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20130903

मिलिए एक्टर दिबांग से


पत्रकारिता जगत में दिबांग किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. वजह स्पष्ट है कि वे खुद कुशल पत्रकारिता और संवेदनशील पत्रकारिता के पर्याय हैं. टीवी जर्नलिज्म के नियमित दर्शक उनसे और उनकी शैली से बखूबी वाकिफ होंगे.लेकिन इस बार वह पहली बार पत्रकारिता से इतर एक नयी भूमिका में दर्शकों के सामने रूबरू हुए हैं. पहली बार वह शूजीत सरकार की फिल्म मद्रास कैफे में एक रॉ एजेंट की भूमिका में नजर आये हैं. फिल्म में उनकी भूमिका अहम है. दिबांग मानते हैं कि मद्रास कैफे हाल के दौर की बनी फिल्मों में एक अलग ट्रेंड सेट करेगी. 

 दिबांग, अभिनय में यह आपकी पहली शुरुआत है. तो कैसे जुड़ना हुआ फिल्म से. अचानकअभिनय की ओर रुझान कैसे?
वैसे मैं बता दूं कि मद्रास कैफे से पहले मैं इटैलियन फिल्म गंगोर ट्रेलर में भी भूमिका निभा चुका हूं. इस फिल्म को कई अंतरराष्टÑीय पुरस्कार से सम्मानित भी किया जा चुका है. साथ ही इसे क्रिटिकली बहुत सराहा गया है. मैं फिल्मों का हमेशा से शौकीन रहा हूं. वर्ल्ड सिनेमा की फिल्में मैं हमेशा देखता रहा हूं और मुझे फिल्में देखना पसंद है. शूजीत सरकार को मैं उस वक्त से जानता हूं. जब वह एनडीटीवी के लिए एक डॉक्यूमेंट्री लेकर आये थे. उन्होंने जो डॉक्यूमेंट्री बनाई थी. वह इस विषय पर थी कि बुजुर्गों को हम कैसे अनदेखा करते हैं और उन्होंने जिस तरह शॉट्स लिये थे फिल्म में. वह आपको इमोशनल करनेवाले थे. उस फिल्म से ही मुझे ये बात समझ आ गयी थी कि इस व्यक्ति के पास अलग विजन है. वह अपनी बातों को अलग तरीके से लोगों तक पहुंचाने का नजरिया रखता है.वही बात भा गयी थी. फिर विक्की डोनर को तो पूरी दुनिया ने सराहा. जब शूजीत ने मुझे मद्रास कैफे के बारे में बताया और मुझे किरदार आॅफर किया तो मुझे लगा कि हां, मुझे करना चाहिए.चूंकि हिंदी फिल्मों में ऐसी फिल्में बहुत कम बनती हैं. हाल के दौर में देखें तो जिस तरह मद्रास कैफे राजनीतिक हाल को प्रस्तुत कर रही है. अन्य फिल्में नहीं कर पातीं. नया ट्रेंड सेट कर रही है यह फिल्म यह मेरा मानना है. हिंदी सिनेमा को नया मोड़ देगी यह फिल्म

त्फिल्म में अपने किरदार के बारे में बताएं?
फिल्म में मेरा किरदार छोटा है. लेकिन काफी पॉवरफुल है. मैं रॉ एजेंट के किरदार में हूं. मेरे सारे दृश्य लगभग जॉन अब्राह्म के साथ ही हैं. मेरे हिस्से की पूरी शूटिंग बैंकॉक में हुई है. फिल्म श्रीलंका मुद्दे व एक महत्वपूर्ण घटना पर आधारित फिल्म है. शूजीत ने इस फिल्म में बहुत ही वास्तविकता से चीजों को दिखाने की कोशिश की है. न तो उन्होंने किसी तरह हाइप क्रियेट करने की कोशिश की है और न ही कोई विवाद जो है. ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया है. इतिहास को नाजुकता से चित्रित किया है फिल्म में. कई लोग होते हैं जो चिल्ला चिल्ला कर दिखाते हैं ऐसे विषय पर अपनी फिल्मों को. शूजीत ने वह नहीं किया है. सामान्य बातचीत के अंदाज में बनी है फिल्म. रैंबो रैंचो बनने की कोशिश नहीं की है निर्देशक ने.
  जॉन सुपरस्टार हैं. तो कैसा रहा आपका अनुभव उनके साथ काम करने का?क्या उनका स्टारडम कहीं हावी नजर आया?
बिल्कुल नहीं, बल्कि मैं तो कहूंगा कि इस फिल्म को देखने के बाद लोग जॉन को बॉडी वाला जॉन समझना भूल जायेंगे. बेहतरीन अनुभव रहा मेरे लिए. जॉन के साथ ऐसा फील ही नहीं हुआ कि वह सुपरस्टार हैं. वजह साफ थी कि फिल्म के निर्देशक शूजीत सरकार अपनी फिल्म और विषय को लेकर इतने क्लीयर हैं. इतने स्पष्ट हैं और उन्हें पता है कि उन्हें अपने किस किरदार से क्या चाहिए. वह निकाल लेते हैं.

  आप पत्रकारिता जगत में सुपरस्टार हैं. जाहिर सी बात है आप इस बात से भलिभांति वाकिफ होंगे कि फिल्मी दुनिया कैसी होती है? बावजूद इसके बतौर पत्रकार इसे देखने का नजरिया और बतौर एक्टर बन कर इस दुनिया को एक्सपीरियंस करना? कैसा रहा यह अनुभव.
यह सच है कि पत्रकारिता भी कम जोखिम भरा काम नहीं है. मैंने वैसे कई जगहों पर रिपोर्टिंग की है जो काफी मुश्किल काम थे. गुजरात, काठमांडू कई जगह रहे. और वाकई इसमें कई चैलेंजेज होते हैं. हम हर दिन फेस करते हैं. हां, लेकिन जहां तक शूटिंग की बात है तो मैं कहूंगा टीवी में शूट करना ज्यादा आसान है. लेकिन फिल्म में शूटिंग करना बहुत कठिन होता है. मैं बताना चाहूंगा कि फिल्म में एक सीन है. जहां हम गली में शूट कर रहे हैं. लंबी चौड़ी सड़क है. पूरी गली भरी हुई है.फिल्म के उस दृश्य में कितनी चीजों की सेटिंग थी. 7-8 लोग बांस लेकर जा रहे होते हैं. और मुझे एक संवाद बोलना था. और मैं भूल जाता हूं. फिर शूजीत जब कट कहते हैं तो दोबारा उस सीन के शूट होने में फिर से वह पूरी तैयारी होती है. दोबारा से सेटिंग होती है. उस दिन मुझे लगा कि फिल्म की शूटिंग करना ज्यादा कठिन है. बहुत मेहनत से एक शॉट पूरे किये जाते हैं.

आप फिल्मों से कैसे जुड़े. पहला सिनेमा कब देखा?
मैं शुरू से शौकीन तो रहा ही था. फिर दिल्ली आया तो फिर सिनेमा देखने का एक माहौल मिला. विदेशी फिल्में देखनी श्ुरू की. कोरिया और चीन, इटैलियन, फ्रेंच हर किस्म की फिल्में. हर देश की फिल्में देखी तो सिनेमा की समझ बढ़ीय देखा कि कल्चर किस तरह बदल रहा है और कल्चर क्या होता है. यह समझने के लिए सिनेमा एक बेहतरीन माध्यम है.
 इस फिल्म में अपने किरदार को निभाने के लिए किसी तरह के रेफरेंस या किसी से कोई मदद ली?
हां, आदिल हुसैन जो कि बेहतरीन कलाकार हैं, उन्होंने मेरी काफी मदद की. वे खास दोस्त हैं और पड़ोसी भी तो जब भी जरूरत होती मैं उनसे मदद मांगता. तो उन्होंने संवाद के थ्रो से लेकर किरदार की समझ को समझने में काफी मदद की. वे खुद भी इस फिल्म का हिस्सा हैं. तो मैं जब भी जरूरत महसूस करता. उनसे पूछता रहता था.दूसरी बात है शूजीत का खुद का होमवर्क ऐसा रहता है और वह अपने हर किरदार के साथ इतना काम करता है. हर किरदार के साथ एक एक करके वक्त देता है कि उसे जो चाहिए वह उसे मिल ही जाता है तो कहीं और रेफरेंस की जरूरत नहीं थी. हां, यह जरूर कहूंगा कि जिस मुद्दे पर फिल्म है. उससे भी पूरी तरह से वाकिफ हूं. पूरी जानकारी है तो किरदार को समझने में इससे भी मदद तो मिलती ही है. और जब निर्देशक को आप पर भरोसा हो तो आप नये हों, पुराने हो. या आपने पहली शुरुआत की हो. निर्देशक के भरोसे की वजह से वह काम निकल कर सामने आता है.
 फिल्म पत्रकारिता के आज मायने बदल चुके हैं. यह भी सच है कि अब फिल्मी पत्रकार भी फिल्मी प्रोमोशन का ही एक जरिया बन गये हैं. स्टार्स जब चाहते हैं, वे बात करते हैं. वरना, उन तक पहुंच मुश्किल है. इस संदर्भ पर आपका क्या नजरिया है? 
हां, बिल्कुल मैं आपकी बात से पूरी तरह से सहमत हूं कि आज फिल्म पत्रकारिता के मायने बदल चुके हैं. जरिया बन जाते हैं अब पत्रकार. हां, यह भी सच है कि मार्केटिंग का खेल है आज़. पूरी सिनेमा इंडस्ट्री पर यह खेल हावी है. कह सकते हैं कि जिस तरह शादी की तैयारियां चलती हैं. शादी का आयोजन होता है. फिल्म रिलीज का आयोजन भी वैसा ही होता है. सात फेरों की तरह स्टार्स भी हर जगह फेरे लगाते हैं. यह सब मार्केटिंग आर्ट है और सिनेमा की दुनिया में यह पूरी तरह से हावी है. दूसरी बात है आज 100 करोड़ का शोर है. यह मार्केटिंग आर्ट इसी कमाई के लिए है. दर्शकों को लुभाने के लिए है, यह जरूरी नहीं कि जो 100 करोड़ की फिल्म बनी है वह अच्छी फिल्म ही हो. लेकिन फिल्म हिट है क्योंकि दर्शक देख रहे हैं. भारत में अब भी दर्शक मिक्सड सोच के दर्शक हैं, जिन्हें बदलने में वक्त लगेगा, तब सिनेमा भी बदलेगा. 

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