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20140910

डांस और एक्टिंग है मेरा जुनून : अनेरी

ेस्टार प्लस के शो निशा और उसके कजन्स में निशा का किरदार निभा रहीं अनेरी इस बात से खुश हैं कि उनके शो को काफी पसंद किया जा रहा है.
अनेरी, क्या अभिनेत्री बनने का सपना आपने हमेशा से देखा था.
जी हां, मैं मुंबई में पैदा हुई और पली बढ़ी एक खांटी गुजराती लड़की हूं, जो घूमने और खाने पीने की शौकीन है. अभिनय मेरे लिए एक खूबसूरत सपना था, जो इत्तेफाकन पूरा हुआ. मैं हमेशा खुद को लेकर कैमरों के लेंस के सामने पोज देने वाली कल्पनाएं किया करती थीं. लेकिन मैंने इसके लिए कोई कोशिश नहीं की थी. फिर एक खूबसूरत दिन एक कास्टिंग डायरेक्टर ने सोशल मीडिया पर मेरी तसवीरें देख कर मेरी तसवीरें देख कर मुझे स्क्रीन टेस्ट के लिए बुलाया, मैं जब तक समझ पाती कि क्या हो रहा है, तब तक यह रोल मेरी झोली में आ चुका था.तब से जिंदगी मेरे लिए परियों की कहानी की तरह हो गयी है, क्योंकि मैं हर रोज अपने सपने को जी रही हूं. मैं दिन भर शूट में व्यस्त हूं और इस बात की मुझे बहुत खुशी है. बल्कि जब मैं किसी खाली दिन घर पर होती हूं मुझे काम पर जाने की इच्छा होने लगती है.
निशा और उसके कजिंस किस तरह अन्य शोज से अलग है?
निशा और उसके कजिंस युवाओं पर आधारित हल्के फुल्के अंदाज वाला रियलिस्टिक शे है, जो मेलोड्रेमेटिक नहीं है. यह पहला संयुक्त परिवार आधारित शो है, जो पूरी तरह से युवाओं, उनके रिश्तों, उनकी परेशानियों और उनकी शैतानियों पर आधारित होगा. कजिन्स से आपका खून का रिश्ता होता है. लेकिन साथ ही वे आपके हमेशा साथ देनेवाले दोस्त होते हैं, जिनसे आप अपने बचपन की यादें बांटते हैं और जिनके साथ हंसते खेलते बड़े होते हैं, यही रिश्ता शो में खासतौर पर रेखांकित किया गया है.
आप किरदार से किस तरह रिलेट करती हैं. कोई प्रशिक्षण या तैयारी?
यह भूमिका मेरे लिए एक सपने की तरह है, क्योंकि असल जिंदगी में मैं बिल्कुल उसी की तरह हूं. मेरे सभी दोस्त मुझे टॉम ब्वॉय कहते हैं. निशा की ही तरह मैं उनकी हर जरूरत में उनके साथ खड़ी होती हूं. इन सबके बावजूद टॉम ब्वॉय जैसे इस रोल के लिए मुझे अपनी बॉडी लैंग्वेज, आवाज में उतार चढ़ाव और संवाद अदायगी पर मेहनत करनी पड़ी. सबसे कठिन फैसला था इस भूमिका के लिए अपने लंबे बालों को कटवाना. लेकिन मुझे पूरी तरह से किरदार में रम जाना पड़ा.
सेट पर आप किसके नजदीक हैं?
मैं अपने आॅनस्क्रीन कजिस हेली और मेहरजान के काफी करीब हूं. मेरी उनसे सबसे अच्छी बनती है. वे मेरा बच्चों की तरह ध्यान रखते हैं और हर परेशानी में मेरे साथ होते हैं. मेहरजान किसी भी चीज पर बात करके मेरा मूडा बना सकती है और हेली मुझे पास्ता खिला कर मेरा दिन बना देती है.
असल जिंदगी में आपका अपने कजिन्स से किस तरह का रिश्ता है?
मैं असल जिंदगी में भी अपने कजिन्स के काफी करीब हूं. मेरी जिंदगी में उनकी खास जगह है. वे मेरे पहले साथी, खेल के पहले दोस्त, दुश्मन और बदमाशियों में साझेदार हैं. हम सभी त्योहारों में साथ मिलकर धमाचौकड़ी मचाते हैं.
अभिनय के अलावा और क्या शौक हैं?
मुझे डांस करना अच्छा लगता है. मैंने भरतनाटयम का औपचारिक प्रशिक्षण भी लिया है और शामक डाबर से भी डांस सीखा है. डांसिंग मेरा जुनून और मुझे मौका मिला तो किसी डांस रियलिटी शो में भाग लेना चाहूंगी.

बचपन मे मैं भी पायलेट बनना चाहती थी : टयूलिप जोशी


टयूलिप जोशी ने फिल्मों से शुरुआत की थी. लेकिन इन दिनों वह टीवी पर अपने नये शो एयरलाइन्स को लेकर चर्चे में हैं. वे बेहद खुश हैं कि उन्हें टीवी पर अलग तरह के किरदार निभाने का मौका मिला है. 

पायलट ही बनना था
दरअसल, मैं बचपन से ही पायलट बनना चाहती थी. और इसलिए मेैंने कॉलेज में साइंस विषय का चुनाव किया था. लेकिन वह सपना तो पूरा नहीं हो पाया. हां, मगर खुश हूं कि इसी बहाने मुझे पायलट बनाने का मौका मिला. इस शो के माध्यम से ही सही मैं पायलट की जिंदगी जी रही हूं और पायलट की जिंदगी को करीबी से देख रही हूं.
शो के बारे में
दिल्ली  की पृष्ठभूमि में यह फ्लाइट आॅफिसर अनन्या रावत की कहानी है, जो आधुनिक और ग्लैमरस एवियेशन इंडस्ट्री में लिंगभेद और हतोत्साहित करने वाले माहौल में अपना सफर करती है. अपनी पहचान स्थापित करने की चाहत में अनन्या को पता चलता है कि इस इंडस्ट्री में उसे सिर्फ पुरुष मानसिकता से ही नहीं लड़ना, बल्कि और भी बहुत सी बाधाएं हैं, जो उसे मजबूत बनाती हैं. यह शो भारतीय युवा महिलाओं के सपनों और महत्वकांक्षाओं की कहानी कहती है.
शो में किरदार
इस शो में मेरा किरदार अनन्या रावत का है, जो वीमन पायलट है. इस शो के माध्यम से हम दर्शकों को एक पायलट की जिंदगी के उतार चढ़ाव और उनके जोखिम भरे कामों के बारे में भी दिखाना चाहते हैं. यह लोगों की सोच है कि महिलाएं अच्छी ड्राइवर नहीं होतीं और इसलिए पायलट भी ज्यादा महिलाएं नहीं बन पातीं, हम इस शो के माध्यम से इस सोच को पूरी तरह से बदलना चाहते हैं. और वैसी लड़कियों को प्रेरणा देना चाहते हैं जो इस क्षेत्र में आना चाहती हों.
रिसर्च
इस शो के लिए मैंने सारे रिसर्च किये हैं. हमारी पूरी टीम में एक पायलट को शूटिंग के वक्त साथ रखा गया था. ताकि वह हमें सही तरीका बताएं और ताकि कोई भी टेक्नीकल गलतियां न हो. इंटरनेट पर मैंने काफी रिसर्च किया है और पूरी टीम ने इसमें मेरी मदद की है.
मीडियम से कोई फर्क नहीं पड़ता
अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं कि मैं फिल्मों में काम नहीं कर रही इसलिए छोटे पर आ गयी. लेकिन मैं मानती हूं कि मीडियम कोई खास मायने नहीं रखता. काम मायने रखता है. इस शो में मुझे सास बहू का किरदार निभाने को तो नहीं कहा गया है. शायद मैं बहू न बन पाऊं. लेकिन अन्नया का किरदार बिल्कुल मॉर्डन है और मेरे स्वभाव से भी मेल खाता है और यही वजह है कि मैंने इसे हां कह दिया.
शो में मौका
इस शो का कांसेप्ट लेकर मेरे पास निखिल( स्टार प्लस के हेड) आये थे. और उन्होंने मुझे बताया कि शो केवल 26 एपिसोड में ही खत्म हो जायेगा. इसे जबरदस्ती खींचा नहीं जायेगा. इस बात से मुझे और तसल्ली मिली कि मैं दर्शकों को लुभाने में कामयाब रहूंगी. इस शो से पहले सारा आकाश जैसे शो भी मीडिटेक( इस शो की निर्माता कंपनी) ने ही बनाया था. यह भी वजह थी कि मैं आश्वस्त थी कि यह कंपनी इस विषय के साथ भी पूरी तरह से न्याय करेगी. हमने इस शो में रियल एयरपोर्ट पर जाकर शूटिंग की है. बाकी काम स्पेशल इफेक्ट्स द्वारा किया गया है.
परिवार ज्यादा महत्वपूर्ण
मैं चाहती हूं कि एक साल में मैं एक ही प्रोजेक्ट करती हूं क्योंकि मेरे लिए मेरा परिवार ज्यादा महत्वपूर्ण है. मैं अपनी मां के साथ घर पर रहना ज्यादा पसंद करती हूं. मैं बहुत डिमांडिंग नहीं, सो जिस तरह से मुझे आॅफर मिलते रहेंगे मैं चूज करके ही काम करना पसंद करूंगी.

अपने घर सा है कॉमेडी नाइट्स का घर : सुनील ग्रोवर


ेॅगुत्थी यानी सुनील ग्रोवर ने कॉमेडी नाइट्स में वापसी कर ली है. जब सुनील ने शो छोड़ा था. उस वक्त इसे लेकर काफी विवाद हुए थे. लेकिन सुनील अब बेहद खुश हैं उन्हें फिर से उनका पुराना परिवार मिल गया है. पेश है अनुप्रिया से हुई बातचीत के मुख्य अंश
सुनील आपने शो में वापसी की है. इस शो को लेकर काफी विवाद रहे तो वापसी के बाद कैसा माहौल है?
मैंने कभी इस शो के बारे में कुछ नहीं कहा था. यह शो हमेशा मेरा पसंदीदा शो था. इस शो के लोग, क्रू हमेशा मुझसे प्यार करते थे और करते रहेंगे. एक कलाकार होने के नाते कुछ वजहें थी. सो, मैं अलग हुआ था. अब जब वापस आया हूं तो लग रहा है कि परिवार में वापस आया हूं. अब भी वही प्यार मिल रहा है. लोगों से भी दर्शकों से भी. मेरा तो यहां बहुत अच्छे से स्वागत किया गया.
लेकिन आप गुत्थी के रूप में कम नजर आ रहे हैं. जबकि इसी किरदार ने आपको हिट किया था. विवाद भी इसी किरदार को लेकर था.
नहीं ऐसा नहीं है, गुत्थी मेरे लिए और इस शो के लिए हमेशा खास रहेगी. जिस तरह 100 वें एपिसोड के सेलिब्रेशन पर फिर से गुत्थी को लाया गया. मुझे ऐसा लग रहा कि फिर से मुझे मेरे सारे चाहने वाले मिल गये. वैसे भी मैं कलाकार हूं. मुझे मंच चाहिए. जहां मैं परफॉर्म कर सकूं.
कपिल की क्या प्रतिक्रिया थी.
मैं कभी कपिल से दूर नहीं रहा. खास बात यह रही कि मैंने जब निर्णय लिया कि मैं शो में वापसी करूंगा. मैं एक दिन सेट पर उनसे पहले पहुंच गया और मैंने उनसे कहा कि वेलकम टू कॉमेडी नाइट्स विद कपिल और फिर हम पहले जैसे साथ हो गये और शूटिंग शुरू हो गयी. मुझे कपिल से मिलने पर ऐसा लगा कि मैं बरसो बाद मिल रहा हूं. चूंकि यह वापसी अलग तरह की वापसी थी. हम दोनों ने कभी एक दूसरे के बारे में बुरा नहीं बोला है. हम हमेशा एक दूसरे को देख कर स्माइल ही करने की कोशिश करते हैं.
आपका शो मैड इन इंडिया लोकप्रिय नहीं हो पाया. इस बात का दुख है?
जी बिल्कुल है, कौन सा कलाकार चाहेगा कि उसका नाम जिससे जुड़ा है, वह फ्लॉप हो जाये. लेकिन जब आप सफल होते हो सभी को श्रेय मिलता है. फ्लॉप होते ही कहानियां बनती हैं. इस शो को लेकर भी कई कहानियां बनीं. लेकिन मुझे कोई अफसोस नहीं चूंकि मैं मेहनती हूं और हर जगह मेहनत से ही आगे बढ़ना चाहता हूं. हां, मैं एक बात जरूर स्पष्ट करना चाहूंगा कि मैंने मैड इन इंडिया की शुरुआत कॉमेडी नाइट्स विद कपिल की प्रतियोगिता में नहीं की थी. मैं मानता हूं कि मुझमें टैलेंट हैं और उसे निखारने के लिए मंच चाहिए. बस उसी ख्वाहिश में शुरुआत की थी.
 कॉमेडी नाइट्स लगातार कामयाब हो रही है. शो के इतने लोकप्रिय होने की खास वजहें आपको क्या लगती हैं?
खास वजह यह है कि यह कॉमेडी नाइट्स विद कपिल है. कपिल कॉमेडी किंग हैं. उन्हें टीम के साथ काम करना आता है. उन पर सफलता हावी नहीं हो रही. वे सबके साथ जुड़ कर काम कर रहे और खास बात यह है कि उन्हें पता है कि उन्हें दर्शकों को कैसे हंसाना है. वह दर्शकों को तुरंत खुद से कनेक्ट कर लेते हैं और एक कॉमेडी करनेवाले कलाकार में ये गुण हो तो वह कमाल करते ही हैं. 

आत्मविश्वास जगाती है मर्दानी : रानी


इन दिनों मर्दानी शब्द सुनते ही जेहन में रानी मुखर्जी का  ही नाम आता है. रानी मुखर्जी ने मर्दानी में जो भूमिका निभाई है. दर्शकों को वह बेहद पसंद आ रही है. उनके लिए मर्दानी क्यों रही खास?

फिल्म मर्दानी चुनने की वजह क्या रही?
मुझे लगता है कि ऐसी फिल्मों की आज बॉलीवुड में जरूरत है. मैं इसलिए नहीं कह रही क्योंकि यह मेरी फिल्म है.मैं इसलिए कह रही कि ऐसी फिल्में महिलाओं का मनोबल बढ़ाती है. मेरा मानना है कि हर औरत में एक मर्द है. लेकिन वह खुद को दबी कुचली सी महसूस करती है. हम जब भी किसी पुलिस आॅफिसर के बारे में सोचते हैं तो हमारे जेहन में पुरुष पुलिस आॅफिसर की ही इमेज आती है. लेकिन इस फिल्म के दौरान जब महिला पुलिस अफसरों से मिली और देखा उनके काम को तो लगा कि महिलाएं बहुत कठोर काम करती हैं. मैं एक पुलिस आॅफिसर से मिलीं. उन्होंने जिस तरह तमाचा लगाया था. डेमो के लिए ही कि मेरे क्रू मेंबर भी हिल गये थे. तो, मैं बस इस माध्यम से ये कहना चाहती हूं कि महिलाओं को कमजोर न समझें. दूसरी बात है कि हम सुरक्षा को लेकर हमेशा बातें करते हैं. मैं मानती हूं कि हर लड़की को मार्शल आर्ट आना ही चाहिए. मैंने इस फिल्म के दौरान क्राव मागा( मार्शल आर्ट का ही हिस्सा) सीखा और यह हर स्कूल में कंप्लसरी कर देना चाहिए. ताकि लड़कियां बचपन से ही यह सबकुछ सीख जायें. मुझे लगता है कि यह फिल्म महिलाओं में आत्मविश्वास जगायेगी कि लड़कियां खुद को कैसे कभी कमजोर न समझें. यह न सोचें कि हम जिस कद के हैं. हम यह नहीं कर सकते. वह नहीं कर सकते. यह सोचना चाहिए कि हम सब कर लेंगे.
आपका नाम रानी है. आप झांसी से हैं. क्या यह वजह रही कि आप भी स्वभाव से हमेशा बोल्ड रही हैं?
हां, यह वजह है और इसी कारण मेरा नाम रानी भी रखा गया था. मैं बचपन से बहुत निर्भिक और निडर रही हूं. मेरे लिए बोल्ड का मतलब वही है कि आपकी बातों और स्वभाव में बोल्डनेस हो. कोई आपके साथ बदतमीजी करे तो उसे ऐसा सबक सिखाओ कि वह चुप हो जाये. हाल ही में झांसी गयी थी. वहां मुझे एक लड़की के बारे में बताया गया कि किस तरह वह गुंडों से अकेली ही लड़ गयी थी.ऐसी लड़कियों की जरूरत है भारत को. इस फिल्म के दौरान एक आॅफिसर से मिली, जो रात में भी डयूटी करती हैं और वह महिला हैं कि पुरुष कोई नहीं देखता. वह काम पर जाती हैं और लोगों का वार सहती हैं. वह मेरी समझ से बोल्ड लेडी हैं. उसे मैं बोल्डनेस कहंूगी.
आप मानती हैं कि इन दिनों बॉलीवुड में वीमेन सेंट्रिक फिल्मों को महत्व दिया जा रहा है?
मुझे इस शब्द से प्रॉब्लम है. वीमेन सेंट्रिक़. क्या हम पुरुष प्रधान फिल्मों को मेल सेंट्रिक बोलते हैं. नहीं न तो हमें फिर माइनॉयोरिटी जैसे क्यों दिखाया जा सकता है. मेरा मानना है कि ऐसे हर मुद्दों पर फिल्म बने, जिससे महिला हो या पुरुष वह बतौर अभिनेता निखर कर सामने आयें.
फिल्म के काम करने के दौरान कभी महसूस हुआ कि काश मैं पुलिस आॅफिसर होती नहीं?
नहीं नहीं, मुझमें इतनी हिम्मत भी नहीं. वह जिस तरह से सैक्ररीफाइसेस करते हैं. मैं नहीं कर सकती. मैं परिवार के बिना नहीं रह सकती. मैं जब एक पुलिस आॅफिसर से मिली. मैंने उनसे कहा कि आपको इतनी धमकियां मिलती हैं. आपके बीवी हैं. बच्चे हैं. आपको डर नहीं लगता. उन्होंने कहा कि हम पहले देश के लिए जीते हैं. वह जज्बा मुझमें नहीं है. हम तो एक्ट करते हैं. लेकिन रियल हीरो तो वे लोग हैं. मुझे देख कर उनसे प्रेरणा मिली. लेकिन मैं हमेशा से एक्टिंग ही कर सकती थी. यह पता था मुझे.
खबर है कि आप फैन में शाहरुख के साथ काम कर रही हैं?
इस बारे में फिलहाल कुछ नहीं कह सकतीं.
शादी के बाद क्या बतौर निर्माता आदित्य ने कुछ बंदिशें लगाई हैं?
नहीं आदि ने कोई भी बंदिश नहीं लगायी है. उन्होंने मुझे मैं ही रहना दिया है. उन्हें मेरे इंटिमेट सीन से भी कोई परेशानी नहीं. चूंकि वह निर्माता हैं और मॉर्डन निर्माता हैं. वे जानते हैं कि काम काम होता है. आप उसे काम की तरह ही लें. तो उन्होंने मुझ पर छोड़ रखा है कि जो करना है मैं करूं. वे जानते हैं कि कहानी की मांग है तो है. शादी के बाद मेरी जिंदगी में बस इतने ही बदलाव आये हैं कि मैं अब अपने मां पापा की बजाय आदि के साथ और पामेला आंटी के साथ रह रही हूं.
क्या वजह है कि आदित्य मीडिया से इतनी दूरी बना कर रखते हैं?
ऐसा नहीं हैं कि उन्हें मीडिया से कोई चिढ़ है. लेकिन उन्हें अपने काम से प्यार है. वह हर फिल्म थियेटर में जाकर भीड़ में देखते हैं. बचपन से ही वह ऐसा ही कर रहे हैं. वह आम रहना चाहते हैं. वह तो कहते हैं कि चूंकि मेरी एक्ट्रेस बीवी बन चुकी है. तो मेरी तसवीरें छपती रहेंगी. लेकिन आदि को अपने परिवार से प्यार है और अपने काम से. आदि तो मेरे साथ दुनिया भर के रेस्टोरेंट घूमने में दिलचस्पी लेते हैं. लेकिन मीडिया से कोई बात करने में नहीं और वह कभी नहीं बदलेंगे. मैं बजलना भी नहीं चाहूंगी.

घर के बदलते सरोकार


 कार्टर रोड पर स्थित सुपरस्टार राजेश खन्ना का घर आशीर्वाद हाल ही में एक बिलिनयरी ने खरीदा है. 95 करोड़ में. शशि शेट्ठी नामक व्यवसायी ने बहुत शान से राजेश खन्ना का आशीर्वाद खरीद लिया है. उन्होंने वह बंगला खरीदने के बाद राजेश खन्ना के परिवार को यह छूट दे रखी थी कि वे राजेश खन्ना से संबंधित जो भी चीजें ले जाना चाहते हैं, ले जा सकते हैं. बस उन्होंने एक तसवीर जो कि शशि को भी पसंद आयी. उसे अपने पास रख लिया है. सभी जानते हैं कि जब राजेश खन्ना ने कामयाबी का दौर देखा तो उसी आशीर्वाद में ट्रक भर भर कर फूल आते थे. राजेश को अपने घर से बहुत लगाव था. उन्होंने यह घर राजेंद्र कुमार से खरीदा था. राजेंद्र कुमार को किसी ने कह दिया था कि यह हांटेड घर है. इसलिए उन्होंने इसे राजेश खन्ना को बेंच दिया था. लेकिन राजेश के लिए यह घर लकी साबित हुआ. राजेश खन्ना की इच्छा थी कि उनकी बेटियां इस घर को म्यूजियम के रूप में तब्दील करें. लेकिन उनके परिवार ने इसे बेंच दिया. गौरी खान जिन्होंने अपने घर को हमेशा प्राइवेट रखा. अब वह भी अपने घर की तसवीरें अखबारों को बेंच रही हैं. दरअसल, बदलते दौर के साथ अपने घरों और उनसे जुड़े सरोकार भी बदल रहे हैं. अक्षय कुमार व राजेश की बेटियां चाहतीं तो वाकई इसे म्यूजियम बना सकती थी. उनके लिए पैसे मायने नहीं थे. ऐसे में अपर्णा सेन व उनका परिवार एक मिसाल है. अपने मरते दम तक अपर्णा ने अपने घर की चहारदीवारी में किसी अनजान को कदम नहीं रखने दिया. उनकी बेटियों व नवासियों ने भी कभी उनके नाम का इस्तेमाल नहीं किया. उनकी निजता को मरते दम तक बरकरार रखा. ऐसे में बॉलीवुड में इन दिनों अब अपने घर को भी ब्रांड के रूप में प्रस्तुत करना. ओंछा लगता है. लेकिन हकीकत यही है कि घर एक सपना है, और इन दिनों सपने भी बिकते हैं.

नीली छतरी वाली टीवी

लाइफ ओके चैनल पर नए रियलिटी शो की शुरुआत हुई है।  शो का नाम है डेयर टू डांस।  इसमें पिछले एपिसोड में एक प्रतिभागी जिन्हें ऊंचाइयों से काफी डर लगता था उन्हें ऊंचाइयों पर बने स्टेज पर ही डांस करना था। उन्होंने डांस किया भी।  चूँकि शो का नाम ही स्पष्ट कर कि इस शो में प्रतिभागियों को ऐसे स्थानों पर ही डांस करना है ,जहाँ परफॉर्म करना आसान नहीं होगा।  जी टीवी के एक रियलिटी शो सिनेस्टार्स की खोज में रुकसाना को ऊंचाइयों से कूदने को कहा गया और कूदने के बाद उनका भय भी खत्म हो गया।  दरअसल, हकीकत ये है कि ऊंचाई को दार्शनिक रूप से देखें तो हम ता उम्र आसमान छूने की ही बात करते हैं।  लेकिन वास्तविकता में जब हम वहां पहुँच जाते हैं तो हम उससे डरने लगते हैं।  दुनिया में ऐसे कई अभिनेता, कई निर्देशक हैं जिन्होंने सिर्फ विमान में बैठने के डर से कभी ऐसी जगहों पर शूटिंग नहीं की जहाँ उन्हें विमान से जाना हो।  फिल्म जिंदगी न मिलेगी दोबारा में फरहान के किरदार को भी यह डर  सताता था . लेकिन जब वह एक बार उड़ लेते हैं तो उन्हें एहसास होता है कि उन्होंने डर के आगे जीत हासिल कर ली है।  चूँकि यही हमारा स्वभाव भी है।  हम निरंतर उसी ऊंचाई को तो हासिल करना चाहते हैं।  लेकिन उसे सामने से एहसास करने में घबरा जाते हैं. इन दिनों गौर करें तो छोटे परदे पर फिर से उन उंचाईओं को छूने की चेष्ठा की जा रही है।  अचानक हर शो में आसमान की बातें , ऊंचाई पर डांस। इस बार तो कलर्स के हिट शो बिग बॉस में भी हवाओं में लड़ाइयां होंगी। स्टार प्लस एयरलाइन के माध्यम से उड़ान भर ही चुका है।  गौर करें तो आलम बदल रहा है। जमीन वाले आसमान पर जा रहे और आसमान से नीली छतरी वाले को जबरन जमीन पर बुला लिया गया है। ऐसे भी टीवी का जो एन्टीना यानि की छतरी जमीन पर नहीं बल्कि घर के सबसे ऊपर की छत का ही रुख करती है।  यानि नीली छतरी वाले के सहारे के आसरे में।  बहरहाल   जमीन और आसमान के बीच की फासले में दुनिया उलझी रहेगी।  लेकिन यह भी हकीकत नहीं बदलेगी कि ऊंचाई पर पहुंच कर लोग तन्हां हो जाते हैं।  काम से काम एक बादशाह तो जरूर। जैसे बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख़ खान।  लेकिन फिर भी आसमान को छूने  की चाहत कभी किसी की कम नहीं होगी।  

जिंदगी की पाठशाला


 झलक दिखला जा में महत्वपूर्ण प्रतिभागी के रूप में नजर आ रहीं मॉनी रॉय ने टीचर्स डे के संदर्भ में इस बात का जिक्र किया है कि जब वह टीवी इंडस्ट्री में आयीं तो उन्होंने अभिनेत्री (अब एचआरडी मंत्री) स्मृति ईरानी से बहुत कुछ सीखने का मौका मिला. उस वक्त मॉनी नयी कलाकर थीं और उन्हें अभिनय के उतने गुर नहीं आते थे. उस वक्त स्मृति ने ही मॉनी को सिखाया कि किस तरह अपने डायलॉग को थ्रो किया जाये. किस जगह उन्हें विराम लेना है. किस जगह नहीं. मॉनी मानती हैं कि उन्हें अभिनय में पहली पाठशाला स्मृति से ही सीखने को मिली. विवेक ओबरॉय को दान की सीख उनकी मां से मिली और आज वह इसे अपनी जिंदगी में लागू भी कर रहे हैं. प्रियंका अपने पिता से प्रेरित रही हैं और वह अपने पिता को ही अपना पहला गुरु मानती हैं. अनुपम खेर गुरु दक्षिणा के रूप में आज भी महेश भट्ट को अपनी आमदनी का कुछ हिस्सा हर महीने देते हैं. चूंकि महेश भट्ट ने ही उन्हें सारांश फिल्म से लांच किया और अभिनय में वे महेश को अपना पहला गुरु मानते हैं. शाहरुख खान की मां ने उन्हें कहा था कि मुझे लगता है कि तू सुपरस्टार बन सकता है. सो, शाहरुख अपनी मां को ही अपना पहला गुरु मानते हैं. दरअसल, हम अपनी जिंदगी में हर किसी से कुछ न कुछ नयी चीजें सीखते हैं. राह चलते भी किसी की कही कुछ बातें हमें प्रेरित कर जाती है. वह हमारे दिल को छू जाती है.इन दिनों हम सोशल नेटवर्किंग साइट्स के माध्यम से हम कई लोगों की कहानियां पढ़ते हैं. और उनसे प्रेरित होते हैं. जबकि हम उनसे कभी नहीं मिले. हम उनकी बातों को अपनी जिंदगी में शामिल करते हैं. तो ये सभी हमारी जिंदगी में गुरु ही तो हैं. यह जरूरी नहीं कि स्कूल में जिन्होंने आपको  सीख दी हो. सिर्फ उन्हें गुरु दिवस पर सम्मान दिया जाये या याद किया जाये. गुरु तलाशे तो हर वक्त आपके इर्द गिर्द होते हैं

सेवा का निस्वार्थ भाव


विवेक ओबरॉय इन दिनों ब्लड डोनेशन कैंप में गंभीरता से हिस्सा ले रहे हैं. वे देश भर में ब्लड डोनेशन कैंप लगवा रहे हैं और युवाओं को इस काम के लिए जागरूक कर रहे हैं. हाल ही में उनसे इस कैंप के सिलसिले में बातचीत करने का मौका मिला. उन्होंने बताया कि उन्हें यह प्रेरणा उनकी मां से मिली है. उनकी मां विवेक के जन्म से पहले से समाज सेवा में जुड़ी रही हैं. वे जूहू में उन बच्चों के लालन पालन का काम करती हैं, जो बेसहारा हैं. पिछले कई सालों से वह हर शुक्रवार स्वयं जाती हैं उस स्कूल में जाती हैं, और खाना पका कर बच्चों को खिलाती हैं. उनकी देखा देखी अब जूहू इलाके में और भी महिलाएं उनका साथ दे रही हैं. विवेक जब  स्टार बने तो उन्होंने अपनी मां से पूछा कि आपको तोहफे में क्या चाहिए. उसी दिन उनकी मां ने विवेक से एक प्रण लिया कि वे अपनी कमाई का एक चौथाई हिस्सा बिना किसी मकसद के उन्हें दान करेंगे, जो जरूरतमंद है और विवेक का खिंचाव समाज सेवा की तरह बढ़ा.दरअसल, हकीकत भी यही है कि सेवा का भाव निस्वार्थ हो तभी वह फलता फूलता है. चूंकि इस बात का ढिंढोरा नहीं पिटा जाना चाहिए. यह फिल्मों का प्रोमोशन नहीं है. विवेक ओबरॉय की मां ने शायद इसी भाव से यह सिलसिला जारी रखा है. आज भी वह जूहू के उन तमाम बच्चों को पढ़ाने का काम कर रही हैं, जो धन की कमी के कारण पढ़ नहीं पाते. लेकिन उनकी मां के बारे में यह खबरें मीडिया में कम ही आयी हैं. जाहिर है यह निर्णय उनका स्वयं का ही होगा. इससे स्पष्ट होता है कि वे इसी बात में विश्वास रखती हैं. विवेक कैंसर मरीजों के लिए भी कई वर्षों से काम कर रहे हैं. यह कदम सराहनीय है और जरूरी है कि सेलिब्रिटिज जिस तरह ब्रांड एंडॉरस्मेंट में आगे आते हैं. वे इस तरह के कामों में भी अपनी दिलचस्पी बढ़ाएं

रईस या फैन


शाहरुख खान की फिल्म रईस एक बार फिर से फ्लोर पर जाने से रुक गयी. शाहरुख खान ने तय किया है कि पहले वह यशराज की फिल्म फैन की शूटिंग पूरी करेंगे और इसके बाद ही वह रईस की शूटिंग शुरू करेंगे. रईस पिछले कई सालों से इसी वजह से टलती जा रही है कि शाहरुख खान इस फिल्म को अपना वक्त नहीं दे रहे. हालांकि शाहरुख पहले एक साथ साल में दो फिल्में किया करते थे. लेकिन पिछले दो तीन सालों से वे इस बात का खास ख्याल रख रहे हैं कि वे साल में सिर्फ एक ही फिल्म करेंगे. शायद इसकी वजह यह है कि वे अपनी हर फिल्म की शूटिंग के बाद उसके पोस्ट प्रोडक् शन में गहरी दिलचस्पी लेते हैं. पिछले दो सालों से तो चेन्नई एक्सप्रेस और हैप्पी न्यू ईयर उनकी होम प्रोडक् शन फिल्में रही हैं, सो, उन फिल्मों को लेकर शाहरुख का सजग होना तो ज्यादा जरूरी है. शाहरुख जानते हैं कि वे किस तरह अपने दर्शकों को एक फिल्म से मोहित कर सकते हैं. एक सुपरसितारा होने के नाते उनका यह निर्णय सही भी है. वर्कोहोलिक होने के बावजूद उन्हें इस वक्त जरूरत है कि उनकी एक ही फिल्म इतनी कामयाब हो कि सारे रिकॉर्ड टूटें. हालांकि शाहरुख पहले सुपरस्टार नहीं, आमिर खान भी एक से अधिक फिल्में करना नापसंद करते हैं. शाहरुख खान भी अब इसी बात को फॉलो कर रहे हैं. चूंकि शाहरुख जितनी ऊर्जा अपनी फिल्मों की शूटिंग के बाद पोस्ट प्रोडक् शन में लगाते हैं. जाहिर है व्यक्ति का किसी एक फिल्म पर एकाग्र होना जरूरी है. सो, उस लिहाज से शाहरुख का निर्णय सही है. फैन और रईस दोनों ही शाहरुख खान को नये अवतार में प्रस्तुत करने का दावा कर रही हैं. दोनों के ही निर्माता विश्वसनीय निर्माता हैं. शायद शाहरुख इस बात से वाकिफ हैं कि वे रईस तो हैं ही. फिलवक्त उन्हें फैन की ज्यादा जरूरत है. सो, वे उसी रूप में अपनी स्ट्रेजी तय कर रहे हैं.

विज्ञापन और सेलिब्रिटी


चीन में जल्द ही कानून लागू होगा. कि सेलिब्रिटिज उन उत्पादों का विज्ञापन न करें, जिन्हें उन्होंने इस्तेमाल न किया हो. जी हां, कानून के मुताबिक सेलिब्रिटिज को पहले उन विज्ञापनों का इस्तेमाल कर उनकी कमियां जाननी होगी और फिर अगर वे संतुष्ट हों और लंबे समय तक उसे इस्तेमाल करने का दावा करें तभी वह आगे उस उत्पाद के ब्रांड अंबैस्डर बन सकते हैं. इस बात को लेकर चर्चे की बात तब सामने आयी, जब प्रसिद्ध अभिनेता तांग गोकियांग से एक सोशल मीडिया पर एक व्यक्ति ने पूछ डाला कि क्या मशीन का विज्ञापन करने के लिए उनके पास बुलडोजर का लाइसेंस है. वाकई यह एक जरूरी कानून होगा. फिल्मी इंटरव्यू के दौरान कई बार अभिनेता और अभिनेत्रियों के घर जाने के मौके मिले हैं. उनके स्रानघर में कोई भी वैसे प्रोडक्टस नहीं दिखते. वहां या तो विदेशी प्रोडक्ट्स दिखते हैं या आयुर्वेदिक जिनके वे विज्ञापन करते हैं. क्या अनुष्का शर्मा ने कभी नारियल तेल को हाथ भी लगाया होगा, क्या अमिताभ उस ठंडे तेल का इस्तेमाल करते होंगे. एक बार अभिनेत्री असीन ने कोल्ड ड्रिंक के विज्ञापन के प्रेस कांफ्रेंस के दौरान कह दिया था कि वे कोल्ड ड्रिंक नहीं पीतीं. बाद में उनके पीआर ने मीडिया को मैनेज किया ताकि खबर अखबार में प्रकाशित न हो जाये. दिलीप कुमार हमेशा इस बात के खिलाफ रहे कि कलाकारों को किसी विज्ञापन का हिस्सा बनना चाहिए. वे कई बार अमिताभ को सलाह देते रहे हैं. रजनीकांत भी विज्ञापनों का हिस्सा नहीं बनते. चूंकि वे मानते हैं कि अगर उनके कोई गलत प्र्रभाव हुए तो इसके जिम्मेदार वे होंगे. लेकिन बॉलीवुड के कलाकारों को इससे खास फर्क नहीं पड़ता.चूंकि एक सेलिब्रिटी की जिम्मेदारी बड़ी होती है. यह हकीकत है कि भारत में लड़कों को गोरे बनाने वाली क्रीम की खपत की सबसे बड़ी वजह उस विज्ञापन में एक बड़े सुपरस्टार का होना है.  

दान का गुणगान


 इन दिनों बॉलीवुड, हॉलीवुड के सेलिब्रिटी एक दूसरे को आइस बकेट चैलेंज दे रहे हैं. यह एक चैरिटी के लिए है. जिसका उद्देश्य है कि जो सेलिब्रिटी यह चैलेंज न ले पाये. उसे उस चैरिटेबल संस्था को कुछ पैसे दान करने होंगे. चैरिटी का यह चैलेंज इस कदर लोकप्रिय है कि कई सेलिब्रिटी अपने दोस्तों को इसके लिए चैलेंज कर रहे. हालांकि यह एक विदेशी संस्था है, और उसका उद्देश्य भी नेक ही है. लेकिन इस जवाब में राइस बकेट चैलेंज लेकर कलानिधि आयी हैं. उन्होंने तय किया है कि वे अपनी संस्था के माध्यम से वैसे लोगों को एक बाल्टी चावल मुहैया करायेंगी, जिन्हें जरूरत है. इसके लिए उन्होंने दक्षिण के कई कलाकारों को भी शामिल किया है और वे खुशी खुशी इसमें शरीक भी हो रहे हैं. लेकिन फिलवक्त तक कोई हिंदी फिल्मी सितारा इससे जुड़ा नजर नहीं आ रहा है. तो क्या इससे यह बात साफ होती है कि हमारे लिए चैरिटी भी ओहदे को देख कर होती है. चूंकि आइस बकेट चैलेंज में सभी हॉलीवुड के बड़े सितारा शामिल हो रहे हैं. सो, बॉलीवुड इससे जुड़ना अपना सम्मान समझ रहा है. हालांकि अब तक सलमान खान, जो कि अपनी दरियादिली के लिए जाने जाते हैं. वे किसी भी संस्था से नहीं जुड़े. कलानिधि  ने अपनी इस मुंिहम के बारे में जो सोच रखी है, वह भी अदभुत है और वह उनकी सोच को दर्शाता है. कलानिधि कहती हैं कि भारत चावल निर्यात देश है और ऐसे में जरूरतमंदों को चावल देने से उनकी भूख शांत होगी और लोगों को दुआ मिलेगी. वाकई ऐसी कलानिधि की भारत में जरूरत है, जो इस सोच के साथ आगे आयें, कि उन्हें इसके बदले में कुछ और नहीं चाहिए. वे निश्छल मन से अपना मान सम्मान देते हैं. वे चैरिटी को दया नहीं बल्कि सम्मान के रूप में देखते हैं और यही दान की वास्तविक सोच भी है कि आपने जो दान किया उसका गुणगान न हो.

टॉक शो की खासियत


 पाकिस्तानी टेलीविजन चैनल हम पर पाकिस्तानी अभिनेत्री माहिरा खान एक शो लेकर आती हैं. यह टॉक शो है. जैसे भारत में करन जौहर का शो कॉफी विद करन हिट है. पाकिस्तान में सेलिब्रिटी माहिरा खान के शो पर आकर महसूस करते हैं. इस शो के कुछ एपिसोड मैंने यूटयूब पर देखे. शो का नाम है द लाइटर साइड आॅफ लाइफ. इस शो में माहिरा खान उन सेलिब्रिटीज से जो कि कराची से बाहर से आये हैं,  एक सवाल जरूर पूछती हैं कि उन्होंने खुद को कराची में कैसे स्थापित किया. वे उनके संघर्ष की बातों पर विशेष प्रकाश डालती हैं. शो की खासियत इसका सामान्य फॉरमेट भी है, जिसमें खुद माहिरा भी अपनी जिंदगी की कई कहानियां सुनाती हैं. भले ही यह शो भारतीय टॉक शो के तर्ज पर हो. लेकिन उसकी गुणवता भारतीय टॉक शो से बेहद अलग और अच्छी है. दरअसल, भारत में विवादों की वजह से ही टॉक शो होते हैं. और जहां विवाद नहीं होते. उसमें खास दिलचस्पी नहीं दिखाई जाती. अनुपम खेर कुछ भी होता है नामक शो लेकर आ रहे हैं. लेकिन उनके शो में कमियां निकालते हुए कई समीक्षकों का कहना है कि वे केवल गुडी गुडी( अच्छी अच्छी) बातें करते हैं. जबकि अनुपम खेर ने यह बात स्पष्ट की थी कि वह अपने शो में कोई विवाद नहीं लाना चाहते. फिर भी यह सवाल उन पर खड़े होते हैं और खासतौर से फिल्म इंडस्ट्री से बाहर से आये कलाकारों के संघर्ष की कहानी अगर यहां सुनाई जाये तो लोग उसे बोर समझते हैं. कॉफी विद करन जैसे शो में तो यह बिल्कुल मुमकिन नहीं. इस लिहाज से पाकिस्तानी टेलीविजन अपनी सार्थकता को बरकरार रखने की कोशिश कर रहा है. शो में स्टार्स ग्लैमर पक्ष को दर्शाते नजर नहीं आते. वे भारी भरकम कॉस्टयूम में नजर नहीं आते और न ही अदाएं दिखाने की कोशिश करते हैं. फिर भी ध्यान आकर्षित करते हैं.

केबीसी के सेट पर अमिताभ


 फवाद खान हाल ही में केबीसी के सेट पर मौजूद थे. वहां फवाद खान ने अमिताभ बच्चन से यह बात शेयर की कि वे अमिताभ की वजह से ही फिल्मों में आये. उन्होंने अमिताभ बच्चन की फिल्म के संवाद बोल कर भी सुनाये. यह एपिसोड 18 सितंबर को प्रसारित होगा. इसी दौरान अमिताभ ने चर्चा की कि अमिताभ के दादाजी के संबंध भी कराची से जुड़े हुए हैं. और वे जब दो साल के थे तो अपनी माताजी के साथ वहां गये थे. अमिताभ बच्चन के चेहरे पर एक अलग मुस्कान थी. इसी एपिसोड की शूटिंग के दौरान अमिताभ ने अपने एलबम की दो तसवीरें सांझा की, जिसमें उन्होंने अपने बेटे के जन्मदिन की तसवीर दिखायी. वे उसमें सुपरमैन के रूप में नजर आ रहे हैं. अमिताभ ने उस तसवीर के बारे में बताया कि बचपन में अभिषेक अपनी जन्मदिन पर थीम पार्टिंया करते थे और उस दिन का थीम सुपरमैन ही था. अमिताभ जिस ताजगी और स्फूर्ति से  केबीसी के सेट पर नजर आते हैं और आॅडियंस में बैठे तमाम लोगों से रूबरू होते हैं. इससे यह स्पष्ट है कि अब केबीसी पूरी तरह से अमिताभ के कंधों पर ही है. आॅडियंस गैलेरी में बैठे लोग सिर्फ अमिताभ की झलक पाकर खुद को धन्य महसूस करने लगते हैं. वरना, जितनी भीड़ आती है, अगर कोई सामान्य शो हो और शोर शराबा न हो यह मुमकिन नहीं. केबीसी जैसे शो को सार्थक बनाने में अमिताभ कोई कसर नहीं छोड़ते. आॅडियंस भी अंत तक सिर्फ इसलिए अमिताभ के एक इशारे पर तालियां बजाती हैं कि उन्हें अंत में अमिताभ से हाथ मिलाने का और अमिताभ को अपनी आंखों के सामने देखने का मौका मिल जायेगा.दरअसल, अमिताभ लोगों के दिल से जुड़े हैं. और उनकी वजह से शो की लोकप्रियता है. केबीसी के संस्करण आगे भी कामयाब रहेंगे. अगर अमिताभ इससे जुड़े रहेंगे. 

मजाक की गंभीरता


आलिया भट्ट ने भले ही अपनी बातचीत में यह बातें कही हों, कि उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके बारे में टिष्ट्वटर व सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर कितने जोक्स बन रहे हैं. वह इन बातों को एंजॉय कर रही हैं. लेकिन उन्होंने हाल ही में यूटयूब पर एक वीडियो जारी किया है, जिसमें उन्होंने खुद का माखौल उड़ाया है. लेकिन हकीकत यह है कि इस वीडियो को देखने के बाद यह बात स्पष्ट होती है कि आलिया ने इस बात को बहुत गंभीरता से लिया है. चूंकि यह पहली बार है, जब कोई अभिनेत्री अपने बचाव में इस तरह आ रही हैं. सभी जानते हैं कि अभी आलिया लोकप्रिय हैं और उन्हें अपना इस कदर माखौल बनवाना शायद गंवारा नहीं है. आप गौर करें तो पिछले कई सालों से रजनीकांत पर लगातार जोक्स आ रहे हैं. लेकिन रजनीकांत ने कभी इस बात को गंभीरता से नहीं लिया. यह दर्शाता है कि आप किस स्वभाव के हैं और आप अपनी आलोचना को किस रूप में लेते हैं. रजनीकांत जानते हैं कि ये उनके चाहने वाले हैं और उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता. इससे उनकी छवि धूमिल नहीं होती. हाल ही में आलोक नाथ का बाबूजी के नाम से सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर जोक्स बनाया गया. लेकिन इस बात से आलोक नाथ खुश थे. क्योंकि जितनी लोकप्रियता उन्हें अब मिली, शायद ही उनकी किसी फिल्म से मिली हो. इससे स्पष्ट है कि आप अपने माखौल को भी अपनी लोकप्रियता के अनुसार भुनाते हैं. चूंकि आलिया हिट हैं. वे नहीं चाहतीं कि किसी भी रूप में उनकी छवि धूमिल हो. वह एक बने बनाये कवच में रहना चाहती हैं. वह पैंपरड चाइल्ड रही हैं. ऐसे में अगर उन्हें इन बातों से फर्क पड़ रहा है तो स्पष्ट है कि उनके माता पिता को भी यह बात खल रही होगी और बेबी को खुश करने के लिए उनके माता पिता भी उनका साथ दे रहे हैं. 

तैयारी के साथ अभिनय


 हाल ही में शाहिद कपूर से फिल्म हैदर के संदर्भ में बातचीत हुई. उनसे जब श्रद्धा कपूर के अभिनय शैली के बारे में पूछा गया तो शाहिद का कहना था कि हमने जब शुरुआत की थी. हम इतनी तैयारी से नहीं आते थे. यह अच्छी बात है कि वर्तमान में नवोदित अभिनेत्रियां अपनी पहली फिल्म में ही सार्थक अभिनय करती हैं और खुद को साबित कर देती हैं. श्रद्धा को देख कर यही लगता है कि वह पूरी तैयारी से आयी हैं. दरअसल, यही हकीकत भी है कि पहले की अपेक्षा अब कलाकार अपनी पहली फिल्म में ही पूरी तैयारी से आते हैं. वह खुद को साबित करने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते. चूंकि वह इस बात से अवगत होते हैं कि वर्तमान में आपको दूसरे मौके तब तक नहीं मिलते. जब तक आपकी पहली फिल्म कामयाब न हो जाये. आज वर्कशॉप्स होते हैं. और उसके बाद अभिनय की प्रक्रिया शुरू होती है. पहले अशोक कुमार, दिलीप कुमार, देव आनंद जैसे कलाकारों ने यूं ही शुरुआत की थी. उन्होंने काम करते हुए काम सीखा. शायद यही वजह है कि अपनी पहली फिल्म में जिस तरह पहले कलाकार मासूम नजर आते थे. अब वह मासूमियत गायब है. अब कलाकार पहली फिल्म में ही नृत्य, अपनी फिटनेस, अपने अंदाज में इस तरह आत्मविश्वास दर्शाते हैं कि वह दर्शकों को अपील कर ही जाते हैं. हेमा मालिनी बताती हैं कि जब शाहरुख फिल्मों में आये थे. उन्होंने शुरुआती दौर में एक्टिंग करके उन्हें दिखाया और फिर शॉट लिया करती थीं. जबकि शाहरुख थियेटर से जुड़े रहे थ.े लेकिन फिल्मों में कैमरे के सामने अभिनय करने का हुनर अलग होता है. खुद हेमा मालिनी को राज कपूर ने अभिनय करने के गुर सिखाएं. आलिया भट्ट, परिणीति चोपड़ा, सिद्धार्थ मल्होत्रा, वरुण धवन, अर्जुन कपूर जैसे कलाकारों में वह आत्मविश्वास उनकी पहली फिल्म से ही नजर आने लगा था.

अभिनेता के पीछे अभिनत्री


विनोद मेहता द्वारा मीना कुमारी की जीवनी पर आधारित किताब पढ़ रही हूँ।  लेखक ने इस किताब में रोचक तरीके से बातें कही हैं।  वे मीना को मीना नाम से सम्बोधित करने की बजाय माय हीरोइन यानि मेरी हीरोइन नाम से सम्बोधित कर रहे हैं।  साथ ही उन्होंने मीना कुमारी की जिंदगी  में झांकने से पहले मीना कुमारी की मौत से अध्याय से शुरुआत की हैं।  मीना की मौत हिंदी सिनेमा जगत में एक रहस्य्मय मौत रही।  मीना की मौत के बाद ही पाकीजा ने कामयाबी हासिल की।  मीना बेहद काम उम्र में जिंदगी को छोड़ चली गई थीं। सो, उनकी मौत भी बॉलीवुड के लिए एक दास्तां बन कर रह गई।  इस पुस्तक में लेखक ने अभिनेता धर्मेन्द्र और मीना कुमारी के रिश्ते के बारे में विस्तार से लिखा है। लेकिन इस पूरी बात में एक बात गौरतलब है कि मीना ही वह पहली महिला थीं जिन्होंने कहा था कि ये लड़का राज करेगा। साथ ही धर्मेन्द्र को मीना ने ही एक्टिंग की बारीकियां सिखायी।  उन्होंने इस कदर धर्मेन्द्र के साथ अभिनय को गंभीरता से लिया कि एक एक सीन पे वे धर्मेंद्र को ट्रेनिंग देतीं।  कुछ इसी तरह देविका रानी ने दिलीप कुमार का न सिर्फ लांच किया।  बल्कि उन्हें अभिनय की बारीकियां भी सिखायीं। स्पष्ट है कि ये शायद वह दौर था , जब फिल्मों में महिलाओं का दबदबा था।  और महिलाओं को इज्जत भी आज से अधिक हासिल थी. फिल्म जगत में।  मगर आज शायद ही यह मुमकिन है कि कोई नौसिखिया भी शीर्ष की अभिनेत्री से अभिनय सीखे और फिर उसका गुणगान करे।उस दौर में भी अभिनेता के पीछे अभिनेत्री होती थी।  आज भी होती हैं।  लेकिन यहाँ पीछे होने में फर्क इतना है कि उस दौर में अभिनेत्री अभिनेता के पीछे उसे सिखाया करती थी और आज पीछे हैं क्यूंकि उन्हें नौसिखिया ही समझा जाता है। कटरीना ने एक बार अपनी बातचीत में यह जिक्र किया था कि कैसे शुरूआती दौर में एक अभिनेता ने उनका मजाक बनाया था. हकीकत तो ये है कि शीर्ष पे पहुँच कर भी आज भी अभिनेत्रियां पीछे ही हैं. मैंने खुद कई पुरुष फिल्म क्रिटिक को खुश होते हुए देखा है , जब कोई महिला केंद्रित फिल्में बॉक्स ऑफिस पर कामयाब नहीं हो पातीं।  उनका संवाद होता है. होती कैसे… क्या सोचा था वीमेन सेंट्रिक फिल्म से कामयाब हो जाएगी। स्पष्ट है कि ये सोच अब तक नहीं बदली है और आगे भी एक अभिनेत्री अभिनेता से पीछे ही रहेगी 

किरदार से सीख

एक अभिनेत्री फिलवक्त एक खिलाड़ी की जिंदगी पर आधारित फिल्म में काम कर रही हैं. चारों तरफ उनकी ही चर्चाएं हैं, कि किस तरह वह अपने किरदार में इस कदर डूब गयीं कि उन्होंने एक खिलाड़ी की तरह मशल्स बनाये और साथ ही साथ कई अन्य कठोर परिश्रम भी किये. हालांकि उनसे यह मनसा रखना कि निजी जिंदगी में भी वह उस खिलाड़ी की तरह हो जायें. तो यह अतिश्योक्ति होगी. मगर क्या वाकई अभिनेता या अभिनेत्री या कोई भी कलाकार  किसी किरदार को निभाने के बाद उन किरदारों से पूरी तरह से खुद को अलग कर पाते होंगे. जिन फिल्मों को वह अपना दिल देते हैं. जिन फिल्मों में दिमाग देते हैं. मैं उनकी बात नहीं कर रहीं. लेकिन वाकई कुछ फिल्में होती हैं, जिन्हें कलाकार अपना दिल देते हैं. फरहान अख्तर ने मिल्खा सिंह का किरदार परदे पर निभाया और यह प्रश्न जब उनसे किया था तो उन्होंने कहा कि उन्हें मिल्खा सिंह की जिंदगी से खुद को अलग करने में वक्त लगा चूंकि मुझे लगा कि क्या जिस संघर्ष से उनकी जिंदगी बीती. उस संघर्ष से मेरी बीतती तो मैं क्या करता. कुछ दिनों तक सोचता रहा...लेकिन फिर खुद को अलग कर पाया. इससे स्पष्ट है कि कलाकार भी प्रभावित होते हैं. दिलीप कुमार ने ट्रेजेडी फिल्मों से खुद को दूर किया क्योंकि वे वास्तविक जिंदगी में भी दुखी रहने लगे थे. काश, बॉलीवुड के वे कलाकार जिन्होंने खिलाड़ियों के पात्र निभाये हैं वक्त की पाबंदी के गुर ही सीख लेते. सौरभ गांगुली जब रिटायर हुए तो उन्होंने कहा कि अब मैं चैन से सो पाऊंगा. सुबह 4 बजे मुझे प्रैक्टिस के लिए नहीं जाना होगा. बॉलीवुड वक्त का पाबंद नहीं है. अमिताभ, आमिर, अक्षय अपवाद हैं. मगर कम से ऐसे किरदारों को निभा कर काश यह सीख ही वह खुद में ढाल लें. मगर यह एक ऐसा मुश्किल टास्क है, जो सिक्स पैक्स एब्स बनाने से भी ज्यादा कठिन है.

जमीन को देखना


हाल ही में अमिताभ बच्चन ने अपने सोशल नेटवर्किंग साइट पर एक तसवीर शेयर की. तसवीर उनकी आगामी फिल्म शमिताभ की है, जिसमें अमिताभ को जमीन को देखते हुए दिखाया गया है. अमिताभ ने खुद तसवीर की कैप् शन में यह बात लिखी है कि कभी कभी व्यक्ति को झूक कर भी चलना चाहिए. दरअसल, अमिताभ की यह बात हर उस कामयाब व्यक्ति के लिए है, जिसने जमीन से ही चलना शुरू किया. लेकिन जूतों की हाइ हिल्स ने जिंदगी इस कदर बदल दी कि वे हाइ हिल्स व्यक्ति को कभी मौका ही नहीं देते, कि उसके पैर जमीन पर आयें. वे हमेशा हाइ हिल्स के कवच में ही जिंदगी गुजार देते हैं. जबकि हकीकत यही है कि वाकई कभी झूक कर भी देखना चाहिए. बचपन से हम सुनते आ रहे हैं कि झूके हुए पेड़ ज्यादा बलवान होते हैं. लेकिन जिंदगी में हम कभी झूकना नहीं चाहते और कोई जमीन को देखना नहीं चाहते. एक विज्ञापन इन दिनों काफी लोकप्रिय है. जमीन से पैर उठाते हैं...तो पंख खुद ब खुद लग जाते हैं. सच्चाई यही हैं कि पंख उर्फ पर लगने के बाद कोई जमीन पर नहीं आना चाहता. लेकिन आसमान की ऊंचाईयों पर उड़नेवाली चिड़िया को जब भूख लगती है तो दाना चुगने तो वह धरती पर ही आती है. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अगर झूके वृक्ष की बात करें तो खुद अमिताभ इसके बड़े उदाहरण हैं, कि वे आज भी इस कदर काम के प्रति प्रतिबध हैं कि अपने जुनियर और युवा पीढ़ी के सामने वह नतमस्तक हो जाते हैं. रणबीर कपूर कपूर परिवार से हैं. लेकिन वे जब भी अपने चाहनेवालों से या मीडिया से मिलते हैं. वे अपने से बुजुर्गों का अभिनंदन एक छोटे से बच्चे की तरह करते हैं. विद्या बालन को इस बात से कोई शर्म नहीं किवे बड़े उम्र के जर्नलिस्ट को पैर छूकर प्रणाम कर लेती हंै. ये झूके हुए वृक्षों की ही शाखाएं हैं, जो उन्हें ऊंचाईयों तक जिंदा रखती हैं.

सलमान का लौटना


सलमान खान ने हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान कहा है कि उन्होंने अपनी पिछली कुछ फिल्मों में खुद को खो दिया था. सो, वह अपनी तलाश के लिए वापस सूरज बड़जात्या के पास आये हैं. चूंकि वह चाहते हैं कि वह जो हैं. वह फिर से फिल्मों में नजर आयें. सभी जानते हैं कि सलमान खान पारिवारिक व्यक्ति हैं. लेकिन उनके इस स्वभाव पर उनका लार्जर देन लाइफ इमेज ज्यादा हावी है. वजह भी साफ है. पिछले कुछ सालों से सलमान ने लगातार लार्जर देन लाइफ फिल्में ही की हैं. उन फिल्मों में सलमान का एक पहलू कि वह दरियादिल हैं. ये पहलू छुआ जाता रहा है. लेकिन उनके अन्य पहलू नहीं निखर पाये हैं. गौरतलब है कि सलमान ने अपनी शुरुआत मैंने प्यार किया से की थी. और उसके बाद वे बाकी फिल्मों में भी मासूम छवि वाले किरदार की भूमिका निभाते रहे हैं. याद करें, फिल्म अंदाज अपना अपना का प्रेम और हम आपके हैं कौन के प्रेम को. यह बात दावे से कही जा सकती है कि उनके प्रशंसक उन्हें इन फिल्मों से ही मिले. लेकिन बाद में उनके लार्जर देन लाइफ छवि में दर्शक भी गिरफ्त हुए. एक अभिनेता अगर यह बात स्वीकारता है कि उसने खुद को कुछ फिल्मों में थोड़ा खोया पाया. तो यह बात तारीफे काबिल है. चूंकि जिस चोटी पर सलमान हैं, वहां से सुपरसितारा नीचे झांकना भी पसंद नहीं करते और सलमान तो नीचे उतरने को तैयार हैं. सलमान जानते हैं कि बाकी सभी निर्देशक कहीं न कहीं उनकी छवि से अपना मुनाफा कमा रहे हैं. लेकिन सूरज उनके जिस पहलू को छूते हैं, वह किसी और निर्देशक के दम की बात नहीं. सो, वे लौटे हैं. सूरज पिछले कई दशकों में उन निर्देशकों में से एक हैं, जिन पर ग्लैमर हावी नहीं है. जो आज भी पारिवारिक मूल्यों को आधार मान कर चलते हैं. उम्मीद है कि दर्शकों को सूरज का यह प्रेम रास आयेगा.

जज्बे की सीख

जैकी श्राफ ने हाल ही में फिल्म हैप्पी न्यू ईयर के ट्रेलर लांच के दौरान बातचीत के क्रम में स्वीकारा कि उन्होंने कभी चाहत नहीं की थी कि वे फिल्मों में नायक बनें. उन्होंने शुरुआती दौर से ही महसूस कर लिया था कि वे खलनायक ही बनेंगे. उन्हें अपनी पहली फिल्म स्वामी दादा के दौरान ही इस बात का एहसास हो गया था कि उनके पास शक्ल और सूरत नहीं हैं. तो वे कैसे नायक बन पायेंगे. लेकिन उन्हें मौके मिलते गये और उन्हें नायक बनने का मौका मिला. किसी जमाने में अभिषेक जैकी दा के फैन हुआ करते थे. जैकी श्राफ ने यह बात खुद शेयर की कि वह अमिताभ बच्चन के फैन थे. लेकिन उनके बच्चे यानि श्वेता और अभिषेक जैकी के फैन थे और एक बार चेन्नई में शूट के दौरान अमिताभ बच्चन ने आकर जैकी से मुलाकात की थी और अपने बच्चों को आॅटोग्राफ  दिलाया. जैकी मानते हैं कि उन्हें जिंदगी में वह सबकुछ मिला, जिसकी कल्पना उन्होंने नहीं की थी. जैकी का बीरू बोल कर बात करने का अंदाज आज भी बरकरार है. जैकी उन चुनिंदा अभिनेताओं में से एक हैं, जो आज भी दिल से बोलते हैं और सच बोलते हैं. उनकी सादगी अब भी बरकरार है. उन्होंने जिस जगह से शुरुआत की थी और आज जो मुकाम हासिल किया है. उस लिहाज से वह चाहते थे तो खुद को अपने जड़ से जुदा कर सकते थे. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. चूंकि उन्हें अपने जड़ से प्यार है. जैकी स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि लोगों को शाहरुख से सीखना चाहिए कि किस तरह छोटा सा लड़का मुंबई से बाहर से आया. मेहनत करके आज वह बॉलीवुड का बादशाह है. दरअसल, वाकई ग्लैमर के पक्ष कुछ भी हों. लेकिन वाकई जैकी श्राफ, अक्षय कुमार, शाहरुख खान जैसी शख्सीयत से यह सीखने की कोशिश करनी चाहिए कि जज्बा हो तो मुकाम मिल ही जाता है.

फिल्मों के वास्तविक रिश्ते

पिछले कई महीनों से लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं कि सुजैन और ऋतिक के तलाक की वजह अर्जुन रामपाल हैं।  अर्जुन सुजैन के करीबी दोस्त हैं और उनकी पत्नी मैहर भी सुजैन की काफी अच्छी दोस्त हैं।  अंतत : दोनों ने निर्णय लिया कि वे अपनी ख़ामोशी तोड़ेंगी और अपनी बात रखेंगी।  उन्होंने एक अंग्रेजी अख़बार से बातचीत करते हुए बताया कि दोनों के बीच कोई मतभेद नहीं हैं।  पूरी बातचीत में एक बात गौरतलब थी कि मेहर ने बातचीत में जिक्र किया है कि जिस दिन ये खबर बनी थी कि वे एक पार्टी ने अर्जुन रामपाल से नाराज होकर गई थीं , क्यूंकि अर्जुन के साथ सुजैन को देख कर उन्हें बुरा लगा था।  मेहर से स्पष्ट करते हुए कहा है कि उसदिन उन्हें अचानक माहवारी की समस्या आ गई थी।  मेहर का इस हद तक स्पष्टीकरण देना इस बात को दर्शाता है कि वाकई फिल्म पत्रकारिता में पीत पत्रकारिता इस कदर हावी है कि एक महिला को अपनी बात को साबित करने के लिए ऐसी बातें भी दुनिया के सामने रखनी पद रही हैं , जो बेहद गोपनीय हैं।  हाँ यह सच हैं कि वर्तमान में जितनी खबरें फिल्म जगत से आती हैं उनमे आधी से ज्यादा खबरें सही होती हैं।  लेकिन कुछ खबरों को जान बूझ कर तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाना भी कहाँ तक उचित है।  जाहिर है मीडिया इस हद तक सेलेब्रिटीस की दुनिया में एंट्री कर चुकी है कि वहां बने रिश्ते आसानी से बदल जाएं। चूँकि फ़िल्मी दुनिया में यूं ही रिश्तों के धागे कमजोर ही होते हैं।  सलमान और शाहरुख़ ने अपनी दुश्मनी भी दिल से निभाई हैं लेकिन उन्होंने एक निर्णय बिलकुल सही लिया कि उन्होंने कभी सार्वजनिक जगहों पर एक दुसरे के बारे में छींटाकशी नहीं की और शायद यही वजह है आज दोनों एक दूसरे से मिलने पर कम से कम नजरें नहीं फेरते। फिल्म एक विलेन में नायिका नायक को समझती है कि प्यार को प्यार से जीता जा सकता है नफरत से नहीं। लेकिन कई बार मीडिया उन रिश्तों को सुधरने का मौका नहीं देता और रिश्ते बिखरते जाते हैं।  क्या वाकई हम इस कदर कठोर हो चुके हैं कि हमें अच्छे रिश्ते में भी खोट ही नजर आते हैं।  क्या हम वाकई संवेदनहीन हो चुके हैं 

30 साल का सफर


 आज प्रभात खबर के 30 साल पूरे हो रहे हैं. यह हमारे लिए गौरव की बात है कि  प्रभात खबर ने पत्रकारिता जगत में जो एक अलक जगाई थी. उसे 30 साल तक निष्पक्ष होकर ईमानदारी से निर्वाह करने में कामयाब रहा. प्रभात खबर की शुरुआत 1984 में हुई थी और इसी वर्ष टेलीविजन ने अपने शब्दकोश में मनोरंजन शब्द जोड़ा. मतलब छोटे परदे पर धारावाहिकों की शुरुआत हुई. और दर्शकों को मिला परिवार का नया सदस्य.इन 30 सालों में फिल्मों की दुनिया ने जितने कलेवर बदले हैं. टेलीविजन की दुनिया में भी उतने ही प्रयोग हुए. हमलोग के रूप में भारत ने अपना पहला धारावाहिक टीवी पर देखा और देखते ही देखते मझलकी, बड़की, छुटकी, लल्लो, बसेसर राम हमारी जिंदगी के हिस्से बन गये. इनकी बातें घर घर में होनेवाली. हमलोग ने ही आगे चल कर टीवी की दुनिया को एक बुनियाद दी और हमें मुंगरीलाल के हसीन सपने, बुनियाद, मिट्टी के रंग जैसे शो देखने को मिले. धीरे धीरे बच्चे गुलजार साहब के साथ चड्डी पहन कर फूल खिलाने लगे, तो चित्रहार और रंगोली देखे बिना ऐसा लगने लगा जैसे जिंदगी से ताल  ही खत्म हो गयी है. यह हिंदी टेलीविजन का वही सुनहरा दौर था, जहां शो का नाम फ्लॉप शो था. लेकिन वह सबसे हिट शो था. जसपाल भट्टी उस दौर के कपिल शर्मा थे. यह टेलीविजन का वही सुनहरा दौर था, जिसने अरुण गोविल को ताउम्र भगवान राम बना कर दर्शकों के दिलों में विराजमान कर दिया तो नितिश भारद्वाज सबके लिए कृष्ण बने. आरके लक्ष्मण के मालगुड़ी डेज की यादें आज भी डायरी में समेटी हुई है. दुनिया देखना तो अब हमने शुरू किया. आंखें तो हमें सुरभि ने ही दे दी थी. उस दौर में टीवी उतना श्रृंगार नहीं करती थी. लेकिन फिर भी वह सोलह श्र्ृांगार से सजी धजी खूबसूरत मासूम नजर आती थी.

ओपनिंग पर मुनाफा


 शाहरुख खान ने निर्णय लिया है कि अब वे अपनी आगामी फिल्म हैप्पी न्यू ईयर दीपावली के दिन नहीं बल्कि दीपावली के दूसरे दिन रिलीज करेंगे. इसकी वजह यह है कि शाहरुख का मानना है कि दीवाली के दिन लोग अपने घर से बाहर नहीं निकलते. वह लक्ष्मी पूजन में व्यस्त रहते हैं और ऐसे में उनके बिजनेस पर बुरा फर्क पड़ सकता है. शाहरुख खान से पहले रितिक रोशन ने भी फिल्म कृष 3 को दीवाली से तीन दिन पहले रिलीज किया था. चूंकि हकीकत यही है कि इन दिनों सिर्फ इस बात की जंग नहीं है कि कौन सी फिल्म 100 करोड़ क्लब में पहुंची है. कौन सी नहीं. इन दिनों तो हर दिन आंकड़ों का आंकलन हो रहा. कि किस कलाकार की फिल्म ने किस दिन कितनी कमाई की. ट्रेड पंडित इसका पूरा व्योरा लेकर बैठ रहे हैं और कलाकार भी इस हिसाब किताब में पूरी दिलचस्पी दिखा रहे. जाहिर है शाहरुख भी यही चाहते हैं कि वह किसी भी हाल में बाकी खान से अपनी फिल्म की ओपनिंग में पीछे न रह जायें. फिलवक्त किक की काफी चर्चा है. सो, शाहरुख चाहते हैं कि वह ओपनिंग पर भी सारे रिकॉर्ड तोड़ें. सो, वह कोई रिस्क नहीं लेना चाहते. वे नहीं चाहते कि प्रतिशत में कमी आये. दरअसल, हकीकत यही है कि इन दिनों जो होड़ शुरू हुई है. वह तील को ताड़ बनाने के लिए काफी है. अब निर्माता या कलाकार वीकएंड की प्रतीक्षा नहीं करना चाहता. वह सोमवार तक धीरज नहीं धर सकता. उसे ओपनिंग पर  ही खुद को बेताज बादशाह साबित करना है. चूंकि हकीकत यही है कि इन दिनों फिल्में जिस लिहाज से बन रही हैं. फिल्म का फर्स्ट डे यानी ओपनिंग महत्व रखता है. क्योंकि अगर फिल्म अच्छी है तो माउथ पब्लिसिटी से आगे भी दर्शक आयेंगे. लेकिन अच्छी नहीं है तो ओपनिंग के बाद दर्शक घटते जायेंगे. सो, सभी चाहते हैं कि पहले दिन ही मुनाफा कमा लिया जाये. 

परदे व निजी जिंदगी में स्टार्स पेरेंट्स


 काजोल की बेटी नयाशा को अपनी मां काजोल की फिल्में नापसंद हैं. वजह यह है कि उनकी मम्मी काजोल ने जिन फिल्मों में काम किया है. वे रोने धोने वाली फिल्में हैं. नयाशा ने वास्तविक जिंदगी में अपनी मां को देखा है कि वह कितनी खुशमिजाज हैं. वह हर वक्त मस्ती के मूड में रहती हैं. फिर फिल्मों में वे रोने धोने वाले रोल क्यों करती हैं. नयाशा की इच्छा है कि वह उनके पिता अजय देवगन के साथ गोलमाल जैसी फिल्में करें. अक्षय कुमार के बेटे आरव को अपने पिता की एक् शन फिल्में ही पसंद है. इसकी वजह साफ है कि आरव जानते हैं कि उनके पिता निजी जिंदगी में भी एक् शन प्रेमी हैं और अक्षय की वजह से ही आरव ने मार्शल आर्ट सीखा. शाहरुख के बेटे ने पिता की फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस देखी. इसके बाद दीपिका पादुकोण ने जब पूछा कि उसे फिल्म कैसी लगी तो उन्होंने शाहरुख खान मार्के वाली ही फिल्म है. मसलन उनके बेटे भी इस बात से वाकिफ हैं कि शाहरुख खान की फिल्में कैसी फिल्में होंगी. खुद काजोल को अपनी मां की फिल्में पसंद नहीं आती थीं. दरअसल, एक कलाकार जब कैमरे के सामने होता तब भी और जब कैमरे के सामने नहीं होता तब भी किसी न किसी पात्र को ही जी रहा होता है. यह बहुत जाहिर सी बात है कि स्टार्स किड अपने पेरेंट्स को निजी जिंदगी में बखूबी जानते हैं. और चूंकि अभी उनकी उम्र बेहद कम होती है. वे उसी मां या पिता को परदे पर भी देखना चाहते हैं. चूंकि अभी वह किरदार और वास्तविक जिंदगी में फर्क करने की स्थिति में नहीं होते और वे निजी जिंदगी की छवि से ही परदे पर दिख रहे माता पिता की छवि को आंकने लगते हैं. यही वजह थी कि श्रद्धा कपूर के दोस्त यह समझ नहीं पाते थे कि उनके पिता शक्ति कपूर फिल्मों में विलेन हैं. वे श्रद्धा को इस बात से चिढ़ाते रहते थे और यह टिस उनके मन से कभी जा ही नहीं पाती.

निर्देशक और दर्शक का रिश्ता


रानी मुखर्जी ने आदित्य चोपड़ा के बारे में बताया कि आदित्य आज भी सारी फिल्में थियेटर में आम लोगों के बीच देखते हैं. चूंकि वह लोगों के रियेक् शन को देखना चाहते हैं और समझना चाहते हैं. और यही वजह है कि आदित्य मीडिया या किसी पब्लिसिटी में नहीं रहना चाहते. ठीक इसी तरह सूरज बड़जात्या आज भी सारी फिल्में आम लोगों के साथ बैठ कर थियेटर में देखना पसंद करते हैं. चूंकि वह भी देखना चाहते हैं कि दर्शक किस तरह की बातों पर हंस रहे हैं. किन बातों पर लोगों को निर्देशक की बात अच्छी नहीं लगी. सूरज भी इसी वजह से दर्शकों के  सामने नहीं आना चाहते. सूरज बताते हैं कि जब हम आपके हैं कौन उन्होंने इंडस्ट्री के लोगों को दिखायी तो सभी ने कह दिया था कि यह फिल्म फ्लॉप होगी. लेकिन जब सूरज फिल्म देखने आम थियेटर में गये तो उन्होंने महसूस किया कि दर्शक किस तरह फिल्म एंजॉय कर रहे. खास कर रेणुका सहाणे की मौत पर थियेटर में बैठे लोगों की आंखों में आंसू आ गये थे. दरअसल, हकीकत यही है कि किसी फिल्म के प्रति अगर आपको नजरिया समझना है तो आप उसे किसी बुद्धिजीवी की नजर से देख कर आंक नहीं सकते. यह हर निर्देशक की सोच होनी चाहिए कि वह अपने दर्शक को समझे और अगर फिल्म में कुछ कमियां भी है तो उन्हें सुनने की हिम्मत रखे. तभी वह वास्तविक फिल्मकार है. आपकी फिल्म आपको पसंद आयी. दर्शकों को नहीं. इससे साफ है कि वह फिल्म दर्शकों को जोड़ नहीं पायी. और अगर कोई निर्देशक अपनी स्वपनीली दुनिया में रहता है और खुश होता है कि उसने बेहतरीन फिल्म बनाई है तो वह उसकी अतिश्योक्ति ही होगी और वर्तमान में इससे ग्रस्त कई निर्देशक हैं. सूरज और आदित्य जैसे निर्देशकों की जरूरत है. जो आज भी दर्शकों को महत्व देते हैं. और यही सच्चाई है कि दर्शक है तो सिनेमा है.

हम आपके हैं कौन के २० साल

हम आपके हैं कौन के २० साल पूरे हुए।  यह महज केवल फिल्म के २० साल पूरे नहीं हुए।  बल्कि उन तमाम हिंदी दर्शक वर्ग , जिन्हे शादी, परिवार और परिवार के जश्न में विश्वास है , उनकी भी भावना के २० साल पूरे होने की तरह है. मेरी उम्र के लगभग हर दर्शक के दिलों में हम आपके हैं कौन की खास जगह होगी और खास यादें होंगी।  मुझे याद है ये फिल्म बोकारो के देवी थिएटर में मैंने अपने पूरे मोहल्ले के लोगों के साथ देखी थी।  हम शायद २० लोग रहे होंगे।  बालकनी में हमें जगह नहीं मिली थी।  लेकिन कोई भी वापस जाने को राजी न था।  हमने स्टाल में बैठ कर फिल्म देखी।  लेकिन यह फिल्म की कहानी का ही कमाल था कि हम यह भूल गए कि हम कहाँ बैठ कर फिल्म देख रहे हैं।  रेणुका सहाणे की मौत पे हॉल में बैठे लोगों की सिसकियाँ साफ़ सुनाई दे रही थी और   दीदी तेरा देवर दीवाना पर सीटियों की आवाज़. सच कहूँ तो फिल्म देखने के बाद अपनी बड़ी बहनों से कहने लगी थी जल्दी शादी करो।  कोई पूछता तो कहती दीदी के देवर से ही शादी करुँगी।  बहरहाल , आज २० साल पुरानी होने के बावजूद यह फिल्म कई अंदाज़ में जवां हैं।  जूता चुराने का रिवाज़ इसी फिल्म से शुरू हुआ और आज ये शादियों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।  कई फिल्म क्रिटिक ने माना कि इस फिल्म ने शादियों में खर्च को बढ़ावा दिया।  जबकि सच्चाई यह कि शादी की रश्मों को जितनी सार्थकता इस फिल्म ने प्रदान की है. किसी फिल्म ने नहीं की।  कल्पना किजीये तीन घंटे किसी फिल्म में केवल हंसी मजाक , एक परिवार दिखा कर कोई निर्देशक दर्शकों को हंसा रहा है।  रुला रहा है।  आज भी टीवी पर जब भी यह फिल्म प्रसारित होती है ,मैं दावें से कह सकती रिमोट पर उँगलियाँ ठहर जाती हैं सब्की. सब दोबारा उसी फ्रेशनेस के साथ उसे देखते हैं।  कई प्रेमी युगलों का यह सपना आज भी है कि काश उनकी प्रेम कहानी निशा और प्रेम सी हो।  अब  थीम शादियां हो रही।  जहाँ वीडियो बनाने वाले तय करते हैं कि दुल्हन को कितने ऐंगल में और कब हंसना है।  जहाँ सब कुछ तय है।  ऐसे दौर में भी अगर हम आपके हैं कौन सर्श्रेस्ट रहेगी।  हिंदी सिनेमा की पवित्र फिल्मों में से एक रहेगी 

चाचा चौधरी के प्राण


 चाचा चौधरी का दिमाग तो कंप्यूटर से भी तेज चलता है...बचपन की ढेर सारी यादें उनसे जुड़ी हैं. कॉमिक की दुनिया में एक दौर में चाचा चौधरी और साबू ने एकल राज किया है. इस साम्राज्य को स्वरूप देने वाले, बच्चों के चेहरे पर मुस्कान लानेवाले प्राण अब हमारे बीच नहीं हैं. लेकिन यह उनकी सृजनशीलता का ही कमाल है. जो वह दशकों याद किये जायेंगे. कॉमिक की दुनिया में पहले जब केवल अंगरेजी कार्टून और किरदारों का दौर था. उस दौर में प्राण साहब ने चाचा चौधरी और साबू जैसे बिल्कुल ठेठ किरदारों को लांच किया. और वह लोकप्रिय हुए. चाचा चौधरी साबू की मदद से हर मुश्किल का आसान कर जाते थे. वह किसी देसी सुपरमैन से कम नहीं थे. कॉमिक की दुनिया में जो किंगडम चाचा चौधरी ने स्थापित किया. वह आज भी कायम है. शायद अब आनेवाले  जेनरेशन के बच्चे चाचा चौधरी से वाकिफ न हों. लेकिन हमने एक बेहतरीन दौर देखा है. चाचा चौधरी जीवन का हिस्सा बन चुके थे.हम बातों बातों में दोस्तों के बीच कहते...चाचा चौधरी समझते हो क्या खुद को और जो वाकई बुद्धिजीवी होते. उन्हें हम चाचा चौधरी के नाम से ही पुकारते. लेकिन अफसोस की बात यह है कि हमें अपने धरोहर को सहजेने के गुण नहीं मालूम. सो, हम इस तरह के सृजन को हल्के में ही लेते हैं. हमारे अपने घर परिवार में हमने रद्दियों में चाचा चौधरी की कॉमिक्स बेंच दी है. लेकिन अगर आप रद्दी वाले के पास भी जायें तो उस दौर में चाचा चौधरी की कॉमिक्स ही सबसे ज्यादा नजर आती थीं और इससे अनुमान लगाया जा सकता था कि वह कितने लोकप्रिय हैं. चाचा चौधरी में प्राण भरने वाले प्राण आज जब हमारे बीच नहीं हैं. तो शायद कई लोगों को प्राण साहब के बारे में जानकारी मिली. वरना, हमारे लिए वही कार्टून कैरेक्टर हमारी जिंदगी का हिस्सा हैं.

किशोर की चाय की प्याली


अनुराग बसु की इच्छा थी कि वह किशोर कुमार पर बायोपिक फिल्म बनाये. इस फिल्म में मुख्य किरदार रणबीर कपूर निभानेवाले थे. लेकिन किशोर कुमार के परिवार वालों ने इस बात से नामंजूरी जतायी और फिलवक्त अनुराग को अपने इस सपने पर विराम लगाना पड़ा. लेकिन अगर वाकई किशोर कुमार पर फिल्म बने तो वह बेहद दिलचस्प होगी. चूंकि किशोर खुद अपनी जिंदगी में बेहद रोचक रहे हैं. वे केवल परदे पर नहीं, अपितु परदे के बाहर भी लोगों का मनोरंजन करते थे. या यूं कहें वह खुद का मनोरंजन करते थे. प्रीतिश नंदी को दिये एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया है कि किस तरह उन्होंने इंटीरियर डेकोरेटर को जब अपने लिविंग रूमको नेचुरल लुक देते हुए घर के अंदर फाउंटेन, पेड़ पौधे, पंखे पर कौएं, लिविंग रूम में नाव तैराने की बात कही तो उनका आर्किटेक्ट वहां से भाग खड़ा हुआ. किशोर कुमार खाली समय में अपने घर के पेड़ पौधों से बातें करते थे. और लोग इस बात पर भी उनका मजाक बनाते थे. किशोर कुमार अपनी फीस को लेकर सख्त थे. वे अपने सेके्रटरी से कोड वर्ड में बात करते थे. वे इशारों में पूछते चाय पीली क्या...इसका मतलब था कि फीस मिली क्या...जब तक उनके सेक्रेटरी हरी झंडी नहीं दिखाते. वे बेसुरे ही बने रहते. जब सेक्रेटरी कहते कि हां, सर कड़क चाय मिली है. बस वे अपनी आवाज में सुरीलापन ले आते. दरअसल, किशोर कुमार चूंकि वास्तविक जिंदगी में भी इतने नटखट थे और उन्हें खुद पर इस कदर आत्मविश्वास था कि उन्हें किसी बात से डर नहीं लगता. अगर उन्हें आधी फीस मिलती तो वह आधा मूंछ मुड़वा कर चले आते और निर्देशक से कहते. मेरे आधे चेहरे की शूटिंग कर लो. यह किशोर कुमार की ही खूबी थी कि उन्होंने निर्देशकों का नाम लेते हुए कहा है कि कई निर्देशकों को कैमरा थामने भी नहीं आता था. 

आदित्य का रुमानी अंदाज


आदित्य चोपड़ा और रानी मुखर्जी के व्याह के बाद रानी मुखर्जी द्वारा दिये कई इंटरव्यू में आदित्य चोपड़ा का जिक्र करना नहीं भूल रहीं. रानी के ही बहाने आदित्य चोपड़ा की जिंदगी के कई पहलू सामने आ रहे हैं. यह बात जगजाहिर है कि आदित्य को मीडिया से मिलना पसंद नहीं और वह अपनी तसवीरें भी अखबारों में देखना पसंद नहीं करते. मीडिया वाले आदित्य को कई सालों से इस बात के लिए कोसते आ रहे हैं. लेकिन आदित्य ने इस बात की परवाह नहीं की है. और आदित्य के इस व्यवहार की वजह से मीडिया ने यह गलतफहमी पाल ली है कि आदित्य काफी अकड़ू हैं. चूंकि मीडिया वर्तमान में वह स्थान हासिल कर चुकी है कि वह अपना निर्णय और सोच लोगों पर थोप सकती है. अपनी रिपोर्टिंग से मीडिया से साबित कर सकती है कि किसी व्यक्ति का क्या व्यक्तित्व है. और विडंबना यह है कि मीडिया ने जो आंखें हमें दी हैं. हम उसी को आंखों देखी मानने लगे हैं. लेकिन रानी मुखर्जी के माध्यम से आदित्य के व्यक्तित्व की जो झलकियां जानने को मिल रही हैं. उससे यही प्रतीत होता है कि आदित्य एक आम इंसान की तरह बिल्कुल सामान्य जिंदगी जीना पसंद करते हैं. यशराज के मालिक होने के बावजूद उन्हें शोर शराबे और दिखावे में दिलचस्पी नहीं. लेकिन अपनी जीवनशैली को पूरी जिंदागानी के साथ जीता है. रानी के अनुसार आदित्य बहुत फूडी हैं और वे रानी को दुनिया के हर बेस्ट रेस्टोरेंट का खाना खिलाना चाहते हैं. उनका सेंस आॅफ ह्मुमर अच्छा है. रानी के कहने पर ही उन्होंने बांग्ला अंदाज में व्याह रचाया. वह फैंटेसी दुनिया में विश्वास रखते हैं. एक प्रैक्टिल निर्माता होने के बावजूद निजी जिंदगी में स्वप्नीली जिंदगी में रहना, रिश्तों में विश्वास करना, प्यार में विश्वास करना दर्शाता है कि वाकई एक व्यक्ति चाहे तो दिखावे की बजाय भी खुशी के साथ जिंदगी निर्वाह कर सकता है. 

आमिर और पीके का पोस्टर


आमिर खान की फिल्म पीके के पहले पोस्टर को देख कर लोग हतप्रभ है. लोग इस बात से दुखी हैं और अपना आक्रोश जाहिर कर रहे हैं कि जो आमिर खान नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं और सत्यमेव जयते शो लेकर आते हैं. वह न्यूड कैसे हो सकते हैं. कानपुर में तो मामला हाइ कोर्ट तक तर्ज हो गया है. निश्चित तौर पर जल्द ही न्यूज चैनल पर इस मुद्दे पर पैनल भी बैठेगी. जबकि आमिर के लुक में ऐसी कोई बात नहीं, जिसे लेकर शोर मचे. राजकुमार हिरानी फिल्म के निर्देशक हैं. इससे यह स्पष्ट है कि राजकुमार ने यूं ही यह लुक आमिर को नहीं दिया होगा. चूंकि राजकुमार किसी पब्लिसिटी के मोहताज नहीं हैं. उनकी फिल्ममेकिंग शेष सभी निर्देशकों ने अलग है. वे एक सीन सोचने में छह छह महीने लगा देते हैं. सो, यह आरोप कि महज लोकप्रियता हासिल करने के लिए आमिर को यह लुक दिया गया है तो यह बेहद तर्कहीन बात होगी. दूसरा पहलू यह भी है कि वह आमिर नहीं आमिर के रूप में फिल्म का किरदार है. यह भारतीय दर्शकों की विडंबना रही है कि वे रामायण जैसे शो में राम का पात्र निभा रहे अरुण गोविल को राम मान कर उनकी ही पूजा करने लगते हैं. अरुण ने खुद स्वीकारा है कि सिर्फ इसलिए चूंकि उन्होंने राम की भूमिका निभायी. वे भविष्य को कोई नकारात्मक भूमिका नहीं निभा पाये. चूंकि दर्शकों ने उन्हें स्वीकार ही नहीं किया. नीतिश भारद्वाज को भी लोग ताउम्र श्री कृष्ण ही मान बैठे. अभिनेता मोहित रैणा ने फिल्म क्रीचर 3 डी का आॅफर ठुकरा दिया चूंकि उनका मानना है कि लोग महादेव को एक विलेन के रूप में देखना पसंद नहीं करेंगे. हमें यह समझना होगा कि किरदार और वास्तविक जिंदगी में फर्क है. हर कलाकार को हक है कि वह अपने किरदार को 100 प्रतिशत रूप दे, जो कि निर्देशक की मांग है. सो, आमिर के लुक पर जो हंगामा बरपा है वह बेबुनियाद है.

वास्तविक जिंदगी के जय वीरू


दोस्ती का दिन बीत चुका है।  पिछले कई सालों से यह दिन अगस्त के पहले रविवार को मनाया जा रहा है।  शायद जिसने भी यह दिन तय किया है उसके जेहेन में यह बात रही होगी कि रविवार का दिन चूंकि छुट्टी का होता है तो दोस्तों और यारों को एक दूसरे के साथ वक़्त गुजारने का वक़्त मिल जायेगा।  भले ही दोस्ती के मायने बदल चुके हैं।  लेकिन दोस्ती मनाने का दिन नहीं बदला है।  अब दोस्तों की किस्में भी बदल गई हैं। फेसबुक और ट्विटर के दोस्त भी जिंदगी का हिस्सा बन गए हैं।  साथ ही  दोस्ती करने और निभाने के तरीके भी बदल चुके हैं। पिछले दिनों अनुपम खेर के शो में ओम पूरी और नसीरुद्दीन शाह आये थे।  ओम पुरी  ने बार बार ये बात दोहराई कि आज वे जिस मुकाम पे हैं वह दोस्तों के कारण ही हैं। किस तरह नसीर साहब ने उन्हें फिल्म संस्थान आने के लिए प्रेरित किया।  किस तरह नसीर साहब ने ओम पुरी को किसी टीवी के इंटरव्यू में जाते वक़्त अपनी शर्ट उतार कर दे दी थी।  किस तरह ओम की अग्रेजी भाषा को नसीर साहब ने ही दुरुस्त किया।  क्या आज हम ऐसी दोस्ती की कल्पना कर सकते हैं।  नसीर और ओम वाकई वास्तविक जिंदगी के जय वीरू हैं।  क्या वाकई आज हम बिना किस मकसद और अपना नुक्सान और फायदे के दोस्ती निभा सकते हैं।  आज तो दोस्त अपना क्रेडिट कार्ड भी इसलिए इस्तेमॉल करने के लिए देता है।  क्यूंकि इससे उसे पॉइंट्स मिलते हैं।  यानी मुनाफा भी उनका।  ओम और नसीर के बीच एक बात गौर करने की है कि ओम नसीर के बारे में अपनी राय देते जा रहे थे।  नसीर के चेहरे से कहीं इस बात का गुरुर नहीं झलक रहा था कि उन्होंने ओम पुरी पे कितने एहसान किये हैं।  जबकि वर्तमान में हम जिसे दोस्त मानते हैं उन्हें अगर अपने पैसे से बर्गेर भी खिला दिया तो वक़्त आने पर दोहराते हैं कि मैंने उसे खिलाया था।  दरअसल , हकीकत यही है कि जैसे वक़्त की मार जिंदगी के हर पहलू पर पड़ी है।  दोस्ती के रिश्ते पे भी पड़ी है।  हालाँकि फिल्म हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया , किक और हीरोपंती जैसी फिल्मों में अब भी दोस्तों के लिए मार खाने और जोखिम उठाते दोस्त नजर आये हैं।  लेकिन वास्विक जिंदगी में ऐसे दोस्तों की तलाश मुश्किल है। हाँ , अब दोस्ती भी फ़िल्मी बातें ही हो गई है।  अब दोस्ती गिव एंड टेक रिश्ते में बदल चुकी है