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20150318

सार्थक सोच वाली फिल्म

 फिल्म : दम लगाके हईशा
कलाकार : भूमि पेडनेकर, आयुष्मान खुराना, सीमा पावा, संजय मिश्रा, अलिका, शीबा चड्डा
निर्देशक : शरत कटरिया
रेटिंग : 3.5 स्टार

 फिल्म दम लगाके हईशा के निर्देशक शरत कटरिया ने अपनी बातचीत के दौरान इस बात का जिक्र किया था कि आदित्य चोपड़ा ने एक दिन में फिल्म की स्क्रिप्ट पढ़ कर फिल्म को हां कह दिया. आप फिल्म देखेंगे तो यह बात भलिभांति समझ पायेंगे कि उनकी हां की वजह क्या रही. हाल के वर्षों में यशराज बैनर द्वारा बनाई गयी यह ईमानदार व शुद्ध देसी कहानी है. फिल्म के निर्देशक शरत ने हरिद्वार को जिस तन्मयता से कहानी में दर्शाया है. उस शहर की बारीकियां फिल्म के निर्देशक की सोच को गढ़ते हैं. िफल्म में बेवजह का शोर शराबा और इ हरिद्वार इ हरिद्वार है...यहां ऐसा ही होता का हल्ला नहीं है. यह फिल्म की सबसे बड़ी खासियत है. शहर या तिवारी परिवार से दर्शकों को मिलवाने में निर्देशक बेवजह वक्त जाया नहीं करते. वे सीधे कहानी की थीम पर आते हैं. यह कहानी संध्या और प्रेम की जिंदगी पर आधारित है.  कहानी 1995 की पृष्ठभूमि पर बनी है. प्रेम गायक कुमार सानू का फैन है और कैसेट रिकॉर्डिंग की दुकान चलाता है. वह दसवीं फेल है. लेकिन आम लड़कों की तरह उसके भी सपने हैं कि उसकी पत् नी सुंदर, सुशील मिले. लेकिन अपने पिता की नजर में निखट्ठू कभी अपने पिता का विरोध नहीं कर पाता. और उनकी पसंद की लड़की, संध्या जिसने बीएड किया है. लड़के से अधिक पढ़ी लिखी भी है. लेकिन वह स्लीम ट्रीम नहीं... संध्या से प्रेम की शादी तो हो जाती है. लेकिन संध्या और प्रेम के बीच प्रेम नहीं हो पाता. वजह सिर्फ संध्या का वजन है. प्रेम हर वक्त संध्या के वजन को लेकर उसे जलील करता रहता है. और लोगों के सामने वह संध्या को बेइज्जत कर देता है. दरअसल, निर्देशक ने इस सोच को बखूबी दर्शाने की कोशिश की है कि अब भी शादी के लिए लड़कियों का वजन सबसे अधिक महत्व रखता है. न जाने कितनी लड़कियों को सिर्फ इस हीन भावना से गुजरना पड़ता है, कितनी लड़कियों की न सिर्फ शादियां टूटती है, क्योंकि उनका वजन अधिक है. एक दृश्य में जब संध्या के वजन को लेकर प्रेम की बुआ खरी खोटी सुना रही होती है...उस वक्त संध्या का सामान्य सा जवाब होता है कि इसे मेटाबॉलिज्म कहते हैं...चूंकि संध्या पढ़ी लिखी है.इसलिए वह जानती है कि वजन बढ़ने की वजह क्या है. निर्देशक ने फिल्म में संध्या को अपने वजन को लेकर खुद से घृणा करते हुए नहीं दिखाया है. यह फिल्म की सबसे खास बात है. वरना, अब तक फिल्मों में लड़कियों को खुद को साबित करने के लिए वजन घटाते या दुखी होते दिखाया गया है. यह फिल्म उन तमाम लोगों के मुंह पर तमाचा मारती है, जो लड़की के रंगरूप व उसके वजन को तव्वजो देते हैं. न कि उसके हुनर और पढ़ाई को. संध्या का फिल्म में अपनी सोच में मजबूत होना फिल्म की सबसे बड़ी कामयाबी है. साथ  ही निर्देशक ने इन बातों पर खास ख्याल रखा है कि उन्होंने सिर्फ फिल्म के मुख्य कलाकार पर फोकस न कर. फिल्म के सभी सहयोगी कलाकारों की दमदार टीम तैयार की है. संजय मिश्रा, शीबा चड्डा, अलिका व सीमा पावा जैसे कलाकारों ने फिल्म को पूरी तरह से समर्थन दिया है. आप कहीं भी बोर नहीं होते. फिल्म में बेहतरीन पंचलाईन व संवाद हैं. फिल्म का सरप्राइज पैकेट फिल्म की मुख्य अभिनेत्री भूमि हंै. भूमि की यह पहली फिल्म है. लेकिन वह स्क्रीन पर जितनी विश्वसनीय लगी हैं. ऐसा लगा रहा, वह काफी सालों से कैमरा फेस कर रही हैं. उन्होंने अपनी पहली ही भूमिका में प्रभावित किया है. वे लाउड नहीं हैं. वे अति उत्साही नजर नहीं आयी हैं.भविष्य में उनके लिए अन्य विकल्प खुलेंगे. यशराज की सराहना होनी चाहिए कि वे अपने साथ काम कर रहे लोगों में हुनर को पहचान रहा और उन्हें मौके दे रहा. परिणीति के बाद भूमि उनकी बेहतरीन खोज हैं. आयुष्मान ने अपनी सीमाओं से बाहर जाकर अपना बेहतर प्रदर्शन देने की कोशिश की है. फिल्म के गीत वरुण ने लिखे हैं और वह फिल्म की सोच से बिल्कुल मेल खाते हैं. 90 के दशक को दर्शाने में गीतों ने पूरा सहयोग किया है. फिल्म मनोरंजक है. जरूर देखी जानी चाहिए

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