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20130330

sanjay dutt

सं जंय उस वक्त सिर्फ 3 साल के थे. जब उनके माता-पिता ने उन्हें बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया था. संजू बाबा नहीं चाहते थे कि उन्हें बोर्डिंग भेजा जाये. लेकिन उन्हें जाना पड़ा. वे वहां से मां नरगिस को पत्र लिखते रहते. कि आइ लव यू मॉम. मैं आपसे बहुत प्यार करता हूं. और मैं घर वापस आना चाहता हूं. मैं यहां नहीं रहना चाहता. नरगिस भी बेटे को तसल्ली देती. लेकिन उनका यह निर्णय नहीं बदला. संजय सनवार के ही बोर्डिंग स्कूल में रहे. मां और पापा संजय से मिलने जाया करते थे. लेकिन इसके बावजूद संजय खुश नहीं थे. शुरुआती दौर से ही घर से दूर रहने की वजह से संजय ने अपनी जिंदगी में कम उम्र ही आजादी को खास जगह दे दी. चूंकि वह बाहर थे. सो, उनके माता पिता भी 24 घंटे उन पर नजर नहीं रख सकते थे. सो, वे अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने लगे. मौज मस्ती, दोस्तों के चयन का निर्णय उनका खुद का होता है. वे खुद अपनी जिंदगी के रहन सहन को तय करने लगे थे.  दो बेटियों के बीच इकलौते बेटे की अच्छी परवरिश की लालच में नरगिस और पिता सुनील दत्त ने संजू बाबा को खुद से दूर तो रख दिया. लेकिन शायद वे भूल गये थे कि उनके बेटे को बोर्डिंग स्कूल की नहीं, बल्कि माता पिता के प्यार की जरूरत है. उनकी यही भूल संजू बाबा की जिंदगी में तूफान लेकर आयी. चूंकि कई सालों तक घर से दूर रहने के बाद दोस्तों के बीच कटी जिंदगी की वही दिनचर्या तब भी जारी रही जब वे वापस मीडिल स्कूल की पढ़ाई करने मुंबई आये. मुंबई के एलिफिस्टन कॉलेज में उनका दाखिला हुआ. लेकिन संजू बाबा की पढ़ाई में दिलचस्पी घट गयी. संजू स्कूल के नाम से बाहर जाते. लेकिन स्कूल नहीं जाया करते थे. वे देर देर से घर आते. घर में किसी से बात नहीं करते. अपने कमरे में हमेशा बंद रहते. मां नरगिस को इस बात का एहसास उस वक्त हुआ कि संजू की जिंदगी में कुछ गलत हो रहा है, जब उन्हें कॉलेज से पता चला कि संजू कॉलेज काफी बंक रहे हैं. धीरे धीरे नरगिस ने बेटे पर निगाह रखनी शुरू की. एक दिन कमरे में नशीली पद्धार्थ देखी. कम उम्र में ही गलत संगति में संजू बाबा ने मारीजुना नामक नशीली पद्धार्थ का सेवन कर दिया था. नरगिस जी जान से संजू को इन चीजों से दूर रखने की कोशिश करती. लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था. चूंकि नरगिस की सेहत दिन ब दिन बुरी होती जा रही थी और पिता सुनील का भी पूरा ध्यान नरगिस पर था. यही वह दौर था. जब संजय परवरिश और परिवार से दूर होते गये और उन्होंने गलत रास्ता इख्तियार कर लिया. मां से करीबी होने के बावजूद वे मां से सारी बातें शेयर नहीं करते. गलत संगति में उन्होंने अपना परिवार ढूंढना शुरू कर दिया था. स्थिति और बिगड़ी जब मां नरगिस की मौत हुई. और यही से संजू बाबा की जिंदगी पर ग्रहण लगना भी शुरू हुआ. दरअसल, हकीकत यही है कि कई बार माता पिता अपने बच्चों से अत्यधिक की उम्मीद कर व उनके बेहतर भविष्य की फिक्र में कुछ ऐसे निर्णय ले लेते हैं, जो उन्हें उनकी नजर में तो सही लगते हैं. लेकिन उस एक निर्णय से बच्चे की पूरी जिंदगी तबाह हो जाती है. संजू बाबा उन बच्चों में से नहीं थे, जो घर से दूर रह कर अपनी शिक्षा को बेहतर कर पाते. चूंकि परिवार की निगाह से दूर रहने पर हर बच्चे को अच्छे व बुरी संगति मिलती है. और कई बार बुरी संगति उन्हें अच्छी लगने लगती है. संजय दत्त को पिता सुनील दत्त ने वर्ष 1981 में पहली बार फिल्म रॉकी से बॉलीवुड में भव्य तरीके से लांच किया. एक मां के लिए इससे खुशी की बात और क्या होती कि उनके बेटे की पहली फिल्म रिलीज हो रही है. चूंकि नरगिस खुद अभिनेत्री थी. तो वे चाहती थीं कि उनका बेटा भी फिल्मों में आये और तरक्की करे. संजू बाबा के साथ शुरुआती दौर से किस्मत नेअजीब तरह के खेल खेले. 7 मई 1981 को रॉकी रिलीज होनेवाली थी और 3 मई फिल्म की रिलीज से ठीक 4 दिन पहले मां नरगिस का देहांत हो गया. अपनी जिंदगी में मां की कमी होने के बाद संजू बाबा धीरे धीरे और नशे की गिरफ्त में आने लगे. फिल्म को शानदार कामयाबी मिली. लेकिन संजू बाबा तब भी पूरी तरह अपने करियर पर ध्यान देने की बजाय ड्रग लेने लगे. पिता सुनील पहले ही पत् नी की मौत से टूट चुके थे. वे डिप्रेशन में जा चुके थे. इसी दौरान सुनील को एहसास हुआ कि उनके बेटे को ड्रग की लत लग गयी है. उन्होंने निर्णय लिया कि संजू जर्मनी गये. लगभग आठ महीने के इलाज के बाद संजू वापस आये. इस बार संजय में सकारात्मक बदलाव थे. पिता भी खुश थे. लेकिन किस्मत ने फिर पासा पलटा. संजू की जिंदगी में उनकी पहली पत् नी ऋचा शर्मा आयी. लेकिन ब्रेन ट्यूमर से उनकी मौत हुई. फिर उन्होंने रिया पिल्लई से शादी की. और इसी बीच संजय ने अपनी फिल्मी करियर को भी सुधार लिया. उन्हें रॉकी से जो पहली कामयाबी मिले. इसके बाद उन्हें लगातार फिल्में मिलती रहीं. उनकी फेहरिस्त में उस दौरन लगभग 56 हिट फिल्में दी. लेकिन उन्हें एक बहुत बड़ी कामयाबी मिली फिल्म खलनायक से, जिसमें उन्होंने पहली बार खलनायक की भूमिका निभाई थी. फिल्म ने शानदार सफलता हासिल की. लेकिन इसी वर्ष उनकी सफलता पर फिर से ग्रहण लगा. इसी वर्ष उन्हें सजा सुनाई गयी और वे डेढ़ साल के लिए जेल में रहे. पिता सुनील दत्त ने हर संभव प्रयास कर अपने बेटे की जिंदगी बचाने की कोशिश की.पिता की कोशिशों का ही नतीजा रहा कि उन्हें बेल मिली. इस घटना ने वाकई संजू की जिंदगी पूरी तरह बदल कर रख दी. ठीक उनकी फिल्म लगे रहो मुन्नाभाई की कहानी की तरह. जिस तरह फिल्म मेंं वे इंटरवल से पहले एक माफिया के आदमी रहते हैं और अवैध, गैर सामाजिक कार्य करते हैं. लेकिन जानवी से प्रेम होने के बाद उन्हें एहसास होता है कि वह किस तरह गलत रास्ते पर थे और उन्होंने अपनी जिंदगी में गांधीगिरी को अपना लिया. ठीक इसी तरह संजू बाबा की जिंदगी भी बदली. उन्होंने जेल से लौटने के बाद पूरी तरह से अपने करियर पर ध्यान दिया. उस दौर में जब उनकी फिल्म कुछ कमाल नहीं कर पा रही थी. उन्हें राजकुमार हिरानी की फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस मिली. पहले यह फिल्म शाहरुख खान करनेवाले थे. लेकिन शाहरुख के ना कहने पर यह फिल्म संजय दत्त को मिली. इस फिल्म की कहानी भी संजय की जिंदगी से काफी मिलती जुलती रही. इस फिल्म में भी वह ठग बने थे और अपने माता पिता को धोखा देकर वे झूठी डॉक्टरी की शिक्षा हासिल करते हैं. लेकिन पिता के सामने जब सच सामने आता है तो वह वाकई खुद को उस काबिल बनाते हैं. उनकी जिंदगी में मुन्नाभाई सीरिज ने अहम भूमिका निभायी. फिल्म को अपार सफलता मिली. यह फिल्म संजू के जीवन में अहम इसलिए भी रही क्योंकि इसी फिल्म वे अपने पिता सुनील दत्त के साथ थे. सुनील दत्त के साथ यह उनकी आखिरी फिल्म थी. लेकिन फिल्मों के संवाद जिस तरह लिखे गये थे और सुनील जिस तरह आॅन स्क्रीन बेटे संजय दत्त को ईमानदारी की राह पर चलने को कहते थे. हकीकत में भी वे अपने बेटे से ही यही उम्मीद रखते थे और शायद यही वजह थी कि इस फिल्म के शॉट खत्म होने के बाद हर बार सुनील की आंखों में आंसू होते थे और वे अपने वैनिटी वैन में जाकर घंटों रोया करते थे. खुद विधु विनोद चोपड़ा ने यह बात स्वीकारी थी कि सुनील दत्त इस फिल्म से भावनात्मक रूप से काफी जुड़ गये थे. दरअसल, इस फिल्म में भले ही सुनील दत्त एक पिता के किरदार में थे और मंच पर सिर्फ एक भूमिका निभा रहे थे. लेकिन फिल्म में बोले गये उनके संवाद वास्तविक जिंदगी में उनके बेटे संजय के लिए ही थी. वे संवाद दरअसल, एक पिता की दिल की टीस थी. चूंकि वह चाहते थे कि उनका बेटा जो कि गलत रास्ते पर चला गया था. लौट आये और ईमानदारी से फिर से अपनी जिंदगी की शुरुआत करे. संजय दत्त ने भी अपने पिता सुनील दत्त के दर्द को समझा. तभी उन्होंने अपनी दोबारा नयी जिंदगी शुरू की और फिल्मों पर ध्यान दिया. मुन्नाबाई एमबीबीएस से पहले तक उन पर से निर्माताओं का विश्वास उठ चुका था. लेकिन इस फिल्म की कामयाबी ने फिर से संजू को बॉलीवुड के शीर्ष सितारों में लाकर शामिल कर दिया. फिर आयी इसी फिल्म की अगली सीरिज लगे रहो मुन्नाभाई की कामयाबी ने संजय दत्त को फिर से उनका सम्मान इंडस्ट्री में वापस दिला दिया. इंडस्ट्री ने उनके प्रति अपना रवैया बदला और उन्हें बेहतरीन फिल्में मिलती रहीं. लेकिन इसी दौरान पिता सुनील दत्त की मौत से वे दोबारा टूटे. लेकिन एक पिता को उन्होंने इतनी तसल्ली जरूर दे दी थी कि उनका बेटा भले ही कानून की दृष्टि में गुनहगार हो. लेकिन निजी जिंदगी में उन्होंने खुद को बदला. तब से लेकर अब तक संजय दत्त ने कभी कोई अवैध रास्ता इख्तियार नहीं किया. उन्होंने अपनी छवि को सुधारने की कोशिश की. अपने खानदान पर लगे कलंक को मिटाने की कोशिश की. अपनी मां की याद में पिता द्वारा बनाये गये नरगिस कैंसर संस्थान की देख रेख की. लेकिन परिवार में एक बार फिर से हलचल तब आयी. जब अचानक संजय दत्त ने अपनी दूसरी पत् नी रिया पिल्लई से तलाक लेने के बाद फिल्मों में आयटम सांग करनेवाली मान्यता दत्त से शादी करने का फैसला किया. बहनें नर्मता दत्त और प्रिया दत्त इस निर्णय केबिल्कुल खिलाफ थी.  परेशांिनयों से तो शायद संजय दत्त की ऐसी दोस्ती हो गयी थी कि उन्हें कोई भी खुशी आसानी से नहीं मिलती. आखिरकार कुछ सालों के बाद बहनों ने भाई की पसंद को स्वीकारा. संजय पिछले 10 सालों में काफी बदले. उन्होंने अपनी जिम्मेदारियां समझीं. मान्यता दत्त व अपने दो बच्चों के साथ उन्होंने पहली पत् नी ऋचा र्मा की बेटी त्रिदाशा के पालन पोषण का भी जिम्मा उठाया. एक पिता होने के नाते उन्होंने बेटी की परवरिश में कोई कमी नहीं की. हां, मगर वे बेटी को साथ नहीं रख पाते. साथ ही वे इस बात के हमेशा सख्त खिलाफ रहे कि दत्त परिवार की बेटियां या उनकी बहनें बॉलीवुड में आयें. वर्तमान में इंडस्ट्री में उन्होंने अपनी एक मजबूत जगह बना ली है. पूरा बॉलीवुड चाहता है कि उन्हें दया मिले. और उन्हें राहत मिल जाये. सलमान खान व अजय देवगन से उनकी जिगड़ी दोस्ती जगजाहिर है. पिछले कुछ सालों में संजय दत्त ने न सिर्फ फिल्मों में बल्कि अपने पिता द्वारा बनाई गयी चैरिटी को भी काफी आगे बढ़ाया है. प्रत्येक वर्ष वे घर पर नवरात्रि के मौके पर माता की चौकी रखते हैं, जैसे किसी दौर में उनकी मां रखा करती थी. उनके घर पर आज भी एंट्री लेने के साथ सबसे पहले सामने की दीवार पर मां नरगिस की भव्य तसवीर है. संजय के हर कमरे में मां और बाबूजी की तसवीर है और वे आज भी अपने पिता की बातें सुन कर काफी भावुक हो जाते हैं. चूंकि संजय जानते हैं कि उन्होंने अपने पिता को वे खुशियां नहीं दी, जो उन्हें वे दे सकते थे. उनके पिता को कई बार उनकी वजह से जिल्लत सहनी पड़ी.जबकि वे खुद एक बेहतरीन और पाक साफ व्यक्तित्व थे. कई लोगों के तानें सुने हैं पिता सुनील दत्त ने. खुद संजू बाबा ने एक बातचीत में स्वीकारा है कि उस वक्त उन्हें सबसे ज्यादा तकलीफ होती थी. जब लोग यह बातें कहते थे कि लायक बाप का नालायक बेटा. बाप के पास बहुत पैसे थे सो, बेटा नालायक हो गया. संजय ने अपनी वह छवि सुधारने की बहुत कोशिश की. लेकिन एक बार फिर किस्मत ने उन्हें उनके उसी इतिहास के कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है. जिस वक्त संजू बाबा को यह खबर मिली कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने 5 साल की सजा सुनाई है. वे उस वक्त चैन की नींद सो रहे थे. लेकिन शायद ही उन्होंने सोचा होगा कि उस रात की सुबह ऐसी होगी. कोर्ट का फैसला सुन कर वे रो पड़े. इस बार तो उनका साथ देने के लिए उनके पिता भी नहीं, लेकिन पूरा दत्त परिवार उनके साथ हैं.

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