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20160321

हम तो ऋषि दा ऋषि दा कह कर धड़ल्ले से चले जाते थे : दीप्ति नवल


दीप्ती नवल  खुद को बेहद खुशनसीब मानती हैं कि उन्होंने जितनी फिल्मों में भी काम किया, उन फिल्मों का गीत-संगीत जहीन रहा. चूंकि वे खुद संगीत से बहुत राबता रखती हैं और यही वजह है कि उन्होंने एंड टीवी के शो मेरी आवाज ही पहचान है के लिए हामी भरी.

आप खुद को लकी मानती हैं कि आपको जितनी भी फिल्में मिलीं, उनका गीत संगीत सदाबहार बना.
 शुक्र करती हूं कि मैंने ऐसी फिल्मों में काम किया है, जिनमें गाने हैं. मैं उन आर्टिस्ट में से एक हूं, जिनकी फिल्मों में जितने भी गाने रहे. हिट रहे हैं. हिट इस लिहाज से नहीं कि वे सिर्फ सुने गये हैं, बल्कि इस लिहाज से कि वे सारे गाने याद रखे गये हैं. और यह मेरे लिए बड़ी कामयाबी है. जो भी मैंने काम किया है. मैं तो काफी चयन करके काम करती आयी हूं. लेकिन फिर भी मेरे हिस्से अच्छे गाने आये. बात करें तो चश्मएबद्दूर का गीत कहां से आये बदरा. उस गाने का पिक्चराइजेशन मुझे बेहद पसंद है. कथा फिल्म का संगीत भी मुझे बेहद प्रिय है. नसीर और मेरा गाना है मैंने तुमसे कुछ नहीं मांगा...फिल्म कथा का ही. ये सारे गाने कितने मेलोडियस थे. कमला फिल्म का एक गाना... जो कि बैकग्राउंड में है. मैं उससे भी जुड़ी रही हूं. फिल्म अंगूर का गीत है आशाजी ने मेरे लिए गाया है. साथ-साथ के गाने भी बेहद प्रिय है. फिल्म मैंने फिल्म की थी अनकही, संगीत जयदेव साहब जी का है. वह सब मेरे लिए यादगार है. आशाजी ने मेरे लिए बहुत सारे गाये हैं. लताजी ने मेरे लिए जो गीत गाया था. उठइले घूंघटा हम पांच के लिए. लताजी ने गाया है मेरे लिए एक बार चले आओ. वह टाइटिल सांग है. फिर दिल ने पुकारा यह सब मुझे प्रिय हैं.
यानी आपको हमेशा से संगीत में दिलचस्पी रही है.
जी हां, बिल्कुल संगीत तो हमारे रगों में हैं. वो तो हमसे निकल नहीं सकते. हम भारतीय हैं. हमारे यहां तो हर मौके पर संगीत है. फोक चाहिए ही. हर रस्म के लिए. संगीत है ही. और यही संगीत की खूबी है. भारतीय संगीत की खूबी है.
फिर आपने कभी इस विधा को गंभीरता से नहीं लिया?
नहीं, ऐसा नहीं है कि इसे लेकर गंभीर नहीं हूं. शुरू में काफी कोशिशें की. कई बार शुरू किया. लेकिन अनुशासित होकर पूरा नहीं किया. यह कमी मुझे खलती है और बहुत खलती है. लेकिन अब सोच रही हूं कि इसे गंभीरता से करूंगी. इस सीरियल में भी मुझे वह रोल मिल गया है, तो मेरे लिए बड़ी बात है कि मैं अब इसे गंभीरता से सीख सकूंगी. मैं काफी अरसे से अच्छे गुरु की तलाश में थी. मैंने बचपन में संगीत सीखा है. जब बहुत छोटी थी. आज भी कहीं कोई राग बजता है तो मैं कहती हूं कि ये राग मुझे याद है. ये तो वह राग है. वह इस राग का गीत है. तो मुझे लगता है कि मैैं  गा सकती हूं. मुझे उन राग के आरोह अवरोह याद है. पकड़ याद है. लेकिन नाम नहीं याद है. मुझे राग की ऐसी पहचान है कि हां यह गीत किसी राग का तो है. तो मैं वह सबकुछ रिवाइव करना चाहती हूं और मुझे लगता है कि यह शो मेरी जिंदगी में बिल्कुल सही वक्त पर आया है कि मुझे संगीत की तरफ लेकर जायेगा और अभी मेरे पास वक्त भी है.
आशाजी और लताजी दोनों ने आपके लिए प्लेबैक सिंगिंग किया है. उनसे जुड़ी कुछ यादें शेयर करें?
हां,बिल्कुल मेरी कोशिश होती थी उस दौर में कि मैं गानों की रिकॉर्र्डिंग में वहां मौजूद रहूं. हालांकि कई बार नहीं भी रह पाती थी. एक्टर्स का रहना अनिवार्य नहीं होता था. लेकिन चूंकि लगाव था तो मैं जाती थी. मैं अंगूर फिल्म की रिकॉर्र्डिंग के लिए गयी थी. वहां पर आरडी साहब थे, गुलजार साहब थे, आशाजी थीं, सभी लोग जिस मजाकिया अंदाज में और मजे लेकर काम करते थे. मजा आता था उनकी संगत में और खास बात यह है कि मैंने उन तसवीरों को आज भी संजो कर रखा है और आज भी उसे बार बार देखती हूं. तो वे सारी यादें ताजा हो जाती हैं.गुलजार साहब के साथ तो खूब बनती थी. जैसे जयदेव साहब की सारी रिकॉर्र्डिंग में मुझे होना चाहिए था. चूंकि उस फिल्म के सारे गाने मुझे पसंद हैं. लेकिन मैं किसी भी रिकॉर्र्डिंग में नहीं थी. तो इस बात की बहुत तकलीफ हुई थी मुझे. मैं उस वक्त अमेरिका में थी. तो मैं मिस करती हूं कि वह मेरी मेमोरी का हिस्सा क्यों नहीं बन पाया. काश बन पाती उस फिल्म की यादें. लताजी के साथ भी काफी स्रेह मिला हमेशा. उनकी खासियत यही है कि वे काम को लेकर डेडिकेटेड रहीं और छोटे बड़े सभी को सम्मान देती हैं और हमेशा आपको सकारात्मक बातें ही कहेंगी. संगीत स्टूडियो में मुझे याद नहीं कि रिकॉर्र्डिंग के दौरान शायद ही उन्होंने कभी चप्पल पहनी होगी, वे पूजा की तरह संगीत को पूजती रहीं.
आपने एक लंबा सफर तय किया है. कामयाबी भी हासिल की. मुकाम बनाया. अब भी क्या कोई चाहत है, जिसे पूरी करना चाहती हैं?
जी हां, बिल्कुल मैं लिखना चाहती हूं,  संगीत सीखना चाहती हूं. पेंटिंग इन दिनों थोड़ी पीछे रह गयी है. लेकिन धीरे धीरे उसे फिर से ट्रैक पर लाना चाहती हूं. मुझे तो लगा है कि अब तक सीखा ही क्या है. आज भी बहुत सी चीजें हैं जो और सीखना चाहती हूं.
आज भी खुद को ऊर्जा से भरपूर रखने के लिए क्या करती हैं?
मुझे लगता है कि ये जो ललक है न कि अभी आपने सीखा ही क्या है, यही आपको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है. एक आर्टिस्ट में भूख तो रहनी ही चाहिए. आप इत्तमिनान हो गये कि हां मैं तो बहुत ग्रेट हूं और आपकी सारी ख्वाहिशें पूरी हो गयीं तो इसके बाद तो आपका खत्म है. वह लगते रहना चाहिए कि अभी तो कुछ करना है. मौका तो मिला ही नहीं है तो वे चीजें आपको इंस्पायर करना है. मुझे तो लगता है कि अभी तो बहुत सारे रोल करने है. अब तक वे रोल मिले ही कहां हैं. वही एक चीज है जो आपको प्रोत्साहित किये रहती है.
 आपने किरदार की बात कही है. तो वे कौन से किरदार हैं, जिसे आप निभाना चाहेंगी?
अगर कभी मौका मिला तो मैं लता मंगेशकर जी का किरदार निभाना चाहूंगी. अगर उन पर कभी फिल्म बनी तो मैं जरूर करना चाहूंगी. उनकी जिंदगी के दिलचस्प शेड्स रहे हैं. वे काफी रोचक हैं. एक कलाकार के लिए मौके होंगे. उसमें खेलने के लिए. मुझे आशा भोंसले, रेशमा का किरदार, गीता दत्त जी का किरदार निभाने का मौका मिले तो भी निभाऊंगी.
आपको किस तरह के किरदार अधिक आकर्षित करते हैं. कभी नेगेटिव किरदार निभाने के बारे में नहीं सोचा. क्या वजह रही है कि आप नेगेटिव किरदारों में कम नजर  आयी हैं?
जी बिल्कुल चाहत है. लेकिन शायद लोग पहले ही मान बैठते हैं कि मैं नेगेटिव करूंगी ही नहीं. मेरा पर्सोना वैसा नहीं होगा शायद, शुरू से सॉफ्ट स्पोकन रही हूं. एक ये वजह हो सकती है. लेकिन एक टीवी शो था मुक्ति बंधन. उसमें मैंने साध्वी का किरदार निभाया. छोटा सा था. लेकिन मजा आया. क्योंकि उसके ग्रे शेड्स थे. और मैंने उसे एंजॉय किया. अलग था वह अब तक जो भी मुझे आॅफर होते आये थे. आप देखें कि फिल्म एनएच 10 में मैंने थोड़ा सा अलग किया तो मुझे सारे अवार्डस उसी फिल्म के लिए मिल गये.
आप मानती हैं कि जहां कला है, वहां कांप्टीशन है?
हर आर्टिस्ट को तलब रहती है कि हमें अपना बेस्ट करना है. हर किसी से अच्छा करना है. ख्वाहिश होती ही है. मुझे जब लोगों ने चशमए बद्दूर के वक्त कहा था कि वाह क्या नेचुरल एक्ट्रेस है तो मैं उसी वक्त मान बैठती कि वही अचीवमेंट है तो रुक जाती. वह तो शुरुआत थी न. किसी कलाकार को तसल्ली नहीं होनी चाहिए. और इसे ही लोग कांप्टीशन का नाम देते हैं तो हां है कांप्टीशन. ये है तभी तो आप खुद को निखारने की कोशिश करेंगे.  जैसे मुझे याद है, जगजीत साहब ने मुकेश साहब का गाना सुन कर कहा था, काश मैं भी ऐसा गा पाते. इसका यह मतलब नहीं कि जगजीत साहब का अपना मुकाम नहीं. मुझे लगता है कि इसे इंस्पायरड कह सकते. आर्ट में नेगेटिविटी की जगह नहीं है.
पुराने दौर से अब के दौर में फिल्मों में काफी माहौल में, रिश्तों में बदलाव आ चुके हैं? आप इसे कैसे देखती हैं?
हां, बदलाव तो बहुत आ चुके हैं. उस दौर में तो हम बच्चे थे. कोई तैयारी नहीं थी. हम उस दौर में बच्चों की तरह ऋषि दा, कह कर धड़ल्ले से घुस जाते थे. सवाल पूछते थे. फिल्मों में काम न भी करते हों तो हम हर निर्देशक से मिलते थे. उनसे सीखते थे. माहौल दोस्ताना था. तभी तो फारुख जैसे दोस्त मिले. गुलजार साहब के साथ अच्छा वक्त गुजरा. काफी कुछ सीखा. नसीर साहब कई कलाकारों की संगत मिली. लेकिन आज आप किसी भी डायरेक्टर को ऐसे अप्रोच नहीं कर सकते. मैंने सुना है कि आज तो काफी प्रोफेशनल हो गये हैं सब. यंगस्टर्स किसी निर्देशक से यूं ही नहीं मिल सकते. हम तो आये. रोल मिला. सराहना हुई. काम चलता रहा.
अब तक के सफर को किस तरह देखती हैं?
चैलेंजिंग तो रहा है. अपने सिद्धांतों के साथ सुदृढ़ रह कर काम करना कठिन रहा है.  हो सकता है कि सिद्धांतवादी न होती तो और भी चीजें अचीव हो जातीं, कुछ और भी चीजें मिल जाती. कुछ लोग मिल जाते.लेकिन अपने ढंग से रहते हुए 

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