My Blog List

20160217

प्यार में फितूर जरूरी नहीं : कट्रीना कैफ


कट्रीना कैफ फिल्में करें या न करें. परदे से वे दूरी भले ही बना कर रखें. लेकिन उनके प्रेम प्रसंग हमेशा ही चर्चे में रहते हंै और इस बार तो उनकी फिल्म फितूर ही एक प्रेम कहानी है. उनका मानना है कि लंबे अरसे के बाद उन्होंने कोई ऐसी प्रेम कहानी में काम किया है. 
फिल्म को हां कहने की खास वजह क्या रही?
मैंने उपन्यास पढ़ी थी. बहुत साल पहले. ग्रेट एक्सपेक्सटेशन. जिस पर यह फिल्म है. यह उपन्यास मेरी पसंदीदा उपन्यास में से एक रही है. बहुत ही रोमांटिक कहानी है.लार्जर देन लाइफ कहानी है. काफी ड्रामा है. काफी प्यार है. मुझे हमेशा से यह लगता था कि इस पर बहुत अच्छी फिल्म बन सकती है. और जब मैंने यह सुना कि अभिषेक यह फिल्म बनाने वाले हैं तो मुझे उसी वक्त एक कनेक् शन सा महसूस हो गया था. मुझे लगा कि यह फिल्म मेरे लिए है. ऐसा नहीं है कि मैं फिरदौस की तरह हूं वास्तविक जिंदगी में इसलिए कनेक् शन हुआ. लेकिन कुछ कनेक् शन सा दिखा मुझे.अभिषेक के पास क्राफ्ट है. और मुझे लगा कि मुझे इस फिल्म का हिस्सा बनना चाहिए. मुझे लगता है कि लिटरेचर पर फिल्में बननी चाहिए. लेकिन कठिन होता है.चूंकि  काफी बड़ा कैनवास होता है लिटरेचर पर फिल्में बनाने के लिए. ऐसे में अभिषेक अगर थोड़ी कोशिश कर वह कैनवास रच पा रहे हैं तो मुझे लगता है कि यह कमाल की बात है.
किरदार के लिए क्या तैयारी की है?
इस बार मेरे लिए कई चीजें नयी हुईं कि मैंने इस फिल्म के लिए वर्कशॉप से अधिक निर्देशक के साथ कनवरसेशन किया है. बातचीत अधिक की है. ताकि किरदार को समझ पाऊं. डायलॉग कोच की मदद ली है. इस फिल्म में मैंने निर्देशक के दिमाग को समझने की कोशिश की है. वर्कशॉप से ज्यादा. यह एक अलग अनुभव रहा मेरे लिए. यह मेरे लिए कांप्लीकेटेड कैरेक्टर रहा है. बाकी फिल्मों से जुदा किरदार रहा. यह आम रोमांटिक किरदार नहीं है. काम्पलेक्स किरदार है. खास बात यह है कि मैं फिरदौस की तरह बिल्कुल नहीं थी तो मुझे किरदार में ढलने के लिए और वक्त लगा. फिरदौस हमेशा अपने दिमाग से नहीं, बल्कि मां के दिमाग से चलती है. और निजी जिंदगी में मैं एक आत्मनिर्भर महिला हूं. फिरदौस इमोशनल है. जेंटल गर्ल है. सॉफ्ट गर्ल है.लेकिन मैं वैसी नहीं हूं.  हां, मगर मैं यह जरूर मानती हूं कि कुछ किरदार होते हैं जो आपके दिमाग में रह जाते हैं और कभी कुछ ऐसा हो तो आप उस किरदार को याद करते हैं. लेकिन हमेशा उन्हें याद करूं. ऐसा नहीं होता.
कश्मीर को हमेशा मोहब्बत का शहर माना जाता है. वहां की फिजाओं में रुमानियत रही है. ऐसे में आपको मौका मिला कि आप वहां एक प्रेम कहानी में काम करें तो वह अनुभव कैसा था.
जी बिल्कुल. कश्मीर मेरी पसंदीदा जगहों में से एक है. मैं वहां इससे पहले जब तक हैं जान की शूटिंग के लिए भी गयी थी. यह रुमानी जगह है. खास बात यह है कि आप जब कोई कविता या कहानी पढ़ें, जो रुमानी हो तो कश्मीर को देख कर आपके जेहन में यह बात आती है कि यही वह जगह है, जिससे उस कविता या कहानी की जगह मेल खाती है.कश्मीर इतना खूबसूरत शहर है कि महिलाओं की खूबसूरती को भी कश्मीर से कई बार जोड़ा गया है. मुझे याद है, यशजी के साथ जब मैं वहां गयी थी तो यशजी ने ही यह बात कही थी कि अगर औरत की खूबसूरती को एक शब्द में बताना है तो कश्मीर कह दें. वह औरत खुद समझ जायेंगी कि उन्हें क्या कहा जा रहा है. यह मेरे लिए संयोग है कि मेरी जिंदगी की जो रोमांटिक फिल्मों में मुझे इस जगह की साक्षी बनने का मौका मिला है.
रेखा जी के साथ न काम करने का अफसोस है? तब्बू से जुड़ने की खुशी कैसी थी?
रेखा जी के साथ मैंने तीन दिनों की शूटिंग की थी और उनसे मेरा एक गहरा रिश्ता रहा है. वह फिल्मों तक सीमित नहीं है. मैं उनसे यूं भी काफी बातें करती हूं और उनसे काफी कुछ सीखा है. तब्बू जी के साथ पहले से मैं उतनी कनेक्ट नहीं थी. लेकिन जब वह फिल्म से जुड़ीं और उनसे जो कनेक् शन हुआ. जरा भी यह महसूस नहीं हुआ कि वह अभी अभी आयी हैं. वह निर्देशक की सोच के हिसाब से जिस तरह खुद को ढालती हैं और तुरंत माहौल में ढल जाती हैं. यह कठिन है. काफी कुछ उनसे भी सीखा.
प्यार बिना फितूर के संभव है?
नहीं, मुझे लगता है कि प्यार की परिभाषाएं भी अलग-अलग सी हैं. हर किसी के प्यार करने का तरीका अलग है. और हम यह नहीं कह सकते कि कौन सा प्यार सही है. कौन सा नहीं है. किसके तरीके सही हैं. किसके नहीं हैं.यह सबकुछ आपके अंदाज पर निर्भर करता है. इसका यह कतई मतलब नहीं कि जो अपना प्यार बोल कर इजहार न करें, वह प्यार नहीं, क्योंकि उस प्यार में फितूर नहीं. कई लोग होते हैं जो पैसिव लव में यकीन करते हैं. कुछ पोजेसिव होते हैं. कुछ ओवर प्रोटेक्टीव होते हैं. कुछ नहीं होते हैं. तो यह आपके विश्वास पर निर्भर करता है कि प्यार क्या है. प्यार में फितूर जरूरी नहीं. प्यार जरूरी है. मुझे लगता है कि प्यार खूबसूरत है. यह आसान है या कठिन है. पता नहीं. शायद खूबसूरत है तो कठिनाई भी आसान ही लगेगी. प्यार कुछ ऐसा होता है. मेरी समझ से.
अब तक का सफर कैसा रहा?
मैंने काफी सीखते सीखते सीखा है. शुरुआत में आयी तो उस वक्त समझ नहीं पाती थी. क्या करना है. क्या नहीं. अब तक सफलता की क्या परिभाषा है. क्या फार्मूला है. यह सब समझ नहीं पायी हूं. बॉलीवुड प्लानिंग से नहीं चलती. आप इसे प्लान नहीं कर सकते.यह हमेशा मेरे लिए प्रश्न चिन्ह रहा है. मेरे लिए यह किसी ड्रीम के पूरे होने जैसा ही है कि आज मैं वह कर रही हूं, जो मैं करना चाहती थी. यह अलग बात है कि मैं इससे और बेस्ट कर सकती थी या नहीं. लेकिन कम से कम मेरा सपना तो पूरा हुआ है. मैं काफी लकी हूं कि मुझे मौका मिला. वरना, मुझसे काफी टैलेंटेड लोग भी हैं, कई लोग हैं, जिन्हें मौके भी नहीं मिल पाते.

No comments:

Post a Comment