवन पर रवींद्रनाथ टैगोर का खास प्रभाव रहा था. नेहरुजी रवींद्रनाथ टैगोर की रचना चित्रांगदा की छवि से बिल्कुल सहमत थे. रवींद्रनाथ स्वयं महिलाओं को हमेशा अव्वल दर्जा देते थे. उनका मानना था कि महिलाएं शक्तिशाली होती हैं और पुरुषों से भी अधिक ताकतवर, अपनी इसी सोच को उन्होंने चित्रांगदा के रूप में लोगों तक पहुंचायी थी. नेहरु जी उनकी इन बातों से हमेशा सहमति रखते थे. और यही वजह रही कि कई बार टैगोर के दृष्टिकोण से सोचने की वजह से महात्मा गांधी और नेहरुजी में कई विषयों को लेकर मन मुटाव हो जाया करते थे.

6. प्रोदिप्तो, चित्रकार व रवींद्र चित्रकारी पर खास अध्ययन कर चुके हैं

किसी माध्यम को कला पर हावी न होने देंः रवींद्र

रवींद्रनाथ टेगोर की चित्रकारी ने मुझे हमेशा प्रभावित इसलिए किया क्योंकि मुझे उनकी चित्रकारी में सबसे खास बात यह नजर आती है कि वह हमेशा अपनी चित्रकारी को लेकर धैर्य नहीं रखते थे. उनका सोचना था कि किसी भी माध्यम को इस कदर खुद पर हावी नहीं करना चाहिए कि उसे आपकी कला से अधिक तवज्जो मिलने लगे. यही वजह रही कि उन्होंने ब्रश की बजाय कूची व स्याही को रंग के रूप में इस्तेमाल किया क्योंकि वह रंगों के सुखने का इंतजार नहीं कर सकते थे. उनकी चित्रकारी में भावनाओं का खास रूप नजर आता है. वे जो बातें कहते थे. जो विचार रखते थे. वे उस पर अमल भी करते थे और ठीक उसी रूप में उसे उकेर भी देते थे. उन्होंने कभी भी किसी एक रूप में बंध कर चित्रकारी नहीं की. उनकी चित्रकारी को देख कर कोई इस बात का अंदाजा नहीं लगा सकता है कि वह किसी भावना या बात से प्रभावित हैं. यही वजह रही कि उन्हें कई वर्षों तक चित्रकार के रूप में पहचान नहीं मिली. रवींद्रनाथ ने ही इस बारे में भी लोगों में जागरूकता फैलायी कि हमारी संस्कृति में ऐसी कई चीजें हैं जिसे हमें सहेजना है, वरना यह सब विलुत्प हो जायेंगी. उन्होंने कहा कि पूरे विश्व फलक की चीजें देखना भी जरूरी है. अपनी आंखों को खुला रखना होगा.

7. शेखर भट्टाचार्य, चित्रकार व एनआइडी में प्रोफेसर

उनकी रचनाओं में एक खास रहस्य था ः रवींद्र

मैं मानता हूं कि रवींद्रनाथ टेगोर ने भारत में एक अलग तरह की चित्रकारी की कला का उत्थान किया. उन्होंने बिना किसी कूची या रंग के सहारे चित्रकारी शुरू की और मॉर्डन आर्ट जैसी विधा को बढ़ावा दिया. रवींद्रनाथ की पेंटिंग को देख कर यह बात समझ में आती है कि उनके संगीत व रचनाओं की तरह ही उनकी पेंटिंग्स में भी हर मौसम, हर मिजाज का रूप निखर कर सामने आता है. उनकी चित्रकारी में वह बात है कि अगर कोई व्यक्ति उदास बैठ कर सूरज को देख रहा है, तो जाहिर है सूरज की रोशनी उसे चुभती ही नजर आयेगी. तो वह उस व्यक्ति के क्रोध की कल्पना करके भी उस दृष्टिकोण से तसवीरों में उकेरते थे. उनकी कला मुझे इसलिए भी प्रभावित करती है कि उसमें हमेशा एक रहस्य छुपा होता है. हर पेंटिंग में कहीं न कहीं कोई रहस्य नजर आता है. साथ ही पेंटिंग्स में मनोवैज्ञानिक आधार पर कई विचार भी नजर आते हैं.

8. श्रीपर्णा, ( रवींद्रनाथ टैगोर की लगभग 100 से भी ज्यादा किताबों का अध्ययन)

मैथिली भाषा में भी रवींद्र की रचना

रवींद्रनाथ टैगोर के बारे में यह बात बहुत कम ही लोग जानते होंगे कि उन्होंने बांग्ला भाषा के साथ साथ उन्होंने मैथिली भाषा में भी कई रचनाएं रची हैं. उन्होंने 16 साल की उम्र की पहली रचना की भानुशी. सावन गगने घोर घन घटा निशित यामिनी रे... को मैथिली के रूप प्रस्तुत करने की कोशिश की गयी. उन्होंने इसे सखी कैसे जावत अवला कामिनी रे के रूप में लिखा. उन्होंने और भी कई मैथिली भाषा में रचनाएं की है. अपनी जिंदगी की अंतिम दिनों में वे बिस्तर पर थे और वे किसी दूसरे से कविता लिखवाते थे. लेकिन उन्होंने हमेशा अपनी रचना जारी रखी.

ज्ञज्ञज्ञज्ञ

9.अनिरबन बोस, मशहूर फैशन डिजाइनर व रवींद्रनाथ टैगोर की किताबों का विशेष अध्ययन

उनमुक्त वातावरण में घूमना चाहते थे रवींद्र

रवींद्रनाथ टैगोर अपने विचारों की तरह ही शारीरिक रूप से भी बहुत उनमुक्त रहना चाहते थे. लेकिन चूंकि वह जमींदारी परिवार से संबध्द थे. सो, उन्हें जमीनदारों की तरह ही वेशभूषा व बर्ताव रखना पड़ता था. जबकि वे खुद इस तरह से बिल्कुल रहना नहीं चाहते थे. उन्हें खुले वातावरण पसंद था. उनके घर पर सभी बच्चे प्रायः एक ऐसे कमरे में रहते थे. जहां सिर्फ एक खिड़की खुलती थी. उस खिड़की से एक ही तालाब नजर आता था, जहां गरीब के बच्चे मटमैले होकर भी घूम रहे होते थे. मस्ती कर रहे होते थे. वे किसी भी तरह के कपड़े पहन कर मस्ती किया करते थे. बेफिक्र, बिंदास, उनमुक्त. रवींद्रनाथ बचपन से ही खुले विचारों के थे और अपने घर में घुटन महसूस करते थे. वह बचपन की यादें उनके मस्तिष्क में इस कदर घर कर चुकी थी कि उन्होंने अपनी अधिकतर कविताओं में उस खिड़की का जिक्र किया है और कहा है कि मैं उस खिड़की से बाहर की दुनिया देखना चाहता हूं. वे चाहते थे कि गरीब के बच्चे भी पढ़ें आगे बढ़ें. यही वजह रही कि आगे चल कर उन्होंने शांतिनिकेतन की स्थापना की व कई विद्यालयों का निर्माण किया, वे हमेशा शिक्षा को बढ़ावा देना चाहते थे. वे जब भी बोर होते थे. कविता लिखते थे और अपनी बालकनी में आकर यही सोचते थे कि मैं क्यों नहीं इस तरह उनमुक्त होकर मस्मौले की तरह घूम सकता.लोगों से बात कर सकता. यही वजह रही कि उन्होंने अपने मन की इस पीड़ा को अपनी रचनाओं में व्यतीत की. वे बेहद सामान्य सा जीवन जीना चाहते थे. लेकिन उन्हें इसकी आजादी नहीं मिलती थी.

10. शुभा मुदगल, गायिका

रवींद्रनाथ टैगोर की गीत-संगीत में जो शांति छुपी है. वह शायद ही हमें किसी और रूप में देखने सुनने को मिले. उनकी हर कृति में जीवन के हर कदम का पाठ छुपा है. टैगोर को बचपन से ही प्रकृति से प्यार था.वह हमेशा सोचा करते थे कि प्रकृति के सानिध्य में ही विद्यार्थियों को अध्ययन करना चाहिए. इसी सोच को मूर्तरूप देने के लिए वह 1901 में सियालदह छोड़ कर आश्रम की स्थापना करने के लिए शांतिनिकेतन आ गये. प्रकृति के सानिध्य में पेड़ों, बगीचों और एक लाइब्रेरी के साथ टैगोर ने शांतिनिकेतन की स्थान की. मैं मानती हूं कि रवींद्र संगीत बांग्ला संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है. टैगोर के संगीत को उनके साहित्य से अलग नहीं किया जा सकता है. उनकी अधिकतर रचनाएं तो अब उनके गीतों में ही शामिल हो चुकी है. हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की ठुमरी शैली से प्रभावित गीत मानवीय भावनाओं के अलग अलग रंग प्रस्तुत करते हैं. अलग अलग रागों में यह प्रतीत होता है कि उनकी रचना उस राग विशेष के लिए ही की गयी थी.

टि्वटिंग टि्वटिंग यस फेसबुक...


एक दौर में फिल्म पतंगा का गीत मेरे पिया गये रंगून बेहद लोकप्रिय हुआ था. उस दौर में एक दूसरे से संपर्क करने के लिए लोग एक जगह पर रखे स्थिर टेलीफोन का इस्तेमाल किया करते थे. आगे चल कर नजदीकियां बढ़ी. अब इंटरनेट लोगों के सामने आया. दूरियां घटती गयीं और फिर दिल की बात कहने के लिए पेजर लोगों के सामने आया है. धीरे धीरे इस पेजर व टेलीफोन की उपयोगिता ने मोबाइल का रूप लिया. फिर आया इंटरनेट का दौर और हाल ही में इन सभी माध्यमों को मात दी है फेसबुक ने . सिनेमा में लोगों की नजदीकियां बढ़ाने के लिए प्रयोग किये गये व बदलते तकनीकी स्वरूपों पर अनुप्रिया अनंत की रिपोर्ट

कोटेशन ः सूरज बड़जात्या, निदर्ेशक

फेसबुक की लोकप्रियता कम नहीं होगी

जब मैंने मैंने प्यार किया फिल्म में कबूतर का इस्तेमाल किया था. तो मेरे जेहन में एक ही वाक्या था. मुझे याद था कि जब मैं किस्से-कहानियां पढ़ा करता था. खासतौर से महाराजाओंवाली. उसमें कबूतर का बहुत इस्तेमाल होता था. सो, मैंने फिल्म में कबूतर को प्रेम का प्रतीक बना कर प्रस्तुत किया. यह सच है कि सिनेमा ने तकनीक के दृष्टिकोण से कई चीजें समाज में उसकी बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए किया है. आज सबसे अधिक फेसबुक पॉपुलर है. चूंकि यह पूरे विश्व को बिना किसी खास इमेल आइडी के भी एक दूसरे से जोड़ने में कामयाब हुआ है. सो, इसकी लोकप्रियता को देखते हुए अब इंटरनेट व जीमेल चैटिंग की बजाय फेसबुक का फिल्मों में जिक्र किया जा रहा है.

ताकि लोग खुद को फिल्म से जुड़ा पायें ः अनीस बज्मी

मैंने फिल्म रेडी के एक गीत में फेसबुक को खासरूप से तवज्जो दी है, चूंकि इन दिनों फेसबुक मोबाइल, इंटरनेट से अधिक लोकप्रिय हो चुका है. मेरे ऐसे कई दोस्त हैं, जो फेसबुक से ही जुड़े हैं. और मुझे मेरे दोस्तों ने ही यह बात कही कि मैं फेसबुक शब्द का इस्तेमाल करूं, ताकि लोगों को यह गीत अपना सा लगे.

उस वक्त इंटरनेट फ्रेंड का चलन प्रचलित था ः रेवती

जिस वक्त मैंने अपनी फिल्म मित्र माइ फ्रेंड का कंसेप्ट सोचा था. मैं उस वक्त एक फ्लाइट में थी. मेरी बगल की सीट पर बैठी एक महिला ने बातों बातों में कहा कि उसकी शादी होनेवाली है और उसका होनेवाला पति उसका इंटरनेट फ्रेंड है. दोनों की नजदीकियां इसके माध्यम से बढ़ी. तो मुझे लगा कि इस पर फिल्म बनाई जानी चाहिए.चूंकि लोग इसे खुद से जुड़ा पायेंगे. ऐसी कई कहानियां उन दिनों मेरे इर्द-गिर्द थी, जिसे देख कर लगा कि मुझे ऐसी कहानी कैमरे के माध्यम से कहनी चाहिए.

फिल्में हमेशा समाज के रूपांतर चलती है. जिस तरह प्रतिदिन समाज में बदलाव होते हैं. उसी तरह फिल्में भी अपना स्वरूप बदलती रहती है. फिल्मों ने हमेशा आम लोगों के जीवन को प्रभावित किया है. फिर चाहे वह किसी भी माध्यम से हो. खासतौर से अपने प्यार का इजहार करने के लिए सिनेमा में हमेशा नये-नये परिवर्तन किये जाते रहे हैं. सिनेमा में किये गये वही प्रयोग आगे चल कर उस फिल्म की खास पहचान बन जाते हैं, या फिर उस किरदार की. लोगों के जेहन में उनके द्वारा इस्तेमाल की गयी वे चीजें स्टाइल स्टेटमेंट बन जाती हैं. वे उन्हें अपने प्रतिदिन की जिंदगी में भी उतारने लगते हैं. गौर करें, तो खासतौर से युवाओं को फिल्मों में दिखाई गयी चीजों से अधिक प्रभावित करने की कोशिश की गयी है. फिर चाहे वह गीतों के माध्यम से हो, या फिर किसी खास सांकेतिक सामान के माध्यम से. दरअसल, सिनेमा ने आम दर्शकों के बीच कई ऐसी चीजों को प्रसारित किया है, लेकिन एक लिहाज में सिनेमा दर्शकों द्वारा इस्तेमाल किये गये चीजों से प्रभावित होकर दर्शकों के बीच से वे चीजें लेने की कोशिश की है. ताकि आम दर्शकों को वह चीजें अपनी सी लगें. हम बात कर रहे हैं सिनेमा में तकनीकी स्वरूपों के लगातार होनेवाले बदलाव की. खासतौर से संदेश भेजने के माध्यम का प्रयोग पहले समाज में प्रचलित हुआ. फिर सिनेमा के माध्यम से इसे फिल्मों के दृश्यों में शामिल किया. गौर करें, तो कभी प्रेमी अपनी प्रेमिका को खत लिखने के लिए कागज कलम का इस्तेमाल करते थे और फिर उसे कबूतरों के माध्यम से अपने प्रेमी-प्रेमिका तक पहुंचाने की कोशिश करते थे. खुद फिल्म के निदर्ेशक सूरज भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि सिनेमा में हमेशा इस तरह के माध्यमों का इस्तेमाल किया गया है, जिसकी प्रासंगिकता उस दौर में रही हो. धीरे-धीरे वक्त के साथ उन तकनीकों का रूप भी बदला. और लोगों के पास आया कंप्यूटर. कंप्यूटर में इंटरनेट से जगह बनायी. उस वक्त इंटरनेट के बारे में लोगों को खास जानकारी नहीं थी. सो, सिनेमा भी उनके मिजाज के मुताबिक अपनी फिल्मों के दृश्यों में इंटरनेट का इस्तेमाल सिर्फ इंटरनेट फ्रेंड व चैटिंग तक ही सीमित रखता. लेकिन पलक झपकते ही इंटरनेट ने इस कदर अपनी जगह बना ली कि इंटरनेट फ्रेंड पर आधारित कई फिल्मों का निर्माण होने लगा. लोग अधिक से अधिक वक्त इंटरनेट पर देने लगे. फिर दूरियां और कम होती गयी. और अब तकनीक हाथों में आ गया. अब जैसे आम जिंदगी में लोग पेजर का इस्तेमाल करने लगे. फिल्मों में भी नायक-नायिका पेजर का इस्तेमाल करते नजर आने लगे. पेजर एक ऐसा उपकरण था, जिसमें आप सामनेवाले व्यक्ति को सिर्फ मेसेज कर सकते थे. धीरे धीरे लोगों की नजदीकियां और बढ़ी और मेसेज के साथ साथ अब लोग घंटों मोबाइल पर बातें करने लगे. नतीजन फिल्मों के साथ गानों में भी मोबाइल नंबर का जिक्र होने लगा. कभी ब्लैक एंड ह्वाइट दौर में एक जगह किसी कोने में पड़े टेलीफोन के सेट पर मेरे पिया गने रंगून किया है वहां से टेलीफून जैसे गीत बेहद लोकप्रिय हुए थे. धीरे-धीरे टेलीफोन पर आधारित वे गाने फिल्मों में कम होते गये. लेकिन कुछ फिल्मों में आज भी टेलीफोन पर कई फिल्माये गये हैं. बहरहाल, फिलवक्त फेसबुक हिंदी सिनेमा का नया तकनीकी शगल है. दरअसल, हमारे जीवन में इसकी सबसे ज्यादा लोकप्रियता की वजह यह रही है कि हमारे जीवन में इन चीजों की उपस्थिति में जीवन में तनाव को बहुत हद तक कम किया है.शायद यही वजह है कि भावनाओं, दोस्ती व रिश्तों पर आधारित फिल्मों में इन चीजों का खासतौर से इस्तेमाल किया जाता रहा है.

टेलीफोन का प्रयोग फिल्मों में

राजकपूर की अधिकतर फिल्मों में किसी खास स्थान पर स्थिर रखे गये टेलीफोन का इस्तेमाल बेहद किया गया है. ब्लैक एंड ह्वाइट दौर में खासतौर से दो टेलीफोन पर कई सीन व गाने फिल्माये जाते थे. इनमें फिल्म पतंगा का गीत मेरे पिया गये रंगून प्रमुख है. जिसे सुनना आज भी लोग पसंद करते हैं. बाद की फिल्मों में सूरज बड़जात्या ने अपनी फिल्में हम आपके हैं कौन में नायक-नायिका के कई संवाद फोन पर फिल्माये. साथ ही एक गीत मुझसे जुदा होकर...व मैंने प्यार किया का गीत अब तो शाम होने आयी...टेलीफोन पर फिल्माया गया. फिल्म हिंदुस्तानी में तो टेलीफोन पर आधारित एक गाना भी तैयार किया गया. इस फिल्म में कमल व उर्मिला ने खास भूमिका निभायी थी. गीत था टेलीफोन धुन पर हंसनेवाली....फिल्म बागवां के एक बेहतरीन गीत में टेलीफोन नजर आया है. गीत है मैं यहां तू वहां...फिल्म कुछ कुछ होता है में भी कई दृश्य टेलीफोन पर ही फिल्माये गये हैं. हाल में फिल्म झूठा ही सही की कहानी भी फोनफ्रेंड पर आधारित है.

पेजर से मोबाइल

फिल्म जब प्यार किसी से होता है देखते वक्त पहली बार जब दर्शकों के सामने पेजर आया तो दर्शक इस उपकरण को समझ नहीं पाये थे. लोगों को समझ में नहीं आया कि यह क्या है, जिसमें आसानी से एक दूसरे को मेसेज किया जा सकता है. बाद में पेजर दर्शकों में लोकप्रिय हुआ. लेकिन अधिक दिनों तक पेजर लोकप्रिय न रहा. उसकी जगह मोबाइल ने ले ली. फिल्म हसीना मान जायेगी का गीत ह्वाइट योर मोबाइल नंबर बेहद लोकप्रिय हुआ. उस दौर में मोबाइल का उपयोग बिल्कुल नया था. लेकिन इस गाने के बाद अचानक सबकी हाथों में मोबाइल नजर आने लगा.

इंटरनेट

इंटरनेट ने फिल्मों में सबसे अधिक व मजबूत पकड़ बनायी. फिल्मों में इंटरनेट का इस्तेमाल सबसे अधिक वक्त तक हुआ. एक दौर में लगभग सभी निदर्ेशकों ने किसी न किसी दृश्य में इसका इस्तेमाल दिखाया. फिल्म सिर्फ तुम व मित्र माइ फ्रेंड जैसी फिल्में इंटरनेट फ्रेंड पर आधारित विषयों पर बनी. फिल्म देव डी, मिर्च, मुंबई कटिंग, भेजा फ्राइ, मुझसे दोस्ती करोगे, यादें, मोहब्बते, जाने तू या जाने न, मैं हूं न..., इश्क-विश्क, कभी खुशी कभी गम, मिलेंगे-मिलेंगे , लव सेक्स और धोखा में भी इंटरनेट का इस्तेमाल दिखाया गया.

फेसबुक

फेसबुक पर यूं तो हॉलीवुड पर पूरी एक फीचर फिल्म का निर्माण किया गया है. लेकिन भारत में भी इसकी लोकप्रियता को देखते हुए पिछली कई फिल्मों में अब फेसबुक का इस्तेमाल किया जा रहा है. इनमें दिल तो बच्चा है जी, लव का द एंड, दो दूनी चार, बैंड बाजा बारात, फालतू, टर्निंग 30, मिर्च, तनु वेड्स मनु, इसी लाइफ में, रोबोट व हाल ही में फिल्म रेडी में एक गीत में फेसबुक का खासतौर से जिक्र किया है. आनेवाली फिल्मों में लव का पंचनामा, कुछ लव सा, रेडी, एक था टाइगर व यशराज की फिल्मों में फेसबुक विशेष रूप से नजर आयेगा.

टि्वटर

फेसबुक के साथ साथ इन दिनों टि्वटर की लोकप्रियता भी बेहद बढ़ी है. खासतौर से सेलिब्रिटी टि्वटर का सबसे अधिक इस्तेमाल करते हैं. 140 शब्दों में वे अपने फैन्स को पल पल की खबर देते रहते हैं. गौरतलब है कि यह खबर आ रही है जल्द ही टि्वट्र की लोकप्रियता को देखते हुए एक बड़ा बैनर एक थ्रीलर फिल्म बनाने जा रहा है, जिसकी पूरी कहानी टि्वटर पर किये गये एक टि्वट से शुरू होती है.

फ़िल्मी किरदारों में कलाकार



हिंदी फिल्मों के निदर्ेशकों ने अपनी फिल्मों के माध्यम से कला जगत की विभिन्न विधाओं का हमेशा सजीव चित्रण प्रस्तुत करने की कोशिश की है. अनुप्रिया अनंत की रिपोर्ट

हिंदी फिल्मों को कलाकारों के खास प्यार रहा है. चूंकि सिनेमा खुद ही एक सृजन की क्रिया है. सो, उसका लगाव भी कल्पना व सृजनशीलता से जुड़े किरदारों से हमेशा से रहा है. शायद यही वजह है कि शुरुआती दौर से लेकर अब तक कई फिल्मों में निदर्ेशकों ने किरदारों के माध्यम से लोगों के सामने जादूगर, चित्रकार, गायक व कला के कई क्षेत्रों को उजागर करने की कोशिश की है. इसी क्रम में राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म लव यू मिस्टर कलाकार नयी पहल है. इस फिल्म में भी तुषार कपूर ने एक चित्रकार की भूमिका निभाई है. सिफ चित्रकारी ही नहीं, बल्कि ऐसे और भी कई क्षेत्र रहे हैं, जिन्हें हिंदी फिल्मों में किरदारों का अहम रोजगार दिखाया गया है. साथ ही कई फिल्मों में कला को ही रोजगार का माध्यम बनाने की वजह से जिंदगी के संघर्ष से जूझते दिखाया गया है.

सुर

फिल्म सुर एक आम लड़की की महान गायिका बनने की कहानी है. जिसमें उसे उसका गुरु ही धोखा दे जाता है. दरअसल, कला की दुनिया की सबसे बड़ी विडंबना ही यही होती है कि कोई भी कलाकार नाम का भूखा होता है और कभी कभी शोहरत पाने की चाहत उस पर इस कदर हावी हो जाती है कि वह बाकी चीजें भूल बैठता है. कुछ इसी व्यथा को दर्शाने की कोशिश की गयी है. इस फिल्म में. जिसमें एक टीचर अपनी छोटी उम्र की विद्यार्थी से ईष्या करता है और उस वजह से उस लड़की की सारी जिंदगी तितिर-बितिर हो जाती है.

ताल

फिल्म ताल में सुभाष घई ने अपने निदर्ेशन के माध्यम से नृत्य व खासतौर से क्लासिकल नृत्य की खूबसूरती को दर्शाने की कोशिश की है. फिल्म में अभिनेत्री बेहतरीन सिंगर होने के साथ साथ नृत्य में भी पारंगत होती है और फिर उसे एक नया मुकाम हासिल होता है.

अभिमान

अमिताभ बच्चन व जया भादुरी की इस फिल्म में पति और पत्नी अच्छे गायक होते हैं. लेकिन शोहरत व नाम की चाहत इन दोनों पर भी हावी हो जाती है और गलतफहमियों की वजह से इनके रिश्ते में कड़वाहट आ जाती है.

लव यू मिस्टर कलाकार

तुषार कपूर व अमृता राव अभिनीत इस फिल्म में तुषार कपूर ने एक पेंटर की भूमिका निभाई है, जो अमृता से बेहद प्यार करता है. लेकिन अमृता के परिवार को तुषार का काम बिल्कुल पसंद नहीं.

धोबी घाट

धोबी घाट में किरण राव ने निदर्ेशन के माध्यम के माध्यम से दो कलाओं को प्रस्तुत करने की कोशिश की है. अरुण के रूप में एक पेंटर और शाही के रूप में उन्होंने फोटोग्राफी की कला को प्रस्तुत करने की कोशिश की है. अरुण वास्तविक पेंटर की तरह ही अपनी जिंदगी में खोये रहता है.

लंदन ड्रीम्स व रॉक ऑन

इन दोनों ही फिल्मों के किरदारों को रॉक स्टार बनने की ललक में अपने रिश्तों में उलझते दिखाया गया है. सपने को पूरा करते करते आपस में दोस्तों में गलतफहमियां हो जाती हैं और ये सभी दूर हो जाते हैं.

मिर्च

फिल्म मिर्च की तीसरी कहानी में अरुधोय सिंह को बेहतरीन पेंटर के रूप में प्रस्तुत किया गया है.

आजा नच ले

हाल की फिल्मों में लफंगे परिंदे की दीपिका व आजा नच ले की माधुरी ने नृत्य की कला का सजीव चित्रण प्रस्तुत करने की कोशिश की है.

कभी-कभी

फिल्म कभी कभी में अमिताभ बच्चन को शायर के रूप में प्रस्तुत किया गया है.

डिस्को-डांसर

एक दौर में ऐसी कई फिल्में आयी थीं, जिसमें कलाकारों ने नृत्य की कला को बेहद उजागर किया था, इनमें ऋषि कपूर, मिथुन चक्रवर्ती व गोविंदा प्रमुख अभिनेता रहें, जिन्होंने इन फिल्मों में एक डांसर की भूमिका निभाई.

इसके अलावा मिनाक्षी सोशाद्री, जया प्रदा, श्रीदेवी ने भी कई फिल्मों में इस तरह की भूमिकाएं निभाई हैं

20110507

रवींद्र ने कहा था भविष्य में सिनेमा होगा सबसे प्रभावशाली माध्यम




सिनेमा आम आदमी को बेवकूफ बना देती है.सिनेमा देखनेवाला व्यक्ति दिशाहीन होता है. महात्मा गांधी सिनेमा के बारे में कुछ ऐसी ही सोच रखते थे. लेकिन उनके विचारों के ठीक विपरीत रवींद्रनाथ टैगोर का मानना था कि सिनेमा एक दिशा देती है. दरअसल, रवींद्रनाथ टैगोर का जुड़ाव सिनेमा से हमेशा रहा. वे सिनेमा को एक दिशा देनेवाला माध्यम मानते थे. उनका सिनेमा से घोर लगाव रहा. इसकी खास वजह यह भी रही कि उनकी नजर पूरे विश्व की सिनेमा पर थी.

रवींद्रनाथ इस बात से अच्छी तरह वाकिफ थे कि पूरे विश्व में हिटलर जैसे नेता भी किस तरह फिल्मों का सहारा ले रहे हैं और सिनेमा का आम लोगों पर किस तरह का प्रभाव हो रहा है. यही वजह थी कि वे खासतौर से जापान, रूस व अमेरिका की फिल्में देखा भी करते थे. उन्होंने इन फिल्मों को देखने के बाद ही यह नजरिया बनाया कि सिनेमा के माध्यम का आनेवाले समय में महत्वपूर्ण प्रभाव पड़नेवाला है. लेखक अरुण कुमार राय की पुस्तक रवींद्रो व चलोचित्र पढ़ने के बाद उसके कई पृष्ठों में इस बात का जिक्र है कि अन्य विधाओं के साथ-साथ रवींद्रनाथ टैगोर इस कला में भी माहिर थे. वे चाहते थे कि सामाजिक मुद्दों को लेकर फिल्में बने. चूंकि पूरे विश्व में सिनेमा का इस्तेमाल वहां के स्वतंत्रता संग्राम में प्रोपेगेंडा की तरह किया जा रहा और वहां के लोगों पर इसका प्रभाव भी पड़ रहा था. यही वजह रही कि उन्होंने भारत में भी इस बात पर जोर दिया. चूंकि रवींद्रनाथ टैगोर खुद स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े थे. वे कई लोगों को इस बात के लिए प्रभावित करते थे कि वे छोटी छोटी फिल्मों का निर्माण करें और उसे गांव कस्बों में दिखाये. उनका यह कहना कतई नहीं था कि वे फिल्मों के माध्यम से लोगों के बीच किसी भी तरह का भड़काउ माहौल तैयार करना चाहते हैं. लेकिन वे इस पक्ष में जरूर थे कि लोगों में जागरूकता फैले. यही वजह रही कि वे खुद 1932 में उनके द्वारा रचित प्ले नाटेर पूजा पर जब फिल्म बनने की बात हुई तो उन्होंने इस फिल्म में निदर्ेशन करने की ललक दिखायी. गौरतलब है कि यह पहली फिल्म थी, जिसमें रवींद्रनाथ टैगोर ने कुछ दृश्यों में शूटिंग करने की कोशिश की है.

विश्व सिनेमा पर पारखी नजर

फिल्मकार मेघनाथ इस बारे में बताते हैं कि रवींद्रनाथ टैगोर गांधीवादी विचारों के विरोधी नहीं थे. लेकिन वे उनकी उन बातों से सहमत नहीं होते थे. रवींद्रनाथ टैगोर ने उसी दौर में कह दिया था कि भविष्य में भारत का एक नया प्रारूप बनाने में सिनेमा का महत्वपूर्ण योगदान होगा. आनेवाले समय में सिनेमा बेहतरीन पहचान बनायेगा और बहुत ज्यादा एक्टिव भी नजर आयेगा. यह भविष्यवाणी उन्होंने उसी वक्त कर दिया है. मेघनाथ आगे बताते हैं कि रवींद्रनाथ टैगोर की कई कृतियों पर तो फिल्में बनी हीं. लेकिन रवींद्र के सिनेमा प्रेम से ही नेहरु भी बहुत प्रभावित थे. वे रवींद्र पर बनाई गयी फिल्मों को तो देखना पसंद करते ही थे. उनके विचारों से प्रभावित होकर ही कभी उन्होंने राजकपूर की फिल्म दिल्ली दूर नहीं में अभिनय करने की बात भी कह डाली थी. साथ ही रवींद्र की नजरिये से सिनेमा को देखनेवाले नेहरु ने विमल रॉय व राज कपूर सरीखे लोगों को रूस, चीन व एशिया के अन्य स्थानों पर भारतीय सिनेमा के प्रचार के लिए प्रभावित किया.

रवींद्र की रचनाएं व सिनेमा

रवींद्रनाथ टैगोर ने हमेशा गंभीर सिनेमा को महत्ता दी. शायद यही वजह है कि उनकी रचनाओं पर आधारित फिल्म गंभीर दर्शकों को ही रास आयी. दरअसल, उनकी रचनाओं में वह खास बात होती थी जो कई विजुअल मेटाफर बनाने में भी सहायक साबित होती थी. कई बार ऐसा होता था कि दर्शक उनके इस मेटाफर को समझने में असमर्थ हो जाते हैं. लेकिन उनकी हर रचना पर आधारित फिल्मों में एक संदेश जरूर होता है. टैगोर ने अपनी रचनाओं में कई प्रयोगात्मक कैरेक्टर का चुनाव किया था. उन्होंने कई तरीके से सारी बातों को जोड़ने की कोशिश की है. शायद यही वजह थी कि सत्यजीत रे जैसे निदर्ेशकों ने एक बार नहीं बल्कि रवींद्रनाथ टैगोर की रचनाओं पर तीन फिल्में बनायीं. जिनमें चारुलाता, तीन कन्या और घारे-बैयरे प्रमुख हैं. चारुलता 1964 में रिलीज हुई थी. यह उनकी रचना नोशटोनिर पर आधारित थी. फिल्म की कहानी स्वतंत्रता व 19वीं व 20वीं शताब्दी में होनेवाले सामाजिक मुदद्ों पर आधारित थी. फिल्म की कहानी में 1879 में बंगाल के परिदृश्य का चित्रण किया गया है. माधावी मुखर्जी ने फिल्म में मुख्य किरदार निभाया था. टैगोर की लघु कहानियों पर आधारित फिल्म तीन कन्या का निर्माण 1961 में किया गया था. उन्होंने इस फिल्म को बनाने से पहले इस फिल्म पर डॉक्यूमेंट्री बनायी थी. इसमें मोनिहारा, पोस्टमास्टर, सम्पाति पर आधारित थी. रवींद्र की रचनाओं में लिंगभेद, जातिवाद, नस्लवाद जैसे कई गंभीर मुद्द्ों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है. उनकी रचनाओं की फिल्मों में भी इसका विस्तार होता है. सत्यजीत रे के अलावा तप्पन सिन्हा ने भी टैगोर की कृतियों पर कई फिल्में बनायीं. जिनमें खुदितो पाषाण, अतिथि, काबुलीवाला जैसी फिल्मों का निर्माण किया. जिनमें काबुलीवाला बेहद चर्चित फिल्म रही. अतिथि में एक ब्राह्मण लड़के व उसके स्वतंत्रता संग्राम की कहानी को दर्शाया गया. टैगोर की खास कृति सेशर कोबिता पर आधारित फिल्म का निर्माण किया सुब्रजीत मित्रा ने. फिल्म का नाम रखा मोन अनमोर. रितुपर्णो घोष ने टैगोर को श्रध्दांजलि देते हुए नौकाडुबी का निर्माण किया है. टैगोर कह विधा में माहिर थे.

निदर्ेशक रवींद्र नाथ टैगोर

रवींद्रनाथ टैगोर ने एक दौर में प्ले के रूप में नाटेर पूजा की रचना की. आगे चल कर उन्हें लगा कि इसे सिनेमा का रूप देना चाहिए. इसलिए उन्होंने इसे अपने कुछ सगे साथियों की मदद से फिल्म का रूप दिया. उन्होंने फिल्म के कई दृश्य फिल्माये. गौरतलब है कि उन्होंने फिल्म की शूटिंग के दौरान एक बच्चे की तरह निदर्ेशन की ट्रेनिंग ली थी. इस फिल्म में बुध्द के जीवन से जुड़ी बातों को दर्शाया गया था. गौरतलब है कि यह उनका सिनेमा को बढ़ावा देना ही था.1914 में रवींद्रनाथ टैगोर ने वीरेंद्र गांगुली को फ्रांस जाकर फिल्म मेकिंग सीखने के लिए फ्रांस को पत्र लिखा था. फिर वर्ष 1931 में निदर्ेशक बीएम सरका ने उन्हें उनकी रचना नाटेर पूजा पर फिल्म निदर्ेशन करने के लिए तैयार किया, जिसमें उन्होंने अपने शांतिनिकेतन के छात्रों को काम करने के अवसर प्रदान किये. इस फिल्म के सिनेमेटोग्राफर नीतिन बोस थे.

सत्यजीत रे ने पांच फिल्में बनायी हैं जिनमें चारुलता, तीन कन्या, घारे बहरे प्रमुख हैं

तपन्न सिन्हा ने पांच फिल्में बनायीं, जिनमें खुदिपतो पाषाणा, अतिथि, काबुलीवाला, कांदिम्बनी प्रमुख हैं.

हाल के दिनों में ऋतोपर्णो ने चोखेरबाली बनायी.

ऋत्विक घटक ने कई बार उनके गानों का इस्तेमाल अपनी फिल्मों में किया था कोमल गांधार, मेघे डाके डार.

सुभाष घई ने हाल ही में उनकी रचना नौकाडबी का निर्माण किया है. इसका निदर्ेशन रितुपर्णों ने ही किया है. गौरतलब है कि नौका डुबी का शुरुआती दौर से लेकर अब तक( 1932- 1980 ) तीन बार निर्माण किया जा चुका है.

गीत-संगीत में रवींद्र

हिंदी फिल्मकारों ने रवींद्र संगीत का इस्तेमाल कई गानों में किया है. पंकज मल्लिक ने फूल हरे, हरे,,,याद आये कि न आये तुम्हारी,.,,,अब तेरे सिवा कौन है मेरा जैसे गानों का इस्तेमाल किया. विशेष कर एसडी बर्मन, बप्पी लहरी, नौशाद, रवींद्र जैन, राजेश रोशन ने अपनी फिल्मों में रवींद्र संगीत दिया है. तलत महमूद व सुरैया ने गाया गीत बचपन के दिन भूला न देना भी रवींद्र संगीत से ही प्रभावित था. राजेश रोशन की रचना छूकर मेरे मन को भी रवींद्र नाथ जोरी कापे नाइ चिनी को शेकी से ली गयी थी. गौरतलब है कि रवींद्रनाथ टैगोर की रचना पर बनी सबसे पहली फिल्म विसर्जन थी.

निदर्ेशन की हॉट सीट पर अभिनेत्रियां




हिंदी सिनेमा जगत की कई अभिनेत्रियों ने अभिनय के साथ-साथ निदर्ेशन की कमान भी सही तरीके से संभाली है. हिंदी सिनेमा जगत की कुछ ऐसी ही अभिनेत्रियों पर अनुप्रिया अनंत की रिपोर्ट

अभी हाल ही में खबर आयी है कि रानी मुखर्जी निदर्ेशिका बनना चाहती हैं. यह सुन कर कई लोगों ने यह कयास लगाना शुरू कर दिया कि उन्हें निदर्ेशिका बनने की प्रेरणा उनके अंतरंग प्रेमी आदित्य चोपड़ा से मिली है. जबकि रानी मुखर्जी ने शुरुआती दौर के एक इंटरव्यू में कहा था कि भविष्य में वह निदर्ेशिका बनना चाहती हैं. गौरतलब है कि बॉलीवुड में अब तक जब भी महिला अदाकाराओं ने कुछ लीक से हट कर करने की कोशिश की है. लोग उन्हें यही बातें सुनाने लगते हैं कि उनके साथ किसी न किसी सहयोग है या उनके सिर पर किसी न किसी हाथ है. ऐसे में जाहिर है, महिला अदाकाराओं का मनोबल भी टूटता है. आखिर क्यों हिंदी सिनेमा जगत भी इस बात को स्वीकारता है कि अपने दम खम पर भी महिलाएं कुछ कर सकती हैं. हिंदी सिनेमा जगत ने यह सोच विकसित कर ली है कि अभिनेत्रियां सिर्फ बार्बी डॉल बन कर ही रह सकती हैं. कोई क्रिएटिव काम नहीं कर सकतीं. जबकि शुरुआती दौर से अब तक देखें तो कई ऐसी अभिनेत्रियां हैं जिन्होंने निदर्ेशन का कमान न सिर्फ संभाला है, बल्कि अपनी कल्पनाशीलता का भी प्रमाण दिया है. गौरतलब है कि 60 के दशक में जब वहीदा रहमान बेहद लोकप्रिय अदाकारा थीं, उन्होंने ने भी गुरुदत्त से एक बातचीत के क्रम में यह बात कही थी कि उन्हें फिल्म निदर्ेशन का शौक है.जया भादुरी ने भी यही बात कही थी. लेकिन इनकी मनसा पूरी न हो पायी थी. लेकिन कुछ सालों के बाद अभिनेत्रियों ने इस सोच से बाहर निकल कर काम करना शुरू किया. और खुद को निदर्ेशन की कुर्सी पर विराजमान भी किया. कुछ ऐसी ही अभिनेत्रियों पर एक नजर

हेमा मालिनी( टेली मी ओ खुदा)

अपने होम प्रोडक्शन के बैनर तले हिंदी सिनेमा जगत की ड्रीम गर्ल ने अब निदर्ेशन की कमान संभाली है. इस फिल्म में वे अपनी बेटी इशा को फिर से लांच कर रही हैं. फिल्म में धमर्ेंद्र ने मुख्य भूमिका निभाई है. निदर्ेशन व अभिनय के बारे में हेमा मालिनी बताती हैं कि अभिनय अधिक मुश्किल काम नहीं है. निदर्ेशन है. यहां सबकुछ निदर्ेशक को तय करना होता है. और खास तौर से तब जब परिवार साथ में काम कर रहा हो तो कई बारीकियों का ध्यान रखना पड़ता है. चूंकि फिल्म फ्लॉप होती है तो सारी जवाबदेही निदर्ेशक की हो जाती है. मेरे लिए भी यह मुश्किल है कि मैं धमेंद्र को पहली बार निदर्ेशित करूंगी.

नंदिता दास( फिराक)

नंदिता दास ने कम ही समय में हिंदी सिनेमा में अपनी वह पहचान बना ली कि लोगों ने उनके बारे में बातें बनाने से पहले कई बार सोचना शुरू कर दिया. उन्होंने अपने अभिनय के माध्यम से साबित किया कि चेहरा मायने नहीं रखता. किरदार रखता है. कलाकार रखता है. वह बिंदास, बेफिक्र होकर काम करती हैं. अपने अभिनय से खास पहचान स्थापित करने के बाद उन्होंने निदर्ेशन में कदम बढ़ाये. और वर्ष 2008 में पहली बार निदर्ेशन की कमान संभाली फिल्म फिराक से.गुजरात में हुए वर्ष 2002 के दंगे के बारे में उन्होंने अपनी फिल्म में सच्चाई दर्शाने की कोशिश की. उन्हें इस फिल्म के कई अवार्ड्स भी मिले. भविष्य में भी वह कई फिल्मों का निर्माण करनेवाली हैं.

रेवती ( मुंबई कटिंग, फिर मिलेंगे)

रेवती दक्षिण फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित अदाकारा हैं. उन्होंने शुरुआती दौर में कई हिंदी फिल्मों में भी काम किया. उसके बाद उन्होंने निदर्ेशन की कमान संभाली. उन्होंने अब तक मुंबई कटिंग, केरला कैफे, फिर मिलेंगे और मित्र माइ फ्रेंड जैसी फिल्मों का निर्माण किया. उन्होंने बतौर निदर्ेशक खास पहचान मिली और लोग उन्हें उनकी अलग सोच की फिल्मों के लिए जानते हैं.

मनीषा कोईराला

मनीषा कोईराला ने कई हिंदी फिल्मों में अभिनय किया है व राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता भी रही हैं. खबर आ रही है कि वह जल्द ही कश्मीर पर एक फिल्म का निर्माण करने जा रही हैं. उन्होंने तैयारी शुरू कर दी है व रिसर्च के लिए वे इन दिनों कश्मीर में हैं.

रेणुका सहाणे

रेणुका सहाणे ने कई हिंदी फिल्मों में काम किया है और वह टेलीविजन से भी हमेशा जुड़ी रही हैं. जल्द ही वह फिल्म रीता से निदर्ेशन के क्षेत्र में कदम रख रही हैं.

आयेंगी निदर्ेशन में

कंगना रनौत ने फिलवक्त तक किसी फिल्म का निदर्ेशन नहीं किया है. लेकिन उन्होंने यह बात साफ जाहिर की है कि वह भविष्य में निदर्ेशन के क्षेत्र में जायेंगी. चित्रागंदा सिंह, सुष्मिता सेन, काजोल व रानी मुखर्जी ऐसी कई अदाकारा हैं, जो फिल्में बनाना चाहती हैं.

20110503

ये शहर नहीं महफिल है....



हिंदी सिनेमा के निदर्ेशकों के दिल में दिल्ली हमेशा राज किया है. फिर चाहे वह काट कलेजा दिल्ली के रूप में हो या फिर इश्क, मोहब्बत और प्यार के रूप में. किरदारों, कहानियों व गीतों के माध्यम से हमेशा निदर्ेशकों का दिल्ली चलो अभियान जारी रहा है. कैमरे की नजर से दिल्ली के विभिन्न पहलुओं को देखने की कोशिश कर रही है अनुप्रिया अनंत

दिल्ली के जनकपुरी के रहनेवाले बिट्टू और श्रूति जब एंवी एंवी गाने के साथ दर्शकों के सामने आते हैं दर्शक बस उनके मुरीद हो जाते हैं. सबकुछ भूल कर वे भी ब्रेड पकौड़े की कसम खाने लगते हैं . यह दिल्ली का ही जादू है जो लोगों को सोचने पर मजबूर कर देता है कि यह शहर है क्या. क्या यह मस्तानों की दिल्ली है, जिसके बायें भी दिल है . आखिर कौन है दिल्ली. या यह काट कलेजा है. दरअसल, दिल्ली महफिल है. यह देश की राजधानी होने के साथ-साथ पूरे भारत का दिल है. यही वजह है कि यहां पूरे भारत की संस्कृति देखने को मिलती है. कभी दिल्ली मासूम शक्लवाली नजर आती है तो कभी जेसिका लाल हत्याकांड का सच बयां करती नीम की तरह कड़वी. कभी मनु शर्मा की कानपुर की चांद दिल्ली की रात में चम कर उसे जगमगा देता है तो कभी यहां की जिंदगी भी साली सी घबराली सी हो जाती है. फिल्म चांदनी में ऋषि कपूर अपनी बाइक पर बिठा कर श्रीदेवी को सैर पर ले जा रहे हैं. कुतुबमिनार से निकलते हुए गाड़ी इंडिया गेट व दिल्ली के उन सभी प्रमुख इलाके से होकर गुजरती है, जहां सिनेमा के कैमरे ने बार-बार फोकस किया है. रंग दे बसंती की कहानी का विराम आकर दिल्ली के इंडिया गेट पर होता है. तो राकेश ओम प्रकाश मेहरा की अगली ही फिल्म दिल्ली 6 में काला बंदर भी दिल्ली का ही होता है. दरअसल, हिंदी सिनेमा ने दिल्ली के किरदारों, वहां के लोकेशन व वहां की संस्कृति सभ्यता का गुणगान हमेशा गाया है.निदर्ेशकों का मानना है कि दिल्ली में कुछ तो खास बात है. वहां की फिजा में जो दर्शकों के साथ-साथ निदर्ेशकों को भी अपनी ओर आकर्षित करता है. तभी तो अब तक इतनी बार दिल्ली के लोकेशन और उन्हीं स्थानों को बार-बार दिखाया जाता रहा है. लेकिन इसके बावजूद न दर्शक दिल्ली से बोर होते हैं और न ही सिनेमावालों का दिल दिल्ली से दूर जाने का होता है. इस क्रम में गौर करें तो अब तक कितनी फिल्मों के नाम दिल्ली पर रखे गये हैं.कितने गीतों में दिल्ली का जिक्र है. कितने लोकेशन में दिल्ली नजर आयी है और कितने किरदारों को दिल्ली के चांदनी चौक से लेकर जनकपुरी तक पहुंचाया गया है. यही नहीं दिल्ली का जादू छोटे परदे पर भी हमेशा सिर चढ़ कर बोलता रहा है.

चांदनी

कई वर्षों पहले सुपरहिट हुई फिल्म चांदनी ने दर्शकों का दिल जीता था. फिल्म के सारे किरदार,लोकेशन दिल्ली के थे. फिल्म का गीत बनी तू मेरी मेहबूबा भी इंडिया गेट पर फिल्माया गया. ऋषि कपूर और श्रीदेवी पर ही फिल्माया गया एक और गीत जयपुर से निकली गाड़ी दिल्ली चले हौले हौले में भी जयपुर से दिल्ली की यात्रा दिखाई गयी है.

चांदनी चौक का जिक्र

हिंदी सिनेमा में दिल्ली के चांदनी चौक का जिक्र भी कई बार किया गया है. फिल्म चांदनी से लेकर चांदनी चौक टू चाइना में चांदनी चौक का गुणगान गाया गया है. फिल्म कभी खुशी कभी गम में भी काजोल और करीना चांदनी चौक के ही रहनेवाले होते हैं. फिल्म चांदनी चौक टू चाइना की कहानी भी चांदनी चौक से शुरू होती है.

दिल्ली-6 और चोर बाजार

जैसे जैसे वक्त बदला निदर्ेशकों ने चांदनी चौक के साथ-साथ दिल्ली के अन्य इलाकों पर भी फोकस करना शुरू किया. राकेश ओम प्रकाश मेहरा की फिल्म रंग दे बसंती के बाद उनकी फिल्म दिल्ली 6 में चोर बाजार, छावड़ी बाजार और दिल्ली 6 इलाके की पूरी तसवीर निकल कर लोगों के सामने आयी. इम्तियाज अली ने तो चोर बाजारी पर गाना बना कर ही उसे लोकप्रिय बना दिया.और दर्शकों के लिए अचानक चोर बाजारी भी घूमने की एक खास जगह बन गयी.

इंडिया गेट

लगभग दिल्ली पर फिल्माई गयी हर फिल्म में इंडिया गेट को जरूर दर्शाया गया है. फिल्म नो वन किल्ड जेसिका व रंग दे बसंती में लोगों का कैेंडल मार्च यही होता है. फिल्म पा में ऑरो और उसके पिता के दिल्ली आवास के दौरान भी कैमरा जूम इन होता है.

गीतों में दिल्ली

फिल्म दिल्ली 6 में ये दिल्ली है मेरे यार में बदलती दिल्ली की खूबसूरत तसवीर प्रस्तुत की गयी है. नो वन के गीत ददद दिल्ली में भी दिल्ली की कड़वी और रफ एंड टफ तसवीर प्रस्तुत करने की कोशिश की गयी है तो वही फिल्म तनु वेड्स मनु के गीत मनु भईया का करिहें में दिल्ली की मासूमियत को दिल्ली की रात कह कर संबोधित किया गया है. गौर करें तो तनु वेड्स मनु के इस गीत में दिल्ली के मसाले, दिल्ली की लोक संस्कृति व वहां के लोगों की भाषा का खूबसूरत चित्रण किया गया है.

दिल्ली के लोकेशन

फिल्म नो वन किल्ड जेसिका, ये साली जिंदगी, दिल्ली-6, लव आज कल जैसी फिल्मों में विशेष रूप से दिल्ली को दर्शाया गया है. लोकेशन के रूप में इंडिया गेट, चांदनी चौक, छाबड़ी बाजार, नयी दिल्ली व हाल की फिल्मों में दिल्ली के मेट्रो की झलक भी फिल्मों में नजर आने लगी है. कभी लोकेशन के रूप में निदर्ेशक दिल्ली के लोकप्रिय स्थानों को ही स्थापित किया करते थे. लेकिन अब उन्होंने भी अपना कैमरा इंडिया गेट और जामा मस्जिद से दिल्ली के पराठेवाली गली में जा पहुंचायी है. फिल्म दिल्ली 6 में मुख्य रूप से दिल्ली की गलियां नजर आयी हैं. फिल्म फनां के दो गीतों में भी दिल्ली को खूबसूरत तरीके से प्रस्तुत किया गया है.

दिल्ली के किरदार

हिंदी सिनेमा में जब जब दिल्ली की कहानी चुनी गयी है. वहां के किरदारों को चुनने में खास सतर्कता बरती गयी है. कोशिश यही रही है कि दिल्ली के मिश्रित रूप को लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जाये. फिर चाहे वह बैंड बाजा बारात के बिट्टू-श्रूति के रूप में हो या तनु वेड्स मनु के मनु शर्मा के रूप में. भाषाई तौर पर भी पंजाबी और दिल्ली की भाषा का सही चित्रण प्रस्तुत किया जा रहा है. खासतौर से करलियो, बतादियो अंदाज में फिल्मी किरदार हमेशा बात करते नजर आते हैं.

चलो दिल्ली

लारा दत्ता और विनय पाठक की फिल्म में दिल्ली के अलग स्वरूप से प्रस्तुत करने की कोशिश है. दो अजनबी कैसे अजनबी होते हुए भी दिल्ली पहुंचने के रास्ते ढ़ूंढ़ते हैं. फिल्म की कहानी में यही दर्शाने की कोशिश की गयी है.

छोटे परदे पर दिल्ली

हिंदी सिनेमा के साथ साथ छोटे परदे पर भी हमेशा दिल्ली के छत, कुतुबमिनार, छाबड़ी बाजार नजर आता रहा है. स्टार प्लस का सुपरहिट शो ससुराल गेंदा फुल छाबड़ी बाजार की कहानी है. तो वही सोनी टीवी का शो छज्जे छज्जे का प्यार नयी दिल्ली की. करोलबाग की सिम्मी भी दर्शकों का दिल जीतने में कामयाब रही. यशराज का शो माही वे की माही भी दिल्ली में ही शरारतें करती नजर आती थीं.

तनु वेड्स मनु के गीतकार राज शेखर की नजर में दिल्ली

मेरे घर की एक बालकनी अभी भी दिल्ली में खुलती है.जब भी मेरे पन्ने सीलने लगते हैं. मैं वहां जाता हूं. सिविल लाइन, यूनिवर्सिटी की खाली सड़कों पर हमेशा एक रुमानी होने का आग्रह होता है. एक लाइफ होती है. कह रहे रात जगे.

उलझी सी है दिल्ली ः राजकुमार गुप्ता, निदर्ेशक

मेरा मानना है कि दिल्ली बहुत ही उलझा शहर है. वह कभी एकरूप में नहीं रहती. वहां की जिंदगी और रफ्तार बाकी सभी शहरों की तुलना में अलग है. उसका मिजाज हमेशा बदलता रहता है. मैं मानता हूं कि दिल्ली को जितनी बार देखो वह अलग एंगल से नजर आती है. शायद यही वजह है कि निदर्ेशकों की नजर से हमेशा दिल्ली को अलग-अलग स्वरूपों में प्रस्तुत किया गया है. हालांकि मैंने भी अपनी फिल्म नो किल्ड जेसिका वास्तविक कहानी पर आधारित थी. वह दिल्ली पर ही आधारित थी. इसलिए दिल्ली को ही चुना. फिल्म में मेरे लिए सबसे खास यादगार लम्हा था जब हमने इंडिया गेट पर फिल्म में दिखाया गया मार्च शूट किया था. बहुत मेहनत हुई थी. भीड़ को एकत्रित करने में. मेरा मानना है कि सिनेमा में जब जब दिल्ली दिखाई गयी है, इंडिया गेट जरूर नजर आया है, क्योंकि यह दिल्ली की नहीं पूरे भारत की शान है.

जिन फिल्मों में किसी न किसी रूप से दिल्ली का जिक्र रहा.

कभी खुशी कभी गम, अमु, हजारों ख्वाहिशें ऐसी, सरफरोश, रंग दे बसंती, चलो दिल्ली, नो वन किल्ड जेसिका, तनु वेड्स मनु, चांदनी, चांदनी चौक टू चाइना, दिल्ली 6. ये साली जिंदगी, लव आज कल, कुर्बान, फनां, बैंड बाजा बारात, रॉकस्टार, जब वी मेट.