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20140217

एबीसीडी के बदलते मायने


 पिछले दिनों साधु और शैतान दोबारी देखी. इस फिल्म का एक गाना है. एबीसी...इन दिनों फिल्म यारियां का भी एक गीत ए फॉर आओ रे आओ...बी फॉर... काफी लोकप्रिय हो रहा है. साधु और शैतान में जन्मदिन का माहौल है और वहां बच्चों को एबीसीडी के माध्यम से कुछ फल के नाम तो, कुछ देश के नाम और कई चीजें सिखाई जा रही हैं. जबकि यारियां में एबीसीडी के माध्यम से युवा अपनी मस्ती दिखा रहे हैं. दरअसल, हकीकत यह है कि पहले फिल्मों में गानों में उन शब्दों का इस्तेमाल खासतौर से किया जाता था, जिसमें कुछ नैतिकता की बात हो या फिर जिनमें कुछ नयी चीजों की सीख मिले. खासतौर से बच्चों के लिए जो गाने बनाये जाते हैं. उनमें तो इन बातों का खास ध्यान दिया जाता था कि वैसी चीजों का इस्तेमाल हो और वैसी पंक्तियां इस्तेमाल की जाये, जिससे बच्चे खेल खेल में और गीत गीत में कुछ नया सीख लें. लेकिन बदलते दौर के साथ अब एबीसीडी के मायने बदले हैं. दरअसल, अब जिंदगी के, फिल्मों के और गानों के अल्फाबेट ही पूरी तरह बदल चुके हैं. साधु और शैतान उस दौर की चुनिंदा फिल्मों में से एक रही होगी, जिसमें लगभग हर उम्दा कलाकार ने अभिनय किया है. फिल्म में लीड किरदार निभाने वाला कोई सुपरस्टार नहीं था. फिर भी फिल्म लोकप्रिय है. प्राण, ओमप्रकाश, अशोक कुमार, मेहमूद, किशोर कुमार जैसे सभी दिग्गजों ने फिल्म में साबित किया है कि दरअसल, अगर कलाकारों को छोटा किरदार भी मिले तो वह उसे बखूबी निभा कर वाहवाही लूट सकते हैं. टुनटुन ने छोटे से किरदार में सबको हंसाया है इस फिल्म में. अशोक कुमार, किशोर कुमार जैसे दिग्गजों के अभिनय को देख कर नहीं लगता कि वह फिल्म में छोटी सी भूमिका में हैं. दिलीप कुमार का स्पेशल अपीयरेंस जताता है कि उस वक्त इगो और अहम की कोई जगह नहीं होती थी.

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