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20130930

टीवी बनाम फिल्म


एक जानी मानी चर्चित कॉस्टयूम डिजाइनर से हाल ही में मुलाकात हुई. उन्होंने अपनी बातचीत में बताया कि फिल्मो ं में जब अभिनेत्री के लुक की बात आती है और उन्हें कोई ऐसा किरदार निभाना होता है, जिसमें उन्हें सामान्य दिखना है तो वे अभिनेत्रियां सस्ते कपड़े पहने के लिए भी तैयार हो जाती हैं. लेकिन टीवी में अभिनेत्रियां अपने लुक से अधिक कपड़े को महत्व देती हैं. जैसे सोनाक्षी सिन्हा ने फिल्म लुटेरा में जिस तरह के कपड़े पहने हैं उन्हें फिल्म के मुताबिक सामान्य सा दिखना है तो उन्होंने महंगे कपड़े नहीं पहने. लेकिन टेलीविजन में अभिनेत्रियां कपड़ों को लेकर नखरे दिखाती हैं. एक अवधारणा तो यहां बदली कि फिल्मों की अभिनेत्रियां केवल कॉस्टयूम को महत्व देती हैं. किरदार को नहीं. हाल ही में खबर आयी थी कि अर्जुन रामपाल ने अपने फिल्म डी डे में अपने लुक को बिल्कुल वास्तविक दिखाने के लिए अंधेरी के स्ट्रीट के कपड़े पहने थे. विद्या बालन ने भी मुंबई के स्ट्रीट बाजार से फिल्म द डर्टी पिक्चर्स के लिए शॉपिंग की थी. लेकिन अब भी टीवी में इन बातों को कम अहमियत दिया जाता है. स्पष्ट है कि अब भी जिस तरह फिल्मों को रियलिस्टिक अप्रोच देने की कोशिश की जा रही है. धारावाहिक में वह मुकाम नहीं आ पा रहा. खुद सुशांत मानते हैं कि टीवी में सीखने के कम विकल्प हैं, क्योंकि टीवी की सीमाएं हैं. टीवी पुराने ढर्रे और बने बनाये फार्मूले पर ही चलने की कोशिश करता है. दरअसल, हकीकत यही है और यही वजह है कि ऐसे कई धारावाहिक उसी ढर्रे पर चले आ रहे हैं. अब कामयाबी का स्तर खो चुके हैं. लेकिन जबरन वे केवल मुनाफे के लिए शो चला रहे हैं. निस्संदेह कुछ धारावाहिकों में प्रयोग शुरू हुए हैं. लेकिन अब भी सिनेमा से अधिक छोटा परदा ड्रामा को ही प्रमुखता देता है. शायद लंबे समय तक टिक पाने की उनकी यही यूएसपी है. 

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