20151126

ूनिवर्सल फिल्में बननी हैं जरूरी : इरफान खान


इरफान खान जिस फिल्म में मौजूद होते हैं वे अपनी अदायगी और अंदाज से अन्य कलाकारों को पीछे छोड़ते चले जाते हैं. हम हर बार इरफान को देखते हैं और चौंकते हैं. वे अपने किरदारों में हमेशा नयापन लाने के लिए तत्पर रहते हैं. हाल ही में रिलीज हुई फिल्म तलवार में उन्हें सबसे सराहना मिली और इस हफ्ते रिलीज हो रही फिल्म जज्बा से भी उन्हें काफी उम्मीदें हैं. 

इरफान, आपकी हाल ही में रिलीज हुई फिल्म तलवार में आपके किरदार की काफी प्रशंसा हो रही है. आपकी क्या प्रतिक्रिया है? पीकू भी लाजवाब फिल्म रही.
मैं काफी खुश हूं. जाहिर है, जब एक कलाकार काम करता है और काम की सराहना होती है तो आप महसूस करते हंै कि आपकी मेहनत रंग लायी है और हर कलाकार इस बात से खुश होता है. मैं भी खुश हूं. मैं चाहता हूं कि मैं अनकनवेशनल काम ही करूं. वरना, आप बोर हो जायेंगे. खुद को स्थापित रखने के लिए प्रयोग करने जरूरी है.धीरे धीरे इंडस्ट्री भी बदल रही है और हां मैं जरूर कहूंगा कि यह साल मेरे लिए काफी खास है. और इस साल यह भी खास बात रही है कि अलग फिल्में हिट रही हैं. अब इसमें मेरा कितना योगदान रहा है.कितना नहीं. यह तो नहीं जानता.लेकिन एक बात महसूस करता हूं कि यह दुखदायी दौर नहीं है. यह सिनेमा इंडस्ट्री के लिए बहुत बड़ी बात है कि लोग अलग तरह की फिल्में देखना पसंद कर रहे हैं और उन्हें सराहना भी मिल रही है.अब ऐसी फिल्में बन रही हैं कि जो आपको एक्साइट भी कर रही है, एजुकेट भी कर रही है. साथ ही साथ मेसेज भी दे रही है. जैसे तलवार. तो मुझे लगता है कि यह एक गुड साइन है कि हम अच्छे दौर की तरफ जा रहे हैं.इस बात से यह एहसास हो रहा है कि अब आॅडियंस मैच्योर हुई है. दरअसल, आॅडियंस बदल रही है. और इसलिए फिल्में बदल रही हैं.फिल्ममेकर्स उनकी वजह से आ रहे हैं, क्योंकि आॅडियंस अलग फिल्मों का डिमांड कर रही हैं.
आमतौर पर बॉलीवुड के जो कलाकार हॉलीवुड का हिस्सा बनते हैं, वे सिर्फ पब्लिसिटी या छोटे से रोल में ही विलुप्त हो जाते हैं. लेकिन आप जब हॉलीवुड का हिस्सा बनते हैं तो आपको वहां भी अच्छे ही किरदार मिलते हैं. तो आपको क्या लगता है. क्या कारण हैं कि हॉलीवुड के निर्देशक भी आपके साथ काम करना चाहते हैं?
मुझे इस बारे में बिल्कुल एक्रुरेट जवाब देने में तो परेशानी होगी. मैंने कभी यह विश्लेषण किया नहीं है. मेरे लिए वैसे भी हॉलीवुड बॉलीवुड मैटर नहीं करता. अच्छा काम मैटर करता है. अच्छा विषय मैटर करता है. मैं मानता हूं कि फिल्म मेकिंग अपने आप में एक मिस्टीरियस जॉब है. किस चीज से कौन से लोग कब आकर्षित हो जायें. कौन सी बात कहां किसको कनेक्ट कर जाये. यह आप अनुमान नहीं कर सकते. लेकिन फिर भी आप तह तक नहीं जा सकते. आप तय नहीं कर सकते कि आपकी क्या बात किसको कहां कनेक्ट कर रही है. मैं मानता हूं कि हर व्यक्ति का अपना चार्म होता है, अपना आॅरा होता है.जिसे आॅडियंस देख रही है. या फिर डायरेक्टर जो एक्टर्स से मिल रहा है.जिसे देख कर उसे लगे कि आपको कुछ नया एक्सपीरियंस देगा. तो शायद यह वजह हो सकती है.जहां तक बात है कि बाकी कलाकारों का हॉलीवुड से जुड़ना तो मैं मानता हूं कि हर किसी की अपनी दुनिया है. अपनी सोच है. लोग अपने तरीके से काम करते हैं. कौन किस तरह से बढ़ना चाहता है. सबकी अपनी प्रायोरटरीज हैं. मैं इस पर कुछ कमेंट करना नहीं चाहता. ना मैं पसंद करता हूं.
आप मानते हैं कि आपको पहले हॉलीवुड में बड़ा नाम मिला फिर बॉलीवुड में ?
नहीं मुझे लगता है कि दोनों जगह साथ साथ काम चल रहा था. मुझे लगता है कि भारत में भी नाम बनने के काफी बाद मुझे हॉलीवुड में अवसर मिले.और ऐसा नहीं है कि बॉलीवुड ने मुझे कास्ट किया क्योंकि उन्होंने मेरा ग्रोथ हॉलीवुड में देखा. यहां आपको तभी कास्ट करेंगे. जब लोगों को यहां जरूरत होगी. किसी की लोकप्रियता से किसी की कास्टिंग अमूमन लीड किरदारों तक ही सीमित होती है. मैं जिस तरह का कलाकार हूं. मैं मानता हूं कि मेरे लिए किरदार को मेरी जरूरत है. तभी वो मुझे कास्ट करेंगे.
हॉलीवुड में हमारी फिल्मों को लेकर क्या नजरिया है?
मुझे लगता है कि थोड़ी सोच तो बदली है और मुझे लगता है कि यह बदल सकती है और अगर हम यूनिवर्सल कहानियां बनाएं. सिर्फ सांग गाने वाले नहीं.मुझे लगता है कि अब वह दौर शुरू हो गया है. जैसे अब हमने कुछ ऐसी फिल्में बनानी शुरू की है. फिर वह लंचबॉक्स जैसी फिल्में ही क्यों न हों. यहां से अधिक उस फिल्म को विदेशों में सराहना मिली है और धीरे धीरे यह पहचान बना सकती है. अगर थोड़े गंभीर होंगे तो.
बतौर एक्टर किसी फिल्म में क्या देखते हैं. काम करने से पहले?
मुझे लगता है कि यह पूरा पैकेज है. आपको स्टोरी एंटरटेन करनी चाहिए. एक्साइट करनी चाहिए. कंटेंट अच्छा होना चाहिए.थ्रीलर है फिल्म की कहानी तो वाकई रोलर कोस्टर राइड की तरह वह दर्शकों को थ्रील करनी चाहिए. तभी आपको फिल्में करने में मजा भी आयेगा.
एक एक्टर के रूप में हर फिल्म से आप खुद को किस तरह निखारते हैं?
अगर आपका काम आपके ग्रोथ में एड नहीं कर रहा है तो एक बहुत बड़ा बोझ होता है. मैं मानता हूं कि आप जो काम कर रहे हैं और उसके माध्यम से अगर आप ग्रो नहीं कर रहे हैं तो इसका मतलब है कि आपका काम आपको सब्सट्रैक्ट कर रहा है.आपको निराश करेगा.काम और आपके विकास का तालमेल वैसे ही होना चाहिए जो रिश्ता मियां बीवी का होता है.दोनों एक दूसरे के रक्षक ही हैं.
ऐश्वर्य राय बच्चन के साथ आपने पहली बार इस फिल्म में काम किया है. कैसा रहा अनुभव?
काफी दिल लगा कर काम करती हैं.बहुत ही सिंपल औरत हैं. अच्छा लगता है.काफी खूबसूरत हैं.
आप जिस फिल्म का भी हिस्सा होत हैं, कुछ अलग कर जाते हैं तो क्या फिल्म चुनते वक्त यह लगता है कि अरे यार स्क्रिप्ट कुछ भी हो...मैं तो इसमें कुछ अलग कर ही जाऊंगा?
नहीं बिल्कुल नहीं. काम को लेकर मेरा अप्रोच यह नहीं होता. हां, जब शुरू शुरू आया था. तो लगता था कि हां, अपनी पहचान बनानी है तो कुछ सोचा भी करता था. अब जबकि पहचान बन चुकी है तो आप उस स्क्रिप्ट में आपके किरदार में वह एक्साइटमेंट ढूंढते हैं. लोगों को लगे कि करके निकल गया कि नहीं निकला उस पर आपका बस नहीं है. आपका किरदार एक्साइट करता है कि नहीं लोगों को वह अहम है.कई बार आप सोचते हैं कि पता नहीं आपने कितना बड़ा कमाल कर दिया और लोग देख कर बोलते हैं कि यार ये तो कुछ था ही नहीं और कभी आप सिंपल चीज करते हैं और वह लोगों को पसंद आ जाती है. आप बस एंजॉय करके काम कीजिए.बाकी लोगों पर छोड़ दीजिए.
फिल्म जज्बा में ज्यादा चर्चा ऐश्वर्य की है तो कहीं इस बात का डर लगता है?
नहीं मुझे नहीं लगता कि इससे हीरो की बुनियाद कम होगी. लोगों को पता चल जाता है कि कौन कितना काम कर रहा है. किसका क्या योगदान है. वह तो लोगों के सामने आ ही जाती हैं बातें. और मैं मानता हूं कि अगर फिल्म में सिर्फ हीरोइन की ही कहानी होती तो पोस्टर में मेरा चेहरा क्यों होता. ये बातें मुझे हर्ट भी नहीं करतीं. क्योंकि कोई किसी का हिस्सा नहीं छीन सकता. किसी की वाहवाही नहीं छीन skte. 

हर दिन नया सीखने की है चाहत : अमिताभ बच्चन


अमिताभ बच्चन  एक बार फिर छोटे परदे पर एक नये शो और ताजगी के साथ आ रहे हैं. स्टार प्लस के नये शो आज की रात है जिंदगी के बहाने अमिताभ फिर से आम लोगों से जुड़ने जा रहे हैं. सदी के महानायक ने हाल ही में अपना 73वां जन्मदिन मनाया है और वे मानते हैं कि आम दर्शक ही उनकी पूंजी हैं. 

आपकी छोटे परदे पर शुरुआत स्टार प्लस के साथ ही हुई थी. फिर से एक बार आप इस चैनल के नये शो का हिस्सा बने हैं. तो पीछे मुड़ कर देखते हैं इस सफर को तो क्या महसूस करते हैं?
 बहुत ही सुखद है. 15 सालों के बाद स्टार से मुलाकात हो रही है. यह उनका प्रस्ताव था. उनका निमंत्रण था.जो मुझे अच्छा लगा.तो मैंने हां कह दिया. मुझे हर दिन कुछ नया करना पसंद है. सीखना पसंद है और मुझे लगता है कि इस शो के माध्यम से फिर से बहुत कुछ सीखने का मौका मिलेगा.
इस शो के कांसेप्ट ने किस तरह प्र्रभावित किया आपको?
मुझे शो का पूरा कांसेप्ट, प्रीमाइस काफी पसंद आया. मैंने व्यक्तिगत रूप से  भी यह महसूस किया है कि हम हर दिन किसी न किसी नकारात्मक बातों से जूझते हैं. ऐसे में हमारे दिल दिमाग पर ज्यादा नकारात्मक बातों का असर होने लगता है. सो, लोगों को यह जताना भी जरूरी है कि उनके आस पास पोजिटिव चीजें भी हो रही हैं और उन्हें इसे ध्यान से देखना होगा और जिंदगी को पोजिटिव नजरिये से जीने की कोशिश करनी होगी. यह शो लोगों में सकारात्मकता लायेगा. मैं यह नहीं कह सकता कि लोगों का नजरिया बदलेगा या हम कोई उपदेश देने की कोशिश कर रहे शो के माध्यम से, बल्कि हम सिर्फ लोगों के बीच पोजिटिविटी को पहुंचाना चाहते हैं, ताकि चंद लम्हों के लिए ही सही लोग दुनिया को अलग नजरिये से देखें और खुश रहें. 
शो के कांसेप्ट के बारे में थोड़ी जानकारी दें?
दरअसल इस शो के माध्यम से उन लोगों को दर्शकों के सामने लाना है. जो नेगेटिविटी में भी पोजिटिविटी न सिर्फ तलाशने की कोशिश करते हैं, बल्कि उसे लोगों से बांटते भी हैं. दूसरों को खुश करने में उन्हें खुशी मिलती है और ऐसे ही कुछ लोगों का चेहरा हम सामने लाना चाहते हैं. मुझे आइडिया बहुत अधिक पसंद आया. और मैंने महसूस किया कि उन्हें एक प्लैटफॉर्म मिलेगा कि वह दुनिया के सामने आ सकें. इससे कोशिश है कि वे लोग जिन्हें अवसर नहीं मिले हैं, जिनके अच्छे कामों को लोगों ने नोटिस ही नहीं किया है. उन्हें जश्न मनाने के लिए एक मंच दिया जाये. तो अगर इन सबको एकत्रित कर किसी की खुशी का हिस्सा बनने के लिए मैं 1 प्रतिशत भी सहयोग कर पाया तो यह मेरे लिए काफी गर्व की बात होगी.
जिंदगी को लेकर आपका क्या फलसफा रहा है?
मेरी तो बस यही कोशिश होती है कि मुझे जो भी काम दिया जाये. मंै उसे पूरी तन्मयता से करूं. लोगों को शिकायत करने का मौका न दूं. हर दिन मंै नये नये लोगों से कुछ न कुछ सीखता हूं और मेरे लिए सीखने का ही नाम जिंदगी है. 
अगर हम पूछें कि आज की रात है जिंदगी...आपकी व्यक्तिगत जिंदगी में यह लम्हा कौन सा है तो आप क्या कहेंगे?
मैं चाहूंगा कि मैं किसी एक दिन को जश्न की रात में न समेटूं. मुझे हर दिन प्रतिदिन लोगों से इंस्पायर होने का, उनसे अच्छी अच्छी चीजें सीखने का मौका मिले. मैं किसी दिन को बांध नहीं सकता और खुशियों और जश्न को भी कोई बांध नहीं सकता. मेरा ऐसा मानना है. हर कोई चाहेगा कि उनकी जिंदगी में हमेशा जश्न की रात रहे.
आपकी अपनी व्यक्तिगत जिंदगी में भी कुछ लोग ऐसे होंगे जो आपके आस पास नकारात्मकता लाने की कोशिश करते होंगे तो अपने आस पास की नकारात्मकता को खत्म करने के लिए आप क्या करते हैं?
मुझे लगता है कि नकारात्मकता को आप सिर्फ काम से खत्म कर सकते हैं. आप निरंतर काम करें तो आपके दिमाग में ऐसी कोई उल जूलूल बातें आयेंगी ही नहीं. मैं किसी ने लड़ने भीड़ने में यकीन नहीं करता. मैं सिर्फ अपना काम करता हूं. लोग क्या कहते. इसकी परवाह नहीं करता. हां, मुझे मेरे काम को लेकर मिलने वाले रिव्यूज जानना पसंद है. मेरे काम की जब तारीफ हो तब भी और कमियां निकाली जाये तब भी. मैं कभी किसी साइट पर जाकर किसी भी व्यक्ति को ब्लॉक नहीं करता. मुझे लगता है कि अगर वे मेरे बारे में कमियां निकाल रहा है. मतलब वाकई कोई कमी होगी तभी वह व्यक्ति ऐसा कर रहा है. तो मैं मीडिया की बातों को आम लोगों की बातों को ध्यान से सुनता हूं और उन्हें आजमा कर खुद में सुधार लाने की कोशिश करता हूं. यही लोग मेरे लिए ऊर्जा का स्रोत भी हैं.
73 बसंत पार करने के बावजूद आप कभी थके नहीं नजर आते. आपके लिए ऊर्जा स्रोत क्या है?
(मुस्कुराते हुए) ऐसा आप लोगों को लगता है. लेकिन हकीकत यह है कि मुझे तो काम बहुत मुश्किल से मिलता है. बस काम मिलता रहे और मैं अपनी कसौटियों पर ही खरा उतर जाऊं.मेरे लिए वही बहुत है. 

फिल्मों में नहीं साहित्य में है मीरा को दिलचस्पी : शाहिद


फिल्म हैदर से जब शाहिद कपूर को एक बड़ी कामयाबी मिली, तो उन्होंने तय किया कि वे सिर्फ गंभीर फिल्में करके यह साबित करने की कोशिश नहीं करेंगे कि वे अब सिर्फ सीरियस फिल्में ही करना चाहते हंै और यही वजह है कि उन्होंने शानदार को हां कहा.

हैदर के बाद अचानक बिल्कुल शानदार जैसी फिल्में क्यों?
चूंकि मैं नहीं चाहता था कि लोग मुझे किसी एक छवि में फिर से बांधें और सोचें कि मैं अब सिर्फ हैदर जैसी गंभीर फिल्में ही कर सकता हूं. चूंकि मुझे लगता है कि अब मेरा दौर आया है और अब मैं खुद को बांध कर नहीं रखना चाहता. शानदार एक खास फिल्म इसलिए है मेरे लिए क्योंकि इसे विकास बहल निर्देशित कर रहे हैं, जिनकी फिल्म क्वीन ने काफी सफलता हासिल की. लोगों को इस फिल्म से काफी प्यार मिला है. विकास का कैरेक्टर्स को लेकर, अपनी सीन को लेकर एक अलग टेक होता है. वो हमेशा बहुत हैप्पी फिल्म बनाते हैं. जैसे अगर आप क्वीन देखें तो कहानी फिल्म की डिप्रेशिंग थी कि एक लड़की है और उसको शादी से पहले लड़के ने न कह दिया है. लेकिन उन्होंने इसमें जो फन डाला, ड्रामा डाला. मैं उससे काफी प्रभावित था. शानदार भी हंसी खुशी वाली पोजिटिव अप्रोच वाली ही फिल्म है. इससे पहले मुझे लगता है कि ऐसी डेस्टीनेशन वेडिंग वाली फिल्म बनी नहीं है तो यह भी एक स्पेशल बात है इस फिल्म की.
आप कभी डेस्टीनेशन वेडिंग का हिस्सा बने हैं?
नहीं, मैं कभी किसी की डेस्टीनेशन वेडिंग में नहीं गया हूं. लेकिन मेरे दोस्त यार बताते रहते हैं कि डेस्टीनेशन वेडिंग में ये होता है. वो होता है. ऐसी मस्ती होती है. तो मुझे वह सब सुनने का मौका मिला है. तो डेस्टीनेशन वेडिंग में कुछ ऐसा वातावरण होता है कि जहां सबकुछ काफी एंटरटेनिंग होता है, क्योंकि एक जगह कई नये लोग एक दूसरे से मिलते हैं. नाच गाना होता है. तो ये सारी चीजें नये अंदाज में विकास ने दिखाने की कोशिश की है.मैं इस बात से भी खुश हूं कि इस फिल्म में मेरी और आलिया की जोड़ी पहली बार दर्शकों को देखने को मिलेगी.
आपने भी हाल ही में असल जिंदगी में भी वैवाहिक जीवन में कदम रखा है मीरा के साथ. तो अपने नये अनुभव के बारे में बताएं?
काफी लोग मुझसे ये सवाल लगातार पूछ रहे हैं. लेकिन हकीकत यह है कि जिंदगी में कुछ खास बदलाव नहीं आये हैं. हां, मीरा की जिंदगी थोड़ी सी बदली इस लिहाज से है कि मीरा को अधिक मीडिया या पब्लिक अटेंशन की आदत नहीं रही और इन दिनों वह कहीं भी जाती है तो उसे वह सब फेस करना पड़ता तो वह मुझे आकर बताती भी है कि किस तरह मॉल में लोग उसे घूर कर देखते हैं तो उसे बुरा लगता है. मीरा को फिल्मों में उतनी भी दिलचस्पी नहीं रही है कि वह हर रोज फिल्में देखे. वह साहित्य में दिलचस्पी रखती है और वह साहित्य काफी पढ़ती है. वह हमेशा से अच्छे मार्क्स लाने वाली लड़की रही है. पढ़ने लिखने वाली तो उसे फिल्मों को लेकर खास दिलचस्पी नहीं है. ऐसी भी खबरें आ रही हैं कि वह बॉलीवुड में शुरुआत करने वाली हैं तो ये सारी बातें अफवाह ही हैं. फिलहाल उसे अभिनय में कोई दिलचस्पी नहीं है और मैं अपनी पसंद नापसंद उस पर थोपने वाला नहीं हूं.
अपने अब तक के करियर को आप किस तरह से देखते हैं?
मेरा करियर बहुत आसान नहीं रहा है. मैंने काफी संघर्ष देखा है. जब मैं आया था.तब भी.और जब मैंने कुछ अच्छी फिल्में कर ली तब भी.मेरे लिए कठिन दौर रहा. कुछ सालों पहले तक लोगों ने मान लिया था कि मेरा चैप्टर क्लोज होने वाला है. जब लगातार मेरी फिल्में कामयाब नहीं हो रही थीं. लेकिन मैंने दोबारा बहुत मेहनत की है और खासतौर से विशाल भारद्वाज सर की इसमें अहम भूमिका रही है. उन्होंने कमीने से लेकर रंगून तक मुझ पर भरोसा किया है. उनकी फिल्मों का हिस्सा मैं रहा हूं. हैदर से तो उन्होंने मुझे मेरी जिंदगी का अहम किरदार दे दिया. जब लोग मुझे सिर्फ चॉकलेटी हीरो वाले किरदार में ही देख रहे थे. विशाल सर को कुछ अलग नजर आया. और उन्होेंने मुझे हैदर जैसा किरदार दिया.उस फिल्म को लेकर भी काफी लोग आशंका जता रहे थे. लोगों को लग रहा था कि यह आॅफबीट से भी आॅफबीट फिल्म है. और अगर वाकई लोग उसे न स्वीकारते तो मेरे लिए चुनौती बड़ी हो जाती. लेकिन विशाल सर ने इस फिल्म को जिस तरह बनाया और लोगों तक यह फिल्म पहुंची.मैं मानता हूं कि क्रेडिट विशाल सर का है. अब लोगों का नजरिया भी बदला है मेरे प्रति. अब जिस तरह की फिल्में मेरे पास आ रही हैं. सारी कंटेट ड्राइवेन हैं. उड़ता पंजाब भी मेरी जिंदगी की अहम फिल्मों में से एक होगा. और रंगून को भी मैं खास फिल्म मानता हूं. उम्मीद करता हूं कि यह अच्छा वक्त मेरी जिंदगी में कायम रहेगा.
इस फिल्म में आपके पिता पंकज कपूर और बहन सनाह कपूर भी हैं. परिवार के दो सदस्यों के साथ काम करने का सफर कैसा रहा?
खुश हूं कि इस फिल्म से सनाह लांच हो रही हैं. मैं  तो काफी एक्साइटेड था. उसे मैंने पहला शॉट देते देखा तो मैं तो काफी खुश था. पापा भी खुश थे. पापा के साथ मौसम के सेट पर मुझे अधिक डर लगता था. इस फिल्म में तो पापा भी बिल्कुल मस्ती के मूड में थे. वे हर शॉट के बाद आकर मुझसे पूछते थे कि मेरा शॉट ठीक तो है, मैं हंसता भी था कि मुझसे पूछ रहे भारत के महान कलाकारों में से एक. लेकिन खुशी भी होती थी कि पापा अब इस काबिल तो समझ रहे.सनाह ने मुझे मौसम के दौरान शॉट देते देखा था. उस वक्त वह पापा को अस्टिट कर रही थी और अब एक्टिंग में वह शुरुआत कर रही है तो मेरे लिए यह प्राउड मोमेंट ही है. 

मां नहीं चाहती थीं कि फिल्मों में आऊं : सनाह कपूर

सनाह कपूर फिल्म शानदार से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत करने जा रही हैं और अपनी शुरुआत को लेकर वह बहुत ज्यादा उत्साहित हैं.
शानदार आपकी पहली फिल्म है. तो इस फिल्म से जुड़ने का मौका कैसे मिला?
दरअसल मुझे एक दिन इस फिल्म के कास्टिंग निर्देशक के आॅफिस से फोन आया. और उन्होंने कहा कि हम एक फिल्म का आॅडिशन कर रहे हैं, क्या आप आकर आॅडिशन देंगी.पर उस वक्त मेरी कोई प्लानिंग नहीं थी कि मैं अभी इंडस्ट्री में आऊं. मैं चाहती थी कि मैं पहले खुद को एक साल तक ग्रूम करूंगी और उसके बाद इस बारे में सोचूंगी.लेकिन मुझे लगा कि आॅडिशन करने में क्या परेशानी है. इसलिए मैं चली गयी आॅडिशन देने. और मुझे लगा भी नहीं था कि मेरा होगा क्योंकि मैंने यों ही आॅडिशन दिया था.फिर मुझे कॉलबैक आया कि आप सेलेक्ट हो गये हो और फिर मैं जाकर निर्देशक विकास बहल से मिली. और तब उन्हें पता चला कि मैं किसकी बेटी हूं और किसकी बहन हूं. और मैं अपनी पहचान भी अपने मम्मी पापा या भईया की वजह से नहीं बनाना चाहती हूं.
मुकेश ने आपको कहीं देखा था?
दरअसल, मुकेश के ही एक कॉलिग हैं जो मेरी मम्मी के साथ फिल्म बॉबी जासूस में काम कर चुके थे. उस वक्त मां ने मेरे बारे में चर्चा की थी कि मैं फिल्मों में आने के बारे में सोच रही हूं तो उन्होंने मुकेश सर को मेरे बारे में बोला था. तो मैं उनसे कैजुअली मिलने गयी थी.
एक्टिंग को लेकर किस तरह की ट्रेनिंग ली है आपने?
मैं न्यूयॉर्क गयी थी. वहां के एक स्कूल से मैंने एक्टिंग की पढ़ाई की.फिर मैंने काफी सारे वर्कशॉप किये हैं. नीरज काबी( तलवार, ब्योमकेश बक् शी में अहम किरदार) के साथ मैंने काफी वर्कशॉप किये थे. डैड के साथ काफी वर्कशॉप किये थे. न्यूयॉर्क में छह महीनों तक रही थी. काफी अच्छा अनुभव था वह भी. मैं काफी पढ़ती भी हूं. एक्टिंग के बारे में काफी किताबें पढ़ी हैं और लिटरेचर काफी पढ़ा है. फिल्में देखी हैं. अच्छे अच्छे फिल्मकारों की फिल्में देखी हैं.उनसे देखते हैं. सीखते हैं. उसी तरीके से मैंने सीखा. मैंने सिंगिंग सीखी है. कथक सीखी है.
जिंदगी का वह कौन सा लम्हा था, जब आपने तय किया कि आप एक्टिंग ही करेंगी.
लम्हा मुझे पूरी तरह तो याद नहीं है. हां मगर मैं यह जरूर कहूंगी कि मुझसे हमेशा जब भी पूछा जाता था कि आप बड़े होकर क्या बनोगी तो मैं हमेशा एक्ट्रेस बनने की ही बातें करती थीं.बड़ी होते हुए जब मैं पिक्चरें देखती थीं तो मुझे लगता था कि काश मैं ये कर रही होती.तो उस तरीके से मुझे एहसास हुआ कि एक्टिंग एक सीरियस चीज है, जिसे मैं अपनी जिंदगी में शामिल करना चाहती  हूं.
आपने जब इस बारे में अपने पापा मम्मी से बातचीत की तो क्या वह फौरन तैयार हुए?
मेरी मॉम नहीं चाहती थीं कि  मैं एक्टर बनूं, क्योंकि मां को लगता है कि यह इंडस्ट्री बहुत क्रेजी इंडस्ट्री है.बहुत ऊपर नीचे है. बहुत इनसेक्योरिटी है.एक स्टेबिलिटी नहीं है. 9 टू फाइव जॉब की तरह.और मुझे लगता है कि कोई भी मां नहीं चाहेगी कि उनके बच्चे उस कष्ट को देखें. तो वह मुझे प्रोटेक्ट करना चाह रही थी. चूंकि उन्होंने इंडस्ट्री के अप्स एंड डाउन देखे हैं.लेकिन पापा हमेशा से सर्पोटिव थे.लेकिन वह कहते थे कि जो भी करोगी. 100 प्रतिशत देकर करना. बिना मन के या आधे मन से किया काम पूरा नहीं होता है. यह बात उन्होंने अपने पिता से सीखी थी और वही उन्होंने मुझे भी सिखाया.
क्या यह खबर सही है कि इस किरदार के लिए आपने काफी वजन बढ़ाया है. एक एक्ट्रेस के लिए वजन बढ़ाना कितना कठिन होता है. फिर फिल्म खत्म होने के बाद उसे कम करना?
जी काफी कठिन होता है. वेट पुटआॅन करना मुश्किल नहीं होती. मैंने भी काफी खाना खाया है. मेरी बॉडीटाइप है कि मैं पुट आॅन करना आसान है. तीन महीने में 15 किलो वजन बढ़ाया है. इस फिल्म में एक ओवर वेट लड़की की ही कहानी है. लेकिन अब मैंने वजन कम करना शुरू कर दिया है और मैं वेट लॉस कर भी रही हूं. मुझे ऐसा लगता है कि एक एक्टर होने के लिए फिट रहना जरूरी है न कि आपका स्लिम रहना. तो मैं इसी बात पर यकीन करती हूं. और मैं कभी भी किरदार के लिए वजन बढ़ाना हो तो बढ़ाऊंगी. घटाना हुआ तो जरूर घटाऊंगी. मुझे इसमें कोई परेशानी नहीं है.
अपने भाई शाहिद से किसी तरह की टिप्स लेती हैं?
नहीं यह मेरी अपनी पर्सनल जर्नी है, क्योंकि वह पुरुष हैं तो उनकी बॉडी अलग है. मेरी अलग है.
फिल्म में आपका फर्स्ट शॉर्ट क्या था?आप कितनी नर्वस थीं?
मेरा पहला शॉर्ट मेरा और इस फिल्म में जिससे मेरी शादी हो रही हैं. उसके साथ था. जिसके लिए मैं विकास सर को काफी थैंक्यू बोलना चाहूंगी. उन्होंने मेरे पहले शॉर्ट में यह ध्यान रखा कि मेरा पहला सीन मेरे फैमिली मेंबर में से किसी के साथ न हो.क्योंकि आपको पहली बार ही कैमरे के सामने आपके डैड या भाई के साथ काम करना पड़े , जो इतने अच्छे एक्टर हैं तो आपको इससे टेंशन होती है. तो मैंने सबको कह दिया था कि कोई भी मेरे शॉट के वक्त वहां न हो. पापा मम्मी तो मान गये थे. ेलकिन भईया ने चुपके चुपके जाकर देख लिया था. हालांकि मुझे पता नहीं था तो मैंने ठीक से परफॉर्म कर लिया था.
पापा से क्या क्या सीखा है?
पापा हमेशा कहते हंै कि किताबें जरूर पढ़नी चाहिए. इससे आपको दुनिया का एक्सपोजर मिलता है. आप दुनिया को बिना देखे भी समझ पाते हो. आपको नजरिया मिलता है तो इस वजह से मेरा ध्यान पढ़ने पर हमेशा से रहा. पापा कहते थे कि अगर एक्टर ही बनना है तो वैसी चीजें पढ़ो, जो तुम्हें एक्टर बनने में हेल्प करे.
बचपन में कभी पापा की फिल्मों के सेट पर जाती थीं?
नहीं पापा के फिल्मों के सेट पर नहीं जाती थी. क्योंकि पापा जब सेट पर होते हैं तो काफी इन कैरेक्टर होते हैं और उन्हें पसंद नहीं फैमिली मेंबर को साथ में रखना. हम कभी उनको डिस्टर्ब नहीं करते थे.लेकिन जब मैं बहुत छोटी थी तो मेरे पेरेंटस मिल कर एक सीरियल बनाते थे.तो वहां मैं जाया करती थी.
अपनी नानी दीना पाठक से कितनी करीब थीं?
मैं बहुत ज्यादा करीब थी. मेरे लिए मेरी नानी सबकुछ थी. मैं जब बहुत छोटी थी तो उनका देहांत हो गया था. लेकिन मुझे याद है. वह मुझसे हमेशा कहती थीं कि मुझे पता है तुम बड़ी होकर एक्ट्रेस ही बनोगी. तेरे में वह सारी बातें हैं जो एक एक्ट्रेस में होनी चाहिए. और देखना मैं तुझे पहला मौका दूंगी. मुझे लगता है कि अगर वह होतीं तो मुझे देख कर काफी खुश होतीं. 

दिलवाले से दिलवाले तक


दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे के २० साल पूरे हुए हाल ही में. इस ख़ुशी में रोहित शेट्टी ने दिलवाले दुल्हनियां और शाहरुख़ खान और काजोल को लेकर एक वीडियो बनाया है. जिसे दर्शकों का बेहद प्यार मिल रहा है. इस वीडियो में काजोल शाहरुख़ अपने अंदाज़ में दिलवाले दुल्हनियां को याद कर रहे हैं।  दरअसल , यह एक चक्र पूरे होने जैसा ही है. दिलवाले दुल्हनियां से शाहरुख़ खान ने सुपरस्टार ख्याति हासिल की थी।  काजोल इस वीडियो में चर्चा करती भी हैं कि शाहरुख़ दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे तुम्हारी सबसे बड़ी फिल्म थी।  शाहरुख़ इसपर कहते हैं कि मेरी तो साड़ी ही फिल्में बड़ी ही होती हैं. लेकिन शायद यह उस दौर में सम्भव नहीं था. उस दौर में शाहरुख़ लोकप्रियता की ऊंचाइयों को धीरे धीरे लांघ रहे थे।  एक बार फिर से वे दिलवाले लेकर आये हैं।  इसमें कोई संदेह  नहीं है कि  शाहरुख़ खान अब जिस मुकाम पर हैं।  उनके लिए पीछे मुड़कर देख पाना अब सम्भव नहीं है. लेकिन इसके बावजूद कम से कम वे इस दिन के महत्व को समझते हुए इस दिन को याद कर रहे हैं तो यह बड़ी बात है।  काजोल और आदित्य की दोस्ती इसी फिल्म के दौरान गहरी हुई थी।  फिर कुछ टकरार हुए।  लेकिन फिर  दोनों इसी फिल्म की वजह से एक भी हुए।  मराठा मंदिर में जब फिल्म का बड़ा जश्न हुआ तो पैरों में चोट होने के बावजूद काजोल उस जश्न में ख़ुशी ख़ुशी शामिल हुई. जहाँ आज के दौर में फिल्मों की यादें फिल्मों के सक्सेस पार्टी तक सीमित हो चुकी है।  शाहरुख़ और काजोल ने लौट कर पुराने दिनों को रोचक अंदाज़ में याद किया है।  हम आपके हैं कौन के २० साल पूरे होने पर सूरज बड़जात्या  और सलमान ने अपनी पिछली यादों को शेयर किया।  यह खासबात है , दोनों की केमेस्ट्री में अब भी उम्र और वक़्त हावी नहीं हुआ है. यह साफ़ नजर आ रहा।  ऐसे में दिलवाले की सफलता का पहला बिगुल तो यही बज चुका है।  और दर्शकों की पसंदीदा जोड़ी तो रही ही है काजोल शाहरुख़ की।  सो उनके चाहने वाले फिल्म का बेसब्री से इंतज़ार कर ही रहे हैं। 

काजोल के साथ हमेशा खुशनुमा है अभिनय करना : शाहरुख


शाहरुख खान अपनी आगामी फिल्म दिलवाले को लेकर काफी उत्साहित हैं. उनका मानना है कि उन्हें इस बात से बिल्कुल फर्क नहीं पड़ता कि फिल्म कितनी कमाई करती है. हां, लेकिन उन्हें खुशी है कि वे पूरी खुशी से इस फिल्म को बना रहे हैं. हाल ही में उनसे हैदराबाद के रामोजी फिल्म सिटी में मुलाकात हुई, जहां फिल्म की शूटिंग चल रही थी. दिलवाले के सेट पर शाहरुख खान ने अनुप्रिया अनंत से फिल्म से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें शेयर की.

 काजोल को शेट्ठी ने मनाया
शाहरुख खान इस बात से वाकिफ हैं कि दर्शकों को उनकी और काजोल की जोड़ी वाली फिल्म का कितनी बेसब्री से इंतजार रहता है. बकौल शाहरुख हां, यह बिल्कुल सच है कि काजोल के साथ काम करना एक अलग अनुभव रहता है हमेशा. वह मेरी बहुत प्यारी दोस्त है. और जब दोस्तों के साथ काम करते हैं तो उसकी एक अलग ही दुनिया बस जाती है. इस फिल्म के लिए काजोल के हां कहने की वजह फिल्म के निर्देशक रोहित शेट्ठी हैं. रोहित काजोल के परिवार के करीबी हैं. काजोल मेरे करीबी हैं और शायद इस वजह से इस फिल्म का संयोग बन गया. काजोल में अब भी कोई बदलाव नहीं है. अच्छा है कि वह अब भी बबली की तरह ही है. सेट पर उसके रहने से खुशनुमा माहौल हमेशा बना ही रहता है.
पतला हीरोइन
हम सब ने मिल कर कृति सनोन को पतला हीरोइन नाम दे दिया है. वजह यह है कि वह सेट पर हम सबसे लंबी है. और पतली भी है. सभी की कोशिश होती है कि हम सभी उसकी लंबाई से मेल खा पायें. यह एक अच्छा अनुभव है कि हमारे साथ नये टैलेंट्स जुड़ रहे हैं. मुझे तो हमेशा ही नये लोगों से सीखना अच्छा लगता है.
्नंरोहित का अंदाज
रोहित और मैं सबसे पहले अंगूर के रीमेक फिल्म को लेकर मिले थे. और अब तक हमने दो फिल्में साथ कर ली हैं. लेकिन अंगूर का संयोग नहीं बन पा रहा है. मुझे रोहित इसलिए पसंद हैं, क्योंकि वह अपनी फिल्म में एक् शन, ड्रामा, इमोशन सबकुछ रखते हैं और खासतौर से फैमिली एंटरटेनर कहते वक्त वह बच्चों का नाम लेना नहीं भूलते. वे जानते हैं कि वे जब तरह तरह के कार उड़ाते हैं हवा में तो बच्चों को बड़ा मजा आता है. तो इस फिल्म में भी रोमांटिक एंगल तो होगा ही. रोहित का अपना अंदाज होगा ही फिल्म में.
आइसलैंड में शूटिंग
इसका पूरा क्रेडिट रोहित और उसकी टीम को है, जिसने इस खूूबसूरत सी जगह की तलाश की. वहां शूटिंग करना कठिन एक्सपीरियंस तो रहा. लेकिन यह भी भूला नहीं जा सकता कि किस तरह रोहित वहां अपनी टीम के साथ तैनात रहते थे. आपको शायद कभी मेकिंग में रोहित की मेहनत देखने को मिले कि रोहित खुद सीन में मौजूद हैं और काजोल की साड़ियां उड़ा रहे हैं. रोहित रफ एंड टफ हैं. कई बार कई एक् शन खुद करके दिखाते हैं वह. तो मुझे लगता है कि एक् शन डिजाइनर अच्छे हैं वह.और साथ ही निर्देशन में उनका हाथ कमाल का है.
रोहित की टीम
रोहित की यह खूबी है कि वह अपनी पूरी टीम के साथ काम करते. वे संजय मिश्रा, मुकेश तिवारी, व उनकी पूरी क्रू टीम को अपनी फिल्मों में जोड़ते ही हैं और उन्हें ऐसे किरदार देते जो फिल्म के अहम हिस्से होते हैं. तो रोहित की ताकत उनकी फिल्म के किरदार भी हैं.
दिलवाले दुल्हनिया के 20 साल पर खास वीडियो
यह रोहित का ही आइडिया था कि वह डीडीएलजे के 20 साल पूरे होने पर एक वीडियो बनाना चाहते थे और हम सभी इसको लेकर उत्साहित भी थे. हम सब फिल्म से अधिक इस वीडियो की मेकिंग को लेकर उत्साहित थे. खासतौर से काजोल. रोहित ने कम वक्त में एक यादगार लम्हे को समेट लिया. जो मुझे हमेशा याद रहेगा.

सिनेमा बदल सकती है सोच : नितिन चंद्रा


नितिन चंद्रा अपनी पहली हिंदी फिल्म लेकर आ रहे हैं. वन्स अपन अ टाइम इन इंडिया. यह फिल्म बिहार के युवाओं की दुनिया की एक ऐसी कहानी बयां करने की कोशिश कर रही है, जिसमें कई सच्चाईयां बयां हो रही हैं. फिल्म के महत्वपूर्ण पहलुओं से फिल्म के निर्देशक नितिन चंद्रा ने रूबरू कराया. इस फिल्म की खास बात यह भी है कि यह फिल्म बिहार की एक खास शख्सियत नीतू चंद्रा ने प्रोडयूस की है. पेश है नितिन से हुई बातचीत के मुख्य अंश 
फिल्म का कांसेप्ट क्या है?
फिल्म, साल 2002-2005 में, बिहार के बक्सर जिले के रहने वाले तीन युवकों की कहानी  हैं. ये फिल्म पलायन, क्षेत्रवाद की राजनीति और बिहार में समाजिक- राजनीतिक - आर्थिक बदहाली से जूझ रहे युवाओं की कहानी है. ये फिल्म बिहार के उन अतीत के पन्नों को पलटता, जहां एक आम भारतीय या आम बिहारी लौट कर नहीं जाना चाहता.  लेकिन देश भर के युवा आए दिन उस दल दल में धकेल दिए जाते हैं जिस बारे में ये फिल्म बात करती है.

इस तरह के विषयों पर फिल्में बनाने की क्या आवश्यकता महसूस होती है?
मुझे नहीं पता कैसी फिल्मों की जरूरत है . लेकिन यह जरूर पता है की कहानी कहनी की जरूरत है. जिस तरह किताबी साहित्य होता है.उसी तरह समाज का जो सबसे प्रसारित और समाज को सबसे प्रभावित करने वाला माध्यम है वो सिनेमाई साहित्य है. सिनेमा ही आम लोगों का साहित्य है .किताबें अब ज्यादातर लोग पढ़ नहीं रहे, साहित्य अब आॅडियो वीडियो हो गया है.कहानी कहना अपने भाव और सोच को बताने की जो बेचैनी है, उसका माध्यम है. हम उस युग में जी जहां हर व्यक्ति अपनी एक पहचान बनाने की जद्दोजहद में हैं. उसी में मैं एक बिहारी, जब ये सोचता हूं कि एक बिहारी के तौर पर मेरी क्या पहचान या एक भारतीय के तौर पर हमारी पहचान क्या है तो मन बेचैन हो उठता है,क्योंकि मैं भारत के 14  राज्यों और दुनिया के5 देशों में रहा हूं.  एक कहानीकार  के तौर पर मैं वो बताना चाहता था जो मेरी कहानी है और मुझे लगता है की ऐसी कहानी जो सब लोगों को अपने किरदाओं और पटकथा के बदलते रंग में बांध कर रखे.      

3.फिल्म के किसी हिस्से को लेकर विवाद हो रहे हैं. इस पर विस्तार पर बताएं?

जैसा की मैंने कहा कि फिल्म साल 2002 से आगे की कहानी है, यह वो समय था जब बिहार में राजनीतिक उथल-पुथल तो थी ही, लेकिन बिहारियों को भी दूसरे राज्यों में कई बार बिहारी होने के लिए हिंसा का सामना करना पड़ा था. 2003 में शिव सेना ने रेलवे परीक्षा देने गए  बिहार के छात्रों की पिटाई की गयी थी और उस समय शिव सेना के विद्यार्थी सेना के प्रमुख राज ठाकरे थे. मैंने फिल्म में राज ठाकरे का नाम रखा था, लेकिन  इस नाम को किसी भी तरह से हमने बुरा नहीं कहा, बस एक समाचार के माध्यम से इसको लिया गया था. इस पर सेंसर बोर्ड को भारी आपत्ति थी.
 सेंसर बोर्ड में भी दिक्कतें हो रही हैं, ऐसी खबरें आ रही हैं?
 सेंसर ने कुछ हास्यास्पद नियम बना रखे हैं, जो कि सरकार के साथ शायद बदल जाते हैं. साला, कमीना जैसे शब्दों पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है जो किसी भी तरह से तार्किक नहीं है.  सेंसर की कोई नियमावली नहीं है और बतौर फिल्मकार जब हम पुरानी फिल्मों में इस्तेमाल किये शब्द अपनी फिल्मों में लाते हैं तो यह सोचते हैं की कोई दिक्कत की बात नहीं है, लेकिन हमें ये ध्यान नहीं रहता कि जब फलां फिल्म में फलां शब्द पास कर दिया गया था तो सरकार कोई और थी अब सरकार कोई और है. इस तरह के जंगल राज वाले नियम सिनेमा के लिए ही नहीं बल्कि दर्शकों के लिए भी हानिकारक हैं.  

4.फिल्म के शीर्षक के बारे में बताएं?
फिल्म का ऐसा शीर्षक इसलिए है क्योंकि ये बिहार के बारे में २००२ के आस पास की कहानी है. कहानी जितनी अलग नयी और रोचक है नाम भी वैसा ही रखना था.

5. फिल्म किस तरह बिहार के लोगों को प्रभावित होगी?

ये फिल्म खासतौर पर बिहार के लोगों को उस तरह से प्रभावित करेगी जैसा किसी फिल्म ने आज तक नहीं  किया है और ये मेरा अनुमान नहीं दावा है. इसमें एक पात्र कहता है कि बिहार के लोग जो मार खा रहे ह.ैं क्या कोई उनको बचाया जा सकता है. एक दूसरा संवाद है कि बिहार के लोग बाहर तो जाते हैं.लेकिन ये नहीं कहते की वो बिहार से हैं. एक  किरदार कहता है की बिहार को लोग कान से देखते हैं, आंख से नहीं.  और ऐसे दिल में टीस जगाने वाले कई संवाद हैं जो प्रभावत करेगी.

6. फिल्म का उद्देश्य क्या है?
फिल्म का मोटिव ये है कि  दर्शक कहानी रूपी नाव में किरदार रूपी पतवार के साथ समय रूपी नदी के उस पार जाएं ,जहां मैं उन्हें ले जाना चाहता हूं.मनोरंजन का मतलब मेरे लिए दर्शकों को खिल्ली रखना, वो मेरे कथानक से बाहर नहीं निकले और फिल्म के आखिरी किनारे में अगर वो कुछ पा लें तो अच्छा है.

7. नीतू बिहार की एक बड़ी आइकन हैं. तो बतौर आइकन और बतौर परिवार की अहम सदस्य आप उन्हें किस तरह देखते हैं?
नीतू बिहार से निकली अंतरराष्ट्रीय आइकन हैं और यह गर्व हमारे साथ उस वक़्त से है, जब वो देश की तरफ से खेलों में सक्रीय थीं.  नीतू घर के अंदर आम लड़की है, लेकिन जब हम कभी बाहर एक साथ होते हैं तो यह देख कर रोमांच होता है जब लोग उसे पहचान कर उसे देखते हैं.
 बिहार के वर्तमान हालात पर आपकी क्या राय है?
वर्तमान में राजनितिक स्थति काफी निराशाजनक है, और ये मेरी व्य्कतिगत राय है .एक वोटर के तौर पर मैं पूरे तरह से भ्रम की स्थिति में  हूं कि वोट किसे  देना है.

और किस तरह के विषयों पर फिल्में बनाना चाहते हैं?

मैं तिलका मांझी, बिस्मिल्लाह खान, कुंवर सिंह, चित्तू पांडे,  भगवान बिरसा मुंडा, यहां तक की नीतू के जीवन पर कहानी बनाना चाहता हूं. मेरी कहानी बिहार झारखंड और उत्तर प्रदेश  की होती है.कहानियां ऐसी जो हमें शर्मिंदा ना करें बल्कि मनोरंजन के साथ आत्म मंथन करने पर जरूर मजबूर करे.

बिहार के लोगों की जो छवि दुनिया में बनी है. उसे कैसे दुरुस्त किया जा सकता है..

बिहारियों के बारे में जो सोच है वो कई मायनो में सही भी है और कई बार गलत भी. लेकिन सवाल है कि बिहार ही क्यों. इस  विषय पर और मंथन की जरुरत है ।
मुझे लगता है कि सिनेमा बहुत हद तक यह सोच बदल सकती है. सिनेमा को लेकर बिहार और झारखण्ड सरकारों को गंभीर होने की जरुरत है और स्थानीय भाषाओं में सिनेमा को लेकर योजनाएं बनाएं क्योंकि सिनेमा लाखों का मनोरंजन करती है तो हजारों को रोजगार भी देती है.