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20160711

स्वतंत्र सिनेमा बनाना कठिन तो है लेकिन सफर मजेदार है : अशोक यादव


कैरी आॅन कुत्तों... फिल्म के शीर्षक ने ही बॉलीवुड में इस फिल्म को चर्चित बना दिया था. फिल्म के निर्देशक अशोक यादव मनोरंजन के साथ फिल्म में व्यंग्यात्मक तरीके से अपनी बात रख रहे हैं.  अशोक की यह फिल्म स्वतंत्र फिल्म के रूप में उभरी है. वे इस सफर को बेहद रोचक तरीके से तय करते आये हैं.फिल्म के बारे में विस्तार से उन्होंने अनुप्रिया अनंत से बातचीत की.

 शुरुआत कैसे हुई
मैं मध्य प्रदेश के छोटे से शहर दतिया से हूं, जहां से मैंने अपनी प्राथमिक शिक्षा हासिल की, इसके बाद मैं ग्वालियर, इंदौर और दिल्ली में रहा. जहां मैंने आगे की पढ़ाई पूरी की. फिर अंतत: मुंबई आया. आखिर यह मेरी मंजिल जो थी. चूंकि मैं फिल्म मेकिंग को लेकर बहुत ज्यादा क्रेजी था. हर भारतीय दर्शक की तरह मैं भी हिंदी फिल्म का दर्शक रहा हूं. और जब मैं कॉलेज में था. उसी दौरान मैंने अपने एक दोस्त की शॉर्ट फिल्म देखी थी. वह फिल्म ब्लैक एंड वहइट में थी. वही से मेरा प्यार जागा. वहां से मैंने कैमरा खरीदा और काम शुरू किया. मैंने अपनी मां की सोने की चेन बेंच दी थी. जो उन्होंने मुझे गिफ्ट की थी. मैंने शॉर्ट फिल्मों से ही एक्सपेरिमेंट करना शुरू किया. मैंने मोबाइल से फिल्में बनायी, मेरी मोबाइल से बनी फिल्म एडवेंचर्स आॅफ मिस्टर आइ को बेस्ट फिल्म अवार्ड मिला इंटरनेशनल सेलफोन सिनेमा प्रतियोगिता में.
 मुंबई का सफर
यहां से मेरा नया सफर शुरू हुआ. मैं मुंबई आया. मेरा कोई कनेक्शन नहीं है फिल्म इंडस्ट्री में. मुझे अशोक मेहता सर के साथ काम करने का मौका मिला, जो कि लीजेंडरी सिनेमेटोग्राफर माने जाते हैं. उन्होंने शूटिंग के आखिरी दिन कहा कि किसी को अस्टिट मत करो. बस काम शुरू करो. और फिर वहां से मैंने अपनी जर्नी की शुरुआत की. 
कैरी आॅन कुत्तों की कहानी
कैरी आॅन कुत्तों ऐसे टीनएजर्स की कहानी है, जो काफी क्रांतिकारी हैं. बलिया की कहानी है. फिल्म के को राइटर हिमांशु ओंकार त्रिपाठी हैं. वे खुद बलिया से हैं तो उन्हें वहां के बारे में काफी जानकारी है. याह जगह अपने क्राइम में रिबेलियस नेचर के लिऐ बहुत जानी जाती है. मेरा गांव भी इस वजह से जाना जाता है. और बचपन से यह सारी बातें सुनता आ रहा था. तो मुझे लगा कि इस पर फिल्म बननी चाहिए.और मैं चूंकि इससे वाकिफ हूं तो अच्छी तरह से अपनी कहानी कह पाऊंगा.
स्वतंत्र फिल्म बनाना एक चुनौती
हां, यह सच है कि  स्वतंत्र फिल्म बनाना एक चुनौती होती है. आपको फिनांशियल ही नहीं कई परेशानियों से जूझना होता है. फिल्म का पूरा प्रोसेस अलग होता है. लेकिन आपके पास सर्पोटिव टीम हो तो काम आसान हो जाता है. फिर काफी मजा आता है. हर दिन आप पोजिटिव एनर्जी के साथ काम करते हैं. लेकिन यह है कि ऐसी फिल्में बनाते हुए आप सबकुछ सीख जाते हैं. यह लर्निंग प्रोसेस मैंने एंजॉय किया है.  
फिल्म का अंदाज
चूंकि मैं और मेरे को राइटर रत्ती से हैं तो हम जानते हैं कि वहां किस तरह की बोली बोली जाती है. तो हमारे लिए यह गढ़ना बहुत कठिन नहीं था. हमारी कोशिश रही कि हमारे एक्टर्स एक्चुअल डायलेक्ट में ही बात करें. एंबीयंस भी सही रहे. सबकुछ स्वभाविक लगे. बनावटी न लगे. ताकि छोटे शहर का वह माहौल बड़े परदे पर सच नजर आये. 
कैरी आॅन कुत्तों शीर्षक क्यों
फिल्म में कैरी मेरे किरदार का नाम है और कांदिबरी दूसरा किरदार है जो अपनी ड्रीम को पूरा करने के कोशिश में लगा रहता है. वह मिलिनेयर बना चाहता है. इस तरह कैरेक्टर्स को लेकर फिल्म का शीर्षक सोचा. टीनएजर्स को भी ध्यान में रख कर लिखा है शीर्षक़.
नये कलाकार क्यों
चूंकि फिल्म का थीम ऐसा है. मुझे लगा कि सभी नये लोग ही परदे पर इसकी फ्रेशनेस को बरकरार रख सकते हैं. साथ ही मेरी भी पहली फिल्म है. तो तर्जुब करने का मौका अधिक होगा. इसलिए मैंने तय किया कि मैं अपने सात साथ नये कलाकारों के साथ काम करूंगा. नये लोग ज्यादा पैशन के साथ काम करते हैं और वे भी चाहते हैं कि उन्हें अधिक एक्सपोजर मिले. स्वाभाविक है काम बेहतर ही होगा इससे.
नये लोगों को टिप्स
मैं नये लोगों को यहीकहूंगा कि मेरा भी फिल्मी बैकग्राउंड नहीं था. लेकिन फिर भी मेरी पहली फिल्म रिलीज हो रही है. तो सपने देखें और जुनून के साथ उसे पूरा करने की कोशिश में जुटें.  हर मेहनत करने वालों को सफलता मिलती ही है.

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