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20160325

बंदिशें न इन्हें रोकें ...



सरहदों पर खींची लकीरें मिटेंगी. बस दो कदम तुम चलो, दो कदम हम चलें...कुछ ऐसी ही नेक सोच के साथ आगे बढ़ी हैं शैलजा केजरीवाल. जिंदगी चैनल को माध्यम बना कर उन्होंने ही पाकिस्तान और भारत की दूरियों को सृजन के स्तर पर कम करने की कोशिश की है और इस बार भी वे एक ऐसे कांसेप्ट के साथ आयी हैं, जिससे वाकई तसल्ली मिलती है कि हां, यह मुमकिन है कि कम से कम इसी बहाने यहां के झोखे, सरहद पार के झोखों से टकरायेंगे और अमन शांति का गीत गायेंगे. जील फॉर यूनिटी एक ऐसी ही मकसद के साथ 12 फिल्में लेकर आयी हैं,जिनका निर्देशन और निर्माण भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों के प्रसिद्ध फिल्मकारों ने किया है.

 तोड़ना हमेशा आसान होता है. जोड़ना उतना ही मुश्किल. लेकिन आसान काम करना शैलजा को पसंद ही कहा है. शायद यही तो वजह रही है कि जहां एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री 100 करोड़, 200 करोड़ की फिल्में बनाने में लीन है. शैलजा केजरीवाल अपनी सोच और क्रियेटिवीटी के माध्यम से कुछ ऐसी गिरहों को खोलने की कोशिश कर रही हैं, जहां दो देश जब एक साथ आयें तो प्रेम बढ़े. सौहार्द्ध बढ़े. इसी मकसद के साथ जील फॉर यूनिटी भारत और पाकिस्तान के 12 ऐसे फिल्म मेकर्स और उनकी कहानियों को लेकर आये हैं, जिनकी कोशिश है कि अपनी फिल्मों के माध्यम से दोनों देशों में कला का आदान-प्रदान हो. और इस खूबसूरत और नेक सोच को आकार में तब्दील करने के लिए वागा बॉर्डर से बेहतरीन जगह और क्या हो सकती थी. इस आगाज का साक्षी बना वागा बॉर्डर का जीरो लाइन. भारत के छह फिल्म मेकर और पाकिस्तान के छह फिल्म मेकर 12 फिल्में लेकर आये हैं. ये 12 फिल्में जल्द ही दर्शकों के बीच होंगी. यह छह फिल्म मेकर हैं भारत से तिग्मांशु धूलिया, अर्पणा सेन, तनुजा चंद्रा, निखिल आडवाणी, बिजॉय नांबियार, केतन मेहता. पाकिस्तान के फिल्म मेकर्स में सबीहा समर, मेहरीन जब्बार,खालिद अहमद, शाहबाज समर जैसे निर्देशकों का नाम शुमार है.इन फिल्मों की खासियच यह है कि पाकिस्तान के फिल्म मेकर ने भारतीय कलाकारों के साथ भी फिल्में बनायी है.
 ये है पहला कदम : शैलजा केजरीवाल, चीफ क्रियेटिव
जील फॉर यूनिटी एक सोच है, एक पहल है, जिसके तहत भारत व पाकिस्तान की सर्वश्रेष्ठ और सृजनशील प्रतिभाएं एक साथ आकर दोनों देशों के बीच एकता की भावना को प्रदर्शित करेंगी व अपनी कृतियों को एक साथ प्रदर्शित करेंगी.हमने दोनों पक्षों के 12 फिल्मकारों को एक साथ लाकर  इस दिशा में अपना पहला कदम उठाया है. और मैं मानती हूं कि छोटी ही सही शुरुआत होनी चाहिए. ताकि  दोनों देशों के लोग यह जान पायें कि दोनों देशों के आम लोग आपस में मिलना चाहते हैं. सब एक सी चाहत रखते हैं. शांति की चाहत. 12 फिल्में, जिन्हें इस ऐतिहासिक पहल को सेलिब्रेट करने के लिए बनाया गया है. मेरा मानना है कि जब लोग इन्हें साथ-साथ देखेंगे  तो उनके मन में कहीं न कहीं दोनों देशों के लोगों के लिए आपस में सम्मान ही बढ़ेगा. और ये फिल्में एक साथ दोनों देशों में प्रदर्शित होगी. हमारा उद्देश्य यही है कि कला के विविध स्वरूपों के जरिये दोनों पक्षों के लोगों के बीच सांस्कृितक संवाद जारी रखा जाये. कला को किसी भी तरह की बंदिशों या जंजीरों में न जकड़ें.

आम लोगों से पूछें वे तो शांति चाहते हैं :खालिद अहमद
खालिद अहमद पाकिस्तान के मशहूर लेखक, निर्देशक और कलाकारों में से एक हंैं. उन्होंने इस प्रोजेक्ट के तहत फिल्म लालूलाल डॉट कॉम का निर्माण किया है, वे मानते हैं कि यह एक बेहतरीन पहल है. बकौल खालिद अहमद पाकिस्तान के आम लोगों से आप बात करके देखें. वे सभी इस बात से थक चुके हैं. कोई अब लड़ाई झगड़ा, दंगे फसाद नहीं चाहता. मेरा तो भारत से पुराना नाता रहा है. मेरे परिवार के कई लोग आज भी यहां हैं. मैं भी विभाजन के बाद गया.तो मेरी तो कई यादें हैं. मेरी कई मौसियां हैं, उनके परिवार हैं. मेरी फिल्म की कहानी एक इलाका है हमारे यहां पाकिस्तान में, जो कि राजस्थान से काफी मिलता-जुलता है.  राजस्थान की संस्कृति, उसके लोक-संगीत, भाषा भी काफी मिलती-जुलती है. और मुझे लगा कि भारत के लोग इस इलाके के बारे में बहुत नहीं जानते. उमर कोर्ट एक जगह है. वहां के बारे में शायद लोग कम जानते हैं कि वहां हिंदू -मुसलिम दोनों एक तरह की संस्कृति का आदान प्रदान करते हैं. वही पर एक आदमी है लालूलाल यह उसकी कहानी है. इस फिल्म के माध्यम से एक छोटी सी कोशिश है दो देशों को साथ लाने की. यही वजह थी कि जब मुझे इसके बारे में कहा गया तो मैं तुरंत तैयार हो गया. सिनेमा एक मजबूत माध्यम है मेरा मानना है.
अर्पणा सेन, निर्देशिका सारी रात
जब मुझे इस प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी मिली. तो मैंने हां इसलिए हां क्योंकि मेरी फिल्म का विषय भी इस दर्शन से निकटता से जुड़ा हुआ है. मेरी फिल्म 80 मिनट की है. यह कहानी युवा विवाहित जोड़े के बारे में है, जो एक अजनबी के संपर्क में आते हैं, और किस तरह उनके अंदर की पारस्परिक समझ व प्रेम व विवाह के भाव  को पूरी तरह से बदल कर देता है. मुझे पूरी उम्मीद है कि यह पहल कला व सिनेमा के माध्यम से दो देशों को एक साथ लाने में सफल होगी. मुझे खुशी है कि मैंने फिर से इस फिल्म में अपनी बेटी कोंकणा सेन को फिल्माया है. अच्छा लगता है कि वह बिल्कुल रेडी कलाकार है.वह खुद को तैयार रखती है. और फिल्म को लेकर उसका अप्रोच अलग होता है. वह काफी सवाल पूछती है.पूरी तैयारी करती है. मैं इस प्रोजेक्ट के साथ जुड़ कर और पाकिस्तान के फिल्म मेकर से मिल कर भी खुश हूं. इस तरह के माहौल में आप कई नयी चीजें देखते सुनते हैं.


फिल्म- निर्देशक
सारी रात-निर्देशिका अर्पणा सेन, भारत 
लालूलाल डॉट कॉम -निर्देशक खालिद अहमद, पाकिस्तान
दोबारा- निर्देशक बिजॉय नांबियार, भारत
जीवन हाथी- निर्देशक मीनू व फरजाद
लाल बेगम- निर्देशिका मेहरीन जब्बार
गुड्डू इंजीनियर- निर्देशक निखिल आडवाणी
छोटे शाह- निर्देशिका सबीहा समर
टोबा टेक सिंह- निर्देशक केतन मेहता
खेमे में मत झांकें- निर्देशक शाहबाज समर
सिलवट- निर्देशिका तनुजा चंद्रा
बारिश और चाउमिन - निर्देशक तिग्मांशु धूलिया 
मोहब्बत की आखिरी रात  - निर्देशक सिराज उल हक

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