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20130903

समाज सुधारक नहीं फिल्ममेकर हूं : प्रकाश झा



उनकी फिल्मों की रिलीज से पहले ही विवादों का सिलसिला जुड़ जाता है. लेकिन उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता. वे स्पष्ट तौर पर कहते हैं कि उनकी फिल्में समाजसुधारक नहीं हैं. वे केवल विषय लेकर चलते हैं और उनकी कोशिश होती है कि वे अपना नजरिया पेश कर पायें. बात हो रही है प्रकाश झा की. जल्द ही उनकी फिल्म सत्याग्रह रिलीज होनेवाली है.  अनुप्रिया अनंत  से हुई बातचीत के मुख्य अंश
आपके लिए सत्याग्रह के क्या मायने क्या हैं?
वास्तविक जिंदगी में तो सत्याग्रह का मतलब मैं यही मानता हूं कि सत्य के लिए आंदोलन.लेकिन जहां तक मेरी फिल्म की बात है. मेरी फिल्म में सत्याग्रह शब्द है, क्योंकि सत्याग्रह की पृष्ठभूमि है. और उस पृष्ठभूमि में एक कहानी मैंने लिखी है. बाप और एक बेटे की. एक बाप एक स्कूल का रिटायर्ड प्रिंसिपल है.उसके अपने मान्यताएं हैं मूल्य है. विश्वास है. और उसका प्रतिबिंब वह अपने बेटे में देखता है. लेकिन वह अपना बेटा खो बैठता है. और दूसरा यंग आदमी है. लेकिन उसके पास उसका पिता नहीं है. इस प्रिंसिपल का बेटा उसका दोस्त है. अब प्रिंसिपल का बेटा नहीं है और एक दूसरा जो व्यक्ति है उसके पिता नहीं है. तो दोनों का टकराव होता है.और उस टकराव में. इस पृष्ठभूमि में सोशल प्रोटेस्ट है और वही सत्याग्रह का रूप लेती है.
त्रआपके फिल्मों के किरदार अलग होते हैं तो उन्हें चुनते वक्त व विषय चुनते वक्त आपके जेहन में क्या बातें रहती हैं?
मैं कहानी लिखते वक्त व किरदारों को चुनते वक्त बस यही ध्यान रखता हूं कि वे किरदार, वे कैरेक्टर मेरी फिल्म की कहानी से मेल खायें.और जब मैं कैरेक्टर पर काम कर रहा होता हूं तभी मेरे जेहन में कुछ एसे एक्टर्स आ जाते हैं जो उस कैरेक्टर में मुझे नजर आने लगते हैं. और फिर जब मैं वह कहानी कलाकारों को सुनाता हूं तो वे भी महसूस करने लगते हैं कि वे उन किरदारों में फिट बैठते हैं और फिर हमारा काम आगे बढ़ जाता है.
त्र पिछले काफी समय से आपकी फिल्मों में मल्टी स्टार कलाकार रहते हैं? और आप लगातार कई कलाकारों को अपनी फिल्मों में दोहराते भी हैं. कोई खास वजह?
मैं निर्देशक हूं और जब मेरी फिल्म में काम करने के लिए कोई कलाकार तैयार हो जाते हैं तो फिर वह स्टार नहीं होते. मेरे लिए वह कलाकार ही होते हैं. मेरी फिल्मों के विषय, फिल्म का ट्रीटमेंट ऐसा होता है, जिसके लिए मुझे कई कलाकारों की जरूरत होती है. साथ ही मेरी फिल्म काफी महंगी बजट वाली भी होती है तो ऐसे में आपको बड़े स्टार कास्ट की तो जरूरत होती ही है. आपने अगर फिल्म सत्याग्रह का प्रोमो देखा होगा तो आपको यह अनुमान हो जायेगा कि मेरी कहानी की जरूरत है बिग कैरेक्टर. हां, लेकिन अगर मैं फिर से दामुल जैसी फिल्में बनाऊंगा तो निश्चित तौर पर मुझे बड़े स्टार कास्ट की जरूरत नहीं होगी. जहां तक बात है फिल्मों में कलाकारों को रिपीट करने की तो उसकी वजह यही है कि मुझे अपनी फिल्मों में जिस तरह के किरदारों की जरूरत होती है. वे सभी कलाकार उसमें फिट बैठते हैं. जिन्हें भी रिपीट करता हूं वे दरअसल, अच्छे कलाकार हैं. मनोज बाजपेयी हों या अर्जुन रामपाल. सभी बेहतरीन एक्टर्स हैं.
त्र तो फिर क्यों नहीं आप इन दिनों दामुल जैसी फिल्में बनाते हैं?
ऐसा नहीं है कि मुझे वैसे विषयों पर फिल्में बनाने से परहेज है. लेकिन कुछ सालों में. बन जायेंगी. जरूर बनेंगी.
त्रआपकी फिल्म मेकिंग की शैली का एक खास हिस्सा है भीड़. आपकी फिल्मों में भीड़ को काफी खूबसूरती से दर्शाया जाता है?
बहुत मेहनत करते हैं हम सब पर. मेरी फिल्म में भीड़ भीड़ का हिस्सा नहीं, बल्कि वे फिल्म में एक्टर्स की तरह ही ट्रीट किये जाते हैं. भीड़ में स्थित सभी लोगों को हम यूं ही नहीं खड़ा कर देते. बल्कि उन्हें पूरी कहानी बताते हैं. उन्हें सीन के आगे क्या है और सीन के पीछे क्या है, इसकी पूरी जानकारी होती है. मेरे कास्टिंग पीपल सभी उनके साथ वर्कशॉप करते हैं. राजनीति में हमने 7 से 8 हजार लोगों को दिखाया है. और इस बार सत्याग्रह में हमने लगभग 4 महीने तक वर्कशॉप किया है. लगभग हर दिन सत्याग्रह में 2 से 2.5 हजार लोग सेट पर होते थे और वे ट्रेंड होते थे. मेरी कोशिश यही होती है कि मेरी फिल्म में जो भीड़ दिखे. वह फिल्म का हिस्सा लगे. मैं चाहता हूं कि मेरी भीड़ के लोग भी समझें कि कहानी जो कहना चाहता हूं. वह उनके सहयोग के बिना मुमकिन नहीं.
त्रआपकी फिल्मों के शीर्षक एक शब्द के होते हैं. तो कितना मुश्किल होता है अपनी पूरी कहानी को एक शब्द के शीर्षक में कहना. 
ऐसा कुछ भी इंटेसनली नहीं करता. लेकिन मैं मानता हूं कि अपने विजन में क्लीयर हूं तो एक शब्द ही क्लिक कर जायेगा मेरा. यह मेरा बॉडी आॅफ वर्क हो चुका है. और मेरे लिए मेरे फिल्मों का एक शब्द सिर्फ शब्द नहीं है, बल्कि वे मेरे लिए जर्नी है. दामुल, चक्रव्यूह,सत्याग्रह, राजनीति, आरक्षण. ये फिल्में जर्नी हैं मेरे लिए.
त्र आपके फिल्मों के इश्यू समाज से जुड़े होते हैं और ज्वलंत होते हैं. तो कैसे निर्धारित करते हैं आप विषय और फिर विषय के साथ बतौर फिल्म मेकर किस तरह सामांजस्य बिठा पाते हैं.
सबसे पहले मैं यह बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि मैं समाज सुधारक नहीं हूं. मेरी फिल्मों के इश्यू तो बैकग्राउंड में रहते हैं.इश्यू के लिए अगर आप लड़ना शुरू करेंगे और बात करने की कोशिश करेंगे न तो कोई नहीं देखने आयेगा पिक्चर.मेरा मानना है कि स्टोरी हमेशा पर्सनल होनी चाहिए.तो मैं कुछ समाज और समाज सुधारक के दृष्टिकोण से फिल्मों का चुनाव नहीं करता.
त्र पहले चर्चा थी कि आपकी यह फिल्म अन्ना हजारे की जिंदगी व उनके आंदोलन पर आधारित है. लेकिन बाद में आपने इसे पूरी तरह से खारिज कर दिया?
लोगों को ऐसा लगता है कि अमिताभ बच्चन कर रहे हैं तो अन्ना हजारे का रोल होगा. लेकिन मेरी कहानी तो बाप बेटे पर है तो क्या रियल लाइफ में अन्ना हजारे बाप बेटा हैं क्या. ये लोग जोड़ रहे हैं. दूर दूर तक उनके आंदोलन से कोई लेना देना नहीं. राजनीति के समय सोनिया की बात हुई थी. मैंने अजय देवगन से इस फिल्म की कहानी के बारे में आज से तीन साल पहले ही बात कर ली थी. उसे कहानी पसंद आयी थी और उसने कहा कि तुम आगे बढ़ाओ कहानी. करेंगे साथ काम. उस वक्त तो कोई आंदोलन नहीं था.
मेरी फिल्मों के साथ विवादों का सिलसिला रहा है और मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.
त्रभोपाल से आपको प्यार हो गया है? कोई खास वजह?
वह शहर फिल्म र्फ्रेंडली हैं. वहां फिल्मों की शूटिंग में कोई दिक्कत नहीं होती. सभी लोग आते हैं. बैठ कर शांति से देखते हैं वे लोग़ . वहां के लोग बहुत मृदु भाषी हैं. मैं तो भोपाल का क्रेजी फैन हो गया हूं. वहां सारी चीजें आसानी से बिना किसी परेशानी के मिलती हैं. आगे भी मैं वहां अपनी फिल्मों की शूटिंग करता रहूंगा. 

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