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20160503

स्टारडम आपको दायरे में बांधती, और मैं मुक्त रहना चाहता : अरविंद स्वामी



फिल्म रोजा व बांबे ने उन्हें रातों-रात स्टार बना दिया.लेकिन उन्हें इस स्टारडम से कभी लगाव न हुआ. उन्हें जिंदगी में और भी नयी चीजें करनी थी. सो, उन्हें बॉलीवुड और अपने बीच एक दूरी बनायी. अब काफी सालों के बाद एक बार वे फिर से लौटे हैं. फिल्म डियर डैड से. पेश है अनुप्रिया अनंत से हुई बातचीत के मुख्य अंश

 अरविंद, आपने ऐसे समय में फिल्मों से दूरी बनायी. जब आप सबसे लोकप्रिय स्टार में से एक थे?
हां, क्योंकि जिस तरह से मुझे स्टारडम मिल रहा था. मैं वह नहीं था. मेरी जिंदगी का मकसद सिर्फ यही नहीं था. सो, मुझे लगा कि मुझे इससे दूरी बनानी चाहिए. मुझे कभी स्टारडम से लगाव नहीं रहा. इसलिए दूरी बनाते वक्त अफसोस भी नहीं हुआ. लेकिन हां, मुझे यह बातें समझ आती थीं कि मेरे फैन्स मुझे बेहद प्यार करते हैं. उनके इमेल मिलते थे मुझे. लेकिन मुझे चूंकि हमेशा से नयी चीजें सीखने में दिलचस्पी रही. तो मैंने खुद को इस तरह से तैयार किया. और मैं दिल से बोलता हूं कि मुझे इन बातों की तकलीफ नहीं है. जब मंैने शुरुआत की थी, उस वक्त मेरी उम्र 21 थी. फिर मैं वहां से यूएस चला गया था.फिर मैंने काफी फिल्मों की स्क्रिप्ट पढ़ी. लेकिन अपनी पहली फिल्म के हिट के बाद से मैं एक्टिंग एंजॉय करने लगा था. लेकिन स्टारडम नहीं. मैं स्टारडम के साथ कंफर्टेबल नहीं था. मुझे फिल्मों की मेकिंग के बारे में जानना, उसे समझना और इस प्रोसेस में मजा आता था. और मैं हमेशा से वही चाहता था. मैं कभी स्टार बनना नहीं चाहता था. लेकिन जो आकर्षण मुझे मिलने लगा था, उन चीजों से डील नहीं कर पा रहा था. अब जाकर मैं इस बात को लेकर थोड़ा सहज हो पाया हूं. और यही वजह थी कि मैंने दूरी बनायी और तय किया कि कुछ और करूंगा. मैं मुक्त रहना पसंद करता हंू. स्टारडम मुझे दायरे में बांध रही थी.
फिल्म डियर डैड की कहानी में ऐसी क्या खास लगी कि आपने हां कह दिया?
मैंने जब पहली बार स्क्रिप्ट सुना तो मुझे लगा कि ऐसे सिचुएशन भी हो सकते हैं किसी परिवार में, क्योंकि मैंने कभी इस तरह की जिंदगी देखी नहीं थी, कि इस तरह के भी सिचुएशन से डील किया जा सकता है. मैं काफी अकंफर्टेबल हो गया था. लेकिन मुझे लगा कि इसके बारे में बात होनी चाहिए. बतौर एक्टर भी मुझे अपने कंफर्ट जोन से बाहर आना चाहिए. फिल्म में जो दिखा रहे. मैं वह नहीं हूं. रियलिटी वह नहीं है इसलिए लगा कि और यह चैलेंज लूं.
फिल्म के पोस्टर देख कर दर्शकों की राय आपके बारे में है कि आप और कम उम्रदराज नजर आने लगे हैं?
हंसते हुए) पता नहीं लोगों को ऐसा लग रहा है. लेकिन मैं वास्तविक जिंदगी में बहुत बड़े बच्चों का पिता हूं. मेरी बेटी 19 साल की है. बेटा भी बड़ा है. सो, मुझे उम्र को लेकर कभी कोई परेशानी नहीं रही है. मुझे कभी किसी फिल्म में पिता का किरदार निभाने में कभी कोई परहेज नहीं रहा है.
आप वास्तविक जिंदगी में जिस तरह के पिता हैं, क्या फिल्म में भी आपकी वह छवि नजर आयी है?
सच कहूं तो नहीं. मैं वास्तविक जिंदगी में उस तरह से नहीं जीता हूं. इस फिल्म से मेरी जिंदगी के किसी भी अनुभव का अनुमान न लगायें.
आप अपने बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार रखते हैं या फिर आप भी सख्त पिता हैं?
सच कहूं तो दोनों ही हूं. हां, मगर एक बात तो मैंने समझी है कि हमारे पिताजी जैसे हुआ करते थे. पेरेंट्स जिस तरह के हुआ करते थे और अब के दौर में अंतर है. उस दौर में तो पिता पूछते नहीं थे. वे कहते थे और हम करते थे और सच कहूं तो कभी यह महसूस भी नहीं होता था कि अरे हमारी नहीं चल रही. पिताजी ने कुछ बुरा कर दिया. पिताजी की सख्ती के कारण मैंने कुछ खोया हो या मिस किया हो. ऐसा नहीं हुआ है. मुझे लगता है कि सख्त और दोस्ताना दोनों व्यवहार होना चाहिए. हां, मगर मैं यह जरूर चाहता हूं कि मेरे बच्चे मुझसे हर विषय पर बातचीत जरूर करें. सभी टीनएज से गुजरते हैं. अगर उनसे गलतियां भी होती हैं. तब भी मैं जानना चाहूंगा. और मुझे लगता है कि कभी जजमेंटल नहीं होना चाहिए. वरना, बच्चे आपसे दूर हो जाते हैं. कोई भी रिलेशनशीप परफेक्ट होता ही नहीं. मैंने अपने 10 साल अपने बच्चों को दिये और मैं इस बात से गर्व महसूस करता हूं कि मैंने उनकी जिंदगी के अहम वक्त उनको दिये. यही वजह है कि वे आपके करीब होते हैं.
आप अपने बेटे की उम्र में थे, तो किस तरह के युवा थे? आपके पिता से आपके रिश्ते कैसे थे?
मैं शर्मिला नहीं था. मेरे पापा स्ट्रीक्ट थे और अनअप्रोचेबल थे. मेरे पिता कभी किसी मीटिंग में नहीं आते थे. उस वक्त आते भी नहीं थे लोग़. उस वक्त बिल्कुल क्लियर होती थी कि बातें कि आपसे आपके पेरेंट्स की क्या उम्मीदें हैं, क्या नहीं. उस वक्त च्वाइस नहीं होते थे.मेरे पापा भी हमसे कभी पूछते नहीं थे कि बाहर आउटिंग पर आये हो तो क्या खाओगे. वे जो खिलाते हम खा लिया करते थे. लेकिन मुझे इससे कभी परेशानी नहीं हुई. आज बच्चों को आप चुप नहीं करा सकते. दिक्कतें आती हैं.
एक दौर में आप बड़ी परेशानी से घिरे रहे. उस वक्त खुद को ऊर्जावान कैसे रखा?
हां, यह सच है कि मैं पैरालाइसिस से ग्रसित था. और काफी परेशान रहा इसकी वजह से. लेकिन उस दौर में भी मैं पोजिटिव रहा. क्योंकि मैं पोजिटिव थॉट का व्यक्ति हूं. हाल में एक मैराथन में मैं 21 किमी दौड़ा. मेरे लिए वह बड़ी उपलब्धि थी. इस बात से मैं महसूस करता हूं कि अगर आप पोजिटिव रहें और इच्छा शक्ति रखें तो कुछ भी कर सकते.
अब आप  और फिल्में करेंगे ?
हां, जल्द ही मेरी एक फिल्म का तेलुगु रुपांतर आप देखेंगे. तमिल और तेलुगू की फिल्में कर रहा हूं

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