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20151223

मेरे पिता व मुगलएआजम को ट्रीब्यूट है बाजीराव मस्तानी : संजय लीला भंसाली


संजय लीला भंसाली की फिल्म बाजीराव मस्तानी दर्शकों को लुभा रही है. धीरे धीरे बॉक्स आॅफिस पर बाजीराव मस्तानी का इश्क गहरा होता जा रहा है.जाहिर है इस बात से फिल्म के निर्देशक भंसाली बहुत खुश हैं. आखिर उनका 1 2सालों का सपना साकार हुआ है. भंसाली की फिल्में देखते वक्त दर्शक अलग दुनिया की सैर कर रहे होते हैं और भंसाली की यही चाहत भी होती है. अपनी फिल्म मेकिंग की शैली, किरदारों से उनके प्रेम व कई पहलुओं पर उन्होंने अनुप्रिया अनंत से बातचीत की.

आपने एक सपने को 12 साल तक जिया है. 12 साल पहले देखा गया सपना बाजीराव मस्तानी के रूप में जब बड़े परदे पर साकार हुआ तो पहली बार जब आपने पूरी फिल्म परदे पर देखी तो वह अनुभूति कैसी थी?
बिल्कुल आंख भर जाती है. रुह भर जाती है.क्या क्या गुजरा इस फिल्म को बनाने में.मैंने कितना स्ट्रगल किया. 12 साल में मैंने कितनी बार शुरू की यह फिल्म. तीन बार शुरू की. तीनों बार बंद हुई.तो अंतत: जब वह साकार हुआ तो खुद पर भी भरोसा हुआ कि मेरे अंदर वह ताकत है, जो ठाना, जो सोचा वह करके दिखाया.और इससे ज्यादा खुशी है कि दर्शक इसे प्यार दे रहे हैं.मैं इस वक्त बहुत इमोशनल हूं. मेरे पिताजी का यह ड्रीम था कि मैं कभी मुगलएआजम जैसी फिल्म बनाऊं.उन्होंने मुझे कुछ 18 बार मुगलएआजम दिखायी थी.उसमें 15 बार उन्होंने खुद उठायी थी. यह फिल्म सिर्फ मुगलएआजम को ट्रीब्यूट है. यह फिल्म मेरे  पिता की ड्रीम को ट्रीब्यूट है. वह मुझे हमेशा कहते थे कि देखो फिल्में बननी चाहिए तो मेहबूब खान साहब,  के आसिफ साहब, गुरुदत्त साहब, वी शांताराम साहब, बिमल रॉय, राजकपूर साहब ये सारे फिल्मों के गुरु होते हैं और खासतौर से वी शांताराम, राज कपूर गुरुदत्त और के आसिफ के फैन थे.ये जो देख देख कर मैं बड़ा हुआ हूं. और जब मैं पहली बार बाजीराव मस्तानी को पूरी करने के बाद फिनिश्ड प्रोडक्ट बड़े परदे पर देख रहा था तो मुझे यह बात महसूस हुई कि कुछ हद तक मैं इन सारी फिल्मों का अच्छा स्टूडेंट साबित हुआ हूं. कहीं न कहीं उन्हें सही रूप में ट्रीब्यूट दे पाया हूं. उनकी लेगेसी को कायम रख पाया हूं. वह लीगेसी बॉलीवुड सिनेमा में रहना बहुत जरूरी है, क्योंकि वह हमारा कल्चर है. क्लासिकल, आर्किटेक्चर यह सब हमारी फिल्मों में दिखनी ही चाहिए. हमें इन धरोहरों को भूलना नहीं चाहिए.और लोग कैसे इसे स्वीकार रहे हैं. इस बात से यह साबित होता है कि दर्शक सिर्फ कर्मशियल फिल्में और सिर्फ टाइम पास फिल्में नहीं चाहते. उन्हें भी मिनिंगफुल सिनेमा चाहिए. तो ये इन सारी बातों से मैं टच्चड हूं. जितने सालों से मैं इस फिल्म से जुड़ा था. काम कर रहा था. लगा कि सबकुछ मुझे वापस मिल गया. मैं पिछले 25 सालों से जुड़ा हूं इस इंडस्ट्री से.इतने सालों में मुझे इस फिल्म ने जितना सुकून दिया है. मैं उसे सिर्फ महसूस कर सकता. शब्द नहीं दे सकता.
आपने जैसे कि कहा कि आप वी शांताराम, गुरुदत्त जैसे फिल्ममेकर और उनकी फिल्मों के स्टूडेंट रहे हैं. लेकिन जब आप खुद फिल्म बना रहे होते हैं तो किस तरह कोशिश होती है कि उनसे प्रेरणा ली जाये. नकल न किया जाये?
यह बहुत जरूरी है. मेरा मानना है कि आप कितना भी अपने गुरुजन से सीखो. लेकिन आपकी खुद की पहचान बहुत जरूरी है.आप मेरा म्यूजिक सुनेंगे और देखेंगे तो महसूस करेंगी कि मेरे म्यूजिक में लक्ष्मीकांत जी की म्यूजिक की बहुत छाप है.और उनका म्यूजिक मुझे बहुत पसंद है. लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि मैं उनका गाना उठा कर कॉपी करूंगा.एक एशेंस लूंगा. इंस्पेरेशन लूंगा. और अगर आपको खुद कुछ कहना है किसी फिल्म में. आपके पास खुद बहुत कुछ कहने की चीजें हैं तो उसका अपना तरीका होता है. मैं कभी के आसिफ साहब को कॉपी नहीं करूंगा, मैं क्या उन्हें तो कोई भी कॉपी नहीं कर सकता.वह एक थे और एक ही रहेंगे. लेकिन 55 साल के बाद मैं एक फिल्म बनाऊं और उसमें खुद की भी पहचान न हो.तो यह दुख की बात होगी. लेकिन मुझे लगता है कि कहीं न कहीं उनकी रुह बहुत खुश होगी कि कोई फिल्म ऐसी आयी. जो उस वक्त उन्होंने सोचा होगा कि बिग सिनेमेटिक एक्सपीरियंस वह कहीं न कहीं थोड़ी ही सही लेकिन पूरी हुई है. तो इंस्पेरेशन होना एक फिल्ममेकर के लिए जरूरी है.मैं वी शांताराम जी से बहुत इंस्पायरड हूं. लेकिन मैं उनकी नकल कभी नहीं करूंगा. हां, मगर यह कोशिश होगी कि उनकी फिल्म की तकनीक क्या थी.प्रोसेस क्या था.वह एक इमोशन को कैसे प्ले करते थे. वह एक पोयेटरी गीतों में कैसे लाते थे. वह ट्रीटमेंट कैसे होती थी.तो वह बहुत जरूरी है. और वह सिग्नेचर मुझे लगता है कि सालों साल काम करने के बाद आता है. तब जाकर लोग कहते हैं कि यह इनका सिग्नेचर है क्योंकि उन्होंने आपका पिछला काम देखा होता है.25 साल से लोगों ने मेरा काम देखा है.तो लोग समझ जाते हैं कि यह भंसाली का सिग्नेचर है. और इस सिग्नेचर को पाने के लिए आपको बहुत मेहनत करनी होती है.वहां तक पहुंचना पड़ता है.
आप जब फिल्मों के विषय का चुनाव करते हैं तो खुद को कनविन्स करना कितना कठिन होता है. चूंकि आप अपने विषय को लेकर भी बारीकी से सोचते हैं?
मुझे अब काम करते करते समझ आ जाता है कि मुझे कहां पहुंचना है. मेरी औकाद कहां तक है. मैं वहां तक सोचने और पहुंचने की कोशिश करता हूं अपनी क्षमता को देखते हुए.लेकिन जब तक वह न हो. मैं नहीं छोड़ता, क्योंकि वह मेरा फर्ज है. वो जो एक खुद से कमिटमेंट है कि मैं एक सेकेंड भी ऐसा दिखाऊं जो 100 सालों तक जिंदा रहेगी तो यह मेरा फर्ज है कि मैं जब फिल्म बना रहा हूं तो वह सब डिटेल, वह सब बारीकियां हों, जो एक फिल्ममेकर के रूप में होनी चाहिए.फिर उसमें पैसे  कितने बचेंगे नहीं बचेंगे, टाइम कितना बचेगा. एक्टरों के डेट का क्या होगा.वह सबकुछ नहीं सोचता.सर्चिंग फॉर एक्सेलेंस जो एक चीज है, और वत्त जो इंसान में होता है वही आपको आपके पोंटेशियल को लेकर आगे जाता है. जहां पर आपको लगता है कि वह आपका कांफीडेंस पोंटेशियल है. दरअसल, हर किसी में होता है. लेकिन हम खोलकर खुद को टैक नहीं करते.वह बहुत जरूरी है. अपने आप को स्ट्राइव करना, स्ट्रेच करना,जाना जरूरी है. मैं अपने एक्टर्स, तकनीशियन सबसे भी यही डिमांड करता हूं.परफेक् शन नहीं मिल सकता. लेकिन स्ट्राइव करना जरूरी है.
कनक्लूशन जरूरी नहीं है. सर्च जरूरी है.परफेक् शनिस्ट इल्युशन है. वह माया है. दूर से उसकी चमक सिर्फ दिखती है. आप वहांजाते हैं तो वह और दूर दिखती है. क्योंकि तलाश जरूरी है. इनरिचिंग उससे ही होती है.
आपकी फिल्मों में आंखों से भी संवाद बोले जाते हैं?
जी हां, क्योंकि मैं मानता हूं कि आंखों की भाषा एक अहम भाषा है.बाजीराव में भी आप देखें तो बहुत सारे साइलेंस मोमेंट हैं. जहां सिर्फ म्यूजिक चल रहा है और सिर्फ आंखों की भाषा है. लेकिन बाजीराव में मैंने संवाद अधिक रखे हैं, क्योंकि आपको उस ऐरा की बात इस दौर के आॅडियंस तक पहुंचानी है. और इसलिए यह जरूरी था कि मैं सही तरीके से, सही लहजे से फिल्मों के किरदार संवाद बोलें.संवादों से ही इतिहास लिखा जाता है, संवादों से ही कहानियां लिखी जाती हैं.स्पोकन वर्डस जरूरी हैं.मुझे लगता है कि लोगों को जो बात पसंद आ रही है वह किरदारों के तेवर हैं और जिस तरह से वह संवाद बोल रहा है. तो डॉयलॉग का इस फिल्म में खास महत्व रहा है. ऐसा मैं मानता हूं. और रामलीला में अधिक नहीं थी. क्योंकि रामलीला में फिजिकलैटी की अहम भूमिका थी.लेकिन यहां संवाद को ग्रेसफुल होना और पॉवरफुल होना जरूरी था इस फिल्म में. सो, इस पर विशेष काम किया है मैंने.
आप जिस इंटेंस के साथ फिल्मों का निर्माण करते हैं. आपकी फिल्मों के किरदार दर्शकों के साथ लंबे समय तक रहते हैं. लेकिन बतौर फिल्मकार जब नयी कहानी सोचते हैं तो वे किरदार आपके साथ होते हैं या फिर आप उन्हें छोड़ आगे निकलते हैं?
मेरे दिल में मेरे हर किरदार के लिए एक स्पेशल जगह है. वे मेरे साथ मेरी जिंदगी में होते हैं. लेकिन वे मुझ पर हावी नहीं होते. जब मैं कोई नयी कहानी लिख रहा होता हूं. मेरी कोशिश होती भी नहीं कि मैं उसके अंदर पुराने किरदारों को लेकर आऊं या उसकी छाप लेकर आऊं.हम दिल चुके सनम की नंदिनी देवदास की पारो कभी नहीं बन सकती. दोनों जबकि ऐश्वर्य ने ही प्ले किया था.लीला की दीपिका का बॉडी लैंग्वेज और मस्तानी का बॉडी लैंग्वेंज अप्रोच, थॉट प्रोसेस, उसका एट्टीटयूड, कॉस्टयूम सबकुछ अलग होता है. रामलीला के दो एक्टर दीपिका रणवीर के सिवा रामलीला और बाजीराव मस्तानी में आपको कुछ भी एक नहीं दिखेगा.मेरी खुद की स्टाइल अलग है.
काशीबाई का किरदार गढ़ना कितना कठिन था?. प्रियंका कम दृश्यों में आयीं. लेकिन वह प्रभावित करती हैं.
प्रियंका को इस किरदार के लिए मनाना कठिन था. प्रियंका को ऐसा लग रहा था कि कहीं मैं सपोर्र्टिंग एक्ट्रेस न लगूं.नाम भी फिल्म का बाजीराव मस्तानी है तो मेरा इसमें क्या होगा?ऐसे सवाल थे उनके मन में. लेकिन अच्छा एक्टर फिल्म में लेंथ और सीन नहीं देखता. उसके पांच सीन 50 के बराबर हैं.वह तो कमाल की एक्ट्रेस हैं ही. सो, मैंने उन्हें भरोसा दिया. उन्होंने मुझे. मझे पता था कि पांच सीन में भी वह जमावदार एक्टिंग करके जायेंगी. और प्रियंका में वह रूप भी था. फ्लेक् शबिल्टिी भी थी. वह जो रियेक् शन था काशीबाई का, उसका ग्रेस सबकुछ प्रियंका में था. काशीबाई का किरदार देखिए तो सबसे कठिन था कि वह पति को बांध भी नहीं रही. उसकी खुशी भी जानती है तो उसे मुक्त भी कर रही और नाराजगी भी दिखा रही कि तुम इस कमरे में मत आना.यह एक रिवोल्यूशनरी स्टेप था कि जो रिश्ता खत्म है. उसको बांध कर क्या रखना. लेकिन उसे कमरे में भी मत आने देती वह डिग्नीटी रखती है अपने लिये. तो यह स्ट्रांग कैरेक्टर था. आप उस दौर में सोचें और फिर काशीबाई के बारे में सोचें. उसके लिए इज्जत और बढ़ जाती है.
आपकी फिल्मों में रंग, लाइट और वक्त भी एक किरदार होता है?
मैं कभी ऐसा कुछ विचार करके तय नहीं करता. मुझे स्पोनटेनियस खयाल आता है.एक नेचुरली जो चीजें प्रो होती हैं वह नेचुरल दिखती हैं.मैं कॉस्टयूम भी एनलाइज नहीं करता. उठा कर तय कर लेता हूं. आॅन सेट, मेरे कॉस्टयूम, मेरे आर्ट डायरेक्टर सबके साथ मिल कर तय करता हूं. स्टडी करके करूंगा तो एक्सपेरिमेंट नहीं कर पाऊंगा. 

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