20120822

रंजिश, बदले की आग



गैंग्स ऑफ वासेपुर में फैजल खान का संवाद है. मां तू चिंता मत कर. तेरा फैजल बदला लेगा. दादा का, बाप का भाई का सबका बदला लेगा. गैंग्स ऑफ वासेपुर 1-2 लगभग उन फिल्मों में से एक है. जिसकी पूरी कहानी दो परिवारों के बीच बदले की भावना पर आधारित है. लगभग कई पीढ़ियां बदले की आग में जलती है और कहानी आगे बढ़ती चली जाती है. कुछ दिनों पहले रिलीज हुई फिल्म इशकजादे में भी दो परिवारों के बीच बदले की भावना के बीच पनपती प्रेम कहानी को दर्शाया गया था. तो दूसरी तरफ फिल्म पान सिंह तोमर में भी पान सिंह तोमर को अपने चाचा से ही जमीन के बंटवारे को लेकर बदला लेते हुए दिखाया गया है. बदले की भावना में जलते हुए दो परिवारों के बीच गालियों और गोली की बरसात की जाती है. दरअसल, हिंदी फिल्मों में बदले की भावना पर आधारित कहानियों को दर्शकों ने हमेशा ही पसंद किया है. इसकी सबसे खास वजह यह है कि दर्शक वर्ग एक आम व्यक्ति ही होता है. जो प्राय: किसी न किसी रूप में निराश है. ऐसे में वह अपनी भड़ास किसी न किसी से किसी न किसी रूप में बदला लेकर ही निकालना चाहता है. वास्तविक जिंदगी में ऐसे कई परिवार होते भी हैं, जहां नफरत की आग में पूरे परिवार के सदस्य शामिल रहते हैं. तो ऐसे में जब रुपहले परदे पर ऐसी फिल्में दिखाई जाती हैं. नायक को लड़ते दिखाया जाता है तो लोगों को लगता है कि वह उनका प्रतिनिधित्व कर रहा है. इसलिए वे उन्हें पसंद करते हैं. हालांकि हिंदी फिल्मों में केवल गालियों व गोलियों के आधार पर ही बदले में जलती कहानियां नहीं दिखाई गयी हैं. कई बार हलचल जैसी फिल्मों के माध्यम से भी नफरत को प्यार में बदलते हुए दिखाया गया है. हालांकि 70-90 के दशक तक ऐसी फिल्में बनती रही हैं, जिनमें नायकों का मुख्य मकसद बदला लेना ही होता था. अजरुन जैसी फिल्में भी इसी श्रेणी में शामिल हैं

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