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20130903

क्या रीमेक के मेक का पूरा खेल?



रीमेक फिल्मों का दौर लगातार जारी है. विषयों की कमी नहीं. लेकिन फिर क्या वजह है कि लगातार पुरानी फिल्मों के रीमेक बनते हैं और आखिर ऐसी क्या मजबूरी होती है कि पुराने निर्माता आसानी से राइट्स बेच देते हैं. अचानक रिलायंस और यूटीवी मोशन जैसी तमाम कॉरपोरेट कंपनियां क्यों दिलचस्पी ले रही है रीमेक फिल्मों में. आखिर क्या है इस रीमेक का खेल . इसकी पूरी पड़ताल इस रिपोर्ट में
अनुप्रिया अनंत
सबहेड्स
प्रोडयूसर की चलती है मनमानी निर्देशक के हाथों में कुछ भी नहीं.
कभी आर्थिक मजबूरी तो कभी लालच की वजह से बेचते हैं राइट्स
अपने परिवार के सदस्यों को लांच करने के लिए निर्माता लेते हैं सहारा
रीमेक  और सीक्वल कहानी न ढूंढने का है हिट और आसान फार्मूला
आमतौर पर 30 लाख से 5 करोड़ रुपये तक में बिकते हैं राइट्स
कमर्शिायल फिल्मों की वजह से बनती हैं और क्रियेटिव एंगल से नहीं.

बॉक्स में :
आनेवाली फिल्में जिन फिल्मों के बेचे जा चुके हैं राइट्स
खूबसूरत, मासूम, शौकीन, चुपके चुपके, सत्ते पे सत्ता..

बॉलीवुड में रीमेक का सिलसिला जारी है. पुरानी फिल्मों के नये हिंदी रीमेक लगातार बनाये जा रहे हैं. पहले रिलीज हो चुकी हिट फिल्मों के नाम से सीक्वल बनाया जा रहा है. लेकिन प्रश्न यह उठता है कि न तो रीमेक फिल्मों की कहानी एक होती है और न ही उसे कलाकार. फिर क्यों धड़ल्ले से रीमेक फिल्मों का निर्माण हो रहा है. क्यों सिनेमा में निवेश करनेवाली बड़ी बड़ी कॉरपोरेट कंपनियां इसके राइट्स खरीदना चाहती हैं. वजह स्पष्ट है. रीमेक फिल्में कमर्शियल रूप से कॉरपोरेट कंपनियों को जरूरत से ज्यादा मुनाफा दिला रही है. वे मामूली सी रकम देकर फिल्मों के राइट्स पुराने निर्माताओं से खरीदते हैं और उन फिल्मों में मल्टी स्टारर कलाकारों को लेकर पुरानी कहानी में नया कलेवर डाल कर उन्हें परोसने की कोशिश करते हैं और वे इसमें कामयाब भी हो रहे हैं. हाल की रीमेक फिल्मों की सूची देखें तो केवल हिम्मतवाला का रीमेक ही सफल नहीं रहा. वरना चश्मेबद्दूर, डॉन, गोलमाल जैसी तमाम फिल्मों के रीमेक हिट रहे हैं. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि वे  सारी फिल्में जो आज भी प्रासंगिक हैं. दर्शक  अगर उन फिल्मों से कनेक्ट कर पाते हैं तो निश्चित तौर पर वे रीमेक फिल्में ंिहट होती हैं. यूटीवी मोशन पिक्चर्स जो कि लगातार रीमेक फिल्में बनाने में निवेश कर रहा हैं. उनकी एक रिसर्चर ने यह जानकारी दी है कि उनका रिसर्च बताता है कि आज भी पुराने दौर की ऐसी कई फिल्में हैं जो लोगों के जेहन में जिंदा हैं. और वे उन फिल्मों की चर्चा अपने नये जेनरेशन के साथ भी करते हैं. सो, नये जेनरेशन में भी उन फिल्मों को लेकर उत्सुकता होती है. रिसर्च बताता है कि जिन पुरानी फिल्मों को आॅन लाइन पर सबसे अधिक वोट मिलते हैं. लाइक्स मिलते हैं. कॉरपोरेट कंपनी उसमें निवेश करती है. चूंकि निवेशक को लगता है कि आॅन लाइन फिल्मों को हिट्स मिल रहे हैं तो जब वह फिल्म परदे पर आयेगी तो निश्चित तौर पर दर्शक मिलेंगे और कॉरपोरेट कंपनी को मुनाफा होगा. सो, वे मामूली सी रकम देकर ओरिजनल निर्माता से राइट्स खरीदते हैं और करोड़ों का मुनाफा कमाते हैं लेकिन इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आखिर ओरिजनल फिल्मों के निर्माता उन फिल्मों के राइट्स बेच क्यों देते हैं. वह भी ज्यादा नहीं बिल्कुल मामूली सी रकम में. क्या यह उनकी कोई आर्थिक मजबूरी होती है? या क्या फिर उन्हें अपनी फिल्मों को लेकर खास लगाव नहीं होता या फिर लालच की वजह से वे ऐसा करते हैं. ऐसे कई निर्माताओं से पूछने पर हमें जवाब मिले. हमारी मर्जी हम फिल्मों के साथ कुछ भी करें.दूसरी बड़ी वजह यह है कि पहले जो फिल्में बनती थीं. वे होम प्रोडक् शन होती थीं.  लोग एकल प्रोडयूसर होते थे. लेकिन अब वह दौर पूरी तरह समाप्त हो चुका है. अब किसी भी फिल्म को प्रोडयूस करने के लिए बड़े कॉरपोरेट हाउस का सहारा लेना ही पड़ता है. एक बड़ी वजह यह भी है, जो निर्माताओं को फिल्में बेचने पर मजबूर करती हैं, वह है उनकी आर्थिक स्थिति. अपने जमाने के जाने माने निर्माता ने नाम न प्रकाशित करने के शर्त पर कई बातें शेयर कीं. उन्होंने बताया कि उनका प्रोडक् शन हाउस कई सालों से बंद पड़ा था. उन्होंने जितनी भी फिल्में बनाई थीं. उनमें से उन्हें दो बड़ी फिल्मों में भारी नुकसान उठाना पड़ा. उन पर काफी लोन भी था. सो, उनके पास जब एक कॉरपोरेट हाउस की तरफ से यह आॅफर आया तो उन्होंने अपनी चर्चित फिल्म के राइट्स बेंच दिये. और अपना ऋण चुकाया. वजह साफ है कि कई निर्माता मजबूरन अपने राइट्स बेच देते हैं. फिल्म मासूम की निर्माता चंदा दत्त -देवी दत्त जिन्होंने हाल ही में फिल्म के राइट्स हिमेश को बेचे हैं. उनका साफ कहना है कि यह उनकी प्रोपर्टी है. वे इसका इस्तेमाल किसी तरह भी कर सकते हैं. लेकिन इस रीमेक के फेर में सबसे ज्यादा कोई आहत होता है और किसी के साथ अन्याय होता है तो वह निर्देशक़ . चूंकि राइट्स बेचते वक्त निर्देशक की राय नहीं ली जाती. हाल ही में फिल्म चश्मे बददूर की निर्देशिका साय पापनैजी ने आक्रोश जताया था. बासु चटर्जी फिल्म शौकीन के रीमेक से नाराज हैं. मासूम के रीमेक से शेखर कपूर को भी तकलीफ है. साय पापनैजी इस बारे में स्पष्ट कहती हैं कि ये नये निर्माताओं और कंपनियों का ढोंग का खेल है. वे केवल मुनाफे की सोचते हैं, कमर्शियली. क्रियेटिव एंगल से बनती नहीं रीमेक फिल्में. वे पुरानी क्लासिक फिल्मों को अपनी मन मर्जी से प्रस्तुत करते हैं और जिन फिल्मों को हमने ब्रांड बनाने की कोशिश की और हमने ब्रांड बनाया वह उसे अपने मनमाने ढंग से इस्तेमाल करते हैं. जो नाइंसाफी है. लेकिन वर्तमान में यही ट्रेंड है. कॉरपोरेट वर्ल्ड हावी है. बासु चटर्जी भी इस पर तीखी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कहते हैं कि हॉलीवुड की नकल से रीमेक और सीक्वल आया है भारत में. सब अपनी जेब भर रहे हैं. लेकिन मारे जा रहे हैं हम निर्देशक़ . हमारी सोच हमारे विजन पर कोई और पैसे कमा रहा है. हम कुछ कर भी नहीं पाते. पुराने निर्माताओं को ही इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए.  बासु चटर्जी अमिताभ बच्चन का जिक्र करते हुए कहते हैं कि मुझे खुशी है कि अमिताभ ने एक फिल्म आग के बुरे हश्र के बाद ही रीमेक फिल्मों से तौबा किया. बाकी बड़े स्टार भी करेंगे तो यह सिलसिला रुकेगा. लेकिन ऐसा हो नहीं रहा. श्याम बेनगल का कहना है कि नयी कहानी सोचों. नये तरीके से काम करो. ऐसे भी पुरानी फिल्म का आप सिर्फ नाम इस्तेमाल करते हो रीमेक में.
परिवारवाद में रीमेक
रीमेक फिल्में बनाने की एक बड़ी वजह परिवारवाद भी है. कई निर्माता व निर्देशक की नयी पीढ़ी फिल्मों में आना चाहती है लेकिन उनके बड़ा मौका नहीं मिल पा रहा. तो वे अपनी ही फिल्म के रीमेक के साथ आगे बढ़ते हंै. प्रकाश मेहरा की जंजीर उनमें से एक है. प्रकाश मेहरा चूंकि फिल्म के निर्माता निर्देशक थे. इसलिए उनके बेटे नयी जंजीर का रीमेक बनाने के राइट्स रखते थे.
 कोटेशन : दिबाकर बनर्जी
हाल के दिनों में जिसे रीमेक का नाम दिया जा रहा है या जो फिल्में इन दिनों बॉलीवुड में सीक्वल कहला रही हैं. दरअसल वह प्रोडयूसर का सीक्वल है. प्रोडयूसर केवल अपने मुनाफे के लिए पुरानी फिल्मों के नाम का इस्तेमाल करता है. फिर उस नाम पर जो पहले से ब्रांड बन चुका है. उससे वह मुनाफा कमा सकें. चूंकि पहले से दिया गया नाम तो दर्शकों में पहले से लोकप्रिय है. सो उससे तो लोग जुड़ेंगे ही. लेकिन यह फंडा सिर्फ इसलिए अपनाया जा रहा है कि बॉक्स आॅफिस पर सफलता मिले

कोटेशन : करन जौहर
अगर लोगों का यह मानना है कि हम रीमेक फिल्में केवल हिट रह चुकी हिट फिल्मों का बनाते हैं तो अग्निपथ तो मेरे पिताजी की सबसे बड़ी फ्लॉप फिल्म थी. फिल्म बाद में कल्ट बनी. मैंने अपने पिता की फिल्म अग्निपथ का रीमेक बनाया चूंकि करन मेरे पास जो नयी अग्निपथ की कहानी लेकर आये थे. उन्होंने उसके साथ न्याय किया था. मुझे लगा कि वह इस कहानी को बखूबी दर्शकों तक पहुंचा पायेंगे और उन्होंने वैसा किया भी. दर्शक उस वक्त फिल्म को समझ नहीं पाये थे. लेकिन अब वह इसे समझ पाये. यानी प्रासंगिक विषय था अग्निपथ. इसलिए हुआ कामयाब.
बॉक्स में
 सलीम-जावेद जंजीर विवाद
सलीम जावेद ने जंजीर के  वक्त ही फिल्म के हिंदी रीमेक के अलावा किसी भी भाषा में बनाने के राइट्स अपने पास सुरक्षित रखे थे. अभी हाल हे में जंजीर को लेकर सलीम जावेद ने फिल्म को कोर्ट में घसीटा. उन्होंने स्पष्ट कहा कि कानूनन जंजीर के निर्माताओं को फिल्म बनाने से पहले उन्हें 3 करोड़ रुपये देने चाहिए, चूंकि जंजीर का तेलुगू संस्करण भी बन रहा है. लेकिन जंजीर के मेकर्स ने जब यह नहीं माना तो  उन्होंने कानून का सहारा लिया. उन्होंने लिखित रूप से प्रूफ दिखा दिये कि उनके पास फिल्म के साउथ रीमेक बनने के राइट्स मौजूद हैं. और नियमत:उन्हें 3 करोड़ देना ही होगा. इस मामले में सलीम जावेद ने कहा है कि इससे पहले  उन्होंने डॉन और यादों की बारात के साउथ इंडियन रीमेक बनने के राइटच्स बेचे हैं. अब भी इस विवाद का पूरा हल नहीं निकला.

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