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20130903

तब और अब

 हाल ही में मंटो द्वारा लिखी किताब मीना बाजार पढ़ी. इस किताब की खासियत यह है कि इसमें मंटो ने कुछ फिल्मी शख्सियत के साथ साथ फिल्मी दुनिया से जुड़े कई दिलचस्प किस्से सुनाये हंै. जैसे किस तरह पारो पारो देवी बनी. क्यों लड़कियां अशोक कुमार पर मर मिटने को तैयार थीं. क्यों नरगिस आ पहुंची थीं अपनी फैन से मिलने. क्यों मंटो की सालियां नरगिस को करती थीं फोन. पूरी किताब पढ़ने के बाद कुछ चीजें जो निकल कर सामने आयीं कि आज भी हिंदी सिनेमा में कई चीजें नहीं बदली हैं और कई चीजें तेजी से बदल गयी हैं. जैसे नरगिस जिस तरह केवल फोन पर अपने प्रशंसकों की आवाज सुन कर उनसे मिलने आ पहुंची थीं और फिर उन्हें अपने घर पर भी दावत दी थी. यह आज तो न ही संभव है. भले ही कई टेलीविजन शो इस बात का दावा कर लें कि वे स्टार्स को उनके फैन से मिलवाते हैं. लेकिन आज बनावटीपन हावी है. नरगिस जिस तरह मंटो की सालियों की मुरीद हो गयी थीं. सिर्फ एक मुलाकात मे. आज वह बिल्कुल संभव नहीं है. लेकिन जिस तरह पारो पारो देवी बनी. आज भी कई नायिकाओं की गाथा वैसी ही है. आज भी कई चालू चपेट फिल्म निर्देशन का दावा करते हैं. जबकि वे निर्देशन के न से भी वाकिफ नहीं है. इससे स्पष्ट होता है कि हिंदी सिनेमा में काम करने का तरीका भले ही आज भी वह है. लेकिन जज्बात अब वह नहीं रह गये. एक टेलीविजन ने स्टार्स और उनके फैन पर आधारित एक बेहतरीन शो बनाया. लेकिन शाहरुख खान के अलावा किसी भी स्टार्स ने पूरी ईमानदारी से उस शो में अपनी भूमिका नहीं दर्शायी. दरअसल, हकीकत यही है कि आज दिखावापन इस कदर हावी हो चुका है कि कोई स्टार्स अपने फैन से उस कदर मुखातिब नहीं होता. जिस तरह पहले हुआ करते थे. हालांकि दोष हमेशा मीडिया पर ही गढ़ा जाता है.

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