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20140425

इस जमाने में आदर सत्कार

 सलमान खान ने हाल ही में अपनी नाराजगी जतायी. वे सुभाष घई के साथ उनके फिल्मी इंस्टीटयूट में गये थे. वहां के छात्रों ने न तो सुभाष घई को देखने के बाद उनका अभिनंदन किया और न ही सत्कार. इस बात से सलमान को दुख हुआ. उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज भी सुभाष घई के आने पर खड़े हो जाते हैं. दरअसल, हकीकत यही है कि हम अब आदर सत्कार को भी आउटडेटेड चीजें मानने लगे हैं. बड़े बुजुर्गों के पैर छूना अब लोग हाइजिनिंग नहीं मानते. हर गुरुवार मैं थियेटर में फिल्मों के प्रेस शो के लिए जाती हूं. वहां कई बुजुर्ग फिल्म क्रिटिक आते हैं. कई फिल्म क्रिटिक खुद इस अहंकार में होते हैं कि वे सीनियर हैं. लेकिन कुछ वाकई सरलता से बात करते हैं. लेकिन आमतौर पर यही देखा है कि हम नये जेनरेशन के जर्नलिस्ट कभी उन बुजुर्गों को बैठने की जगह नहीं देते. कपिल शर्मा अपने शो में अपने मेहमान को सर कह कर संबोधित करते हैं. अन्य रियलिटी शोज में भी जज की भूमिका निभा रहे लोगों को सभी सर ही कहते हैं और उनको वह सम्मान देते हैं. तो फिर हकीकत में हम जिनसे ज्ञान ले रहे. उन्हें आदर देने में क्यों हिचकिचाते हैं. फिल्मी दुनिया में तहजीब की कभी काफी कद्र थी. हम भट्ट साहब और जावेद साब कह कर ही बुलाते हैं. दिलीप कुमार को हम दिलीप साहब कह कर ही संबोधित करते हैं. पुराने जमाने में सभी कलाकार एक दूसरे को आप कह ही संबोधित करते थे. इससे स्पष्ट होता है कि आदर सम्मान और सत्कार भी अब पुराने जमाने की बात हो गयी है. नया जेनेरेशन किसी के सामने झूकने में यकीन नहीं रखता. यह सही भी है कि आप अपने गुरु को अपना दोस्त माने. लेकिन सम्मान में झूक जाना, कोई हार नहीं. विद्या बालन आज भी बुजुर्ग कलाकारों को पैर छूकर प्रणाम करती हैं. उन्हें इसमें कोई हिचक नहीं होती.

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