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20140910

वास्तविक जिंदगी के जय वीरू


दोस्ती का दिन बीत चुका है।  पिछले कई सालों से यह दिन अगस्त के पहले रविवार को मनाया जा रहा है।  शायद जिसने भी यह दिन तय किया है उसके जेहेन में यह बात रही होगी कि रविवार का दिन चूंकि छुट्टी का होता है तो दोस्तों और यारों को एक दूसरे के साथ वक़्त गुजारने का वक़्त मिल जायेगा।  भले ही दोस्ती के मायने बदल चुके हैं।  लेकिन दोस्ती मनाने का दिन नहीं बदला है।  अब दोस्तों की किस्में भी बदल गई हैं। फेसबुक और ट्विटर के दोस्त भी जिंदगी का हिस्सा बन गए हैं।  साथ ही  दोस्ती करने और निभाने के तरीके भी बदल चुके हैं। पिछले दिनों अनुपम खेर के शो में ओम पूरी और नसीरुद्दीन शाह आये थे।  ओम पुरी  ने बार बार ये बात दोहराई कि आज वे जिस मुकाम पे हैं वह दोस्तों के कारण ही हैं। किस तरह नसीर साहब ने उन्हें फिल्म संस्थान आने के लिए प्रेरित किया।  किस तरह नसीर साहब ने ओम पुरी को किसी टीवी के इंटरव्यू में जाते वक़्त अपनी शर्ट उतार कर दे दी थी।  किस तरह ओम की अग्रेजी भाषा को नसीर साहब ने ही दुरुस्त किया।  क्या आज हम ऐसी दोस्ती की कल्पना कर सकते हैं।  नसीर और ओम वाकई वास्तविक जिंदगी के जय वीरू हैं।  क्या वाकई आज हम बिना किस मकसद और अपना नुक्सान और फायदे के दोस्ती निभा सकते हैं।  आज तो दोस्त अपना क्रेडिट कार्ड भी इसलिए इस्तेमॉल करने के लिए देता है।  क्यूंकि इससे उसे पॉइंट्स मिलते हैं।  यानी मुनाफा भी उनका।  ओम और नसीर के बीच एक बात गौर करने की है कि ओम नसीर के बारे में अपनी राय देते जा रहे थे।  नसीर के चेहरे से कहीं इस बात का गुरुर नहीं झलक रहा था कि उन्होंने ओम पुरी पे कितने एहसान किये हैं।  जबकि वर्तमान में हम जिसे दोस्त मानते हैं उन्हें अगर अपने पैसे से बर्गेर भी खिला दिया तो वक़्त आने पर दोहराते हैं कि मैंने उसे खिलाया था।  दरअसल , हकीकत यही है कि जैसे वक़्त की मार जिंदगी के हर पहलू पर पड़ी है।  दोस्ती के रिश्ते पे भी पड़ी है।  हालाँकि फिल्म हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया , किक और हीरोपंती जैसी फिल्मों में अब भी दोस्तों के लिए मार खाने और जोखिम उठाते दोस्त नजर आये हैं।  लेकिन वास्विक जिंदगी में ऐसे दोस्तों की तलाश मुश्किल है। हाँ , अब दोस्ती भी फ़िल्मी बातें ही हो गई है।  अब दोस्ती गिव एंड टेक रिश्ते में बदल चुकी है 

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