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20150630

घर , मकान व यादें


हाल ही में संगीतकार प्रीतम से बातचीत हुई. उन्होेंने बताया कि जिस वक्त उन्होंने मुंबई में पहला मकान खरीदा था. वह एक कमरे का मकान था और वे अपनी मां के साथ उसे खरीदने गये थे. हुआ यों था कि उन्होंने घर ले तो लिया था. लेकिन उस दौरान उनके पास उतने काम नहीं थे.सो, उनके चेक बाउंस हो जा रहे थे. इत्तेफाकन मुंबई में आमतौर पर लोगों को अच्छे बिल्डर मिल जाना किसी भगवान के मिल जाना माना जाता है. प्रीतम भी उन चुनिंदा भाग्यशाली लोगों में से एक रहे. उनके बिल्डर ने उन्हें कहा कि जैसे जैसे उन्हें पैसे मिलते जायें वे चुकाते जायें. यही वजह है कि प्रीतम ने आज भले ही कितने भी मकान मुंबई में क्यों न ले लिये हों. उनका पहला घर आज भी उन्हें प्रिय है और वे उसे खोना नहीं चाहते. वे उस घर को अपनी मां का घर मानते हैं. प्रीतम स्वीकारते हैं कि वे उन संवेदनशील लोगों में से हैं जो जिन चीजों से लगाव कर लेते. उससे वह खुद को अलग नहीं कर पाते. फिर वह कोई सामान हो या कोई व्यक्ति. राजेश खन्ना की बेटियों ने अपने पिताजी की धरोहर एक बड़े घराने के व्यक्ति को बेच दिया था. दुखद बात यह है कि अब वह व्यक्ति उस मकान को तुड़वा कर वहां नयी इमारत खड़ी करने जा रहा है. यानी राजेश खन्ना जैसे सुपरस्टार की आखिरी धरोहर अब अस्तित्व में नहीं रहेगी. आश्चर्यजनक बात है कि उनकी बेटियों को पिता के इस स्थान से लगाव न रहा. वे इसे संजोने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहीं. और अब तो उनका मालिकाना हक भी खत्म है. दरअसल, हकीकत यह है कि मकान व्यक्ति और उनकी यादों से ही बनता है. अगर घर में हसीन यादें होती हैं. तभी आप उस मकान को घर कहते हैं और उससे लगाव होता है. वरना, चहारदीवारी के पीछे के हकीकत से रूबरू होना मुमकिन नहीं. शायद यही वजह है कि कुछ इसे संजोने तो कुछ इसे मिटाने में यकीन रखते

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