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20130204

सम्मान की हकदार



इन दिनों बॉलीवुड में अवार्ड समारोह की भरमार है. लगातार समारोह हो रहे हैं. इस समारोह के सबसे अहम अवार्ड जिस पर सबकी निगाह रहती है. वह है बेस्ट एक्टर व बेस्ट एक्ट्रेस का पुरस्कार.वर्ष 2012 में निस्संदेह कई महिला प्रधान फिल्में आयीं और दर्शकों ने इन्हें पसंद किया. वर्ष 2012 में हर साल की तूलना में अधिक बेहतरीन फिल्में आयीं. इसमें कोई संदेह नहीं. शायद यही वजह रही कि इस बार हर अवार्ड समारोह में जूरी के लिए यह तय करना काफी कठिन था कि बेस्ट कौन है. इस वर्ष लगभग सभी महत्वपूर्ण अवार्ड समारोह में बेस्ट एक्ट्रेस का खिताब हर बार की तरह विद्या बालन को फिल्म कहानी के लिए मिला. और बेस्ट एक्टर के रूप ेमें सारे अवार्ड रणबीर कपूर को फिल्म बर्फी के लिए और इरफान खान को पान सिंह तोमर के लिए मिले. निस्संदेह दोनों ही बेस्ट भी थे. लेकिन जिस तरह अभिनेताओं में बेस्ट एक्टर का अवार्ड दो एक्टर्स में शेयर किया गया. उस तरह अभिनेत्रियों में भी यह अवार्ड शेयर किये जाने चाहिए थे. चूंकि पिछला साल 2012 इस बात का गवाह है कि यह साल पूरी तरह महिलाओं का रहा. अभिनेत्रियों ने जितनी मजबूत भूमिकाएं इस वर्ष निभायीं. शायद ही किसी वर्ष निभाई होंगी. फिर चाहे वह श्रीदेवी की फिल्म इंगलिश विंगलिश हो या रानी मुखर्जी की अय्या. प्रियंका चोपड़ा ने अपने करियर का बेस्ट बर्फी में दिया है. बर्फी में जितना बेहतरीन काम रणबीर कपूर ने किया. प्रियंका ने भी किया. लेकिन उन्हें किसी भी अवार्ड समारोह में यह सम्मान नहीं मिला. जबकि रणबीर कपूर पर फिल्माये गये कई सीन तो नकल के थे. अगर किसी ने फिल्म में मौलिकता से अपने किरदार को निभाया तो वह प्रियंका थीं. लेकिन इसके बावजूद वे वंचित रहीं. ऐसा क्यो? कि अभिनेताओं को उनके हिस्से का सम्मान मिले और अभिनेत्रियां वंचित रहे. पुरस्कार समारोह में अभिनेत्रियों को भी अवार्ड शेयर करने का मौका मिलना चाहिए था. दरअसल, हकीकत यही है कि अब भी हिंदी सिनेमा में महिलाएं  पुरुषों से पीछे ही हैं. उनके साथ किसी न किसी रूप में पक्षपात होता ही है. जबकि लगातार अभिनेत्रियां अपने किरदारों से साबित कर रही हैं. हिंदी सिनेमा में आज से नहीं शुरुआती दौर से ही पुरस्कारों में पक्षपात किया जाता रहा है. लेकिन आज के दौर में अभिनेत्रियां पुरस्कारों का खंडन  नहीं कर पातीं. दिल में भले ही उन्हें अफसोस होता होगा. मलाल होता होगा. लेकिन वह इसे कभी जाहिर नहीं होने देतीं. जबकि उन्हें सम्मान मिलना ही चाहिए.

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