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20150630

अवार्ड समारोह की फिल्में



 इन दिनों सोशल मीडिया पर एक बेहतरीन वीडियो वायरल हो रहा है. इस वीडियो का मकसद उन फिल्मकारों तक अपनी बात पहुंचाना है, जो किसी गली, मोहल्ले व चॉल में जाकर सिर्फ अपनी फिल्मी जरूरतों को पूरा करने के लिए वहां के लोगों व बच्चों से बड़े बड़े वायदे करते हैं. इस वीडियो में उन बच्चों की बातें दिखाई जा रही हैं, जो बता रहे हैं कि जब किसी फिल्म में उनके वीडियो दिखाये जाने होते हैं तो उन्हें किस तरह सारी सुख सुविधाएं मिलती हैं. किस तरह कोई एनजीओ आकर अपनी फिल्मी जरूरत को पूरा करने के लिए उन्हें लुभाते हैं. लेकिन फिल्म बन जाने के बाद उन्हें उस परिवार से, या वहां के लोगों से कुछ मतलब नहीं होता. इस वीडियो में एक बच्ची बोलती है कि समर सीजन, विंटर सीजन, रेनी सीजन के अलावा एक अवार्ड सीजन होता है. जब कई फिल्मकार कैमरे लेकर इन गलियों की खाक छानते हैं. और फिर उन फिल्मों को बड़े बड़े फिल्मोत्सव में बड़े अवार्ड मिलते हैं. लेकिन इसका श्रेय कहीं से भी उन गलियों के लोगों को नहीं जाता. इसी वीडियो में एक लड़का बताता है कि किस तरह उसे फिल्म की जरूरत को पूरा करने के लिए अंगरेजी के कई शब्द सिखाये गये. लेकिन जब वह बच्चा वाकई अंगरेजी सीखने के लिए प्रेरित हुआ. वे लोग वहां से चले गये. स्पष्ट है कि डॉक्यूमेंट्री और इन फिल्मी दुनिया का भी यह कड़वा सच है कि यहां सिर्फ फिल्मकार फिल्मी महोत्सव को जितने व अपनी वाहवाही के लिए ऐसी जमीनी स्तर की फिल्में बनाते हैं. लेकिन वे खुद इससे वास्ता नहीं रखते. किसी दौर में सुनील दत्त ने मदर इंडिया फिल्म की शूटिंग जहां हुई थी. वहां के गांव को ही गोद ले लिया था. सलमान भी शूटिंग करते हुए अगर उस जगह की परेशानी देखते हंै तो वे ठोस कदम उठाते हैं. लेकिन ये अपवाद हैं. भीड़ तो सिर्फ मतलबी फिल्म मेकर्स की है.


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