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20140218

एक फैन ऐसी भी


 सुधा कृष्णमूर्ति 365 दिनों में 365 फिल्में देखती हैं. मसलन हर दिन वह लगभग एक फिल्म जरूर देखती हैं. कम ही लोगों को यह जानकारी है कि सुधा और नारायण मूर्ति भी सुधा के फिल्मी शौक की वजह से ही मिले थे. उन्हें फिल्मों में इस कदर दिलचस्पी थी कि उन्होंने नारायण मूर्ति की भी फिल्मों के प्रति रुझान पैदा कर दिया था. वरना, नारायण मूर्ति फिल्मों के बिल्कुल शौकीन नहीं थे. दरअसल, व्यवसाय अपने आप में एक ऐसा नशा है, जिसके सामने किसी और नशे की जरूरत ही नहीं. शायद यही वजह है कि  कई सफल और महान व्यवसायियों ने फिल्मों को हमेशा हीन रूप में देखा. खुद गांधीजी भी फिल्मों को बुरी चीज मानते थे. एक बार रतन टाटा और दिलीप कुमार एक ही विमान में सफर कर रहे थे. दिलीप कुमार ने रतन टाटा को देख कर हाथ मिलाया और कहा कि मैं दिलीप कुमार. रतन टाटा ने उनसे पूछा कि कौन दिलीप कुमार. इस बार से दिलीप कुमार बेहद आहत हुए. उन्हें इस बात से काफी तकलीफ हुई कि जिस दिलीप कुमार के पीछे पूरी दुनिया पागल है, रतन टाटा उन्हें नहीं जानते. इस बात से उन्हें काफी तकलीफ हुई थी और उन्हें कई बार इस बात का जिक्र फिल्मों में किया . दरअसल, दोष रतन टाटा का नहीं था. वे फिल्में चूंकि देखा ही नहीं करते हैं सो, उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी. उस वक्त मीडिया इस कदर सक्रिय भी नहीं थी कि लोगों को इतनी जानकारी मिल जाये. अब तो दौर बदल चुका है. अब व्यापार ब्रांड का रूप ले चुका है और हर ब्रांड का चेहरा कोई न कोई सेलिब्रिटी है. मुकेश अंबानी और उनकी पत् नी नीता अंबानी की पार्टी में अब फिल्मी सितारों के बिना फीके हैं. हर व्यवसायी अब सेलिब्रिटिज के नजदीक रहने के बहाने ढूंढते हैं. लेकिन पहले फिल्मो को लेकर लोगों की सोच बिल्कुल अलग थी.

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