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20130629

लेखक दिखा रहे कमाल



फिल्म शांघाई जैसे पॉलिटिकल थ्रीलर को देख कर शायद सबसे पहले हमारे जेहन में यह बात आती हो कि इस फिल्म की पटकथा शायद किसी राजनीति के विशेषज्ञ ने लिखी होगी. लेकिन फिल्म के निर्देशक दिबाकर बनर्जी इस फिल्म के लेखन का श्रेय देते हैं उर्मि ज्वूयेकर को. चूंकि उन्होंने इस फिल्म में टिष्ट्वस्ट और टर्न देने में दिबाकर की मदद की. विकी डोनर हाल के सालों में आयी ऐसी फिल्म है, जिसे न केवल बॉक्स आॅफिस पर सफलता मिली, बल्कि इस फिल्म को अंतरराष्टÑीय स्तर के निर्देशकों ने भी सराहा. विकी डोनर की कहानी को कभी कई निर्माताओं ने यह कह कर फिल्म निर्माण से मना कर दिया था कि यह कहानी तो किसी ऐड फिल्म की लगती है. लेकिन लेखिका जूही चतुर्वेदी को अपनी कहानी पर पूरा विश्वास था. सो, उन्होंने हौसला न छोड़ा और लगी रहीं. आखिरकार उन्हें सुजीत सरकार का साथ मिला. पिछले कई सालों से भट्ट कैंप की फिल्में लगातार सफल हो रही हैं. भट्ट कैंप में इन दिनों रोमांटिक जोनर के साथ साथ सस्पेंस थ्रीलर और हॉरर जॉनर की फिल्में भी बन रही हैं. खासतौर से भट्ट कैंप के संवादों की काफी चर्चा हो रही है. यह कमाल कैंप में शामिल एक ऐसी लेखिका का है जो कभी बार सिंगर थीं. शगुफ्ता रफीक़ . निर्देशक मोहित सुरी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें लगातार लिखने के लिए प्रेरित किया. दरअसल, हकीकत यही है कि हिंदी सिनेमा की नयी फेहरिस्त में ऐसी कई महिला लेखिकाओं का नाम शामिल है, जिनकी वजह से फिल्म की नींव रखी जा रही है. उनके लेखन के कायल इन दिनों हिंदी सिनेमा के कई निर्देशक हैं. तभी उन्हें लगातार फिल्में लिखने का मौका मिल रहा है. एक खास बात जो गौर करने की है वह यह है कि महिला लेखिकाओं की कलम से आम लव स्टोरी या आम फिल्मी कहानी नहीं लिखी जा रही, बल्कि वे इनोवेटिव विषयों पर लिख रही हैं. हाल ही में फिल्म गिप्पी प्रदर्शित हुई है. इस फिल्म की लेखिका सोनम नायर हैं. वे फिल्म की निर्देशिका भी हैं. लेकिन गिप्पी के माध्यम से उन्होंने भारत की ऐसी आधी आबादी के बारे में दर्शाने की कोशिश की है, जो खूबसूरत नहीं है. लेकिन फिर भी वह अपनी जिंदगी में खुश रहने की कैसे कोशिश करता है. सोनम नायर ने अपनी जिंदगी की कहानी इस फिल्म के माध्यम से दर्शाने की कोशिश की तो रीमा कागती ने फिल्म तलाश के माध्यम से एक बेहतरीन सस्पेंस थ्रीलर प्रस्तुत किया. जोया अख्तर भी फिलवक्त हिंदी सिनेमा की बेहतरीन महिला फिल्म लेखिका हैं. सकारात्मक बात यह है कि हिंदी सिनेमा के निर्देशक, जहां आज भी पुरुषों का बोलबाला है. वे भी मानते हैं कि महिला लेखिकाओं की सोच आम फिल्मों से अलग होती है. वे विशेष कर संवाद बेहतरीन तरीके से लिख पाती हैं. शायद इसकी वजह यह है कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं अधिक अनुभवी होती हैं. वे आमतौर पर भी पुरुषों से अधिक और अलग नजरिये से जिंदगी के अनुभवों को हासिल करती हैं. किसी दौर में सलाम बांबे ने हिंदी सिनेमा में धूम मचाई थी. इस फिल्म का निर्देशन मीरा नायर ने किया था और उनका लेखन में साथ दिया था सूनी तारपोरवाला ने. सोनी बताती हैं कि उस वक्त जब वह लेखन की शुरुआत कर रही थीं तब वे बिल्कुल नयी थी इस दुनिया के लिए और सलाम बांबे ऐसी कहानी थी, जिसमें संवेदना को बनाये रखना बेहद जरूरी था. सूनी तारपोरवाला ने इस फिल्म की पटकथा यूं ही तैयार नहीं की थी. बल्कि मुंबई के स्ट्रीट के बच्चों के साथ काफी वक्त बिताया था और उसके बाद कहीं जाकर अपने रीयल एक्सपीरियंस पर उन्होंने फिल्म की पटकथा लिखी थी. उस वक्त हिंदी सिनेमा में पटकथा लेखन में महिलाओं की संख्या न के बराबर थीं. लेकिन उन्हें खुशी होती है कि अब कई महिलाएं लेखन के क्षेत्र में न सिर्फ आ रही हैं, बल्कि उन्होंने अपनी पहचान भी हासिल की है. सूनी को बहुत अच्छा लगता है जब किसी फिल्म के क्रेडिट को देखने के बाद लोग कहते हैं कि वाव, इस फिल्म की कहानी किसी महिला ने लिखी है. आॅशम. तब सूनी को लगता है कि वाकई महिलाओं को कितनी उपेक्षित नजर से देखा जाता है.
 शांघाई की शान उर्मि
उर्मि और दिबाकर की पहचान उस वक्त से है, जब दिबाकर खोंसला का घोंसला लिख रहे थे. उर्मि उस वक्त भी दिबाकर के साथ थीं. लेकिन उस वक्त वे किसी डॉक्यूमेंट्री फिल्म का निर्माण कर रही थीं. बाद में दिबाकर और उर्मि ने मिल कर ओये लकी लकी ओये लिखी थी. और उसी वक्त दोनों के जेहन में शांघाई जैसी फिल्म की कल्पना आयी थी. उर्मि से दिबाकर ने कहा कि वह जी जैसी एक पॉलिटिकल फिल्म बनाना चाहते हैं. उर्मि को भी जी काफी पसंद थीं. उन्होंने दिबाकर से कहा कि जी जैसी फिल्म उन्हें लिखनी है. दिबाकर ने उन्हें कहा . ठीक है तुम लिखो. दिबाकर और उर्मि सोचते साथ साथ हैं. और लिखने का काम अलग अलग करते हैं. दोनों ने लिखना शुरू किया. दिबाकर ने महसूस किया कि उर्मि इस फिल्म की कहानी के साथ न्याय कर सकती हैं सो, उन्हें यह जिम्मा सौंप दिया. हालांकि उर्मि से शांघाई से पहले कई फिल्में लिखी हैं. लेकिन उन्हें असन पहचान इसी फिल्म से मिली. उर्मि मानती हैं कि हिंदी सिनेमा में लेखक को लेकर आज भी उदासीनता है. लेकिन यह बात पुरुष लेखक और महिला लेखक दोनों पर ही लागू होती है. कोई खास अंतर नहीं. हर किसी को क्रेडिट हासिल करने में वक्त लगता है. सो, उन्हें भी लगा. लेकिन वे अपने नाम और काम दोनों से संतुष्ट हैं.

भट्ट कैंप की शगुफ्ता
शगुफ्ता रफीक जब युवा थीं. तब से जब भी वह कोई फिल्म देखतीं तो उसे वह अपने अंदाज में दृश्यों को सोच कर लिखती थीं. उन्हें लिखने का और दृश्य गढ़ने का शौक हमेशा से रहा. लेकिन घर की ऐसी परिस्थिति थी कि वह कभी इस बारे में सोच नहीं पायीं. मां की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. सो, वे रात में बार में गाना गातीं और दिन भर प्रोडयूसर के घरों के चक्कर लगातीं ताकि उन्हें फिल्में लिखने का मौका मिले. वे फ्री में भी काम करने को तैयार थीं. लेकिन उन्हें काम नहीं मिला. एक दिन वह भट्ट कैंप गयीं. वहां भी उन्हें कई बार लौटाया गया. बाद में कलयुग के दौरान  भट्ट कैंप के लेखक बीमार पड़ गये थे. तो कलयुग का कुछ हिस्सा शगुफ्ता ने लिखा और वही से उनकी जर्नी शुरू हुई. मोहित सूरी के साथ उन्हें लगातार लिखने का मौका मिला और उन्होंने वो लम्हे से लेकर अब तक मोहित की सारी फिल्मों का लेखन शुरू किया. हाल ही में प्रदर्शित आशिकी 2 की पटकथा लेखक भी शगुफ्ता रफीक ही रही हैं.

इला बेदी दत्ता
इला बेदी ने टेलीविजन के लिए लंबे अरसे तक काम किया है. बाद में उन्हें करन मल्होत्रा के साथ अग्निपथ में काम करने का मौका मिला. करन मल्होत्रा की अग्निपथ की लेखिका वही हैं. रॉफ लैला का किरदार उन्होंने ही गढ़ा. वे मानती हैं कि अब हिंदी सिनेमा में महिला लेखिकाओं का स्वागत हो रहा है. करन खुद मानते हैं कि अग्निपथ में जिस तरह से इला ने अपनी लेखन ने आग लगायी है. उनके लेखनी में एक स्पार्क है. जिसे उन्होंने बखूबी अपनी कहानियों में गढ़ा है. वे एक् शन थ्रीलर लिखना पसंद करती हैं . साथ ही उन्हें एक् शन ड्रामा लिखने में खास दिलचस्पी है.  इला मानती हैं कि अब हिंदी फिल्म जगत में कुछ भी नामुमकिन नहीं. यहां नये और फ्रेश लोगों को जमकर मौके मिल रहे हैं. उनका मानना है कि कंटेट ही अब किंग है.

जूही चतुर्वेदी की विकी डोनर
जूही चतुर्वेदी ने विकी डोनर की कहानी कई निर्देशकों को सुनाई थी. लेकिन निर्देशकों ने उनकी कहानी को खास नहीं समझा. सभी उन्हें राय देते थे कि वह ऐड वर्ल्ड की ही लेडी हैं तो उन्हें ऐड वर्ल्ड में ही रहना चाहिए. उन्हें किसी भी तरह से फिल्मों की दुनिया में नहीं जाना चाहिए. सब उन्हें विकी डोनर की कहानी के बारे में कहते थे कि इस पर विज्ञापन बन सकता है . ेलकिन फिल्म नहीं. लेकिन एक विज्ञापन शूट के दौरान जूही को सुजीत सरकार का साथ मिला और उन्होंने फिल्म की स्क्रिप्ट उन्हें सुनायी. सुजीत ने हां कह दिया और विकी डोनर जैसी फिल्म बन कर दर्शकों के सामने आयी. जूही ने कहा कि उन्हें शुरुआती दौर में थोड़ी परेशानी हुई. लेकिन व मानती हैं कि अगर आपके पास कुछ टैलेंट है तो यह इंडस्ट्री आपके हुनर को पहचान ही लेती है.
मेघा रामास्वामी : एफटीआइआइ से पढ़ाई पूरी करने के बाद मेघा ने बिजॉय के फिल्म शैतान में साथ साथ लेखन शुरू किया. मेघा का मानना है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री आजकल किकएश स्टोरी पर विश्वास करती हैं. मेघा मानती हैं कि सूनी ने सलाम बांबे  और हनी ईरानी ने डर और कृष जैसी फिल्मों के लेखन से महिला लेखिकाओं को इस क्षेत्र में आने का मौका दिया. कामना चंद्रा ने चांदनी और करीब का लेखन किया था.

रीमा कागती : रीमा कागती बचपन से ही टिन टिन मैगजीन में लिखा करती थीं और उन्हें उस वक्त से ही लेखन का शौक था. बाद में लगान में उन्हें आशुतोष ग्वारिकर के साथ कामकरने का मौका मिला. फिर जोया अख्तर के साथ उन्होंने कई फिल्में लिखीं. रीमा जेंडर बायसनेस को बिल्कुल नहीं मानतीं. 

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