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20140802

रमजान व प्यार


केबीसी के एक विज्ञापन में हिंदू परिवार का लड़का केबीसी में शामिल होता है. जब वह रवाना हो रहा होता है तो पड़ोस के मुसलिम परिवार और लड़के के परिवार में छींटाकशी होती रहती है. लेकिन अचानक केबीसी के फॉन आॅफ फ्रेंड में लड़का उसी मुसलिम परिवार के चाचा को फोन करके पूछता है कि अस सलाम वालेकुम का क्या अर्थ होता है चाचा. मुसलिम पड़ोसी उसे बताते हैं और वह केबीसी जीत जाता है. और दोनों पड़ोसी गले लग जाते हैं. दरअसल, भारत की यही संस्कृति है. हम अकेले जिंदा नहीं रह सकते. सफल नहीं हो सकते. यहां जो इज्जत देवी दुर्गा के आहुवाहन को मिलती है. वही सम्मान खुदा की इबादत को भी मिलनी चाहिए. पिछले दिनों शिवसेना के कुछ कार्यकर्ताओं ने जिस तरह रोजे के दौरान मजदूरों को जबरन रोटी खिलवा कर उनका रोजा तोड़ने की कोशिश की. यह निहायत ही शर्मनाक बात है. भारत लोकतांत्रिक देश है. यहां किसी जाति धर्म पर किसी की जोर जबरदस्ती नहीं चल सकती. लेकिन अफसोस की बात यह है कि ऐसे मुद्दे अब केवल अखबार और मीडिया में गंभीरता से नहीं दिखाये जा रहे. यह मुद्दा मुद्दा ही नहीं बन रहा. ऐसे कई हिंदू हैं जो रोजा रखते हैं. कई फिल्म स्टार्स भी हिंदू होने के बावजूद रमजान में रोजा रखते हैं. इफ्तार के वक्त सब मिल जुल कर, प्यार बांटते हैं. फिर ऐसे में रोजा के साथ यह खिलवाड़ सही नहीं. यह जबरन धर्म को भड़काना है. विज्ञापन इंडस्ट्री की इस बारे में सराहना की जानी चाहिए कि वे लगातार अपने विज्ञापनों के माध्यम से हिंदू मुसलिम एकता की बातें दर्शा रहे हैं. यह बेहद जरूरी है कि ऐसे मुद्दों पर गंभीरता से बात हो. ताकि जो आज हुआ फिर दोबारा न दोहराया जाये. वरना, यह संकेत है कि आनेवाले वक्त में किस तरह फिर से हिंदू मुसलिम हिंसा को बढ़ावा दिया जायेगा.

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