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20131127

ड्रामा क्वीन

सुचित्रा कृष्णमूर्ति ने ड्रामा क्वीन नामक एक किताब लिखी है. इस किताब में उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत से लेकर अपनी बीमारी, अपने जीवन के बारे में भी कई बातें की हैं. मुख्यत: फिल्मी दुनिया के बारे में उन्होंने कुछ ऐसी सच्चाईयों से सामना कराया है, जिनके बारे में लोग कम बातें करते हैं. कास्टिंग काउच. सुचित्रा ने इस बात का जिक्र किताब में किया है कि किस तरह उन्हें एजेंट का फोन आता था और फिल्म देने के नाम पर उनसे किस तरह की बातें की जाती थीं. सुचित्रा की यह किताब बधाई की पात्र है कि उन्होंने कम से कम हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा होते हुए भी सच कहने की हिम्मत दिखाई है. वरना, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के कई सच से कई लोग रूबरू तो होते हैं लेकिन उन्हें कहने की हिम्मत नहीं रखते. सुचित्रा की बातों से साफ स्पष्ट होता है कि जब वह शेखर कपूर की पत् नी थी. तब उन्हें इस तरह के आॅफर आया करते थे. तो उन लड़कियों का क्या? जिनकी इस इंडस्ट्री में कोई पहचान ही नहीं. दरअसल, यह हिंदी फिल्मों के लिए कोई नयी बात नहीं और यह सिलसिला आज से शुरू नहीं हुआ, बल्कि कई दौर से चला आ रहा है. किसी दौर में मीना कुमारी से एक निर्माता ने उनके इनकार करने पर इस तरह बदला लिया था, कि सीन में बार बार उन्हें थप्पड़ मारनेवाले सीन रखवाये, ताकि मीना को बार बार थप्पड़ पड़े. उस दौर में भी निर्माताओं की पसंद की अभिनेत्री किसी अन्य अभिनेत्री से रिप्लेस कर दी जाती थी. कास्टिंग काउच हिंदी सिनेमा का वह कड़वा सच है, जो बदला नहीं जा सकता. हकीकत यह है कि हिंदी सिनेमा इंडस्ट्री में ही नहीं वरन बाहरी दुनिया में भी लड़कियों को इस दृष्टिकोण से देखा जाता है कि उनकी जरूरत को लोग अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करें. तरुण तेजपाल कांड इसका जीता जागता उदाहरण है. 

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