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20150130

मंटो की वापसी


नंदिता दास ने निर्णय लिया है कि वे फिराक के बाद जिस फिल्म को निर्देशित करना चाहती हैं. वह मंटो पर आधारित होगी. नंदिता पिछले कई सालों से सआदत हसन मंटो की जीवनी, उनकी लिखी कहानियों व रेडियो प्लेज पर शोध कर रही हैं. उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि उनकी यह फिल्म मंटो पर बायोपिक नहीं होगी. बल्कि वे अपनी फिल्म में 1942 से लेकर 1952 तक के दौर को दिखाना चाहती हैं. यह 10 साल मंटो की जिंदगी के अहम साल रहे हैं. चूंकि इसी दौरान उन्हें पाकिस्तान जाना पड़ा. उन पर कई तरह के चार्जेज लगे. नंदिता उनकी बेटियों से मिली हैं और वे लगातार इस पर काम भी कर रही हैं. नंदिता का मानना है कि मंटो ने जो लड़ाई कई सालों पहले लड़ी थी. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लड़ाई दरअसल, वह वर्तमान दौर में प्रासंगिक है. चूंकि वर्तमान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर कई विवाद चल रहे हैं. इस फिल्म के जरिये नंदिता की कोशिश होगी कि मंटो द्वारा सेक्स वर्क्स पर लिखी गयी उनकी कहानियां उनके दर्द को भी दिखाया जाये.नंदिता जानती हैं कि वे पूरी कहानी खुद नहीं लिख सकतीं. सो वे मीर अली हुसैन का भी साथ ले रही हैं. गुलजार साहब पिछले कई सालों से लिटरेटर महोत्सवों के माध्यम से मंटो को जिंदा रखने की कोशिश कर रहे हैं. चूंकि गुलजार साहब भी मानते हैं कि मंटो आज भी प्रासंगिक हैं. उनकी कहानियों में हकीकत के साथ साथ जो व्यंग्य होता था. वह आज नामुमकिन है मिलना. पांच शब्दों में अपनी बात कह जाने का हुनर मंटो को बखूबी आता था. नंदिता की सोच की सराहना होनी चाहिए कि वे मंटो की मुलाकात वर्तमान पीढ़ी से करायेंगी और निश्चित तौर पर दौर बदला है.मंटो वक्त से आगे की सोच रखते हैं और शायद वर्तमान में दर्शक व युवा पीढ़ी उनके लिखे, उनकी सोच को बेहतरीन तरीके से समझ पायेगी. मंटो की इस वापसी का बेसब्री से इंतजार 

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