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20150318

स्टार्स व उनके चाटुकार


हाल  ही में एक अपकमिंग सुपरस्टार से मुलाकात हुई. कहने को तो वह वन आॅन वन( मुंबई में अगर आप किसी स्टार से एक्सक्लूसिव बातचीत करते हैं तो उसे वन आॅन वन कहने का प्रचलन) बातचीत थी. लेकिन दरअसल, वह कई दखलअंदाजों के बीच हुई बातचीत रही. बातचीत के अनुसार मुझे 20 मिनट का समय मुहैया कराया जाना था. लेकिन बातचीत के दौरान जब उस अभिनेता के वैनिटी में पहुंची तो उनके चाटुकारों ने इसे घटा कर 10 मिनट तय किया. आमतौर पर दूर से देखने वाले लोगों की यह अवधारणा है कि फिल्म जर्नलिष्ट की जिंदगी में सिर्फ ग्लैमर हंै. उनके काम में कैसा संघर्ष. दरअसल, यहां संघर्ष के मायने थोड़े अलग हैं. हमारा संघर्ष बस इतना सा है कि हमें पांच घंटे के इंतजार के बाद 15 मिनट तो कभी सिर्फ पांच मिनट की मोहलत मिलती है. मतलब हमारे पांच घंटों के बदले मिले उनके सिर्फ 15 मिनट की कीमत है. वे पांच घंटे जो व्यर्थ गये. वे गये. तब भी कोफ्त नहीं होती. कोफ्त तब होती है कि एक लंबे इंतजार के बाद आपको जब अभिनेता से उनके वैनिटी में बातचीत करने का मौका मिलता है तो उस वक्त वह अभिनेता अपने चाटुकारों के साथ व्यस्त होता है. फिर वह क्या बातें करेगा. किन सवालों का जवाब देगा. किन सवालों का नहीं. यह स्टार नहीं वे तय करते हैं. वह बातचीत वन आॅन वन नहीं रह जाती. ऐसी बातचीत से आप कभी संतुष्ट नहीं हो सकते. दरअसल,वर्तमान दौर में स्टार्स अपने वैनिटी में अपनी अलग दुनिया में रहते हैं. जहां वे अपने चाटुकारों से घिरे रहते हैं और वही हुक्मरान होते हंै, यह आश्चर्यजनक है कि किस तरह फिल्म शमिताभ में बाल्की ने यह कल्पना की कि दानिश कई दिनों तक वैनिटी में रहता है लेकिन लोगों को पता नहीं चलता. चूंकि स्टार्स के चाटुकार तो अपनी ओछी जासूसी से इन दिनों बाज नहीं आते.

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