20120913

सिनेमा में हिंदीपन की कमी है


orginally published in prabhat khabar all edition on 12sep2012
कमलेश पांडे
रंग दे बसंती, दिल्ली 6, तेजाब, विरुद्ध समेत कई फिल्मों व धारावाहिकों की कहानी लिख चुके हैं.
इ स सच्चाई से कौन इनकार कर सकता है कि हिंदी देश की मनोरंजन की सर्वप्रमुख भाषा है. इसका कारण जानने के लिए किसी अध्ययन-विेषण की जरूरत नहीं. ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारे देश में आमतौर पर बोली जानेवाली भाषा हिंदी है. यह जन-जन की भाषा है. हिंदी से लोग आसानी से जुड़ पाते हैं. जनता का मनोरंजन उसीभाषा में हो सकता है, जिसमें वह सहज हो, जिसे आसानी से समझ सके. और हिंदी यह काम बखूबी करती है. 

मनोरंजन की प्रमुख भाषा के रूप में हिंदी का प्रचलन आज से नहीं है. इसका इतिहास काफी पीछे, करीब 100 साल पहले से शुरू होता है. यह भारत की खुशकिस्मती थी कि उसे ऐसे-ऐसे साहित्यकार मिले जिन्होंने अपनी शैली से साहित्य को भी मनोरंजन का माध्यम बनाया. पहली बार 1920 में देवकीनंदन खत्री ने चंद्रकांता संतति जैसी बेहतरीन रचना से एक ब.डे वर्ग को हिंदी की ओर आकर्षित किया. उसकी लोकप्रियता ऐसी थी, कि बहुत बाद में उस पर टेलीविजन सीरियल का निर्माण हुआ और उसे बेहद पसंद भी किया गया. यह दर्शाता है कि हिंदी साहित्य कितना विस्तृत है. समृद्ध है. और उसमें मनोरंजन के कितने तत्व मौजूद हैं. मैं मानता हूं कि गोपालदास गहमरी, देवकीनंदन खत्री जैसे साहित्यकारों ने ही शुरुआती दौर में हिंदी में इतनी बेहतरीन रचना की कि आम लोगों का इससे जुड़ाव हुआ. इसके बाद हिंदी को लोकप्रिय बनाया हमारी फिल्मों और विशेष कर फिल्मों के गानों ने. गीत-संगीत हिंदी फिल्मों में मनोरंजन के खास माध्यम बने. हिंदी सिनेमा के गीतकारों ने शुरुआती दौर से ही काफी बेहतरीन गाने लिखे. ये बिल्कुल आम बोलचाल की भाषा में थे. इन गानों से लोग खुद को भावनात्मक रूप से जोड़ पाये. फिल्मों के साथ साथ टेलीविजन ने भी हिंदी को मनोरंजन की भाषा बनाया. चूंकि टेलीविजन की पहुंच घर-घर तक थी, इसलिए स्वाभाविक प्रतिक्रिया केस्वरूप आम लोगों की भाषा हिंदी में ही सबसे अधिक कार्यक्रम बनने लगे. धीरे-धीरे क्षेत्रीय भाषाओं के भी टीवी चैनल आये. जो यह बताता है कि लोग अपनी जुबान में ही मनोरंजन पसंद करते हैं.

दरअसल अंगरेजी अगर सरकारी और कारोबारी कामकाज की भाषा है, तो हिंदी लोगों की जज्बात की, सामाजिक कामकाज की भाषा है. हिंदी फिल्मों और उसके गानों की सफलता ने यह साबित किया है कि हमारा देश हिंदी में ही खुशियां और गम बांटना पसंद करता है. फिल्मों के संवादों से कई लोगों ने हिंदी बोलना सीखा है. यह सही है कि हिंदी भाषा के साहित्य को उतने पाठक शायद नहीं मिले, जितने मिलने चाहिए थे, लेकिन जब हिंदी भाषा टेलीविजन की भाषा बनी, तो लोग इसे खूब दर्शक मिले. खास बात यह रही कि हिंदी भाषा को जानने समझने के लिए लोगों को बहुत अधिक साक्षर होने की जरूरत नहीं थी, सो हिंदी भाषा को लोगों ने अपना माना. यह हमारे मनोरंजन की भाषा बन गयी. 

यह सच है कि हम खाते हिंदी की हैं और राग अलापते अंग्रेजी की. यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि हम हिंदी भाषा जैसी समृद्ध, खूबसूरत, विस्तृत और सभ्य भाषा का मान नहीं करते. इस भाषा की ताकत दुनिया को मालूम है, लेकिन हमें ही इससे अजीब सा परहेज है. हमारे लिए हिंदी सम्मान की भाषा नहीं है. गूगल जैसे सुप्रसिद्ध पोर्टल के लोगों को पता है कि हिंदी की अहमियत क्या है. उसमें अन्य भाषाओं के साथ ही हिंदी में भी बाकायदा काम किया जा सकता है. निस्संदेह अंग्रेजी कुछ ‘पढे-लिखे’ लोगों की भाषा है, लेकिन यहां अंगरेजी पढ.ाई-लिखाई से नहीं लोगों की हैसियत से जुड़ी है. वह एक विशिष्ट अभिजन वर्ग की भाषा है. उसका वर्ग सीमित है. यह वर्ग ही पूरा भारत नहीं है. हालांकि यह एहसास दिलाने की कोशिश कई बार की जाती है. दोष अंगरेजी भाषा में नहीं है. बल्कि भारत में अंगरेजी को लेकर पनपी सोच का है, जो यह मानता है कि जो हिंदी बोलते हैं, वे कहीं न कहीं कमतर हैं. पिछ.डे हुए हैं. हिंदी को लेकर फिल्म और इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की स्थिति इस व्यापक सोच के भीतर ही है. जबकि हिंदी से अलग होकर इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता. भारत में सिर्फ फिल्में ही हिंदी में नहीं बन रहीं, बल्कि जिस बाजार से यह इंडस्ट्री चल रही है, वह बाजार सबसे आसानी से हिंदी समझता है. फिर चाहे वह विज्ञापन की बात हो. फिल्मों की या धारावाहिकों की. 

फिल्म इंडस्ट्री को लेकर यह विरोधाभास बार-बार उभरता है कि इसका कच्चा माल और तैयार माल हिंदी है, स्टारडम की, नाम और शोहरत की सीढ.ी हिंदी है, लेकिन हमारे सितारे हिंदी में बात करना शायद ही पसंद करते हैं. वे इंटरव्यू अंगरेजी में देते हैं. सच्चाई तो यह है कि हमारे कई सितारों को हिंदी आती ही नहीं है. यह एक तरह की गुलामी है जो फिल्मी दुनिया में और बहुत ब.डे वर्ग में गहरे तक बसी हुई है. कईस्टार रोमन में स्क्रिप्ट लिखवाते हैं. अमिताभ बच्चन को छोड़ दें तो इंडस्ट्री में बहुत कम कलाकार हैं, जो हिंदी में ही स्क्रिप्ट लेते हों. अंगरेजी पूरी तरह से हिंदी पर हावी है. सवाल सिर्फ हिंदी जानने का नहीं है. हिंदी को जानना अपने देश-समाज को जानना है. हिंदी को जाने बगैर देश को नहीं जाना जा सकता. अगर देश को नहीं जानेंगे तो इस देश की आत्मा को बयां करने वाली फिल्में भी नहीं बना पायेंगे. और जब तक ऐसा नहीं होगा, हिंदी फिल्में दुनिया में अपने लिये नाम नहीं कमा पायेंगी. यह दरअसल उस सोच का ही विस्तार है, जो उपनिवेशी मूल्यों को ही श्रेष्ठ समझता है. इसमें एक साई यह भी जुड़ी है कि आज हिंदी सिनेमा पर हिंदी में पत्रिकाओं का भी अभाव है. अगर हैं भी तो वे अंगरेजी का अनुवाद हैं. यानी यह एक विरोधाभासी स्थिति है कि फिल्में बने हिंदी में लेकिन उसे चलाने वाले अंगरेजी का इस्तेमाल करें.

मैं जब इस इंडस्ट्री में नया-नया आया था, तब दोनों भाषा की समझ रखने के कारण मुझे थोड़ी कम परेशानी का सामना करना पड़ा. लेकिन मैं आज भी हिंदी को अपनी प्राथमिक भाषा मानता हूं. अंगरेजी का चाहे कितना भी गुणगान किया जाये, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि देश के, कम से कम पूरे उत्तर भारत के सारे काम हिंदी में होते हैं. इस उत्तर भारत से ही नहीं, महाराष्ट्र, गुजरात यहां तक कि दक्षिणभारत के ब.डे हिस्से में भी बात जब मनोरंजन की आती है, तो भाषा के तौर पर हिंदी का इस्तेमाल किया जाता है. 

इन दिनों भारत में अंगरेजी फिल्मों के बाजार में भी बड़ा इजाफा हुआ है. खासकर इनकी हिंदी में डब की गयी फिल्में काफी पसंद की जा रही हैं. हालांकि मनोरंजन की कोई सरहद नहीं होती है, लेकिन जो पश्‍चिम का है वही श्रेष्ठ है, यह भावना मूलभूत रूप से सही नहीं कही जा सकती है. विदेशी फिल्म निर्माता भारतीय बाजार की ताकत समझ गये हैं, इसलिए, वे अपनी फिल्में यहां आकर हिंदी में डब करके हमें दिखा रहे हैं और हम शान से देख रहे हैं. यह एक ऐसी चीज है, जिसके प्रति इंडस्ट्री को सजग रहना चाहिए. क्योंकि अंगरेजी फिल्मों की कामयाबी हमारे यहां नकल की प्रवृत्ति को बढ.ावा दे रही है. उनकी नकल में अपनी धरोहर को खो रहे हैं. दरअसल भारतीय फिल्मों में नकल की अकल पुरानी है जो अब और बढ. रही है. भारतीय फिल्मों को भारतीय फिल्मों की तरह बनने कोशिश करनी चाहिए, लेकिन यहां कई निर्देशकों की कोशिश हॉलीवुड की तरह बनने की तरह होती है. यही वजह है कि हॉलीवुड उन्हें पसंद नहीं करता. 

यह एक बड़ी हकीकत है कि शुरुआत में हिंदी सिनेमा जब भारत की मिट्टी से जुड़ा हुआ था, उसी दौर में भारत में ऐसी फिल्में बनी जिन्हें आज भी भारती क्लासिक्स, विश्‍व क्लासिक्स का दर्जा दिया जा सकता है. लेकिन दशकों तक हमने ऐसी फिल्में गिन-चुन कर ही बनायीं, जिस पर हम सचमुच नाज कर सकते थे. इसके पीछे सिनेमा में छायी अंगरेजियत को ही वजह माना जा सकता है. भारत में जैसा है वैसा शायद ही कहीं और हो. दूसरे देशों की फिल्में अपने खास फ्लेवर के साथ हमारे सामने आती हैं. इस मामले में ईरानी फिल्मों का उदाहरण देखा जा सकता है. नकल में कलात्मकता नहीं होती है. हां इससे कमाई की जा सकती है. दिक्कत यह है कि भारत में हिंदी फिल्में भी ओवरसीज मार्केट को ध्यान में रखकर बनाने का प्रचलन बढ.ा है. सिनेमा में भारतीयता लंबे अरसे तक गायब रही. कुछ अपवादों को छोड़ दें तो हिंदी साहित्य से रिश्ता न के बराबर रहा. अभी भी सिनेमा को चलाने वाले इसकी अहमियत नहीं स्वीकार करते, यही कारण है कि हिंदी फिल्में दुनिया में अपनी पहचान नहीं बना पायी हैं. 

जब तक आप अपनी कहानी अपने अंदाज में नहीं दिखाएंगे सुनाएंगे तब तक कोई आपकी फिल्मों को क्यों देखेगा. अगर किसी को देखना हो, तो वह हॉलीवुड की फिल्में ही क्यों नहीं देखेगा, बजाय कि उसकी नकल देखेगा! भारत में ही देखिए हॉलीवुड की फिल्में भारत की नकल करके तो बन नहीं रहीं. हम उनकी कहानी देखते हैं, बस भाषा हिंदी होती है. उन्होंने अपनी मौलिकता बरकरार रखी है. वे अपनी चीजें ही आकर हमें हमारी भाषा में परोस रहे हैं और हम बेहद दिलचस्पी से उसे देख रहे हैं और उनका मान बढ.ा रहे हैं. उनके बाजार में भी हमारी हिंदी भाषा से ही फायदा हो रहा है. 

हाल में फिल्मों में आयी नयी पीढ.ी ने जरूर कुछ उम्मीद जगायी है, लेकिन इनमें से कई ऐसे हैं, जो ट्रीटमेंट और कहानी दोनों के स्तर पर अंगरेजी से आक्रांत नजर आता है. जो लोग इससे बाहर निकल पायेंगे वे ही हिंदी सिनेमा को आगे ले जा पाएंगे. हिंदी सिनेमा की अंगरेजियत सिर्फ भाषा से जुड़ा हुआ मसला नहीं है. यह हमारी सोच और कलात्मक विकास से जुड़ा हुआ मामला है. सच्चाई यह है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री चाहे कितनी भी बड़ी हो गयी हो, लेकिन यह पूरी तरह भारतीय नहीं हो पायी है. और भारतीय नहीं हो पाने के कारण ही यह अंतरराष्ट्रीय भी नहीं हो पायी है. अनुप्रिया अनंत से बातचीत पर आधारितइ स सच्चाई से कौन इनकार कर सकता है कि हिंदी देश की मनोरंजन की सर्वप्रमुख भाषा है. इसका कारण जानने के लिए किसी अध्ययन-विेषण की जरूरत नहीं. ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारे देश में आमतौर पर बोली जानेवाली भाषा हिंदी है. यह जन-जन की भाषा है. हिंदी से लोग आसानी से जुड़ पाते हैं. जनता का मनोरंजन उसीभाषा में हो सकता है, जिसमें वह सहज हो, जिसे आसानी से समझ सके. और हिंदी यह काम बखूबी करती है. 

मनोरंजन की प्रमुख भाषा के रूप में हिंदी का प्रचलन आज से नहीं है. इसका इतिहास काफी पीछे, करीब 100 साल पहले से शुरू होता है. यह भारत की खुशकिस्मती थी कि उसे ऐसे-ऐसे साहित्यकार मिले जिन्होंने अपनी शैली से साहित्य को भी मनोरंजन का माध्यम बनाया. पहली बार 1920 में देवकीनंदन खत्री ने चंद्रकांता संतति जैसी बेहतरीन रचना से एक ब.डे वर्ग को हिंदी की ओर आकर्षित किया. उसकी लोकप्रियता ऐसी थी, कि बहुत बाद में उस पर टेलीविजन सीरियल का निर्माण हुआ और उसे बेहद पसंद भी किया गया. यह दर्शाता है कि हिंदी साहित्य कितना विस्तृत है. समृद्ध है. और उसमें मनोरंजन के कितने तत्व मौजूद हैं. मैं मानता हूं कि गोपालदास गहमरी, देवकीनंदन खत्री जैसे साहित्यकारों ने ही शुरुआती दौर में हिंदी में इतनी बेहतरीन रचना की कि आम लोगों का इससे जुड़ाव हुआ. इसके बाद हिंदी को लोकप्रिय बनाया हमारी फिल्मों और विशेष कर फिल्मों के गानों ने. गीत-संगीत हिंदी फिल्मों में मनोरंजन के खास माध्यम बने. हिंदी सिनेमा के गीतकारों ने शुरुआती दौर से ही काफी बेहतरीन गाने लिखे. ये बिल्कुल आम बोलचाल की भाषा में थे. इन गानों से लोग खुद को भावनात्मक रूप से जोड़ पाये. फिल्मों के साथ साथ टेलीविजन ने भी हिंदी को मनोरंजन की भाषा बनाया. चूंकि टेलीविजन की पहुंच घर-घर तक थी, इसलिए स्वाभाविक प्रतिक्रिया केस्वरूप आम लोगों की भाषा हिंदी में ही सबसे अधिक कार्यक्रम बनने लगे. धीरे-धीरे क्षेत्रीय भाषाओं के भी टीवी चैनल आये. जो यह बताता है कि लोग अपनी जुबान में ही मनोरंजन पसंद करते हैं.

दरअसल अंगरेजी अगर सरकारी और कारोबारी कामकाज की भाषा है, तो हिंदी लोगों की जज्बात की, सामाजिक कामकाज की भाषा है. हिंदी फिल्मों और उसके गानों की सफलता ने यह साबित किया है कि हमारा देश हिंदी में ही खुशियां और गम बांटना पसंद करता है. फिल्मों के संवादों से कई लोगों ने हिंदी बोलना सीखा है. यह सही है कि हिंदी भाषा के साहित्य को उतने पाठक शायद नहीं मिले, जितने मिलने चाहिए थे, लेकिन जब हिंदी भाषा टेलीविजन की भाषा बनी, तो लोग इसे खूब दर्शक मिले. खास बात यह रही कि हिंदी भाषा को जानने समझने के लिए लोगों को बहुत अधिक साक्षर होने की जरूरत नहीं थी, सो हिंदी भाषा को लोगों ने अपना माना. यह हमारे मनोरंजन की भाषा बन गयी. 

यह सच है कि हम खाते हिंदी की हैं और राग अलापते अंग्रेजी की. यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि हम हिंदी भाषा जैसी समृद्ध, खूबसूरत, विस्तृत और सभ्य भाषा का मान नहीं करते. इस भाषा की ताकत दुनिया को मालूम है, लेकिन हमें ही इससे अजीब सा परहेज है. हमारे लिए हिंदी सम्मान की भाषा नहीं है. गूगल जैसे सुप्रसिद्ध पोर्टल के लोगों को पता है कि हिंदी की अहमियत क्या है. उसमें अन्य भाषाओं के साथ ही हिंदी में भी बाकायदा काम किया जा सकता है. निस्संदेह अंग्रेजी कुछ ‘पढे-लिखे’ लोगों की भाषा है, लेकिन यहां अंगरेजी पढ.ाई-लिखाई से नहीं लोगों की हैसियत से जुड़ी है. वह एक विशिष्ट अभिजन वर्ग की भाषा है. उसका वर्ग सीमित है. यह वर्ग ही पूरा भारत नहीं है. हालांकि यह एहसास दिलाने की कोशिश कई बार की जाती है. दोष अंगरेजी भाषा में नहीं है. बल्कि भारत में अंगरेजी को लेकर पनपी सोच का है, जो यह मानता है कि जो हिंदी बोलते हैं, वे कहीं न कहीं कमतर हैं. पिछ.डे हुए हैं. हिंदी को लेकर फिल्म और इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की स्थिति इस व्यापक सोच के भीतर ही है. जबकि हिंदी से अलग होकर इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता. भारत में सिर्फ फिल्में ही हिंदी में नहीं बन रहीं, बल्कि जिस बाजार से यह इंडस्ट्री चल रही है, वह बाजार सबसे आसानी से हिंदी समझता है. फिर चाहे वह विज्ञापन की बात हो. फिल्मों की या धारावाहिकों की. 

फिल्म इंडस्ट्री को लेकर यह विरोधाभास बार-बार उभरता है कि इसका कच्चा माल और तैयार माल हिंदी है, स्टारडम की, नाम और शोहरत की सीढ.ी हिंदी है, लेकिन हमारे सितारे हिंदी में बात करना शायद ही पसंद करते हैं. वे इंटरव्यू अंगरेजी में देते हैं. सच्चाई तो यह है कि हमारे कई सितारों को हिंदी आती ही नहीं है. यह एक तरह की गुलामी है जो फिल्मी दुनिया में और बहुत ब.डे वर्ग में गहरे तक बसी हुई है. कईस्टार रोमन में स्क्रिप्ट लिखवाते हैं. अमिताभ बच्चन को छोड़ दें तो इंडस्ट्री में बहुत कम कलाकार हैं, जो हिंदी में ही स्क्रिप्ट लेते हों. अंगरेजी पूरी तरह से हिंदी पर हावी है. सवाल सिर्फ हिंदी जानने का नहीं है. हिंदी को जानना अपने देश-समाज को जानना है. हिंदी को जाने बगैर देश को नहीं जाना जा सकता. अगर देश को नहीं जानेंगे तो इस देश की आत्मा को बयां करने वाली फिल्में भी नहीं बना पायेंगे. और जब तक ऐसा नहीं होगा, हिंदी फिल्में दुनिया में अपने लिये नाम नहीं कमा पायेंगी. यह दरअसल उस सोच का ही विस्तार है, जो उपनिवेशी मूल्यों को ही श्रेष्ठ समझता है. इसमें एक साई यह भी जुड़ी है कि आज हिंदी सिनेमा पर हिंदी में पत्रिकाओं का भी अभाव है. अगर हैं भी तो वे अंगरेजी का अनुवाद हैं. यानी यह एक विरोधाभासी स्थिति है कि फिल्में बने हिंदी में लेकिन उसे चलाने वाले अंगरेजी का इस्तेमाल करें.

मैं जब इस इंडस्ट्री में नया-नया आया था, तब दोनों भाषा की समझ रखने के कारण मुझे थोड़ी कम परेशानी का सामना करना पड़ा. लेकिन मैं आज भी हिंदी को अपनी प्राथमिक भाषा मानता हूं. अंगरेजी का चाहे कितना भी गुणगान किया जाये, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि देश के, कम से कम पूरे उत्तर भारत के सारे काम हिंदी में होते हैं. इस उत्तर भारत से ही नहीं, महाराष्ट्र, गुजरात यहां तक कि दक्षिणभारत के ब.डे हिस्से में भी बात जब मनोरंजन की आती है, तो भाषा के तौर पर हिंदी का इस्तेमाल किया जाता है. 

इन दिनों भारत में अंगरेजी फिल्मों के बाजार में भी बड़ा इजाफा हुआ है. खासकर इनकी हिंदी में डब की गयी फिल्में काफी पसंद की जा रही हैं. हालांकि मनोरंजन की कोई सरहद नहीं होती है, लेकिन जो पश्‍चिम का है वही श्रेष्ठ है, यह भावना मूलभूत रूप से सही नहीं कही जा सकती है. विदेशी फिल्म निर्माता भारतीय बाजार की ताकत समझ गये हैं, इसलिए, वे अपनी फिल्में यहां आकर हिंदी में डब करके हमें दिखा रहे हैं और हम शान से देख रहे हैं. यह एक ऐसी चीज है, जिसके प्रति इंडस्ट्री को सजग रहना चाहिए. क्योंकि अंगरेजी फिल्मों की कामयाबी हमारे यहां नकल की प्रवृत्ति को बढ.ावा दे रही है. उनकी नकल में अपनी धरोहर को खो रहे हैं. दरअसल भारतीय फिल्मों में नकल की अकल पुरानी है जो अब और बढ. रही है. भारतीय फिल्मों को भारतीय फिल्मों की तरह बनने कोशिश करनी चाहिए, लेकिन यहां कई निर्देशकों की कोशिश हॉलीवुड की तरह बनने की तरह होती है. यही वजह है कि हॉलीवुड उन्हें पसंद नहीं करता. 

यह एक बड़ी हकीकत है कि शुरुआत में हिंदी सिनेमा जब भारत की मिट्टी से जुड़ा हुआ था, उसी दौर में भारत में ऐसी फिल्में बनी जिन्हें आज भी भारती क्लासिक्स, विश्‍व क्लासिक्स का दर्जा दिया जा सकता है. लेकिन दशकों तक हमने ऐसी फिल्में गिन-चुन कर ही बनायीं, जिस पर हम सचमुच नाज कर सकते थे. इसके पीछे सिनेमा में छायी अंगरेजियत को ही वजह माना जा सकता है. भारत में जैसा है वैसा शायद ही कहीं और हो. दूसरे देशों की फिल्में अपने खास फ्लेवर के साथ हमारे सामने आती हैं. इस मामले में ईरानी फिल्मों का उदाहरण देखा जा सकता है. नकल में कलात्मकता नहीं होती है. हां इससे कमाई की जा सकती है. दिक्कत यह है कि भारत में हिंदी फिल्में भी ओवरसीज मार्केट को ध्यान में रखकर बनाने का प्रचलन बढ.ा है. सिनेमा में भारतीयता लंबे अरसे तक गायब रही. कुछ अपवादों को छोड़ दें तो हिंदी साहित्य से रिश्ता न के बराबर रहा. अभी भी सिनेमा को चलाने वाले इसकी अहमियत नहीं स्वीकार करते, यही कारण है कि हिंदी फिल्में दुनिया में अपनी पहचान नहीं बना पायी हैं. 

जब तक आप अपनी कहानी अपने अंदाज में नहीं दिखाएंगे सुनाएंगे तब तक कोई आपकी फिल्मों को क्यों देखेगा. अगर किसी को देखना हो, तो वह हॉलीवुड की फिल्में ही क्यों नहीं देखेगा, बजाय कि उसकी नकल देखेगा! भारत में ही देखिए हॉलीवुड की फिल्में भारत की नकल करके तो बन नहीं रहीं. हम उनकी कहानी देखते हैं, बस भाषा हिंदी होती है. उन्होंने अपनी मौलिकता बरकरार रखी है. वे अपनी चीजें ही आकर हमें हमारी भाषा में परोस रहे हैं और हम बेहद दिलचस्पी से उसे देख रहे हैं और उनका मान बढ.ा रहे हैं. उनके बाजार में भी हमारी हिंदी भाषा से ही फायदा हो रहा है. 

हाल में फिल्मों में आयी नयी पीढ.ी ने जरूर कुछ उम्मीद जगायी है, लेकिन इनमें से कई ऐसे हैं, जो ट्रीटमेंट और कहानी दोनों के स्तर पर अंगरेजी से आक्रांत नजर आता है. जो लोग इससे बाहर निकल पायेंगे वे ही हिंदी सिनेमा को आगे ले जा पाएंगे. हिंदी सिनेमा की अंगरेजियत सिर्फ भाषा से जुड़ा हुआ मसला नहीं है. यह हमारी सोच और कलात्मक विकास से जुड़ा हुआ मामला है. सच्चाई यह है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री चाहे कितनी भी बड़ी हो गयी हो, लेकिन यह पूरी तरह भारतीय नहीं हो पायी है. और भारतीय नहीं हो पाने के कारण ही यह अंतरराष्ट्रीय भी नहीं हो पायी है. अनुप्रिया अनंत से बातचीत पर आधारित

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