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20130903

आमिर खान


 मेरा मानना है कि बच्चों पर तो फिल्में ही कम बनती हैं और जो फिल्में बनती हैं वह सही तरीके से प्रोमोट ही नहीं हो पा रही हैं. तो फिर बच्चों के पास फिल्में देखने के विकल्प कम हो जाते हैं. वे बड़ों की फिल्में अधिक देखते हैं. हालांकि मैं यह नहीं कहूंगा कि बच्चों को बिगाड़ने में फिल्म या टीवी का हाथ है. टीवी की दुनिया में कई अच्छी चीजें भी हुई हैं. आप देखें. हमने सत्यमेव जयते जैसे शो बनाये. उसमें हमने गंभीर मुद्दे उठाये. एक पूरे एपिसोड में हमने बच्चों के लिए वर्कशॉप किया. ताकि बच्चे अपने आप को सेक्सुअल एब्यूज से बचा सकें. मुझे लगता है कि अगर बच्चे इसे देखते ही नहीं तो फिर कैसे समझ पाते कि उन्हें ऐसी परिस्थिति में क्या करना है क्या नहीं. हां, यह बात स्पष्ट है कि हमें बच्चों के लिए किसी भी तरह के कार्यक्रम का निर्माण करते वक्त इस बात का ख्याल रखना होगा कि वह बच्चों को किसी तरह से नुकसान न पहुंचाये. साथ ही जहां तक बात है प्रभाव की तो ऐसे कई चैनल है जो बच्चों को ज्ञानवर्धक चीजें देते हैं और मेरा मानना है कि उन चीजों क ो तो देखना ही चाहिए, उससे अच्छा प्रभाव और माध्यम क्या होगा कि आप उन चीजों को घर बैठे बैठे सीख पा रहे हो. उससे बच्चे इनहांस ही होते हैं. मैं तो कई बार बच्चों से ही सीखता हूं. वे जितने अवेयर हैं. मुझे नहीं लगता कि मैं हूं. वे जितना गैजेट्स के बारे में जानते हैं. तकनीक के बारे में जानते हैं. मैं जब तारें जमीन पर का निर्माण कर रहा था. उस वक्त मैंने काफी रिसर्च किया था और वैसे बच्चों से जाकर मिला भी था. बाद में जब मेरी फिल्म पूरी हुई तो कितने पेरेंट्स ने मुझसे आकर कहा कि हम अपने बच्चों को वक्त नहीं देते थे. समझ नहीं पाते थे. अब समझ पाते हैं. आपकी फिल्म की वजह से. तो खुशी होती है कि आपकी फिल्म समाज में कुछ सकारात्मक प्रभाव डाल पा रही है. तो यह तो सकारात्मक पहलू है किसी सिनेमा का. कितने लोगों को फिल्म के बाद जानकारी मिली कि आखिर डायलेक्सिया जैसी बीमारी के बारे में पता चल पाया. कई पेरेंट्स ऐसे थे. जिनके बच्चों को यह बीमारी थी. लेकिन वह उस पर ध्यान नहीं देते, ऐसे पेरेंट्स को आईना दिखाती है यह फिल्म. तो मेरा मानना है कि बच्चों के लिए जब कोई धारावाहिक बने या फिर सिनेमा तो उस पर रिसर्च हो और हर आयाम को सोच कर प्रस्तुत किया जाये. मेरा मानना है कि सिनेमा और टीवी बेहतरीन माध्यम है. और इसका विस्तार होना चाहिए, लेकिन पेरेंट्स के हाथों में है ये कि वह किस तरह बच्चों तक अच्छी चीजों को पहुंचाये. किस तरह बच्चों को हीरोइक बनने से रोकें. किस तरह बच्चों को कनविंस करें कि जो टीवी में दिखाया जा रहा है. वह दूसरी दुनिया है. वैसा आप न करें. यह जिम्मेदारी पेरेंट्स की हो जाती है. मुझे लगता है कि भारत में बच्चों के कई विषय हैं. जिन पर फिल्में बननी चाहिए, अगर बच्चों पर फिल्में बनेगी तो निश्चित तौर पर इसक ेसकारात्मक प्रभाव होंगे. मैं जोकोमोन जैसी फिल्मों को भी सराहना करता हूं. उसमें जिस तरह तकनीक को दिखाया गया है. उसको देख कर बच्चे नयी चीजें नयी तकनीकों को देख पाते हैं. उन्हें सीख पाते हैं. बच्चों के लिए हर तरह की फिल्में बननीू चाहिए. कॉमेडी फिल्में भी बने. सीरियस और संवेदनशील फिल्में भी बने. दूसरी तरफ पेरेंट्स को यह समझना होगा कि वे फिल्मों या टीवी को ब्लेम न करें कि वह बच्चों को बिगाड़ रही है. इसे एक माध्यम समझे. और इससे बेहतर और कहूं तो इसे टयूटर समझें. बस आप अपनी जवाबदेही रखें कि किस तरह की चीजें उन्हें देखनी दिखानी है. और क्या नहीं दिखाना है. 

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