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20151126

बाजीराव और भंसाली

निस्संदेह संजय लीला भंसाली जब भी फिल्में लेकर आते हैं, दर्शक बेसब्री से उनकी फिल्मों को देखने के लिए उत्सुक रहते हैं। वजह यह है कि उनकी फिल्मों में दर्शकों को भव्यता देखने को मिलती है।और हिन्दी सिनेमा में उतने बड़े कैनवास पर फिल्में बनाने मैं कई निर्देशक सक्षम नहीं हो पाते हैं। संजय फिल्मों को सुंदर बनाना बखूबी जानते हैं। वे अपनी भव्यता से इस कदर दर्शकों को मोहित कर देते हैं,मंत्रमुग्ध कर देते हैं कि दर्शक फिल्म की कहानी या उसकी मौलिकता पर विशेष ध्यान नहीं देते। निस्संदेह एक फिल्ममेकर के लिए यह बड़ी चुनौती होती भी है, कि वह अपनी रचना का सृजन इस तरह करे कि आम दर्शक उसे सच मान बैठे। जब वह एक ऐसी प्रेम कहानी दिखाए,जिसमें खामोशियां ही जुबान हो। जब वह किसी सपनों की दुनिया में ले जाये तो दर्शक उस सपने को  भी हकीकत मान बैठे। जैसा भंसाली ने अपनी फिल्म सांवरियां में किया भी था।उन्होंने देवदास की जो छवि गढ़ी वह शाहरुख़ खान के यादगार किरदारों में से एक है। हकीकत में भले ही उपन्यास में कभी पारो और चंद्रमुखी आपस में न टकराये हो। मगर भंसाली ने लोगों के जेहन तक पहुंचायी और लोगों ने विश्वास भी किया। इस दृष्टिकोण से एक निर्देशक की भी जिम्मेदारी है कि वह उस विश्वास का सम्मान करें। यह सारी बातें इसलिए क्योंकि भंसाली इस बार भी बड़े कैनवास पर बड़े कलाकारों के साथ बाजीराव मस्तानी लेकर तो आ रहे हैं लेकिन इस बार उन्होंने  कई बारीकियों पर कम ध्यान दिया है। जिस अंदाज़ में दीपिका तीरंदाज़ी करती नजर आ रही हैं,जानकार का मानना है कि यह तीरंदाज़ी का सही तरीका नहीं है। साथ ही दीवानी मस्तानी गीत में जिस वाद्य यंत्र का इस्तेमाल हो रहा है वह उस दौर का वाद्य यन्त्र नहीं है।हाल ही में रिलीज़ गीत पिंगा में भी कई त्रुटियाँ हैं। संजय इस बार कॉस्ट्यूम व फिल्म के लूक पर अधिक ध्यान दे रहे हैं जबकि उन्हें इन बारीकियों पर भी ध्यान देनी ही चाहिए।दर्शक उनसे ऐसी कमियों की अपेक्षा नहीं रखेंगे। जाहिर है।

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