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20151126

सिनेमा बदल सकती है सोच : नितिन चंद्रा


नितिन चंद्रा अपनी पहली हिंदी फिल्म लेकर आ रहे हैं. वन्स अपन अ टाइम इन इंडिया. यह फिल्म बिहार के युवाओं की दुनिया की एक ऐसी कहानी बयां करने की कोशिश कर रही है, जिसमें कई सच्चाईयां बयां हो रही हैं. फिल्म के महत्वपूर्ण पहलुओं से फिल्म के निर्देशक नितिन चंद्रा ने रूबरू कराया. इस फिल्म की खास बात यह भी है कि यह फिल्म बिहार की एक खास शख्सियत नीतू चंद्रा ने प्रोडयूस की है. पेश है नितिन से हुई बातचीत के मुख्य अंश 
फिल्म का कांसेप्ट क्या है?
फिल्म, साल 2002-2005 में, बिहार के बक्सर जिले के रहने वाले तीन युवकों की कहानी  हैं. ये फिल्म पलायन, क्षेत्रवाद की राजनीति और बिहार में समाजिक- राजनीतिक - आर्थिक बदहाली से जूझ रहे युवाओं की कहानी है. ये फिल्म बिहार के उन अतीत के पन्नों को पलटता, जहां एक आम भारतीय या आम बिहारी लौट कर नहीं जाना चाहता.  लेकिन देश भर के युवा आए दिन उस दल दल में धकेल दिए जाते हैं जिस बारे में ये फिल्म बात करती है.

इस तरह के विषयों पर फिल्में बनाने की क्या आवश्यकता महसूस होती है?
मुझे नहीं पता कैसी फिल्मों की जरूरत है . लेकिन यह जरूर पता है की कहानी कहनी की जरूरत है. जिस तरह किताबी साहित्य होता है.उसी तरह समाज का जो सबसे प्रसारित और समाज को सबसे प्रभावित करने वाला माध्यम है वो सिनेमाई साहित्य है. सिनेमा ही आम लोगों का साहित्य है .किताबें अब ज्यादातर लोग पढ़ नहीं रहे, साहित्य अब आॅडियो वीडियो हो गया है.कहानी कहना अपने भाव और सोच को बताने की जो बेचैनी है, उसका माध्यम है. हम उस युग में जी जहां हर व्यक्ति अपनी एक पहचान बनाने की जद्दोजहद में हैं. उसी में मैं एक बिहारी, जब ये सोचता हूं कि एक बिहारी के तौर पर मेरी क्या पहचान या एक भारतीय के तौर पर हमारी पहचान क्या है तो मन बेचैन हो उठता है,क्योंकि मैं भारत के 14  राज्यों और दुनिया के5 देशों में रहा हूं.  एक कहानीकार  के तौर पर मैं वो बताना चाहता था जो मेरी कहानी है और मुझे लगता है की ऐसी कहानी जो सब लोगों को अपने किरदाओं और पटकथा के बदलते रंग में बांध कर रखे.      

3.फिल्म के किसी हिस्से को लेकर विवाद हो रहे हैं. इस पर विस्तार पर बताएं?

जैसा की मैंने कहा कि फिल्म साल 2002 से आगे की कहानी है, यह वो समय था जब बिहार में राजनीतिक उथल-पुथल तो थी ही, लेकिन बिहारियों को भी दूसरे राज्यों में कई बार बिहारी होने के लिए हिंसा का सामना करना पड़ा था. 2003 में शिव सेना ने रेलवे परीक्षा देने गए  बिहार के छात्रों की पिटाई की गयी थी और उस समय शिव सेना के विद्यार्थी सेना के प्रमुख राज ठाकरे थे. मैंने फिल्म में राज ठाकरे का नाम रखा था, लेकिन  इस नाम को किसी भी तरह से हमने बुरा नहीं कहा, बस एक समाचार के माध्यम से इसको लिया गया था. इस पर सेंसर बोर्ड को भारी आपत्ति थी.
 सेंसर बोर्ड में भी दिक्कतें हो रही हैं, ऐसी खबरें आ रही हैं?
 सेंसर ने कुछ हास्यास्पद नियम बना रखे हैं, जो कि सरकार के साथ शायद बदल जाते हैं. साला, कमीना जैसे शब्दों पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है जो किसी भी तरह से तार्किक नहीं है.  सेंसर की कोई नियमावली नहीं है और बतौर फिल्मकार जब हम पुरानी फिल्मों में इस्तेमाल किये शब्द अपनी फिल्मों में लाते हैं तो यह सोचते हैं की कोई दिक्कत की बात नहीं है, लेकिन हमें ये ध्यान नहीं रहता कि जब फलां फिल्म में फलां शब्द पास कर दिया गया था तो सरकार कोई और थी अब सरकार कोई और है. इस तरह के जंगल राज वाले नियम सिनेमा के लिए ही नहीं बल्कि दर्शकों के लिए भी हानिकारक हैं.  

4.फिल्म के शीर्षक के बारे में बताएं?
फिल्म का ऐसा शीर्षक इसलिए है क्योंकि ये बिहार के बारे में २००२ के आस पास की कहानी है. कहानी जितनी अलग नयी और रोचक है नाम भी वैसा ही रखना था.

5. फिल्म किस तरह बिहार के लोगों को प्रभावित होगी?

ये फिल्म खासतौर पर बिहार के लोगों को उस तरह से प्रभावित करेगी जैसा किसी फिल्म ने आज तक नहीं  किया है और ये मेरा अनुमान नहीं दावा है. इसमें एक पात्र कहता है कि बिहार के लोग जो मार खा रहे ह.ैं क्या कोई उनको बचाया जा सकता है. एक दूसरा संवाद है कि बिहार के लोग बाहर तो जाते हैं.लेकिन ये नहीं कहते की वो बिहार से हैं. एक  किरदार कहता है की बिहार को लोग कान से देखते हैं, आंख से नहीं.  और ऐसे दिल में टीस जगाने वाले कई संवाद हैं जो प्रभावत करेगी.

6. फिल्म का उद्देश्य क्या है?
फिल्म का मोटिव ये है कि  दर्शक कहानी रूपी नाव में किरदार रूपी पतवार के साथ समय रूपी नदी के उस पार जाएं ,जहां मैं उन्हें ले जाना चाहता हूं.मनोरंजन का मतलब मेरे लिए दर्शकों को खिल्ली रखना, वो मेरे कथानक से बाहर नहीं निकले और फिल्म के आखिरी किनारे में अगर वो कुछ पा लें तो अच्छा है.

7. नीतू बिहार की एक बड़ी आइकन हैं. तो बतौर आइकन और बतौर परिवार की अहम सदस्य आप उन्हें किस तरह देखते हैं?
नीतू बिहार से निकली अंतरराष्ट्रीय आइकन हैं और यह गर्व हमारे साथ उस वक़्त से है, जब वो देश की तरफ से खेलों में सक्रीय थीं.  नीतू घर के अंदर आम लड़की है, लेकिन जब हम कभी बाहर एक साथ होते हैं तो यह देख कर रोमांच होता है जब लोग उसे पहचान कर उसे देखते हैं.
 बिहार के वर्तमान हालात पर आपकी क्या राय है?
वर्तमान में राजनितिक स्थति काफी निराशाजनक है, और ये मेरी व्य्कतिगत राय है .एक वोटर के तौर पर मैं पूरे तरह से भ्रम की स्थिति में  हूं कि वोट किसे  देना है.

और किस तरह के विषयों पर फिल्में बनाना चाहते हैं?

मैं तिलका मांझी, बिस्मिल्लाह खान, कुंवर सिंह, चित्तू पांडे,  भगवान बिरसा मुंडा, यहां तक की नीतू के जीवन पर कहानी बनाना चाहता हूं. मेरी कहानी बिहार झारखंड और उत्तर प्रदेश  की होती है.कहानियां ऐसी जो हमें शर्मिंदा ना करें बल्कि मनोरंजन के साथ आत्म मंथन करने पर जरूर मजबूर करे.

बिहार के लोगों की जो छवि दुनिया में बनी है. उसे कैसे दुरुस्त किया जा सकता है..

बिहारियों के बारे में जो सोच है वो कई मायनो में सही भी है और कई बार गलत भी. लेकिन सवाल है कि बिहार ही क्यों. इस  विषय पर और मंथन की जरुरत है ।
मुझे लगता है कि सिनेमा बहुत हद तक यह सोच बदल सकती है. सिनेमा को लेकर बिहार और झारखण्ड सरकारों को गंभीर होने की जरुरत है और स्थानीय भाषाओं में सिनेमा को लेकर योजनाएं बनाएं क्योंकि सिनेमा लाखों का मनोरंजन करती है तो हजारों को रोजगार भी देती है. 

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