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20150130

बांग्ला सिनेमा का अस्तित्व


 लीव मिंट डॉट कॉम की खबर है कि बांग्ला सिनेमा इन दिनों अपने दर्शकों को खो रहा है. पिछले कुछ सालों में थियेटरों में बांग्ला फिल्में देखने वालों की दर्शकों की संख्या बहुत कम हो गयी है. एक रिसर्च के मुताबिक 54 प्रतिश्त दर्शकों ने कोलकाता के थियेटर में जाकर फिल्में नहीं देखी है.  भारतीय सिनेमा में बांग्ला सिनेमा ने क्या योगदान दिया है. यह जगजाहिर है. अब भी बांग्ला सिनेमा को क्लास यानी बुद्धिजीवी वर्ग का सिनेमा माना जाता है. अब भी विशेषज्ञ मानते हैं कि बांग्ला सिनेमा ने ही क्षेत्रीय सिनेमा को बढ़ावा दिया है और उसकी गरिमा को बरकरार रखा है. फिल्मों के विषय, कांसेप्ट, लेखन निर्देशन इससे सभी वाकिफ हैं. लेकिन इसके बावजूद अगर सिनेमा में दर्शकों की कमी आ रही है, तो यह वाकई चौंकानेवाली खबर है. चूंकि बांग्ला सिनेमा के दर्शकों का मिजाज भारत के अन्य सभी राज्यों के दर्शकों से अलग है. इससे स्पष्ट है कि दर्शक यह महसूस कर रहे हैं कि बांग्ला सिनेमा इंडस्ट्री में भी पिछले कुछ सालों में गिरावट आयी है. तभी दर्शक घट रहे हैं. यह बेहद जरूरी है कि बांग्ला सिनेमा का अस्तित्व बरकरार रखा जाये. चूंकि क्षेत्रीय सिनेमा में सबसे समृद्ध इतिहास इसी राज्य का है. इन दिनों मराठी सिनेमा ने जो विषयपरक फिल्मों को महत्व देना शुरू किया है. वह कहीं न कहीं बांग्ला सिनेमा की देन है. सत्यजीत रे, ऋतुपर्णो घोष, ऋत्विक घटक जैसे शख्सियतों ने ही विश्व सिनेमा में भारतीय सिनेमा को पहचान दिलाई है. और बेहद जरूरी है कि इस सिनेमा का अस्तित्व बरकरार रहे. कमियां और खामियां कहां हैं, इस पर सिनेमा की सोच रखने वाले बांग्ला फिल्मों के निर्देशकों व रंगकर्मियों को चर्चा करनी चाहिए, क्योंकि यह वाकई गंभीर मुद्दा है. वरना, बॉलीवुड में जिस तरह मसाला फिल्में हावी है. कहीं बांग्ला सिनेमा में भी यह लत न लग जाये.

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