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20130118

किसी कैंप का हिस्सा नहीं मैं : अर्जुन रामपाल


अर्जुन मानते हैं कि प्रकाश झा ने उनकी फिल्मी करियर को नयी उड़ान दी. उनकी फिल्में राजनीति, चक्रव्यूह के बाद अब वह फिल्म सत्याग्रह में भी नजर आयेंगे. लेकिन फिलवक्त वह सुधीर मिश्रा की फिल्म इनकार को लेकर काफी उत्साहित हैं, क्योंकि ऐसे विषय को लेकर वह पहली बार किसी फिल्म में काम कर रहे हैं.


अ ॉफिस कार्यालय में महिलाओं के साथ होनेवाले सेक्सुअल हैरेशमेंट को लेकर पहली बार इस विषय पर सुधीर मिश्रा  फिल्म बना रहे हैं. अर्जुन फिल्म में राहुल वर्मा के किरदार में हैं. बातचीत अर्जुन से

फिल्म इंकार के लिए क्यों इंकार नहीं किया?
मैंने सुधीर मिश्रा की पहले की कई फिल्में देखी थी. सो इस बात से तो वाकिफ था कि सुधीर जो करेंगे अच्छा ही होगा. कम से कम कंटेट तो जरूर होगा. हर कलाकार चाहता है कि वह अच्छी फिल्में करे. पहले जब सुधीर कहानी लेकर आये थे तो मैंने उसी वक्त हां नहीं कही थी. मैं पूरी तरह से संतुष्ट नहीं था. फिर मैंने सुधीर को कहा कि बैठते हैं इस पर बात करते हैं. फिर हम हफ्तों बैठे. मैंने ही सुधीर को सुझाव दिया कि क्यों न फिल्म का क्लाइमेक्स थोड़ा थ्रील कर दें. दर्शकों को अच्छा लगेगा. सुधीर को मेरा सुझाव पसंद भी आया. जब हम लगातार इस फिल्म की कहानी पर काम कर रहे थे तो मेरी पत् नी भी परेशान हो गयी थी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि हम किस तरह के विषय पर काम कर रहे हैं. सुधीर को लेकर भी वह कांफिडेंट नहीं थी. लेकिन अब धीरे धीरे जब कहानी ने शेप लेने लगी तो उसे भी लगा कि कुछ अच्छा अलग हो रहा है और निश्चित तौर पर अब ऐसा लग रहा है कि फिल्म दर्शकों को पसंद आयेगी.दूसरी बात फिल्म का जो विषय है. वाकई रोचक और गंभीर है. संवेदनशील भी है. ऐसी फिल्में इन दिनों कम बन रही हैं. जबकि मुझे लगता है कि ऐसे विषयों पर फिल्में बननी चाहिए. क्योंकि अब हमारे यूथ तैयार हो रहे हैं. दर्शकों में ऐसी कहानियां नॉलेज पहुंचाती है.

इस फिल्म को चुनने से पहले क्या आप इस विषय पर इतनी जानकारी रखते थे या दिलचस्पी लेते थे.
नहीं, मैं ईमानदारी से कहना चाहूंगा कि मुझे बिल्कुल इस बारे में खास जानकारी नहीं थी. मैंने फिल्म के दौरान ही कई केस स्टजी की. कानून पढ़ा. उसके प्रावधान पढ़े कि किस तरह एक कार्यलय में लड़कियां शोषित होती हैं और फिर भी वह आवाज नहीं उठा पातीं, जबकि उनके लिए कानून है. मैं किसी आइटी कंपनी का नाम नहीं लेना चाहूंगा कि लेकिन हकीकत यही है कि लड़कियां आइटी सेक्टर में सबसे अधिक शोषित होती है. ऐसे में लड़कियों को तो यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए, ताकि वह कई चीजों से अवगत हों. उनकी सुरक्षा के लिए यह जरूरी है. इस फिल्म के जरिये ही जान पाया कि आॅफिस परिसर में र्फ्लटिंग करना, वलगर जोक्स भेजना भी सेक्सुअल हैरेशमेंट ही कहलाता है. काफी जानकारी मिली फिल्म से.

तो क्या फिल्म केवल महिला दर्शकों को ध्यान में रख कर बनाई गयी है. कई बार निर्दोष पुरुष भी कानून की वजह से चपेत में आकर फंस जाते हैं.
नहीं इस फिल्म की यही तो खासियत है कि फिल्म में राहुल वर्मा और माया दोनों के पक्ष को दर्शाया गया है. मैं कंपनी का सीइओ हूं और माया वर्कर. फिल्म में दोनों पक्षों को रखा गया है. खासतौर से फिल्म का क्लाइमेक्स लाजवाब है.

ऐसे वक्त में जहां गैंगरेप के मुद्दे से सभी आहत हैं. ऐसे में यह फिल्म आ रही है?
अनफॉरचुनेटिली, हमारी फिल्म की रिलीज का यह वक्त है. जो हुआ गलत हुआ. इंकार शायद थोड़ा एजुकेट कर पाये लोगों को.

इन दिनों आप केंद्रीय भूमिकाओं में नजर आने लगे हैं. पहले की अपेक्षा अब आपके अभिनय भी निखार आया है. आप खुद इस बात से सहमत हैं ?
खुशी इस बात की है कि जरूरत से ज्यादा मिला. इतना सोचा नहीं था. लेकिन प्रकाश झा, सुधीर मिश्रा जैसे निर्देशकों ने वाकई मेरे हुनर को निखारा है. संवारा है. मैं चाहता हूं कि मैं इंडस्ट्री में सभी लोगों के साथ काम करूं. किसी कैंप का हिस्सा न बनूं
लेकिन आप तो शुरू से शाहरुख के कैंप के माने गये हैं. इन दिनों आप दोनों में अनबन है? 
थक चुका हूं यह सुन सुन कर. मैं तब भी किसी एक कैंप का नहीं था. अब भी नहीं हूं. इंडस्ट्री छोटी सी है. हम यहां काम करने आये हैं. कैसे किसी एक के साथ ही काम करके हम संतुष्ट रह सकते हैं. मुझे सबके साथ काम करना है. बस यही मोटो है मेरा.

मेरे परिवार में हमेशा महिलाओं की चली है : सुधीर मिश्र


हजारों ख्वाहिशें ऐसी, ये साली जिंदगी जैसी अलग विषयों की फिल्मों के निर्देशन के बाद सुधीर मिश्रा इस बार इनकार लेकर आये हैं. इनकार आॅफिस परिसर में महिलाओं के साथ हो रहे सेक्सुअल हैरेशमेंट के मुद्दे पर आधारित फिल्म है. सुधीर की यह खासियत रही है कि वह फिल्मों से इतर भी सामाजिक मुद्दों से सरोकार रखते हैं. शायद यही वजह है कि उनकी फिल्मों में वह अस्तित्व, वह हकीकत नजर आती है. आखिर एक लखनऊ का सामान्य सा लड़का कैसे मुंबई आया और फिर कैसे फिल्में बनाने लगा, इनकार जैसी फिल्मों के विषय कैसे जेहन में आती हैं... ऐसे तमाम सवालों के जवाब दिये.

सुधीर की फिल्मों की खासियत रही है कि वह अभिनेत्रियों को केवल आयटम के रूप में फिल्मों में इस्तेमाल नहीं करते. 

सुधीर, शुरुआती दौर से ही जब भी आप फिल्में बनाते आये हैं. आपके विषय बिल्कुल आम होते हुए भी आम नहीं होते. तो इनकार जैसे विषय पर फिल्म बनाने की बात कैसे जेहन में आयी.
देखिए, मैं शुरू से जिस माहौल में पला बढ़ा हूं. वहां हमेशा महिलाओं को शीर्ष पर रखा जाता रहा है. फिर चाहे वह मेरी मां हो या मेरी दादी या नानी. ऐसे में जब मैं परिवार के बाहर आकर देखता हूं और जो स्थिति है वर्तमान समाज की देखता हूं तो थोड़ी खोफ्त तो होती ही है. हम महिलाओं को क्यों बराबरी का दर्जा नहीं दे सकते. क्यों उन्हें हीन मानते हैं. दयनीय मानते हैं. जबकि मैं तो मानता हूं कि उनसे स्ट्रांग कोई है ही नहीं. यही वजह है कि मेरी फिल्मों में महिलाओं को अहमियत देता हूं. लेकिन ऐसा मैं कुछ महान काम नहीं करता. ये मेरी नीयत में है. स्वभाव में है और इसमें कुछ बुरा नहीं है. ऐसे में जबकि मैं फिल्मकार हूं तो मेरा दायित्व है कि अपने इस स्वभाव की थोड़ी छवि तो लोगों के सामने प्रस्तुत करूं. इनकार का विषय मेरे पास मेरे खास दोस्त मनोज त्यागी लेकर आये थे. लेकिन उन्होंने सिर्फ ढांचा दिया था. मुझे लगा इस पर विस्तार से काम होना चाहिए तो मैंने उन्हें काम सौंपा. फिर धीरे धीरे कहानी तय हुई.
अर्जुन रामपाल और चित्रांगदा ही जेहन में क्यों आये?
दरअसल, यह कहानी ऐसी है. जिसमें आपको जिस भी महिला को दर्शाना था बतौर अभिनेत्री. वह डरी सहमी सी नहीं दिखनी चाहिए. कांफिडेंट लगनी चाहिए. इंडिपेंडेंट लगनी चाहिए. लेकिन साथ ही उसमें खूबसूरती भी होनी चाहिए. यह सारी क्वालिटीज मुझे चित्रांगदा में नजर आयी. चित्रांगदा जिस तरह की अभिनेत्री हैं, उन्हें लड़कियां भी पसंद करती हैं. वह ग्लैमरस भी हैं और एट द सेम टाइम वह बिल्कुल घर की लड़की की तरह दिखती हैं तो मुझे लगा कि मेरे किरदार माया के लिए वही सबसे परफेक्ट होंगी. अर्जुन को लेने की खास वजह यह थी कि मैं काफी दिनों से उनके साथ कोई फिल्म करना चाहता था. वह मुझे बतौर एक्टर प्रभावित करते हैं. उनकी फिल्में देखी है मैंने. खासतौर से चक्रव्यूह में उन्होंने बेहतरीन काम किया है. वर्सेटाइल लगता है अर्जुन. मेरा जो किरदार है एक सीइओ का. उसमें इगो, इमोशन, बेबसी सबकुछ झलकाना था. अर्जुन में वह बात थी तो मैंने दोनों का साथ लिया.
आॅफिस परिसर में महिलाएं सुरक्षित नहीं क्या आप ऐसा मानते हैं? क्या ऐसा नहीं होता कि कई बार महिलाएं महिला होने का फायदा उठा कर निर्दोर्षों पर भी अपने मतलब के लिए कसूरवार ठहरा देती है.
आॅफिस परिसर में महिलाएं सुरक्षित हैं या नहीं या कितनी सुरक्षित हैं. यह आॅफिस टू आॅफिस निर्भर करता है. मेरी फिल्म इस मुद्दे पर नहीं है कि आॅफिस परिसर में महिलाएं सुरक्षित ही नहीं. बल्कि इस मुद्दे पर है कि उनके साथ होनेवाले सेक्सुअल हैरेशमेंट पर उनका क्या टेक होता है और साथ ही साथ जैसा कि आपने यह सवाल पूछा कि महिलाएं कई बार जानबूझ कर लोगों को फंसा देती है. मेरी फिल्म में वह पहलू भी प्रस्तुत किया जायेगा. हां, लेकिन यह कोशिश जरूर है कि कम से कम इस फिल्म के माध्यम से कई आॅफिस में काम करनेवाली महिलाएं जो इस बात से वाकिफ ही नहीं कि फ्लर्टिंग को लेकर हैरशमेंट को लेकर कानून है और वह उसका इस्तेमाल कर सकती हैं या कैसे इसका गलत इस्तेमाल भी होता है. यह सारी जानकारियां उन्हें जरूर मिलेगी. और साथ ही साथ मैं कहना चाहूंगा कि जो लोग यह दुहाई देते हैं कि महिलाओं को आॅफिस जाना ही नहीं चाहिए काम करना ही नहीं चाहिए, क्योंकि उनके साथ ऐसा हो रहा है तो वह बकवास है. महिलाएं काम करें. और सबके साथ काम करें. एक आॅफिस में वह माहौल होना चाहिए. आपको आश्चर्य होगा जान कर कि हमने जो सर्वेक्षण करवाया, उसमें हमने गौर किया कि सबसे अधिक केस तो एक बड़ी प्रतिष्ठित आइटी कंपनी जिसका मैं नाम नहीं लूंगा उसमें दर्ज है. जो जब वहां ऐसी स्थिति है तो और जगह पर भी होगी और मैं यह बेफिजूल की बातों को बिल्कुल नहीं मानता कि महिलाएं हैरेश होने के लिए या छोटे कपड़े पहनने या आॅफिस में लड़कों से बात करके उन्हें प्रोवोक करने की कोशिश करती है.
वर्तमान में जो भारत में स्थिति है. महिलाओं की सुरक्षा को लेकर. इस पर आपकी क्या राय है?
मेरा मानना है कि यह सारी समस्या इसलिए है कि हम महिलाओं को बराबरी का दर्जा देते नहीं. मानते नहीं. आप खुद गौर करेंगे कि आप जिसे बराबरी का मानते हैं. उनकी इज्जत करेंगे. हम महिलाओं को शुरू से ही खुद से कम आंकते हैं. खाना बनाना है तो महिलाएं बनायें. सारे काम महिलाएं करें. अरे क्यों करें. अपने काम खुद करो. मैं खुशनसीब हूं कि मुझे ऐसा माहौल मिला, जहां महिलाएं हम से अधिक पॉवरफुल भी. घर के सारे  अहम फैसले लेने में वही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं.
आप जिस परिवार से थे. उसमें फिल्मी माहौल तो न था. फिर आप कैसे फिल्मों से जुड़े?
मेरे पापा गणित के प्रोफेसर थे. मैं उनके साथ कई जगहों पर घूमा करता था. मैं यूनिवर्सिटी कैंपस में ही बड़ा हुआ हूं. तो मैं आम जिंदगी से अलग कॉस्मोपोलेटियन माहौल में रहा कैंपस के. तो उस माहौल का असर रहा मुझपर . कॉलेज में थियेटर बहुत किया करता था. वही से मुझे नेशनल स्कूल आॅफ ड्रामा का चस्का लगा तो वहां चला गया. लेकिन वहां जाकर समझ आया कि एक्टर अच्छा नहीं बन पाऊंगा. फिर विनोद चोपड़ा का साथ मिला. मेरी जिंदगी में विनोद नाम के शख्स की खास अहमियत रही है, क्योंकि विधु विनोद चोपड़ा ने फिल्मों से मिलन कराया तो विधु से मिलवाने वाला था विनोद दुआ. उसने मुझे कहा था कि विधु से इंटरव्यू करो. तो मैंने किया और विधु उसी वक्त से काफी इंप्रेस हो गया था. विधु ने कहा चलो मुंबई. आ गया. फिर उसकी फिल्म में एक्टिंग की . लेकिन लगा कि न मैं एक्टर नहीं बन पाऊंगा. धीरे धीरे कुंदन शाह, केतन मेहता, जावेद अख्तर, शेखर कपूर जैसे लोग मिले और फिल्मों से जुड़ाव हो गया.
हमने सुना आपने कभी पॉलिटिक्स की तरफ भी रुख किया था.
वह मेरी सबसे बड़ी गलती थी. मैं पहली बार किसी अखबार से यह बात शेयर कर रहा हूं कि मैंने पॉलिटिक्स में एंट्री ली थी. अपने नानाजी की वजह से. मैंने एक जगह से चुनाव भी लड़ा था. लेकिन सफल नहीं हो पाया. वैसे जब तय था कि यही आना है तो निश्चित तौर पर यही आता.
आपकी फिल्मों को क्रिटिक की तरफ से तो वाहवाही मिलती है. लेकिन कमर्शियल सक्सेस नहीं मिल पायी अब तक? आपकी प्रतिक्रिया?
देखिए मैं अधिक फिल्में नहीं करता. फिर भी लोग सुधीर मिश्रा को जानते  हैं, यही कामयाबी है. मैं चाहता भी नहीं कि मसाला फिल्में बनाऊं. मेरी नजर में क्रिटिक की भूमिका हमेशा अहम रही है. मेरे कई क्रिटिक दोस्त हैं. क्योंकि मुझे वैसे क्रिटिक अच्छे लगते हैं जो मेरे नजरिया को लोगों तक पहुंचायें. वह भी इस बात को समझे कि मैं क्या दिखाना चाहता हूं. वह कमी बताएं मेरी फिल्मों की लेकिन बेबूनियादी स्तर पर नहीं. कर्मशियल सक्सेस जरूरी तो है ही. लेकिन मिलेगी धीरे धीरे.
आपकी आनेवाली फिल्में
मेहरुनिशा करने जा रहा हूं. फिलहाल. इस पर फिर बाद में बात होगी.
चित्रांगदा के साथ आपने पहली फिल्म से लेकर अब तक काम किया है? बतौर एक्ट्रेस कितना निखरी हैं वह?
 बहुत. खास बात यह है कि उसे पता ही नहीं है कि वह क्या है. वह क्या कमाल कर सकती है. उसे अपनी काबिलियत पर घमंड नहीं है. वह काम करने से पहले बहुत बहस करती है और बार बार चीजें पूछती है. पहली फिल्म से लेकर अब तक उसकी भूख जिंदा है. अच्छी फिल्मों में काम करने को लेकर. वह तो बहुत आगे जायेगी. निश्चित तौर पर.

एक फोटोग्राफर की दुर्दशा


दो दिनों पहले की घटना है. मुंबई के बांद्रा इलाके में वेटरन फिल्म फोटोजर्नलिस्ट जगदीश माली भिखारी की हालत में मिले. टीवी एक्ट्रेस मिंक ने उन्हें उस वक्त इस हालत में देखा जब वह गरीबों में कंबल वितरीत कर रही थीं. उन्होंने तुरंत अपने भाई को बुलाया और फिर दोनों ने मिल कर उन्हें किसी रेस्टोरेंट में बिठाया और बातचीत करने की कोशिश की. उन्होंने  जब जगदीश् माली से पूछा कि वह क्या चाहते हैं और कहां जाना चाहेंगे तो उन्होंने जवाब दिया कि अपने स्टूडियो. जबकि वह स्टूडियो उन्होंने कई सालों पहले बेंच दिया था.जगदीश किसी दौर में लोकप्रिय फोटोग्राफर थे, जिन्होंने कई अभिनेत्रियों की तसवीरें और पोर्टफोलियो शूट किया है. रेखा जैसी अभिनेत्री भी इनकी फेहरिस्त में शामिल हैं. मिंक ने जब जगदीश के परिवार से संपर्क किया तो किसी न े भी जगदीश का ख्याल रखने की जिम्मेदारी लेने से मना कर दिया. अंतत: मिंक ने सलमान को फोन किया और सलमान ने जगदीश को अस्पताल में भर्ती कराया. बॉलीवुड की दुनिया में फोटोग्राफर्स खास महत्वपूर्ण इसलिए हैं, क्योंकि यह दिखावे की ही दुनिया है. हर व्यक्ति चाहता है कि वह तसवीरों में बेहतरीन दिखे. चूंकि अकबर इलाहाबादी ने कहा है कि तेरी चेहरे से तो तेरी तसवीर भली है. सो, हर अभिनेता अभिनेत्री तरह तरह के अंदाज में तसवीरें निकलवाना चाहते हैं. इन दिनों डब्बू रतनानी काफी लोकप्रिय फोटोग्राफर हैं. किसी दौर में जगदीश भी हुआ करते थे. लेकिन जिस तरह कलाकार भी उम्र ढलने के साथ बूढ़ा होता जाता है. कैमरे के लेंस भी उम्रदराज होते जाते हैं और धीरे धीरे उनकी अहमियत खत्म होती जाती है. ताउम्र फिल्मी कलाकारों के पीछे भागते भागते अपनी दुनिया की वास्तविक तसवीर शायद ही वह देख पाते हैं. लेकिन जब वह एकाकी हो जाते हंै, उन्हें पूछनेवाला कोई नहीं होता.

लुट ले ओ दुनिया को ठेंगा दिखाके

आगामी 8 फरवरी को निर्देशक नीरज पांडे की फिल्म स्पेशल 26 रिलीज हो रही है.यह फिल्म एक ऐसे नकली आइपीएस अधिकारी पर आधारित है, जो वेष बदल कर पॉलिटिशिसन और काला धंधा करनेवाले लोगों को लूटता है. और राजनेता इसके बारे में कभी कोई शिकायत नहीं कर पाते, क्योंकि वह सारा धन काला धन है. नीरज पांडे ने 1986 में मुंबई व भारत के कई हिस्सों में घटित कुछ ऐसी ही वास्तविक घटना को फिल्म का रूप दिया है. नीरज पांडे ने इससे पहले अ वेडनेस डे फिल्म से सबको चौंकाया था. आम आदमी की जिंदगी पर आधारित वह फिल्म काफी लोगों को पसंद आयी थी. वजह थी फिल्म का बिल्कुल अलग हट के सोचना. विशेष कर फिल्म का अंत दर्शकों को भी चौंकाता है. दरअसल, नीरज पांडे जैसे निर्देशक लगातार आम आदमी से जुड़ी ऐसी कहानियां परदे पर उतार रहे हैं, जो आम जन से काफी जुड़ी हैं. लेकिन हमारा कभी उस ओर ध्यान नहीं जा पाता. स्पेशल 26 के रूप में नीरज ने एक बार फिर से सिस्टम की खामियों को सामने लाने की कोशिश की है कि किस तरह भारत में एक नकली आइपीएस अधिकारी का वेष धारण करके लोगों को लूट रहा है. लेकिन कोई उसे पकड़ नहीं पा रहा. चूंकि यहां हर जगह भ्रष्टाचार है. अब जहां भ्रष्टाचार है. वहां डर है. डर है. सो, असली गुनहगार को पकड़े कौन. पकड़नेवाला भी और पकाड़नेवाला दोनों ही तो गुनहगार है. नीरज पांडे ने एक गीत धड़ कपड़ के माध्यम से इस पूरे चक्र को समझाने की नायाब कोशिश की है. कुछ इसी तरह विशाल भारद्वाज ने मटरू...के गीत चोर नेता जनता...के माध्यम से देश में मुखौटे पहन कर बैठे ठगों की व्याख्या की है. दरअसल, वर्तमान में भारत में सिस्टम का हर व्यक्ति किसी न किसी बहाने लोगों को ठेंगा दिखा कर ठग ही रहा है. फिर चाहे वह ठग हमारे सामने आये न आये

उम्मीदों-आशाओं का कैलेंडर


नये वर्ष की शुरुआत हो चुकी है. नये वर्ष के उपलक्ष्य में लगभग हर कॉरपोरेट हाउस से लेकर सामान्य कार्यालयों तक में कैलेंडर की लेन देन होती है. मेरे दफ्तर में भी कई ऐसे कैलेंडर आये हैं. लेकिन नजर जाकर टिकी तो सिर्फ एक कैलेंडर पर. आरुषि नामक एनजीओ के वार्षिक कैलेंडर पर. इस कैलेंडर की खासियत इसमें इस्तेमाल किये गये कागज नहीं हैं.बल्कि इसे आम से खास बना दिया है गुलजार साहब के 12 नगमों में. दो पंक्तियों के इन 12 नगमों में आरुषि की सोच झलकती है. आरुषि भोपाल की एक ऐसी संस्था है, जो अंधे बच्चों के लिए कार्य करती है. इस कैलेंडर में गुलजार साहब ने जो पंक्तियां लिखी हैं, वह इसलिए भी खास है, क्योंकि वे सारी पंक्तियां इन बच्चों की बेबसी नहीं दर्शाती, बल्कि उन्हें आम जिंदगी से जोड़ती है, जो सकारात्मक ऊर्जा देती है. गुलजार लिखते हैं मेरे पीछे पीछे आओ लोगों, मैंने छड़ी में आंखें रखी हैं...इन चंद शब्दों में गुलजार ने इनकी छड़ी को इनका सहारा नहीं, बल्कि इनकी आंखों का दर्जा दिया है. गुलजार साहब आगे लिखते हैं चश्मा अपनी नाक पे रखो तुम मेरी तो उंगलियां लिखती पढ़ती हैं...इन पंक्तियों में गुलजार साहब ने उन पर कटाक्ष किया है, जो इन बच्चों को हीन दृष्टि से देखते हैं. जागा तो सपना देखा जैसी पंक्तियों के माध्यम से गुलजार ने इन बच्चों की आंखों में सजते सपने का जिक्र किया है. तिरंगा कहीं भी हो...मेरा सलाम पहुंचा दो...ये दर्शाती हैं कि ये  बच्चे  कितनी शिद्दत से उस देश को चाहते हैं. दरअसल, वर्तमान में ऐसे बच्चों को गुलजार सरीखे शख्सियत के साथ की खास जरूरत है, क्योंकि यही इनकी बात, इनकी सोच को लोगों तक पहुंचा सकते हैं और लोगों को जागरूक कर सकते हैं. इस संस्था को आगे बढ़ाने की सोच में जुड़े अशोक बिंदल जैसे लोगों की इस संस्था को जरूरत है और हमारे देश को भी.

प्रासंगिक है स्क्रीन अवार्डस



हिंदी सिने जगत में स्क्रीन अवार्डस की प्रासंगिकता हमेशा बनी रही है. इसकी खास वजह यह है कि स्क्रीन अवार्ड क्रिटिक को ध्यान में रख कर दिये जानेवाले फिल्मी पुरस्कारों में से एक है. इस पुरस्कार समारोह में आज भी फिल्मों को मनोरंजन के दृष्टिकोण से कहीं ऊपर देखा जाता है. शायद यही वजह है कि न सिर्फ फिल्मों के नॉमिनेशन के चयन में बल्कि विजेताओं के रूप में भी लगभग उन सभी फिल्मों को सम्मान मिला, जो इसके हकदार थे. विशेष कर रणबीर कपूर और इरफान खान को साथ साथ बेस्ट अभिनेता के पुरस्कार से नवाजा गया. रणबीर को फिल्म बर्फी के लिए तो पान सिंह तोमर के लिए इरफान खान सराहे गये. यही नहीं नवाजुद्दीन सिद्दकी को भी बेस्ट सर्पोटिंग किरदार के लिए सम्मान मिला. इस बार स्क्रीन अवार्ड की यह खासियत रही कि इस बार पुरस्कारों के विजेताओं में कई नये चेहरे थे. सुपरसितारा कलाकार केवल पुरस्कार वितरण का हिस्सा बनते नजर आये. नये चेहरों में डॉली आहुवालिया, नवाजुद्दीन सिद्दकी, भावेश मंडालिया, उमेश शुक्ला समेत कई नये नामों की फेहरिस्त शामिल हुई. पान सिंह तोमर, विकी डोनर, बर्फी, ओह माइ गॉड और कहानी इन फिल्मों को सर्वाधिक पुरस्कार मिले. इन फिल्मों की सफलता दर्शाती है कि हिंदी सिनेमा जगत में भी अब नये विषयों को महत्व देने का सिलसिला शुरू हो चुका है. वे सारी फिल्में जो अलग कांसेप्ट और सोच के साथ दर्शकों के सामने आयीं विजयी रहीं. विद्या बालन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वह सर्वश्रेष्ठ हैं. पिछले साल कई अभिनेत्री प्रधान फिल्में आयीं. लेकिन विद्या सब पर हावी रहीं. गैंग्स आॅफ वासेपुर को भी सम्मान दिया गया. स्क्रीन अवार्ड के लगातार एसे चेहरे और नामों को सम्मानित किये जाने से यह स्पष्ट होता है कि यह पुरस्कार अब भी पारदर्शी पुरस्कार समारोह के रूप में लोगों के सामने आता है.

शुरुआत अच्छी है


अनुराग बसु ने फिल्म बर्फी में अपनी फिल्म के शुरुआत से पहले पिक्चर शुरू हो गयी बोल वाले एक गीत का प्रदर्शन किया था. इस गाने के बोल में आज का प्यार कैसा दो मिनट नूडल्स जैसा...जैसे शब्दों के बहाने प्यार की वास्तविक रूपरेखा प्रस्तुत की थी. रीमा कागती ने अपनी फिल्म तलाश में ओपनिंग सांग में मुस्कानें झूठी हैं...गीत का इस्तेमाल मुंबई के कई दृश्यों को दिखाते हुए की है. हाल ही में रिलीज हुई विशाल भारद्वाज की फिल्म मटरू की बिजली का मंडोला में विशाल ने न सिर्फ गाने का इस्तेमाल कास्ट और क्रू के क्रेडिट के लिए इस्तेमाल किया है, बल्कि विशाल ने धू्रमपान न करने के लिए एक छोटा लेकिन प्रभावशाली गीत भी फिल्माया है. (इन दिनों थियेटर में धू्रमपान के बारे में लगभग हर कलाकार अपनी आवाज में लोगों को सलाह दे रहे हैं) ऐसे में विशाल का यह अंदाज बेहतरीन है. चूंकि वह खुद संगीत की अच्छी समझ रखते हैं. सो, उन्होंने एक अच्छा तरीका अपनाया है. यही नहीं फिल्म के अंतराल में उन्होंने इंटरवल लिखने की बजाय हरियाणवी शब्द अध्धा का इस्तेमाल किया है. चूंकि पूरी की पूरी फिल्म हरिणानवी पृष्ठभूमि पर आधारित है. दरअसल, हिंदी सिनेमा में इन दिनों हर निर्देशक लगातार कुछ न कुछ नया और अलग गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं. न सिर्फ फिल्मों की कहानी में बल्कि प्रेजटेंशन में भी. इस फिल्म के प्रमोशन में लगातार विशाल ने एक शराब की बोतल का इस्तेमाल किया था. उनका कहना था कि फिल्म में इसकी अहम भूमिका है. और यह हकीकत भी है. इन दिनों निर्देशक हर तरह से खुद को अलग साबित करना चाहते हैं और यह सकारात्मक संकेत है, इससे दर्शकों को हर बार कुछ न कुछ नया देखने का मौका मिल रहा है. यह एक नयी और सार्थक शुरुआत है. इन्हें लगातार सराहना मिलती रहे.

प्रयोगात्मक निर्देशकों का दौर


Orginally published in prabhat khabar date 8jan2012
यशराज फिल्म्स ने हाल ही में दिबाकर बनर्जी से हाथ मिलाया है. तीन फिल्मों के इस अनुबंध में तय किया गया है कि  दिबाकर बनर्जी यशराज की तीन फिल्में निर्देशित करेंगे. दिबाकर बनर्जी अपनी तरह की फिल्मों के लिए जाने जाते रहे हैं. उन्होंने लव सेक्स धोखा, खोसला का घोसला और हाल ही में प्रदर्शित हुई फिल्म शांघाई का निर्देशन किया है. इनमें से कोई भी फिल्म यशराज बैनर की फिल्मों के स्वभाव से मेल नहीं खाती. लेकिन इसके बावजूद यशराज ने दिबाकर को अपनी टीम में शामिल किया है. इससे स्पष्ट है कि अब यशराज भी अपनी बनी बनाई छवि को तोड़ना चाहता है. यशराज की भी इच्छा है कि वह प्रयोगात्मक फिल्में करें. यही नहीं यशराज ने शेखर कपूर के साथ भी पानी फिल्म बनाने के लिए हामी भरी है. हिंदी सिनेमा जगत में यह उम्मीद की नयी किरण है कि घोर मसाला व डांस गाने वाली फील गुड फिल्में बनानेवाला प्रोडक् शन हाउस अचानक प्रयोगात्मक फिल्मों की तरफ रुख कर रहा है. यशराज ने पिता यश चोपड़ा की मृत्यु के बाद आदित्य चोपड़ा ने एक साथ कई फिल्मों की घोषणा की है. दरअसल, यशराज भी इस नये बयार को अच्छी तरह समझ रहा है कि वर्तमान में लीक से हटकर की गयी चीजें ही दर्शकों तक पहुंच सकती हैं. कर्मशियल सक्सेस की यह नयी कूंजी है. जिसे अपनाने में अब यशराज परहेज नहीं कर रहा. किसी दौर में अनुराग कश्यप की एक फिल्म से जुड़ने से मना कर दिया था यशराज ने. लेकिन अब वह उनके सरीके निर्देशकों को प्रोत्साहित कर रहा है. सिर्फ यशराज ही नहीं करन जौहर जैसे निर्माता भी अनुराग कश्यप के साथ फिल्म निर्माण करना चाहते हैं. स्पष्ट है कि निर्देशकों का दौर फिर से लौट रहा है, यही वक्त है जब प्रतिभाएं अपना कमाल दिखा दें. नयी सोच और हिम्मत वाली सोच का दौर लौट रहा है. सकारात्मक संकेत हैं

ग्रीक गॉड की उपाधि की सार्थकता



आज रितिक रोशन का जन्मदिन है. रितिक रोशन उन चुनिंदा सुपरसितारों में से हैं, जिन्हें रातोंरात कामयाबी मिली थी. फिल्म कहो न प्यार है, बतौर अभिनेता उनकी पहली फिल्म थी और इस फिल्म से उन्होंने खुद को साबित कर दिया था.इस फिल्म के बाद वे सुपरस्टार बने. हालांकि उनकी फिल्में इसके बाद लगातार असफल रहीं. लेकिन लोगों का विश्वास उन पर से नहीं हटा. रितिक रोशन भी इस बात से वाकिफ हो चुके थे. सो, उन्होंने भी फिल्मों के चयन में सर्तकता बरतनी शुरू हुई और धीरे धीरे फिल्म धूम, जोधा अकबर, गुजारिश जैसी फिल्मों से उन्होंने खुद को स्थापित कर दिया. रितिक रोशन के व्यक्तित्व की यह खासियत है कि वह न सिर्फ आकर्षक हैं बल्कि वे डांसिंग स्टार भी हैं. डांसिंग में पारंगत होने की वजह से ही लोग उन्हें ग्रीक गॉड मानते हैं. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में रितिक को सर्वश्रेष्ठ डांसर अभिनेता माना जाता है. अक्षय कुमार चाहते हैं कि उनके बच्चे रितिक से ही डांस सीखे. सलमान खान प्राय: अपनी बातों में इस बात का जिक्र करते हैं कि वह रितिक रोशन की तरह डांस सीखना और करना चाहते हैं. दरअसल, रितिक जब डांस करते हैं तो उनके शरीर के हर अंग इस बात के साक्षी होते हैं कि वे डांस को कितना एंजॉय कर रहे हंै. स्टार प्लस के एक रियलिटी शो जस्ट डांस में उन्होंने जज की भूमिका ंिंनभाई थी. उस वक्त किसी प्रेस कांफ्रेंस में भी मौका मिलते वे थिरकने लगते थे. इस शो की शूटिंग में तो शो के मेकर्स उनके परफेक् शन से तंग आ गये थे. चूंकि रितिक अपने डांसिंग मूव्स को लेकर कुछ ज्यादा ही कांसस हैं. रितिक का डांस के प्रति यह समर्पण यूं ही नहीं है, बल्कि वे वाकई समर्पित और अनुशासन प्रिय कलाकार हैं. शायद उनके पिता की बतौर अभिनेता असफलता ही उनके लिए सबसे बड़ी सीख है और वे अपनी जिंदगी में वे गलतियां या कमियां दोहराना नहीं चाहते. सो, वे मेहनत करते हैं.

खोते ख्वाब



हर दिन कुछ न कुछ  ख्वाब देखती हूँ 
कुछ अच्छे कुछ बुरे 
बंद आँखों में वे कहीं खो जाते हैं 
किसी कोने में 
लुका छिपी  खेलते ख्वाब 

जानकर भी बनती हूँ अनजान 
खुली आँखों से उन ख्वाबों के खोज में लग जाती हूँ 
कोने कोने में, जर्रे जर्रे में। 

मेरे जादूगर पापा


हाँ तुमसे ही कह रही हूँ मेरे जादूगर पापा
वह कौन सी जादू की  छड़ी है तुम्हारे पास
जो झट से तुम चलाते हो. 
पलक झपकाते ही हमारे सारे अरमान पूरी किये जाते हो
मेरे सचिन तेंदुलकर भी तुम, अमिताभ भी तुम
मेरे ऑल राउंडर पापा ,
 तुम प्यार की वो कौन सी बाण चलाते हो 

परेशानी ने तुम्हारा साथ न छोड़ा 
पर फिर भी तुम हमेशा कैसे मुस्कुरा पाते हो
बताओ न मेरे जादूगर पापा
तुम ते सब कैसे कर पाते हो

बचपन में जब भी बजती थी स्कूटर की घंटी 
हम सब डर जाते थे. कभी कभी तो हम तुम्हारी थप्पड़ भी खाते थे
लेकिन उस थप्पड़ में मिश्री सा स्वाद घुला है
तुम वो प्यार जताते हो. 
मेरे जादूगर पापा 
तुम ये सब कैसे कर पाते हो

हम तीन बेटियाँ हैं कितनी खास 
तुम्हे ही तो कराया ये एहसास 
अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो 
ये विश्वास जगाते हो
मेरे जादूगर पापा 
तुम ये सब कैसे कर पाते हो

हमने हमेशा किया है तंग
फिर भी तुम रहे हर दम संग
रिटायरमेंट के बाद भी 
बुरे हालात में भी हमारी झोली  खुशियों से भर जाते हो
मेरे जादूगर पापा 
तुम ये सब कैसे कर पाते हो

मेरे सुरक्षा कवच, मेरे सच्चे दोस्त
तुम कहाँ से वो ऊर्जा पाते हो. 
मुझे हमेशा राह दिखाने वाले
प्रकाश को तुम दूर तक फैलाते हो. 

काश ! तुम सा ही हो मेरा जीवनसाथी 
तुम्हे देख के मेरे पापा हर बार 
तुम मुझमे ऐसे ही खवाब जगाते हो 

बताओ न  मेरे जादूगर पापा तुम ये सब कैसे कर पाते हो


20130113

मेरी फिल्म मेकिंग को सभी पागलपंथी समझते हैं



‘नेमसेक’, ‘सलाम बॉम्बे’, ‘मानसून वेडिंग’ जैसी लोकप्रिय हिंदी फिल्में बना चुकी मीरा नायर अपनी नयी फिल्म ‘द रिलक्टेंट फंडामेनटलिस्ट’ को लेकर फिर से सुर्खियों में हैं. यह फिल्म अब तक भारत में रिलीज नहीं हुई है, लेकिन इफ्फी महोत्सव में फिल्म की स्क्रीनिंग की जा चुकी है. हाल में मीरा नायर मुंबई के एक लिटरेचर फेस्टिवल का हिस्सा बनीं, जहां उन्होंने अपने फिल्मी सफर पर विस्तार से बातचीत की.

मीरा नायर अपनी अलग सोच और अलग ट्रीटमेंट से बनायी गयी फिल्मों के लिए जानी जाती हैं. श्याम बेनेगल से लेकर गुलजार तक सभी मीरा की फिल्मों के कायल हैं. जल्द ही उनकी फिल्म ‘द रिलकटेंट फंडामेंटलिस्ट’ रिलीज होने वाली है. इस बार फिर मीरा ने एक बार फिर गंभीर मुद्दे की फिल्म चुनी है. इस विषय पर मीरा से हुई बातचीत के प्रमुख अंश..
मीरा, आप भारत बहुत कम आती हैं. अब से दो साल पहले भी आप इफ्फी गोवा में शामिल हुई थीं. जब ‘सलाम बॉम्बे’ की स्क्रीनिंग की गयी थी. भारत से दूरी की कोई खास वजह?
कोई खास वजह नहीं है, बल्कि मैं तो भारत को अपना दिल मानती हूं. तभी तो जब भी यहां से बुलावा मिलता है, मैं चली आती हूं. हां, यह जरूर है कि साल के चार महीने मैं कभी अफ्रीका में रहती हूं, कभी चार महीने यूएस में, तो कभी कहीं और रहती हूं. इस दौरान फिल्मों और इंस्टीट्यूट पर काम होता रहता है. लेकिन जब भी मुझे भारत आने का मौका मिलता है मैं जरूर आती हूं. आखिर भारत ही मेरा जन्मस्थान है.
अपनी नयी फिल्म ‘द रिलकटेंट..’ के बारे में बताएं?
हम सबके मन में हमेशा लाहौर या पाकिस्तान की यही छवि रहती है कि पाकिस्तान बुरा है. वहां के लोग अच्छे नहीं है. इस फिल्म से मैंने लोगों की इस धारणा को बदलने की कोशिश की है. एक पाकिस्तानी कैसे यूएस से उतना ही प्यार करता है, जैसे कोई अमेरीकी अपने संघर्ष को जीता और झेलता है. इसमें उन पहलुओं पर प्रकाश डालने की कोशिश की गयी है.
फिल्म एक उपन्यास पर आधारित है. किसी उपन्यास पर फिल्म बनाने में कितनी कठिनाइयां होती हैं?
मुझे लगता है कि फिल्म बनाना, खासतौर से फीचर फिल्म बनाना किसी भी फिल्मकार के लिए एक स्टोरी टेलिंग करने जैसा ही है. फिर चाहे आपकी कहानी कहीं से भी ली गयी हो. हां, यह जरूर है कि जब आप एडप्टेशन पर काम करते हैं, तो आपको इन बातों का ख्याल रखना पड़ता है कि उपन्यास का दिल खो न जाये. फिल्म बनाते वक्त पूरे उपन्यास से कहीं अधिक वक्त, किरदार, प्रीमाइसेज और नजरिये पर ध्यान देने की जरूरत होती है. वीडियो बनाना हमेशा कठिन काम होता है. आप यहां अचानक से न कुछ जोड़ सकते हैं, न ही मिटा सकते हैं.
हमने सुना आप ‘मॉनसून वेडिंग’ को री-लांच करेंगी.
सच कहूं मैं अपनी फिल्मों में या किसी की भी फिल्म में म्यूजिक की भूमिका को बेहद अहम मानती हूं. इसीलिए मैंने तय किया है कि मैं मॉनसून वेडिंग को कई गानों के साथ म्यूजिकल फिल्म के रूप में फिर से लाऊंगी. म्यूजिक तैयार करने की जिम्मेदारी विशाल भारद्वाज की है. विशाल ने कहा है कि वह ‘मटरू..’ का काम पूरा करते ही इसमें जुटेंगे.

मुझे लगा कि मैंने अपने कैरियर में अब तक म्यूजिक के क्षेत्र में कुछ अलग नहीं किया है. इसीलिए यह एक नया एक्सपेरिमेंट होगा. मेरे दोस्तों ने तो अभी से कहना भी शुरू कर दिया है कि वाह मीरा फिर से एक और पागलपन! दरअसल, मैं जब भी कोई प्रोजेक्ट शुरू करती हूं. मेरे दोस्त मुझे यही बोलते हैं कि यह मेरा पागलपन ही है. मेरे सारे प्रोजेक्ट आम नहीं होते और रिस्की तो होते ही हैं.
आज आप किसी भी निर्माता के साथ काम कर सकती हैं. फिर भी आप जिस तरह की फिल्में बनाती हैं, उसके लिए क्या आपको कभी बजट से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ता है?
एक नहीं, कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है. यह सोचियेगा भी मत कि मुझे फिल्म के बजट से जुड़ी परेशानी नहीं होती. सबसे पहले लोग यही पूछते हैं कि फिल्म का कमर्शियल आस्पैक्ट कितना है. दिक्कत आती है, तो मैं खुद ही प्रोड्यूस करती हूं या कुछ को फिल्म समझ में आती है, तो वह हिम्मत दिखाते हैं.
आज तक आपने ओड़िया सिनेमा के लिए कुछ भी नहीं किया? इच्छा नहीं हुई या कोई विषय जेहन में नहीं आया?
हां, यह सच है कि मैंने अब तक ओड़िया फिल्म जगत के लिए कुछ नहीं किया है, लेकिन 2-4 सालों में वहां के लिए कुछ-न-कुछ करूंगी. मुझे जानकारी मिलती रहती है कि वहां क्या हो रहा है. मैं जड़ से अलग नहीं. वहां के लिए कुछ अच्छा और अलग जरूर करना चाहूंगी.

20130108

जारी रहेगी चुलबुल पाण्डेय की चुलबुलाहट : सलमान खान


दबंग के ब्रांड बनने या उसकी अपार सफलता का गुरुर नहीं है उन्हें. वे इस बात पर भी गुमान नहीं करते कि वे इंडस्ट्री में वर्तमान में सबसे शक्तिशाली अभिनेता हैं. वे आज भी मानते हैं कि यही वह सलमान है जिसने फ्लॉप पर फ्लॉप भी दी है. और यही है जिसे आज सभी पसंद भी कर रहे हैं. फैन,फैमिली और फ्रेंड्स इन तीन एफ पर विश्वास करनेवाले बॉलीवुड के बिग बॉस सलमान खान का कहना है कि दबंग की कुंडली का क्या होना है यह तो 21 दिसंबर ही तय करेगा.

 सलमान और चुलबुल पांडे अब ब्रांड बन चुके हैं. इस पर आपका नजरिया?आप भी ऐसा मानते हैं.
कोई एक्सप्लानेशन नहीं है इसका है. ब्रांड बन चुका है नहीं बन चुका है. नहीं कह सकता. जब फिल्म फ्लॉप होती तो लोग कुछ और कहते. अब जबकि फिल्म चल चुकी है तो लोगों को इसको ब्रांड का नाम दे दिया है. एक फिल्म चल चुकी है. दूसरी रिलीज होनेवाली है.देखें क्या होता है.

क्या आपने कभी सोचा था कि दबंग को इतनी बड़ी कामयाबी मिलेगी.
जिस वक्त पहली दबंग बनाने चले थे हम. उस वक्त भी नेगेटिव पब्लिसिटी हुई थी. और आज भी हो रही है. इंडस्ट्री में इस बात को लेकर शोर शराबा था कि एक फिल्म बना रहे हैं दबंग जिसका मतलब कोई नहीं समझेगा. अनोखा और वियर्ड सा टाइटिल है. सब कह रहे थे कि रस्टीक रुरल बैकग्राउंड पर है. ग्रॉस है. एक पुलिस वाला है. मर जायेंगे. चुलबुल पांडे हैं. डूब जायेंगे. इंडस्ट्री के डूब जायेंगे. मेरे दोस्त यार कह रहे थे कि बर्बाद हो जाओगे.दबंग की स्क्रिप्ट घूम फिर चुकी थी. मुझे पता है कि तीन चार बड़े बड़े आॅफिस में घूम चुकी थी ये. लेकिन कोई बनाने को तैयार नहीं था. जब हमने बनानी शुरू की. तो सबने सोचा अरे ये क्या बनाने लग गये. लेकिन जब बनते बनते बन गयी. प्रोमोज आये. आॅडियंस को अच्छी लगी. दबंग अपनी एक कुंडली. अपनी एक किस्मत लेकर आयी थी. उस फिल्म के बाद जब ऐसी फिल्म जिसकी उम्मीद नहीं थी किसी को.इतनी बड़ी हिट हो गयी. पहला सीक्वल होगा. जिसमें मैं काम कर रहा हूं.

दबंग का सीक्वल बनना चाहिए. ऐसा क्यों लगा आपको? पहली फिल्म में हैप्पी एंडिंग तो हो चुकी थी.
(हंसते हुए)वो नो एंट्री के सीक्वल में वक्त लग रहा था तो सोचा दबंग की ही कर लूं. यह सच है कि वह दबंग कंप्लीट फिल्म थी. लेकिन इस फिल्म में भी आपको दबंग 2 पूरी कंप्लीट फिल्म नजर आयेगी. इसमें भी हमने कई बदलाव किये हैं. कई चीजें नयी सोची हैं. जैसे सोनाक्षी का जो किरदार है वह तो शादीशुदा है. अब इस फिल्म में क्या तो हमने दिखाया है कि फिल्म में वह प्रेगनेंट हैं और फिर उनसे चुलबुल पांडे का कैसा प्रेम है. वह भी बेहद प्यारा प्लॉट है. फिर विलेन को लेकर हमने खासतौर से सोचा है. चुलबुल पांडे का इसमें भी निराला अंदाज रहेगा तो झलकिया तो मिलेगी पहलेवाली की, लेकिन यह खुद में भी कंप्लीट फिल्म होगी. और यहां साथ ही मैं यह भी कहना चाहंूगा कि 21 दिसंबर को ही तय होगा कि हम अपने काम में कामयाब हुए कि नहीं. अगर यह दबंग बनी तो हम दबंग सीरिज की एक और फिल्म बनायेंगे और वह प्रीक्वल होगा दरअसल. उस फिल्म के लिए हमने पहले ही सोच रखा है कि हम दिखायेंगे कि ये चुलबुल पांडे जिसे लोग रॉबिनहुड मानते हैं. आया कैसे अस्तित्व में. उसके इतिहास पर जायेंगे. वह भी अपने आप में अनोखी कहानी होगी और मुझे लगता है कि दर्शकों को पसंद आयेगी ऐसी फिल्म. विदेशों में तो ऐसी खूब फिल्में बनती हैं न.और पसंद भी करते हैं इसको. सीक्वल भी कई तरह के होते हैं. एक होती है जेम्ड बांड सीरिज की फिल्म. मुन्ना भाई सीरिज जिसमें दोनों फिल्में अलग अलग है. लेकिन हमारे दबंग में हमने दिखाया है कि चुलबुल पांडे का ही किरदार में और क्या क्या हो सकता है. अब शादीशुदा चुलबुल पांडे कैसा है. पापा बनने की खुशी कैसी मिलती है. ये सब देखना पड़ा. इमोशनल कंटेंट पर काम किया. वरना, लोग सोचेंगे कि फिल्म में हीरोइन का क्या काम? हमने लेकिन हीरोइन को भी बोरिंग नहीं होने दिया है. एक रोमांटिक एंगल रखा है. गाने रखे हैं इससे चुलबुल पांडे का ही एक स्वभाव सामने आयेगा न कि अब वह पारिवारिक व्यक्ति के रूप में भी कैसा है. कैसे पत् नी से प्यार करता है. वगैरह वगैरह. लेकिन एक बात तय है कि इसमें भी चुलबुल की शरारत, उसकी चुलबुलाहट जारी रहेगी.

दबंग ने हिंदी फिल्मों को देसी अवतार में बदल दिया बना दिया?दबंग के बाद ही लगातार ऐसी ही कई फिल्में बन रही हैं और ये सिलसिला अब भी जारी है.
मैं मानता हूं कि हर दौर में सिनेमा बदलता है. अभी ये जॉनर चल रहा है तो कुछ और दिन चलेगा. फिर खुद बदल जायेगा. बहुत सारे लोगों ने दबंग के बारे में कहा था कि दबंग 70-80 दशक वाला जॉनर है. लेकिन यह वह जॉनर नहीं था. उस दौर में कोई करप्ट कॉप नहीं हुआ करता था कि वह कब हंस दे कैसे रियेक्ट करे, पता ही न चले. दरअसल, एक दौर में तो  सूरज बड़ाजात्या ने ही पारिवारिक फिल्मों को नया आयाम दिया फिर करन की फिल्में आयीं, फिर इसी तरह की कई फिल्में आयी. एक दौर था.जब दो पॉवरफुल फादर होते थे. उनके बच्चे होते थे. उनकी प्रेम कहानी होती थी. फिर  फिर उसके पहले एंग्रीमैन वाला दौर था जो मेरे फादर ने शुरू की... तो सिनेमा बार बार बदलता रहा है. इस किस्म की कई फिल्में बनी हैं.  ये जॉनर भी जल्दी खत्म हो जायेगा, क्योंकि बार बार आप एक चीज नहीं दिखा सकते और सिनेमा का तो काम ही है बदलना. आपने बेल्ट पकड़ कर डांस कर लिया, जेब में हाथ डाल कर डांस कर लिया. ये सबका भी एक दौर है. और अब ये भी खत्म हो जायेगा. एक् शन हो गया. किक मरवा लिया. टप्पा मरवा लिया. बाइशेप्स खेल लिये.ये सब हो चुका है. तो देखिए अब और कौन सा नया दौर आता है.

लेकिन दबंग को इतनी चौंकानेवाली सफलता मिलने का राज़?
पहली बार कोई ऐसा कैरेक्टर आया .आफ्टर लांग टाइम करप्पट कॉप आया.जो हंसेगा भी और लोगों को रुलायेगा भी. उस पर गांव का आदमी. आम लोगों ने तुरंत कनेक्ट कर लिया इससे. लोगों को अच्छा लगा. अपना सा. मैं हमेशा कहता हूं कि अगर दर्शक को कुछ भी पसंद आया तो समझिए आप हिट हैं. वरना, यही सलमान जिसके फ्लॉप्स की गिनती नहीं हो पा रही थी. इतने फ्लॉप दिये थे. सबका टाइम होता है. अभी दबंग हिट है. 21 दिसंबर के बाद इसकी डेस्टनी में क्या लिखा है. अरबाज ने कितना बखूबी काम किया है. सब पता चल जायेगा.

अरबाज पहली बार निर्देशन की पारी संभाल रहे हैं. कैसा रहा आपका अनुभव उनके साथ काम करने का?
अरबाज के साथ कई फिल्मों में काम भी किया है और मैं उससे बस एक ही साल बड़ा हूं तो हम दोनों साथ साथ ही ग्रो अप हुए हैं. सो, हम दोनों में कंफर्ट जोन रहा. भाई है तो कोई भी सलाह देने में यह सोचने की जरूरत नहीं पड़ती कि अरे कहीं उसको कुछ बुरा तो नहीं लग जायेगा. इगो तो हर्ट नहीं हो जायेगा. भाई अगर रिजेक्ट कर दे आइडिया तो बुरा नहीं लगता कि अरे रिजेक्ट कर दिया. लेकिन दूसरे निर्देशक के साथ काम करो तो उनका ध्यान रखना पड़ता है कि वह बुरा न मान जाये. सामनेवाले के चेहरे पर सिकन न पड़े इसका भी ख्याल रखना पड़ता है. लेकिन भाई है अगर किसी सलाह पर मजाक भी कर दिया तो बुरा नहीं लगता. और भाई है तो भाई के झगड़े भी क्रियेटिव लेवल पर फिल्म को अलग ही एंगल देते हैं. लेकिन अगर किसी और निर्देशक के साथ झगड़ा हो जाता है तो मीडिया में तो इश्यू बनता ही है. उनसे रिश्ते भी खराब हो जाते हैं. शराफत के दायरे में रहना पड़ता है. यहां लेकिन काफी कपड़े फटे हैं...( हंसते हुए)लेकिन दिस इज बेटरमेंट आॅफ द फिल्म. वैसे अरबाज ने भले ही दबंग निर्देशित नहीं की थी. लेकिन वह पूरी तरह से होल सोल था फिल्म का.उस वक्त भी. वह जानता है एटूजेड कि क्या चाहिए उसे इस फिल्म में. उसका टारगेट कौन है. क्या कमी है. क्या दोहराना है और क्या नहीं. वैसे एक बात यह भी कहना चाहूंगा कि अरबाज के लिए मैं भी प्रेशर में हूं क्योंकि उसे लग रहा है कि एक फिल्म बना दी हो गया काम. लेकिन उसे पता ही नहीं कि उसकी अग्निपरीक्षा तो अब शुरू हुई है. अब उसका काम निश्चित तौर पर पहले दबंग और अभिनव के काम से जोड़ा जायेगा. तूलना की जायेगी. तो अब उसकी नयी जर्नी की शुरुआत हुई है.

 आप दोनों की लड़ाई में अमूमन जीत किसकी होती है?
यह तो तय नहीं रहता. लेकिन जब ज्यादा लड़ाई बढ़ जाती है तो बात डैड तक पहुंचती है कि आप बताइए सही कौन है. किसका आइडिया अच्छा है तो फिर कभी डैड हम दोनों की बात मानते हैं तो कभी हम में से किसी एक की और कभी कभी वह अपनी एक अलग ही राय दे देते हैं कि ये करो ये अच्छा है. फिर हम दोनों भाई सोचने लग जाते हैं कि लड़ाई हम दोनों की थी. दो मत पर सहमत नहीं थे अब तीसरा मत भी आ गया. लेकिन इस पूरे प्रोसेस में मुझे मजा आता है कि हमारा परिवार किसी फिल्म में एक साथ इन्वॉल्व हुआ है.

और अगर व्यक्तिगत अनुभव की बात करें तो
भाई के रूप में तो उसे बचपन से देखा है. जानता हूं कि हममें से सबसे काबिल वही है. वह हमेशा अच्छे मार्क्स लाता था और हमें डांट मिलती थी. अब्बू को लगता था कि वह मुझे कहेंगे कि देखो अरबाज के कितने नंबर आते हैं और एक तुम हो तो मैं जलन से पढ़ने लगूंगा. लेकिन मैं इन बातों को कभी सीरियसली लेता ही नही था. मुझे कभी इस बात का कोई शिकवा नहीं रहा. अरबाज से कभी कंपीट करने की कोशिश ही नहीं की. भाई है वो मेरा. आगे बढ़ेगा तो मुझे तो खुशी ही होगी न. मुझे याद है. जब मेरी पहली फिल्म रिलीज होनेवाली थी वह कैसे सब दोस्तों को बताता कि जल्द ही सलमान की फिल्म रिलीज होनेवाली है. देखना. वह अब हीरो बन जायेगा. वैसे हमारे बड़े बड़े झगड़े भी हुए हैं. लेकिन वही सॉल्व भी हो गये हैं. सो, दोस्त जैसे हैं हम.

सलीम खान ने फिल्म की स्क्रिप्ट में कितनी मदद की?
जैसा कि मैंने आपको बताया कि डैड मदद तो करते ही हैं. अपनी बात रखते हैं. कई जगह हमने उनसे कहा कि ये अब नहीं होता तो वे आज की तरह सोच कर बताते. लेकिन घर में जब इतने बड़े लेखक हैं जिनसे सब सीखते हैं तो हम तो मदद लेंगे ही न. मदद क्या. यह उनका हक भी है और फर्ज भी कि वे हमें गाइड करते रहें. दबंग के स्क्रिप्ट में उतार चढ़ाव जिस हद तक हुए हैं. लेयर्स आये हैं. उसमें डैड ने काफी मदद की है.
सलमान, आज सिनेमा में आप सबसे पॉवरफुल माने जाते हैं. फैन्स के लिहाज से भी. बॉक्स आॅफिस के लिहाज से भी. इसके बावजूद क्या अब भी फिल्म की कामयाबी नाकामयाबी से फर्क पड़ता है.
बिल्कुल पड़ता है. दूर से देखने पर सबको सब कुछ अच्छा ही लगता है. लेकिन ऐसा होता नहीं है. लोगों को लगता है 100 करोड़ कमाया.200 करोड़ कमाया. लेकिन मैंने तो कभी एक साथ 200 करोड़ नहीं देखा. फिल्म बनाने में कितना खर्च होता है. प्रोडक् शन कॉस्ट के अलावा भी कितनी सारी चीजें होती हैं.लेकिन ये चीजें मैं न एक्सप्लेन कर सकता हूं और न ही पब्लिक समझेगी. लेकिन फिल्म नहीं चले तो दुख क्यों नहीं होगा. मेहनत करते हम. वक्त देते हैं. पैसे लगाते हैं उसमें. दुख होना तो बिल्कुल स्वभाविक है.
लेकिन सलमान मेनिया तो आपकी फिल्मों पर हावी है. आप जिस फिल्म में हैं. वहां हिट की गारंटी है.
मैं जब भी किसी की फिल्म के लिए हां बोलता हूं तो बस स्क्रिप्ट सुनते वक्त इसी बात का ख्याल रखता हूं कि जो पैसे लगा रहा है उसके पैसे वापस आ जायें और पब्लिक सिर पीट कर वापस न जाये. वह भी खुशी खुशी जाये. बाकी बॉक्स आॅफिस का कोई गणित मुझे समझ नहीं आता. हां, ये जरूर है कि मेरे फैन्स लॉयल हैं क्योंकि मैं भी लॉयल हूं उनके लिए. इस बात की गारंटी दे सकता हूं.

आप अपनी फिल्मों में संगीत को खास महत्व देते हैं?
हां, मेरा लगाव रहता है संगीत से मैं शॉकीन हूं. आप देखेंगे इस फिल्म में भी फेविकॉल बिल्कुल पहले दबंग से अलग है. वहां मुन्नी थी. यहां बेबो है. मेरे खास लगाव गाना तेरे मस्त दो नैन से है. लेकिन इस फिल्म का भी एक खास गाना है...नैनों से वह भी बेहतरीन रोमांटिक सांग है.  मुझे रोमांटिक गानों में फिल्माना और सुनना दोनों अच्छा लगता है. इसलिए फिल्म के गानों पर भी खास काम करता हूं और ध्यान देता हूं.
आपकी आनेवाली फिल्में?
किक, नो एंट्री, शेर खान.

खानदान आपकी पहचान नहीं बन सकता : तुलसी



फिल्म ‘वंस अपॉन अ टाइम’ के गीत ‘तुम जो आये जिंदगी..’ से उन्होंने सबको प्रभावित किया. अब वह सलमान खान की भी फेवरिट गायिका बन गयी हैं और राहत फतेह अली खान साहब की भी. तुलसी ने कम उम्र में ही खास पहचान बना ली है. गुलशन कुमार की यह बिटिया अपने खानदान की परंपरा को बखूबी आगे बढ़ा रही हैं. जल्द ही ‘दबंग 2’ के एक खास गाने में आप उनकी आवाज सुनेंगे.
फिल्मी घराने से ताल्लुक रखने के बाद भी तुलसी कुमार को अपने कैरियर की शुरुआत में लोगों के तानों का सामना करना पड़ा. मगर तुलसी ने लोगों की बेफिजूल की बातों पर ध्यान न देते हुए सिर्फ काम पर ध्यान दिया और आज आलम यह है कि वह संगीतकारों की ही नहीं, बल्कि अभिनेताओं की भी पसंदीदा गायिका बन चुकी हैं. इन दिनों रोमांटिक गीतों के लिए उन्हें विशेष रूप से मौके मिल रहे हैं. तुलसी खुश हैं कि उन्होंने कम उम्र में पहचान बना ली है. ‘हमको दीवाना कर गये’, ‘चुपके चुपके’ जैसी फिल्मों से अपने संगीत कैरियर की शुरुआत करनेवाली तुलसी अब इंडस्ट्री में अपनी खास पहचान बना चुकी हैं. पेश है, तुलसी से खास बातचीत..
बेपरवाह तुलसी
बकौल तुलसी, मुझे भी बाकी लोगों की तरह ही ये बातें सुनने को मिलती थीं कि मुझे काम आसानी से मिल जायेगा. मेरा परिवार संगीत निर्माता का रहा है, लेकिन मैं मानती हूं कि आज का वक्त टैलेंट का है. अगर आप अपने हुनर को साबित नहीं कर पाते हैं, तो लोग आपको कभी काम नहीं देंगे. खासतौर से संगीत के क्षेत्र में तो अगर फिट आवाज न हो, तो तुरंत आपको आउट कर दिया जायेगा. मुझे लगातार गाने के मौके मिल रहे हैं और अच्छे संगीतकारों के साथ काम करने का मौका भी मिल रहा है. अब मैं किसी की बातों की परवाह नहीं करती.
तुम जो आये ने बदली तसवीर
ऐसा नहीं था कि इससे पहले मैंने गाने नहीं गाये थे, लेकिन मुझे असली पहचान ‘वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई’ के गीत ‘तुम जो आये जिंदगी..’ से मिली. यह मेरा अपना भी काफी पसंदीदा गाना है. इसी गाने को सुन कर सलमान खान ने मुझे ‘बॉडीगार्ड’ का खास रोमांटिक सांग गाने का मौका दिया.
दबंग 2 का ‘सांसों से..’
फिल्म ‘रेडी’ के गीत ‘हमको प्यार हुआ..’ सलमान को पसंद आया था और इस बार ‘दबंग 2’ में उन्होंने मुझे ‘सांसों से..’ गाने का मौका दिया है. इसमें मैं सोनू निगम के साथ डुयेट कर रही हूं और साजिद वाजिद का संगीत है. ‘दबंग 2’ का यह एकमात्र रोमांटिक गाना है. मुझे उम्मीद है कि गीत के जैसे बोल हैं. वे लोगों को बेहद पसंद आयेंगे. इस गाने की रिकॉर्डिग के बाद खुद सलमान और अरबाज ने आकर मुझसे कहा कि मैंने बहुत अच्छा गाया है. सलमान को फिल्म का यह गाना सबसे ज्यादा पसंद है.
रोमांटिक गानों में फिट
मुझे लगता है कि मेरी आवाज रोमांटिक गानों के लिए बिल्कुल फिट बैठती है. मैं जिस तरह के गीत गाती हूं और मेरी जैसी आवाज है, वह रोमांटिक गानों के लिए बिल्कुल परफेक्ट है. इसलिए मुझे ऐसे मौके मिल रहे हैं. मुझे व्यक्तिगत रूप से रोमांटिक गाने सुनना पसंद है और मुझे लगता है कि यह सबसे कठिन, लेकिन बेहद इमोशनल जॉनर है. अगर आप गाने में अपने इमोशन के साथ गीत गाएंगे, तो आप खुद गाने में डूब जायेंगे. मैं इस बात से बेहद खुश हूं कि अब फिल्मों का दौर बदल रहा है. इसके बावजूद कई ऐसी फिल्में हैं, जिनके रोमांटिक गीत आपको हमेशा याद रहेंगे. ‘वंस अपॉन..’ का ‘तुम जो आये..’ उन गानों में से एक है.
सबको मिल रहे हैं मौके
हां, यह सच है कि अब पहले की तरह एक ही गायक को पूरी फिल्म में गाने का मौका नहीं मिलता. ऐसे में कई गायकों का नाम लोग जान भी नहीं पाते, लेकिन इसका एक दूसरा पहलू यह भी है कि नये लोगों को मौके मिल रहे हैं और वह लोग कमाल का काम कर रहे हैं. मैं मानती हूं कि जितने भी रियलिटी शोज हैं, उनसे अच्छे टैलेंट्स निकल रहे हैं. लोगों को हर तरह की प्रतिभाओं को देखने और सुनने का मौका मिल रहा है. जहां तक मैं अपनी बात कहूं तो मुझे लगता है कि मेरे गीत जितने भी अच्छे रहे हों, लोगों ने मुझे पहचाना है और वही मेरी उपलब्धि है. मुझे लगता है कि इस नये ट्रेंड की वजह से कई नये लोगों को मौके मिल रहे हैं. यही सही भी है. आखिर फिल्मों में प्लेबैक सिंगिंग करने का तो सबका सपना रहता ही है.
आनेवाली फिल्में
‘दबंग 2’ के बाद मैं ‘नौटंकी साला’, ‘यारियां’, ‘आइ लव न्यूयॉर्क’, ‘आशिकी 2’ और ‘जिला गाजियाबाद’ के गानों में भी आवाज दे रही हूं. इन फिल्मों में भी मुझे रोमांटिक गाने ही मिले हैं, जिन्हें गाकर मैं बहुत संतुष्ट हूं.
एक्टिंग का कोई इरादा नहीं
मुझे कई लोगों ने यह बात कही है कि मुझे एक्टिंग में कोशिश करनी चाहिए, लेकिन मैं अपने काम से बेहद खुश हूं और गायिकी पर ही फोकस करना चाहती हूं. खुद गायिकी अपने आप में एक बहुत बड़ी जिम्मेवारी है. इसमें काफी वक्त देना होना होता है, इसलिए मैं अपने कैरियर से खुश हूं.
एलबम भी पसंद किये गये
फिल्मों के अलावा मुझे एलबम के लिए गाना भी बेहद पसंद है. मेरा एलबम ‘लव हो जाये’ भी रोमांटिक गानों पर आधारित था और उसके गानों को लोगों ने बेहद पसंद किया था. साथ ही मैंने फिल्म ‘बिल्लू बारबर’ के लिए आयटम सांग ‘लव हिट हिट’ किया था. वह भी लोगों को काफी पसंद आया था. मैं गायिकी के साथ और भी कई नये प्रयोग करते रहना चाहती हूं.
मिला भाइयों का सपोर्ट
मैं खुशनसीब हूं कि मेरे भाइयों ने मुझे हमेशा सपोर्ट किया है. वे मुझे अच्छे गाने और हमेशा रियाज करने के लिए प्रेरित करते हैं. यही वजह है कि हमेशा से ही मेरा गायिकी की तरफ झुकाव रहा और मेरी रुचि भी इसमें रही.

एक्टिंग से भी कठिन है एंकरिंग : आयशा




‘वांटेड’ जैसी फिल्म में सलमान खान के साथ काम कर चुकीं आयशा टाकिया इन दिनों ‘सुरक्षेत्र’ में बतौर एंकर नजर आ रही हैं. एंकरिंग में यह उनका पहला मौका है. आयशा खुद को लकी मानती हैं कि उन्हें नये-नये अनुभव प्राप्त करने के मौके मिल रहे हैं.
फि लहाल आयशा टाकिया फिल्मों से विराम ले चुकी हैं, क्योंकि शादी के बाद वह अपनी शादीशुदा जिंदगी में व्यस्त हो चुकी थीं, लेकिन इस विराम को खत्म करते हुए उन्होंने टेलीविजन पर अपनी नयी पारी की शुरुआत ‘सुरक्षेत्र’ से की. इस शो में दर्शकों को कुछ और पसंद आये न आये, आयशा का काम उन्हें पसंद आ रहा है. शो के बारे में आयशा से हुई छोटी-सी बातचीत..
टीवी में आना अच्छा लगा
टेलीविजन फिल्मों से बिल्कुल अलग और टफ है, क्योंकि आपको यहां हर दिन न सिर्फ डेडलाइन के साथ काम करना होता है, बल्कि काफी मेहनत भी करनी होती है. सबकुछ रुटीन के साथ करना होता है. फिल्मों में आपको महीने के अनुसार काम करना होता है और आप हमेशा व्यस्त नहीं रहते. लेकिन टीवी में आप हमेशा व्यस्त रहते हैं, क्योंकि कई तरह के काम होते हैं. मेरे लिए टीवी का एक्सपीरियंस बिल्कुल अलग है, चूंकि मैंने पहले कभी टीवी के लिए काम नहीं किया, जब मुझे टीवी का ऑफर आया तो मैं उधेड़बुन में थी कि करूं या न करूं. फिर मुझे लगा कि नया चैलेंज होगा, तो मैंने हां कह दी.
एंकरिंग बेहद कठिन
पहले मैं खाली वक्त में टीवी पर रियलिटी शोज देखती थी. मुझे लगता था कि आसान काम है. सिर्फ सारे प्रतिभागियों को बुलाना ही तो है. कॉर्डिनेशन का तो काम है. लेकिन अब जब काम कर रही हूं तो लगता है कि यह काफी टफ है. यहां न सिर्फ प्रतिभागियों को बुलाना होता है, बल्कि उनका हौसला भी बढ़ाना पड़ता है.

यह भी ध्यान देना होता है कि कोई गलती न हो जाये. दो जज के बीच अगर गलतफहमियां हो जायें, तो उसे भी सुधारने का काम एंकर का ही होता है. साथ ही बोलने का लहजा, कपड़े सभी चीजों का ख्याल रखना होता है. जबकि एक्टिंग के वक्त सारी जिम्मेवारी निर्देशक की होती है. टीवी में आपको खुद को प्रूफ करना काफी कठिन होता है.
खुश हूं निर्णय से
मेरे कई दोस्तों ने मुझसे कहा कि टीवी में जाकर मैं गलती कर रही हूं. कई लोगों को ऐसा भी लगता है कि मुझे फिल्में नहीं मिल रही हैं, इसलिए मैं टीवी में आयी. मैं इस बारे में यही कहना चाहूंगी कि मुझे अभी भी फिल्में मिल रही हैं, लेकिन वैसी ही फिल्में जैसी मैंने की हैं. मैं अब खुद को दोहराना नहीं चाहती.

इसीलिए मैंने कुछ वक्त के लिए फिल्मों से ब्रेक लिया है. हां, मगर मेरी फिल्मों से कोई छुट्टी नहीं हुई. मुझे मौका मिला तो मैं दोबारा प्रभुदेवा और सलमान खान के साथ काम करना चाहूंगी. ‘वांटेड’ मेरे जीवन की अब तक की सबसे बेस्ट फिल्म रही है और आगे भी मैं ऐसी फिल्मों में काम करना चाहूंगी.
पसंदीदा गायक
मैं हमेशा से हिमेश रेशमिया और आतिफ दोनों की फैन रही हूं. उनके गाने मुझे बेहद पसंद आते हैं और ‘सुरक्षेत्र’ के स्टेज पर मुझे एक साथ आशाजी, रुना जी, आबिदा सभी लीजेंड के साथ काम करने, उनके साथ वक्त बिताने का मौका मिलता है. इस बात की काफी खुशी होती है. आशाजी हमेशा मेरी मुस्कान की तारीफ करती हैं, तो अच्छा लगता है. यह अनुभव वाकई अच्छा है

ताकि यादों में जिंदा रहे झेलम



गुलजार तब भी प्रासंगिक थे, आज भी हैं. उनकी शेरो शायरी और उनकी अदायगी की अदा पर युवा पीढ़ी आज भी फिदा है. हाल में उनके जीवन पर आधारित एक किताब दिल ढूंढ़ता है का विमोचन किया गया. नसीर मुन्नी कबीर द्वारा लिखी गयी इस किताब के विमोचन के दौरान गुलजार ने अपने जीवन और नगमों से जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से सुनाये.
गुलजार साहब इस बात से बेहद खुश थे कि आज भी दर्शक और श्रोता उन्हें सुनना पसंद करते हैं. शायद यही वजह है कि बहुत कम पब्लिक अपियेरेंस देनेवाले गुलजार साहब उस दिन दिल खोल कर बातचीत कर रहे थे.
गुलजार साहब, आप अब काफी कम कार्यक्र्मो में शिरकत करते हैं. कोई खास वजह?

नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है. मुझे नये लोगों से मिलना-जुलना पसंद है. खासतौर से युवाओं से, लेकिन चाहता हूं कि केवल वही बातें न करूं, जिन्हें मैं कई बार दोहरा चुका हूं. चाहता हूं कि अब कुछ नया हो. कुछ ऐसा काम, जिसे करने और कहने दोनों में मजा आये. वैसे, मैं हर साल ही जयपुर के लिटरेचर फेस्टिवल का हिस्सा बनता हूं. और भी कई राज्यों में जाता रहता हूं. जहां तहजीब जिंदा है, वहां मैं हूं और रहूंगा.

‘दिल ढूंढ़ता है’ के माध्यम से नसीर ने आपके जीवन के कौन से नये पहलू से अवगत कराया है? वह इसमें कितनी कामयाब हो पायी हैं?
ये तो आपको किताब पढ़ने के बाद ही पता चलेगा. वैसे, मुझे इस किताब की मेकिंग में काफी मजा आया, क्योंकि पहली बार मैंने नयी तकनीक सीखी. स्काइप के बारे में. बड़ा ही रोचक रहा यह सफर. मुन्नी विदेश में बैठ कर वहां से स्काइप के माध्यम से मुझसे बात किया करती थी. तो झूठ बोलने का तो सवाल ही नहीं उठता (हंसते हुए).

कुछ छुपाना भी चाहता तो स्क्रीन पर दिख जाता और फिर मुन्नी जिद्द पे अड़ जाती. स्पष्ट है कि कई नयी चीजों को इस किताब में शामिल करने की कोशिश की है. मैंने इस किताब में मुख्यत: अपने फिल्मी कैरियर के बारे में काफी चर्चा की है. मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं फिल्मों के लिए कुछ लिख पाऊंगा, लेकिन मैं जिनकी संगत में रहा, उन्होंने मुझसे गाने लिखवा लिये. मैं तो बिमल रॉय के साथ सहायक निर्देशक के रूप में था. शैलेन्द्र ‘बंदिनी’ फिल्म के गीत लिख रहे थे, लेकिन उन्होंने फिल्म का एक गीत ‘मोरा गोरा अंग’ मुझसे जबरन लिखवाया और फिर बस एक लत-सी लग गयी और कारवां बनता गया. मुझे याद है मैंने पंचम दा के लिए जब ‘मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है’ लिखा. उस वक्त पंचम ने यही कहा कि मतलब अब ‘लगेज’ और ‘चाभी’ यही गाने के बोल होंगे. कुछ भी लिख देते हो. हमलोग उस वक्त पंचम दा के घर पर ही बैठे थे. वहां सोफे की दूसरी ओर आशा ताई थी.

वो गाने के बोल ‘वो शाम लौटा दो’ गुनगुना रही थीं. पंचम ने कहा, फिर से गाओ, पंचम ने इस पर धुन बनानी शुरू की और फिर गीत बन गया. आज भी लोग इस गीत को पसंद करते हैं. इसके बाद से पंचम ने मेरा नाम ही चाभी रख दिया. मैं जब आता वे मजाकिया अंदाज में यही कहते कि आज क्या बोल लाये हो. अखबार या कुछ और.

आपकी तमन्ना थी कि आप ही ‘आनंद’ निर्देशित करें?
हां, यह मेरी चाहत थी. हुआ यूं था कि मैं इस फिल्म के बनने से पहले काफी दिनों तक ऋषिकेश मुखर्जी को असिस्ट कर चुका था. उन्होंने ही कहा था कि अब जो फिल्म तुम लिखोगे उसे तुम ही डायरेक्ट कर लेना. जब मैंने स्क्रिप्ट लिखने के बाद उन्हें सुनायी, तो उन्होंने कहा कि इस बार छोड़ दो, अगली बार तुम कोई और फिल्म डायरेक्ट कर लेना. ‘खामोशी’ के साथ भी ऐसा ही हुआ. स्क्रिप्ट सुनने के बाद मेरा नंबर ही नहीं. उसे असित सेन ने निर्देशित किया. बाद में ‘मेरे अपने’ से मुझे वह मौका मिला.

आपके नगमों पर कई बार विवाद भी होते रहे हैं? जैसे ‘हमने इन आंखों में देखी है’ गीत को लेकर हुआ था. ऐसा क्यों?
मुझे आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि आजतक किसी ने यह नहीं पूछा कि यह गाना एक महिला सिंगर कैसे गा सकती थी. लोगों को इस बात पर आपत्ति थी कि किसी की आंखों से महकती खुशबू कैसे आ सकती है, लेकिन किसी ने इसके पीछे की कहानी जानने की कोशिश ही नहीं की. दरअसल, ये गीत मैंने पुरुष आवाज के लिए लिखा था. लेकिन जब मैंने इसे हेमंत दा को सुनाया, तो उन्हें यह गीत बेहद पसंद आया. उनकी जिद थी कि इस गीत को लता ही गायेंगी. मैंने कई बार उन्हें समझाया कि ये गीत पुरुष की आवाज के लिए है, लेकिन वह नहीं माने. उन्होंने यह गीत लता से ही गवाया और मैं मानता हूं कि जहां कुछ सृजन होता है, पसंद-नापसंद का सिलसिला तो चलता ही रहता है.

आपने पंचम दा के साथ सबसे अधिक गीत लिखे. इसकी कोई खास वजह?

पंचम दा मेरे मेंटर हैं. मैंने जिन शब्दों को रचा, उन्होंने उसे आवाज दी. उनके साथ काम करने में बेहद मजा इसलिए आया, क्योंकि वे मेरे दोस्त बन गये थे. हम दोनों की खेल में बहुत दिलचस्पी थी. वक्त मिलने पर हम दोनों खूब खेल भी खेलते थे. वे मेरे लिखे गानों के साथ विजुलाइजेशन भी रखते थे. उनके कहने पर ही मैंने गीत ‘नदिया किनारा’ में ‘मांझी’ जोड़ा था. उनकी फिल्मों के लोकेशन और गाने के इस्तेमाल के मामले में समझ काफी अच्छी थी.

पंचम दा के बाद आपने सबसे अधिक काम विशाल भारद्वाज के साथ किया. यहां क्या खास वजह रही?

मुझे लगता है कि विशाल मेरा एक्सटेंशन है. उसकी फिल्मों और फिल्म के गानों को लेकर जो समझ है, वह औरों से बिलकुल अलग है. कम ही लोग उतनी अच्छी सोच रख पाते हैं. मैं उससे पहली बार दिल्ली में मिला था. तभी समझ गया था कि अगले दस सालों में वह हिंदी सिनेमा का कामयाब शख्स तो बनेगा ही, अगले 100 सालों तक राज भी करेगा. आज भी वह जो करता है, सबको पसंद आये-न-आये, मैं उसे हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित ही करता हूं. जनता हूं वह अलग है. अभी जब ‘मटरू की बिजली का मंडोला’ के नाम की बात आयी थी, हम में काफी बातचीत हुई थी. मैंने बोला यही नाम रखो. शीर्षक ही अलग होगा तो लोगों की दिलचस्पी बढ़ेगी. मुझे खुशी है कि आज भी विशाल जैसे निर्देशक हैं, जिनके साथ काम करने में मजा आता है. विशाल पढ़ता बहुत है. काफी समझ रखता है. इमोशनल है.
इसलिए अच्छी फिल्में बनाता है. विशाल के अलावा मुझे मणिरत्नम सर (मैं मनिरत्नम को सर ही कहता हूं) उनके साथ काम करने में बेहद मजा आता है. उन्होंने ही पहली बार मुझसे गाने लिखने पर गानों के सारे सीन डिस्क्रिप्शन भी मांगे थे. उनकी इस बात पर मैं फिदा हो गया था. मणि सर के साथ हमेशा नयी चीजें सीखता रहा हूं. हाल में उनका फोन आया तो कहा वो मुझे मिस कर रहे हैं. एक तमिल फिल्म बना रहे हैं (मजाकिया अंदाज में) मैंने कहा हिंदी रीमेक बनाइये मैं जुड़ जाता हूं. उनके साथ हंसी-मजाक का रिश्ता जुड़ चुका है.

आपकी कविताओं, कहानियों, नगमों में आपके पुराने शहर दीना का कई बार जिक्र हुआ. वहां की यादों का जिक्र रहा. फिर आप वहां जाते क्यों नहीं?
इसलिए नहीं जाता ताकि वह शहर वही पुरानी सड़कों, लोग, घर के साथ मेरी यादों में जिंदा रहे. इन यादों के सहारे ही तो उसे नगमों में बयां कर पाता हूं. वरना शहर तो सारे एक साथ बदले और बढ़े. अब जिस शहर को मैं छोड़ आया, वो वैसा न होगा. वहां भी नये लोग आ गये होंगे. नयी इमारतें बन गयी होंगी. फिर कैसे लिखूंगा. जब मैं मुंबई आया था. चार बंगले के पास रहता था. रात को गर्मी लगती थी, तो बाहर आकर सो जाता था. अब तो वहां की काया बदल चुकी है. अब वो मुंबई भी नहीं, तो वो झेलम वैसा ही कैसे होगा. वैसे भी मानता हूं कि आंखों को वीजा नहीं लगता, जब भी मन करता है आंखें बंद करके घूम आता हूं वहां. जैसा छोड़ आया था, चाहता हूं झेलम हमेशा वैसा ही रहे.
फिर से फिल्म निर्देशन की इच्छा नहीं होती?
मैंने कोई रिटायरमेंट तो नहीं ली है. मुमकिन होगा तो और काम करूंगा आगे. अभी से कुछ कह नहीं सकता

मानसिक क्षमता का वजन



सोनाक्षी सिन्हा ने तय किया है कि वह साजिद खान की फिल्म में आयटम  सिर्फ इसलिए करेगंगी क्योंकि वह लोगों को दिखाना चाहती हैं कि वह भी अन्य अभिनेत्रियों की आकर्षक हैं. उनका बढ़ता वजन उनके लिए बाधा नहीं. सीधे तौर पर कहें तो वह आलोचकों का मुंह बंद करना चाहती हैं.ऐश्वर्य राय बच्चन जिनकी खूबसूरती के सभी मुरीद थे. लेकिन मां बनने के बाद जब उनका वजन बढ़ा तो लोगों ने उनका कई तरह से उपहास बनाया. माखौल उड़ाया. विद्या बालन आज भी अपने बढ़ते वजन को लेकर आलोचनाएं सहती रहती हैं. दरअसल, अभिनेत्रियां इसी वजह से वे हर वक्त अपने शरीर को लेकर चिंतित रहती हैं. कभी बढ़ते वजन को लेकर तो कभी घटते वजन को लेकर. इन दिनों अनुष्का शर्मा अपनी लीड बॉडी की वजह से आलोचनाएं झेल रही हैं. दरअसल, हकीकत यही है कि हमें परदे पर हमेशा सबकुछ आकार में देखने की आदत है. हमारा सामाजिक ढांचा ही कुछ इसी तरह बनाया गया है. आमतौर पर भी लड़कों को मोटी लड़कियां पसंद नहीं आतीं. लड़कियों की शादी में वजन एक महत्वपूर्ण विषय होता है. जबकि बढ़ते वजन या घटने वजन से दुनिया की किसी भी महिला की मानसिक क्षमता का अनुमान नहीं लगाया जा सकता. हालांकि ऐसा सिर्फ भारत में ही नहीं, जहां बढ़ते वजन को लेकर महिलाओं को आलोचना का शिकार होना पड़ता है. हॉलीवुड की एक प्रतिष्ठित एंकर ने हाल ही में अपने फेसबुक स्टेटस पर इस बात का जिक्र किया कि किस तरह एक दर्शक ने उन्हें एक पत्र भेजा और कहा कि उन्हें यह शो नहीं करना चाहिए क्योंकि वह मोटी हैं और सुबह सुबह उनका चेहरा देख कर लोगों में फ्रेशनेस नहीं बल्कि आलसपन आता है. दरअसल, हमें जरूरत है कि हम महिलाओं की मानसिका क्षमता का वजन निहारे न कि उनके शारिरीक वजन का.

इंकार के बहाने



 सुधीर मिश्रा की फिल्म इंकार आॅफिस परिसर में महिलाओं के साथ होनेवाले सेक्सुअल हैरेशमेंट पर आधारित है. इस विषय पर गंभीरता से बननेवाली यह फिल्म होगी. सुधीर मिश्रा की सोच काबिलेतारीफ हैं कि उन्होंने अपने दोस्त व फिल्म के लेखक मनोज त्यागी द्वारा सुझाये गये इस विषय पर गंभीरता से सोचा. फिल्म दर्शकों को किस हद तक पसंद आयेगी या नहीं, इसका फैसला तो फिल्म की रिलीज पर होगा. लेकिन एक बात तय है कि कम से कम इसी फिल्म के बहाने इस विषय पर लोगों का ध्यान जायेगा. चूंकि यह बात दावे के साथ कही जा सकती है कि भारत में आधी आबादी को भी सेक्सुअल हैरेशमेंट और इससे जुड़े कानून या उसके प्रावधान के बारे में जानकारी होगी. इंकार की टीम इसलिए भी बधाई की पात्र है कि फिल्म के निर्माताओं ने हाल ही में मेट्रो शहरों में सर्वक्षेण कराया है. जिसके आंकड़ें बता रहे हैं कि एक प्रतिष्ठित आइटी कंपनी में सबसे अधिक इस तरह के मामले दर्ज हुए हैं. लेकिन ऐसे कई शहर और कंपनियां हैं, जहां इसके बारे में तो महिलाओं को जानकारी भी नहीं और अनजाने में अपने साथ हो रहे अत्याचार को बर्दाश्त कर रही है. दरअसल, भारत में महिलाओं के साथ यही  विडंबना है कि वे हर वक्त अपने पुरुष साथी या पति या पिता या भाई पर निर्भर रहती हैं. और यही कारण है कि वे केवल कागजों में दस्तखत करने तक सीमित रहती है. कितनी महिलाएं हैं, जिन्होंने अपना बीमा तो करवाया होगा. लेकिन इसके प्रावधान नहीं जानतीं. कई महिलाएं कंप्यूटर या तकनीकी चीजें जानना नहीं चाहतीं क्योंकि वह पुरुषों पर निर्भर होती हैं. यही वजह है कि सेक्सुअल हैरेशमेंट जैसे मुद्दों पर भी वह चुप्पी साध कर रहती हैं.ऐसे में सुधीर मिश्रा की फिल्म इंकार निश्चित तौर पर कुछ हद तक तो जरूर रास्ता दिखायेगी महिलाओं को यह फिल्म एक बार तो जरूर देखनी चाहिए.

गुमनाम प्रेम कहानियां



बीते दौर की अभिनेत्री सुलक्षणा पंडित इन दिनों काफी बीमार हैं. संजीव कुमार के साथ फिल्म उलझन से लोकप्रिय हुई यह अभिनेत्री इन दिनों ट्रॉमा में है. उनकी यस्ह हालत उनकी ढलती उम्र की वजह से नहीं, बल्कि प्यार में मिली बेवफाई की वजह से है. सुलक्षणा संजीव कुमार से बेहद प्यार करती थीं. संजीव कुमार भी उनसे प्यार करते थे. सबकुछ ठीक था. लेकिन हेमा मालिनी से उनके प्रेम की शुरुआत होने के बाद संजीव ने सुलक्षणा से दूरी बना ली. सुलक्षणा इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पायी. और वे उस वक्त से दुनिया से कट गयीं. कुछ इसी तरह राजेश खन्ना ने अंजू महेंद्रो से शादी का वादा करके तोड़ दिया. राजेश उस दौर में सुपरस्टार थे. अंजू से उनका लंबा समय तक प्रेम प्रसंग रहा. लेकिन बाद में उन्होंने डिंपल का हाथ थाम लिया. अंजू के लिए यह बड़ा सदमा था. लेकिन उन्होंने ताउम्र किसी और से शादी नहीं की. और अपनी जिंदगी को सामान्य करने की कोशिश की. लेकिन कहीं न कहीं आज भी उन्हें वह टीस है. राजेश खन्ना की मृत्यु पर उनकी आंखें साफ बता रही थी कि वह आज भी राजेश खन्ना से कितना प्यार करती थीं. हिंदी सिने जगत में ऐसी कई अधूरी या यूं कहें चोट खाई कहानियां हैं. जिनका कभी जिक्र नहीं होता. या कई प्रेमी अपनी इस चोट को जाहिर नहीं कर पाते. लेकिन हकीकत यही है कि वे दिल में काफी दर्द छुपा होता. लेकिन चूंकि वे सुपरसितारा अभिनेता या अभिनेत्री नहीं रहते. सो, उनकी प्रेम कहानियों में न तो लोगों को दिलचस्पी होती है और न ही वे प्रेम कहानियां सामने आ पाती हैं. प्रेम का अहम आधार तो विश्वास ही है. लेकिन ऐसी प्रेम कहानियों में हमेशा धोखा ही मिलता आता है. कसूरवार तो आराम की जिंदगी जीता है. लेकिन  प्रेम को समर्पण माननेवाली अभिनेत्रियां गुमनामी की जिंदगी जीने पर मजबूर हो जाती हैं.

चोली के पीछे से पल्लू के नीचे तक



इन दिनों पॉप सिंगर हनी सिंह को लेकर विवाद है. लोगों का मानना है कि वे अपने गानों में अश्लील शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं और लोगों में उत्तेजना फैला रहे हैं. सो, उन्हें गाने से रोकना चाहिए. हाल ही में हनी सिंह का जो गीत काफी लोकप्रिय हुआ है. उनमें वाकई कई अश्लील शब्द हैं. लेकिन हनी सिंह वह पहले शख्स नहीं, जिन्होंने अपने गीतों में द्विअर्थी शब्दों व अश्लील शब्दों का इस्तेमाल किया है. भारतीय सिनेमा में पिछले कई सालों से यह प्रचलन चला आ रहा है. लेकिन लोकप्रिय हो रहे ये सारे गाने लोगों को अत्यंत प्रिय और कर्णप्रिय लगते हैं. फिर ऐसे में केवल हनी सिंह पर तोहमत लगाना या उंगली उठाना कहां तक उचित है.गौर करें तो पिछले कई सालों से लगातार हिंदी फिल्मों के आयटम सांग में ऐसे उत्तेजक शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा. अश्लील शब्दों का लगातार इस्तेमाल किया जा रहा है. फिर चाहे वह हाल ही में रिलीज हुई फिल्म दबंग के आयटम सांग हों या पल्लू के नीचे छुपा कर रखा है हो. फिल्म खलनायक के गीत चोली के पीछे से अब यह दौर पल्लू के नीचे तक आ पहुंचा है. लेकिन लोग उसे न केवल पूरे परिवार के साथ सुन रहे हैं. बल्कि उनकी तरफ लोगों का ध्यान भी नहीं गया है. शायद यह आज की तकनीक का कमाल है कि संगीत इतना लाउड होता है कि हम शब्दों को समझ ही नहीं पाते कि वे क्या शब्द हैं. फास्ट फूड के दौर में शायद हनी सिंह भी बच जाते. अगर फिलवक्त गैंगरेप का मामला इतना गर्म न होता. वरना, आज किसे इतनी फिक्र है, जो इस पर गौर करें. केवल हिंदी फिल्में ही नहीं. भोजपुरी गानों में आधे दर्जन गाने अश्लील ही होते हैं. लेकिन न तो इस पर कोई उंगली उठाई जा रही है और न ही लोगों का इस तरह पर ध्यान जा रहा है. भोजपुरी सिनेमा अश्लीलता के साथ भलिभांति फल फूल रहा है. ऐसे में केवल किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाना उचित नहीं

कहां है दिल्ली का दिल



उस दिन अभिनेत्री जया बच्चन की फूट फूट कर रो पड़ी थीं. उनकी आवाज में दर्द था. वह दिल्ली में महिला के साथ हुए दुष्कर्म और फिर उसकी मौत पर आहत थीं. बार बार वे यही बात दोहरा रही थीं कि ये किसी के साथ भी हो सकता है. हम सभी तो लड़कियां ही हैं. अभिनेत्री शबाना आजिमी ने अपनी अगुवाई में इस बलात्कार और दुष्कर्मियों के खिलाफ मोर्चा निकाला. एक आवाज उठायी. बॉलीवुड की कई हस्तियां इसमें शामिल हुईं. विशेष कर महिला फिल्मकार, महिला अभिनेत्रियां. चूंकि इस बार कहीं न कहीं हर किसी को इस घटना ने झकझोर कर रख दिया है. हर किसी के मन में यही सवाल है. खासतौर से हर महिला के मन में कि यह हादसा कभी भी किसी के साथ भी हो सकता है. खुद अभिनेत्री चित्रागंदा सिंह जिन्होंने दिल्ली में अपना लंबा समय व्यतीत किया है. वे खुद स्वीकारती हैं कि जब वह कॉलेज के दिनों में बस से जाया करती थीं, किस तरह उन्हें इव टिजिंग का बार बार शिकार होना पड़ता था. किस तरह वे देर रात बाहर जाने से डरती थीं. अभिनेत्री ईशा गुप्ता बताती हैं कि उनके पिता इस कदर दिल्ली के माहौल से भयभीत रहते हैं कि वे चाहते ही नहीं कि ईशा या उनकी बेटियां दिल्ली में रहें और अगर वह दिल्ली में रहती भी हैं तो उन्हें सक्त हिदायत है कि वह गाड़ी लेकर ड्राइवर के साथ जायें और ड्राइवर के साथ ही वापस आयें. स्पष्ट है कि बड़े परिवार की लड़कियां  और उनके परिवार के सदस्य सारी सुख सुविधाओं और सुरक्षा के कड़े इंतजाम के बाद दिल्ली के माहौल को लेकर भयभीत रहते हैं तो आम महिला सुरक्षा को लेकर कैसे इत्तिमिनान हों. मुंबई में देर रात लोकल ट्रेन, आम सड़कों पर पुलिस प्रशासन तैनात रहते हैं. लेकिन बाकी राज्यों में ऐसा क्यों संभव नहीं. शायद यही वजह है कि पूरे भारत में मुंबई में हर महिला खुद को सबसे अधिक महफूज मानती है

हिंदी सिनेमा में 13 नंबरी



आज से नये साल की शुरुआत. शुरुआत का आज पहला दिन. 2012 एक इतिहास और 2013 एक नयी शुरुआत के रूप में, आगाज के रूप लोगों के साथ होगा. हिंदी सिने जगत के यह 13 नंबर हमेशा खास रहेगा. चूंकि भारत में सिनेमा की शुरुआत ही 1913 में हुई थी. इस लिहाज से 13 अंक हिंदी सिनेमा के लिए सबसे अहम है. दादा साहेब फाल्के ने राजा हरिशचंद्र से 1913 में सिनेमा की नींव रखी. इन 100 सालों में हिंदी सिनेमा में कई बदलाव किये. कई करवटें ली हैं. 2013 का आगमन उन सभी बदलावों का साक्षी रहेगा. और नये प्रयोगों और नयी सोच के साथ और नये आगाजों के उड़ान को भरने की कोशिश करेगा. आनेवाले सालों में रिलीज होनेवाली सभी फिल्मों की सूचि तैयार हो चुकी है. 2013 में विशेष कर दर्शकों को मटरू की बिजली का मंडोला, लूटेरा, राकेश ओम प्रकाश मेहरा की फिल्म भाग मिल्खा भाग जैसी फिल्मों का मुख्य रूप से इंतजार रहेगा. पिछले साल की तूलना में इस वर्ष कई नये चेहरे तैयारी में हैं. धर्मेंद्र के बेटे करन देओल अस्टिेंट डायरेक्टर के रूप में अपनी पहली पारी की शुरुआत करेंगे. तो कपूर खानदान के अरमान जैन अभिनय की पारी की शुरुआत करने जा रहे हैं. कई नये स्टार पुत्र खुद को कसौटी पर उतारने की कोशिश करेंगे. राकेश रोशन अपनी बहुप्रतिक्षित फिल्म कृष 3 की तैयारियों में जुटे हैं. उम्मीदन फिल्म दर्शकों को पसंद आयेगी. हिंदी सिने जगत में हिंदी सिनेमा के 100वें साल पूरे होने के उपलक्ष्य में कई बड़े कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं. जिनमें अनुराग कश्यप, जोया अख्तर और दिबाकर बनर्जी द्वारा बनाई जा रही शॉट फिल्में मुख्य आकर्षण का केंद्र रहेंगी. नये कलाकार, नये निर्देशक नयी उत्साह के साथ फिर से राज करने की कोशिश करेंगे. अभिनेत्रियों के लिए 2012 का साल खास रहा है. उम्मीदन यह भी उनके नाम रहे.

2012 के गहने व ग्रहण



आज 2012 का आखिरी दिन है.यह साल विवादों के साथ साथ इस लिहाज से भी काफी चर्चित रहा, चूंकि कई लोगों का मानना था कि 2012 में दुनिया का अंत हो जायेगा. बहरहाल, 2012 हिंदी सिनेमा जगत के लिए बेहद खास रहा. चूंकि इस वर्ष दर्शक और ट्रेड पंडित दोनों चौंके हैं. पिछले कई वर्षों की अपेक्षा इस वर्ष वैसी कई फिल्में जिनसे ट्रेड पंडितों या समीक्षकों को सफल होने की नामात्र की गुंजाईश थी. वे फिल्म न सिर्फ हिट रहीं, बल्कि सबने 100 करोड़ का आंकड़ा भी पार किया. 2012 में कई बेहतरीन फिल्में भी आयीं. नयी सोच, नये विषयों के साथ. नये निर्देशक इस वर्ष भले अधिक लोकप्रिय नहीं रहे. लेकिन पुराने नामों ने अपना स्थापित नाम बना लिया. तिग्मांशु धूलिया जो पिछले कई सालों से प्रयासरत थे. उन्हें पान सिंह तोमर ने खास पहचान दिला दी. सुजोय घोष ने कहानी से सफलता की कहानी लिखी. शूजीत सरकार ने विकी डोनर जैसी फिल्में दी. तिग्मांशु, शूजीत, सुजोय तीनों ही पुराने नाम हैं. लेकिन इन्हें असली पहचान इसी वर्ष मिली. इंगलिश विंगलिश से श्रीदेवी का लौटना और अलग विषय के चयन  के साथ दर्शकों को लुभाना इस वर्ष की खास उपलब्धि रहेगी.समीक्षकों ने जिन फिल्मों की धज्जियां उड़ायीं. वे सारी फिल्में कामयाब रहीं. फिर चाहे वह राउड़ी राठौड़ हो, सन आॅफ सरदार हो. खिलाड़ी 786 हो. इस साल 2012 का एक खास प्रकोप इंडस्ट्री पर शायद यह हुआ कि कई अच्छे दोस्त दुश्मन बन बैठे. आदित्य चोपड़ा और काजोल की दूरी का कारण बनीं अजय की फिल्म सन आॅफ सरदार. तो दूसरी तरफ फराह और अक्षय के बीच में भी जोकर जैसी फिल्म रही. करीना कपूर और विद्या ने अपनी विवादित जीवन के साथ नयी शुरुआत की. इंडस्ट्री को अर्जुन कपूर, आलिया और आयुष्मान जैसे नये सितारें मिले.

परोपकार ही पाश्याताप



आज सलमान अपने जीवन के 47वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं. उनका फिल्मी करियर फिलवक्त सबसे शीर्ष पर है. लेकिन जीवन की दो बड़ी गलतियां अब भी उनका पीछा नहीं छोड़ रहीं. शराब के नशे में गाड़ी चलाते हुए उन्होंने अपनी गाड़ी से एक जान ले ली थी. तो वही हम साथ साथ हैं की शूटिंग के दौरान चिंकारा के शिकार कर उन्होंने अपने सिर पर मुसीबत ले ली थी. जिस दौर में सलमान इन दो बड़े हादसों के शिकार हुए थे. उस वक्त उनका फिल्मी करियर भी डमाडोल था. लेकिन आज वे सबसे सफल अभिनेता हैं. हालांकि आज भी उनके फैन फॉलोइंग में कोई कमी नहीं आयी. लेकिन जो सलमान को अभिनेता नहीं मानते या सलमान की आलोचनाओं में लगे रहते हैं, उनका मानना है कि सलमान ने चूंकि ये दो बड़ी गलतियां की हैं. इसलिए वह एक नेक दिल बंदे हो ही नहीं सकते.यह हकीकत है कि कभी कभी जीवन में कुछ गलतियां ऐसी हो जाती हैं, जिसकी कोई भरपाई नहीं हो सकती. सलमान ने भी की है वैसी गलतियां. वे छोटी नहीं हैं. इसलिए अनदेखी भी नहीं की जा सकतीं. लेकिन सलमान के पूरे व्यक्तित्व को सिर्फ इन्हीं गलतियों पर ताउम्र आंकना भी उचित नहीं. सलमान शायद जब भी अकेले होते होंगे तो उन्हें महसूस होता होगा कि उन्होंने क्या किया? वे शायद किसी ने बोले बिना भी लगातार जरूरतमंदों की मदद करते हैं तो सिर्फ इसलिए कि कहीं वे अपनी गलती की कुछ भरपाई कर पायें.  शायद उनका परोपकार ही उनका पाश्याताप है. वे गुनहगार हैं. आईना उन्हें बार बार बताता होगा. लेकिन सलमान परोपकारी भी हैं. यह भूला नहीं जा सकता. अब भी मनीषा कोईराला की सपोर्ट में सबसे पहला हाथ उन्होंने ही बढ़ाया है. सरबजीत से लेकर कई मामलों में वे आगे आते हैं. उन्हें क्रूरर, निदर्यी की संज्ञा तो हरगिज नहीं दी जानी चाहिए.

एक अभिनेता की ऐसी भी कहानी



अनुराग कश्यप ने हाल ही में द लास्ट एक्ट नामक एक फिल्म रिलीज की. अनुराग की इस फिल्म के 12 निर्देशक हैं. और 12 शहर की कहानी है. लेकिन विषय एक है. फिल्म की शुरुआत और जिस आधार पर फिल्म की रफ्तार बढ़ रही थी यह फिल्म किसी सस्पेंस थ्रीलर जॉनर की ही फिल्म है. ऐसा अनुमान था. लेकिन फिल्म के अंत ने किसी सस्पेंस थ्रीलर फिल्म की तरह ही राज खोला और सामने थी एक अभिनेता की कहानी. किसी थियेटर से जुड़े एक ऐसे स्पॉट ब्वॉय की ये कहानी एक थियेटर से जुड़े, मन में एक्टर बनने का ख्वाब पालनेवाले एक ऐसे शख्स की कहानी. जो हर हाल में अभिनेता बनना चाहता है. लेकिन उसे मौके नहीं मिलते. तो वह खुद अपने लिए अपने तरीके से एक्टिंग की पाठशाला खोल लेता है और जिंदगी की वास्तविकता को खुद से अनुभव करता है. यह फिल्म एक थियेटर आर्टिस्ट के मर्म को भी खूबसूरती से बयां करती है. हिंदी फिल्मों में ऐसी फिल्में कम बनती हैं, जहां थियेटर या नाटक से जुड़े व्यक्ति की पीड़ा या उसके अंर्तद्वंद्व की कहानी प्रस्तुत हो सके. पुलिस का आम लोगों के प्रति नजरिया. चीजों को देखने का तरीका और फिर किसी की मौत पर शोर शराबा और उसकी तहकीकात करने के तरीके पर भी प्रकाश डाला गया है.  फिल्म की एक खासियत यह भी रही कि फिल्म में 12 शहरों के व्यवहार, उस शहर के मिजाज और विशेषत: उस शहर के पुलिस प्रशासन के मिजाज की स्थिति को खूबसूरती से दर्शाया गया है. फिल्म की कहानी आपको पूरी तरह इंगेज और इनवॉल्व करती है. एक अभिनेता की जिंदगी पर इससे पहले भी कई कहानियां बनी हैं. लेकिन द लास्ट एक्ट एक अलग ही रूप दिखाती है. भेड़चाड़ से दूर अनुराग ने एक अच्छी सोच को हरी झंडी दिखाई है. हिंदी सिनेमा को ऐसी स्वतंत्र और मौलिक फिल्मों की सख्त जरूरत है.

दान की नीयत



अभिनेत्री सोनम कपूर बॉलीवुड में फैशन को लेकर काफी सजग रहनेवाली अभिनेत्री मानी जाती हैं. जाहिर है. उनके वार्डरॉब में दुनिया के सर्वाधिक बड़े ब्रांड के कपड़े व फैशनेबल चीजें होंगी ही. हाल ही में उनकी इस बात की खूब चर्चा हुई कि सोनम ने अपने कई नये कपड़े, जो उन्होंने कभी पहने भी नहीं थे उसमें गरीब बच्चों को दान किया है. सोनम की मम्मी ने उन्हें समझाया भी कि वे अपने नये और महंगे कपड़े क्यों दे रही हैं. लेकिन उन्होंने किसी की एक न मानी. इस बात को लेकर लगातार पब्लिसिटी बटोरने में कायम रहीं. लोगों ने इस बात को तवज्जो दी कि सोनम ने अपने नये कपड़े दान में दिये. कुछ दिनों पहले ही सोशल नेटवर्किंग साइट पर आर्टिस्ट विधा सौम्या ने दो पंक्तियों में एक बेहद संवेदनशील बात की थी, कि जो खाना हमारे लिए बासी है वह नौकरों के लिए ताजा क्यों? कैसे? दरअसल, हकीकत यही है कि हम दान को दया क्यों मान लेते हैं. कई वर्षों पहले जब सुनामी आया था. बिहार के कई इलाकों में बाढ़ के दौरान बाढ़ पीड़ितों को मदद पहुंचाई जा रही थी. लेकिन उन्हें कपड़ों के रूप में लोगों ने अपने फटे पुराने कपड़े भेजे थे. फिल्म ओह माइ गॉड में परेश रावल ने एक दृश्य में बेहतरीन रूप से इसकी व्याख्या की है. एक सीन में परेश कोर्ट में दर्शाते हैं कि हम किस तरह किसी मंदिर में जाकर एक पत्थर पर दूध की नदियां बहा देते हैं. वह दूध बह कर किसी नदी में जाते हैं या नाले में जाते हैं और बर्बाद होते हैं. लेकिन किसी भिखारी को एक वक्त हम भोजन नहीं करा पाते. हम अगर भोजन देते भी हैं तो जूठन या बासी. दरअसल, दान किसी चीज से नहीं, बल्कि आपकी नीयत से व्यतीत होती है. और यह नीयत कम ही लोगों में होती है. बॉलीवुड में कई हस्तियां हैं, जो दान करने में समर्थ हैं. लेकिन दान के नीयत में असमर्थ हैं.

स्फूर्ति का टैबलेट और अनिल



अभिनेता अनिल कपूर आज 53 वर्ष के हो चुके हैं. अगर दूसरे नजरिये से देखें तो किसी सरकारी नौकरी में रिटारटमेंट की उम्र जो कि 60 निर्धारित की गयी है. उसके बेहद करीब. लेकिन चूंकि वे बॉलीवुड हस्ती हैं. तो रिटायरमेंट जैसी किसी प्रणाली पर बात करना बेबूनियाद होगा. लेकिन उम्र और अनिल कपूर की स्फ्रूर्ति के आधार पर तो कम से कम यह बात कहीं ही जा सकती है कि उन्होंने खुद को कहीं से भी अनफिट नहीं रखा है. अनिल कपूर आज भी हिंदी सिने जगत में सबसे फिट और स्फूर्ति के साथ नजर आनेवाले अभिनेताओं में से एक हैं. उनके समकक्ष के लगभग सभी अभिनेताओं ने जहां फिल्मों से विराम लेने के बाद कभी सेहत की फिक्र नहीं की. अनिल कपूर उन अभिनेताओं में से एक हैं जो अब भी अपनी फिटनेस को लेकर सजग रहते हैं. आज भी वे फिट रहने के लिए जब कार में बैठते हैं तो एसी आॅन नहीं करते, कई बार और स्वेटर पहन कर बैठते हैं ताकि उन्हें पसीना हो और वह वसा ने एकत्रित कर सकें. उनकी सफलता का मूलमंत्र भी शायद यही है. चूंकि वे खुद फिट रहते हैं तो वे एक साथ कई प्रोजेक्ट पर साथ काम करते हैं, सोनम अनिल के बेटी हैं. लेकिन जब ये दोनों किसी भी कार्यक्रम में शिरकत करते हैं. अनजान कभी अनुमान नहीं लगा सकता कि अनिल सोनम के पिता हैं. दरअसल, उन्होंने अपनी जिंदगी में कभी आलस्य को हावी नहीं होने दिया. प्राय: अमिताभ बच्चन की बढ़ती उम्र के साथ उनके बढ़ते चार्म पर चर्चा होती है. लेकिन अनिल कपूर की भी अनदेखी नहीं की जा सकती. यह नहीं भूला जा सकता कि अनिल कपूर ने ही कभी अमिताभ बच्चन की बादशाहत खत्म की थी. उनकी बाद की दौर की फिल्में भले ही कॉर्मिशियल रही हों. लेकिन उन्होंने अपने अभिनय से सबको लुभाया था. उन्होंने हाल ही में अपना स्टूडियो भी मुंबई में शुरू कर दिया है.

दबंग पर दाग न लगने की दावं



मशहूर लेखक सलीम खान अपने तीनों बेटों में अरबाज खान को सबसे काबिल बेटे मानते हैं. इसकी खास वजह यह रही है कि अरबाज खान बचपन से बेहद शांत और पढ़ाई में हमेशा अव्वल आनेवाले बच्चों में से एक थे. तीनों भाइयों में सबसे अनुशासित और माता पिता की बातों का ध्यान रखनेवाले भी अरबाज ही थे. वही दूसरी तरफ बड़े बेटे सलमान खान की पढ़ाई को लेकर सलीम खान हमेशा ही चिंतित रहते थे. छोटे बेटे सोहेल खान लाड़ प्यार में पले हैं. सो, उनकी सारी उम्मीदें हमेशा ही अरबाज से रही हैं. भले ही सलमान आज सुपरस्टार हैं. लेकिन पिता के सबसे करीब आज भी अरबाज खान ही हैं. अरबाज द्वारा निर्देशित पहली फिल्म दबंग 2 आज रिलीज हो रही है और आज ही अरबाज की यह अग्निपरीक्षा होगी. या यूं कह लें कि एक कामयाब स्क्रिप्ट राइटर के बेटे की अग्निपरीक्षा. चूंकि यह हिंदी सिनेमा के इतिहास की रीत रही है कि यहां उन बच्चों को हमेशा अपने फिल्मी खानदान में पहले से स्थापित परिवार के किसी भी सदस्य के काम से जरूर तूलना की जाती है. सो, निश्चित तौर पर अरबाज भी इससे अछूते नहीं रहेंगे. अगर फिल्म हिट रही तो भले ही सारा क्रेडिट सलमान को मिले. लेकिन अगर फिल्म नाकामयाब रही तो अरबाज के साथ साथ अरबाज के पिता सलीम खान पर भी प्रश्नचिन्ह लगाया जायेगा कि एक प्रसिद्ध फिल्म लेखक के बेटे ने बुरी फिल्म बनायी. अरबाज ने बतौर अभिनेता भले ही परदे के सामने काम दरार से शुरू किया हो. लेकिन अरबाज ने महेश भट्ट जैसे निर्देशकों को अस्टिट किया है. सो, उनके काम को या उनकी प्रतिभा को भी कम आंकना उचित नहीं. वे जिस पारिवारिक माहौल में पले हैं. वे जानते हैं कि उन पर एक साथ कितने लोगों की मर्यादा का सवाल है. ऐसे में दबंग 2 से उनकी कोशिश यही रहेगी कि दबंग2 पर उनकी वजह से दाग न लगे.

बेपरदा होते पोस्टर्स



अभिनव कश्यप की बहुचर्चित फिल्म बेशरम का फर्स्ट लुक जारी कर दिया गया है. जारी किये गये पोस्टर में इस बात की भी सूचना थी कि फिल्म की शूटिंग जारी किये गये पोस्टर वाले दिन से शुरू हो रही है. यशराज फिल्म्स की रणवीर सिंह व अर्जुन कपूर अभिनीत फिल्म गुंडे के फर्स्ट लुक पोस्टर में इस बात की जानकारी दी गयी कि शूटिंग शुरू हो चुकी है. कुछ दिनों पहले साजिद खान ने अपनी फिल्म हिम्मतवाला का भी पोस्टर जिस दिन लांच किया. उस दिन इस बात की घोषणा की कि अभी फिल्म की शूटिंग शुरू होने में वक्त है. दरअसल, हिंदी सिनेमा में इन दिनों फिल्मों की मार्केटिंग इस कदर फिल्म मेकिंग पर हावी है कि फिल्म की शूटिंग शुरू होने से पहले. या यूं कहें कि फिल्म के विषय फिल्मकार के जेहन में आने से पहले सार्वजनिक रूप से उसका शोर शराबा शुरू हो जाता है. पहले जहां निर्देशकों और निर्माताओं की कोशिश होती थी कि वे फिल्म के पोस्टर, उनके नाम को गुप्त रखें. अब निर्माता या प्रोडक् शन कंपनी इस कदर तेज रफ्तार में है कि वे शूटिंग से पहले पोस्टर रिलीज कर दे रहे हैं. जबकि दादा साहेब फाल्के ने लिखा है कि किसी भी फिल्म का पोस्टर पूरी फिल्म का चेहरा होता है और वह चेहरा तभी तैयार होता है. जब पूरी फिल्म बन कर तैयार हो जाये. पुराने दौर में निर्देशक पोस्टर बनाने की तैयारी सबसे अंत में करते थे. राजकपूर मानते थे कि पोस्टर सिनेमा के विषय के मूड के अनुसार ही होना चाहिए. लेकिन आज दौर या तो रफ्तार में है या फिर उल्टे समीकरण पर चल रहा है.यहां फिल्म की शूटिंग से पहले फिल्म का पोस्टर जारी कर दिया जा रहा है. यह दर्शाता है कि वर्तमान में फिल्मकार भी अपने विषय से अधिक दिखावे में विश्वास करते हैं और धीरे धीरे यह ट्रेंड और बढ़ेगा. प्रतियोगिता की होड़ में फिल्म का दिल कहीं खो सा गया है.

जवां हैं गुलजार के नगमें



हाल ही में मुंबई में आयोजित एक लिटरेचर महोत्सव में गुलजार साहब से मुलाकात हुई. अमूमन गुलजार साहब कम ही कार्यक्रमों का हिस्सा बनते हैं. लेकिन इस कार्यक्रम में गुलजार ने पूरा वक्त दिया. महोत्सव के दौरान वे प्रमुखता से सारे अलग अलग तरह के आयोजनों का हिस्सा बने. सबसे पहले उन्होंने केजरीवाल पर आधारित पैनल डिस्कशन का न सिर्फ हिस्सा बने. बल्कि प्रमुखता से आम आदमी की परेशानी पर अपनी बात रखी. गुलजार मानते हैं कि अन्ना का आंदोलन उनकी नजर में सफल हमेशा इसलिए रहेगा, क्योंकि यह अरसे बाद हुआ था जब किसी आंदोलन में नौजवानों ने प्रमुखता से हिस्सा लिया था. इसके बाद गुलजार मंटो पर आयोजित कार्यक्रम जिसके मुख्य वक्ता प्रसून जोशी और जावेद अख्तर थे. उसके भी हिस्से बने. गुलजार ने मंटो के जीवन से संबंधित कई पहलुओं पर प्रकाश डाला. उन्होंने बताया कि किस तरह मंटो पांच शब्दों में भी अपनी पूरी बात कह जाते थे. इस सभा में बैठे जितने दर्शक थे. वे सभी गुलजार की बातों पर बार बार तालियां बजा रहे थे. दरअसल, गुलजार साहब उन हस्तियों में से एक हैं, जो स्वयं भले ही उम्रदराज हो गये हों.लेकिन उनकी रचनाएं और उनके बोलने का अंदाज आज भी जवां है. शायद यही वजह है कि गुलजार को चाहने वालों में युवाओं की संख्या भी काफी है. इसी महोत्सव में गुलजार की किताब दिल ढूंढता है का लोकार्पण भी हुआ. इस महोत्सव में किसी ने गुलजार साहब से जानना चाहा कि अब वह पाकिस्तान क्यों नहीं जाते, क्या अपने देश की याद नहीं आती. उन्होंने इस सवाल का सटीक जवाब अपने अंदाज में यह दिया कि वे चाहते हैं कि वे जिस पाकिस्तान जिस लाहौर को छोड़ कर आये थे, उनकी यादें वैसी ही रहे. वे यादें ही उनके लिए लिखने की प्रेरणा है और वे उन्हें धूमिल नहीं करना चाहते. स्पष्ट है कि गुलजार आज भी प्रासंगिक हैं

लाख टका मेरो मोल



अभिनेत्री अनुष्का शर्मा ने हाल ही में एक मीडियाकर्मी से बदतमीजी से उसके सारे सवालों का जवाब देते हुए दर्शाने की कोशिश की कि उन्हें अगर अच्छे निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिल रहा है तो इसलिए क्योंकि वे काबिल हैं. साथ ही उन्होंने रुखे स्वर में कहा कि उन्हें किसी अन्य अभिनेत्रियों से जलने या उनका काम छीनने की जरूरत ही नहीं.  निस्संदेह अनुष्का इन दिनों इंडस्ट्री के बेहतरीन निर्देशकों की च्वाइस बन गयी हैं. लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं कि वे अपना लहजा ही भूल जायें. अनुष्का शायद वे दिन भूल गयी हैं, जब वे इम्तियाज अली के आॅफिस के चक्कर काट-काट कर थक गयी थीं. लेकिन उन्हें काम नहीं मिला. शायद वह यह भी भूल रही हैं कि इतिहास गवाह है. यह वही इंडस्ट्री है, जहां एक से बढ़ कर प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों को भी टैलेंट के बावजूद अपनी रुखी बोली की वजह से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. अभिनेता विवेक ओबरॉय बेहतरीन अभिनेता होने के बावजूद केवल अपनी बचकानी हरकतों व इसी तरह स्टारी नखरें दिखाने वजह से इंडस्ट्री की नजर में गिरते चले गये. दरअसल, हकीकत यही है कि यहां वे ही टिक सकते हैं. जो संयम रखना जानते हों. जिनमें धैर्य रख कर अपनी बुराईयां सुनने और झेलने की ताकत हो. अभिनेत्री विद्या बालन भी एक बुरे फेज से गुजरीं. लेकिन उन्होंने संयम रखते हुए मृदभाषी होकर अपना रास्ता बनाया और काम से सबको जवाब दिया. शायद यह हकीकत है कि हर कोई इसी वजह से विद्या बालन नहीं बन सकता. सोनाक्षी मानती हैं कि आलोचनाओं का जवाब है काम. वे काम से सबका मुंह बंद करना चाहती हैं. अनुष्का यह बड़बोलापन उनके लिए परेशानी का सबब न बन जाये, क्योंकि कबीर सभी जानते हैं कि अगर आपका मोल लाख टके का है तो खुद से इसका ढिंढोरा पिटने की जरूरत नहीं.

औपचारिकता बनता विवाह



अभिनेत्री 14 दिसंबर को परिणय सूत्र में बंध गयीं. बॉलीवुड की टॉप एक्ट्रेस होने के बावजूद विद्या ने अपनी शादी सादगी से की. उन्होंने बिना किसी ताम-झाम के अपने व सिद्धार्थ के परिवार के बीच शादी की. यहां तक कि उनकी शादी में बॉलीवुड की कोई भी हस्ती शामिल नहीं थी. वर्तमान में बॉलीवुड में ऐसी सादगी वाली शादी विरले ही देखने को मिलती है. विद्या ने मेहंदी की रस्म पर भी न सिर्फ पारंपरिक जोड़ा पहना था, बल्कि हाथों में सामान्य सी मेहंदी ही लगाई थी. शादी की सारी रस्में भी एक मंदिर में संपन्न हुई. विद्या चाहतीं तो वह अपनी शादी का जश्न भव्य तरीके से कर सकती थीं. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. इसलिए नहीं कि वह जश्न में विश्वास नहीं करतीं. बल्कि इसलिए क्योंकि वे शादी की खुशी को वाकई अपने परिवारवालों के साथ ही बांटना चाहती थी. यह उनकी सोच है. लेकिन दुनियावालों की नजर में बॉलीवुड की ऐसी फीकी शादी शोभा नहीं देती, चूंकि सेलिब्रिटी का मतलब ही सेलिब्रेशन है. यही वजह है कि लोग विद्या की ऐसी शादी से अचंभित हैं. दूसरी तरफ कपूर खानदान की बेटी करीना ने भी हाल ही में सैफ अली खान से शादी की तो वे भी बेहद औपचारिक तरीके से. उनके हाथों में भी न तो मेहंदी थी. न ही कई रस्में हुईं. दरअसल, हकीकत यही है कि फिल्म जगत में अब शादी फिल्मी नहीं रहीं. शादी अब खुशियां सेलिब्रेट करने का नहीं बल्कि औपचारिका भर पूरी करने की एक रस्म बन चुकी है. जिसे अभिनेत्रियां बिना किसी ताम झाम या दिखावे की पूरी करना चाहती हैं. एक दौर था जब दिलीप कुमार की शादी में इतना भव्य आयोजन किया गया था जिसमें हिंदी सिनेमा की सभी हस्तियां आधी हस्तियां सायरा बानो की तरफ से तो आधी हस्तियों ने दिलीप कुमार की तरफ से शिरकत की थी. प्राण इस जश्न का हिस्सा बनने के लिए दूसरे की टिकट पर सफर करके लौटे थे.

जड़ से कटते फिल्मकार



 हाल ही में मुंबई में आयोजित एक साहित्यिक महोत्सव में फिल्ममेकर मीरा नायर आयी थीं. मीरा नायर की पहली फिल्म सलाम बांबे थी. इस फिल्म से ही मीरा ने खुद को स्वतंत्र फिल्मकार के रूप में स्थापित कर दिया था. इसके बाद वे लगातार मानसून वेडिंग व कई फिल्मों से विश्व स्तर पर फिल्में बनाने में कामयाब रही हैं और स्थापित नाम बन चुकी हैं. मीरा ओड़िशा के राउरकेला से हैं. इसी महोत्सव में राउरकेला से आये एक मीडिया रिपोर्टर ने मीरा से एक सवाल किया कि वह उड़िया सिनेमा जगत के लिए क्या कर रही हैं. क्या वह वहां के लिए फिल्में बनायेंगी या फिर उनकी कोई योजना है इस जगत के लिए. उनका जवाब था कि हां वे कुछ तो करेंगी. लेकिन तीन चार सालों के बाद. इससे पहले जब वह श्याम बेनेगल से बात कर रही थीं तो बार बार राउरकेला में बिताये अपने बचपन और उनकी यादों की बात कर रही थीं और यह भी जताने की कोशिश कर रही थीं कि उन्हें वहां से कितना प्यार है. लेकिन बात जब फिल्म जगत के लिए कुछ योगदान की आयी तो उन्होंने तीन चार साल का हवाला देते हुए कहा कि वे कुछ न कुछ जरूर करेंगी. दरअसल, वर्तमान के फिल्मकार अपने शहर या अपने प्रदेश को लेकर सिनेमा बनाने के बारे में न तो सोच रखते हैं और न ही इच्छा. इसकी एक बड़ी वजह यह जरूर है कि उन्हें राज्य सरकार से बहुत मदद नहीं मिलती. लेकिन इसका एक पहलू यह भी हो सकता है कि अगर मीरा नायर जैसे बड़े नाम दिल से इच्छा करें और कुछ करना चाहें तो राज्य सरकार उनकी बात जरूर सुनेंगे. यह बात सिर्फ मीरा पर नहीं बल्कि बिहार, झारखंड के कई फिल्मकारों पर भी लागू होती है. आज भी कोलकाता के फिल्मकार बांग्ला फिल्म बनाना अपनी जिम्मेदारी समझते हैं. मराठी फिल्मों का भी विकास हो रहा है.लेकिन झारखंड बिहार ओड़िशा के फिल्मकार जमीन से कटते जा रहे हैं.

खान हिट हैं क्योंकि फिट हैं



ेसलमान- शाहरुख और आमिर पिछले 20 सालों से इंडस्ट्री पर राज कर रहे हैं. आज भी दर्शक इनके दीवाने हैं.  लेकिन आज भी वे पुराने नहीं लगते.दर्शकों को उनकी फिल्मों का इंतजार रहता है. सलमान की दबंगई से सभी वाकिफ हैं और शाहरुख खान ने जब तक हैं जान से फिर से साबित कर दिया है कि उनकी तरह स्क्रीन पर कोई रोमांस नहीं कर सकता. इन दिनों किसी भी प्रेस वार्ता या मीडिया गैदरिंग में इस बात को लेकर काफी चर्चा होती है कि आखिर क्या वजह है कि ये आज भी कायम हैं. जबकि पुराने दौर में कोई भी कलाकार लगभग11-12 सालों तक ही लोकप्रिय रहा है. फिर उन कलाकारों ने या तो फिल्में करनी कम कर दीं, या फिर वे हीरो के रूप में अनफिट हो गये.यह सवाल इन दिनों लगभग हर कलाकार से पूछा भी जा रहा है कि आपकी नजर में तीनों खान आज भी हिट हैं, आपका क्या नजरिया है. इस पर सबसे बेहतरीन और सटीक जवाब अब तक रानी मुखर्जी ने दिया है कि भारत में दर्शक आज भी अपने हीरो को सबसे पहले फिट देखना चाहते हैं. चार्मिंग देखना चाहते हैं. और इन तीनों खानों ने उम्र बढ़ने के साथ साथ अपनी फिटनेस को न सिर्फ बरकरार रखा है. बल्कि वे इसके लिए मेहनत करते रहते हैं. वे जवां दिखते हैं और यही वजह है कि दर्शक उनसे आकर्षित होते हैं. रानी की यह बात कई फिल्म आलोचकों को बड़बोली लग सकती है. लेकिन हकीकत यही है कि हिंदी सिनेमा में आज भी अभिनेता का फिट दिखना अत्यंत आवश्यक है. खुद लीजेंडरी प्राण साहब मानते हैं कि एक कलाकार की पहली जरूरत है कि वह फिट दिखे. प्राण साहब शुरुआती दौर से अब तक अपनी फिटनेस का ख्याल रखते हैं. जबकि उस दौर के कई अभिनेताओं ने कुछ सालों के बाद अपने शरीर का ख्याल नहीं रखा और वह धीरे धीरे आउट होते चले गये. जबकि जो फिट है वही हिट है.

12-12-12 अफवाहों से बेपरवाह



पिछले लगभग एक वर्ष से सोशल नेटवर्किंग समेत दुनिया के तमाम अखबार व समाचार चैनलों में लगातार 12-12-12 के दिन विश्व की तबाही की बात दोहरायी जा रही है. कहीं लोगों ने इसे वाकई काफी गंभीरता से लिया तो कहीं इसे लेकर कई तरह के मजाक भी हुए. लेकिन इससे सबसे बेफिक्र अगर कोई नजर आया है तो वह है भारतीय सिनेमा जगत. इस दिन से जुड़े अफवाहों से बेपरवाह होकर सिनेमा जगत ने न सिर्फ अगले साल रिलीज होनेवाली कई फिल्मों की घोषणा की है, बल्कि हिंदी सिनेमा के 100 साल पूरे होने की खुशी में जश्न का भी ऐलान किया है. इस क्रम में अनुराग कश्यप ने 12 निर्देशकों से साथ बनी एक  ँप्रयोगात्मक फिल्म द लास्ट एक्ट की घोषणा की है. तमिल सिनेमा के लोकप्रिय सुपरस्टार रजनीकांत न सिर्फ अपना जन्मदिन धूमधाम से मना रहे हैं, बल्कि उनकी बेटी सौंदर्य पिता के साथ एक फिल्म की घोषणा भी कर रही हंै. हिंदी सिनेमा जगत में आनेवाले सालों में कुछ बेहतरीन फिल्मों की घोषणा हुई है, जिनमें आशुतोष ग्वारिकर की पीरियड फिल्म की चर्चा है. दरअसल, यह हकीकत है कि निर्देशक हमेशा दूरदर्शी होता है. वह कल में जीता है. राकेश रोशन ने एक बार अपनी बातचीत में कहा था कि एक फिल्मकार के लिए किसी विषय को लेकर फिल्म बनाना इसलिए भी कठिन होता है क्योंकि एक फिल्म बनने में कई साल लग जाते हैं और यह जरूरी नहीं कि वह जिस विषय को लेकर फिल्म बनाने की शुरुआत कर रहा हो. वह विषय प्रासंगिक ही हो. इसलिए एक निर्देशक को बहुत दूर की सोच रखनी चाहिए. वाकई, अगर ऐसा न होता तो शायद राजकपूर ने कई सालों पहले मेरा नाम जोकर जो आज के दौर में प्रासंगिक है न बना दिया होता. और भी ऐसी कई फिल्में हैं, जो उस दौर में कामयाब नहीं हुईं लेकिन बाद के दौर में कामयाब रही. सिनेमा हमेशा सकारात्मक सोचता है