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20150905

जयेदव की याद में

अल्लाह तेरो नाम...ईश्वर तेरो नाम...यह गीत आज भी कर्णप्रिय हैं.लोगों की जुबां पर भले ही यह गीत चढ़ा हो. मगर शायद ही लोगों को इस गाने के संगीतकार याद हों. लेकिन हाल ही में मुंबई की एक संस्था जो लगातार साहित्य और सिनेमा जगत की ऐसी शख्सियतों को याद कर रही हैं, चौपाल के माध्यम से जयदेव पर एक खास कार्यक्रम का आयोजन किया. खास बात यह थी कि संगीतकार जयदेव के परिवार के सदस्यों में ंशेष रह चुके उनके भांजे जो कि फिलवक्त लंदन में हैं और डेनटिष्ट हैं, वे इस खास कार्यक्रम के लिए लंदन से भारत आये है. जयदेव पर इस खास कार्यक्रम में कई नयी जानकारियां मिलीं और उन जानकारियों के आधार पर यह यकीन किया जा सकता है कि जयदेव एक बेहतरीन संगीतकार थे. लेकिन उन्हें अनेक मौके नहीं मिले. फिल्म इंडस्ट्री में होनहारों को मौके न मिलने से कई प्रतिभाओं का नुकसान हुआ है और उनमें से एक जयदेव भी थे. जयदेव उन संगीतकारों में से एक थे, जिन्होंने नये लोगों को सबसे ज्यादा मौके दिये. उस दौर में जब लता और आशा ही गायिकी में लोगों की पहली पसंद होती थी. उस दौर में जयदेव ने छाया गांगुली, माया, फय्याज जैसी गायिकाओं को मौके दिये. घरौंदा फिल्म के गीत तुम्हे हो न हो उन्हीं गीतों में से एक है.जयदेव साहब को न सिर्फ फिल्मी बल्कि गैर फिल्मी  गानों की भी अच्छी समझ थी. उन्होंने कई भजनों व गजलों को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया. एक अकेला इस शहर में...दो दीवाने शहर में...दोनों एक ही दर्ज पर बने दो गीत थे और दोनों एक होकर भी एक दूसरे से जुदा थे. हरिहरण ने स्वीकारा कि आज वह जो कुछ भी हैं जयदेव साहब की वजह से ही हैं. उनके साथी गीतकार नक्ष लायपुरी ने अपनी यादों को सांझा करते हुए बताया कि जयदेव को गपशप में गीतों की धून बनाने की आदत थी और उन्होंने कभी किसी की बुराई नहीं की.

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