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20150318

 होली का मौका है और टीवी के सितारे भी पीछे नहीं. वे भी एक दूसरे पर चुटकी ले रहे...कैसे आप खुद देखें.


 1.छोटे परदे के स्टार्स बहुत खुश हैं.वे पाकिस्तानी टीवी स्टार्स को मौका मौका का विज्ञापन दिखा कर चिढ़ा रहे. तभी पाकिस्तानी टीवी स्टार्स जिंदगी चैनल की टीआरपी दिखाते हैं और कहते हैं कि क्रिकेट में हारे हैं लेकिन यहां तो सबका दिल जीत न... और फिर वे भी मौका मौका गीत गाते चले जाते हैं.
2.
 आलिया और करिश्मा तन्ना एक ही कॉलेज में पढ़ती हैं...दोनों आपस में लड़ रही हैं. टीचर के पूछने पर करिश्मा तन्ना ने बताया कि आलिया ने मेरी कॉपी की है...
टीचर ने पूछा  क्या...
करिश्मा तन्ना : सर इसने मेरी कॉपी की है..एनसार शीट को खाली छोड़ दिया है.
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बिग बॉस को लेकर सलमान और फराह खान में बातें हो रही है...
सलमान : हे फराह, हैप्पी होली .टेल मी हू इज द विनर आॅफ बिग बॉस
फराह : गुलाटी
सलमान : बट आइ थॉट करिश्मा इज विनर
फराह : नहीं...बिग बॉस का तो नहीं जीत पायी. लेकिन आलिया को वह टक्कर दे सकती है. सबसे बड़ा डंबो कौन...में


टीआरपी चाची के साथ रिमोट काका जरा आज पीके मूड में होली खेलना चाहते हैं. तो जरा सुने इनकी होलियाना नोक झोक इन पीके स्टाइल
 टीआरपी चाची से रिमोट काका पूूछते हैं कि ओजी टीआरपी, काहे कंफ्यूजिया रही हो...गब्बर की तरह. आजे है होली. फ्रस्टीयाओ मत...पुआ पुरी खाओ. लेकिन तनिक हमरो बात सुनती जाओ. हर वक्त  हमरी जिंदगी का तो तुम रिमोट अपने हाथ में रखिये ली ओ. और टीवीओ का रखी रहती हो. लेकिन आज हम तुमरा टेस्ट लेंगे. जवाब ठीक दी तो प्राइज में तुमको कॉमेडी नाइट्स विद कपिल का यूटयूब पर एपिसोड दिखायेंगे बाकी गलत बोली तो ...और गलत जवाब देने पर बिग बॉस के घर में चुनवा देंगे. बोलो तैयार  हो...
टीआरपी काकी : हां...काहे नहीं...
रिमोट काका : तो बताओ, भारत रत् न किसको मिलना चाहिए.
टीआरपी काकी : जी सोनी टीवी के सीआइडी वाले एसीपी पद्मुन को. 18 साल के करियर में उसने 800 केसेज सॉल्व किया और सोचो जरा कभी ब्रेको नहीं लिया है.
रिमोट काका : अच्छा दूसरा सवाल...क्योंकि की बा का चाइल्डहुड क्रश कौन है
टीआरपी काकी : (शरमाते हुए) जी, किचन किंग हो या गरम मसाला...कस्तूरी मेथी अदेगी मिरच...असली मसाले सच सच...एमडीएच...एमडीएच वाले दादाजी.
रिमोट काका : अरे टीआरपी, हमरा एक बात नहीं बुझाया इ इस बार मास्टर शेफ वेज काहे रखा है
टीआरपी काकी : अरे आप तो एकदमे लूल हो...उ बाबूजी( आलोक नाथ) बिग बॉस देख देख के उनका हाजमा नू खराब हो गया था. एहीसे उनको खुश करने  के लिए सांस्कारिक मास्टर शेफ आया है न.
रिमोट काका : अब जो हम सवाल पूछेंगे न उसका जवाब सोच समझ के देना. टफ है...
हू इज द बिटा वर्जन आॅफ सिधूजी
टीआरपी काकी : अर्चना पूरन सिंह
रिमोट काका :  अरे वाह गुरु, खड़का दिया आज तो खेड़का दिया. हो हाहाहा ठोको, ठोको ताली...एकदम करारा जवाब वाह वाह. छा गयी तुम तो एकदम छा गयी.
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हंसने हंसाने व होलियाना माहौल की और कॉमेडी नाइट्स कपिल शो के साथ फ्री मिलने वाले सिधू जी के मुहावरों और दोहों की बात न हो ये कैसे हो सकता है...तो सिधू जी के मूड में जरा टीवियाना मुहावरों का लुत्फ उठाइए.
ठोको ताली
1. ओये हारकर जीतने वाले को बाजीगर कहते हैं
और जिसकी हंसी में है नहीं कोई साइलेंसर उसे...
सिधू जी के हंसी का स्कोर कहते हैं.
ठोको ठोको ताली...






सार्थक सोच वाली फिल्म

 फिल्म : दम लगाके हईशा
कलाकार : भूमि पेडनेकर, आयुष्मान खुराना, सीमा पावा, संजय मिश्रा, अलिका, शीबा चड्डा
निर्देशक : शरत कटरिया
रेटिंग : 3.5 स्टार

 फिल्म दम लगाके हईशा के निर्देशक शरत कटरिया ने अपनी बातचीत के दौरान इस बात का जिक्र किया था कि आदित्य चोपड़ा ने एक दिन में फिल्म की स्क्रिप्ट पढ़ कर फिल्म को हां कह दिया. आप फिल्म देखेंगे तो यह बात भलिभांति समझ पायेंगे कि उनकी हां की वजह क्या रही. हाल के वर्षों में यशराज बैनर द्वारा बनाई गयी यह ईमानदार व शुद्ध देसी कहानी है. फिल्म के निर्देशक शरत ने हरिद्वार को जिस तन्मयता से कहानी में दर्शाया है. उस शहर की बारीकियां फिल्म के निर्देशक की सोच को गढ़ते हैं. िफल्म में बेवजह का शोर शराबा और इ हरिद्वार इ हरिद्वार है...यहां ऐसा ही होता का हल्ला नहीं है. यह फिल्म की सबसे बड़ी खासियत है. शहर या तिवारी परिवार से दर्शकों को मिलवाने में निर्देशक बेवजह वक्त जाया नहीं करते. वे सीधे कहानी की थीम पर आते हैं. यह कहानी संध्या और प्रेम की जिंदगी पर आधारित है.  कहानी 1995 की पृष्ठभूमि पर बनी है. प्रेम गायक कुमार सानू का फैन है और कैसेट रिकॉर्डिंग की दुकान चलाता है. वह दसवीं फेल है. लेकिन आम लड़कों की तरह उसके भी सपने हैं कि उसकी पत् नी सुंदर, सुशील मिले. लेकिन अपने पिता की नजर में निखट्ठू कभी अपने पिता का विरोध नहीं कर पाता. और उनकी पसंद की लड़की, संध्या जिसने बीएड किया है. लड़के से अधिक पढ़ी लिखी भी है. लेकिन वह स्लीम ट्रीम नहीं... संध्या से प्रेम की शादी तो हो जाती है. लेकिन संध्या और प्रेम के बीच प्रेम नहीं हो पाता. वजह सिर्फ संध्या का वजन है. प्रेम हर वक्त संध्या के वजन को लेकर उसे जलील करता रहता है. और लोगों के सामने वह संध्या को बेइज्जत कर देता है. दरअसल, निर्देशक ने इस सोच को बखूबी दर्शाने की कोशिश की है कि अब भी शादी के लिए लड़कियों का वजन सबसे अधिक महत्व रखता है. न जाने कितनी लड़कियों को सिर्फ इस हीन भावना से गुजरना पड़ता है, कितनी लड़कियों की न सिर्फ शादियां टूटती है, क्योंकि उनका वजन अधिक है. एक दृश्य में जब संध्या के वजन को लेकर प्रेम की बुआ खरी खोटी सुना रही होती है...उस वक्त संध्या का सामान्य सा जवाब होता है कि इसे मेटाबॉलिज्म कहते हैं...चूंकि संध्या पढ़ी लिखी है.इसलिए वह जानती है कि वजन बढ़ने की वजह क्या है. निर्देशक ने फिल्म में संध्या को अपने वजन को लेकर खुद से घृणा करते हुए नहीं दिखाया है. यह फिल्म की सबसे खास बात है. वरना, अब तक फिल्मों में लड़कियों को खुद को साबित करने के लिए वजन घटाते या दुखी होते दिखाया गया है. यह फिल्म उन तमाम लोगों के मुंह पर तमाचा मारती है, जो लड़की के रंगरूप व उसके वजन को तव्वजो देते हैं. न कि उसके हुनर और पढ़ाई को. संध्या का फिल्म में अपनी सोच में मजबूत होना फिल्म की सबसे बड़ी कामयाबी है. साथ  ही निर्देशक ने इन बातों पर खास ख्याल रखा है कि उन्होंने सिर्फ फिल्म के मुख्य कलाकार पर फोकस न कर. फिल्म के सभी सहयोगी कलाकारों की दमदार टीम तैयार की है. संजय मिश्रा, शीबा चड्डा, अलिका व सीमा पावा जैसे कलाकारों ने फिल्म को पूरी तरह से समर्थन दिया है. आप कहीं भी बोर नहीं होते. फिल्म में बेहतरीन पंचलाईन व संवाद हैं. फिल्म का सरप्राइज पैकेट फिल्म की मुख्य अभिनेत्री भूमि हंै. भूमि की यह पहली फिल्म है. लेकिन वह स्क्रीन पर जितनी विश्वसनीय लगी हैं. ऐसा लगा रहा, वह काफी सालों से कैमरा फेस कर रही हैं. उन्होंने अपनी पहली ही भूमिका में प्रभावित किया है. वे लाउड नहीं हैं. वे अति उत्साही नजर नहीं आयी हैं.भविष्य में उनके लिए अन्य विकल्प खुलेंगे. यशराज की सराहना होनी चाहिए कि वे अपने साथ काम कर रहे लोगों में हुनर को पहचान रहा और उन्हें मौके दे रहा. परिणीति के बाद भूमि उनकी बेहतरीन खोज हैं. आयुष्मान ने अपनी सीमाओं से बाहर जाकर अपना बेहतर प्रदर्शन देने की कोशिश की है. फिल्म के गीत वरुण ने लिखे हैं और वह फिल्म की सोच से बिल्कुल मेल खाते हैं. 90 के दशक को दर्शाने में गीतों ने पूरा सहयोग किया है. फिल्म मनोरंजक है. जरूर देखी जानी चाहिए

सफर नहीं था आसां...


छोटे परदे के किसी धारावाहिक में जब कोई अभिनेत्री शो का चेहरा बन जाती हैं, जो वही उस शो की पहचान हो जाती हैं. फिर उनकी पिछली जिंदगी और उनके संघर्ष को कोई याद नहीं रखता. लेकिन अगर कुछ पन्ने पलट कर देखें तो ऐसे कई कलाकार हैं, जिन्होंने इस इंडस्ट्री में काफी संघर्ष किया है और वे लंबे समय से मेहनत करते आ रही हैं, लेकिन उन्हें पहचान कई सालों की मेहनत के बाद मिली है. आमतौर पर इन अभिनेत्रियों से जुड़ी गॉसिप व उनके ग्लैमर की ही खबरें आती हैं. उनके संघर्ष की नहीं.  कई अभिनेत्रियां ऐसी भी हैं जो लंबे अरसे से से टेलीविजन में सक्रिय तो हैं, लेकिन उन्हें वह पहचान नहीं मिली, जिसकी वह हकदार हैं. टेलीविजन की दुनिया में भी अपनी राह बनाना इतना आसान नहीं.
द्रष्टि धामी
अक्सर द्रष्टि धामी के बारे में यह खबरें आती हैं कि वे मीडिया के प्रति रुखा व्यवहार रखती हैं. वे काफी मूडी हैं. वे मीडिया से कम बातें करना पसंद करती हैं. दरअसल, इसकी वजह यह भी है कि द्रष्टि धामी ने संघर्ष का एक लंबा दौर देखा है. उन्होंने इंडस्ट्री में कई साल दिये हैं. उन्होंने कई वीडियो एल्बम में काम किया है. जिस दौर में वीडियो एल्बम का दौर था. उस दौर में द्रष्टि ने कई लोकप्रिय एल्बम में काम किया. बकौल द्रष्टि मैं जिस परिवार से आती हूं. वह बहुत कंर्जरवेटिव फैमिली थी. मुझे वीडियो एल्बम में काम करने के लिए लगभग 10 लोगों से इजाजत लेनी पड़ी थी. आज भी जरूरत पड़ने पर मेरे कंजिन सपोर्ट करते हैं. लेकिन घर के बड़े बुजुर्गों को मेरे इस क्षेत्र में आने से परेशानी थी.  वे फिल्मों में अपना करियर बनाना चाहती थीं. लेकिन उन्हें वैसी सफलता नहीं मिली, जिसकी उन्हें उम्मीद थी. बाद में उन्होंने कई सहयोगी भूमिकाएं निभायी, जिनमें दिल मिल गये शो प्रमुख था. लंबी मेहनत के बाद द्रष्टि को गीत हुई सबसे पराई से लोकप्रियता मिली. बाद में कलर्स शो के लोकप्रिय धारावाहिक मधुबाला से भी काफी लोकप्रियता मिली.
परिधि शर्मा
जीटीवी पर प्रसारित हो रहे धारावाहिक जोधा अकबर की जोधा ने भी अपने अभिनय करियर में लंबी पारी खेली है. उनका भी सफर आसान न रहा. उन्होंने शुरुआती दौर में कई विज्ञापन में काम किया. बाद में उन्हें सहयोगी किरदार निभाने का मौका मिला. उन्होंने तेरे मेरे सपने में छोटी सी भूमिका निभा कर शुरुआत की. बाद में उन्हें रुक जाना नहीं में किरदार मिला. लेकिन असली पहचान उन्हें धारावाहिक जोधा अकबर से ही मिली. परिधि छोटे परदे की उन सशक्त महिलाओं में से एक हैं, जो जरूरत पड़ने पर अपनी आवाज उठाती हैं. हाल ही में उन्होंने अपने शो के निर्देशक द्वारा किये जा रहे बुरे बर्ताव पर आवाज उठाई थी.
ेसादिया सिद्दिकी
टेलीविजन की दुनिया में अब भी सादिया सिद्दिकी सक्रिय हैं. वे टेलीविजन की वरिष्ठ कलाकारों में से एक हैं. लेकिन आज भी वे प्रभावशाली हैं. उन्होंने शुरुआत शाहरुख खान की फिल्म कभी हां, कभी ना से की थी. वर्ष 1993 में. बाद में उन्होंने कई फिल्मों में काम किया.  ब्योमकेश बक् शी की रजनी, बनेगी अपनी बात की प्रियंका को कैसे भूला सा सकता है. एक दौर में जब स्टार बेस्टसेलर्स काफी लोकप्रिय थे. साधिया उसकी जान हुआ करती थीं. उन्होंने एक लंबी पारी खेली है. और वे लगातार अपनी मेहनत से जगह बना पाने में कामयाब हुई हैं. लेकिन अब तक उन्हें किसी धारावाहिक में लीड किरदार निभाने का पूरी तरह मौका नहीं मिला है. जबकि वे छोटे किरदारों में भी विश्वसनीय लगती हैं. धारावाहिक ससुराल गेंदा फूल का राधा का किरदार काफी लोकप्रिय हुआ. इन दिनों वे सतरंगी ससुराल में नजर आ रही हैं. न चाह कर भी वे अपनी उम्र से अधिक के कई किरदार निभा रही हैं. चूंकि यहां छोटे परदे पर ऐसी अभिनेत्रियों के लिए दमदार किरदार लिखे ही नहीं जाते.
ेसाक्षी तंवर
साक्षी तंवर आज टेलीविजन की दुनिया का एक बड़ा नाम हैं, लेकिन उन्होंने भी यह सफर आसानी से तय नहीं किया, वे लंबे समय से टेलीविजन की दुनिया में सक्रिय रही हैं. उन्होंने कई ऐसे किरदार भी निभाये हैं, जो कभी केंद्रीय भूमिकाएं नहीं रहीं. सोनीटीवी पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक कुटुंब अगर आपको याद हो तो उसमें साक्षी ने एक मरी हुई चाची का किरदार निभाया था. साक्षी ने 1990 में अपने करियर की शुरुआत की. उस वक्त वे एंकर थीं. बाद में काफी मशक्कत के बाद उन्हें दस्तूर नामक शो में काम करने का मौका मिला. संघर्ष जारी रहा. लंबे अरसे के बाद उन्हें जब बालाजी का शो कहानी घर घर की मिला. फिर उनका करियर संभल गया, इसके बाद उन्हें बड़े अच्छे लगते हैं से काफी लोकप्रियता मिली. इन दिनों साक्षी कोड रेड की होस्टिंग कर रही हैं. साक्षी इसके अलावा कई सामाजिक कार्यों से भी जुड़ी हैं और शॉर्ट  फिल्में भी बनाती हैं. 

झुर्रिया व अभिनेत्री

करीना कपूर ने हाल ही में दिये एक इंटरव्यू में कहा कि उन्हें झुर्रियों वाले लड़के अधिक पसंद हैं. उन्हें लगता है कि वे झुर्रियां वाले लड़के अधिक बुद्धिमान होते हैं. उन्होंने कहा कि उन्हें झुर्रियों से कोई परेशानी नहीं. उन्हें महारानी गायत्री देवी की झुर्रियां बेहद पसंद थी और मर्दों के चेहरों पर झुर्रियां देखना उन्हें आकर्षक लगता है. करीना कहती हैं कि उन्हें अपनी उम्र छुपाने में कोई परेशानी नहीं. उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि वे 34 साल की हो चुकी हैं. करीना वर्तमान दौर की लड़की हैं. और शायद यही वजह है कि खूबसूरती को लेकर अब उनके विचार बदल चुके हैं. वरना, इससे पहले उनकी मौसी साधना जिन्होंने कई सालों तक खुद को लोगों व सार्वजनिक  स्थानों से दूर रखा, क्योंकि साधना के चेहरे पर झुर्रियां आ गयी थीं और वह किसी बीमारी से ग्रसित हो गयी थीं, उनका ख्याल था कि लोग उन्हें उस रूप में देखना पसंद नहीं करेंगे. चूंकि लोगों ने हमेशा उनका सौंदर्य ही देखा है. साधना के मन के भय का कारण भी यही था कि वे जिस दौर में थीं. वहां अभिनेत्रियों को सिर्फ खूबसूरत होने का ही हक था. हाल ही में एक तसवीर जिसमें हेलेन, आशा पारेख, वहीदा रहमान साथ साथ हैं, वह तसवीर सोशल नेटवर्किंग साइट पर काफी लोकप्रिय था. उसमें लोगों ने वक्त ने किया क्या हसीं सितम...का कैप्शन दिया था. चूंकि लोगों की यह मानसिकता प्रबल है कि वे खूबसूरती को ही हमेशा टेलीविजन पर देखना चाहते हैं. आज भी हेमा मालिनी लोकप्रिय हैं. उनके चेहरे की खूबसूरती के चर्चे होते रहते हैं. माधुरी की मुस्कान के चर्चे होते हैं. लेकिन शबाना के हमेशा अभिनय की तारीफ होती है. मुमकिन है कि करीना जब उस दौर में पहुंचेंगी तो उनके पास उस उम्र में भी अपनी खूबसूरती बरकरार रखने के लिए कई विकल्प मौजूद होंगे. लेकिन हर अभिनेत्री के पास वैसे ही विकल्प हों. यह मुमकिन नहीं.

अपना शहर व लोकप्रियता

जिसेले बुंडचैन सुपरमॉडल रही चुकी हंै. लेकिन अब उन्होंने निर्णय लिया है कि 20 अप्रैल को वे अंतिम बार रैंप वॉक करेंगी और उनकी यह दिली ख्वाहिश थी कि वे अपने जन्मस्थल, जहां उन्होंने अपना बचपन बिताया है. ब्राजील. वे वहां एक शो करें. इधर खबर है कि कट्रीना कैफ की वैक्स की मूर्ति मैडम तुषाद म्यूजियम में रखी जा रही है.खास बात यह है कि अन्य सेलिब्रिटिज की तरह कट्रीना की मूर्ति सामान्य रूप में नहीं, बल्कि नृत्य के पोज में रखी जायेगी और उन्हें साड़ी, सूट या किसी सामान्य से परिधान में नहीं, बल्कि वे एक ट्रेडिशनल फोक डांस के रूप में नजर आयेंगी. कट्रीना ने इस बारे में अपनी खुशी जाहिर करते हुए कहा है कि लंदन उनका जन्मस्थल है और उनका परिवार वही रहता है. उनकी बहनें भी वही हैं और उन्हें खुशी होगी. जब उनकी बहन अपने बच्चों को उनका स्टैचू दिखायेंगी.यह उनके लिए गर्व की बात होगी कि उन्हें अपने जन्मस्थल में यह सम्मान मिल रहा है. दरअसल, यह हकीकत है कि हर व्यक्ति के लिए दुनिया की कामयाबी से बड़ी उनके अपने जन्मस्थल में मिलने वाला सम्मान है. वजह स्पष्ट है कि जहां उस हस्ती का बचपन बीता है. उन्होंने अपनी जिंदगी में कई अनुभव किये होंगे. निश्चित तौर पर उनमें कुछ खट्ठे कुछ कड़वे होंगे. जब आप पूरी दुनिया पर जीत हासिल करने के बाद अपने शहर, अपने गांव में फतेह हासिल करते हैं तभी आपकी जीत पूरी होती है और उन तमाम लोगों के मुंह पर तमाचा जड़ता है, जिन्होंने आपको नाकामयाब होने की दुआएं की हों, जिन्होंने आपकी नयी शुरुआत, नये करियर को लेकर फब्तियां कसी हों. साथ ही दूसरा पहलू यह भी है कि आप जब अपने शहर, अपने गांव के लिए कुछ करते हैं तो वह उस गांव , उस शहर के प्रति आपका समर्पण व आदरांजलि दर्शाता है. निस्संदेह वह एहसास खास और अदभुत होता है

सिनेमा व सेंसर बोर्ड


अनुष्का शर्मा द्वारा निर्मित फिल्म एनएच 10 को फिल्म समीक्षकों से अच्छी सराहना मिल रही है. फिल्म में हिंसा है. लेकिन फिल्म सच्चाई को दर्शाती है. कई महत्वपूर्ण सवालों को कुरेदती भी है. लेकिन आश्चर्यजनक बात यह है कि इस फिल्म ने सेंसर के कई वार का सामना किया. जहां भारत में इसे केवल व्यस्कों की श्रेणी में शामिल किया गया है. पाकिस्तान में इसे यू सर्टिफिकेट दिया गया है. आमतौर पर यह अवधारणा है कि हमारा पड़ोसी मुल्क संकीर्ण मिजाज का है. लेकिन इस फिल्म पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर कर पाकिस्तान ने साबित किया है कि वे ऐसी शोधपरक और गंभीर मुद्दों पर आधारित फिल्मों को स्वीकारने के लिए तैयार है. हालांकि पाकिस्तान के सेंसर बोर्ड में केवल कुछ गालियों को हटाने की बात कही गयी है. इन दिनों सेंसर बोर्ड जिस तरह की मनमर्जी कर रही है. वे अपने मनमुताबिक शब्दकोश लोगों पर थोपने की कोशिश कर रही है. किसी जमाने में लोकप्रिय अभिनेता रह चुके शत्रुघ् न सिन्हा ने कहा है कि उन्होंने ताउम्र कई नकारात्मक भूमिकाएं निभायी, लेकिन उन्होंने कभी अपशब्दों का प्रयोग नहीं किया. लेकिन वह दौर अलग था. उस दौर में फिल्में वाकई फिल्मी हुआ करती थीं. वास्तविक फिल्मों का दूर दूर तक वास्तां नहीं था. लोग फिल्मी कहानियां देख कर ही खुश हुआ करते थे. लेकिन धीरे धीरे फिल्मों ने जो तेवर बदले हैं. वे बहुत हद तक आवश्यक हैं. एनएच 10 एक महत्वपूर्ण फिल्म है और महिलाओं को अवश्य देखनी चाहिए.  हां, यह सही है कि सेंसर बोर्ड को अश्लीलता पर अधिक कठोर होना चाहिए. लेकिन वे महज गालियों के इस्तेमाल के आधार पर पूरी फिल्म को अश्लील घोषित नहीं कर सकते. फिल्मों की अपनी दुनिया होती है. सो, वर्तमान दौर में सिनेमा की नकेल कसने की कोशिश करने वालों को यह बात समझनी ही होगी. 

क्रिकेटर पर बायोपिक


वर्ल्ड कप का मौसम है और ऐसे में क्रिकेट को दो भारतीय कप्तान पर बननेवाली फिल्मों की भी जोर शोर से चर्चा शुरू हो गयी है. इमरान हाशमी मोहम्मद अजीरुद्दीन पर बननेवाली बायोपिक में लीड निभा रहे हैं और सुशांत सिंह राजपूत महेंद्र सिंह धोनी पर. जाहिर है दोनों ही फिल्मों में कई रोचक पहलू दर्शकों के सामने फिल्म के माध्यम से आयेगी. इस फिल्म के मेकर्स ने निश्चित तौर पर कुछ बातें ध्यान में रखी होंगी. अजहर का व्यक्तित्व इमरान की आॅफ स्क्रीन इमेज से बहुत हद तक मेल खाती है. इमरान भी फिल्मों में बिल्कुल बेपरवाह, हरफनमौला जैसे किरदार निभाते आये हैं. वही दूसरी तरफ सुशांत सिंह ने काय पोचे में एक गंभीर क्रिकेटर की भूमिका निभाई है और आॅन स्क्रीन उनकी इमेज अलग है और थोड़ी बहुत धोनी से जरूर मेल खाती है. ऐसी शख्सियतों पर जब फिल्में बनती हैं तो निश्चित तौर पर जेहन में मेकर्स की यह बात जरूर होती होगी. कहीं न कहीं किसी एक बिंदू पर वे किरदार व कलाकार में कुछ कनेक् शन जरूर महसूस करते होंगे. जिस तरह भाग मिल्खा भाग के लिए फरहान और मिल्खा सिंह के लुक को  एक दूसरे से मेल खाता दिखाया गया. साथ ही फरहान की आॅन स्क्रीन इमेज भी एक गंभीर अनुशासन प्रिय कलाकार की है. शायद यह बातें भी दर्शकों को उन बायोपिक किरदारों में विश्वास कायम रखने के लिए आवश्यक होती हैं. कल्पना की िजए, कि अगर अजहर और धोनी दोनों की बायोपिक फिल्में एक साथ रिलीज हों. तो क्या नजारा होगा. या दोनों फिल्मों के किरदार अचानक एक दूसरे से बात करने लगें तो क्या बातें करेंगे. उनके बीच की गुफ्तगू पर एक दिलचस्प कहानी गढ़ी जा सकती है. चूंकि अजहर से लेकर धोनी तक के नेतृत्व में भारत ने दिलचस्प क्रिकेट खेला है. सो, इन फिल्मों के माध्यम से हम भारतीय क्रिकेट के कई पहलुओं को खुलते देख सकेंगे.

सुजोय का थ्रीलर


और अंतत: सुजोय घोष ने लंबे इंतजार के बाद अपनी नयी फिल्म की घोषणा की. सुजोय ने कहानी से पहले भी अपने निर्देशन करियर में बुरा दौर देखा था. लेकिन कहानी के बाद उनका आत्मविश्वास बढ़ा. निस्संदेह अरसे बाद हिंदी सिनेमा ने ओरिजनल थ्रीलर का स्वाद चखा था. कहानी फिल्म के रूप में. इस फिल्म की सफलता के बाद सुजोय लगातार विवादों में फंसे रहे. पहले फिल्म कहानी के सीक्वल को लेकर उन्हें फिल्म के निर्माताओं से परेशानी हुई. बाद में विद्या के हां कह कर पांव खींचने से सुजोय को काफी नुकसान का सामना करना पड़ा. अपनी एक महत्वकांक्षी कहानी के प्रोजेक्ट पर उन्हें विराम लगाना पड़ा. लेकिन अंतत: उन्होंने फिर से एक नयी शुरुआत की है. सुजोय अपनी शैली से खुद को साबित कर चुके हैं. हिंदी फिल्मों में कहानी से पहले और कहानी के बाद अब तक कोई वैसी दमदार थ्रीलर फिल्म नहीं आयी है. इस लिहाज से यह स्पष्ट है कि सुजोय इस बार जिस तरह की फिल्म लेकर आयेंगे वे खुद को कहानी से भी बेहतरीन साबित करने की कोशिश करेंगे. सुजोय की यह फिल्म एक जापानी फिल्म द डिवोशन आॅफ सस्पेक्ट नामक फिल्म का हिंदी रुपांतर होगा. फिल्म की कहानी एक महिला के इर्द गिर्द घूमती है, जिसमें एक महिला सुकून पाने के लिए अपने पति की हत्या कर देती है. सुजोय ने कहानी में भी एक पति, पत् नी और उनके प्यार की कहानी व अपने पति के कातिल का बदला लेती एक लड़की की कहानी दशाई है. इस बार भी वे महिला को केंद्र में ला रहे हैं. ऐसे विषयों में सुजोय को महारथ हासिल है. अगर आप उनके टिष्ट्वट पर गौर करें तो महसूस करेंगे कि वे महिला संबंधी विषयों को लेकर कितने जागरूक हैं. इस फिल्म में पहली बार सैफ और कंगना की जोड़ी साथ नजर आयेगी. कंगना ऐसे विषयों में कमाल करती हैं. इस बार भी उनसे दोगुना उम्मीदें हैं.

स्टार्स व उनके चाटुकार


हाल  ही में एक अपकमिंग सुपरस्टार से मुलाकात हुई. कहने को तो वह वन आॅन वन( मुंबई में अगर आप किसी स्टार से एक्सक्लूसिव बातचीत करते हैं तो उसे वन आॅन वन कहने का प्रचलन) बातचीत थी. लेकिन दरअसल, वह कई दखलअंदाजों के बीच हुई बातचीत रही. बातचीत के अनुसार मुझे 20 मिनट का समय मुहैया कराया जाना था. लेकिन बातचीत के दौरान जब उस अभिनेता के वैनिटी में पहुंची तो उनके चाटुकारों ने इसे घटा कर 10 मिनट तय किया. आमतौर पर दूर से देखने वाले लोगों की यह अवधारणा है कि फिल्म जर्नलिष्ट की जिंदगी में सिर्फ ग्लैमर हंै. उनके काम में कैसा संघर्ष. दरअसल, यहां संघर्ष के मायने थोड़े अलग हैं. हमारा संघर्ष बस इतना सा है कि हमें पांच घंटे के इंतजार के बाद 15 मिनट तो कभी सिर्फ पांच मिनट की मोहलत मिलती है. मतलब हमारे पांच घंटों के बदले मिले उनके सिर्फ 15 मिनट की कीमत है. वे पांच घंटे जो व्यर्थ गये. वे गये. तब भी कोफ्त नहीं होती. कोफ्त तब होती है कि एक लंबे इंतजार के बाद आपको जब अभिनेता से उनके वैनिटी में बातचीत करने का मौका मिलता है तो उस वक्त वह अभिनेता अपने चाटुकारों के साथ व्यस्त होता है. फिर वह क्या बातें करेगा. किन सवालों का जवाब देगा. किन सवालों का नहीं. यह स्टार नहीं वे तय करते हैं. वह बातचीत वन आॅन वन नहीं रह जाती. ऐसी बातचीत से आप कभी संतुष्ट नहीं हो सकते. दरअसल,वर्तमान दौर में स्टार्स अपने वैनिटी में अपनी अलग दुनिया में रहते हैं. जहां वे अपने चाटुकारों से घिरे रहते हैं और वही हुक्मरान होते हंै, यह आश्चर्यजनक है कि किस तरह फिल्म शमिताभ में बाल्की ने यह कल्पना की कि दानिश कई दिनों तक वैनिटी में रहता है लेकिन लोगों को पता नहीं चलता. चूंकि स्टार्स के चाटुकार तो अपनी ओछी जासूसी से इन दिनों बाज नहीं आते.

चैनल व आपसी रिश्ते


एक बार फिर कपिल शर्मा विवादों से घिर गये हैं. इस बार यह विवाद कपिल और कलर्स चैनल के आपस में हो गयी है. मामला यह है कि कपिल को शाहरुख ने एंड टीवी पर प्रसारित हो रहे रियलिटी शो में अपीयरेंस के लिए व्यक्तिगत रूप से निमंत्रण भेजा था. जाहिर सी बात शाहरुख कॉमेडी नाइट्स विद कपिल शो के कई बार मेहमान बन चुके हैं और शाहरुख व कॉमेडी किंग के टिष्ट्वटर पर होने वाली बातचीत से भी यह स्पष्ट है कि दोनों के संबंध अच्छे हैं और यही वजह रही होगी कि कपिल ने हामी भरी. लेकिन चैनल को इस बात से परेशानी हो गयी है.इससे पहले भी कपिल ने केबीसी में अपीयरेंस दिया था. इस बात से भी चैनल ने आंखें तरेरी थी. इस बात से शाहरुख बहुत दुखी हैं और उन्होंने स्पष्ट रूप से कह दिया है कि ( आलेख लिखने तक)वे फराह खान के कुकरी शो जो कि चैनल पर प्रसारित हो रहा है. उसका हिस्सा नहीं बनेंगे. यह पहली मर्तबा नहीं है, जब चैनल इन मसलों को लेकर अत्यधिक तमाशा करते आये हैं. इससे पहले भी सोनी टीवी पर प्रसारित हो रहे बीसीइल में जीटीवी में जोधा अकबर का किरदार निभा रहे कलाकारों को सोनी टीवी पर जाकर परफॉर्म करने के लिए नोटिस थमा दी गयी थी. एकता कपूर चाह कर भी उसे टेलीकास्ट नहीं कर पायीं. दरअसल, हकीकत यह है कि टीआरपी की दौड़ में शामिल चैनल इस कदर रमा रहता है कि उसे किसी अन्य बात से फर्क नहीं पड़ता. उनके लिए आपसी रिश्ते मायने नहीं रखते. इस लिहाज से फिल्मों की दुनिया थोड़ी अलग है. वहां कलाकार अगर अच्छे दोस्त हैं तो वे एक दूसरे को पूरी तरह से सहयोग करते हैं.वे मेहमान कलाकार की भूमिका निभाने के लिए भी तैयार हो जाते हैं. चैनल का यह तीखा रुख किसी भी लिहाज से उचित नहीं है. चूंकि कलाकारों के आपसी रिश्ते भी मायने रखते हैं.

सेट पर निखरते रिश्ते


अमिताभ बच्चन ने फिल्म पीकू के  सेट पर दीपिका के साथ एक अलग ही रिश्ता स्थापित कर लिया है. दीपिका ने इससे पहले भी अमिताभ के साथ फिल्म आरक्षण में साथ काम किया था. उस फिल्म में भी दीपिका अमिताभ की बेटी के किरदार में थीं. पीकू में भी वे अमिताभ की बेटी का ही किरदार निभा रही हैं और यही वजह है कि अमिताभ को वह आॅफ स्क्रीन भी इन दिनों बाबा कह कर ही बुलाती हैं, अमिताभ ने भी दीपिका को प्यार का नाम दीपिकू दिया है और दीपिका इस बात से बेहद खुश हैं कि उन्हें अमिताभ बच्चन से इस तरह स्रेह मिल रहा है. हिंदी सिनेमा में इन दिनों कम ही रिश्ते ऐसे हैं, जो फिल्म की मेकिंग, व रिलीज  के बाद जिंदा रह पायें. किसी दौर में एक फिल्म के निर्माण में फिल्म के कलाकार व तकनीशियन इस कदर रमे होते थे कि फिल्म खत्म होने के बाद उनकी आंखों में आंसू होते थे. फिल्म हम आपके हैं कौन की शूटिंग के अंतिम दिन फिल्म का गीत मुझसे जुदा होकर सुनाया गया था और सभी की आंखें नम थी. लेकिन आज कट के साथ ही सितारे दूसरी दुनिया में या अपने दूसरे घर वैनिटी वैन में चले जाते हैं. जबकि पहले सेट पर किस्से इसलिए होते थे. चूंकि स्टार्स शूटिंग के बाद भी आपस में बातें करते थे. अब भी टीवी की दुनिया में बहुत हद तक यह माहौल कायम है, जैसे धारावाहिक वीरा में भाई बहन का किरदार निभा रहे दोनों कलाकार वास्तविक जिंदगी में भी एक दूसरे के भाई बहन बन गये हैं. किसी दौर में राजकपूर साहब के प्रेम व स्रेह का ही यह प्रमाण था कि उन्होंने नवाब बानो को निम्मी नाम दे दिया और सिने जगत ने निम्मी को उसी रूप में स्वीकारा बिना किसी शक और शिकायत के साथ. यह रिश्ते के अटूट  होने का ही प्रमाण है. दरअसल, रिश्तों को पनपने के लिए सिर्फ अपनत्व की जरूरत है. उसे किसी मुहर की जरूरत नहीं पड़ती. 

छोटे शहर में लोकप्रियता


आलिया भट्ट ने हाल ही में कहा कि उन्हें संतुष्टि है कि अब उनकी फैन फॉलोइंग छोटे शहरों में भी हो गयी है. इसका प्रमाण उन्हें इस बात से लगा है कि हाल ही में वह किसी छोटे शहर में प्रोमोशन के सिलसिले में गयी थीं. वहां उन्होंने एक मोहल्ले में एक लेडीज ब्यूटी पार्लर देखा, जहां उनके पोस्टर लगे हुए थे. आलिया का मानना है कि वे भी जब छोटी थीं और किसी छोटे शहर में जाती थीं और रेखा, माधुरी दीक्षित, दिव्या भारती की तसवीरें देखा करती थीं तो उन्हें लगता था कि वे भी कभी इस तरह की लोकप्रियता हासिल करें. यह सच है कि आलिया किचन में नहीं जातीं. वे काफी नाजो नखरे से पली बढ़ी हैं. इन दिनों उन पर कई चुटकुले बन रहे हैं और वे लोकप्रिय भी हो रहे हैं. आलिया अन्य मुद्दों पर चाहे जिस तरह से भी जवाब दें. लेकिन अपनी लोकप्रियता को लेकर उन्होंने अपनी पारखी नजर रखी है. हां, यह हकीकत है कि छोटे शहरों की लोकप्रियता के अपने मापदंड हैं. मुझे याद है जब सलमान की फिल्म तेरे नाम आयी थी. उस वक्त कॉलेज की अधिकतर लड़कियों ने क्लास बंक कर सलमान की यह फिल्म देखी थीं. रांची के सुजाता सिनेमा हॉल में टिकट ब्लैक में बिके थे. सलमान उस वक्त एक बार से छोटे शहरों के हीरो के सरताज के रूप में उभरे थे. मीरा रोड के पार्लर में मधुबाला और माधुरी दीक्षित की ही तसवीरें हैं. हाल ही में सोनाक्षी जब आगरा में एक फिल्म की शूटिंग कर रहीं थीं. वहां के लोग उन्हें दबंग गर्ल  कह कर ही पुकार रहे थे. उन्हें वैनिटी से बाहर तक आने में परेशानी हो रही थी. गोविंदा की फिल्में छोटे शहरों में आज भी लोग देखना पसंद करते हैं. कुमार सानू के गीत आज भी वहां कर्णप्रिय हैं. चूंकि अब भी छोटे शहरों में लोकप्रियता की धुन दिल से सुनी सुनाई जाती है. उस पर अब भी आधुनिकता का पूरा प्रभाव नहीं पड़ा.और अच्छा है. कुछ शहरों को ज्यों के त्यो छोड़ देना.

प्लस साइज को ट्रीब्यूट


ऐश्वर्य राय बच्चन जब मां बनीं तो उनका वजन काफी बढ़ गया था और इस बात को लेकर ऐश्वर्य पर कई चुटकुले बने. उनका माखौल उड़ाया गया. परिणीति चोपड़ा पर भी आये दिन वजन की वजह से सवाल उठाये जाते हैं. विद्या बालन ने कई बार वजन को लेकर लोगों के ताने सुने हैं. वे अभिनेत्रियां हैं. फिर भी इस ताने ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. फिर आम जिंदगी में उन लड़कियों को कितने ताने सुनते पड़ते होंगे, जो आम हैं. निर्देशक शरत कटारिया की फिल्म दम लगाके हईशा उन तमाम लोगों के मुंह पर तमाचा जड़ती है. शरत ने फिल्म के माध्यम से एक बेहतरीन संदेश दिया है और जाहिर है इससे वे लड़कियां खुद को जरूर कनेक्ट कर पायेंगी, जिन्होंने मोटी होने की वजह से काफी जिल्लत सही है. फिर वह अपने घर के लोगों के बीच में हों, या फिर अपने ससुराल में.चूंकि दरअसल, यहां परेशानी किसी के शारीरिक वजन का नहीं बल्कि सोच के वजन का है. हमारे समाज में आज भी शादी के लिए सुशील सुंदर कन्या के साथ साथ लड़की का फिगर बहुत अधिक मायने रखता है. ताकि शादी के बाद ससुराल में होने वाले बहूभात में सास ससूर और पति सीना चौड़ा कर लोगों को सुना सकें कि चांद सी दुल्हन लाये हैं हम. वे लड़कियां जिनकी उम्र महज 25 हैं लेकिन अधिक वजन की वजह है, उन्हें बड़ी उम्र के वर के साथ इसलिए व्याह दिया जाता है क्योंकि वे मोटी हैं. लेकिन दम लगाके हईशा की अभिनेत्री संध्या को जिस तरह खुद सो हीन भावना न करते हुए दिखाया गया है. शरत बताते हैं कि इस फिल्म के लिए यशराज की कास्टिंग हेड शानु ने ही भूमि को कास्ट करने के लिए दबाव दिया था. चूंकि शानु का भी वजन अधिक है. सो, निश्चिततौर पर इस फिल्म से बहुत हद तक कनेक्ट कर पायी होंगी. दरअसल, यह फिल्म उन तमाम प्लस साईज सुशील लड़कियों को ट्रीब्यूट है.

फिजूलखर्ची के मायने

स्टार प्लस पर जल्द ही एक धारावाहिक की शुरुआत हो रही है. तेरे शहर में. इस धारावाहिक में एक लड़की अमाया की कहानी है, जिसे शॉपिंग करना पसंद है. एक मुहावरा है. चांदी की चम्मच लेकर जन्म लेना. अमाया की जिंदगी भी कुछ ऐसी ही है. वह ऐशो आराम से जिंदगी जीती है. लेकिन अचानक उसकी जिंदगी में एक तूफान खड़ा होता है और उसकी जिंदगी बदल जाती है. ट्रेलर में फिलवक्त दिखाया जा रहा है कि मुसीबत में या तो इंसान निखर जाता है या बिखर जाता है. अमाया पेरिस से सीधे बनारस की गलियों में आ पहुंचती और फिर कहानी नया मोड़ लेती है. जिंदगी चैनल पर कुछ महीनों पहले प्रसारित हुए धारावाहिक आईना दुल्हन का में भी दो बहनों की कहानी है. एक बहन घर को संभाल कर बजट में चलने में विश्वास रखती है. लेकिन दूसरी को फिजूलखर्ची पसंद है और वह ताउम्र फिजूलखर्ची के मायाजाल में ही फंसी रह जाती है. धारावाहिक मात में भी नायिका ताउम्र फिजूलखर्ची करती रहती है और पैसे की लालसा में वह अपने पति व अपने बच्चे दोनों को ही खो देती है. दरअसल, हकीकत यही है कि  फिजूलखर्ची की अपनी अपनी परिभाषाएं हैं. अभिनेता नाना पाटेकर ने कहा कि कभी फिल्मों में पैसों के लिए काम नहीं किया. पैसों की जरूरत नहीं हुई कभी. क्योंकि मेरी जरूरतें ज्यादा नहीं हैं. तो फिर फिजूलखर्ची की तो बात ही दूर है. मुकेश भट्ट चूंकि निर्माता हैं तो फिजूलखर्ची को लेकर उनकी अलग सोच है. उनका मानना है कि सितारों के साथ साथ उनके मेकअप आर्टिस्ट, उनके स्पॉट ब्वॉय को जरूरत से ज्यादा पैसे देना फिजूलखर्ची है. उन्होंने इस बात पर भी प्रश्न चिन्ह लगाया है कि जब अस्टीटेंट निर्देशक इतनी मेहनत करता है तो फिर उसे फिर स्पॉट ब्वॉय से कम पैसे क्यों मिलता है. दरअसल, हर क्षेत्र में फिजूलखर्ची को अलग रूपों में परिभाषित किया जाता रहेगा.

बदलते रिश्ते


कट्रीना कैफ के मेकअप आर्टिस्ट रह चुके सुभाष ने निर्णय लिया है कि अब वह निर्माता की कुरसी पर बैठेंगे. उन्होंने कट्रीना के लिए लगभग 11 सालों तक काम किया. लेकिन बाद में कैट ने उन्हें काम से निकाल दिया. यह कह कि वे सेट पर देर से पहुंचते हैं. जबकि सुभाष ने इस बारे में स्पष्ट राय दी है कि वे कभी भी देर से नहीं पहुंचते थे. किसी  अन्य कारणों से दूरी आयी. खबर यह भी थी कि रणबीर कपूर ने कैट से सुभाष को वापस काम पर रखने के लिए भी कहा था. लेकिन सुभाष तैयार नहीं हुए. बहरहाल खास बात यह है कि सुभाष ने जिस फिल्म के निर्माण की योजना बनाई है. फिल्म की कहानी फिल्मी दुनिया पर ही आधारित है और खबर  है कि शबाना आजिमी, जूही चावला और अनुपम खेर जैसे दिग्गजों ने फिल्म करने के लिए मंजूरी दे दी है. जाहिर सी बात है सुभाष पिछले कई सालों से इंडस्ट्री का हिस्सा रहे हैं और उन्होंने इसे करीब से देखा है. वे अपने निजी अनुभव को फिल्म की कहानी में जरूर साझा करेंगे. यह भी संभव है कि वे यह फिल्म किसी बदले की भावना से बना रहे हों. अक्सर फिल्मी दुनिया में बदला इस तरह भी लिया जाता है. जरूरी नहीं कि श्रीराम राघवन के रघु की तरह वह सामने से वार करे और खुद को पूरी तरह उस बदले की भावना में झकझोर दें. अप्रत्यक्ष रूप से वार करने का यह भी अंदाज होता है. क्रिकेट के मैदान पर खिलाड़ी अपने बल्ले से बातों का जवाब देते हैं. विरेंद्र सहवाग, सचिन तेंदुलकर और शोयेब अख्तर प्रकरण हर किसी को याद होगा. जहां, सचिन ने अपने बल्ले से शोयेब की बातों का जवाब दिया था. हालांकि सुभाष ने शुरुआत नयी की है. लेकिन प्राय: ऐसे प्रयास असफल रहे हैं, क्योंकि तथ्य जानना और उसे प्रस्तुत करना फिल्मों के माध्यम से. वह भी मनोरंजक तरीके से. एक कठिन प्रक्रिया है. बेहतर है कि काम ही बोले. इंसान नहीं

रोहित शेट्ठी की नयी फिल्म

शाहरुख खान ने घोषणा की है कि उनकी आगामी फिल्म, जिसका निर्देशन रोहित शेट्ठी कर रहे हैं. इस फिल्म में भी लगभग 17 कलाकार मेहमान भूमिका निभायेंगे. शाहरुख ने कहा है कि फिल्म की शूटिंग जल्द ही शुरू होनेवाली है. और इससे पहले भी शाहरुख की फिल्म ओम शांति ओम में कई कलाकारों ने उपस्थिति दर्ज की थी. फिल्म के टाइटिल ट्रैक गीत में सभी सितारे नजर आये थे. किसी फिल्म में सलमान व शाहरुख की उपस्थिति वाली फिलवक्त तक की यह आखिरी फिल्म है. अब एक बार फिर से शाहरुख कुछ वैसा ही माहौल बनाने की कल्पना कर रहे हैं. जाहिर है. ओम शांति ओम में नजर आये कलाकारों से अब इतने सालों में शाहरुख के समीकरण बदल चुके है. अब कई नये रिश्ते बन चुके हैं. लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि फिल्म में क्या अजय देवगन व सलमान खान नजर आयेंगे. चूंकि रोहित अजय के बेहद करीब हैं और यहां आपसी रिश्तों पर मेहमान भूमिका वाले रोल निभाये जाते हैं.  सलमान के पिता सलीम खान कहते हैं कि सलमान खान का नाम गिनीस बुक आॅफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज होना चाहिए. चूंकि उन्होंने अब तक सबसे ज्यादा मेहमान भूमिकाएं निभाई हैं. सलमान दोस्ती की वजह से भूमिकाएं निभाने के लिए तैयार हो जाते हैं. शाहरुख ने भी कुछ फिल्मों में मेहमान भूमिकाएं निभाई हैं. इस बार उनकी भी कोशिश होगी कि वे इस बार भी अपने गीत को खास रूप देने में सफल हो. शाहरुख अपनी फिल्मों की मार्केटिंग अलग तरह से करते हैं. रोहित की फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस उनके लिए लकी रही है. सो, शाहरुख का रोहित पर विश्वास बढ़ा है. सो, यह देखना दिलचस्प होगा. दर्शक ऐसे लम्हों को पसंद करते हैं. अब तक ऐसे जितने भी गीत बने हैं या प्रयोग हुए हैं गीतों को लेकर. वह कामयाब रहे हैं. 

वरुण के गीत


यशराज की फिल्म दम लगा के हईसा में नायक कुमार सानु का फैन है और वह हरदम कुमार सानू के गाने ही सुना करता है. यही वजह है कि इस फिल्म में एक बार फिर से कुमार सानु को लगभग दो गाने गाने का अवसर प्राप्त हुआ है. साथ ही वह फिल्म में छोटी सी भूमिका भी निभा रहे हैं. वरुण ग्रोवर ने फिल्म के गीत लिखे हैं. वरुण ग्रोवर ने इससे पहले गैंग्स आॅफ वासेपुर के लिए गाने लिखे थे. गैंग्स आॅफ वासेपुर भी धनबाद शहर के वासेपुर इलाके पर आधारित थी और वरुण ने फिल्म व शहर की समझ को ध्यान में रखते हुए गाने लिखे थे. इस बार भी दम लगा के हईसा, चूंकि उत्तर भारत पर आधारित है तो निर्देशक के साथ साथ वरुण ने भी इस बात को पूरी प्राथमिकता दी है. फिल्म का गीत सुंदर सुशील..., दर्द करारा, और तू ...तीनों गाने आपको फिल्म की पृष्ठभूमि की वास्तविक खुशबू देते हैं. दरअसल, वरुण जैसे गीतकार उन श्रेणी में आते हैं, जो निर्देशक की समझ और कहानी की जरूरत को समझते हुए उसे मिजाज के मुताबिक गाने गढ़ते हैं, जिसमें गाने यूं ही फिल्म की कहानी के बीच में ही अचानक गांव से स्वीटरजलैंड की सैर करके नहीं आते, बल्कि वे उसी जगह को अपने शब्दों के माध्यम से स्वीटरलैंड बनाने में विश्वास रखते हैं. इस फिल्म के हरेक गीत को ध्यान से सुने तो वे फिल्म से मेल खाते हैं और शायद इसलिए वे अपने से लगते हैं. जिस तरह उत्तर भारत में शादी के वक्त का माहौल होता हंै, लड़कियां तलाशी जाती है. गाने उसी के आधार पर लिखे गये हैं. इस फिल्म में कई अरसे बाद आॅडियो कैसेट नजर आयेंगे, जो कि किसी दौर में हर घर में एंटरटेनमेंट का खास जरिया होता था. यह दौर सीडी की दुनिया के धाक जमाने से पहले का है. जिस तरह सीडी ने कैसेट को हथियाया. कुमार सानु की जगह अन्य कलाकारों ने हथिया लिया. फिल्म ने उन यादों को फिर से जीवंत कर दिया हैय.

वरुण का रिस्क


वरुण धवन ने फिल्म बदलापुर में अलग मिजाज का किरदार निभाने की कोशिश की है. वे करन जौहर की खोज हैं और वे फिल्मी खानदान से भी हैं. उनकी पहली फिल्म स्टूडेंट आॅफ द ईयर की सफलता का सारा श्रेय आलिया और सिद्धार्थ को मिला. फिल्म हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया में उन्होंने खुद को बेहतर तरीके से साबित किया. लेकिन वह भी उनके लिए कंफर्ट जोन था. इस बार वे बदलापुर में अलग अंदाज में हंै और दर्शकों को उनका यह लुक पसंद भी आ रहा है. वरुण के समकक्ष उनके सहपाठी फिलहाल ऐसी फिल्मों से तौबा कर रहे हैं. लेकिन वरुण ने एक अच्छा रिस्क लिया. उन्होंने अन्य निर्देशकों के सामने अपने विकल्प दिये हैं कि वे सिर्फ सामान्य फिल्में नहीं करना चाहते. हालांकि फिल्म गजनी के आमिर खान की तरह वे इस फिल्म में उस इंटेंस किरदार के साथ नजर नहीं आये हैं .लेकिन उनकी मेहनत को कमतर नहीं आंका जा सकता है. चूंकि वे जिस माहौल से निकल कर ऐसे रिस्क ले रहे हैं. वहां अभिनय में यहां तक भी पहुंच पाना कठिन टास्क है. दरअसल, फिल्मी खानदान से जुड़े सितारें कंफर्टजोन से निकल कर कुछ नया व प्रयोग करने से डरते हैं. वे चूंकि बचपन से ही ैएक सुरक्षित कवच में रहना जानते हैं. लेकिन कई बार वही कंफर्ट व आरामतलबी होना उनके लिए मुश्किल सबब बन जाता है. लेकिन गौर करें तो जब जब कलाकारों ने अपने जोन से निकल कर नया करने की कोशिश की है, वे कामयाब रहे हैं. अभिषेक की फिल्म गुरु उनके करियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म है. हालांकि रावण में भी उन्होंने बेहतरीन अभिनय किया था. भले ही फिल्म कामयाब हो या नहीं. विद्या हमेशा मानती हैं कि वे कभी एक किरदार में बंध कर नहीं रह सकतीं. शायद यही वजह है कि वे प्रयोग करती रहती हैं. चूंकि प्रयोग ही आपको निखारता संवारता है. वरुण के सहपाठियों को उनसे सीख लेनी चाहिए

नाना का व्यक्तित्व


नाना पाटेकर ने लगातार तीन सालों से मीडिया से बातचीत नहीं की है. लेकिन इस बार वे मीडिया से बातें कर रहे. अपनी नयी फिल्म अब तक छप्पन 2 के लिए. लेकिन अन्य कलाकारों की तरह उनके फिल्मी प्रोमोशन का अंदाज अलग है. वे बहुत शोर शराबे या दिखावे में विश्वास नहीं करते. मेरी नाना पाटेकर से यह पहली मुलाकात थी. नाना के साथ उनके बेटे मल्हार भी थे. मल्हार से उस दिन नाना के बारे में लंबी बातचीत हुई. उन्होंने बताया कि अब भी नाना साहेब( वे अपने पिता को साहेब कह कर ही पुकारते हैं) को थाली में जूठन देख कर दर्द होता है. उन्हें उन लोगों से कोफ्त होती है, जो भोजन बर्बाद करते हैं. नाना मानते हैं कि उन्होंने किसी दौर में बमुश्किल एक वक्त की रोटी जुटाई थी. और आज भी वे इस बात को भूले नहीं हैं. वर्तमान दौर में वे एकमात्र ऐसे लोकप्रिय स्टार हैं, जिन्हें ग्लैमर से कोई मतलब नहीं. लेकिन फिर भी वे लोकप्रिय हैं. मल्हार ने बताया कि एक बार उन्हें नाना के साथ कहीं पहुंचना था. मल्हार को पहुंचने में थोड़ी देर हो गयी. नाना मल्हार पर इस बात को लेकर बहुत भड़के. उन्होंने मल्हार को चेतावनी दी कि अगर अगली बार से उन्होंने यह गलती दोहरायी तो वे अपना सरनेम वापस ले लेंगे. नाना जिद्दी हैं. वे स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि वे फिल्मों की स्क्रिप्ट में काफी दखलअंदाजी करते हैं और वे निर्देशकों के कलाकार नहीं हैं. लेकिन यह हठ उनका अभिनय के प्रति जुनून है. शायद ही कोई कलाकार वर्तमान में इतनी हिम्मत जुटा सकता है कि उनकी जिंदगी पर मेकिंग बनाने वाले मेकर्स को उन्होंने साफतौर पर कह दिया है कि वे उनके घर में सीसीटीवी लगा दें. ताकि जो भी नजर आये. वह हकीकत नजर आये. ऐसे दौर में जहां बिग बॉस जैसे शोज में जहां सेहसर लगे होते हैं. तब भी लोग बनावटी होते हैं. नाना की ऐसी सोच उन्हें एक निडर कलाकार बनाती है.

नाट्य सम्राट का किरदार करियर का सबसे कठिन किरदार : नाना


 नाना पाटेकर फिल्मों का चयन यंू ही नहीं करते. उनके लिए फिल्म की कहानी सबसे ज्यादा अहम रखती है. ग्लैमर की इस दुनिया में पिछले कई दशक से सक्रिय रहने के बावजूद वे अपने मिजाज के इकलौते कलाकार हैं, जिनके लिए सिर्फ और सिर्फ अभिनय महत्वपूर्ण है. जल्द ही वे दर्शकों से अब तक छप्पन से रूबरू होने जा रहे हैं. 
अब तक छप्पन 2 के बारे में बताएं?
इस फिल्म को मैं अपनी फिल्म मानता हूं. इसका पहला हिस्सा लोगों को पसंद आया. उम्मीद करता हूं इस बार भी फिल्म पसंद आये. फिल्म के पहले हिस्से में मैंने जैसा किरदार निभाया था. इस फिल्म में भी मैं वैसा ही किरदार निभा रहा हूं. अंदाज अलग होगा मगर.
आपने जब पहली बार अब तक छप्पन की थी तो उसके निर्देशक शिमित अमिन थे. उस वक्त वे भी नये थे. इस बार फिर से आप ऐजाज गुलाब के साथ काम कर रहे हैं.तो क्या नये लोगों के साथ काम करने में आपको मजा आता है?
हां, बिल्कुल मजा आता है. नये लोग हैं तो मैं उन्हें अपनी तरफ से बहुत सारी बातें कह सकता. जो मुझे सीन में पसंद न आये. मैं उन्हें डांट कर कह सकता. वैसे भी मैं निर्देशक का एक्टर बिल्कुल नहीं हूं. मैं बहुत ज्यादा दखल देता हूं. जो सीन मुझे पसंद नहीं. आप मेरे निर्देशक से पूछ सकते हैं कि मुझसे वह कितने परेशान रहते हैं कितने नहीं. लेकिन अभिनय मेरी रोजी रोटी है तो उसके साथ बेईमानी नहीं. जो मैं बेहतर तरीके से कर सकता. वह जरूर करूंगा. जो नहीं कर सकता. वह नहीं करूंगा. मुझे लगा है कि नये लोगों में ज्यादा जुनून होता है. पहली फिल्म में वह अपनी पूरी मेहनत को झकझोर देते हैं. इसलिए मुझे पसंद है ऐसे लोगों के साथ काम करना. उनके आइडियाज अलग होते हैं. पहले जमाने में जैसे एक ही कैमरा रहता था. लेकिन इस फिल्म में मैंने एक साथ कई कैमरों में शूटिंग की है तो नया सीखने को भी मिलता है. अब तक छप्पन 2 चूंकि एक् शन फिल्म है तो उसे रोचक बनाना ज्यादा कठिन होता है. लेकिन ऐजाज ने अच्छा काम किया है.
नाना, आप कई दशकों से सिनेमा से जुड़े हैं. ऐसे कोई किरदार जिन्हें आप आज भी निभाना चाहते हों या आपकी पसंदीदा रही हो.
वैसे तो सारे किरदार अच्छे लगते हैं. लेकिन एक अभिनेता हूं कैसे कह दूं कि क्या बेस्ट किया क्या नहीं. हां, मगर बहुत जल्द मराठी में मेरी एक फिल्म आयेल्गी नाट्य सम्राट मुझे लगता है कि वह मेरे कठिन किरदारों में से एक है. क्योंकि इसमें मैंने जो किरदार निभाया है. वह अब तक सारी मेहनत से ज्यादा है. मुझसे बहुत निचोड़ रहा है यह किरदार. मैं काफी मेहनत भी कर रहा हूं और डर भी रहा हूं कि इतना महान किरदार निभा पाऊंगा की नहीं. वैसे सच कहूं तो लोगों को लगता है कि मैं इंटेंस कलाकार हूं तो किरदारों को अपने साथ रखता हूं फिल्मों के खत्म होने पर भी. लेकिन इस मामले में मैं बिल्कुल अलग हूं. मैं अपनी फिल्में भी नहीं देखता. मैं कोई फिल्म ही नहीं देखता. काम किया और फिर खत्म. मैं तुरंत किरदार से बाहर आ जाता हूं. तभी मैं एक्टर हूं. किसी किरदार के साथ जीने लगा तो मुश्किलें खड़ी हो जायेंगी.
सेंसर बोर्ड लगातार सिनेमा पर अपनी कमान कस रहा. आपकी इस पर क्या प्रतिक्रिया है?
मुझे सेंसर बोर्ड से सिर्फ और सिर्फ एक सवाल पूछना है कि वे यह सब करके किसको क्या दिखान चाहते हैं क्या साबित करना चाहते हैं. आज कल यूटयूब है, इंटरनेट है. कई चीजें हैं. जिस पर हर युवा कुछ भी देख सकता. कुछ भी कर सकता. आप कैसे उन्हें रोक सकते. गंदा क्या है क्या नहीं. इसके बीच एक पतली सी लकीर है. जिसे देखना समझना जरूरी है. सिनेमा को हमेशा हिट किया जा रहा है. संस्कृति के नाम पर. यह सही नहीं.
क्या आप मानते हैं कि अब फिल्में बिल्कुल इंस्टेंट खुशी के लिए बन रही हैं. फिल्में आती हैं. चली जाती हैं. फिल्मों से एक इमोशनल अटेचमेंट नहीं रह गया, फिल्म के कलाकारों का भी और दर्शकों का भी.
देखिए मेरा मानना है कि जैसे जैसे समाज बदला है. फिल्में भी बदली हैं. पॉटिटिकल, सोशल माहौल बदलेगा तो फिल्में भी बदलेंगी. जेनरेशन बदला है. उनकी सोच बदली है. उनका नजरिया बदला है. माध्यम बदले हैं. उनकी चाहत बदली है तो बदलाव हो होंगे ही. हां, लेकिन अगर आपने खुद को उस लिहाज से अपडेट किया है तो आप आगामी जेनरेशन के साथ कदमताल कर सकते हो. वरना, आपको वह सब बोझ लगेगा. मैं किसी सोशल साइट पर नहीं हूं. लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि मैं अपडेट नहीं हूं. मेरे यहां अपडेट शब्द कहने का मतलब है कि आपको अपने आस पास की दिन दुनिया, तकनीक व समाज की जानकारी होनी ही चाहिए.
फिल्मों को चुनने में अब भी क्या बातें महत्व रखती हैं?
मुझे फिल्म की कहानी, फिल्म का निर्देशक और फिल्म का ब्रांड यानी कौन निर्माता है. इन चीजों से मतलब होता है. बाकी मैं कुछ भी नहीं सोचता 

अभिनय के लिए दम लगाके हईसा


फिल्म दम लगा के हईसा के निर्देशक शरत कटरिया से मुलाकात हुई. उन्होंने अपनी बातचीत में बताया कि उन्होंने फिल्म की मुख्य कलाकार भूमि के बारे में बताया कि वे फिल्म का हिस्सा कैसे बनी. वे फिल्म की कास्टिंग निर्देशक टीम में थीं और यशराज की प्रमुख कास्टिंग डायरेक्टर शानु शर्मा ने भूमि को लेने के लिए बहुत जिद्द की. उनका मानना था कि भूमि फिल्म के लिए बेस्ट थी. क्योंकि वे फिल्म की डिमांड को पूरा करती हैं. लेकिन निर्देशक ने स्पष्ट रूप से कहा कि भूमि मुंबई की हैं. फिल्म उत्तर भारत की पृष्ठभूमि पर है. सो, वह किरदार के लिए फिट नहीं बैठेंगी. लेकिन भूमि इस फिल्म में खुद को ढालने के लिए हर तरह से तैयार थीं. उन्होंने अभिनेत्री सीमा पावा के साथ वर्कशॉप किया और उत्तर भारत की पृष्ठभूमि को समझा. वे वहां गयीं. वहां के लोगों से बातें की. उत्तर भारत की महिलाओं को देखा और वहां के माहौल में ढलीं. उन्होंने इस फिल्म के लिए काफी मेहनत की. झाड़ू लगाना, पोछा लगवाना जैसे तमाम कार्य निर्देशक ने भूमि से कराया. जाहिर सी बात है एक मुंबई की लड़की के लिए यह सारी चीजें अलग मिजाज की थीं. लेकिन उन्होंने अपनी पहली फिल्म के लिए काफी मेहनत की. नतीजन फिल्म के ट्रेलर में वे दर्शकों का दिल जीत रही हैं. भूमि की तरह ही आलिया ने जब हाइवे फिल्म के लिए शूटिंग शुरू की, तो उन्होंने मुंबई से बाहर की दुनिया को एक अलग नजरिये से देखा. वे मानती हैं कि अगर इस फिल्म में मैंने काम नहीं किया होता तो शायद ही मुझे ऐसी जिंदगी जीने का मौका मिलता. दरअसल, कलाकार भी अपनी फिल्मों के साथ ऐसी फिल्में करते हुए एक अलग जिंदगी जीते हैं. और खुद को एक्सप्लोर करने की कोशिश करते हैं. खुद को समृद्ध करते हैं. आयुष्मान खुराना ने भी खुद को पंजाबी सोच से निकाल कर इस बार  उत्तर प्रदेश की पृष्ठभूमि में ढालने की कोशिश की है.

पापा का सपना पूरा कर रही हूं : हीबा


ेस्टार प्लस पर बहुत जल्द तेरे शहर में नामक शो में अमाया माथुर उर्फ हीबा अपने अभिनय से दर्शकों का दिल जीतने की कोशिश करेंगी. वे शो में लीड किरदार निभा रही हैं और वे अपने किरदार को लेकर बहुत उत्साहित हैं. पेश है अनुप्रिया अनंत से हुई बातचीत के मुख्य अंश

 सबसे पहले शो के बारे में बताएं?
मैं बताना चाहंूगी कि मैं इस शो में अमाया माथुर का रोल प्ले कर रही हूं. अमाया बहुत ही अमीर खानदान से है. उसे शॉपिंग करना बहुत पसंद है. वह कुछ भी करते वक्त सोचती नहीं. वह अपने लुक को लेकर बहुत कांसस रहती है. वह खुद को दीवा समझती है. वह आज की लड़की है. वह पेरिस जैसी जगह पर रहती है और उसे लगता है कि उसकी जिंदगी बेहद खूबसूरत है. अमाया का उसके पापा के साथ खास रिश्ता है. वह अपने पापा को सुपरमैन बुलाती है, क्योंकि अमाया के किसी भी विश को उसके पापा तुरंत पूरी कर देते हैं. उसकी मम्मी थोड़ी स्ट्रिक्ट है. और जिंदगी में फिर ऐसी सिचुएशन आती है, जिसके बारे में अमाया बिल्कुल नहीं जानती थी. और फिर किस तरह जिंदगी यू टर्न लेती है और अमाया की उसमें क्या भूमिका होती है. यही इस शो में दिखाया गया है.
इस शो का हिस्सा कैसे बनी?
मुझे इस शो के लिए कॉल आया था. पहले मैंने किसी दूसरे शो के लिए आॅडिशन दिया था. एक शो आ रहा था. सीरिज में. लेकिन उसमें बात नहीं बन पायी. उसी दौरान मैंने एक लाइव शो था, उसे साइन कर लिया था. लेकिन फिर जब इस शो के लिए मेरा नाम फाइनल हुआ तो मैंने वह शो छोड़ दिया. वह शो लाइफ ओके का शो था.
अमाया और हीबा में कितनी समानता है?
मैं पूरी तरह से अमाया नहीं हूं, क्योंकि अमाया ब्रांड कांसस हैं. मैं उतनी ब्रांड कांसस नहीं हूं. हां मुझे खूबसूरत दिखना पसंद है. लेकिन हर वक्त नहीं. और अमाया  हमेशा आसमान पर उड़ती है. मतलब उसके पैर जमीन पर नहीं रहते. लेकिन मेरे पैर हमेशा रियलिटी को जानते हैं और उसी के अनुसार वह काम भी करते हैं. मुझे पता है कि जिंदगी में रियलिज्म क्या होता है. हालांकि मैं आज कल शूटिंग कर रही हूं तो मैं थोड़ी थोड़ी अमाया की तरह हो गयी हूं. उसके नखरे मुझमें भी आने लगे हैं.
इस किरदार के लिए किस तरह तैयारी की?
मैंने बहुत वर्कशॉप किया है. लगभग एक महीने तक हमने वर्कशॉप किया है. और मेरे निर्देशक ने मुझे इसमें ढलने के लिए काफी मदद की है.
पेरिस में शूट करने का अनुभव कैसा रहा?
मैंने इससे पहले कभी पेरिस देखा नहीं था. अच्छा लगा कि उसे देखने का मौका मिला. हमने बहुत अच्छे अच्छे जगहों पर शूटिंग की है इस शो में. आप विश्वास नहीं करेंगे. मेरा सपना था कि इस शहर को देखूं. यह कितना सुंदर सा शहर है. मैंने वहां से खूब सारे चॉकलेट्स खरीदे हैं. ढेर सारा टूथ ब्रश खरीद ा है, क्योंकि वहां बहुत क्यूट क्यूट टूथ ब्रश मिलते हैं. इसके अलावा ढेर सारे कपड़े भी खरीदे. मेरे लिए तो यह किसी सपने को पूरा करने जैसा रहा. जिसे मैं हमेशा याद रखूंगी. मुझे पेरिस की सबसे अच्छी बात यह लगी कि वह शहर बहुत ज्यादा साफ है. वहां बिल्कुल भी प्रदूषण नहीं है. इसलिए वहां घूमने में काफी मजा आया. हालांकि मुझे शूटिंग से बहुत वक्त नहीं मिल पाता था. लेकिन जब भी मौका मिला. मैंने उस मौके का पूरा फायदा उठाया.
जब आप एक्टिंग नहीं कर रही होती हैं तो क्या करना पसंद है?
मुझे ट्रैवल करना पसंद है, किताबें पढ़ना पसंद है. मुझे इंटीरियर डिजाइनिंग करना पसंद है. तो शायद मैं इंटीरियर में कुछ करना चाहूंगी.
्रगौतमी के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
वह काफी सीनियर हैं. लेकिन उनके साथ काम करने में बहुत मजा आया. वह बहुत मजाकिया हैं. हम तो अब दोस्त बन चुके हैं. हमलोग खूब मस्ती करते हैं. खूब मजे करते हैं. मजा आ रहा है इस शो में.
आपका फेवरिट व्यंजन?
मुझे बिरयानी बहुत पसंद है. मैं कभी कभी बनाती भी हूं.
आपके परिवार से कोई इस क्षेत्र में हैं?
दरअसल, मेरे पापा थियेटर से जुड़े हुए थे. लेकिन बाद में उन्होंने डॉक्टरेट कर लिया था, सो उन्होंने छोड़ दिया था. लेकिन उनकी इच्छा थी कि कुछ भी हो मैं एक्टिंग में करियर बनाऊं और उनकी वजह से ही मैं इस लाइन में हूं आज़ शायद उनका ही सपना पूरा कर रही हूं. 

स्टार की एक झलक


सचिन तेंदुलकर ने वर्ल्ड कप में भारत व पाकिस्तान के बीच हुई भारत की जीत के बाद एक टिष्ट्वट किया. टिष्ट्ववट के माध्यम से उन्होंने बताया कि जीत मिलने की खुशी में कई लोग  उनके घर के बाहर खड़े होकर जीत का जश्न मना रहे थे. उन्हें यह देख कर बेहद खुशी हुई. उनकी भी इच्छा थी कि वे बाहर निकल कर उस जश्न का हिस्सा बने. लेकिन जाहिर सी बात है वह बाहर नहीं जा सकते थे. लेकिन उनकी इच्छा जरूर थी. उन्होंने यह नजारा अपनी खिड़की से ही देखा और सुंतष्टि की. कुछ दिनों पहले सोनाक्षी ने भी अपने फेसबुक पर एक वीडियो शेयर किया, जिसमें गुजरात से कुछ महिला प्रशंसक आयी थीं. सोनाक्षी ने भी खिड़की से ही इस नजारे को देखा. कुछ दिनों पहले ही शाहरुख के तीनों बच्चों की तसवीरें सोशल नेटवर्किंग साइट पर खूब लोकप्रिय रहीं. शायद अरसे बाद किसी ने शाहरुख के तीनों बच्चों को मन्नत की बालकनी में देखा था. हालांकि बेटी सुहाना ने खुद को परदे के पीछे ही छुपाये रखा. अमिताभ हर रविवार अगर मुंबई में रहते हैं तो अपने प्रशंसकों से मिलने की कोशिश करते हैं. दरअसल, हकीकत यही है कि अपने प्रिय कलाकारों या क्रिकेटरों को दर्शक इस कदर प्यार करते हैं कि उनके मात्र हाथ हिला देने से भी उनके दिल में तसल्ली आ जाती है. व े एक झलक पाने के लिए बेकाबू रहते हैं. शाहरुख की मन्नत के बाहर हमेशा भीड़ लगी होती है. सबकी कोशिश यही होती है कि कहीं शाहरुख को झरोखे से भी देख पायें. अपने जन्मदिन पर हालांकि शाहरुख आकर लोगों का अभिनंदन करते हैं. हाल ही में खबर आयी थी कि कपिल शर्मा ने जब लोगों को शांत करवाया. तब जाकर लोगों ने उनकी फिल्म की शूटिंग शुरू होने दी. चूंकि आम दर्शकों के लिए यही उपलब्धि है कि उन्हें अपने स्टार की झलक ही सही लेकिन उसे देखने का मौका तो नसीब हुआ. यही सिनेमा का तिलिस्म है.

रिश्तों पर आधारित कहानियां प्रभावित करती हैं : मनीष

 

 नागेश कुकनूर द्वारा निर्देशित व मनीष मुंद्रा की फिल्म धनक(रेनबो) ने बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में ग्रैंड प्रिक्स फोर बेस्ट फीचर फिल्म का खिताब जीता है. उन्हें यह सम्मान इंटरनेशनल ज्यूरी द्वारा जेनरेशन के प्लस सेक्स फॉर चिल्ड्रेन के अंतर्गत दिया गया है. मनीष की फिल्म आंखों देखी को भी इस वर्ष फिल्मफेयर की तीन श्रेणियों में सम्मानित किया गया है. उनकी ही फिल्म आंखोंदेवी व उमरिका को विश्व स्तर के कई फिल्मोत्सव में सराहा व सम्मानित किया जा चुका है.  उमरिका को भी सनडांस फिल्मोत्सव में सराहना मिली. सिनेमा को लेकर मनीष की यही सोच है कि वे इंडी( स्वतंत्र) और विषयपरक सिनेमा को बढ़ावा देना चाहते हैं.  मनीष का बचपन झारखंड के देवघर में ही गुजरा है. दिलचस्प बात यह है कि मनीष फिल्मों से पेशे की वजह से नहीं, बल्कि सिनेमा को लेकर उनकी सोच, उनके जुनून व इसके प्रति रुचि की वजह से जुड़े हैं.  सिनेमा से जुड़ने की वजह पैसे कमाना नहीं, बल्कि वैसी फिल्मों को सहयोग करना है, जो विषयपरक हैं. मसालाप्रधान नहीं. फिलवक्त वह दुबई में कार्यरत हैं. पेश है  अनुप्रिया अनंत से मनीष मुंद्रा की बातचीत के मुख्य अंश
बचपन
 मेरा जन्म देवघर में हुआ था. फिर माता पिता के साथ जोधपुर चला गया था. लेकिन  स्कूल की पढ़ाई मैंने देवगर में ही पूरी की. सो, वहां से कई यादें जुड़ी हैं. बाबा भोले की नगरी है. खास बात यह है कि मैं आज भी अपने स्कूल के दोस्तों से जुड़ा हुआ हूं. व्हाट्स अप पर हमेशा हमारी बातें होती हैं. कोई मुझसे पूछता है कि मुझे क्या चाहिए. तो  मैं  देवघर के पेड़े ही लाने को कहता हूं. फिल्मों से मेरा लगाव बचपन से ही था. बचपन में जब फिल्में देखता था तो लगता था उसका हिस्सा बनूं. हम उस वक्त छोटे छोटे थियेटर में फिल्में देखने जाते थे. पूरे परिवार के साथ. वह एक पारिवारिक इवेंट की तरह होता था कि फिल्म देखने जाना है. धीरे धीरे जब उम्र बढ़ी तो समझ आया कि फिल्में बनती कैसे हैं और किस तरह हम तक पहुंचती हैं. मुझे यह बातें समझ आयीं. साथ ही यह बातें भी समझ आयीं कि फिल्में बिना पैसे के नहीं बन सकती. सो, पैसे तो चाहिए. इसलिए नौकरी करना जरूरी है. मैं फिल्मों से पैसे कमाने के लिए नहीं जुड़ा हूं. बस अच्छी फिल्में दर्शकों तक पहुंचाऊं. यह उद्देश्य है.
विश्व सिनेमा से जुड़ाव
वर्ष 2002 में ही मैं विदेश चला गया था. अपनी उच्च शिक्षा के लिए.  थाइलैंड चला गया था. बाहर जाने  पर जब विश्व सिनेमा से जुड़ी अलग अलग मिजाज की फिल्में देखने लगा तो समझ आया कि फिल्मों में विषयपरक फिल्मों का होना कितना जरूरी है. विदेशों में सामान्य से सामान्य कहानियों को जिस तरह प्रयोगात्मक तरीके से प्रस्तुत किया जाता है. वही दर्शकों को लुभाती है. मैंने गौर किया है कि वर्ल्ड सिनेमा में रिश्तों की कहानियों को बहुत अहमियत देते हैं. और उसे खूबसूरती से दर्शाते हैं. मुझे वैसी ही फिल्में आकर्षित करती हैं. एक मां बेटी की कहानी. बाप बेटे की कहानी. बहन भाई की कहानी. पति पत् नी की कहानी. बेहद खूबसूरती से दर्शाते हैं. मेरा तो मानना है कि इन रिश्तों की कहानी में ही भारतीयता नजर आती है. हमारे रिश्ते भी कितने खूबसूरत हैं. उन्हें बस रूप देने की जरूरत है. लेकिन अफसोस कि इन दिनों मसाला प्रधान फिल्मों को इस कदर अहमियत मिल रहीं, कि ऐसी फिल्में बन नहीं पातीं. मैं ऐसी ही सिंपल और दिल को छूने वाली कहानियां कहनेवाले स्वतंत्र रूप से काम करने वाले निर्देशकों को सपोर्ट करना चाहता हूं. आप भारत से बाहर आयें और विश्व सिनेमा से जुड़ें तो आपको समझ आयेगा कि विदेशों में किस तरह भारत की फिल्मों का मजाक उड़ाया जाता है. उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता है. ऐसे में मेरी कोशिश है कि ऐसी फिल्में बनाऊं, जो ऐसे स्थानों पर सम्मानित हों. लंचबॉक्स से भारतीय फिल्मों के प्रति सोच बदली है. और आनेवाले समय में भारत की ऐसी विषयपरक फिल्मों को विदेशों में बड़ा मार्केट मिलेगा और मिल रहा है. यह शुभ संकेत हैं. मेरा मानना है कि अब भारतीय दर्शक भी रियल सिनेमा देखना चाहते हैं. और कुछ फिल्ममेकर्स अच्छी कोशिश भी कर रहे हैं.
फिल्म धनक को सम्मान
फिल्म धनक को हाल ही बर्लिन फिल्मोत्सव में ग्रैंड प्रिक्स अवार्ड से सम्मानित किया गया है. यह हमारे लिए गर्व की बात है. खासतौर से संतुष्टि तब मिलती है. जब लोग आपकी फिल्म देखने के बाद आते हैं और कहते हैं कि आपने अच्छी कहानी कही. उन दर्शकों में जर्मनी, अमेरिका हर देश के लोग होते हैं. मेरा मानना है कि आपकी फिल्म अगर वाकई प्रभावित करती है तो निश्चित तौर पर लोग आकर आपसे फिल्म के बारे में बात करेंगे. वह प्रतिक्रिया ही फिल्म की सफलता दर्शाते हैं कि आपने जो कहा, किसी के दिल तक बात पहुंची भी या नहीं. धनक को देखने के बाद किड्स ज्यूरी ने विशेष सराहना की.  धनक दो बच्चों की कहानी है. भाई बहन की कहानी. भाई अंधा है. लेकिन छोटी बहन उसका ख्याल रखती है. भले ही भाई अंधा है, लेकिन उसमें आत्मविश्वास की कोई कमी नहीं है.  वह लाचार नहीं है. आमतौर पर हिंदी फिल्मों में हम दिखाते हैं कि आप अंधे हैं तो लाचार हैं. इस फिल्म में ऐसा नहीं है. दो भाई बहनों की मासूम सी कहानी को दर्शाया गया है और मुझे लगता है कि फिल्म की मासूमियत ही लोगों को आकर्षित कर गयी. इस फिल्म का निर्माण संयोग से हुआ. मेरे पास फिल्म के निर्देशक दूसरी कहानी लेकर आये थे. वह बॉक्सर की कहानी थी.  जाते जाते उन्होंने मुझे धनक की कहानी सुनायी, मैंने कहा कि पहले यह करते हैं. वह भी चौंके कि अभी इस पर काम पूरा नहीं हुआ है. लेकिन मैंने कहा करते हैं इस पर काम. फिर पूरी टीम ने काम किया और जल्द फिल्म बन कर तैयार भी हो गयी और पुरस्कृत भी हुई. मुझे खुशी है कि हमारी कोशिशें सफल हो रही हैं. आंखों देखी के बारे में भी बताना चाहूंगा कि मैंने रजत के टिष्ट्वटर पर एक दिन देखा कि उन्हें फिल्म बनानी है लेकिन निर्माता नहीं मिल रहे. मैंने उन्हें कहा आप बनाएं. मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी. वह भी रिश्तों पर आधारित फिल्म थी. अनोखी स्क्रिप्ट थी इस फिल्म की. सो, मैंने कहा बनाइये  फिल्म मैं करूंगा निवेश और आज आंखों देखी सबके सामने हैं. आंखों देखी को भी कई सम्मान मिले. यह हमारे लिए गर्व की बात है.
अपकमिंग प्रोजेक्ट्स
 बहुत सारे प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है. फिलवक्त नीरज गायवान की मसान है. इसके अलावा अनु मेनन की फिल्म वेटिंग है. रजत कपूर की दो फिल्में पाइपलाइन में हैं. मुझे लगता है 2016 में और भी कई फिल्में आयेंगी.

अवार्ड समारोह के शब्द


आमतौर पर अवार्ड समारोह में कलाकारों व तकनीशियनों को जब अवार्ड से सम्मानित किया जाता है, तो वह अवार्ड मिलने की खुशी में कुछ शब्द जरूर कहते हैं. हालांकि टीवी पर प्रसारित होने तक संपादन से केवल लोकप्रिय कलाकारों के ही लंबे भाषण रखे जाते हैं. लेकिन कभी कभी कुछ आम कलाकारों को भी मौके मिल जाते हैं. इस वर्ष अवार्ड समारोह के कुछ लम्हे यादगार रहेेंगे उनके शब्दों के साथ. फिल्मफेयर जीतने के बाद निर्देशक विकास बहल ने अपनी कहानी सुनायी कि उनके पिता किस तरह उनसे पूछा करते थे कि आखिर तुम करते क्या हो. हर काम के लिए तो कोई न कोई होता है. विकास उस वक्त सोचते कि हां, वाकई यह हकीकत है कि वह हैं तो निर्देशक लेकिन लाइट, कैमरा, एक् शन भी सेट पर हमेशा फर्स्ट अस्टीटेंट ही कहते हैं तो फिर वे क्या करते हैं. फिर विकास ने अपने पिता को जवाब दिया था कि मैं उन सभी अच्छे तकनीशियनों को एक जगह एक छत के नीचे लेकर आया. यही निर्देशक करता है. अब तक के अवार्ड समारोह में इससे अच्छा भाषण मैंने नहीं सुना था. बजाय इसके कि आम लोगों की तरह वे अपने माता पिता, भगवान को थैंक्स कहते. उन्होंने टीम को बधाई दी और बेहतरीन तरीके से अपनी बात रखी. फिल्मफेयर समारोह में ही अभिनेता संजय मिश्रा को फिल्म आंखों देखी के लिए बेस्ट क्रिटिक अभिनेता का खिताब मिला. उन्होंने बेहतरीन तरीके से अपनी बात रखी कि किसी चीज को शिद्दत से चाहो तो वह मिल ही जाती है. यह उनकी आंखों देखी है. कम शब्दों में उन्होंने अपनी बात पूरी की और मन मोह लिया. इसी दौरान अभिनेत्री कामिनी कौशल को लाइफटाइम अचीवमेंट से सम्मानित किया गया और उन्होंने भी कम शब्दों में अपनी बात कही. दरअसल, इन शब्दों के कहे जाने के अंदाज से भी आप कलाकारों की मेहनत व लगन को आंक सकते हैं.

शिवनेंद्र की अनोखी पहल


शिवनेंद्र सिंह डुंगारपुर ने पिछले साल ही यह घोषणा की थी कि वे फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन का निर्माण करेंगे और उन्होंने अपनी मेहनत से इसे पूरा भी कर लिया है. आगामी 22 फरवरी को इस फाउंडेशन का लोकार्पण होने जा रहा है. खास बात यह है कि इसका लोकार्पण अमिताभ बच्चन कर रहे हैं. शिवनेंद्र ने इससे पहले सेल्योलाइड मैन नामक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई थी. फिल्म पीके नायर पर भी, जिन्होंने पुणे के फिल्म इंस्टीटयूट में फिल्मों के संरक्षण के लिए कदम उठाये. शिवनेंद्र ने एक नयी पहल की है. उन्होंने इस जरूरत को समझा है कि भारत में फिल्मों के संरक्षण की कितनी जरूरत है. आज आलम आरा के प्रिंट्स उपलब्ध नहीं हैं, कई फिल्में विलुत्प हो चुकी हैं. मगर अब तक यह कार्य शुरू नहीं हुआ था. शिवनेंद्र ने अपनी मेहनत और सोच से यह पहल की है, जिसकी सराहना होनी चाहिए. खास बात यह है कि यह सिर्फ फिल्म के संरक्षण तक सीमित फाउंडेशन नहीं होगा. इसके तहत भारत, नेपाल, श्रीलंका जैसे शहरों से विद्यार्थियों को बुलाकार फिल्म संरक्षण पर कई वर्कशॉप भी कराये जायेंगे. अमिताभ भी यह स्वीकारते हैं कि भारत ने सिनेमा के कई धरोहर को खो दिया. कम से कम अब भी लोगों की आंखें खुलें और वे इसे संजोने की कोशिश करें. सिनेमा के लिए क्रांति लाना सिर्फ फिल्में बनाने से ही नहीं आती. इन प्रयासों से भी सिनेमा के लिए क्रांति की जा सकती है. शिवनेंद्र इन बातों को न सिर्फ समझ रहे हैं, बल्कि वे अपनी ऊर्जा उसमें डाल रहे हैं. आज जहां कई फिल्में शुक्रवार को आकर चली जा रही हैं. उनकी सूध लेना वाला कोई  नहीं. ऐसे में इस फाउंडेशन की मदद से वैसी फिल्में जो काफी समृद्ध हैं और उन्हें सहेजा जाना चाहिए था. ताकि आगे आने वाली पीढ़ी उससे रूबरू हो पायें. आवश्यक था. शिवनेंद्र के साथ पूरी फिल्म फर्टिनिटी को आगे बढ़ना ही चाहिए. 

शाहिद का उतावलापन


शाहिद कपूर जल्द ही तेलुगु की सुपरहिट फिल्म मगधीरा के हिंदी रीमेक में लीड किरदार निभायेंगे. मगधीरा एक पीरियड फिल्म थी और इस फिल्म ने तेजा को तेलुगु का सुपरस्टार बना दिया. निस्संदेह फिल्म में वीएफएक्स का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया था. इस वजह से फिल्म का एक भव्य रूप नजर आया था. शाहिद को पिछले साल फिल्म हैदर के लिए लगभग सारे पुरस्कार मिले हैं. फिल्म अवार्ड में सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार माने जाने वाले फिल्मफेयर में भी सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का खिताब मिला. शाहिद कपूर पिछले काफी अरसे से इस सफलता के लिए मशक्कत कर रहे थे. अब जाकर उनकी यह मेहनत रंग लायी है. मगर उन्हें अधिक उतावला नहीं होना चाहिए. उन्हें यह बात समझनी होगी कि उनकी फिल्म आर राजकुमार भले ही बॉक्स आॅफिस पर सफल रही, लेकिन वे राउड़ी रूप में नहीं जमते. उन्हें अपने फिल्मों के चयन में अब सतर्कता रखनी होंगी. उड़ता पंजाब का चयन उन्होंने बेहतरीन किया है. चूंकि इस फिल्म के निर्देशक अभिषेक चौबे भलिभांति जानते हैं कि उन्हें अपने किरदारों को किस रूप में ढालना है. शानदार भी उनके मिजाज की फिल्म होगी. मगर मगधीरा के लिए वे फिट हैं या नहीं यह तो आने वाला समय ही बतायेगा. उन्हें अति उत्साह में गलत चुनाव से बचना चाहिए. यह उनकी पहली पीरियड फिल्म होगी और वर्तमान दौर में कलाकार यह चाहते हैं कि उन्हें पीरियड फिल्मों में काम करने का मौका मिले. चूंकि वे इससे जल्दी लाइमलाइट में आते हैं और उन्हें खुद को साबित करने के लिए सही स्थान मिलता है. लेकिन आयुष्मान खुराना की फिल्म हवाईजादा निराश करती है.ऐसे में शाहिद को भी संभल कर कदम बढ़ाने चाहिए. फिलवक्त उन्हें करियर ओरियेटेंड फिल्में करनी चाहिए, ताकि वह इस सफलता को बरकरार रख सकें.

आमिर का जवाब


आमिर खान ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि उन्हें एआइबी रोस्ट जैसे शोज से परेशानी है. उनका मानना है कि उनके फिल्म फर्टनिटी के सदस्यों को ऐसे शोज का हिस्सा नहीं बनना चाहिए, हालांकि आमिर ने यह भी कहा है कि वह उन्हें रोकने टोकने वाले कोई नहीं. लेकिन उनका मानना है कि किसी को एंटरटेन करने का मतलब हरगिज गालियां देना नहीं है. स्वतंत्रता का अधिकार हर किसी को निस्संदेह मिलना चाहिए. लेकिन उसका गलत प्रयोग नहीं होना चाहिए, उन्होंने स्वीकारा कि उन्होंने भी फिल्में बनाई हैं, डेल्ही बेली जिसमें कुछ ऐसे शब्द थे.लेकिन उन्होंने किसी को व्यक्तिगत तौर पर गालियां नहीं दी थीं और उन्होंने ए सर्टिफिकेट ही डिमांड की थी. आमिर का मानना है कि अगर किसी को आप हंसाना चाहते हैं, तो बिना उनका मजाक उड़ाये आपको हंसाना चाहिए. व्यंग्य के अपने तौर तरीके हैं. और वे होते भी रहने चाहिए. लेकिन एआइबी एक हिंसात्मक शो है. आमिर ने वाकई इस बात को बखूबी रखा है कि हिंसा का मतलब केवल शारीरिक नहीं होता. आमिर खान ने कुछ महीनों पहले ही सत्यमेव जयते पर कुछ अभिनेत्रियों को अपने शो पर बुलाया था, जिनमें कंगना, दीपिका और परिणीति चोपड़ा शामिल थीं. तीनों ही अभिनेत्री इस शो का हिस्सा इसलिए थीं, क्योंकि किसी न किसी रूप में उन्हें कुछ बातों का सामना करना पड़ा था. लेकिन इनमें से केवल कंगना ही अपनी बातों पर अमल कर पा रही हैं. उन्होंने स्पष्ट कहा था कि न तो वैसी फिल्मों का हिस्सा बनेगी, जिससे बच्चों पर बुरा असर हो और न ही वे आयटम सांग ही करेंगी. आमिर ने भी कहा था कि वे अपने फिल्मी दुनिया के लोगों से इस पर गंभीरता से बात करेंगे. मगर यह भी कलाकारों की सोच को ही दर्शाता है कि एक तरफ सत्यमेव जयते है और दूसरी तरफ एआइबी जैसे शोज़ और जिसका हिस्सा बन कर सेलिब्रिटी बेह खुश हैं

हर व्यक्ति की दो आवाजें होती हैं : विक्रमजीत सिंह

फिल्म रॉय की काफी चर्चा हो रही है. पेश है फिल्म के लेखक व निर्देशक विक्रमजीत सिंह  की खास बातचीत
आपकी पहली फिल्म रॉय रिलीज हो रही है. कैसा अनुभव रहा?
बचपन से ही फिल्में देखने और फिल्मों में कुछ  करने की तमन्ना रही है. लेकिन मेरे पिता चाहते थे कि मैं पहले अपनी पढ़ाई पूरी कर लंू. उसके बाद फिल्मों में करियर बनाने को लेकर कोई निर्णय लूं. पिता के आदेश का पालन करते हुए पढ़ाई करने के लिए मैं न्यूयॉर्क चला गया था. वहां मैंने चार साल तक मैनेजमेंट की पढ़ाई की. फिर दो साल तक अमरीका में ही नौकरी की. उसके बाद फिल्मों में दिलचस्पी होने की वजह से मुंबई वापस आ गया. जाहिर सी बात है हर पेरेंट्स की तरह मेरे पिता भी मुझसे काफी नाराज हुए,. लेकिन मुझे खुशी है कि आखिरकार मेरी पहली फिल्म रिलीज होने जा रही है.
फिल्म को लेकर काफी चर्चा है.फिल्म के बारे में थोड़ी जानकारी दें?
यह कहानी दो निर्देशकों की है. कबीर और आयशा. कबीर के चरित्र में अर्जुन रामपाल हैं और आयशा का किरदार जैकलीन निभा रही हैं. रॉय एक चोर हैं और रॉय की भूमिका रणबीर निभा रहे हैं. फिल्म में रॉय की भूमिका को लेकर ही खासियत है. वह क्या है. यह आपको फिल्म देखने के बाद ही पता चलेगा. फिल्म में कबीरा कहानियां लिखते हैं.
फिल्म की क्या बातें दर्शकों को आकर्षित करेंगी?
इस वक्त पूरी कहानी नहीं बता सकता. आज ही फिल्म रिलीज हुई है. दर्शकों को फिल्म देख कर इसका मजा लेने दीजिए.  फिल्मकार अपनी कहानी को किस तरह दर्शाता है. दर्शक उसी अंदाज को पसंद और नापसंद करते हैं. इसी तरह मेरी फिल्म की कहानी रॉय और कबीर नामक दो इंसानों की है. रॉय और कबीर का क्या रिश्ता है. वह किस तरह एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. यही कहानी का टिष्ट्वस्ट है. इस कहानी के पीछे मेरी यही सोच है कि हर इंसान में दो तीन आवाजें छिपी होती हैं. इस फिल्म में भी कबीर के अंदर दो आवाजें हैं. एक कबीर और दूसरा रॉय. इसके अलावा मैंने फिल्म को मलेशिया में फिल्माया है.
खबर थी कि आप यह फिल्म वियतनाम में फिल्माना चाहते थे. फिर वहां जाना संभव क्यों नहीं हो पाया?
हर फिल्मकार की यह जरूरत होती है कि वह अपने दर्शकों को अलग अलग जगहों की सैर कराये. फिल्मों के माध्यम से. मेरी भी इच्छा कि वियतनाम में फिल्म की शूटिंग करूं, क्योंकि वहां घने जंगल हैं, वहां के समुद्री बीच बहुत अलग है. लेकिन सभी इस बात के लिए तैयार नहीं हुए तो मुझे मलेशिया में ही शुट करना पड़ा.
फिल्म के कलाकारों के बारे में कुछ बताएं?
फिल्म बफी्र को देख कर मैं रणबीर कपूर से बहुत प्रभावित हुआ था. बर्फी में जिस तरह उन्होंने एक गूंगे लड़के का किरदार निभाया. वह हर कलाकार नहीं निभा सकता था. जब मैंने स्क्रिप्ट पूरी कर ली तो मुझे एहसास हुआ कि हमारी फिल्म में रणबीर कपूर जैसा कलाकार चाहिए. मैंने उसे अपनी स्क्रिप्ट भेजी. स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद रणबीर ने मुझे फोन करके कहा कि वह रॉय का किरदार निभाना चाहेगा. मुझे खुशी हुई और आश्चर्य भी, क्योंकि हमारी फिल्म का नाम भले ही रॉय हो. लेकिन वह लीड किरदार नहीं है. लेकिन यह अलग सा किरदार है. सो, मुझे बेहद खुशी है कि रणबीर जैसे कलाकार फिल्म से जुड़े हैं. अर्जुन की रॉक आॅन और राजनीति देख कर मैंने उन्हें साइन की. जैकलीन की मैंने कोई फिल्म नहीं देखी है. लेकिन हम पहले कई बार मिल चुके थे और मैं उनके व्यक्तित्व से प्रभावित था. इसलिए मैंने उन्हें फिल्म में साइन कर लिया.
आपके पसंदीदा निर्देशक कौन कौन हैं?
मुझे राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्में पसंद हैं. फरहान अख्तर, दिबाकर बनर्जी  पसंद हैं. लेकिन मैंने किसी की नकल नहीं की है फिल्म में. 

कामिनी कौशल को फिल्मफेयर


आमतौर पर जया बच्चन सार्वजनिक समारोहों में गंभीर नजर आती हैं, मीडिया से उनकी अनबन की खबरें आती रहती हैं. लेकिन हम शायद यह भूल जाते हैं कि जया बच्चन भी आम इंसान ही हैं. उनके मन में भी भावनाएं हैं. संवेदनाएं हैं. बहरहाल, इस वर्ष फिल्मफेयर में उनका अनोखा स्वरूप नजर आया. वे मंच पर कामिनी कौशल को फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित करने आयी थीं. उन्होंने अपने भाषण में जिक्र किया कि कामिनी कौशल उस दौर में फिल्मों में आयी थीं, जब लड़कियों के लिए फिल्मों की दुनिया में आना कठिन था. दोनों अभिनेत्रियां भावुक थीं. खासतौर से तब दोनों अभिनेत्रियों की आंखें छलक गयीं, जब कामिनी जी ने कहा कि धीरे धीरे वे अकेली होती जा रही हैं, चूंकि एक एक करके उनके दौर के सभी संगी साथी कलाकार उनसे बिछुर रहे. प्रथम रो में बैठीं रेखा भी भावुक हो उठीं. कामिनी जी ने इसी दौरान बताया कि उन्हें अपनी जिंदगी में पपेट शो का निर्माण अहम उपलब्धि लगती है. चूंकि इस शो के लिए वह खुद से पपेट तैयार करती थीं. और सभी को खुद ही आवाज िदया करती थीं. 10 किरदारों के लिए 10 आवाजें. और इसके साथ ही उन्होंने कहा इप्पी जो उनके किरदार कहते नजर आते थे. कामिनी जी ने नयी अभिनेत्रियों व युवाओं को ढेर सारा प्यार दिया. साथ ही उन्होंने मीठे स्वर में कहा कि उन्हें कभी कभी ईर्ष्या भी होती है कि वह इस दौर में फिल्मों में क्यों नहीं. चूंकि इस दौर में अधिक स्वतंत्रता है.  हम कामिनी कौशल को हमेशा उनकी मोहक और मीठी आवाज करेंगे. आज भी उनकी बातों में शिकायत का लहजा नजर नहीं आता. वे आज भी सिनेमा को किसी भी रूप में कंट्रीब्यूट करने के लिए तैयार रहती हैं. वे मानती हैं कि सिनेमा ने ही उन्हें सबकुछ दिया और बदले में सिनेमा के लिए वह जो भी कर पायेंगी. उनका सौभाग्य होगा. इस जज्बे को सलाम.

सतरंगी ससुराल


 जीटीवी पर प्रसारित हो रहे धारावाहिक सतरंगी ससुराल में नायक सात मांओं का लाड़ला है. उसे एक लड़की आरुषि से प्यार है. लेकिन नायक ने निर्णय लिया है कि वह आरुषि के माध्यम से सभी मांओं का दिल जीतेगा. वह आरुषि को बुआ के मुताबिक शास्त्रीय संगीत में दिलचस्पी जगाने को कहता है. लेकिन आरुषि आज की लड़की है. उसे शास्त्रीय संगीत दिलचस्पी नहीं है और वह झूठ बोलती हुई पकड़ी जाती है. नायक की चाची का दिल जीतने के लिए वह किचन में अपना हाथ आजमाती है. लेकिन वह उसमें भी नाकामयाब रहती है. लाइफ ओके के शो मेरे रंग में रंगने वाली में भी शादी जबरदस्ती की है. लेकिन नायिका नायक के परिवार वालों का दिल जीतने के लिए सारे नियम कानूनों को मानना शुरू कर देती है. दरअसल, हकीकत यही है कि बहू को लेकर जो प्रथा चली आ रही है वह यही है कि बेटी जब बहू का रूप धारण करती है तो ससुराल वालों का दिल जीतने की सारी जिम्मेदारी लड़की पर ही थोप दी जाती है. वाकई ससुराल ऐसी सतरंगी दुनिया है, जहां कई लड़कियों के सपने कड़वे हो जाते हैं और कुछेक को इंद्रधनुषी संसार की प्राप्ति होती है.  दरअसल, बहुओं को भी वही आजादी मिलनी चाहिए जो हम बेटियों को देते हैं. उन्हें जबरन वह बनाने की कोशिश न करें, जो वह नहीं हैं. कई बार लड़कियों को बहू के रूप में ऐसे कार्य भी करने पड़ते हैं, जो हास्यपद होते हैं. जबकि तमाम बातों से परे केवल एक बात महत्व रखती है और वह है लड़की का व्यवहार. यशराज की आगामी फिल्म दम लगाके हईसा के प्रोमो में नायिका को स्कूल टीचर की भूमिका में दर्शाया जा रहा. लेकिन उसका पति खुश नहीं, क्योंकि वह उसके पास जीरो फिगर नहीं. स्पष्ट है कि वह टीचर बनी है, तो वह काफी पढ़ी लिखी है. फिर क्यों उसे खुद को साबित करने की नौबत आती है. 

आर बाल्की के रंग


 आर बाल्की की फिल्में फिल्मी होते हुए भी पूरी तरह फिल्मी नहीं होती. यह आर बाल्की की रचनाशीलता का कमाल है कि वे अपने संवादों में इस कदर जान डालते हैं कि वह याद रह जाते हैं. अमिताभ की जिंदगी में आर बाल्की जैसे निर्देशकों की सख्त जरूरत थी. चूंकि वे अमिताभ को अलग अंदाज में संवारते हैं और दर्शकों के सामने प्रस्तुत करते हैं. आर बाल्की किसी अच्छे दोस्त की तरह अमिताभ को अमिताभ से मिलने का मौका देते हैं. जी हां, न सिर्फ परदे पर बल्कि परदे से इतर. जब हम बाल्की के अमिताभ को देख रहे होते हैं तो कहीं न कहीं हमें वह आॅफ स्क्रीन वाले अमिताभ की छवि भी नजर आती है. बाल्की शायद कोशिश करते हैं कि अमिताभ के दिल के उस कोने में जाकर झांके और लोगों तक वे बातें पहुंचायें, जिससे दर्शक रूबरू नहीं हैं. यह स्पष्ट है कि किसी दौर में अमिताभ बच्चन को उनकी आवाज की वजह से रेडियो में काम नहीं मिला था. बाल्की ने इस बात को फिल्म षमिताभ में बखूबी दर्शाया है और जाहिर सी बात है, जब अमिताभ उस सीन को निभाने रहे होंगे. वे वास्तविक रूप में होंगे. फिल्म पा में  वह एक चंचल बच्चे के रूप में हैं. वे बीमारी से ग्रस्त हैं, लेकिन फिर भी अपनी जिंदगी में आॅरो जिंदादिली के साथ जीता है. अमिताभ की वास्तविक जिंदगी भी कुछ ऐसी ही जिंदादिली से भरी है. फिल्म षमिताभ में अमिताभ के इस हकीकत को आर बाल्की से सही तरीक ेसे प्रस्तुत किया है कि वे आवाज के कारण नकारे गये थे. कहीं न कहीं अमिताभ की पीड़ा को वह समझते होंगे. चूंकि वे अमिताभ के नजदीकी रहे हैं. अभिनय को लेकर दो पीढ़ियों की सोच भी षमिताभ में नजर आती है. एक कलाकार किस आॅरे में जीता है. इसकी भी कहानी दर्शकों को नजर आती है. बाल्की की यही खूबी उन्हें अमिताभ के दिल में विशिष्ट स्थान दिलाती है. 

एक बिंदू पर मेल


 सैफ अली खान की फिल्म फैंटम की कहानी अक्षय कुमार की फिल्म बेबी से मिलती जुलती है. और यही वजह है कि फिल्म के मेकर्स ने स्क्रिप्ट में फिर से बदलाव करने का निर्णय लिया है. अब फिल्म अप्रैल में नहीं अगस्त में रिलीज होगी. यह पहली बार नहीं, जब बॉलीवुड में कहानियों को लेकर इस तरह के क्लैश न हुए हों. ताजा उदाहरण राजकुमार हिरानी की फिल्म पीके और ओह माइ गॉड है. दोनों फिल्मों की तुलना खूब हुई. चंूकि दोनों का विषय एक ही था. इससे पहले राजकुमार हिरानी ने स्वीकारा कि उनकी फिल्म की कहानी पहले विदेशी फिल्म इंसेप्शन से भी मिलती जुलती थी. लेकिन बाद में उन्होंने बदलाव किया. उनकी फिल्म मुन्नाभाई चले अमरीका की कहानी भी माइ नेम इज खान से मिलती जुलती थी. सो, अंतत: राजू को वह फिल्म वही रोकनी पड़ी. फिल्मों में ही नहीं, छोटे परदे पर भी ऐसी कई कहानियां हैं, जो मेल खाती हैं. वर्तमान में यमदेव पर दो धारावाहिक प्रसारित हो रहे हैं. हैल्लो प्रतिभा और सोनी टीवी के शो एक नयी पहचान की कहानी एक सी थी. दरअसल, इस बात से सिर्फ यह अनुमान लगा पाना गलत है कि फिल्म के लेखक निर्देशक एक दूसरे की नकल करते हैं. चूंकि सृजनशीलता भी कहीं न कहीं किसी न किसी स्थान पर एक दूसरे से प्रभावित होती है. यह भी संभव है कि जिन तथ्यों, या खबर या किसी एक घटना से एक व्यक्ति प्रभावित होता है. अन्य भी हो सकता. शायद यही वजह है कि ऐसी कहानियां अधिकतर कामयाब रही हैं. चूंकि अगर वे कहानियां किसी रूप में भी एक से अधिक सृृजनशील व्यक्ति को प्रभावित करती है. तो वह व्यक्ति भी तो दर्शकों के बीच का ही हिस्सा है. और यही वजह है कि दर्शक ऐसी कहानियों से जुड़ पाते हैं.यह खेल उस एक बिंदू पर है, जहां सभी केंद्रित होते हैं. इसे महज नकल का नाम देना उचित नहीं होगा. 

शिकवा नहीं किसी से किसी से गिला नहीं



बॉलीवुड में कुछ जोड़ियां हैं, जिन्होंने रिश्ते टूटने के बाद कभी साथ में काम करना गवारा नहीं समझा. साथ ही कुछ जोड़ियों ने मनमुटाव के कारण साथ काम करना पसंद नहीं किया.  लेकिन कुछ जोड़ियां जल्द ही एक नयी शुरुआत कर रहे हैं. वे रिश्तों में खटास आने के बावजूद साथ काम करने की पहल कर रहे हैं.

 करीना व शाहिद
करीना कपूर व शाहिद कपूर कभी एक दूसरे के बेहद करीब थे. दोनों जब साथ साथ कॉफी विद करन में आये थे. उस वक्त करीना कपूर की बहन करिश्मा कपूर ने कहा था कि शाहिद से अच्छा जीवनसाथी करीना को कभी नहीं मिल सकता है. लेकिन बाद में दोनों में दूरियां आ गयीं. िफल्म ओमकारा की शूटिंग के दौरान करीना और सैफ नजदी क आये और करीना व शाहिद अलग हुए. इसके बाद करीना व शाहिद ने कभी साथ काम नहीं किया. हालांकि करीना ने हाल ही में कई फिल्मोत्सव में शाहिद को हाय हल्लो कहा. लेकिन शाहिद की तरफ से उन्हें कोई खास प्रतिक्रिया नहीं मिली. लेकिन दोनों ने कुछ सालों पहले जो निर्णय लिया था कि वे साथ काम नहीं करेंगे. अब दोनों साथ साथ एक फिल्म में काम करने जा रहे हैं. इश्किया व डेढ़ इश्किया के निर्देशक अभिषेक चौबे दोनों को साथ में लेकर उड़ता पंजाब बनाने जा रहे हैं. हालांकि खबर है कि फिल्म में दोनों के साथ में कोई दृश्य नहीं हैं.
करीना-अभिषेक
करीना कपूर और अभिषेक बच्चन ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत साथ साथ की थी. फिल्म रिफ्यूजी से. लेकिन फिल्म कामयाब नहीं रही थी. उस दौर में करिश्मा कपूर और अभिषेक बच्चन की शादी होने वाली थी. और दोनों की सगाई हो चुकी थी. जया बच्चन ने कई सार्वजनिक स्थानों पर भी करिश्मा को अपनी बहू के रूप में संबोधित किया था. लेकिन बाद में रिश्ता टूटा और इसके साथ ही वे सारे प्रोजेक्ट बंद हो गये जिसमें करीना और अभिषेक साथ काम करने वाले थे. लेकिन अब दोनों फिर से फिल्म उड़ता पंजाब में ही साथ नजर आने वाले हैं. यह पहला ऐसा मौका होगा, जब करीना उन दो स्टार्स के साथ काम करने जा रही हैं, जिनके साथ उनके रिश्तों में खटास आ चुकी थी.
रेखा-अमिताभ
रेखा और अमिताभ की प्रेम कहानी के चर्चे अब भी होते ही रहते हैं. अगर किसी सार्वजनिक समारोह में भी दोनों एक दूसरे के सामने आते हैं तो सुर्खियां बनती हैं. कुछ दिनों पहले शोर भी था कि फिल्म वेलकम बैक में रेखा और अमिताभ साथ साथ फिल्म में काम कर रहे हैं. लेकिन अमिताभ ने इस खबर का खंडन किया. लेकिन फिल्म षमिताभ में कई अरसो बाद अमिताभ रेखा नजर आयेंगे. हालांकि इस फिल्म में भी रेखा कैमियो में हैं और उनका दृश्य धनुष के साथ है.
दीपिका-सलमान
सलमान खान और दीपिका पादुकोण ने अब तक साथ में फिल्में नहीं की है. चूंकि कभी सलमान खान दीपिका को अपनी फिल्म से लांच करना चाहते थे. लेकिन उस वक्त दीपिका ने मना कर दिया था. इसके बाद लगातार दीपिका और सलमान के बीच रिश्ते में मनमुटाव होते रहे. दोनों कभी अच्छे दोस्त नहीं बने. यहां तक कि दोनों एक दूसरे से बातचीत भी नहीं करते थे. लेकिन अब खबर है कि दोनों के रिश्तों में सुधार हो रही है और दोनों साथ में करन जौहर की फिल्म शुद्धि में साथ काम करेंगे.
बॉक्स में
सुधरे रिश्ते
अनुराग बसु की फिल्म बर्फी में कैट ने काम करने से मना किया था तो खबर थी कि अनुराग कैट से नाराज हैं.लेकिन दोनों साथ काम कर रहे. करन जौहर और अनुराग कश्यप में भी शुरुआती दौर में एक दूसरे पर व्यंग्यबाजी होती थी. लेकिन अनुराग की फिल्म बांबे वेल्वेट में करन नकारात्मक किरदार में साथ नजर आयेंगे.अनुराग कश्यप और मनोज बाजपेयी में भी कई सालों तक बातचीत नहीं थी. लेकिन गैंग्स आॅफ वासेपुर के दौरान दोनों के रिश्ते सुधरे.
बनते बनते रह गयीं जोड़ियां
करीना और ऋतिक रोशन ने फिल्म मुझसे दोस्ती करोगे के बाद साथ काम नहीं किया था. चूंकि ऋतिक की एक्स वाइफ सुजैन को करीना और ऋतिक का साथ होना पसंद नहीं था. किसी जमाने में दोनों के प्रेम प्रसंग के काफी चर्चे थे. यही वजह थी कि दोनों ने साथ काम नहीं किया.लेकिन हाल ही में दोनों करन जौहर की फिल्म शुद्धि में साथ काम करने जा रहे थे. लेकिन ऋतिक ने अपना नाम पीछे कर लिया. तो करीना भी पीछे हो गयीं. उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वे ऋतिक के साथ काम करना चाहती थीं इसलिए उन्होंने भी फिल्म से दूरी बना ली. माधुरी दीक्षित और संजय दत्त ने फिर कभी साथ काम नहीं किया. ऐश्वर्य राय और सलमान खान ने ब्रेकअप होने के बाद कभी साथ काम करना मंजूर नहीं किया. करिश्मा व अभिषेक ने भी साथ काम करने से इनकार कर दिया. प्रियंका व शाहरुख खान भी शायद हाल के वर्षोँ में किसी फिल्म में साथ नजर आयेंगे. विद्या बालन और सुजोय घोष में इन दिनों फिल्म कहानी 2 को लेकर काफी मनमुटाव है. विद्या ने साफ किया है कि फिलहाल दोनों में बातचीत बंद है. लेकिन आनेवाले सालों में रिश्ते में सुधार के भी आसार हैं. 

अभिनेत्रियां व सलाहकार


विद्या बालन ने हाल ही में एक अखबार को दिये इंटरव्यू में स्वीकारा है कि किस तरह उनकी डायटीशियन ने उन्हें स्लीमिंग पील्स देकर अचानक स्लीम बनाया. लेकिन बाद में जब विद्या ने उसका सेवन बंद किया तो उनका वजन दोबारा तेजी से बढ़ा और अब तक वह पूरी तरह से अपने वजन पर नियंत्रण नहीं रख पायेंगी. विद्या ने भी यह भी कहा कि उस डायटीशियन ने जान बूझ कर उन्हें गलत सलाह दी. इससे उसने अपना उल्लू सीधा किया. चूंकि जब विद्या अचानक दुबली नजर आने लगीं तो उस डायटीशियन को कई क्लाइंट मिलने लगे. सभी का विश्वास बढ़ा कि अगर इस डायटीशियन ने विद्या को दुबला कर दिया है तो उन्हें भी कर देंगी. लेकिन दरअसल, उस डायटीशियन ने विद्या के साथ धोखा किया. उन्हें अंधेरे में रख कर गलत सलाह दिया. जिसका नतीजा वह आज भुगत रही हैं. विद्या इस बात से काफी दिनों तक दुखी रहीं. लेकिन अब वह लोगों को सलाह दे रही हैं कि वे इस तरह पील्स या दवाईयों पर भरोसा न करें. विद्या अभिनेत्रियों में पहली अभिनेत्री नहीं होंगी, जिन्होंने वजन कम करने के लिए यह कदम उठाया था. बॉलीवुड के दर्शक, बॉलीवुड की सोच ही उन्हें मजबूर करती है कि वे ऐसे कदम उठायें. करीना ने भी पहले कई गलतियां की थी. लेकिन बाद में उन्हें रुजुता की शरण मिली.  और वे कामयाब हुई. फिल्मी हस्तियों की यह परेशानी है कि वह अपने सलाहकारों व चाटुकारों पर अत्यधिक भरोसा करते हैं और आंध मूंध कर भरोसा करना ही कभी कभी उनके लिए परेशानी का सबब बन जाता है. विद्या पर लगातार उनके बढ़े वजन को लेकर इस कदर वार होते रहे, कि विद्या ने भी आजिज आकर फटाफट खुद को पतला करने की होड़ में गलत कदम उठाये. अभिनेत्रियों को मजबूर भी दर्शक और आम लोग ही करते हैं, सो वजन को लेकर नजरिया बदलना ही होगा.

एआइबी का छिछोरा शो


एक आॅनलाइन शो एआइबी की टीम ने हाल ही में एक आयोजन किया, जिसके टिकट की राशि 4000 रुपये थी. इस शो में लगभग 40 हजार आॅडियंस शामिल थी. साथ में इंडस्ट्री के बड़ी नामचीन हस्तियां, जिनमें करन जौहर, अर्जुन कपूर, रणवीर सिंह, आलिया भट्ट, दीपिका पादुकोण, सोनाक्षी सिन्हा, अनुराग कश्यप जैसे लोग मौजूद थे. शो का कांसेप्ट अमेरिकी आॅनलाइन शो के तर्ज पर तैयार किया गया था, जहां आप लोगों को उनके सामने ही अपशब्द और अश्लील बातें कहते हैं. लेकिन अपना माखौल उड़वाने पर खुद पर हंसते हैं. इस शो में वह सारी हदें पार रहती हैं. इस शो में अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा के बारे में टीम के ही एक सदस्य तनमय ने एक ऐसी बात कही, जो सरासर एक महिला का अपमान था. लेकिन वहां बैठीं दीपिका पादुकोण, आलिया भट्ट और सोनाक्षी इसका चुटीले अंदाज में लुत्फ उठा रही थीं. यह वही दीपिका हैं, जिन्होंने अपनी एक तसवीर को लेकर एक अखबार से भिड़ंत की थी. आमिर खान के शो का हिस्सा भी बनीं और उस वक्त महिलाओं के चरित्र को लेकर बड़ी बड़ी बातें कही थीं. अर्जुन कपूर को अपने पिता बोनी कपूर और सौतेली मां श्रीदेवी के बारे में बात करना या उससे संबंधित प्रश्न पूछे जाने से परहेज है. लेकिन उस मंच पर उनके पिता व श्रीदेवी को लेकर भी बातें कही गयीं और वह हंसी से लोट पोट हो रहे थे. करन जौहर जिन्हें इन दिनों खुलेआम अपनी विशेषता दर्शाने में दिलचस्पी है. वे भी इस शो में सबसे अधिक आनंद ले रहे थे. मनोरंजन का यह कैसा स्वरूप है, जहां माता, पिता, भाई बहनों का सिर्फ मजाक के नाम पर माखौल उड़ाया जाये. सलमान खान ने इस पर तीखा रुख अपनाया है. और मजबूरन शो के कुछ अंश एडिट किये गये हैं. दरअसल, इस तरह का तीखा रुख हर सदस्य को अपनाना चाहिए. मजाक उड़ाने और किसी को अपशब्द कहने में जमीन आसमान का फर्क है

मास्टर शेफ और भावनाएं


स्टार प्लस पर प्रसारित हो रहे रियलिटी शो मास्टर शेफ में इस बार थीम शाकाहारी भोजन का रखा गया है. मसलन प्रतिभागियों को अपना हुनर शाकाहरी व्यंजनों में दर्शाना होगा. फिलवक्त आॅडिशन के एपिसोड टेलीकास्ट हो रहे हैं. मगर मास्टर शेफ भी अन्य रियलिटी शोज की तरह ही अपने शो के कांसेप्ट पर कम, और प्रतिभागियों की भावनाओं पर अधिक ध्यान दे रहा. यह भारत वर्ष में ही हो सकता कि जहां कई महिलाएं पूरा पूरा दिन चुल्हा चौका करते हुए बीता देती हैं. लेकिन बदले में उनके तारीफों के दो शब्द सुनने को नहीं मिलते. वहां उनकी भावनाओं को कोई तवज्जो नहीं मिलती. लेकिन दूसरी तरफ वही महिलाएं जब नेशनल चैनल पर आकर अपनी भावनाओं को दर्शा रहीं तो शेफ उनके डिश से ज्यादा उनकी भावनाओं को अहमियत दे रहे. एक लिहाज से यह उन तमाम पुरुष वादी सोच के मुंह पर तमाचा है, जो यह सोचते हैं कि भोजन पकाना महिलाओं का कर्तव्य है और वे उनकी भावनाओं को इज्जत न देते हुए उनके खाने में नुक् श निकालने से बाज नहीं आते. ऐसी   औछी सोच को तो मास्टर शेफ निस्संदेह एक करारा जवाब दे रहा. लेकिन चूंकि मास्टर शेफ विदेशी रियलिटी शो के ही तर्ज पर तैयार किया है. सो, उसे उस मापदंड पर भी खरा उतरना ही होगा. हां,यह हकीकत है कि भारत में भावनाएं ही बिकती हैं, और रियलिटी शो में सबसे अधिक यह नजर आता. लेकिन वाकई यहां जंग व्यंजन की है. और लोगों को उसी आधार पर अपना हुनर दर्शाना चाहिए. चूंकि अच्छा और स्वादिष्ट भोजन बनाना हर किसी के वश की बात नहीं. मास्टर शेफ में ही एक महिला प्रतिभागी ने दाल का दुल्हा नामक एक सामान्य बिहारी डिश को जिस अंदाज में शेफ को परोसा और शेफ को नाम के साथ स्वाद भी पसंद आया. ऐसी छुपी प्रतिभाओं को सामने लाने का जरिया बने तो अच्छा है.

फाल्के की कालिया मर्दान


भारतीय सिनेमा के रचयिता दादा साहेब फाल्के की फिल्म कालिया मर्दान मुंबई के दीपक बुटिक सिनेमा में दिखाई जा रही है. यह फिल्म 1919 में रिलीज हुई थी. मुंबई में लगभग एक हफ्ते तक इस फिल्म का प्रदर्शन किया जा रहा है.  वर्ष 1918 में फाल्के ने श्री कृष्णा का निर्माण किया था. यह पहली फिल्म थी जिसका निर्माण हिंदुस्तान सिनेमा फिल्म कंपनी के तहत हुआ था. इस फिल्म की कामयाबी के बार कालिया मर्दान का निर्माण किया गया था. चूंकि उस दौर में ज्यादातर माइथॉलॉजिकल फिल्मों का ही निर्माण हुआ करता था. इस फिल्म में कुछ ड्रीम सीक्वेंस हैं. जिन्हें फिल्म का रूप देने में उस वक्त निश्चित तौर पर फाल्के को कठिनाईयों का सामना करना पड़ा होगा. कुछ दिनों पहले अपने पिताजी के साथ पुराने फिल्मी गीत देख रही थी. पिताजी ने कहा कि पहले के दौर में पेड़ पौधे बिल्कुल वास्तविक नजर आते थे. अब नजर नहीं आते. इस पर मेरे दोस्त जो कि एनिमेशन की दुनिया से जुड़े हैं. उन्होंने बताया कि इन दिनों फिल्मों के दृश्य में सही तरीके से बादल भी दर्शा पाना कठिन है. सारे पहाड़, बादल कृत्रिम ही तैयार किये जाते हैं. इसलिए वे वास्तविक नजर नहीं आते. जरा गौर करें कि कैसे उस दौर में बिना किसी इफेक्ट्स के फाल्के साहब ने अपनी बुद्धिमता से वैसे दृश्यों का निर्माण किया होगा. यह देखना वाकई दिलचस्प है. कालिया एक काला सांप है, जो हिंदु पौराणिक कथाओं के अनुसार यमुना नदी में रहता है. कल्पना कीजिए इसे कृत्रिम रूप से तैयार करना उस वक्त कितना कठिन रहा होगा. फाल्के ने कालिया मर्दान में ही अपनी बेटी को फिल्म में लांच भी किया. उस दौर में फिल्में आपसी सहयोग, और संसाधनों के इस्तेमाल जिसे कबाड़ से जुगाड़ कहा जाता है. उसी अंदाज में बनती थीं और वाकई उस दौर में लोग सिनेमा को जीते थे. चूंकि वे उसमें अपने प्राण फूंकते थे.

सुपरस्टार्स की जोड़ी


 सैफ अली खान ने अपने करियर के शुरुआती दिनों में अक्षय कुमार के साथ फिल्म मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी में काम किया था. फिल्म में वह फिल्म स्टार की भूमिका में थे और वे वास्तविक जिंदगी में कुछ ऐसा करना चाहते थे कि लोग उन्हें असल दुनिया में भी हीरो मानने लगे. शुरुआती दिनों अक्षय कुमार और अजय देवगन ने कुछ फिल्मों में साथ काम किया. सलमान खान और आमिर खान ने अंदाज अपना अपना में साथ काम किया, शाहरुख सलमान ने भी कुछ फिल्में कीं. ऋतिक रोशन और शाहरुख खान ने साथ में सफल फिल्म कभी खुशी कभी गम में साथ काम किया. आमिर और अजय ने साथ साथ इश्क में काम किया. शाहरुख और सैफ ने भी कल हो न हो में साथ काम किया. लेकिन आज ये जोड़ियां कभी भी किसी फिल्म में साथ नजर नहीं आयेंगी. चूंकि सभी ने सुपरस्टार का दर्जा हासिल कर लिया है. अब ये जोड़ियां बनना असंभव है. निर्देशकों की चाहत है कि वे दो सुपरस्टार को लेकर किसी एक फिल्म का निर्माण करें.लेकिन आज हर स्टार अपने ओहदे को पहचानते हैं और अपनी कीमत जानते हैं. सो, निर्देशकों के पास इन दिनों नये कलाकारों को चुनने के सिवा कोई और विकल्प है ही नहीं. खबर है कि वरुण धवन और शाहरुख रोहित शेट्ठी की फिल्म में साथ नजर आयेंगे. वरुण अपने करियर के शुरुआती दौर में हैं और उनके लिए शाहरुख के साथ काम करना किसी जैकपॉट से कम नहीं. ठीक उसी तरह जैसे ऋतिक ने अपने करियर के शुरुआती दौर में शाहरुख के साथ कभी खुशी कभी गम क़िया. लेकिन आज वह शाहरुख के समंतर खड़े हैं. इसमें उनकी मेहनत और लगन है. उन्होंने अपनी खास पहचान बनायी. वरुण धवन को भी यह निर्णय लेना होगा कि वह बरगद के पेड़ के नीचे रह कर छाव लेना चाहेंगे या अपना आकाश खुद बनायेंगे. 

रिश्तों का बनना बिगड़ना


कोरियोग्राफर गणेश आचार्य अपनी नयी फिल्म लेकर आ रहे हैं. हे ब्रो. इससे पहले भी गणेश ने स्वामी नामक फिल्म बनाई थी. हालांकि फिल्म कामयाब नहीं रही थी. लेकिन इस बार वे अलग तेवर में नजर आ रहे हैं. इंडस्ट्री में उन्होंने काफी वर्ष दिये हैं. सो, वे भी इस बार ताम झाम के साथ नजर आ रहे हैं. उन्होंने फिल्म में एक खास गीत फिल्माया है, जिसमें सुपरस्टार अक्षय कुमार, ऋतिक रोशन, अजय देवगन और अमिताभ बच्चन नजर आ रहे हैं. गणेश आचार्य आमतौर पर यह कहते नजर आते हैं कि गोविंदा उनके पसंदीदा कलाकारों में से एक हैं और करीबी दोस्तों में से एक. लेकिन इस वीडियो में गोविंदा कहीं भी नजर नहीं आ रहे. निश्चित तौर पर गणेश की यह इच्छा रही होगी कि गोविंदा वीडियो का हिस्सा बने. मुमकिन हो कि उन्होंने गोविंदा से बात की. लेकिन उन्होंने रजामंदी न दी हो. लेकिन यह भी मुमकिन है कि गोविंदा की इच्छा रही होगी. लेकिन गणेश उन्हें शेष कलाकारों की वजह से इस वीडियो का हिस्सा बना पाने में असमर्थ हों. चूंकि वर्तमान में वीडियो में जो स्टार्स नजर आ रहे. सभी सुपरस्टार हैं. और सभी स्टार्स एक दूसरे के साथ सामान्य इक्वेशन रखते हैं. अजय अक्षय में अच्छी दोस्ती है और अक्षय अजय अमिताभ के करीबी हैं. बॉलीवुड में यों भी एक ही रणनीति चलती है. जो बिकते हैं. वही दिखते हैं. किसी दौर में जब अमिताभ अपनी दूसरी पारी की शुरुआत कर चुके थे. वे कामयाबी हासिल नहीं कर पा रहे थे. उस वक्त गोविंदा ने ही अमिताभ को बड़े मिया छोटे मिया में काम करने के लिए प्रोत्साहित किया और फिल्मों में अमिताभ का समीकरण दोबारा इसी फिल्म की कामयाबी के बाद फिर से संभला. मगर वर्तमान में अमिताभ शीर्ष पर हैं. गोविंदा की दूसरी पारी खास कामयाब नहीं. सो, यहां रिश्तों का बनना बिगड़ना उनकी लोकप्रियता व सफलता पर ही आधारित है.