आज दादा साहेब फाल्के का जन्मदिवस है. और आज से ठीक 4 दिनों के बाद यानी 3 मई को भारतीय सिनेमा के 100 साल पूरे हो जायेंगे. दादा साहेब फाल्के ने वर्ष 1913 में फिल्म राजा हरिशचंद्र से भारतीय सिनेमा का शंखनाद किया था. दादा साहेब फाल्के के साथ साथ हिंदी सिनेमा को उनकी पत् नी सरस्वती फाल्के का भी शुक्रगुजार होना चाहिए और वाकई वह भी इस बात की हकदार हैं कि उन्हें भी सम्मानित किया जाये. चूंकि उस दौर में उनकी पत् नी सरस्वती फाल्के ने उनका बहुत सहयोग किया था. उस दौर में जब अन्य महिलाएं सोने के गहनों से लदी रहना पसंद करती थी. उस वक्त सरस्वती ने अपने सारे गहने बेंच कर फाल्के साहब की मदद की थी. साथ ही उन्होंने न केवल फिल्म की मेकिंग में मदद की. बल्कि उन्हें हर तरह से सहयोग किया. फिल्म एक टीम वर्क है. बिनाा टीम के फिल्म बनाना संभव नहीं. यह बात आज भी रोहित शेट्ठी व अनुराग कश्यप जैसे निर्देशक मानते हैं. उस दौर में भी सरस्वती फालके ने इस फिल्म को टीम बनने में मदद की थी. वह अकेले पूरी टीम का खाना बनाती थी. कॉस्टयूम डिजाइन करती थीं. इसकी विस्तृत जानकारी आपको फिल्म हरिशचंद्राची फैक्ट्री में देखने को मिल जायेगी. सरस्वती ने अपने बच्चों की खुशी को भी दांव पर लगा कर फाल्के साहब की मदद की. लोग उन्हें पागल कहते थे. लेकिन सरस्वती जानती थीं कि फाल्के साहब कुछ तो जादू कर रहे हैं.सरस्वती ने अपने सारे इंश्योरेंस, घर सबकुछ दादा साहेब के सपने को पूरा करने में लगा दिया. वाकई एक कामयाब आदमी के पीछे एक औरत का हाथ होता है. लेकिन हम उन महिलाओं को कभी याद नहीं रखते. जबकि वह भी सम्मान पाने की उतनी ही हकदार हैं. भारतीय सिनेमा में जब भी फाल्के का नाम याद किया जायेगा, सरस्वती फाल्के को भी स्मरण किया जाना चाहिए.
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20130513
सरस्वती फालके के दादा फालके
आज दादा साहेब फाल्के का जन्मदिवस है. और आज से ठीक 4 दिनों के बाद यानी 3 मई को भारतीय सिनेमा के 100 साल पूरे हो जायेंगे. दादा साहेब फाल्के ने वर्ष 1913 में फिल्म राजा हरिशचंद्र से भारतीय सिनेमा का शंखनाद किया था. दादा साहेब फाल्के के साथ साथ हिंदी सिनेमा को उनकी पत् नी सरस्वती फाल्के का भी शुक्रगुजार होना चाहिए और वाकई वह भी इस बात की हकदार हैं कि उन्हें भी सम्मानित किया जाये. चूंकि उस दौर में उनकी पत् नी सरस्वती फाल्के ने उनका बहुत सहयोग किया था. उस दौर में जब अन्य महिलाएं सोने के गहनों से लदी रहना पसंद करती थी. उस वक्त सरस्वती ने अपने सारे गहने बेंच कर फाल्के साहब की मदद की थी. साथ ही उन्होंने न केवल फिल्म की मेकिंग में मदद की. बल्कि उन्हें हर तरह से सहयोग किया. फिल्म एक टीम वर्क है. बिनाा टीम के फिल्म बनाना संभव नहीं. यह बात आज भी रोहित शेट्ठी व अनुराग कश्यप जैसे निर्देशक मानते हैं. उस दौर में भी सरस्वती फालके ने इस फिल्म को टीम बनने में मदद की थी. वह अकेले पूरी टीम का खाना बनाती थी. कॉस्टयूम डिजाइन करती थीं. इसकी विस्तृत जानकारी आपको फिल्म हरिशचंद्राची फैक्ट्री में देखने को मिल जायेगी. सरस्वती ने अपने बच्चों की खुशी को भी दांव पर लगा कर फाल्के साहब की मदद की. लोग उन्हें पागल कहते थे. लेकिन सरस्वती जानती थीं कि फाल्के साहब कुछ तो जादू कर रहे हैं.सरस्वती ने अपने सारे इंश्योरेंस, घर सबकुछ दादा साहेब के सपने को पूरा करने में लगा दिया. वाकई एक कामयाब आदमी के पीछे एक औरत का हाथ होता है. लेकिन हम उन महिलाओं को कभी याद नहीं रखते. जबकि वह भी सम्मान पाने की उतनी ही हकदार हैं. भारतीय सिनेमा में जब भी फाल्के का नाम याद किया जायेगा, सरस्वती फाल्के को भी स्मरण किया जाना चाहिए.
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