20160118

अपने लिए माइलस्टोन खुद तय कर रही : प्रियंका चोपड़ा


फिल्म बाजीराव मस्तानी में प्रियंका चोपड़ा ने शीर्षक किरदार नहीं निभाया था. लेकिन उन्होंने अपने किरदार काशीबाई से साबित कर दिया कि काशीबाई नहीं होतीं तो बाजीराव मस्तानी की प्रेम कहानी पूरी नहीं होती. हाल ही में फिल्म जय गंगाजल का ट्रेलर भी जारी किया गया है, जिसमें वह अहम किरदार में हैं. प्रियंका इन दिनों भारत के साथ साथ विदेशों में भी अपने अभिनय का डंका बजा रही हैं. वे एक साथ कई विधाओं में काम कर रही हैं, लेकिन पूरे परफेक् शन के साथ. बाजीराव की सफलता से चहक रही हैं. 
फिल्म बाजीराव मस्तानी को जिस तरह से प्यार मिल रहा है और फिल्म में काशीबाई के किरदार में आपने जो जान डाली है. आपको किस तरह की प्रतिक्रिया मिल रही है लोगों से.
पहले तो मैं अपने फैन्स और दर्शकों की शुक्रगुजार हूं. मैं हमेशा से जानती थी कि काशीबाई के किरदार को दर्शक जरूर सराहेंगे.काशी बहुत स्पेशल कैरेक्टर है. इसलिए मैंने हां भी कहा. मैं पहली व्यक्ति थी कि जिसकी इस फिल्म में कास्टिंग हुई थी. मुझे याद है, मैं मैरी कॉम शूट कर रही थी. मनाली में. वहां आये थे संजय सर.मुझसे बातचीत करने के लिए.काशी की सबसे खूबसूरत बात यह है कि कहानी बाजीराव और मस्तानी की है. लेकिन इतिहास काशी को भूल गया है.क्योंकि उस दौर में बाजीराव और मस्तानी की कहानी सेंशेनल थी. इंटर रिलीजन थी तो सभी ने उस पर ही ध्यान दिया. किसी ने सोचा ही नहीं कि उस बीवी का क्या हुआ होगा. क्रेडिट टू संजय सर कि उनके लिए काशी का किरदार तय करना सबसे पहले जरूरी है. उन्होंने मुझसे कहा कि मैं सबसे पहले इस किरदार को तैयार करना चाहता हूं.मेरे लिए झिलमिल का किरदार इस किरदार  से ज्यादा आसान था. जबकि उसमें बहुत वेरियेशन थे.मगर फिर भी काशी के किरदार सा कठिन था. चूंकि वह बच्ची सा किरदार था. उसने जिंदगी में सिर्फ राव से ही प्यार किया. बचपन से दोनों दोस्त थे.वह हमेशा राव राव करती रहती थी.राधा मां मां की तरह थी उसके लिए. और उसे शनिवाड़ वाड़ा में घूमना फिरना छोटी सी दुनिया में रहना पसंद था. जब तक मस्तानी उसकी जिंदगी में नहीं आती है. काशी का दिल भी बच्चे सा ही था.लेकिन इसके बाद उसकी जिंदगी अचानक से मैच्योर हो जाती है. यह कठिन इसलिए भी था कि संवाद बहुत नहीं थे फिल्म में मेरे लिए. वह सबसे बड़ा चैलेंज था. मोनोलोग करना आसान होता है. बिना कहे उस बात को बयां करना  बहुत इंटरेस्टिंग था.और यह आज की दौर की महिलाओं के साथ भी होता है. तो वह तो फिर भी 1700 का दौर था.तभी भी काशी ने उस वक्त राव को कहा कि तुम जाओ. लेकिन आज भी कितनी समाज के दबाव में कुछ नहीं कर पातीं.उनके पास आवाज नहीं होतीं. काशी की आवाज मेरे ख्याल से उस औरत को आवाज देती है, जिसके पास आवाज नहीं है. मेरे लिए वह बहुत जरूरी था. और यह फिल्म देखने के बाद मेरे पास ऐसे ऐसे लोगों के फोन आये हैं, जिनसे मैं मिली नहीं हूं कभी. कितनी पत्नियों के फोन आये हैं कि आप सही हैं ऐसे सिचुएशन में हमको सोचने के लिए कुछ दिया.और मैं खुश हूं कि मैंने कोई ऐसा कैरेक्टर जिया जो मुद्दे को एड्रेस करता है.
लेकिन क्या आज के दौर में काशीबाई सा दिल होना संभव है?
मैं मानती हूं कि मस्तानी की क्या गलती थी. काशी तो मस्तानी को जानती भी नहीं थी.गलती आदमी की है. काशी फिल्म में कहती है कि तुमने मेरा गुरुर छीना तो होना यही चाहिए कि उस लड़की को दोष मत दो. अपने पति से पूछो.मैं साधारण हूं. एक महिला के लिए उसका गहना उसका सेक्ररिफाइस नहीं होता है. उसका गुरुर होता है.यह डबल स्टैंडर्ड की बात है. मैं वैसी फेमिनिस्ट हूं कि सिर्फ पुरुष को गलत समझूं. मेरा मानना है कि आप जिसके साथ हो. उसके साथ खुश रहो. हां, मगर मेरा जो सम्मान है. मुझे दो जिसकी मैं हकदार हूं. मेरा मानना है कि आप अपना सेल्फ रिस्पेक्ट मत खो.वह  अंत तक पेशवर रही. यहां तक कि इतिहास भी गवाह है कि काशीबाई ने ही मस्तानी के बच्चे शमशेर को पेशवर की तरह तैयार किया.मराठा वॉरियर बनाया. यह काशीबाई था.
मस्तानी के साथ वाकई में हुआ वह इतिहास था. लेकिन अगर दर्शक के रूप में बात की जाये तो जो मस्तानी के साथ हुआ क्या वह सही था. आपका इस पर क्या नजरिया है?
मेरा मानना है कि मजहब के ऊपर से वॉर क्रियेट होते हैं.उन सबके खिलाफ हूं. जिसको बचपन से सिखाया गया है कि सभी धर्म के लोग एक हैं.मैं बिलिव नहीं करती कि कोई भी प्रेम मजहब से छोटा है. मजहब के नाम पर होनेवाली तमाम चीजें मुझे पसंद नहीं हैं. हम इंसानीयत को भूल जाते हैं. बाजीराव मस्तानी मुझे लगता है कि उस लिहाज से प्रोगेसिव फिल्म है, जब बाजीराव बोलता है कि ठीक है आप इसे मराठा नहीं मानेंगे तो मैं इसे मस्तानी का ही मजहब दूंगा. शमशेर बहादूर नाम रखूंगा. और काशी ने भी जाकर मस्तानी से कहा कि तुमने तय किया है कि तुम यहां आयोगी तो लोग तुमसे बातें कहेंगे. लेकिन मजहब की बात अब भी बहुत रिलेवेंट है. पूरी दुनिया में बुरे हालात हैं. इंसान को क्या हो गया है. पता नहीं. संजय सर ने कहानी दिखाते दिखाते इन सारी बातों को कहा है.
आपने किस तरह से काशीबाई के किरदार के लिए तैयारी की थी?
मैं महाराष्टÑ में काफी वक्त से हूं. मेरे कई दोस्त हैं जो महाराष्टÑ से हैं. उनके बीच रही हूं मैं. मेरी पूरी टीम को खुशी थी कि वह काशीबाई का मेकअप करेंगी. चूंकि वे भी महाराष्टÑ से हैं. मेरी हेयरस्टाइलिश, मेरी मेकअप आर्टिस्ट सभी.बहुत इंटरेस्टिंग चीजें हमने की भी, साड़ी मैं दो घंटे में पहनती थी. क्योंकि उस जमाने में जिस तरह से औरतें साड़ियां पहनती थीं. जैसे राजा रवि वर्मा की पेंटिंग्स आप देखें तो उससे आपको रेफरेंस मिलता है. मेरे बाल में एक भी इलेक्ट्रॉनिक आॅब्जेक्ट इस्तेमाल नहीं किया गया है. हाथ से मेरी हेयर ड्रेसर प्रियंका कर्ल करती थी. डेढ़ घंटे लगते थे उसको.ताकि वह ओथेंटिक लगे. मेरी जो बिंदी थी. मेरे मेकअप आर्टिस्ट थे वह मेरी बिंदी हाथों से पेंट करते थे. चूंकि उस जमाने में बिंदी चिपका नहीं सकते थे. तो ऐसी डिटेलिंग डाली है. मेरी आंखों का कलर ऐसा रखा है, जो ब्राह्मणी महाराष्टÑीयन का होता है. वर्षा उधगांवकर जैसा. बहुत प्यार से संजय सर ने इस किरदार को रचा है. और क्रेडिट सुदिप्ता को जाता है.
फिल्म का शीर्षक किरदार आपने नहीं निभाया है. मगर फिर भी सारी तारीफें इस किरदार के लिए आपको मिल रही हैं. दीपिका से हो रही आपकी तूलना के बारे में क्या कहेंगी?
मुझे लगता है कि मैंने जब से अपना फिल्मी करियर शुरुआत किया है. ऐतराज से लेकर अब तक मैंने कई दो अभिनेत्रियों वाली फिल्मों में काम किया है और यह तूलना तो होती ही आयी है.मैंने हमेशा इन बातों को अहमियत दी है कि मैं फिल्म में अच्छी हूं. लेकिन फिल्म अच्छी नहीं है. तो फिर मेरे अच्छे होने का क्या फायदा. मुझे कभी भी मेरे करियर में बैड रिव्यूज नहीं मिले हैं. कुछ फिल्मों को छोड़ कर. सबसे बड़ी बात है कि सबलोग के योगदान से फिल्म बनती हैं. मैं काशी नहीं बन पाती अगर दीपिका मस्तानी नहीं होती. जिसका नाम क्रेडिट पर होता है. फिल्म उसी की होती है. चाहे जितने लोग के नाम आये हों बोर्ड पर. लेकिन दीपिका और रणवीर ने ही उसे जिया है. तो यह उनकी कहानी है. यह शुरू से पता था. मुझे लगता है कि सबका कंट्रीब्यूशन से फिल्म बनी. संजय सर ने काशी के किरदार को बहुत इज्जत दी है.उन्होंने तीनों के कंफ्यूजड रिलेशन को रेशम की तरह ट्रीट किया है.
प्रियंका, एक दौर में लगातार भारत को मिस यूनिवर्स, मिस वर्ल्ड जैसे खिताब हासिल हो रहे थे. खासतौर से जब आपने यह खिताब जीता था. उस दौर में ऐश, सुष्मिता, लारा, डायना, दीया कई नाम थे. लेकिन अचानक से वह दौर खत्म होता नजर आ रहा है. कई सालों से भारत को यह खिताब नहीं मिल रहा. आपकी क्या राय है इस बारे में?
हां, इस बात को लेकर मैं भी कई बार सोचती हूं. मुझे भी समझ नहीं आ रहा कि आखिर परेशानी क्या है. क्यों ऐसा हो रहा है. चूंकि मैं चयन कमिटी में हूं भी नहीं, ब्लेकिन मुझे यह नहीं लगता कि किसी में भी कोई कमी हैं और टैलेंटेड लड़कियां नहीं आ रहीं. मुझे ऐसा लगता है कि कमी रह रही है कहीं और.  और इस बारे में गंभीरता से सोचा जाना बहुत जरूरी है.
विदेश में भी आपके शो को काफी लोकप्रियता मिल रही है? अब आगे क्या?
मैं खुद नहीं जानती कि अब आगे क्या करूंगी. लेकिन इतना तय है कि मेरी प्रतियोगिता अब मुझसे खुद से है. मुझे दूसरों का नाम देखने की फुर्सत ही नहीं है. मेरे पास वक्त ही नहीं है. मैं अपने लिए माइलस्टोन खुद ही तय करते जा रही हूं और एक एक कर अपने ही माइलस्टोन को तोड़ती जाऊंगी. यही कोशिश है. 

20160116

आनेवाला दौर विषयपरक फिल्मों का ही होगा : अक्षय व निमरत



अक्षय कुमार और निमरत कौर एक साथ एक महत्वपूर्ण फिल्म लेकर आ रहे हैं. फिल्म एयरलिफ्ट की कहानी कुवैत की एक ऐसी घटना से जुड़ी है, जिसकी वजह से भारत एक दौर में काफी प्रभावित हुआ था.
एयरलिफ्ट में दिखाई जा  रही घटना के बारे में खास जानकारी नहीं है लोगों को. ऐसे में फिल्म के लिए तथ्य एकत्रित करने में परेशानी हुई?
अक्षय : मुझे लगता है कि मेरे निर्देशक राज इस बारे में अच्छी तरह से वाकिफ थे कि वह किस तरह की कहानी कहने जा रहे हैं और उनके पास काफी कुछ फैक्ट्स हैं, इसके बारे में.मेरे डायरेक्टर साउथ इंडियन हैं और उनके अपने अंकल वहां फंस गये थे. तो उनको काफी जानकारी है. फैक्ट्स को तो छुपाया नहीं जा सकता. लेकिन मैं हैरान हूं कि किस तरह सरकार ने इस खबर को छुपा कर रखा और सिर्फ एक न्यूजपेपर में इसकी जानकारी आने दी थी. जबकि यह घटना गिनीस बुक आॅफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल है.और विश्व के सबसे बड़ी घटनाओं में से एक है.
निमरत, आप इस घटना के बारे में पहले से वाकिफ थीं?
निमरत : नहीं, मुझे भी इस बारे में बिल्कुल जानकारी नहीं थी.और जब मैंने इस घटना पर अपनी स्क्रिप्ट सुनी तो मैं हैरान थी. और मुझे हैरानी हुई थी कि मैं इतिहास और राजनीति सारी चीजों की अच्छी जानकारी रखती हूं और मैं भी इस बारे में अनजान थी. और मुझे यह बात चुभी कि मेरी तरह अवयेर रहने वाले मेरे जेनरेशन के लोग अगर इतनी बड़ी बात नहीं जानते हैं तो यह अफसोसजनक है.और मुझे खुशी है कि इस फिल्म के माध्यम से मैं वह कहानी दर्शकों के सामने ला पा रही हूं और लोग निश्चित तौर पर इस कहानी से अटैच हो जायेंगे. इसके अलावा अक्षय जैसे सुपरस्टार जब फिल्म से जुड़ते हैं तो इस तरह की कहानियों को और हिम्मत मिलती है, क्योंकि अक्षय की वजह से लोग इस फिल्म को देखने आयेंगे. और लोगों को यह फिल्म देखना जरूरी है, क्योंकि यह मेरी फिल्म है इसलिए नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण विषय पर है इसलिए.
अक्षय, लेकिन आपकी बाकी फिल्मों की तूलना में इस तरह की फिल्में जैसे बेबी, स्पेशल 26, हॉलीडे 100 करोड़ का आंकड़ा पार नहीं कर पातीं और राउडी, सिंह इज ब्लिंग जैसी मसाला फिल्में काफी धमाल मचा जाती हैं. आपको क्या लगता है क्या वजह है?
 हां, मुझे दुख होता है इन बातों का कि इस तरह की फिल्में 90 करोड़ तक ही रह जाती है, क्योंकि देशभक्ति के बारे में लोग बात करते हैं.लेकिन लोग पैसे खर्च करके उस पर आधारित फिल्में देखना पसंद नहीं करते. लोग कर्मशियल फिल्में ही देखना पसंद करते हैं. कॉमेडी, फाइट्स, गाड़ियां उड़ रही हैं...वगैरह वगैरह, लेकिन मैं भी गिव अप नहीं करने वाला क्योंकि नंबर्स कम आ रहे बॉक्स आॅफिस पर. मैं तब भी फिल्में करूंगा और कोशिश करूंगा कि धीरे धीरे ही सही अधिक दर्शकों को शामिल करूं. हैट्स आॅफ टू एयर इंडिया के पाइलेट्स को जो वार जोन में उस दौर में गये.और लोगों को बचाया. जिन्होंने उन लोगों की मदद की. वह उनके परिवार के सदस्य नहीं थे. लेकिन एक इंसान के रूप में लोगों की मदद के लिए वे आगे आये.और मैंने जो किरदार निभाया है. वह भी आम है और वह चाहता है कि लोगों की मदद करें और वह करता है. उसके पास मौका था कि वह उस वक्त लंदन जा सकता था.लेकिन वह भागा नहीं. लेकिन धीरे धीरे लोग इन फिल्मों के बारे में अवेयर हो रहे हैं और आनेवाले सालों में लोग बोलने वाले हैं हम लोगों से कि बेकार की फिल्में मत दिखाओ. कुछ अलग दिखाओ.
निमरत आप क्या सोच रखती हैं बॉक्स आॅफिस को लेकर.
निमरत : मुझे लगता है कि दर्शकों का माइंडसेट धीरे धीरे बदल रहा है. सोशल साइट्स पर इस फिल्म को लेकर काफी उत्सुकता है. लोग धीरे धीरे ही सही लेकिन मिनिंगफुल फिल्मों के तरफ रुख करेंगे और मेरी पिछली फिल्म लंचबॉक्स की कामयाबी यही साबित करती है. मैं बहुत होफ फुल हूं.
अक्षय, आप लगातार यह कह रहे हैं कि इस तरह के विषय हमारी टेक्स्ट बुक में आने चाहिए?
जी हां, मैं बिल्कुल कह रहा हूं. मेरा मानना है कि अकबर, बिरबल हमने सब पढ़ लिया. जान लिया कि उन्होंने क्या इतिहास रचा था. क्या क्या कारनामें नहीं किये. लेकिन अब यह भी जरूरी है कि हमारे इतिहास के रियल हीरोज की कहानी लोगों के सामने आये. यह तभी संभव है जब इन सारी कहानियों को टेक्स्ट बुक में लाया जाये. तभी आने वाले जेनरेशन को यह पूरी कहानी पता चलेगी. 
निमरत, आप कम फिल्में कर रही हैं, कोई खास वजह?
मैंने हिंदी फिल्मों में शुरुआत लंचबॉक्स जैसी फिल्म से की है तो कुछ वक्त तो मुझे ही निर्देशकों को यह बताने में लगा कि मैं कर्मशियल फिल्में भी करने के लिए तैयार हैं. कई लोग मुझे इसलिए आॅफर नहीं करते थे कि उन्हें लगता था कि शायद मैं वैसी फिल्में करना ही नहीं चाहूंगी. लेकिन अब धीरे धीरे शुरुआत कर रही हूं. लेकिन म्ोरी कोशिश होगी कि मैं विषयपरक वाली कर्मशियल फिल्म में काम करूं.
फिल्मी अवार्डस को लेकर अक्षय आपका अंदाज हमेशा व्यंगात्मक होता है. क्यों?
क्योंकि मुझे पता है कि कौन कौन लोग हैं जो अवार्ड खरीदते हैं. मुझे जब कभी स्टेज पर अवार्ड देने के लिए बुलाया भी जाता है तो मैं पहले आगे वाली रो देखते हंूं और समझ जाता हूं कि किसे अवार्ड मिलने वाला है. यह एक गेस गेम बन गया है.
आपने रोबोट 2को क्यों हां कहा?
क्योंकि मुझे लगता है कि तमिल या साउथ की फिल्मों में कभी किसी हिंदी के सुपरस्टार ने काम नहीं किया है और वह एक बड़ी उपलब्धि है. मेरा किरदार बेहतरीन है. मैंने अपने करियर के शुरुआती दौर में एक कन्नड़ फिल्म की थी. और अब यह फिल्म कर रहा हूं. मेरी पसंद का जॉनर है. इसलिए मैं उत्साहित हूं इसे करने के लिए. 

20160114

कभी राइटर नहीं बनना चाहती थी : सबा मुमताज


सबा मुमताज ने टेलीविजन की दुनिया में अपनी कलम की ताकत से धाक जमाई है. उन्होंने अपनी लेखनी से कई धारावाहिकों को शब्द दिये हैं और एक बार फिर वे निर्माता के रूप में एक नया शो लेकर आ रही हैं. वे मानती हैं कि टेलीविजन सिर्फ कलाकारों को ही नहीं, बल्कि अगर टैलेंट हो तो लेखिकाओं को भी एक नया मुकाम देता है. वे अपने अब तक के करियर से काफी संतुष्ट हैं. 
भारतीय टेलीविजन के लिए सासू मां का विषय नया नहीं हैं. फिर आपके जेहन में कब यह बात आयी कि मुझे इस विषय पर कुछ लिखना चाहिए या किसी शो का निर्माण करना चाहिए?
मेरा मानना है कि हम कितना भी बाहर का खाना खा लें या कुछ और खा लें. हमें घर की दाल चावल खाने की बहुत आदत होती है तो टेलीविजन की दुनिया के लिए सास और बहू का टॉपिक उसी दाल चावल की तरह है.हर कोई इस कहानी से रिलेट करता है, क्योंकि हर किसी के परिवार में कई कहानियां होती भी हैं.हर  महिला बहू, बेटी और सास बनती है. यह साइकिल की तरह है. इस शो में मैं यह दिखाने की कोशिश कर रही हूं कि अगर एक लड़की शादी से पहले ही यह अवधारणा बना कर न जाये कि उसे बुरी सास ही मिलेगी और सास भी यह न मानें वह भी बहू को बेटी के रूप में स्वीकारने की कोशिश करें तो एक अच्छा संबंध कायम हो सकता.यंग जेनरेशन को मूव लेना होगा. चूंकि पुराने लोगों की सोच एक जगह सीमित हो जाती है. वह वही सोचते हैं. जो एक ढर्रे पर बात चली आती है. तो मैंने वही सोच को तोड़ने की कोशिश की है इस शो के माध्यम से.
आप क्या सोच रखती हैं किस तरह एक लड़की शादी के बाद सास से रिश्ते कायम कर सकती है?
जी हां, बिल्कुल मैं भी एक छोटे से शहर से हूं बूलंदशहर से. मेर भी अपने सपने रहे हैं. मैं जिस परिवार से संबंध रखती हूं, वह मुसलिम कनजरवेजिव फैमिली रही है.लेकिन वहां से मुंबई जैसे शहर में अकेली चली आयी और अपना रास्ता तलाशा. मेरी मां हमेशा चिंतित रहती थीं कि पता नहीं मैं क्या किस तरह से मैनेज करूंगी.तो मुझे यही लगता है कि जब हम अकेले आकर नये लोगों से मिलते जुलते हैं. अनजान लोगों के साथ बातचीत करके रिश्ता बना लेते हैं तो फिर सास जिनके साथ हम जिंदगी भर रहने वाले हैं.उसके साथ रिश्ता अच्छा क्यों नहीं बना सकते.
आपकी सास के साथ आपके रिश्ते मधुर हैं, यह बात साफ झलक रही हैं?
जी हां, बिल्कुल मुझसे जब कोई पूछता है कि मैं अपनी बेटी के लिए क्या विश करती हूं तो मैं यही विश करती हूं कि उसे भी मेरी तरह ही एक सुलझी हुई सास मिले.और वह भी किसी परिवार का जब हिस्सा बने तो पोजिटिविटी के साथ उस घर में जायें.
आपके पति बांग्ला संस्कृति से हैं और आप मुसलिम संस्कृति से संबंध रखती हैं, तो जब दो संस्कृति का मिलन हुआ तो आपने किस तरह खुद को इनरिच किया?
हां, बिल्कुल. मैं उत्तर प्रदेश से हूं और मेरा ससुराल बंगाल में है.तो दोनों बिल्कुल अलग-अलग कल्चर है. लेकिन मेरी सास ने मुझे काफी कुछ सिखाया. मुझे बंगाल के खान-पान, उनकी संस्कृति, उनके साड़ी पहनने के अंदाज सबकुछ के बारे में बताया. हम काफी बातें करते हैं. वह मेरे साथ नहीं रहतीं. लेकिन जब भी वह यहां आती हैं मैं उन्हें पूरा पॉवर दे देती हूं. और वह काफी खुश हो जाती हैं. लेकिन दरअसल, यह अच्छा भी है न कि हमें उनके रहने से मदद ही मिलती है. आप जिम्मेदारियों से मुक्त होते हैं और मैं तो वर्र्किंग वीमेन हूं. यही चाहूंगी कि कोई मदद करें. तो मैं उन्हें उस रूप में देखती हूं.हमें फेलेक्सबल होना चाहिए. थोड़ा एडजस्ट करने में कोई बुराई नहीं है. आखिर वह परिवार का हिस्सा हैं. मेरा मानना है कि आप जितने बुढ़े होते जाते हैं, आपकी सोच उतनी जिद्दी हो जाती है तो बेहतर है कि यंग जेनरेशन ही थोड़ा एडजस्ट करना सीख लें.
एक लेखिका के तौर पर टेलीविजन में क्या चुनौतियां महसूस करती हैं?
टीवी में पहले जब मैंने शुरुआत की थी. उस वक्त पांच दिन का शो होता था. आजकल छह दिन शोज आने लगे हंै. तो डिलिवरी एक बड़ा चैलेंज है.और वह स्टोरिज निकालना कि हर दिन आॅडियंस को पसंद आये. उन्हें बांधे रख सकें.हर दिन हद से ज्यादा फुटेज की डिलीवरी काफी कठिन होती है. 
अबतक के सफर को कैसे देखती हैं?
जब मैं आयी थी. तो उस वक्त मुझे खुद को प्रूव करना था. उस वक्त मैं दिन रात दोनों वक्त काम करती थी.मैं एक साथ चार चार शो करती थी. उस वक्त तो डेडलाइन से परेशान नहीं होती थीं. अब बच्ची है, परिवार है, तो सबकुछ मैनेज करना होता है. तो थोड़ा कट डाउन करती हूं काम को. वक्त के साथ आपकी जिम्मेदारी बदलती है.
लेखन के लिए आपको प्रेरणा कहां से मिलती है?
आपको जान कर हैरानी होगी, लेकिन मैं कभी राइटर बनना नहीं चाहती थी. मैंने जामिया मिलिया से मास कम्यूनिकेशन किया. मैं अपने कॉलेज में लिखने से जी चुराती थी. पांच सवाल हों तो तीन के ही जवाब देती थी. हमारी जब एल्युमिनी मीट हुई थी. मेरे सारे टीचर हंस रहे थे कि मैं कैसे स्क्रिप्ट राइटर बन गयी. मैं निर्देशन के क्षेत्र में जाना चाहती थी. मैंने इसलिए कोर्स पूरा होने के बाद एनएफडीसी के लिए एक फिल्म भी बनायी थी.फिर मैंने सुभाष घई के साथ अस्टिेंट के रूप में काम किया, उस वक्त वह यादें बनाने जा रहे थे.लेकिन उन्होंने कुछ मीटिंग्स के बाद मुझे अस्टिेंट के रूप में नहीं लिया.उन्होंने कहा कि तुम बहुत जानती हो. मेरे अस्टिेंट चुपचाप से मेरी बात सुनते हैं. इसके बाद मैंने अर्जुन सबरोल के साथ काम किया. मुझे एक बात का अफसोस है कि मुझे लगान के दौरान आशुतोष ग्वारिकर ने कहा कि अपना पोर्ट फोलियो दो. सेकेंड अस्टिेंट के लिए जगह खाली है.मुझे लगा कि मैं क्यों सेकेंड अस्टिेंट बनूं. लेकिन मुझे नहीं पता था कि वह लगान बना रहे हैं. इस बात का अफसोस रहा.लेकिन सबकी अपनी डेस्टीनी होती है तो फिर उस बारे में अधिक नहीं सोचा. उस वक्त मेरे एक दोस्त हकीकत निर्देशित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि तुम लिखो.तो मैंने लिखना शुरू किया और सिलसिला आजतक जारी है.यही मेरी मुलाकात मेरे पति से हुई. 
बचपन में टीवी देखने में दिलचस्पी थी?
नहीं मैं बिल्कुल टीवी नहीं देखती थी. और जामिया से पास आउट होने के बाद तो मैंने कभी टीवी नहीं देखा था. लेकिन आज जो कुछ भी हूं इसी इंडस्ट्री ने दिया मुझे.
अब तक सा सबसे कठिन शो कौन सा रहा?
ये रिश्ता क्या कहलाता है लिखना काफी कठिन रहा. चंूकि इसमें सारे अच्छे किरदार हैं. नेगेटिव किरदार हैं ही नहीं और ऐसे शो लिखना कठिन होता है. इस शो में ह्ुमन इमोशन का ही कमाल है. वही शो की यूएसपी भी है. 

20160110

रोबोट बनाम बाहुबली


रजनीकांत की फिल्म रोबोट की अगली कड़ी में इस बार अक्षय कुमार वीलेन की भूमिका में हैं. वे खुद इस बात को लेकर बहुत उत्साहित हैं. चूंकि उन्हें रजनीकांत के साथ काम करने का मौका मिल रहा है. शंकर फिल्म के निर्देशक हैं. दक्षिण सिनेमा में शंकर की अपनी पहचान रही है. वे रजनीकांत को लेकर कई फिल्मों का निर्माण कर चुके हैं और सफलता की सीढ़ी चढ़ चुके हैं. बाहुबली फिल्म के प्रदर्शन से पहले शंकर ही दक्षिण सिनेमा के सबसे अधिक धन अर्जित करने वाले निर्देशकों में से एक रहे हैं, यही वजह है कि वे अब नयी तैयारी कर रहे हैं, ताकि वे बाहुबली से आगे जा सकें. रोबोट कई मायनों में तकनीकी आधार पर माइलस्टोन रही हंै. गौरतलब है कि रोबोट की वीएफएक्स टीम और बाहुबली की वीएफएक्स टीम एक ही रही है. और इसलिए भी यह वीएफएक्स टीम के लिए बड़ी चुनौती है कि रोबोट के बाद बाहुबली जैसे माइलस्टोन के आगे वे फिर एक क्या नयी लकीर खींचते हैं. गौरतलब है कि यह फिल्म आमिर खान को भी पसंद आयी थी और वे चाहते थे कि वे इस फिल्म में दोहरी भूमिका निभायें. लेकिन बात नहीं बनी. स्पष्ट है कि अक्षय कुमार ने अपने द्वार अलग तरीके से खोल रखे हैं. वे साल में चार फिल्में कर सबसे अधिक फिल्में करने वाले कलाकारों में से एक हैं. वे हल्की फुल्की फिल्मों के साथ एक गंभीर फिल्म अवश्य करते हैं. रोबोट एक् शन प्रधान फिल्म है और ऐसी फिल्मों में अक्षय को महारथ हासिल है. उन्होंने पहले भी कई फिल्मों में नकारात्मक भूमिकाएं निभायी हैं. और उस दौर में वे उतने सफल सितारा नहीं थे. लेकिन अब उनका मान सम्मान और कद बढ़ चुका है. इसके बावजूद उन्होंने रजनीकांत के साथ फिल्म साइन की है तो वे इन सारी बातों को ध्यान में रख कर ही. सो, यह देखना दिलचस्प होगा. कई मायनों में इस फिल्म में चुनौतियां हैं.

सुपरस्टार के बच्चे व जोड़ियां


शाहरुख खान ने हाल ही में यह इच्छा जाहिर की थी कि भविष्य में उनके बेटे अबराम और ऐश्वर्य राय बच्चन की बेटी आराध्या की जोड़ी भविष्य में खूबसूरत जोड़ियों में से एक हो सकती है. इस बात पर अमिताभ बच्चन ने कहा है कि शाहरुख खान के मुंह में घी शक्कर...दरअसल, हिंदी फिल्म जगत में यह हमेशा प्रचलन रहा है कि हिंदी सिनेमा के सदाबहार कलाकारों के बच्चों की जोड़ियों को लेकर उत्सुकता रही है. जिस  दौर में ईशा देओल ने अपने करियर की शुरुआत की थी. उस दौर में जब उनकी और ऋतिक रोशन की जोड़ी साथ आ रही थी तो काफी चर्चाएं हुई थीं. यहां तक कि उस दौर में जीतेंद्र के बेटे तुषार कपूर और ईशा की जोड़ी को लेकर भी काफी चर्चाएं हुई थीं. बॉबी देओल और टिष्ट्वंकल खन्ना की फिल्म बरसात लांचिंग फिल्म थी. दोनों के करियर के लिए. दोनों ही सुपरस्टार्स डिंपल और धर्मेंद्र के बच्चे थे. उस वक्त भी उम्मीद थी कि यह जोड़ी कमाल कर पायेगी. लेकिन फिल्म खास कामयाब नहीं हो पायी थी. दरअसल, यह भी हकीकत है कि लोकप्रिय सितारों के बच्चे जब जब साथ आये हैं. फिल्म खास कामयाब नहीं रही है. फिल्म रिफ्यूजी में भी अमिताभ जया के पुत्र अभिषेक और रंधीर बबीता की बेटी करीना ने अपने करियर की शुरुआत की थी. लेकिन दोनों की जोड़ी कामयाब नहीं हो पायी. यह भी एक हकीकत है कि जो जोड़ियां लोकप्रिय हो चुकी होती हैं, जब उनके बच्चे साथ में आते हैं तो दर्शक उनके माता पिता से उनकी तूलना करते हैं और वे उस पर खरे नहीं उतर पाते. लेकिन यह भी गौरतलब है कि जब जब फ्रेश जोड़ियां आयी हैं. उन्हें पसंद किया गया है. लेकिन मुमकिन है कि आने वाले सालों में सुपरस्टार्स के बच्चे इस मिथक को तोड़ें. चूंकि अब दौर बदला है और सभी पूरी तैयारी के साथ इंडस्ट्री में कदम रखेंगे.

हर सीन में बदलता था मेकअप और हेयरस्टाइल: शिल्पा शिरोडकर


शिल्पा शिरोडकर ने छोटे परदे पर धारावाहिक एक मुट्ठी आसमान से शुरूआत की और एक बार फिर वे स्टार प्लस के शो सिलसिला है प्यार का में एक अहम भूमिका निभा रही हैं. खास बात यह है कि उनके पहले शो से इस शो के अवतार में काफी बदलाव है. शिल्पा खुश हैं कि उन्हें छोटे परदे पर अलग तरह के किरदार निभाने के मौके मिल रहे हैं. 
इस शो से कैसे जुड़ीं
जब मेरा पहला शो बंद हो रहा था. उसी वक्त रश्मि जी( शो की प्रोडयूसर) का फोन मेरे पास आया था. हालांकि वह कोई और शो था.लेकिन वह शो बन नहीं पाया. लेकिन रश्मि जी को मैंने यह कहा था कि अब अगर मैं कोई शो करूंगी तो रिप्यूटेड चैनल के साथ करूंगी. मुझे प्राइम टाइम स्लॉट चाहिए और कहानी मेरे ही इर्द गिर्द होनी चाहिए.रश्मि जी ने मुझे कुछ महीनों बुलाया और फिर कहानी सुनायी तो मैं काफी उत्साहित हो गयी.मेरे लिए रश्मि जी का पहला फोन था, जब एक मुट्ठी बंद हो रहा है. उस वक्त रश्मि जी ने मुझसे कहा कि नया शो साथ करेंगे. तो मैं खुशनसीब हूं कि मुझे दोबारा नया मौका मिला. 
टेलीविजन में अब तक के सफर को किस तरह देखती हैं?
मैं अपने आप को लकी मानती हूं क्योंकि मैंने पहला शो किया था. लीडिंग चैनल के साथ किया. और काफी लीडिंग प्रोडक् शन हाउस के साथ काम किया और फिर से मुझे लीडिंग चैनल के साथ ही काम करने का मौका मिला है तो मेरे लिए यह खुशी की बात है. मैं इसे अपने लिए गोल्डन एरा मानती हूं क्योंकि इस एरा में काम मिले और लोगों को काम पसंद आये तो यह मेरे लिए ब्लेसिंग है. मैं ऊपर वाले पर विश्वास करती हूं, क्योंकि इस इंडस्ट्री में बहुत कठिन है खुद को सस्टेन कर पाना.अपनी पहचान बनाना और काम मिलना.तो इस लिहाज से बहुत खुशनसीब हूं कि अच्छे मौके मिल रहे हैं.
फिल्मों की दुनिया को मिस करती हैं?
मैं जरूर फिल्में करना चाहंूगी. मैं फिल्में देख देख कर ही बड़ी हुई हूं. उसी ने मुझे अभिनय सिखाया है. जो पहचान मिली है उसी से मिली है. मुझे हमेशा से एक्टिंग में दिलचस्पी रही है और मैं मानती हूं कि इस वक्त फिल्म इंडस्ट्री काफी बेहतरीन बदलाव आये हैं. अब ज्यादा अच्छी फिल्में बनने लगी हैं. अच्छे विषय आ चुके हैं. किसी एक्टर के लिए यह बेहतर दौर है, जब वह एक्टिंग कर सकता है. और हमने जब शुरूआत की थी. उस वक्त से अधिक स्टारडम आज मिल सकती है. मेरा बचपन से ही सपना था कि एक्टिंग करूंगी.और वही करूंगी. एक्टिंग के अलावा मैं किसी और एसपैक्ट पर नहीं सोच पाती हूं.
सिनेमा में किस तरह के बदलाव महसूस कर रही हैं?
हाल के दौर में मैंने तलवार देखी. मुझे काफी पसंद आयी. आज की आॅडियंस इतनी समझदार हो गयी है कि अगर उन्हें कुछ बकवास दिखाया जाये तो वह तुरंत रियेक्ट करती है. इस लिहाज से भी काफी बदला है सिनेमा. इसलिए अब अच्छे विषय आने लगे हैं कि आप आॅडियंस को बेवकूफ नहीं बना सकते.
आपने जब शुरूआत की थी और जब आज न्यू कमर्स आते हैं. कितना बदलाव देखती हैं उनके और अपने दौर के संघर्ष में?
मेरे अनुसार जब मैं इंडस्ट्री में आयी थी तो सीधे सेट पर एक्टिंग सीखने वाले दौर में आयी थी.हमलोग के लिए कोई मेंटर नहीं था. हमलोग हर फिल्म से ग्रो होते गये. आजकल सभी पूरी तरह से तैयार होकर आते हैं, और यह जरूरी भी है, क्योंकि उस दौर में 10 लड़कियां थीं. आज 100 लड़कियां हैं. तो कंप्टीशन टफ है. आपके पास वक्त नहीं है कि आप पहले सीखें फिर काम करें. सो, आपको फास्ट रहना ही होगा. ट्रेंड होना ही होगा. आज अच्छा है कि लोग ट्रेंड आते हैं. आजकल फिल्मों में पैसे भी इतने लगते हैं कि आप अफोर्ड नहीं कर सकते कि आपको पहले सिखाये फिर मौके दें. सबकुछ बदला है. तकनीक मेकअप सबकुछ. हमारे दौर में मेकअप भी अलग था. हमलोग कहीं भी मेकअप करते थे. कैसे भी करते थे. वैनिटी वैन नहीं होने पर भी मेकअप करते थे. हर सीन में हमारा मेकअप और हमारा हेयरस्टाइल बदल जाता था. हम पैन केक लगा लेते थे. पाउडर लगा लेते थे. आजकल टेक्चर बदल चुका है.लाइटिंग पूरी तरह बदल चुकी है शूटिंग की. जहां जरूरत ही नहीं है कि आप मेकअप करो. वह लाइटिंग से ही कमाल कर लेते हैं.उस वक्त तो मॉनिटर नहीं होता था कि हमलोग देख पायें कि जो हमारी शूटिंग हुई है, वह कैसी हुई है. आज जो मॉनिटर है. हम खुद को देख कर इंप्रूव कर सकते हैं. लेकिन आज देखें रियल हुआ है सिनेमा. एक फिल्म का एक लुक होता है. अभिनेत्रियां उसी लुक में नजर आती हैं. अब कलाकारों का नहीं फिल्म का लुक होता है और वह काफी रियलिस्टिक भी लगता है. दीपिका पादुकोण का काम मुझे काफी पसंद है.मुझे लगता है कि दीपिका के पास सिंपल ब्यूटी है. और टैलेंटेड है. प्रियंका चोपड़ा मुझे बहुत पसंद है. मुझे लगता है कि वह सिर्फ ग्रो कर रही हैं.अपनी पर्सनैलिटी में.ऐतराज से लेकर क्वानटिको  तक उन्होंने बेहतरीन काम किया है. अभिनेताओं में मुझे सलमान और ऋतिक पसंद हैं.
अगर आपको कभी मौका मिले तो अपनी कौन सी फिल्मों को दोबारा जीना चाहेंगी?
मुझे अपनी फिल्में टीवी पर देखना बहुत पसंद हैं. मैं उन्हें देखती हूं तो लगता है कि आज शायद मैं वह किरदार करती तो अलग तरह से करती. मुझे हम और खुदागवाह काफी पसंद है. इसके अलावा मुझे अपनी फिल्मों में मृत्युदंड में काम करके काफी मजा आया था. वह किरदार दोबारा मिले तो फिर करना चाहूंगी. हास्य फिल्मों में मुझे गोपी किशन काफी पसंद है, किशन कन्हैया को देखती हूं. तो लगता है कि उस किरदार को आज मैं काफी अच्छे से निभा सकती थी.
बॉलीवुड में अब भी किसी से संपर्क में हैं. अपने को स्टार या निर्देशकों से?
बॉलीवुड में मेरे दोस्त कम हैं. मेरे तीन ही फ्रेंड्स हैं. मैं उनके साथ ही रहना पसंद करती हूं. लेकिन इंडस्ट्री के लोग मिलते हैं तो मैं पूरे इज्जत से उनसे मिलती हूं. मेरे कम दोस्त हंै.
उस दौर में फैन से जुड़ना किस तरह होता था. चूंकि उस दौर में सोशल मीडिया नहीं थी.
उस दौर में मीडिया का इतना इंटरफेयरेंस नहीं था. न ही उतनी मीडिया थी. हम अपने फैन्स से ढेर सारे लेटर्स आते थे. तसवीरें आती थीं. हम उस वक्त उन्हें तसवीरों में अपने आॅटोग्राफ भेजते थे. पोस्टकार्ड भेजते थे. उसी के माध्यम से फैन हमारे बारे में इंप्रेशन बनाते थे. अखबारों में जो पढ़ते थे उससे ही. हम अपना क्लेरिफिकेशन नहीं दे पाते थे.मुझे याद है हम साउथ अफ्रीका गये थे. एक रेडियो इंटरव्यू देने. वहां एक फैन आया और उन्होंने कहा कि मैं आपको लगातार 20 मिनट से देख रहा हूं. और मैं आपसे यह बात शेयर करना चाहूंगा कि मैंने आपके बारे में पढ़ा था कि आप घमंडी हैं, लेकिन आज आपको देख कर ऐसा नहीं लगा. फैन यही मानते थे कि हमलोग की दुनिया अलग होती हैै. मुझे लगता है कि मीडिया ने हमेशा एक स्टार की गू्रमिंग में महत्वपूर्ण काम किया है. क्योंकि लोग इस पर विश्वास करते थे.

अच्छा सिनेमा वही जो जड़ से जुड़ा हो : विकास मिश्रा

झारखंड के हजारीबाग के विकास मिश्रा की फिल्म है चौरंगा
दलित विषय पर आधारित है फिल्म की कहानी
बमुश्किल मिले हैं रांची के थियेटरों में दो शो


इस शुक्रवार रिलीज हुई फिल्म चौरंगा कई मायनों में झारखंड बिहार के लिए महत्वपूर्ण है. इसकी सबसे बड़ी और खास वजह यह है कि इस फिल्म के निर्देशक विकास रंजन मिश्रा झारखंड के हजारीबाग इलाके से संबंध रखते हैं. और फिल्म की कहानी में उन्होंने दलित समाज की विडंबना को दर्शाने की कोशिश की है. उनका बचपन गांव में ही बीता है और उन्होंने अपने आस पास जात-पात के आधार पर हो रहे भेदभाव को महसूस किया है. इसी दास्तां को उन्होंने चौरंगा में दर्शाने की कोशिश की है. चौरंगा बनाने और उसे सिनेमाघरों तक पहुंचाने तक का सफर आसान नहीं रहा है. लेकिन विकास ने इस बार ठान लिया था कि वे अपने राज्य के लोगों तक इस कहानी को जरूर पहुंचायेंगे. यह हकीकत है कि ऐसी कई फिल्में हैं जो झारखंड के फिल्मकारों ने झारखंड की पृष्ठभूमि पर बनाई है. लेकिन वहां के सिनेमाघरों में वे फिल्में रिलीज ही नहीं हो पायी हैं. ये फिल्में वहां तक पहुंच ही नहीं पाती. चूंकि वहां के डिस्ट्रीब्यूटर्स का मानना है कि ऐसी फिल्मों के दर्शक नहीं होते. सो, विकास ने इस बात मशक्कत कर इस फिल्म को रांची के ग्लिज्ड सिनेमा थियेटर तक पहुंचाने की कोशिश की. और वे सफल हुए हैं. विकास बताते हैं कि उनकी हमेशा से यह इच्छा रही थी कि उनकी फिल्म उनके अपने गांव के लोग देखें. उनके माता पिता ने यह फिल्म हजारीबाग से आकर रांची में देखी है. विकास का मानना है कि प्राय: यह चर्चा होती रहती है कि मराठी सिनेमा ने अपने सिनेमा को कहां से कहां ुपहुंचा दिया. क्षेत्रीय सिनेमा में अभी मराठी सिनेमा का स्तर काफी उठ चुका है. इसकी बड़ी वजह यह है कि ये सारी फिल्में महाराष्टÑ में बनती हैं. यहां की कहानी होती है और यहां के लोग होते हैं. उन्हें कहीं और नहीं जाना पड़ता. उन्हें राज्य सरकार से मदद मिलती है. तो वे कामयाब हो पा रहे हैं. सो, यह बेहद जरूरी है कि आप जहां से हैं, वहां के गांव-घर की कहानी दिखायें. अपने जड़ की कहानी दिखायें. अच्छा सिनेमा वही होती हा जो जड़ से जुड़ा होता है. बकौल विकास मुझे दुख है कि मैं जब अपनी इस फिल्म के लिए पटना के डिस्ट्रीब्यूटर से बात कर रहा था. वह फिल्म लगाने के लिए अंत तक तैयार नहीं हुए. जबकि यह कहानी बिहार झारखंड के लोगों को कनेक्ट करेगी. उनका स्पष्टीकरण है कि ऐसी फिल्मों के दर्शक यहां नहीं. इस बात का विकास को बहुत अफसोस है. विकास को चौरंगा बनाने के लिए प्रेरणा अपने आस पास की जिंदगी और उनके बचपन की यादें और परवरिश से मिली है. वर्ष 2010 में उन्होंने इस फिल्म का निर्माण शुरू किया था. एनएफडीसी के स्क्रीन लैब में उनकी स्क्रिप्ट चयनित हुई थी. बाद में जब वे ओनिर और संजय सुरी जिन्होंने फिल्म में जमींदार की भूमिका भी निभाई है. उनसे मिले तो उन्होंने स्क्रिप्ट सुनते ही फिल्म बनाने के लिए हाथ मिला लिया था. इस फिल्म की कहानी का शीर्षक चौरंगा इसलिए हैं. चूंकि हमारे समाज में चार वर्गों में जाति को बांटा गया है. विकास मानते हैं कि वे पहले निर्देशक नहीं हैं, जिन्होंने इस विषय पर फिल्म बनाई है. कई सालों से इस विषय पर फिल्में बन रही हैं और तब तक फिल्में बनती रहेंगी जब तक मुद्दा ज्यों का त्यों रहेगा. सबसे पहले हिमांशु राय ने अछूत कन्या बनाई थी. फिर श्याम बेनेगल की फिल्म आक्रोश व कई फिल्में बनती रही हैं. लेकिन आज भी यह मुद्दा समकालीन ही है. प्रासंगिक ही है. यह कहानी सच्ची घटनाओं पर ही आधारित है, जहां जात पात के नाम पर दलितों पर कई तरह से अत्याचार किये जाते रहे हैं. कई बच्चों की जात पात के नाम पर हत्याएं होती रही हैं, चूंकि उन्होंने मंदिर में प्रवेश किया है. विकास अपनी फिल्म से उन्हीं हकीकत को बयां करने की कोशिश कर रहे हैं. साथ ही उन्होंने फिल्म का अंत एक सकारात्मक संकेत के साथ इसलिए छोड़ना उचित समझा क्योंकि वे मानते हैं कि एक दिन में कुछ नहीं बदलता, धीरे धीरे कोशिशें हो तो बदलाव आ सकते हैं. उनका मानना है कि ऐसी फिल्मों को अगर राज्य सरकार की तरफ से सपोर्ट मिले तो अन्य लोग भी ऐसी फिल्में बनाने की हिम्मत जुटायेंगे. कम से कम एंटरटेनमेंट टैक्स से मुक्ति मिलनी ही चाहिए. साथ ही ऐसी फिल्मों को उनके मूल स्थान जहां से फिल्म संबंधित है, वहां थियेटर में जगह जरूर मिलनी चाहिए. तभी दर्शकों तक वह बात पहुंचेगी. विकास ने चौरंगा के माध्यम से एक गंभीर फिल्म बनाई है, जो कई सवाल खड़े करता है. इसलिए बेहद जरूरी है कि ऐसी फिल्मों को सहयोग मिले. गौरतलब है कि विकास की फिल्म को मुंबई में रिलीज के बाद फिल्म समीक्षकों से बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिली है. कई विश्व स्तरीय फिल्म महोत्सव में भी चौरंगा ने खुद को स्थापित किया है. रांची के सिनेमाघर ग्ल्जिड में फिल्म का प्रदर्शन किया जा रहा है.