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20130108

जड़ से कटते फिल्मकार



 हाल ही में मुंबई में आयोजित एक साहित्यिक महोत्सव में फिल्ममेकर मीरा नायर आयी थीं. मीरा नायर की पहली फिल्म सलाम बांबे थी. इस फिल्म से ही मीरा ने खुद को स्वतंत्र फिल्मकार के रूप में स्थापित कर दिया था. इसके बाद वे लगातार मानसून वेडिंग व कई फिल्मों से विश्व स्तर पर फिल्में बनाने में कामयाब रही हैं और स्थापित नाम बन चुकी हैं. मीरा ओड़िशा के राउरकेला से हैं. इसी महोत्सव में राउरकेला से आये एक मीडिया रिपोर्टर ने मीरा से एक सवाल किया कि वह उड़िया सिनेमा जगत के लिए क्या कर रही हैं. क्या वह वहां के लिए फिल्में बनायेंगी या फिर उनकी कोई योजना है इस जगत के लिए. उनका जवाब था कि हां वे कुछ तो करेंगी. लेकिन तीन चार सालों के बाद. इससे पहले जब वह श्याम बेनेगल से बात कर रही थीं तो बार बार राउरकेला में बिताये अपने बचपन और उनकी यादों की बात कर रही थीं और यह भी जताने की कोशिश कर रही थीं कि उन्हें वहां से कितना प्यार है. लेकिन बात जब फिल्म जगत के लिए कुछ योगदान की आयी तो उन्होंने तीन चार साल का हवाला देते हुए कहा कि वे कुछ न कुछ जरूर करेंगी. दरअसल, वर्तमान के फिल्मकार अपने शहर या अपने प्रदेश को लेकर सिनेमा बनाने के बारे में न तो सोच रखते हैं और न ही इच्छा. इसकी एक बड़ी वजह यह जरूर है कि उन्हें राज्य सरकार से बहुत मदद नहीं मिलती. लेकिन इसका एक पहलू यह भी हो सकता है कि अगर मीरा नायर जैसे बड़े नाम दिल से इच्छा करें और कुछ करना चाहें तो राज्य सरकार उनकी बात जरूर सुनेंगे. यह बात सिर्फ मीरा पर नहीं बल्कि बिहार, झारखंड के कई फिल्मकारों पर भी लागू होती है. आज भी कोलकाता के फिल्मकार बांग्ला फिल्म बनाना अपनी जिम्मेदारी समझते हैं. मराठी फिल्मों का भी विकास हो रहा है.लेकिन झारखंड बिहार ओड़िशा के फिल्मकार जमीन से कटते जा रहे हैं.

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