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20160129

यह तो रांची की रंग दे बसंती है...

यह तो रांची की रंग दे बसंती है...
हाल ही में रंग दे बसंती के दस साल पूरे हुए. मैं खुशनसीब हूं कि आज से 10 साल पहले जब रंग दे बसंती सिनेमा थियेटर में देखी थी. उस वक्त इस बात का अनुमान नहीं था कि भविष्य में कभी मुझे अपनी इस पसंदीदा फिल्म के 10 साल पूरे होने के अवसर पर साक्षी बनने का मौका मिलेगा.  रंग दे बसंती ने उन चंद फिल्मों में से एक है, जिसने कई लिहाज से प्रभावित किया था. उस वक्त कॉलेज में अंतिम साल था मेरा. 2006 की बात है. रांची के सुजाता सिनेमा में देखी थी यह फिल्म. दोस्तों के साथ. दोबारा देखी. तब भी दोस्तों के साथ ही. अब सुजाता मल्टीप्लेक्स थियेटर में बदल चुका है शायद. उस वक्त सिंगल थियेटर था. फिल्म लंबे समय तक थियेटर में चली. लेकिन थियेटर से जाने के बावजूद इस फिल्म का प्रभाव जेहन से नहीं गया. वह दौर सोशल नेटवर्किंग का नहीं था. होगा भी तो मैं एक्टिव नहीं थी. न फेसबुक़ न टिष्ट्वटर. यहां तक कि आॅरकुट पर नहीं. और ब्लॉगिंग के बारे में तो मुंबई आने के भी तीन सालों के बाद जाना और जिंदगी में जिनकी बातें मेरे लिए अहमियत रखती हैं, उन्हीं मेंटर्स में से एक शख्सियत के बार -बार प्रोत्साहित करने के बाद अनुख्यान नाम  से ब्लॉगिंग की शुरुआत की. और वाकई उनका शुक्रिया, ब्लॉगिंग के एक ऐसे माध्यम से रूबरू कराने के लिए, जो शब्दों की संख्या की मोहताज नहीं है. जो बार-बार मुझे यह एहसास नहीं कराती, कि मैं परफेक् शनिस्ट नहीं.  बहरहाल, सोशल नेटवर्किंग साइट्स न होने के बावजूद काफी अपडेट रहती थी. वजह यह थी कि हिंदुस्तान अखबार के फीचर डेस्क में काम कर रही थी. और घनश्याम श्रीवास्तव सर के साथ जिन्होंने भी काम किया है. वे जानते होंगे कि घनश्याम सर अपनी टीम को अपडेट और हर दिन नयी सोच, नये आइडियाज लाने के लिए किस तरह प्रेरित करते थे. और मैंने तो जर्नलिज्म ककहरा ही उनकी पाठशाला में सीखा है.खासतौर से किसी पर्व, त्योहार में उनकी कोशिश यही होती थी कि रटे-रटाये तरीके से पन्ने न निकाले जायें. तभी दर्शकों की रुचि बरकरार रहेगी. इसी क्रम में उन्होंने हमेशा युवा लेखकों को प्रेरित किया. उनके जेहन में यह बातें हमेशा से स्पष्ट थीं कि युवा के लिए पन्ना बन रहा तो लिखने वाले भी युवा हों. तभी बात बनेगी. और उनकी इसी सोच की वजह से हमें योगिता बीर,  सौरभ रॉय ,तौसिफ अहमद, विनीत कुमार, शिल्पा श्री, आत्रेयी विश्वास, संयुक्ता, सुरुचि, शिल्पा मिश्रा जैसे कई अच्छे और नयी सोच वाले युवा लेखक मिले थे. ये सभी उस वक्त जेवियर्स कॉलेज से ही मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई कर रहे थे. हर  शुक्रवार हिंदुस्तान सिटी नामक चार पन्नों का फीचर प्रकाशित होता था. उसके संयोजन, परिकल्पना और इन युवा लेखकों के साथ आइडिया मंथन की जिम्मेदारी मेरी थी. इसी दौरान एक इश्यू में शिल्पा श्री का आलेख हमने रीमिक्स सिटी में प्रकाशित किया था. शिल्पा का वह आलेख रंग दे बसंती की तर्ज पर उस मौजूदा दौर के युवा, छोटे शहर के युवाओं को ध्यान में रख कर लिखा गया था. अंदाजा फिल्माना था. मतलब स्क्रिप्टिंग अंदाज में. घनश्याम सर ने तुरंत मंजूरी दी थी. और फीचर के पहले पन्ने पर इसे खूबसूरती से प्रकाशित किया गया था. उस दिन कई युवा पाठकों के फोन आये थे. सभी बधाई दे  रहे थे. कईयों ने कहा था कि यह तो रांची सिटी का रंग दे बसंती है. वेलडन.यकीन मानिए. वह शुरुआती दौर थे नौकरी के. जिस ऊर्जा, उत्साह से उस वक्त हम परिकल्पना करते, स्टोरी प्लानिंग और फिर प्रकाशन के बाद ऐसी सराहना. खुशी और दोगुनी हुई. जब उस आलेख पर मेरे अहम गुरु बीके सिन्हा सर की निगाह गयी. उन्होंने फौरन फोन मिलाया. वे इस बात से वाकिफ थे कि उस दौर में मैं और अमित उनकी गाइडेंस में कुछ नया करने को हमेशा आतुर रहते थे. खासतौर से विजुअल  माध्यम में. उन्होंने एक और आइडिया सुझाया कि क्यों न शिल्पा के इस आलेख को फिल्म का रूप दिया जाये. हमने बिना देर किये. निर्णय लिया. और अपनी इसी ऊर्जावान टीम को तैयार किया. शिल्पा भी चहक उठी थीं. और चहकती भी क्यों न...शुरुआती दौर में अगर लेट्स टू एडिटर लिखने पर भी वाहवाही मिलती तो खुशी होती थी. यहां तो लोगों को उसके लेख पसंद आ रहे थे. यह अफसोस है कि मेरे पास उस आलेख की कॉपी नहीं है. मगर उम्मीद है कि शिल्पा ने जरूर संभाल कर रखे होंगे. बहरहाल, हमने तय किया और टीम बनायी. योगिता, आत्रेयी, सौरभ, तौसिफ, अमित, विनीत, निधि, अतुल के साथ हमने टीम तैयार की. प्रकाशित आलेख को स्क्रिप्ट का रूप दिया. लोकेशन अपने जेवियर्स कॉलेज के कैंटीन से बेहतर और क्या हो सकता था. कुछ घंटों में स्क्रिप्ट का खाका तैयार किया और शूटिंग भी शुरू हो गयी. कैमरामैन अमित अर्ज और उनका हैंडी कैमरा तो हमेशा ही तैयार रहता था. कास्ट से बातचीत शुरू हुई. स्क्रिप्ट में एक किरदार नौकर का भी था. सबकुछ तैयार. बस नौकर किसी को नहीं बनना. कच्चेपन में भी कितना सच्चापन होता है न. कॉलेज कैंटीन में बन रही फिल्म में भी कोई नौकर नहीं बनना चाहता. हैट्स आॅफ कॉमेडी नाइट्स विद कपिल के राजू किरदार कि जिसने नौकर के किरदार से लोकप्रियता हासिल की. हमारी फिल्म को भी आखिरकार एक राजू मिला. विनीत कुमार. विनीत को भी कॉमेडी नाइट्स के राजू से कम लोकप्रियता नहीं मिली इस फिल्म के बाद. और रूबरू के रूप में रंग दे बसंती को समर्पित वह फिल्म बन कर साकार हुई. रंग दे बसंती के 10 साल पूरे होने पर यह ख्याल आया कि हमारी रंग दे बसंती के भी तो दस साल पूरे हो गये....सो, दुनिया नहीं तो न सही कम से कम हमारी टीम को तो याद दिलायी जाये. भले ही हमारी फिल्म परफेक्ट नहीं...लेकिन रांची वही  थे हमारे चंद्रशेखर, वही थे हमारे भगत. सच ही तो कहा था उस पाठक ने कि हमारा तो रंग दे बसंती यही है.वैसे भी कोई भी फिल्म परफेक्ट नहीं होती..उसे परफेक्ट बनाना होता है. रंग दे बसंती का वह खुमार तब भी नहीं उतरा था. बाद में जब प्रभात खबर की युवाओं को समर्पित यूथ प्लस की जिम्मेदारी मिली,तब भी यही टीम और एक महत्वपूर्ण नाम जिनके बिना यह पूरी कहानी ही अधूरी है. हेमंत कुमार. शुक्रिया मेघनाथ सर का, हमारे प्रयासों को बचकाना न कह कर हमें प्रोत्साहित करने के लिए. याद है न सर, एडिंटिंग के लिए हमने आपके ही घर पर कब्जा किया था. शुक्रिया अक्षय मिश्रा दमदार आवाज के लिए, शायद उस आवाज के बिना वाकई सुबह नहीं होती...हम सबने न जाने कितने आलेख, कितने आलेखों के शीर्षक रंग दे बसंती से प्रभावित होकर लिखे थे. रंग दे बसंती के 10 साल पूरे होने पर उन सभी यारों, दोस्तों को याद करने का जी कर दा... क्योंकि बेमौसम भी आम की कच्ची कैरी पेपरबोट के रूप में होंठों तक पहुंचे. तब भी राहत ही देती है...क्योंकि कच्चेपन के  अधूरेपन में जो मिठास है. वह खास है. थैंक्यू राकेश ओमप्रकाश मेहरा व टीम रंग दे बसंती.हमारी इस प्रेरणा के लिए.

ये रहा हमारा वाला पेपरबोट...
https://www.youtube.com/watch?v=PV5tUnm4NJQ

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