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20160508

किरदारों के साथ इतने प्रयोग किये हैं ओरिजिनल प्रोसेन कौन है, याद नहीं : प्रोसेनजीत


ँप्रोसेनजीत का नाम किसी फिल्म से जब भी जुड़ता है. वह फिल्म खास हो जाती है. हिंदी फिल्मों में उनकी आवाजाही कम है. चूंकि वे चूनिंदा फिल्में ही करते हैं. उनका मानना है कि कहानी में दम हो तो कलाकार खुद आकर्षित हो ही जाता है.इस बार वे हिंदी फिल्म ट्रैफिक का हिस्सा बने हैं. 
 ट्रैफिक से जुड़ने की खास वजह क्या रही?
दरअसल, मैं बंगाली फिल्में भी करता हूं. साल में दो तीन. लेकिन वह अलग तरह की फिल्में होती हैं. हमारे यहां पहले जो होता था कि मेनस्ट्रीम सिनेमा, अलग सिनेमा. लेकिन अब वह बदलाव आ गया है.दर्शक हर तरह की फिल्में देखना चाहते हैं. बहुत सालों के बाद जब शंघाई में मैंने काम किया. शंघाई के बाद मैंने तय किया कि अगर हिंदी फिल्मों में भी मुझे अच्छे रोल मिले तो करूंगा. जिस वक्त मैं बांग्ला की मेनस्ट्रीम फिल्म कर रहा हूं और उस वक्त अगर मुझे यहां आना है तो मेरे लिए कांप्टीशन बढ़ जाता है. उस वक्त तय करना मुश्किल होता है. दरअसल, मैं खुद को स्टार प्रोट्रे करने की कोशिश ही नहीं कर रहा हूं. पिछले 10 साल से मैंने जितनी भी फिल्में की हैं, वह जानते हैं कि मैं किस तरह की फिल्में करता हूं. मराठी, मलायली सभी जानते हैं कि मुझे किसी तरह की फिल्म पसंद है. जब मुझे ट्रैफिक आॅफर हुई तो ऐसा नहीं है कि मैंने यह सुना नहीं था. मैं जानता था इस फिल्म के बारे में. मुझे पता था कि मलायली में जो यह फिल्म बनी है. यह अच्छी फिल्म बनी है. अच्छे एक्टर्स ने काम किया है. तो मुझे लगा कि मुझे जुड़ना चाहिए. मुझे सबसे बड़ी बात है कि बहुत सारे अच्छे एक्टर्स के साथ काम करने का मौका मिला है. 
मसलन, हिंदी सिनेमा के अच्छे एक्टर्स से आपकी बांडिंग अच्छी है?
जी हां, बिल्कुल मनोज यहां फिल्में बनाते हैं. मैं वहां रह कर भी उनकी फिल्में देखता हूं. मैं हमेशा मनोज से टच में हूं. हर जगह के जो अच्छे एक्टर्स हैं, वह कहीं न कहीं, किसी न किसी जगह पर कनेक्ट जरूर हैं. दिव्या दत्ता हमेशा मुझसे मिलती रही हैं. वे कभी भी मिलीं, कहीं भी मिली, हमेशा उन्होंने यही कहा कि मैं आपके साथ काम करना चाहती हंू. मनोज, जिम्मी, सचिन, दिव्या के साथ काम करके मुझे मजा आया. मनोज बिहार से हैं, जिम्मी पंजाब से. मैं बंगाल से. सचिन मराठी सिनेमा से जुड़े हैं. तो एक अच्छा कांबीनेशन हुआ है इस फिल्म में.
मनोज बाजपेयी से जुड़ाव कैसे हुआ?
मुझे यह तो याद नहीं कि उनकी पहली फिल्म कौन सी है. लेकिन उनकी फिल्म शूल देख कर मैं चौंका था और मुझे समझ आ गया था कि वह काफी डायनेमिक एक्टर हैं. उन्होंने जिस तरह खुद को बदलाव किया है. मेनस्ट्रीम, कमर्शियल सबमें वह कमाल का है. जैसे मैंने 300 फिल्में की कमर्शियल वह बॉक्स आॅफिस पर कामयाब रहीं. लेकिन पिछले 10 साल से मैंने स्टाइल ही पूरी तरह बदल दी. तो वे फिल्में भी दर्शकों को पसंद आयी है. एक एक्टर के रूप में आप ग्रो करना जरूरी है और साथ ही वक्त के अनुसार चलना भी जरूरी है. हाल ही में जो अलीगढ़ में उन्होंने कमाल का काम किया है. उनकी हर फिल्म पसंद आती है. रेंज दिखता है. फिल्म गैंग्स आॅफ वासेपुर में वे कमाल हैं. हमलोग मिलते-जुलते रहते हैं.
आप बांग्ला सिनेमा के सुपरस्टार हैं, तो जब आप हिंदी सिनेमा में फिल्में चुनते हैं तो कहीं जेहन में यह बात रहती है कि मैं कोई ऐसी फिल्म न चुन लूं, कि उन्हें दुख हो.
देखिए, शांघाई फिल्म में मेरे कितने सीन्स थे. लेकिन आप पूछें बंगाल में, ऐसा कोई फैन फॉलोअर्स नहीं थे, जिन्होंने मुझे यह कहा कि आपने यह फिल्म क्यों की. यह कांसेप्ट आज के जमाने में बदलना शुरू हो चुका है. जो कभी हॉलीवुड में हुआ करता था. कि कई सुपरस्टार छोटी फिल्मों में भी छोटे दृश्यों के लिए काम करते रहे हैं. तो ये जो सुपरस्टार और स्टार का जो कांसेप्ट है, हां तो मैं सुपरस्टार हूं. सलमान, शाहरुख हैं. लेकिन किसी फिल्म में अगर बात है तो उससे जुड़ने में कोई हर्ज नहीं. जैसे शाहरुख खान ने फिल्म बिल्लू में काम किया था. वह शाहरुख पर फिल्म नहीं थी.लेकिन उन्होंने हां इसलिए किया, क्योंकि उन्हें लगा कि अच्छी फिल्म बन रही है. अच्छा विषय है. और उसमें शाहरुख की जरूरत है. आज के जमाने में स्टार है, लेकिन कंटेंट भी महत्वपूर्ण हो गया है. अच्छे कांटेंट में भी अगर चार सीन भी करे तो लोग उसे याद रखते हैं. हां, मगर यह दस साल पहले होता तो शायद मेरे लिए प्रेशर हो जाता. आप किसी भी रीजन में नंबर वन हो और कहीं भी जाकर आप अगर नंबर वन न बने तो वह मेरे आॅडियंस, मेरे प्रोडयूर्स सबको मैं अफैक्ट कर रहा हूं. लेकिन आज की तारीख में मुझ पर कोई प्रेशर नहीं है बंगाल में, चूंकि मेरी फिल्में जाते ही हैं, दर्शक कुछ अलग देखने के लिए. 10 साल में मेरे बारे में जो लिखा गया है , लोगों ने यह लिखा है कि ओरिजनल प्रोसेनजीत दिखते कैसे हैं. मैंने अपने लुक के साथ इतने एक्सपेरिमेंट कर लिये हैं.
आप मानते हैं कि अब बांग्ला सिनेमा में आपका कोई प्रतिद्वंदी नहीं रह गया है?
मुझे लगता है कि प्रोसेनजीत इस तरह से ब्रांड बन चुका है वहां, कि आज के जमाने में जो हीरो लोग अच्छा काम कर रहे हैं, वह मुझे कांप्टीटर के रूप में नहीं देखते. उन्होंने मुझे अलग जगह पर ही बिठा कर रखा है. वे लोग मुझसे सलाह लेने आते हैं. मैं अभी एक्टर कम मेंटर अधिक हो गया हूं वहां के लिए. और मैं गाइड भी करता हूं.
आपके लिए सिनेमा क्या है?
मेरी जिंदगी में सभी जानते हैं कि सिनेमा ही मेरी दुनिया है. मुझे दुनिया को और कोई भी चीज टच नहीं कर पाती. मेरी जिंदगी में 24 घंटे में से 20 घंटे फिल्मों के लिए ही है. फिल्म से ही मेरे ताल्लुकात है.
आपका सिनेमा से जुड़ाव किस तरह हुआ?
मेरे पिताजी ने एक फिल्म प्रोडयूस की थी. ऋषिकेश मुखर्जी ने निर्देशित की थी. मैं उस वक्त पांच साल का था. वह फिल्म बहुत बड़ी हिट थी.छोटो जिज्ञासा, इसके बाद मुझे बहुत सारे आॅफर आये थे. शक्ति सामंत से, राज कपूर से, घर से मुझे इजाजत नहीं मिली. इसके बाद मैंने दूती पाता की. यह फिल्म बंगाल में कई मायनों में अलग रही थी. इस फिल्म में मैंने एक् शन इंट्रोडयूस किया. डांस इंट्रोडयूस किया.थोड़ा बांबइशस टच दिया था. वह फिल्म 100 डेज से ऊपर चली थी. इसके बाद कमर्शियल फिल्मों में न बदलाव होना शुरू  हुए, तो सच कहूं तो ब्लैक एंड व्हाइट ऐरा से कलर तक जिस तरह सिनेमा बदला. मैं सबका साक्षी रहा हूं.सिनेमास्कोप से मल्टीप्लेक्स सबमें कहीं न कहीं मेरा कंट्रीब्यूशन है. 
आप हिंदी और बांग्ला सिनेमा में कितना अंतर देखते हैं?
मुझे बहुत अंतर नहीं दिखता. अंतर बस इतना है कि बजट का अंतर है. फिल्म की जो भाषा है वह पूरी दुनिया में एक ही भाषा है. आप कहीं भी जाओ तीन दिनों में आप वहां के सिनेमा को समझ लेते हैं. वही लोग हैं. वही काम है. हॉलीवुड में भी वही है. कैमरामैन, मेकअप सब वही है. एंबीयंस का फर्क होता है. हमलोग रीजनल में बजट पर ध्यान देते हैं. कंटेंट पर ध्यान देते हैं. हमारे सारे निर्देशक शुजीत सरकार ने भी बंगाली फिल्म प्रोडयूस की. मैंने उनके साथ काम किया है. सेकेंड फिल्म भी की. सुजोय घोष कोलकाता में जाते हैं. तो मैं मानता हूं कि हमारा सिनेमा कंटेंट के ऊपर ही है. हम उस पर ही निर्भर हैं. मलायली भी वही है. मलायली, मराठी, और बांग्ला सिनेमा ये सभी ज्यादा सेंसिबल फिल्में बनाते हैं.एक्सपेरिमेंटल बनाते.
पहली बार आपने किस फिल्म से स्टारडम का स्वाद चखा और वह अनुभव कैसा था?
मैं उस वक्त 16 साल का था.उस वक्त मुझे कुछ समझ ही नहीं आया था. दूती पाता बहुत हिट रही थी और लोग मुझे पसंद करने लगे थे. इसके बाद मेरी फिल्म आयी अमर संगी. वह फिल्म कोई भूल नहीं सकता. इसके बाद मैंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. 
कभी डर लगता है कि नंबर वन की कुरसी पर इतने लंबे समय तक विराजमान रहा. कठिन है.
जिस वक्त मैंने खुद को मेनस्ट्रीम से हटाया. वह वक्त मेरे लिए रिस्की जोन था. क्योंकि मेरा आॅडियंस जो हमेशा मुझे एक् शन करते देखते रहे, रोमांस करते, डांस करते देखते रहे. एक वक्त मुझे लगा कि मुझे यह जगह अब नेक्स्ट जेनरेशन के लिए छोड़ना चाहिए. पब्लिक एक वक्त पर भूल जायेंगी. मैं एक वक्त में घड़ी को या कैलेंडर को कंपीट नहीं कर पाऊंगा. मैं बिलिव करता हूं कि  मैं एक एक्टर के रूप में ही जो कर सकता हूं. अच्छे किरदार करूं. मैंने जब 40 की उम्र पार की.मेरे दिमाग में यह आ गया था कि मैं प्रोसेजनजीत हूं. लेकिन जो मैंने 25 साल तक किया है. अब मैं वह नेक्सट जेनरेशन के लिए छोड़ूंगा और ग्रेसफुली मैं हटा. लेकिन मैंने अपने ब्रांड को कम नहीं होने दिया. यही वजह है कि आज की तारीख में अगर मैं एक भी फिल्म करूं तो आॅडियंस इंतजार करती है.ये तो कुछ अलग होगा. आप देखें जो भी मेरी फिल्म आती है, उस पर आज भी क्या प्रतिक्रिया मिलती है.
आपने अपने स्टारडम के इर्द-गिर्द कोई लकीर खींची है. या आपको लोगों से मिलना जुलना पसंद है?
अगर आपके कोई जर्नलिस्ट दोस्त हों कोलकाता में तो उनसे पूछें. मैं कैसा हूं.क्योंकि हमारे यहां पर जर्नलिस्ट भी आते हैं तो मुझे हीरो नहीं मानते.बड़े भाई मानते हंै. मैं हमेशा जर्नलिस्टस को बोलता हूं कि आप भी हमारी इंडस्ट्री के अहम हिस्सा हैं.अगर वे मुझे कहते हैं कि किसी फिल्म में मैंने अच्छा नहीं किया तो वे मुझे लेशन देते हैं.जब मैंने 30 साल इंडस्ट्री में पूरे किये तो मैंने उठ कर बोला कि मैं आज जो भी हूं,उसमें मीडिया की अहम भूमिका है. उन्होंने प्रोसेनजीत को बनाया है.हर जगह पर उन्होंने टोका है. और मैं करेक् शन करते करते आज मैं 30 साल तक टिका हूं. यही वजह है कि मेरी मीडिया से इक्क्वेशन अलग है. मैं हर जर्नलिस्ट की शादी में जाता हूं. वहां मैं परिवार का सदस्य बन कर जाता हूं. सुपरस्टार नहीं.
खुद को निखारने के लिए क्या-क्या करते रहते?
मैं थियेटर करता हूं.इसके साथ मैं हर वक्त अपने आप को डेवलप करता हूं. कैरेक्टर के हिसाब से. गेटअप के हिसाब से. फिजिकिली मैं कभी मोटा तो कभी दुबला हो जाता हूं.जैसा कुछ आमिर करता है. मैं जो भी काम करता हूं इमोशन से करता हूं और मैं समझता हूं कि कोई भी अच्छा काम जो हमलोग क्रियेट करते हैं. वह इमोशन से ही आता है. मेरा प्लस प्वाइंट है. जो भी प्रोसेनजीत अंदर से नहीं कहेगा कि इसको कर. तो मैं प्रोजेक्ट करूंगा ही नहीं. इसके लिए मैं क्या क्या नहीं कर सकता. आप सोच भी नहीं सकते. मैंने एक फिल्म की थी. मैं कोलकाता में ही था. लेकिन मेरा परिवार के साथ, आॅफिस के साथ कोई राबतां नहीं था. मैं एक घर में मैट पर  सोता था. बाउल के साथ काम किया. एक फिल्म में मैंने कबीर जैसा रोल किया था तो उसकी अलग तैयारी थी. कभी कभी अगर किरदार की जरूरत हो तो मैं आम लोगों से जुड़ा रहूं.
और किन चीजों में दिलचस्पी है?
गाना, म्यूजिक, फुटबॉल खेलना पसंद है. बट नॉट पॉलिटिक्स. लेकिन मैं पॉलिटिक्स से नहीं जुड़ूंगा. मैं विश्वास करता हूं कि मैं एक एंटरटेनर हूं और हर पार्टी के लोग मुझे देख कर बोलें मेरे काम को कि आपकी फिल्म अच्छी थी बस. 

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