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20141203

दहेज प्रथा के खिलाफ मनोरंजक फिल्म

फिल्म : दावतएइश्क
कलाकार : आदित्य रॉय कपूर, परिणीति चोपड़ा, अनुपम खेर
निर्देशक : हबीब फैजल
रेटिंग : 3 स्टार

हबीब फैजल की फिल्मों की यह खासियत रही है कि वे अपनी फिल्मों के माध्यम सामाजिक कुरीतियों को मनोरंजक अंदाज में प्रस्तुत करते हैं. दावतएइश्क नाम सुन कर शायद आप इसे कोई फूडी फिल्म समझें. लेकिन दरअसल, यह दहेज प्रथा के खिलाफ एक मनोरंजक फिल्म है. निर्देशक ने फिल्म की शुरुआत में ही यह स्पष्ट कर दिया है कि दहेज प्रथा की वजह से किस तरह लड़कियों के परिवार को जिल्लत सहना पड़ता है. यह हकीकत है कि लड़की कितनी पढ़ी लिखी है. उसके पास कितनी डिग्री है. यह कोई नहीं देखता. उसके अपने क्या सपने है. यह भी जानने वाला कोई नहीं. लेकिन दहेज के नाम पर अपने बेटे की विलायती पढ़ाई का खर्च निकालने वाले दहेज प्रेमी परिवार आज भी हर गली कुचे में ही नहीं, बड़े बड़े रईस खानदान में भी मिल जायेंगे. घर में एक फ्रिज है. लेकिन एक और चाहिए. टीवी है तो एलडी क्यों नहीं. बेटा विलायत जाना चाहता है. भले लड़की के पिता ने लड़की को कितनी मेहनत से पढ़ाया हो. लेकिन कीमत तो सिर्फ लड़कों की पढ़ाई वालों की होती है. दावतएइश्क उन तमाम परिवारों के मुंह पर तमाचा है तो दहेज को बढ़ावा देते हैं. जो दहेज को सीधे तौर पर दहेज न कह कर मदद और शगुन के नाम पर लड़कियों के साथ अत्याचार करते हैं. दावतएइश्क की गुल अपने बेटे की लाड़ली बेटी है. उसने एमबीए किया है और उसकी इच्छा है कि वह शू डिजाइनिंग करें. लेकिन उसे पिता की चिंता है कि वह उसे व्याह दें. चूंकि वह भी बुजुर्ग हो चले हैं. जिंदगी भर ईमानदारी से जीने वाले क्लर्क पिता में काबिलियत वकील बनने की है. लेकिन कभी ईमानदारी का साथ न छोड़ पाने की वजह से वह वकील नहीं क्लर्क की ही जिंदगी जी रहे. उस क्लर्क पिता की तनख्वाह 30 हजार है. लेकिन वह बेटी की शादी के लिए 19 लाख रुपये भी खर्च करने को तैयार है. यह दर्शाता है कि किस तरह एक लड़की के पिता अपनी जिंदगी की पूरी कमाई लड़की के व्याह के लिए बचाते हैं. पिता अपनी बेटी से कहता है कि मैं चाहता हूं कि तेरी शादी कर दूं. लेकिन पता नहीं उतने पैसे कहां से आयेंगे. बेटी कहती है कि गुलाब जामून के साथ ही चटा दिया होता जन्म लेते ही. दरअसल, हकीकत यही है कि दहेज प्रथा ने ही भ्रूण हत्या को बढ़ावा दिया है. दहेज की लालच में सभी चाहते लड़का आये और लड़कियों को मार दिया जाता है. हबीब फैजल ने इस फिल्म के माध्यम से बिना किसी भाषणबाजी के एक सटीक और मनोरंजक अंदाज में इस कुरीति पर से परदा उठाया है. कि लगातार लड़के दहेज के लिए लड़की के परिवार को तंग करें तो ठीक़ लेकिन इस फिल्म में एक लड़की तय करती है कि वह दहेज के लिए बने कानून का इस्तेमाल करेगी और मजा चखायेगी. लेकिन इसी दौरान उसे एक सही हमसफर मिलता है. जिसे प्यार चाहिए, वह दहेज के लिए अपने परिवार को मना नहीं करता. लेकिन गुप्त तरीके से अपनी तरफ से लड़की वालों की मदद करता है. एक लड़की के लिए बात चौंका देने वाली होती है. चूंकि यह हकीकत है कि जितनी खबरें दहेज के लिए लड़कियों को जलाने ीक आती है. उस देश में ऐसे युवा भी हैं जो लड़की के परिवार की परेशानी समझें. फिल्म सीख देती है कि एक लड़की के अरमान को भी समझें. उसे पैसे न तौलें. उनके दिमाग का मोल समझें. उसे मूल्य में न तौलें. फिल्म में परिणीति और आदित्य दोनों ने ही बेहतरीन अभिनय किया है. अनुपम खेर फिल्म स्पेशल 26 के बाद एक बार फिर अलग और अपने कंफर्ट जोन से निकल कर बाहर आये हैं. इस तिकड़ी ने कमाल किया है. यशराज को मनोरंजन के माध्यम से एक महत्वपूर्ण सामाजिक उद्देश्य दर्शाने के लिए सराहा जाना चाहिए. आदित्य रॉय कपूर ने अपनी बाकी फिल्मों से अलग जोन में अभिनय किया है. हैदराबाद और लखनऊ केवल बैकड्रॉप का हिस्सा है. फिल्म का कंटेट उसका किंग हैं. हबीब ने दो दूनी चार, इशकजादे के बाद दावतएइश्क से साबित किया है कि वे सिर्फ सिनेमा को एंटरटेनमेंट का माध्यम नहीं समझ रहे. बल्कि उसका इस्तेमाल सामाजिक सोच के लिए भी कर रहे हैं.

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